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18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के सत्र: “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता: समावेशी वैश्विक विकास के लिए भविष्य को आकार देना” में प्रधानमंत्री के प्रारंभिक वक्तव्य

September 13, 2026

18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के सत्र: “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता: समावेशी वैश्विक विकास के लिए भविष्य को आकार देना” में प्रधानमंत्री के प्रारंभिक वक्तव्य

Posted Date:- Sep 13, 2026

Your Highness,
Excellencies,
नमस्कार।

ब्रिक्स के विस्तृत परिवार में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।

आज यह सभागार अलग-अलग महाद्वीपों, संस्कृतियों और विकास यात्राओं को एक साथ जोड़ रहा है। यह ब्रिक्स की बढ़ती ताकत, आकर्षण और अभूतपूर्व विश्वास का प्रमाण है।

Friends,

भारत की अध्यक्षता में हमने सभी प्रयास Resilience, Innovation, Cooperation और Sustainability, इन चार स्तंभों पर केंद्रित किये हैं। मुझे खुशी है कि आप सबके सहयोग और समर्थन से हम अपने साझा vision को win-win सहयोग में बदल सके।

आज विश्व में तनावों की संख्या लगातार बढ़ रही है, और सामान्य मानव के जीवन पर इसका बहुत negative प्रभाव भी हो रहा है, और व्यापक प्रभाव भी हो रहा है।

महामारियों, climate disasters और supply-chain disruptions ने दिखाया है कि आज के interconnected world में कोई भी संकट एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। इसलिए हमने ब्रिक्स समूह में Resilience बढ़ाने पर विशेष बल दिया है। चुनौतियों को समय रहते पहचानना, उनके लिए तैयार रहना और तुरंत कार्रवाई करना भी उतना ही आवश्यक है।

इसी सोच के साथ, infectious diseases के prevention और response के लिए BRICS Integrated Early Warning System पर सहमति बनी है। Disaster Management के लिए Early Warning Data Integration Guidelines तैयार की गई हैं। BRICS Logistics Supply Chain Cooperation Framework हमारी supply chains को अधिक reliable और resilient बनाने में सहायक होगा।

Friends,

Innovation के अंतर्गत BRICS Incubator Network हमारे start-ups और incubators को आपस में जोड़ेगा। Innovative और scalable solutions को बढ़ावा देने के लिए हमने BRICS Startup Innovation Fund का प्रस्ताव रखा है।

BRICS Network on Digital Agriculture किसानों के लिए नई संभावनाएं तैयार करेगा। इसके माध्यम से AI, geospatial technology और Digital Public Infrastructure को किसानों की वास्तविक आवश्यकताओं से जोड़ा जाएगा।

Technology और Critical Minerals का weaponization हमारी साझा प्रगति में बाधा बन सकता है। इसलिए हमने technology के adoption में inclusivity पर बल दिया है।

Friends,

भारत ने ब्रिक्स के मंच से मित्रता, सहभागिता और सहयोग को आगे बढ़ाया है।

हमारा प्रयास रहा है कि ब्रिक्स cooperation केवल सरकारों तक सीमित न रहे। हमारे entrepreneurs, farmers, researchers, women, youth और सामान्य नागरिक भी इसके सक्रिय भागीदार बनें।

हमने BRICS CONNECT के माध्यम से skills, employability, women in workforce, social security और capacity building को बढ़ावा दिया है।

छोटे उद्यमों को knowledge, finance और नए markets से जोड़ने के लिए, BRICS MSME Cooperation Portal का इनिश्यटिव लिया गया है।

हमारे शहरों के बीच best practices साझा करने के लिए BRICS Urban Mobility Hub की स्थापना की गई है।

Friends,

भारतीय सभ्यता में प्रकृति को माँ का दर्जा दिया गया है। सदियों से हमारी मान्यता रही है कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विकल्प नहीं, पूरक हैं। BRICS में भी हमने मानव विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन पर बल दिया है।

यही Sustainability का आधार है। यह भावी पीढ़ियों के प्रति हमारा दायित्व भी है। इस दिशा में हमने कई पहलुओं पर प्रगति की है।

Smart Grids और Energy Storage के लिए हमने BRICS Digital Centre of Excellence बनाया है। यह हमारे clean energy systems को अधिक reliable, efficient और accessible बनाने में मदद करेगा।

Agro-Ecology और Regenerative Agriculture के Centers of Excellence, पारंपरिक ज्ञान को modern science से जोड़ेंगे। Community-based climate adaptation के लिए तैयार किये गए सिद्धांत, indigenous knowledge को climate action का महत्वपूर्ण आधार बनाएँगे।

Friends,

इन चारों स्तंभों पर आगे बढ़ते हुए BRICS के माध्यम से हमने inclusive global growth को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। क्योंकि हमारा मानना है कि BRICS में विकसित solutions का लाभ केवल ब्रिक्स तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इन्हें ग्लोबल साउथ की आवश्यकताओं के अनुरूप adaptable और accessible बनाना चाहिए।

साथियों,

मैं मेरे निजी अनुभव से कह सकता हूं कि BRICS में Global South के देशों का विश्वास बढ़ा है, क्योंकि BRICS में-

उनकी आवाज सुनी जाती है।
उनके अनुभव का सम्मान होता है।
और solutions उनके लिए नहीं, उनके साथ मिलकर बनाए जाते हैं।

BRICS की शक्ति हमारी diversity और cooperation में है।

We may be rooted in different realities, but together, we rise through cooperation, and blossom for humanity.

हमारी विविधता हमारी पहचान रहे, हमारा सहयोग हमारी प्रेरणा बने, और हमारी प्रगति पूरी मानवता के काम आए।

आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद।

प्रधानमंत्री ने “समावेशी वैश्विक शासन और बहुपक्षवाद को मजबूत करने” पर आयोजित ब्रिक्स सत्र की अध्यक्षता की

Posted Date:- Sep 12, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान “समावेशी वैश्विक शासन और बहुपक्षवाद को मजबूत बनाने” पर आयोजित ब्रिक्स सत्र की अध्यक्षता की।

2. अपने वक्तव्य में, प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि:

  1. ग्लोबल साउथ वैश्विक संकटों का सामना करने के मामले में सबसे अग्रिम पंक्ति में है, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में सबसे पीछे। हमें “पिरामिड ऑफ प्रिविलेज” को “प्लेटफॉर्म ऑफ पार्टनरशिप” में बदलना होगा।
  2. वैश्विक शासन में आज की वास्तविकताओं को दर्शाना चाहिए, जिसमें विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे संस्थानों में अधिक प्रतिनिधित्व होना आवश्यक है।
  3. ग्लोबल साउथ को केवल नियम मानने वाले के बजाय नियम बनाने वाले की भूमिका में लाने के प्रयास किए जाने चाहिए। ब्रिक्स के माध्यम से, हम ग्लोबल साउथ के युवा राजनयिकों और नीति निर्माताओं को वार्ता कौशल, व्यावहारिक प्रशिक्षण और कानूनी विशेषज्ञता प्रदान कर सकते हैं।
  4. समुद्री नाविक, वैश्विक व्यापार में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, फिर भी संकट के समय उन्हें अक्सर पर्याप्त सहायता नहीं मिल पाती है। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने समुद्री नाविक आपातकालीन सहायता नेटवर्क स्थापित करने का प्रस्ताव रखा।

3. प्रधानमंत्री ने अपने वक्तव्य का समापन यह कहते हुए किया कि चूंकि हमारा भविष्य साझा है, इसलिए उस भविष्य को आकार देने का अधिकार भी साझा होना चाहिए – आवाज उठाने से लेकर प्रभाव छोड़ने तक, और विशेषाधिकार से लेकर साझेदारी तक। प्रधानमंत्री का प्रारंभिक वक्तव्य यहां देखा जा सकता है।

4. सत्र का समापन नई दिल्ली ब्रिक्स लीडर्स घोषणापत्र को अपनाने के साथ हुआ, जो भविष्य में ब्रिक्स सहयोग की साझा प्राथमिकताओं, प्रतिबद्धताओं और दिशा को तय करता है। यह घोषणापत्र यहां देखा जा सकता है।

प्रधानमंत्री की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय बैठक

Posted Date:- Sep 12, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर चीन जनवादी गणराज्य के राष्ट्रपति महामहिम श्री शी जिनपिंग के साथ मुलाकात की।

दोनों नेताओं ने अगस्त 2025 में तियानजिन में हुई अपनी पिछली बैठक के बाद से भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में हुई निरंतर प्रगति का स्वागत किया। उन्होंने दोहराया कि दोनों देशों को अपने संबंधों के प्रति रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। मतभेदों को विवादों का रूप नहीं लेना चाहिए। प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि दोनों पक्षों को तीन पारस्परिकताओं—पारस्परिक सम्मान, पारस्परिक संवेदनशीलता और पारस्परिक हित—से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता द्विपक्षीय संबंधों के निरंतर विकास का एक आवश्यक आधार बनी हुई है। उन्होंने सीमा से संबंधित मुद्दों पर मौजूदा समझौतों और सहमतियों का दोनों पक्षों द्वारा पालन किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। दोनों नेताओं ने अपने समग्र द्विपक्षीय संबंधों के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और दोनों देशों के लोगों के दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए सीमा प्रश्न के निष्पक्ष, तर्कसंगत और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

दोनों नेताओं ने जन-से-जन संबंधों में हुई प्रगति का संज्ञान लिया और दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, कारोबारी संबंधों तथा लोगों की अधिक आवाजाही को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। आर्थिक और व्यापारिक संबंधों के संबंध में, उन्होंने संरचनात्मक व्यापार असंतुलन और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े मुद्दों सहित एक-दूसरे की चिंताओं का समाधान करने तथा सार्थक और पूर्वानुमेय बाजार पहुंच को सुगम बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

दोनों नेताओं ने सहमति व्यक्त की कि दोनों पक्षों को क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों तथा चुनौतियों के समाधान के लिए साझे आधार का लगातार विस्तार करते रहना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के लिए चीन के समर्थन और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन-2026 की सफलता में उसके योगदान की सराहना की।

18th BRICS Summit Session: Inclusive Global Governance and Strengthening के दौरान प्रधानमंत्री के Opening Remarks

Posted Date:- Sep 12, 2026

Your Highness,
Excellencies,
नमस्कार!

भारत में आप सभी का स्वागत और अभिनंदन करते हुए मुझे अत्यंत खुशी हो रही है।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता people-centric और humanity first approach पर आधारित है। Resilience, Innovation, Cooperation और Sustainability हमारी प्राथमिकताएं रही हैं। इन प्राथमिकताओं के साथ, हमने BRICS सहयोग को सामान्य जन से जोड़ने पर विशेष बल दिया है।

इसी सोच के साथ साढ़े तीन सौ से अधिक बैठकों का आयोजन किया गया। लगभग तीस शहरों में आपकी टीम्स का स्वागत करने का हमें अवसर मिला। भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता को सफल बनाने में सक्रिय योगदान और समर्थन के लिए मैं आप सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।

Friends,

इस वर्ष की ब्रिक्स Summit एक ऐतिहासिक पड़ाव है। हम ब्रिक्स की बीसवीं वर्षगांठ मना रहे हैं। मानव जीवन में बीस वर्ष की आयु, maturity और responsibility के नए चरण का आरंभ होती है। यह वह अवस्था होती है, जब सपनों के साथ जिम्मेदारियाँ जुड़ती हैं, सामर्थ्य को नई दिशा मिलती है।

आज ब्रिक्स भी अपने ‘coming of age’ के क्षण में है। पिछले बीस वर्षों में ब्रिक्स ने वैश्विक मंच पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। हम एक-दूसरे के दृष्टिकोण का सम्मान करते हैं और consensus से आगे बढ़ते हैं। हम किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने की सोच के साथ आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।

अब समय है, कि हम ब्रिक्स में हमारी एकता और सहमति को वैश्विक मंच पर ठोस परिणामों में बदलें। अगले बीस वर्षों के लिए हमें एक नए और ambitious agenda पर काम करना होगा। इसकी शुरुआत हमें अपने खुद के वर्किंग सिस्टम से करनी होगी।

ब्रिक्स की अध्यक्षता हर वर्ष बदलती है, किन्तु इसकी वजह से हमारा institutional momentum नहीं रुकना चाहिए। मैं BRICS Continuity and Implementation Mechanism का प्रस्ताव रखता हूँ। इसके तहत Troika के माध्यम से सभी initiatives और outcomes का follow up हो सकेगा।

हम एक secure digital repository बना सकते हैं। इसमें हर निर्णय के साथ nodal point, समय-सीमा और implementation status दर्ज किया जा सकता है।

Friends,

ब्रिक्स को मजबूत करते हुए, हमें global reform की दिशा भी तय करनी होगी। Global Governance का वर्तमान structure, एक pyramid जैसा दिखाई देता है। इसके ऊपरी भाग में power और decision making केंद्रित हैं, और निचले भाग में वे देश हैं जो इन decisions से प्रभावित तो होते हैं, लेकिन उन्हें आकार नहीं दे पाते।

Global South आज वैश्विक संकटों की front row में है, लेकिन decision-making की back row में। हमें इस “pyramid of privilege” को “platform of partnership” में बदलना है, जहां हर देश की आवाज़ हो, हर सदस्य का stake हो और हर प्रयास के केंद्र में मानवता का विकास हो।

इस उद्देश्य से मैं प्रस्ताव रखता हूँ कि हम मिलकर global governance reform के दस proposals तैयार करें, जिसे हम अगली Summit तक एक BRICS Reform Roadmap का रूप देने का प्रयास कर सकते हैं।

इस roadmap को बनाने में हमें तीन मुख्य पहलुओं- Representation, Responsiveness and Rule-making का ध्यान रखना होगा।

पहला, Representation के संबंध में मैं कहना चाहूंगा, UN Security Council में reform अब और टाला नहीं जा सकता। इस विषय पर text-based negotiations को निश्चित समय-सीमा और स्पष्ट परिणाम से जोड़ना होगा।

उसी तरह, financial institutions में voting power, leadership positions और policy priorities आज की इकोनॉमिक रियेलिटीज़ के अनुसार होनी चाहिए। जो देश global economic growth को गति देते हैं, उन्हें global economic governance को दिशा देने में भी उचित भूमिका मिलनी चाहिए।

दूसरा, Responsiveness। वैश्विक संस्थानों में मानवता का विश्वास तभी बनेगा जब वे समस्याओं का प्रभावी समाधान करने में सक्षम होंगे। हमें collective response के speed, scale और last mile impact पर ध्यान देना होगा।

Seafarers का वैश्विक व्यापार में बहुत बड़ा योगदान है, किन्तु अक्सर मुश्किल समय में उन्हें सहारे की कमी महसूस होती है। मेरा प्रस्ताव है कि क्या हम Seafarers Emergency Support Network बना सकते हैं? इसके माध्यम से संबंधित देशों की Maritime authorities और missions को जोड़ा जाएगा। इससे distress alerts, medical assistance, परिवारों को सूचना तथा evacuation में सहयोग दिया जा सकता है।

और तीसरी मैं कहना चाहता हूँ Rule Making के संबंध में। भविष्य के global rules तय करने में समान भागीदारी सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

AI, cyberspace, outer space, biotechnology और critical technologies, भविष्य के अवसरों के साथ भविष्य के नियम भी तय कर रहे हैं।

हमें ग्लोबल साउथ को rule-taker से rule-shaper बनाने के लिए प्रयास करने होंगे। ब्रिक्स के माध्यम से हम ग्लोबल साउथ के देशों के युवा diplomats और policymakers को negotiations skills, practical training और legal expertise प्रदान कर सकते हैं।

सुखद संयोग से आज United Nations Day for South-South Cooperation है। Global South को समर्पित इस दिन पर ऐसा निर्णय लिया जाना विशेष महत्व रखता है। भारत इस विषय में lead लेने के लिए तैयार है।

Friends,

भारत में आयोजित इस ब्रिक्स समिट का संदेश स्पष्ट होना चाहिए: यदि हमारा भविष्य साझा है, तो उसके निर्माण का अधिकार भी साझा होना चाहिए।

From voice to impact. From privilege to partnership.

यही ब्रिक्स at 20 का संकल्प हो।

बहुत-बहुत धन्यवाद।

हिंदी और एक राजभाषा का प्रश्न

Rajrishi Purushottam Das Tandon

लेख प्रकाशित 13.09.2026, रविवार

सर्वेश कुमार सिंह

भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रवाह हिन्दी में गतिमान है। हिंदी ही भारत की राष्ट्रीय पहचान है। किंतु इसे अभी तक भारत में एकमेव राजभाषा का गौरव नहीं मिल सका है। राजनीतिक तिकड़म और अंग्रेजी प्रेमी नेताओं ने हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी को भी सहायक राजभाषा का दर्जा दिया हुआ है। इसे समाप्त किए जाने की आवश्यकता है तभी हिंदी भारत की अकेली राजभाषा बन सकेगी। वर्ष 1963 का संसद द्वारा पारित विधेयक इस राह का सबसे बड़ा रोड़ा है।

हम हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते हैं। क्योंकि इसी दिन 1949 में संविधान सभा ने लंबी बहस के बाद अनुच्छेद 343 (1) के तहत हिंदी को भारत की राजभाषा स्वीकार किया था। इसमें लिखा गया कि देवनागरी में लिखी गई हिंदी भारत की राजभाषा होगी। इसी उपलक्ष्य में 1953 में पहली बार वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया। तभी से हम हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते हैं।

स्वतंत्र भारत में हिंदी को न्याय और यथोचित स्थान देने की कोशिश हुई, किंतु अंग्रेजी प्रेमी नेतृत्व का विदेशी भाषा से मोह नहीं टूटा। उन्होंने 1950 में ये निर्णय ले लिया कि आगामी 15 वर्ष तक हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी भी सहायक राजभाषा रहेगी। ये 15 वर्ष अंतहीन हो गए हैं और आज तक समाप्त नहीं हुए हैं। परिणाम ये हुआ कि हिंदी की समानांतर राज भाषा बनकर अंग्रेजी ने भारत की राजव्यवस्था से लेकर समस्त शिक्षा व्यवस्था को अपने चंगुल में जकड़ लिया। जब अंग्रेजी के लिए निर्धारित समय सीमा निकट आई तो एक बार फिर हिंदी के साथ छल हुआ। वर्ष 1963 में संसद में विधेयक पारित किया गया कि हिंदी के साथ तब तक अंग्रेजी भी राजभाषा बनी रहेगी जब तक दक्षिण भारत के राज्य हिंदी को राजभाषा मानने पर सहमत ना हो जाएं। ये विधेयक ऐसा बैरियर है जो हिंदी को उसके यथोचित सम्मान की दिशा में प्रगति को बाधित करता है।

उत्तर भारत खासकर उत्तर प्रदेश में हिंदी को राजभाषा से आगे राष्ट्र भाषा का गौरव दिलाने का प्रश्न स्वाभिमान से जुड़ा रहा है। इसी कड़ी में 1910 में राजऋषि पुरुषोत्तम दास टंडन ने हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की। इसमें अनेक हिंदी प्रेमियों ने हिंदी की शाश्वत ज्वाला को प्रज्ज्वलित किया हुआ है। हिंदी को राजभाषा का आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए भी राजऋषि पुरुषोत्तम दास टंडन ने संविधान सभा में लंबी और निर्णायक पैरवी की। प्रखर समाजवादी नेता और चिंतक डॉ राममनोहर लोहिया ने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चलाया। डा लोहिया का कहना था कि लोकभाषा के बगैर लोकराज असंभव है। पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1900 में संयुक्त प्रांत में हिंदी को शासकीय और न्यायालय की भाषा का दर्जा दिलाया। इन प्रयासों से आज हिंदी गौरवान्वित है।

देवनागरी के शासकीय प्रयोग की शताब्दी पर लखनऊ के रवींद्रालय में 18 अप्रैल 2000 को आयोजित समारोह में हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल पंडित विष्णुकांत शास्त्री ने कहा था कि आज अखिल भारतीय स्तर पर अंग्रेजी जीत रही है। भारतीय बाधाएं पिछड़ रही हैं। अंग्रेजी प्रतिष्ठा की प्रतीक बन गई है। उन्होंने कहा कि कोई भी स्वाभिमानी देश अपने देश के बच्चों को विदेशी भाषा में शिक्षा नहीं देता। उन्होंने सुझाव दिया कि हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति बनाई जानी चाहिए और हिंदी का प्रयोग नहीं करने पर दंड की व्यवस्था होनी चाहिए।

हिंदी के विकास को कैसे अवरुद्ध किया गया इस पर प्रख्यात साहित्यकार डॉ विद्यानिवास मिश्र ने एक लेख में अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने रायबरेली में 30 सितंबर से 1 अक्टूबर 2000 तक आयोजित उप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन के अवसर पर एक लेख प्रेषित किया, जिसे आयोजकों ने पत्रक के रूप में प्रकाशित कर वितरित किया। इसमें डॉ मिश्रा ने कहा कि अंग्रेजी को 15 वर्ष से आगे बनाए रखने के लिए हिंदी शब्दावली आयोग बना दिए गए। कहा गया हिंदी को तो अभी बनना है। ये आयोग हिंदी के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए नहीं बने, बल्कि मार्ग के रोड़े बने। ये बहाने बने की हिंदी का निर्माण करना है। तत्कालीन एक मंत्री ने कहा था कि हिंदी तो वन की शकुंतला है, इसे राज दरबार में आना है तो इसे राज दरबार के अनुरूप आना होगा।

आज लगभग 77 साल बाद भी राजभाषा का प्रश्न ज्यों का त्यों है। इसे न तो संसद और न ही राजनीतिक दल तय कर सके हैं। हां समाज और समय ने इसे न्याय देने का प्रयास किया है। समाज ने हिंदी को अपने अंतर्मन में स्थान दिया है, इसे अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाए रखा है। समय ने भी न्याय किया है। कंप्यूटर युग और इसमें भारतीय भाषा टूल यूनिकोड आदि मील के पत्थर साबित हुए हैं। इस प्रयास में भारत सरकार का योगदान रहा और हिन्दी कंप्यूटर की सुगम भाषा बनकर उभरी है।

वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व से अपेक्षा है कि हिंदी को एकमेव राजभाषा का संविधानिक दर्जा प्रदान करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दें।

लेखक परिचय : सर्वेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार लखनऊ

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