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जरासंध’ की खुशी तात्कालिक है…

July 26, 2026

जरासंध’ की खुशी तात्कालिक है…

Dharmendra Pradhan Ex Education Minister

✍️ प्रणय विक्रम सिंह

इतिहास का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह युद्धभूमि में दिखाई देने वाले दृश्य को ही अंतिम सत्य मान लेता है। किंतु भारत की सभ्यता ने कभी केवल दृश्य को सत्य नहीं माना। उसने परिणाम से पहले उद्देश्य को देखा, विजय से पहले धर्म को देखा और पराक्रम से पहले बुद्धि को स्थान दिया।

यही कारण है कि इस भूमि ने उस पुरुष को भी भगवान कहा, जिसे उसके विरोधियों ने कभी ‘रणछोड़’ कहकर उपहास का विषय बनाया था।

कितना विचित्र है कि जिन श्री कृष्ण को गीता के उपदेशक, धर्म के संस्थापक, महाभारत के सूत्रधार और अधर्म के अंत का नायक माना जाता है, उन्हीं कृष्ण के नाम के साथ ‘रणछोड़’ शब्द भी जुड़ा। यदि केवल तत्कालीन जनमत से इतिहास लिखा जाता, तो शायद लोग यही कहते कि कृष्ण युद्धभूमि छोड़कर भाग गए। जरासंध स्वयं भी शायद यही समझ बैठा होगा कि उसने अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी को पराजित कर दिया है। लेकिन इतिहास कभी तत्कालीन शोर से नहीं लिखा जाता। इतिहास समय की अग्नि में तपकर अपना निर्णय देता है।

भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि प्रत्येक युद्ध रणभूमि में खड़े होकर नहीं जीता जाता। कभी-कभी एक कदम पीछे हटना ही अंतिम विजय की भूमिका बनता है। मथुरा से द्वारका का प्रस्थान ‘पलायन’ नहीं था, वह राष्ट्र, समाज और भविष्य की रक्षा के लिए लिया गया दूरदर्शी निर्णय था। उस समय जरासंध ने स्वयं को विजेता समझा होगा, पर इतिहास ने विजेता किसे माना? इतिहास ने रणछोड़दास को भगवान कहा, जरासंध को नहीं।

जरासंध की सबसे बड़ी भूल यह नहीं थी कि वह कृष्ण से लड़ता रहा। उसकी सबसे बड़ी भूल यह थी कि उसने हर बार पीछे हटते कृष्ण को पराजित समझ लिया। उसे दिखाई नहीं दिया कि कृष्ण युद्ध नहीं, समय चुन रहे हैं। यही कारण है कि उस दिन की जय-पराजय समय के साथ उलट गई। जरासंध अपने युग का विजेता कहलाया, लेकिन इतिहास का नायक नहीं बन सका। कृष्ण उस क्षण ‘रणछोड़’ कहे गए, किंतु काल ने उन्हें योगेश्वर के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया।

भारत का दर्शन हमें सिखाता है कि पीछे हटना और हार जाना समानार्थी शब्द नहीं हैं। जो व्यक्ति अपने अहंकार की रक्षा के लिए समाज को संकट में डाल दे, वह विजेता होकर भी पराजित है। और जो व्यक्ति अपने सम्मान का त्याग करके समाज की रक्षा कर ले, वह तत्कालीन आलोचना झेलकर भी इतिहास में विजेता बनता है। इसी कारण इस देश ने श्री राम को वनवासी होकर भी मर्यादा पुरुषोत्तम कहा, श्री कृष्ण को रणछोड़ होकर भी भगवान कहा और छत्रपति शिवाजी महाराज की आगरा से रणनीतिक वापसी को कायरता नहीं, राष्ट्रनीति माना।

राजनीति में भी यही कसौटी लागू होती है। नेतृत्व का अर्थ केवल संघर्ष करना नहीं है। नेतृत्व का अर्थ यह भी है कि किस संघर्ष को कहां समाप्त करना है, किस विवाद को कितना बढ़ने देना है और किस क्षण स्वयं को पीछे करके राष्ट्रहित को आगे रखना है। जो राजनेता केवल इसलिए अड़ा रहे कि कहीं उसे झुकना न पड़ जाए, वह नेतृत्व नहीं कर रहा होता, वह अपने अहंकार की रक्षा कर रहा होता है। सच्चा नेतृत्व वह है, जो जानता है कि कब तलवार उठानी है और कब म्यान में रख देनी है।

आज जब हम केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को देखते हैं, तो उसे केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इस निर्णय के पीछे जो भी राजनीतिक परिस्थितियां रही हों, एक तथ्य स्पष्ट है कि उन्होंने पद को राष्ट्र से बड़ा नहीं माना। उन्होंने स्वयं को विवाद का केंद्र बनाए रखने के बजाय पद छोड़कर व्यवस्था को आगे बढ़ने का अवसर दिया। लोकतंत्र में इससे असहमति हो सकती है, लोग इसे अलग-अलग दृष्टि से देख सकते हैं, किंतु यह प्रश्न अवश्य पूछा जाएगा कि यदि कोई नेता अपने पद से चिपका नहीं रहता, बल्कि परिस्थितियों को सामान्य बनाने के लिए पीछे हटता है, तो क्या उसे पराजित कह देना न्याय होगा?

केंद्रीय शिक्षा मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान ने केवल एक मंत्रालय नहीं संभाला। नई शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकालने, मातृभाषा को सम्मान दिलाने, भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः स्थापित करने और इतिहास के अनेक उपेक्षित अध्यायों को शिक्षा के मुख्य विमर्श में लाने का प्रयास किया। दशकों तक जिस शिक्षा व्यवस्था पर वैचारिक एकरूपता का आरोप लगता रहा, उसमें विविध भारतीय दृष्टियों के लिए स्थान बनाने का प्रयास हुआ। इस दिशा में स्वाभाविक रूप से मतभेद भी हुए और समर्थन भी मिला।

शिक्षा पर बहस होनी चाहिए। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान भी होना चाहिए। विद्यार्थी यदि अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं तो वह लोकतांत्रिक अधिकार है। परीक्षा व्यवस्था में यदि कमियां हैं तो उनका कठोर सुधार भी होना चाहिए। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि छात्रों के वास्तविक प्रश्न किसी व्यापक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का साधन न बन जाएं। किसी भी लोकतंत्र में यह चिंता स्वाभाविक है कि युवाओं के असंतोष का उपयोग ‘वे’ लोग न करने लगें जिन्हें जनता ने चुनावों में स्वीकार नहीं किया, अथवा वे समूह जो किसी भी असंतोष को राजनीतिक अस्थिरता में बदलना चाहते हैं।

आज आवश्यकता उन प्रवृत्तियों को पहचानने की है जो छात्र आंदोलनों की ऊर्जा को अपने वैचारिक या राजनीतिक उद्देश्यों की दिशा में मोड़ने का प्रयास करती हैं। छात्र राष्ट्र की आशा हैं, उन्हें किसी भी प्रकार के राजनीतिक प्रयोग की प्रयोगशाला नहीं बनने देना चाहिए।

भारत का अनुभव यह भी बताता है कि हर जनभावना के साथ कुछ ऐसी राजनीतिक प्रवृत्तियां भी जुड़ जाती हैं, जो उस भावना को समाधान तक नहीं, टकराव तक ले जाना चाहती हैं। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां वास्तविक पीड़ा किसी और की थी और उसका राजनीतिक लाभ किसी तीसरे ने उठाया।

इतिहास गवाह है कि क्षणिक विजय के उत्सव अक्सर समय की धूल में खो जाते हैं, जबकि त्याग और धैर्य से लिए गए निर्णय पीढ़ियों तक स्मरण किए जाते हैं। जो लोग आज इस इस्तीफे को अंतिम विजय मान रहे हैं, उन्हें भी इतिहास के निर्णय की प्रतीक्षा करनी होगी। और जो लोग इसे अंतिम पराजय मानकर निराश हैं, उन्हें भी स्मरण रखना चाहिए कि भारत का इतिहास क्षणिक नारों से नहीं, दीर्घकालिक परिणामों से लिखा जाता है। जरासंध ने अपने समय में विजय का उद्घोष किया था। श्री कृष्ण ने नहीं। इतिहास ने दोनों का निर्णय स्वयं कर दिया।

मान-अपमान, जय-पराजय, पद-प्रतिष्ठा, ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। किंतु जो व्यक्ति राष्ट्र को स्वयं से बड़ा मानता है, वह इतिहास में कभी ‘छोटा’ नहीं होता। जरासंध को खुश होने दीजिए, विजय तो गुजरात वाले ‘रणछोड़दास’ को ही मिलेगी।

जंतर-मंतर: अराजकता का अखाड़ा

प्रणय विक्रम सिंह

यह जंतर-मंतर की सड़क है। यहां हर सुबह एक नई ‘क्रांति’ की बोली लगती है, और हर शाम उसकी लाश पर वैचारिक भाषणों के कसीदे पढ़े जाते हैं। जो लोग इतिहास और समाज के सतही पन्नों को पढ़कर संतुष्ट हो जाते हैं, वे इस जमावड़े को ‘जन-आक्रोश’ कह सकते हैं। किंतु यदि आप थोड़ा ठहरकर, भीड़ के कोलाहल को चीरते हुए उसके भीतर झांकें, तो आपको यथार्थ का वह घिनौना रूप दिखेगा, जहां नीट (NEET) के मासूम परीक्षार्थियों का भविष्य केवल एक मोहरा है, और असली खिलाड़ी परदे के पीछे बैठे विदेशी व राजनीतिक आका हैं।

‘आंदोलन’ तो व्यवस्था की सड़ी-गली नसों में न्याय की खौलती धारा प्रवाहित करने वाला वो महा-मन्थन है, जो सत्ता के अहंकार को पिघलाकर जन-आकांक्षाओं की नींव रखता है। किंतु जब असंतोष की यह पवित्र आग भाड़े के उपद्रवियों के हाथ की मशाल बन जाए, तो इतिहास बदलता नहीं, केवल लोकतंत्र का चीरहरण होता है। हमें यह कड़वा सच कबूल करना होगा कि व्यवस्था का विरोध और अराजकता का नग्न तांडव कभी एक नहीं हो सकते।

विरोध तो मर्यादा की ढाल पहनकर सत्य की ढली हुई शमशीर से लड़ा जाता है, जबकि यह अराजकता तो व्यवस्था की छाती को नोच-नोचकर अपनी राजनीतिक हवस मिटाने वाला वो खूंखार भेड़िया है, जिसकी लार में मासूमों के भविष्य का लहू मिला हुआ है।

जरा इन उपद्रवियों के चेहरों को गौर से देखिए। हाथों में उछलते पत्थर, पुलिस की गाड़ियों पर बर्बरता से टूटती भीड़ और देश की सुरक्षा में तैनात वर्दी पर झपटते नापाक हाथ! क्या ये इस मुल्क का मुस्तकबिल गढ़ने वाले मेधावी छात्र हैं? क्या रातों की नींदें जलाकर जीवन-दान देने का ख़्वाब देखने वाले नौजवान अपने ही रक्षकों की हड्डियों को चटखाने पर आमादा होंगे? हरगिज नहीं! यह किसी परीक्षा का दर्द नहीं, यह तो ‘डीप स्टेट’ का बुना वो जहरीला सिंडिकेट है, जो हर जायज असंतोष को लाशों के ढेर में तब्दील करने का फन जानता है। पर्चा लीक होने से टूटे बच्चों के अवसाद की महज़ आड़ ली गई है। मक़सद साफ़ है, मासूमों के सीने पर अपनी सियासत की तोप रखना और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारत की आबरू का सौदा करना।

किंतु, इस पूरे ख़ूनी ड्रामे का सबसे नंगा, सबसे ज़लील दृश्य तब दिखा, जब सच का आइना लिए डटी एक निष्पक्ष महिला पत्रकार को उग्र भीड़ ने चारों तरफ से घेर लिया। ज़रा उस ख़ौफ़नाक लम्हे की आग को महसूस कीजिए, जब सच की तलाश में निकली एक बेटी पर भेड़ियों का झुंड टूट पड़ता है, जहां उसकी आबरू को तार-तार करने की हिंसक कोशिश होती है, जहां धक्के, अपशब्द और मॉब-लिंचिंग की सड़ांध उसकी सांसों तक पहुंचने लगती है! उस वक़्त सड़क पर केवल एक पत्रकार का उत्पीड़न नहीं हो रहा था, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ पर लात मारकर उसकी बची-कुची मर्यादा को लहूलुहान किया जा रहा था। जब सच बोलने वाली बेटी का गिरेबान खिंच रहा हो और कलम के मठाधीश ख़ामोश खड़े मुस्करा रहे हों, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र ज़िंदा नहीं, उसकी लाश का बाज़ार में सौदा हो चुका है!
उस वक़्त कहां दफ़्न हो गई थी निष्पक्षता के मसीहा बनने वाले इन मठाधीशों की आत्मा? अतीत में तमाचा खाकर जीवन भर ‘मज़लूमियत’ की भीख मांगने वाले आशुतोष हों, या रवीश, प्रसून और अजीत अंजुम जैसी पूरी जमात, सबकी बोलती पर ताले जड़े थे।

आंखों में अमानवीय शांति थी और मन में इस बात का घिनौना उल्लास कि शिकार उनके वैचारिक आकाओं के खेमे का नहीं था। जब थूककर चाटना ही पत्रकारिता का धर्म बन जाए, तो सहकर्मी की चीत्कार भी एजेंडे का संगीत लगती है। राजनीतिक आकाओं के जूठन पर पलने वाले इन नपुंसक चेहरों की रगों में अब निष्पक्षता का लहू नहीं, बल्कि चाटुकारिता का जहर दौड़ रहा है। जब कलम की स्याही सत्ता-विरोधी तुष्टीकरण और विदेशी फंडिंग के चेक से भरी जाने लगे, तो पत्रकार निर्भीक नहीं रहता, वह केवल एक वैचारिक भाड़े का टट्टू बनकर रह जाता है।
और इस पूरे अधर्म को खाद-पानी दे रही है आज की ‘रील-पीढ़ी’। इन राजनीतिक गिद्धों के लिए किसी छात्र की तबाह होती जिंदगी या किसी महिला पत्रकार की चीत्कार महज एक ‘डिजिटल अवसर’ है। मोबाइल का कैमरा ऑन हुआ तो बनावटी क्रांति का बाज़ार सज गया, और लाइव-स्ट्रीम बंद होते ही सारी वैचारिक निष्ठा कूड़ेदान में जा गिरी! इनके पास तर्कों का अकाल है, जबान पर गालियों का अमर्यादित शोर है, और न्याय की तड़प से बड़ा सोशल मीडिया का ‘एल्गोरिद्म’ हो चुका है। जो क्रांति, कैमरा ऑन होने पर शुरू और लाइव-स्ट्रीम बंद होने पर दम तोड़ दे, वह इतिहास की धारा नहीं मोड़ती… केवल डिजिटल कचरे का ढेर बनाती है!

स्याह झंडों और प्रायोजित सियासत के इस घिनौने खेल में आख़िर किसकी बलि चढ़ी? वही सच्चा छात्र! पचास हज़ार उपद्रवियों की एक घंटे की प्रायोजित हिंसा ने मुल्क की करोड़ों आंखों की स्वतःस्फूर्त सहानुभूति को एक ही झटके में जलाकर राख कर दिया। भीड़ में फेंका गया हर एक पत्थर व्यवस्था का कुछ नहीं बिगाड़ता, वह केवल किसी गरीब छात्र के घर में जलती हुई उम्मीद की मोमबत्ती को बुझा देता है। कल यह हिंसक भीड़ चली जाएगी, कुछ उग्र चेहरे नेता कहलायेंगे, कुछ डिजिटल दुनिया के सितारे बन जाएंगे और सियासी पार्टियां अपनी रोटियां सेंक कर निकल जाएंगी। लेकिन उस बदक़िस्मत छात्र का क्या? वह कल भी अपने कमरे में अधूरी किताबों और धुंधले भविष्य के साथ तन्हा बैठा था, और आज भी अनिश्चितता के अंबर तले अकेला ही अपनी किस्मत पर आंसू बहा रहा है!

रामायण के पन्ने पलटिए। रावण की दंभी सभा में जब सीता के सम्मान की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं, तब भी ज्ञानी कहलाने वाले मठाधीश चुपचाप उस अधर्म का आनंद ले रहे थे। आज का जंतर-मंतर उसी दंभी सभा का नया रूप है। लेकिन याद रखिए, गिद्धराज संपाती की तरह निष्पक्ष और दूरदर्शी सोच ही सत्य को बचाती है। रावण का अहंकार और उसकी सभा का सन्नाटा उसे महाविनाश से नहीं बचा पाया था।

फंडिंग के चेक एक दिन रीते होंगे, सियासी आकाओं का हाथ सिर से हटेगा और पत्थरों के दम पर खड़ा यह प्रायोजित तमाशा ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। सत्य का सूरज भले ही प्रायोजित बादलों में छुप जाए, लेकिन जब वह प्रकट होता है, तो झूठी क्रांतियों के सारे टिमटिमाते चिराग़ों को बेनूर कर देता है। जो आंदोलन न्याय की जगह ‘वायरल’ होने की होड़ में अपनी मर्यादा बेच देते हैं, वे कभी इतिहास का अमर पृष्ठ नहीं लिखते… वे महज इतिहास का सड़ता हुआ कचरा बनकर रह जाते हैं!

July 18, 2026

भारतीय रेलवे में नई हाइड्रोजन क्रांति


प्रधानमंत्री ने कई रेलवे स्टेशनों का भी दिया उपहार
मृत्युंजय दीक्षित
जुलाई 17, 2026 का दिन भारतीय रेलवे के लिए एक स्मरणीय दिन बन गया है क्योंकि इस दिन रेल यातायात में विकसित भारत के नये युग का सूत्रपात हुआऔर भा रत को हाइड्रोजन ट्रेन का उपहार मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरियाणा के जींद रेलवे स्टेश्न से हरी झंडी दिखाकर इसका उद्घाटन किया। अब भारत उन चुनिन्दा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है जहां हाइड्रोजन ट्रेनों का संचालन हो रहा है।अभी तक जर्मनी, फ्रांस और चीन जैसे देश ही इस प्रकार की ट्रेनों का संचालन कर रहे थे ।
जींद-सोनीपत मार्ग पर चलने वाली यह ट्रेन शून्य कार्बन उत्सर्जन वाली 10 कोच और 3,200 हार्स पावर क्षमता वाली दुनिया की सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेनों मे शामिल है। यह ट्रेन पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से तैयार की गई है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक से चलने वाली इस ट्रेन में हाइड्रोजन से बिजली बनाई जाती है जिससे ट्रेन संचालित होती है। इस प्रक्रिया में केवल जलवाष्प निकलती है इसलिए इससे शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है। यह ट्रेन डीजल ट्रेनों की तुलना में प्रदूषण नहीं फैलाती, आवाज भी कम करती है और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करती है। इसके लिए पारपंरिक इलेक्ट्रिक ट्रेनों की तरह मार्ग पर ओवरहेड बिजली लाईन की जरूरत भी नहीं होती क्योकि बिजली ट्रेन के भीतर ही तैयार होती है। ऐसी ट्रेनों के संचालन से कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर निर्भरता कम होगी।
यह 10 कोच वाली दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेनों में शामिल है। यह अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त ट्रेन है जो बाहर से देखने में तो साधारण ट्रेनों की तरह ही लगती है किन्तु जब यात्री ट्रेन के कोच में बैठकर यात्रा करते हैं तो उन्हें एक अलग प्रकार की सुखद अनुभूति होती है। ट्रेन में आधुनिक सुरक्षा प्रणाली, हाइड्रोजन लीक डिटेक्शन सिस्टम और विशेष फ्यूल सेल तकनीक का उपयोग किया गया है। इस ट्रेन में यात्रियों के लिए टिकट का मूल्य 5 से 25 रुपए तक रखा गया है ताकि आम से खास तक सभी वर्ग के लोग इस पूर्ण रूप से स्वदेशी तथा प्रदूषण रहित ट्रेन की आरामदायक यात्रा का लाभ उठा सकें। भारतीय रेलवे की पहली हाइड्रोजन ट्रेन हरियाणा में जींद से सोनीपत के बीच 89 किमी प्रतिदिन दो राउंड ट्रिप यानी कुल 356 किमी का सफर तय करेगी। यह हाइड्रोजन ट्रेन जींद सिटी, गोहाना, पांडु पिंडारा, ललित खेड़ा, भंभेवा, इसापुर खेड़ी, बुटाना, खंडराई, राबरा, लाथ, मोहाना और सोनीपत स्टेशन पर रुकेगी।
भारत की स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन अन्य देशों की तुलना में सबसे कम लागत मात्र 136 करोड़ रुपए में बनी है। ट्रेन की सामान्य ऑपरेशनल स्पीड 75 किमी प्रति घंटा होगी। ट्रायल रन के दौरान इसने 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार प्राप्त की थी। यह ट्रेन एक घंटे में 90 किमी का सफर तय कर सकती है। जबकि कई पुराने डीजल इंजन वाली ट्रेनों को इतनी दूरी तय करने में लगभग दो घंटे लग जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेलवे में व्यापक बदलाव लाने का संकल्प लिया था जो अब धरातल पर उतरता दिख रहा है। भारतीय रेलवे आगामी वर्षों में और भी आधुनिक बनने की तैयारी कर रहा है। सरकार का लक्ष्य व संकल्प भारतीय रेलवे को अधिक सुरक्षित, तेज और पर्यावरण के अनुकूल बनाना है यह हाइड्रोजन ट्रेन उसी लक्ष्य की दिशा में ले जाने वाली पहल है।
संक्षिप्त इतिहास – भारत में पहली यात्री ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को मुंबई के बोरीबंदर स्टेशन से ठाणे के बीच चलाई गई थी। यह ट्रेन 34 किमी की दूरी तय करती थी इसमें 14 डिब्बे थे1 960 में भारतीय रेलवे ने डीजल इंजनों को अपनाना शुरू किया। इन इंजनों की मदद से लंबी दूरी की ट्रेनों का संचालन शुरू हुआ। मालगाड़ियों की क्षमता बढ़ी और रेलवे का विस्तार पहले की तुलना में तीव्रगति से हुआ। इसके पश्चात रेलवे में विद्युतीकरण का युग आया जिसमें बिजली से चलने वाले इंजन डीजल की तुलना में अधिक तीव्र ,कम प्रदूषण फैलाने वाले और ऊर्जा की दृष्टि से अधिक किफायती सिद्ध हुए। अब समय पूरी तरह से बदल चुका है। अब यात्रियों को सुविधाएं देने के लिए बेहतर तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, वंदेभारत एक्सप्रेस जैसी हाईस्पीड ट्रेनों,आधुनिक कोच, आटोमेटिक सिग्नल सिस्टम, कवच सुरक्षा प्रणाली, डिजिटल टिकटिंग और बेहतर स्टेशन सुविधाएं रेलवे को नई पहचान दे रही हैं। आगामी समय में बुलेट ट्रेनों की रफ्तार भी भारतीय जनमानस देखने वाला है। केवल यात्रियों के लिए ही नहीं भारतीय रेल अब माल ढुलाई के लिए भी आधुनिक ट्रेनों का संचालन कर रही है।
हाइड्रोजन ट्रेन के उद्घाटन के अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने जींद और पंजाब के जालंधर से रेलवे की विकास व बदलाव की कहानी बताई और साथ ही कांग्रेस सहित समस्त विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए राजनैतिक संदेश भी दिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि जो काम आज हो रहे हैं वो काम तो 30 -40 वर्ष पहले ही हो जाने चाहिए थे लेकिन पहले की सरकारों में यह काम प्राथमिकता में थे ही नहीं। इस पर पहले की सरकारें चर्चा ही नहीं करती थी। 2014 के बाद भाजपा सरकार ने स्थितियों को बदलना शुरू किया। आज पूरे भारत में रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प किया जा रहा है। अमृत भारत स्टेशन योजना के अंतर्गत 1300 स्टेशनों का कायाकल्प किया जा रहा है आज ऐसे ही 75 स्टेशनों का लोकार्पण हुआ है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने अमृतसर -वाराणसी के बीच चलने वाली संत रविदास एक्सप्रेस ट्रेन सेवा को भी हरी झंडी दिखाई।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं. – 9198571540

July 12, 2026

दान का ‘हिसाब’ मांगने वाले कालनेमियों सुनो…!

Ram Mandir Ayodhya

राम मंदिर अयोध्या

प्रणय विक्रम सिंह

‘​स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकं परस्वत्वोत्पादनं दानम्’ के दिव्य उद्घोष से सिंचित इस धरा पर दान कोई भौतिक सौदा या व्यापार नहीं बल्कि आत्मा की परम शुद्धि और प्रभु के चरणों में सर्वस्व समर्पण का महामार्ग है, लेकिन आज राजनीति के कुछ आधुनिक कालनेमी प्रभु श्री राम के इस पावन दरबार में भी अपनी नफरत की दुकान चमकाने के लिए ‘कमीशन’ और ‘हिसाब’ का झूठा बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं।

सत्ता से दूर होकर छटपटा रहे इन दिशाहीनों को शायद सनातन का गौरवशाली इतिहास नहीं मालूम, वरना तकादा करने से पहले वे अपने पूर्वजों की उस महान विरासत को याद कर लेते जहां दैत्यराज बलि ने भगवान वामन को तीन पग भूमि दान करते समय गुरु शुक्राचार्य के प्रबल विरोध के बाद भी अपने कदम पीछे नहीं खींचे थे और सर्वस्व सौंपने के बाद कभी लौटकर स्वर्ग की ‘रसीद बुक’ नहीं मांगी थी।

ठीक इसी त्याग परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सूर्यपुत्र कर्ण ने अपने प्राणों की रक्षा करने वाले कवच-कुंडल हंसते-हंसते काटकर इंद्र को दे दिए थे पर कभी यह पूछने नहीं गए कि उन्हें किस अलमारी में छिपाकर रखा गया है, और इसी सत्य की रक्षा के लिए महाराज हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र को अपना पूरा राज्य सौंपकर श्मशान में चांडाल की नौकरी स्वीकार की, जहां उनकी पत्नी और बच्चे तक बिक गए लेकिन उन्होंने कभी राजकोष के ‘ऑडिट’ का इंचार्ज बनने की इच्छा नहीं जताई।

जब महर्षि दधीचि ने देवताओं के वज्र के लिए अपने प्राण त्यागकर हड्डियां दान कर दीं और महाराज शिबि ने एक शरणागत पक्षी के लिए अपने शरीर का जीवित मांस तौल दिया, तब इनमें से किसी ने भी तराजू और रसीद लेकर विधाता को कटघरे में खड़ा नहीं किया था क्योंकि वे भली-भांति जानते थे कि प्रभु के चरणों में अर्पित वस्तु पर फिर इस नश्वर संसार का कोई वैधानिक दावा नहीं रह जाता।

​परंतु आज की इस कलियुगी राजनीति में कुछ ‘प्रचारवीर’ चार साल बाद अचानक टीवी चैनलों पर बैठकर और हाथ में दान की तस्वीरें लहराकर चांदी की ईंटों और रसीदों का ऐसा हिसाब मांग रहे हैं जैसे उन्होंने प्रभु को दान नहीं बल्कि कोई कर्ज दिया हो। जिन्होंने खुद अपनी स्वेच्छा से समर्पण किया था, वे आज केवल अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए गबन का ढोंग रच रहे हैं क्योंकि वास्तव में यह पीड़ा राम मंदिर की सुरक्षा या उसकी मर्यादा की है ही नहीं, बल्कि यह पीड़ा मीडिया में ‘नाम चमकाने’ और अपने ‘अहंकार’ की तृप्ति न होने की छटपटाहट है।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने सात्विक दान की परिभाषा बताते हुए स्पष्ट कहा है कि श्रेष्ठ दान वही है जो बिना किसी बदले की भावना या सम्मान की लालसा के दिया जाए, और हमारी लोक-परंपरा भी यही कहती है कि दाहिने हाथ से दो तो बाएं हाथ को पता न चले, अन्यथा वह दान नहीं बल्कि एक घटिया प्रदर्शन मात्र बनकर रह जाता है। आज करोड़ों हिंदुओं के एक-एक रुपए के पवित्र संकल्प और अटूट आस्था से यह भव्य और गगनचुंबी मंदिर खड़ा हुआ है, और जिन्हें इस दिव्य शिखर की ऊंचाई में, धवल फर्शों की भव्यता में और रामलला के श्रीचरणों के अलौकिक अलंकरण में अपना समर्पण दिखाई नहीं दे रहा, दोष निश्चित ही उनकी नियत और आंखों के राजनीतिक मोतियाबिंद का है।

​भ्रम फैलाकर अपनी रोटियां सेकने वाले इन राजनीतिक गिद्धों को यह बात कान खोलकर सुन लेनी चाहिए कि राम मंदिर ट्रस्ट के एसबीआई लॉकर में सिंधी समाज द्वारा समर्पित सभी 200 चांदी की ईंटों के साथ-साथ कागभुशुंडि जी की दिव्य प्रतिमा, प्रभु का स्वर्ण धनुष-बाण, चरण पादुकाएं और भक्तों का अर्पित किया गया एक-एक आभूषण पूरी तरह सुरक्षित है।

इस सत्य को झुठलाने की कोशिश करने वाले भूल रहे हैं कि यह उत्तर प्रदेश है, जहां राम और राष्ट्र के आराधक योगी आदित्यनाथ जी महाराज मुख्यमंत्री की पद पर विराजमान हैं, जिनके राज में कोई चोर, कोई ठग या कोई कालनेमी बचकर निकल ही नहीं सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और मुख्यमंत्री योगी जी का अपना कोई निजी परिवार नहीं है बल्कि यह पूरा राष्ट्र ही उनका परिवार है जिसके स्वाभिमान और वैभव के लिए वे दिन-रात अपने तन-मन से जुटे हुए हैं। इसलिए समस्त रामभक्त इन देशद्रोहियों और बहरूपियों के बहकावे में न आएं और पूर्ण धैर्य रखें, क्योंकि रामजी के काम में विघ्न डालने वालों का समय आने पर इसी धरती पर दूध का दूध और पानी का पानी होगा और विधाता की लाठी से पाई-पाई का ऐसा मर्मभेदी हिसाब होगा जिसे इनकी आने वाली पीढ़ियां भी याद रखेंगी।

जय जय श्री राम
​राष्ट्रहित सर्वोपरि।
भारत माता की जय!
वंदे मातरम! जय हिंद!

July 11, 2026

Shri Ram Mandir: विश्वास, समर्पण और सार्वजनिक जीवन में सावधानी की सीख

Champatrai General Secretary Shri Ram Janmbhumi Teerth Kshetra Trust

अखिलेश शर्मा

श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें उन लोगों का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा जिन्होंने दशकों तक बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। ऐसे ही व्यक्तित्वों में विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का नाम प्रमुखता से आता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। संगठन, संघर्ष और सेवा के कारण वे करोड़ों रामभक्तों के बीच सम्मानित हैं।
हाल के दिनों में चंपत राय एक ऐसे विवाद के केंद्र में आ गए, जिसने यह संदेश दिया कि सार्वजनिक जीवन में केवल ईमानदारी ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि हर कदम पर सतर्कता भी आवश्यक होती है। चर्चा इस बात की रही कि वे अपने निकट के लोगों पर अत्यधिक विश्वास कर बैठे और इसी अति विश्वास ने उन्हें अनावश्यक विवादों में ला खड़ा किया। राजनीति, सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं में यह एक पुरानी कहावत है कि “विश्वास आवश्यक है, लेकिन सत्यापन उससे भी अधिक आवश्यक है।”
चंपत राय का व्यक्तित्व सदैव सादगी, अनुशासन और संगठन के प्रति समर्पण का रहा है। उन्होंने कभी व्यक्तिगत प्रचार को महत्व नहीं दिया और हमेशा स्वयं को रामकाज का एक साधारण कार्यकर्ता बताया। यही कारण है कि उनके समर्थकों का मानना है कि यदि उनसे कोई चूक हुई भी है तो वह किसी निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपने सहयोगियों पर अधिक भरोसा करने के कारण हुई।
सार्वजनिक जीवन में कार्य करने वाले लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि वे अपने आसपास ऐसे लोगों का चयन करें जो उनके विश्वास पर खरे उतरें। कई बार प्रतिष्ठित व्यक्तियों की वर्षों की कमाई हुई साख कुछ लोगों की लापरवाही या गलत आचरण के कारण प्रभावित हो जाती है। इसलिए किसी भी संस्था की मजबूती के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और समय-समय पर तथ्यों का परीक्षण आवश्यक माना जाता है।
राम मंदिर आंदोलन करोड़ों लोगों की आस्था का विषय रहा है। मंदिर निर्माण पूर्ण होने के बाद भी ट्रस्ट और उससे जुड़े प्रत्येक पदाधिकारी पर समाज की निगाह रहती है। ऐसे में किसी भी प्रकार का विवाद स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन जाता है। यही कारण है कि ट्रस्ट से जुड़े लोगों से सामान्य से भी अधिक सावधानी और पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है।
चंपत राय के समर्थकों का कहना है कि उनके दशकों के योगदान को किसी एक विवाद की कसौटी पर नहीं परखा जाना चाहिए। वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही की मांग करने वाले लोगों का मानना है कि जितना बड़ा पद, उतनी ही अधिक पारदर्शिता और उत्तरदायित्व भी आवश्यक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यही स्वस्थ परंपरा मानी जाती है।
यह पूरा घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि समर्पण और निष्ठा जितने आवश्यक हैं, उतनी ही आवश्यक विवेकपूर्ण सतर्कता भी है। किसी भी बड़े संगठन में व्यक्तिगत विश्वास के साथ-साथ संस्थागत व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए ताकि किसी प्रकार की भ्रांति या विवाद की संभावना कम हो।
भगवान श्रीराम के आदर्श भी यही सिखाते हैं कि धर्म, मर्यादा, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलते हुए प्रत्येक निर्णय पूरी सावधानी और निष्पक्षता के साथ लिया जाए। यदि इस घटना से कोई सीख निकलती है तो वह यही है कि सार्वजनिक जीवन में विश्वास और पारदर्शिता दोनों का संतुलन ही व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी होता है।

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