Web News

www.upwebnews.com

लखनऊ में नकली दवाओं के संगठित नेटवर्क पर एफएसडीए की बड़ी कार्रवाई, चार के खिलाफ एफआईआर

August 12, 2026

लखनऊ में नकली दवाओं के संगठित नेटवर्क पर एफएसडीए की बड़ी कार्रवाई, चार के खिलाफ एफआईआर

बिना दवा सप्लाई के करोड़ों की फर्जी बिलिंग का आरोप

*39.20 लाख Zoryl M1 टैबलेट का हिसाब नहीं मिला, बंद फर्म के जरिए भी कागजी लेनदेन*

*एफएसडीए आयुक्त के निर्देश पर राजधानी लखनऊ के अमीनाबाद थाने में दर्ज की गई एफआईआर*

*लखनऊ, 12 अगस्त।* नकली और संदिग्ध दवाओं की सप्लाई चेन के खिलाफ योगी सरकार सख्ती से निपट रही है। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) ने बुधवार को लखनऊ में एक और बड़े नेटवर्क का खुलासा करते हुए बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया है। विभाग के अनुसार, अमीनाबाद में बिना वास्तविक दवा की आपूर्ति किए फर्जी बिलिंग, क्रॉस-बिलिंग और कागजी लेनदेन के जरिए नकली एवं काउंटरफिट दवाओं को बाजार में खपाने का खेल चल रहा था। मामले में चार आरोपियों के खिलाफ थाना अमीनाबाद में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराई गई है।

एफआईआर में अंकुर अवस्थी, प्रोपराइटर हेल्थ प्लस, मनीष बाजपेयी, संचालक एमके फार्मा, गोविंद शुक्ला, संचालक राम फार्मा और ऐजाज अहमद, संचालक पैशन्ट केयर सर्जिकल हाउस, सहारनपुर को आरोपी बनाया गया है। आरोप है कि इन फर्मों के बीच बिना वास्तविक दवा सप्लाई के आपस में बिलिंग की गई और कागजों पर लेनदेन दिखाकर दवाओं की खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड तैयार किया गया।

*बिना लाइसेंस दवाओं का कारोबार करने का आरोप*
विभाग के मुताबिक अमीनाबाद स्थित हेल्थ प्लस के प्रोपराइटर अंकुर अवस्थी ने वैध औषधि लाइसेंस के बिना बड़े पैमाने पर दवाओं के भंडारण और लेनदेन का रिकॉर्ड तैयार किया। जांच में गोविंद शुक्ला की भूमिका भी सामने आई, जिन्हें विभाग ने फर्म के मुख्य कर्ताधर्ताओं में शामिल बताया है। जांच के अनुसार, हेल्थ प्लस और राम फार्मा एक ही फ्लोर पर संचालित हो रहे थे और इनके माध्यम से कथित तौर पर दवाओं के अवैध डायवर्जन और कागजी लेनदेन का नेटवर्क चलाया जा रहा था। सहारनपुर की पैशन्ट केयर सर्जिकल हाउस नामक फर्म, जो पिछले करीब दो वर्षों से बंद बताई गई है, का इस्तेमाल भी कथित तौर पर फर्जी खरीद और कागजी रोटेशन के लिए किया गया।

*8.87 करोड़ रुपये की खरीद दिखाने का दावा*
मामले में एमके फार्मा की भूमिका भी जांच के घेरे में है। विभाग के अनुसार, फर्म के संचालक मनीष बाजपेयी ने वित्तीय वर्ष 2026 में करीब 8.87 करोड़ रुपये की दवाओं की खरीद दिखाई। जांच के दौरान विभाग को कथित तौर पर ऐसे दस्तावेज मिले, जिनमें अन्य फर्मों के नाम पर Zoryl M1, Augmentin और Dexorange Syrup की खरीद दर्शाई गई थी।
विभाग का कहना है कि साक्ष्य छिपाने के लिए लैपटॉप का पुराना डेटा भी डिलीट किया गया। दवाओं के निर्माताओं और संबंधित फर्मों से सत्यापन कराया गया तो उन्होंने इन दवाओं की बिक्री से इनकार किया और संबंधित बैचों को काउंटरफिट बताया।

*39.20 लाख Zoryl M1 का नहीं मिला हिसाब*
जांच में एमके फार्मा से Zoryl M1 की करीब 39.20 लाख दवाओं का हिसाब नहीं मिलने की बात सामने आई है। विभाग का आरोप है कि इन दवाओं को अवैध तरीके से बाजार में खपाया गया, जिससे लोगों के स्वास्थ्य और जान को गंभीर खतरा पैदा हो सकता था। एफएसडीए के अधिकारियों के मुताबिक, पूरे मामले में फर्जी रिकॉर्ड तैयार करने, कूटरचना, नकली दवाओं के कारोबार और अवैध धन अर्जित करने की आशंका की जांच की जा रही है। इसी आधार पर चारों आरोपियों के खिलाफ बीएनएस की धारा 111, 276, 277, 278, 318, 319, 336 और 338 के तहत कार्रवाई की गई है।

*लखनऊ में पहले भी सामने आ चुके हैं कई मामले*
नकली दवाओं और फर्जी बिलिंग के खिलाफ चल रहे अभियान में लखनऊ में इससे पहले भी कई बड़ी कार्रवाई की जा चुकी हैं। विभाग के अनुसार, अमीनाबाद की आठ फर्मों और एक सॉफ्टवेयर डिस्ट्रीब्यूटर के खिलाफ फर्जी बिलिंग और सॉफ्टवेयर में हेरफेर के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। इनमें महाराजा इंटरप्राइजेज, शिव शक्ति फार्मा, श्री अशोक फार्मास्युटिकल्स, अपोलो फार्मेसी, शिव शक्ति मेडिकल, मीत इंटरप्राइजेज, विद्या फार्म और आरएन फार्मा के साथ मार्ग सॉफ्टवेयर के डिस्ट्रीब्यूटर आबिद अली शामिल हैं।

जुलाई 2026 में अमीनाबाद के एक कथित अवैध गोदाम से करीब 21 लाख रुपये की नकली दवाएं बरामद की गई थीं। इसी तरह आलमबाग मेट्रो स्टेशन के पास करीब 1.60 लाख रुपये की संदिग्ध दवाएं जब्त की गईं। बख्शी का तालाब क्षेत्र में भी अवैध भंडारण और परिवहन के मामले में कार्रवाई की गई।

*आगरा में भी सामने आया बड़ा नेटवर्क*
एफएसडीए के अभियान के दौरान आगरा में भी नकली, री-लेबल की गई और सरकारी सप्लाई की दवाओं के अवैध कारोबार के कई मामले सामने आए हैं। विभाग के अनुसार, कम्बूटोला, मुबारक महल, शू मार्केट और नवबिया मार्केट में की गई कार्रवाई में 15 से अधिक संचालकों के खिलाफ नौ एफआईआर दर्ज कराई गईं।
जांच में कथित तौर पर फर्जी बिलों के जरिए टोरेंट फार्मा की नकली Chymoral Forte और Aciloc जैसी दवाओं की बिक्री तथा ESI और सरकारी कोटे की दवाओं की कालाबाजारी का मामला सामने आया। इसके अलावा अस्पतालों और सरकारी संस्थानों के लिए भेजी गई दवाओं के मूल लेबल हटाकर नए लेबल और मनमानी एमआरपी लगाकर खुले बाजार में बेचने का मामला भी पकड़ा गया।

आगरा में एक अन्य कार्रवाई में Telma-H और Jardiance जैसी दवाओं की कथित री-लेबलिंग तथा निरस्त या कागजी फर्मों के जरिए करीब 1.88 करोड़ रुपये की फर्जी बिलिंग का खुलासा हुआ।

विभाग के अनुसार, आगरा में अब तक 3.63 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की अवैध, नकली तथा सरकारी/डिफेंस सप्लाई की दवाएं जब्त की जा चुकी हैं। मई 2026 में एक अवैध गोदाम से करीब 2.5 करोड़ रुपये मूल्य की इंसुलिन, वैक्सीन और डिफेंस/ईएसआई
सप्लाई की दवाएं बिना आवश्यक कोल्ड-चेन के रखी मिली थीं। वहीं, करीब 50 लाख रुपये की नकली Oxalgin DP भी जब्त की गई थी।

*दूसरे राज्यों तक फैले नेटवर्क की जांच*
एफएसडीए अब नकली दवाओं के इस नेटवर्क के अंतरराज्यीय कनेक्शन की भी जांच कर रहा है। विभाग के मुताबिक लखनऊ के अमीनाबाद में एक अवैध गोदाम से बरामद नकली दवाओं के स्रोत की जांच राजस्थान तक पहुंची है। इस मामले में भूपेंद्र शर्मा और ट्रांसपोर्टर सतेन्द्र गुज्जर के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज कराई गई है। देहरादून में कथित तौर पर विभिन्न ब्रांड की नकली दवाएं तैयार करने वाली एक अवैध निर्माण इकाई के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई की गई है। मामले में राजेंद्र सिंह उर्फ अरुण टुंडा, विनय भटनागर, गौरव त्यागी और विनय चन्द्र के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है।

*लाइसेंस निरस्तीकरण और एजेंटों पर भी होगी कार्रवाई*
विभाग ने नकली और काउंटरफिट दवाओं की सप्लाई चेन तोड़ने के लिए प्रदेशभर में निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। आयुक्त खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन, उत्तर प्रदेश डॉ रोशन जैकब ने सभी जिलों के औषधि निरीक्षकों को अंतरराज्यीय नेटवर्क से जुड़े कारोबारियों, स्थानीय थोक फर्मों और एजेंटों पर लगातार निगरानी रखने को कहा है। उनके अनुसार, जांच में दोषी पाए जाने वाले कारोबारियों के लाइसेंस निरस्त करने के साथ उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई भी की जाएगी। उद्देश्य नकली, अमानक, री-लेबल और अवैध दवाओं की सप्लाई चेन को उसके स्रोत तक पहुंचकर समाप्त करना है।

August 11, 2026

आरएमएलआईएमएस रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी के उत्साहजनक परिणाम

75 मरीजों के मूल्यांकन में बेहतर पोस्ट-ऑपरेटिव रिकवरी, कम दर्द और उच्च मरीज संतुष्टि

लगभग 80% मरीज 48 घंटे में स्वतंत्र रूप से चलने लगे, जबकि 60% मरीज तीन दिनों के भीतर हुए डिस्चार्ज

डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान , लखनऊ के सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग में रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी के परिणाम अत्यंत उत्साहजनक सामने आए हैं। विभाग में रोबोटिक सर्जरी से उपचारित 75 मरीजों के पोस्ट-ऑपरेटिव रिकवरी, जीवन की गुणवत्ता तथा मरीजों की संतुष्टि का मूल्यांकन किया गया। इस गुणवत्ता आकलन में मरीजों में तेज रिकवरी, कम दर्द, शीघ्र गतिशीलता और उपचार के प्रति उच्च स्तर की संतुष्टि देखने को मिली।

रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी आधुनिक शल्य चिकित्सा की एक उन्नत तकनीक है, जो सर्जन को ऑपरेशन के दौरान बेहतर सटीकता, नियंत्रण और सूक्ष्म गतिविधियों को करने में सहायता प्रदान करती है। छोटे चीरे, कम पोस्ट-ऑपरेटिव दर्द, छोटे निशान, शीघ्र गतिशीलता तथा दैनिक गतिविधियों और काम पर अपेक्षाकृत जल्दी लौटना इसके प्रमुख संभावित लाभ हैं।

75 मरीजों के आकलन में सामने आए उत्साहजनक परिणाम

आरएमएलआईएमएस में किए गए गुणवत्ता एवं जीवन-गुणवत्ता आकलन में रोबोटिक सर्जरी के बाद मरीजों की रिकवरी के कई सकारात्मक संकेत सामने आए।

लगभग 80 प्रतिशत मरीजों ने ऑपरेशन के 48 घंटे के भीतर स्वतंत्र रूप से चलना-फिरना शुरू कर दिया। यह शीघ्र शारीरिक रिकवरी और सामान्य गतिविधियों की ओर तेजी से लौटने का महत्वपूर्ण संकेत है।

इसी प्रकार, 60 प्रतिशत मरीजों को रोबोटिक सर्जरी के तीन दिनों के भीतर सुरक्षित रूप से अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। कम अवधि में अस्पताल से डिस्चार्ज होने से मरीजों को अपने घर के परिचित वातावरण में जल्दी लौटने और सामान्य दिनचर्या की ओर तेजी से बढ़ने में मदद मिलती है।

पोस्ट-ऑपरेटिव अवधि में मरीजों में दर्द भी प्रभावी रूप से नियंत्रित रहा। अधिकांश मरीजों में न्यूनतम दर्द निवारक दवाओं की आवश्यकता पड़ी और मरीजों में शीघ्र गतिशीलता एवं बेहतर रिकवरी देखी गई। आकलन में सर्जरी के बाद की जटिलताएं भी कम रहीं।

मरीजों की प्रतिक्रिया इस मूल्यांकन का सबसे उत्साहजनक पहलू रही। सर्वेक्षण में शामिल 100 प्रतिशत मरीजों ने भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर दोबारा रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी को चुनने की इच्छा व्यक्त की। यह मरीजों के उपचार अनुभव, आराम और संतुष्टि के उच्च स्तर को दर्शाता है।

सिर्फ सामान्य सर्जरी नहीं, जटिल कैंसर सर्जरी में भी रोबोटिक तकनीक का उपयोग

आरएमएलआईएमएस के सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग में रोबोटिक तकनीक का उपयोग विभिन्न प्रकार की जटिल गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सर्जरी में किया जा रहा है। इनमें कैंसर संबंधी जटिल ऑपरेशन भी शामिल हैं।

मूल्यांकन किए गए मामलों में सबसे बड़ा हिस्सा हेपेटोबिलियरी सर्जरी का रहा, जो लगभग 38.3 प्रतिशत था। इसके बाद 23.4 प्रतिशत मामले एडवांस्ड कोलोरेक्टल सर्जरी के थे। बेरियाट्रिक सर्जरी और इसोफैगो-गैस्ट्रिक सर्जरी के साथ जटिल हर्निया रिपेयर प्रत्येक लगभग 19.1 प्रतिशत मामलों में किए गए।

इस विविधता से यह स्पष्ट होता है कि रोबोटिक सर्जरी का उपयोग केवल अपेक्षाकृत सरल प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि चयनित मरीजों में जटिल गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और ऑन्कोलॉजिकल सर्जरी में भी किया जा रहा है।

विशेष रूप से जटिल कैंसर संबंधी प्रक्रियाओं में भी मरीजों में शीघ्र गतिशीलता, बेहतर शारीरिक रिकवरी और पोस्ट-ऑपरेटिव स्वास्थ्य लाभ की सकारात्मक प्रवृत्ति देखी गई।

मरीजों की संतुष्टि ने बढ़ाया भरोसा

रोबोटिक सर्जरी की सफलता का आकलन केवल ऑपरेशन की तकनीकी सफलता से नहीं किया जाता, बल्कि मरीज के अनुभव, दर्द, गतिशीलता, अस्पताल में रहने की अवधि और जीवन की गुणवत्ता जैसे पहलुओं से भी किया जाता है।

आरएमएलआईएमएस में किए गए मूल्यांकन में इन सभी पहलुओं पर सकारात्मक संकेत प्राप्त हुए। मरीजों ने कम दर्द, जल्दी चलने-फिरने, अस्पताल में कम समय रहने और उपचार के समग्र अनुभव के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की।

विशेष रूप से 100 प्रतिशत मरीजों द्वारा आवश्यकता पड़ने पर भविष्य में दोबारा रोबोटिक सर्जरी चुनने की इच्छा व्यक्त करना इस तकनीक के प्रति मरीजों के विश्वास और संतुष्टि का महत्वपूर्ण संकेत है।

आरएमएलआईएमएस के निदेशक डॉ. सी. एम. सिंह ने कहा कि संस्थान का उद्देश्य अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीक को मरीजों के लिए सुलभ और किफायती बनाना है।

उन्होंने कहा:

“आरएमएलआईएमएस में अत्याधुनिक रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी की सुविधा उपलब्ध कराना संस्थान की मरीज-केंद्रित और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाओं की प्रतिबद्धता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमारा प्रयास है कि आधुनिक चिकित्सा तकनीक का लाभ मरीजों को सुरक्षित, प्रभावी और किफायती रूप में उपलब्ध कराया जाए। रोबोटिक सर्जरी के इन उत्साहजनक प्रारंभिक परिणामों से हमें इस दिशा में आगे बढ़ने का और प्रोत्साहन मिला है।”

आरएमएलआईएमएस में प्राप्त प्रारंभिक परिणाम यह दर्शाते हैं कि रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी के माध्यम से उपयुक्त मरीजों में पोस्ट-ऑपरेटिव रिकवरी को बेहतर बनाया जा सकता है।

विशेष रूप से शीघ्र स्वतंत्र गतिशीलता, कम अवधि में अस्पताल से छुट्टी, प्रभावी दर्द नियंत्रण और उच्च मरीज संतुष्टि इस प्रारंभिक गुणवत्ता आकलन के महत्वपूर्ण निष्कर्ष रहे हैं।

आरएमएलआईएमएस में रोबोटिक-असिस्टेड सर्जरी की उपलब्धता संस्थान की उस व्यापक प्रतिबद्धता का हिस्सा है, जिसके अंतर्गत आधुनिक तकनीक, विशेषज्ञ चिकित्सकीय सेवाएं और मरीज-केंद्रित देखभाल को एक साथ लाकर गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।

अधिक जानकारी हेतु संपर्क:- प्रो0 अंशुमन पांडे
फोन न0-8176007038
सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग
डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान , लखनऊ

June 3, 2026

Oncology: Next-generation nanomedicine can silence key cancer drivers

Posted Date:- Jun 03, 2026, Wednesday

Pune 03 June 2026, Scientists from Pune have reported a gene-silencing strategy that can drive effective tumor inhibition in breast cancer, highlighting its potential as next-generation precision nanomedicine.

Advances in cancer nanomedicine are increasingly shifting toward precision strategies that directly silence disease-driving genes while minimizing systemic toxicity.

Scientists from from the Agharkar Research Institute (ARI), Pune, an autonomous institute under the Department of Science and Technology (DST), Government of India,  have presemted an innovative biodegradable nanocarrier platform engineered for targeted gene therapy in breast cancer.

The research, recently published in Advanced Healthcare Materials, provides new insights into targeted gene silencing of key survival pathways in breast cancer, enabling efficient tumor targeting and suppression, and offering a promising strategy for developing more effective and safer nanomedicine-based therapies.

The system is built on biodegradable mesoporous silica nanoparticles—well known for their high loading capacity and tunable surface chemistry—which enable efficient delivery of small interfering RNA (siRNA) molecules. By functionalizing the nanocarrier with a protamine biopolymer and an MUC1-specific aptamer, the researchers achieved precise tumor targeting, leveraging the overexpression of MUC1 receptors on breast cancer cells. This targeting strategy significantly enhances cellular uptake while reducing off-target effects, a key limitation in conventional therapies.

Fig: MUC1-Targeted Silica Nanocarrier (MPPM) Engineered biodegradable mesoporous silica nanohybrids target the MUC1 receptor overexpressed in breast cancer

A major highlight of the study by the team costsing of Niladri Haldar, Rajkumar Samanta, Surajit Patra, Devyani Sengar, Sachin Jadhav, and Virendra Gajbhiye is the dual gene-silencing approach. The nanocarrier simultaneously delivers siRNAs against two critical anti-apoptotic genes, MCL-1 and Survivin—both known to promote tumor survival and resistance to therapy. Once inside the tumor microenvironment, the glutathione-responsive design triggers controlled release of the therapeutic payload, ensuring efficient intracellular delivery and activity.

Biological evaluations in MCF-7 breast cancer models demonstrated robust gene knockdown, resulting in increased apoptosis and substantial tumor growth inhibition. Importantly, in vivo studies in Severe Combined Immunodeficiency (SCID) mice showed that the nanocarrier accumulates effectively at tumor sites and exhibits minimal systemic toxicity, as evidenced by favorable histological outcomes. These findings align with growing evidence that aptamer-guided nanocarriers can significantly improve tumor specificity and therapeutic efficacy.

Overall, this work highlights a powerful convergence of targeted delivery, stimuli-responsive release, and combinatorial gene silencing. By integrating these features into a single biodegradable platform, the study provides a compelling framework for next-generation RNAi-based cancer therapies. Such approaches could play a critical role in advancing precision oncology, offering more effective and safer alternatives to traditional chemotherapy.

The research was conducted by scientists from the Nanobioscience Group at the Agharkar Research Institute, Pune, India.

February 21, 2026

ललितपुर में दुर्लभ चिकित्सीय उपलब्धि–डा कौर

35 सप्ताह की गर्भवती में प्लेसेंटा से निकला दुर्लभ ट्यूमर

उप्रससे अजय बरया

ललितपुर- गुरु नानक हॉस्पिटल में एक अत्यंत दुर्लभ और असामान्य प्रसूति संबंधी मामला सामने आया है। 35 सप्ताह की गर्भवती महिला, जिनका पूर्व में एक सीज़ेरियन ऑपरेशन हो चुका था, प्रसव पीड़ा एवं स्कार टेंडरनेस के साथ अस्पताल में भर्ती हुईं। स्थिति को देखते हुए आपातकालीन सीज़ेरियन सेक्शन करने का निर्णय लिया गया।

ऑपरेशन वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. कौर के मार्गदर्शन में डॉ. आकांक्षा सिंघई (एम.एस., स्त्री एवं प्रसूति रोग) द्वारा सफलतापूर्वक संपन्न किया गया।

ऑपरेशन के दौरान 2.5 किलोग्राम वजन का स्वस्थ शिशु (पुरुष) जन्मा, जिसने जन्म के तुरंत बाद रोना शुरू कर दिया। शिशु पूर्णतः स्वस्थ पाया गया।

हालांकि, प्लेसेंटा निकालने के बाद चिकित्सकों को एक अप्रत्याशित खोज मिली। प्लेसेंटा से जुड़ा हुआ लगभग 7 × 6 × 4.5 सेमी आकार एवं लगभग 230 ग्राम वजन का एक स्पष्ट सीमांकित मास पाया गया।

यह मास पतली झिल्ली से ढका हुआ था। कट सेक्शन पर निरीक्षण करने पर उसमें त्वचा, बाल, वसायुक्त ऊतक तथा उपास्थि/हड्डी जैसे कठोर भाग दिखाई दिए। महत्वपूर्ण बात यह रही कि:

• किसी भी प्रकार के भ्रूण अंगों की पहचान नहीं हुई
• यह मास शिशु एवं नाल से पूर्णतः अलग था
• नवजात शिशु पूरी तरह सामान्य था

प्रारंभिक निरीक्षण के आधार पर इसे प्लेसेंटल टेराटोमा होने की संभावना व्यक्त की गई है। पुष्टि हेतु प्लेसेंटा सहित मास को हिस्टोपैथोलॉजिकल परीक्षण के लिए भेजा गया है।

चिकित्सकों के अनुसार प्लेसेंटल टेराटोमा अत्यंत दुर्लभ एवं सामान्यतः सौम्य (benign) प्रकृति का ट्यूमर होता है, जो प्लेसेंटा के ऊतकों से उत्पन्न होता है। अधिकांश मामलों में इसका माँ या शिशु के भविष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

ऑपरेशन के पश्चात माँ और शिशु दोनों स्वस्थ एवं स्थिर हैं।

यह मामला ललितपुर में चिकित्सा क्षेत्र की एक उल्लेखनीय उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।

February 19, 2026

Gorakhpur कैंप में ऑपरेशन के बाद 9 मरीजों की आंखों की रोशनी गई, डीएम ने दिए जांच के आदेश

Posted on 19.02.2026, Thursday Time 05.50 PM, Santosh Kumar Singh, Gorakhpur संतोष कुमार सिंह , गोरखपुर*मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद 9 मरीजों की आंखें निकालनी पड़ीं, कई की रोशनी गई*

गोरखपुर, 19 फरवरी। जिले के सिकरीगंज स्थित एक निजी अस्पताल में आयोजित मोतियाबिंद ऑपरेशन कैंप के बाद सामने आए गंभीर संक्रमण ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। ऑपरेशन के बाद कई मरीजों की हालत बिगड़ गई, जिनमें से नौ मरीजों की आंखें निकालनी पड़ीं, जबकि कई अन्य की आंखों की रोशनी चली गई। यह मामला सामने आते ही प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है।
बताया जा रहा है कि 1 फरवरी को न्यू राजेश हाइटेक हॉस्पिटल में आई कैंप आयोजित किया गया था, जिसमें करीब 30 मरीजों का मोतियाबिंद ऑपरेशन किया गया। परिजनों के अनुसार ऑपरेशन के 24 घंटे के भीतर ही कई मरीजों की आंखों में तेज दर्द, सूजन, खून आना और मवाद जैसी शिकायतें शुरू हो गईं। धीरे-धीरे स्थिति इतनी बिगड़ी कि 18 मरीजों में गंभीर संक्रमण पाया गया।
इन्दारी निवासी संजय सिंह ने बताया कि वे अपने पिता का ऑपरेशन कराने अस्पताल गए थे। ऑपरेशन के बाद आंख से लगातार खून आने लगा। पहले वाराणसी ले जाया गया, फिर दिल्ली तक इलाज कराया गया, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। अंततः डॉक्टरों ने आंख निकालने की सलाह दी। संजय सिंह का कहना है कि उनके परिवार के दो लोगों का ऑपरेशन हुआ था और दोनों की स्थिति गंभीर हो गई।
इसी तरह रेखा नामक महिला ने बताया कि उनकी सास का ऑपरेशन भी इसी कैंप में हुआ था। ऑपरेशन के बाद आंख में तेज दर्द और मवाद की शिकायत शुरू हो गई। उन्होंने कहा कि 18 मरीजों की हालत बिगड़ने की जानकारी है और कई लोग अलग-अलग शहरों में इलाज करा रहे हैं।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कई मरीजों को गोरखपुर से बाहर दिल्ली, लखनऊ और वाराणसी के सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों में भर्ती कराया गया। स्वास्थ्य विभाग की प्रारंभिक जांच और कल्चर रिपोर्ट में गंभीर संक्रमण की पुष्टि हुई है।
मामले की जानकारी मिलते ही जिला प्रशासन सक्रिय हुआ। जिलाधिकारी दीपक मीणा ने बताया कि सिकरीगंज के एक निजी अस्पताल में आंख के ऑपरेशन के बाद संक्रमण की बात सामने आई है। पीड़ित मरीजों का अलग-अलग स्थानों पर इलाज चल रहा है। कुछ मरीजों को गंभीर संक्रमण हुआ है। अस्पताल को सील कर दिया गया है और मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए गए हैं। रिपोर्ट आने के बाद दोषियों के खिलाफ विधिक कार्रवाई और पंजीकरण निरस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजेश झा ने बताया कि 4 फरवरी को जानकारी मिली कि 1 फरवरी को 30 ऑपरेशन किए गए थे। कई मरीजों में संक्रमण की पुष्टि होने के बाद जिला स्तरीय कमेटी गठित कर जांच शुरू की गई। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की टीम ने भी अस्पताल का निरीक्षण किया। प्रथम दृष्टया मामला गंभीर संक्रमण का प्रतीत हो रहा है। एहतियातन अस्पताल के नेत्र विभाग को सील कर दिया गया है और संबंधित ऑपरेशन थिएटर की जांच की जा रही है।
इस घटना ने निजी अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था और ऑपरेशन प्रक्रियाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिजनों का आरोप है कि लापरवाही और संक्रमण नियंत्रण में कमी के कारण यह स्थिति बनी। कई परिवारों की जिंदगी में अंधेरा छा गया है।
फिलहाल पूरे मामले की मजिस्ट्रियल जांच जारी है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। वहीं पीड़ित परिवार न्याय और उचित उपचार की उम्मीद में हैं। यह घटना स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और निगरानी तंत्र पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रही है।

Older Posts »