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मुद्दों से दूर कांग्रेस

September 30, 2026

मुद्दों से दूर कांग्रेस

Editorial

Editorial 30 September 2026

कांग्रेस अगर राजनीति में हाशिए पर खिसक रही है तो जिसका जिम्मेदार कोई और नहीं केवल कांग्रेस और इसके नेतृत्वकर्ता हैं। कांग्रेस को भारतीय जनता के मूल मुद्दों और उन प्रश्नों से कोई मतलब नहीं है जो मायने रखते हैं। वह केवल दोषारोपण करके, अधिकारियों पर आरोप लगाकर राजनीति करना चाहती है। इसका ताजा उदाहरण 29 सितंबर को नई दिल्ली में पार्टी कार्यसमिति की बैठक में पारित प्रस्ताव हैं। इस बैठक में उसके अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़के और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बयानों से भी स्पष्ट है। कांग्रेस ने तीन प्रस्ताव पारित किए तीनों का संबंध निर्वाचन आयोग से है। पहला प्रस्ताव है कि 13.30 करोड़ मतदाताओं के नाम फिर से जोड़े जाएं। दूसरा मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार त्यागपत्र दें। तीसरा एसआईआर प्रकिया बंद की जाय। इन तीनों मांगों का जानते कोई असर नहीं है। जनता एसआईआर से कतई भी नाराज नहीं है। यह गत चुनावों से स्पष्ट हो चुका है। लेकिन कांग्रेस की समझ में ये बात नहीं आ रही है। राहुल गांधी अभी भी वोट चोरी को मुख्य मुद्दा बनाए हुए हैं, जबकि ये मुद्दा फ्लॉप हो चुका है। यही बात कल की बैठक में वरिष्ठ नेता पी चिदबंरम ने भी कही। उन्होंने कहा एसआईआर का कोई असर नहीं है। इसका प्रमाण तमिलनाडु का चुनाव है। लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई।

दरअसल इस समय जो कांग्रेस कान्तृत्व है उसे जमीनी हकीकत और जनता को प्रभावित करने वाले मुद्दों की कोई समझ नहीं है। समाज में चल क्या रहा है? समाज किन मुद्दों पर चिंतित है? समाज की अपेक्षा और आकांक्षा क्या है? इससे कांग्रेस पूरी तरह अनजान है। इसका कारण सिर्फ राहुल गांधी का पार्टी पर एकाधिकार है। जब तक ये एकाधिकार नहीं टूटेगा, कांग्रेस की स्थिति नहीं सुधरेगी।

September 29, 2026

अक्षम्य लापरवाही

Editorial

Editorial 29 September 2026

राजधानी लखनऊ के तीन प्रमुख चिकित्सा संस्थानों की अक्षम्य लापरवाही सामने आई है। डा राम मनोहर लोहिया चिकित्सा संस्थान, लारी कार्डियोलॉजी और किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के ट्रामा सेंटर की संवेदनहीनता और लापरवाही से लखीमपुर के एक 19 वर्षीय युवक की जान चली गई। तीनों संस्थानों में बेटे को दौड़ी गरीब मां को इन अस्पतालों के डॉक्टरों ने लौटा दिया और इलाज के लिए दूसरी जगह भेजते रहे। अंततः युवक की एक निजी अस्पताल में सांसें थम गईं।

युवक हिमांशु लखीमपुर के कांसीराम कॉलोनी का निवासी था। उसके सीने में भारीपन और सांस लेने में तकलीफ थी। उसकी मां बेटे को लेकर लोहिया संस्थान पहुंची। यहां उसे भर्ती नहीं किया गया और लारी bhdk दिया गया। लारी ने ट्रामा भेज दिया, ट्रामा में स्ट्रेचर पर भर्ती किया गया। किंतु इलाज शुरू नहीं हुआ और यहां से उसे निजी अस्पताल ले जाया गया। जहां उचित इलाज के अभाव में उसकी मृत्यु हो गई। युवक को हृदय रोग की आशंका थी। लेकिन इन तीनों अस्पतालों ने मरीज के इलाज को गंभीरता से नहीं लिया और घनघोर लापरवाही की। जबकि लोहिया और लारी में हृदय रोग की समुचित चिकित्सा सुविधा और व्यवस्था है।

लारी कार्डियोलॉजी केवल हृदय रोग की शिक्षा और चिकित्सा का संस्थान है। यहां प्रतिदिन हजारों लोग ओपीडी में आते हैं और 24 घंटे इमर्जेंसी सेवा भी है। फिर भी मरीज के साथ लापरवाही कैसे हुई। इसकी जांच संस्थान को करनी चाहिए। वहीं लोहिया संस्थान को भी सुपर स्पेशियलिटी का दर्जा प्राप्त है।

आज विश्व हृदय स्वास्थ्य दिवस है। इस दिवस के दो दिन पहले किसी युवक की हृदय रोग के इलाज के अभाव में मृत्यु होना न केवल चिंताजनक है। बल्कि राजधानी की स्वास्थ्य सेवाओं पर भी प्रश्न चिन्ह है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ चिकित्सा सेवा का बड़ा हब बनकर उभरा है। यहां श्रेष्ठ चिकित्सा संस्थान हैं किंतु इनके कर्ताधर्ता और अधीनस्थ छवि को बट्टा लगा रहे हैं। इस प्रकरण को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री स्वयं संज्ञान लें। जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कारवाई करें।

Editorial 29 September 2026

The inexcusable negligence of three major medical institutions of the capital Lucknow has come to the fore. The insensitivity and negligence of Dr Ram Manohar Lohia Medical Institute, Lari Cardiology and Trauma Centre of King George’s Medical University cost the life of a 19-year-old youth from Lakhimpur. The poor mother, who had rushed her son to the three institutions, was turned away by the doctors at these hospitals and sent elsewhere for treatment. The youth finally breathed his last at a private hospital. The youth, Himanshu, was a resident of Kansiram Colony in Lakhimpur. There was heaviness in his chest and difficulty in breathing. His mother arrived at the Lohia Institute with her son. Here he was not admitted and given Lari Bhdk. Lari sent to Trauma, admitted to Trauma on a stretcher. But the treatment did not start and from here he was taken to a private hospital. Where he died due to lack of proper treatment. The young man was prone to heart disease. But these three hospitals did not take the treatment of the patient seriously and committed gross negligence. While Lohia and Lari have proper medical facilities and arrangements for heart disease. LARI Cardiology is an institution for the education and treatment of cardiovascular disease only. Thousands of people visit the OPD every day and there is also a 24-hour emergency service. Still, how was the patient treated? It should be investigated by the institute. At the same time, Lohia Institute also has the status of super speciality. Today is World Heart Health Day. The death of a young man two days before this day due to lack of treatment for heart disease is not only worrisome. Rather, there is also a question mark over the capital’s health services. Lucknow, the capital of Uttar Pradesh, is medically

 

September 25, 2026

लोकमत परिष्कार : दीनदयाल उपाध्याय और वर्तमान संदर्भ

दीनदयाल उपाध्याय जी जयंती 

लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकमत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी लोकतंत्र की सफलता केवल चुनाव, राजनीतिक दलों और सरकारों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि समाज का सामान्य नागरिक देश, समाज और अपने दायित्वों के प्रति कितना जागरूक है। इसी संदर्भ में ‘लोकमत परिष्कार’ की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है।

लोकमत परिष्कार का सामान्य अर्थ है—जनता के विचारों, भावनाओं और दृष्टिकोण को सत्य, विवेक, नैतिकता, राष्ट्रहित और सामाजिक उत्तरदायित्व की दिशा में विकसित करना। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में समाज, राष्ट्र और व्यक्ति के बीच गहरे संबंध को महत्व दिया गया। उनके विचारों में ऐसी सामाजिक चेतना की आवश्यकता दिखाई देती है जो राष्ट्रजीवन को स्वस्थ और रचनात्मक दिशा प्रदान करे।

लोकमत परिष्कार का अर्थ

‘लोक’ का अर्थ है जनता और ‘मत’ का अर्थ है विचार या जनधारणा। इसलिए लोकमत का अर्थ हुआ—किसी विषय के प्रति समाज की सामूहिक धारणा।

‘परिष्कार’ का अर्थ है किसी विचार या दृष्टिकोण को अधिक शुद्ध, विवेकपूर्ण और सकारात्मक बनाना। अतः लोकमत परिष्कार का अर्थ है समाज के सामूहिक विचारों और जनभावनाओं को विवेक, सत्य, नैतिकता और व्यापक सामाजिक हित की दिशा में विकसित करना।

यह केवल किसी विशेष राजनीतिक विचार के समर्थन में जनमत तैयार करना नहीं है। व्यापक अर्थ में इसका उद्देश्य नागरिकों में विवेकपूर्ण निर्णय, कर्तव्यबोध, सामाजिक संवेदनशीलता और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व विकसित करना है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय राजनीतिक चिंतन के प्रमुख विचारकों में माने जाते हैं। उन्होंने भारतीय समाज और संस्कृति को आधार बनाकर आधुनिक समस्याओं को देखने का प्रयास किया। उनका प्रमुख दार्शनिक योगदान ‘एकात्म मानववाद’ है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी लोकमत परिष्कार को महत्वपूर्ण कार्य मानते हैं और कहते हैं कि “सबसे अधिक महत्त्व है जनता को सुसंस्कृत करने का, लोकमत परिष्कार का।“

दीनदयाल उपाध्याय जी कहते हैं कि “लोकमत-परिष्कार का कार्य वही कर सकता है जो लोकेषणाओं से ऊपर उठ चुका हो। भारत ने इसका समाधान खोज निकाला। भारत ने इस समस्या का समाधान राज्य के हाथ से लोकमत निर्माण के साधन छीन कर किया है। लोकमत-परिष्कार का कार्य है वीतरागी द्वन्द्वातीत संन्यासियों का। लोकमत के अनुसार चलने का काम है राज्य का। संन्यासी सदैव धर्म के तत्त्वों के अनुसार, जनता के ऐहिक एवं आध्यात्मिक समुत्कर्ष की कामना लेकर अपने वचनों एवं निरीह आचरण से जन-जीवन के ऊपर संस्कार डालते रहते हैं। उन्हें धर्म की मर्यादाओं का ज्ञान कराते रहते हैं। कोई मोह और लोभ न होने के कारण वे सत्य का उच्चारण सहज कर सकते हैं। लोक-शिक्षा और लोक-संस्कार के वही केन्द्र हैं। शिक्षा और संस्कार से ही समाज के जीवन-मूल्य बनते और सुदृढ़ होते हैं। इन मूल्यों को बांध रखने के बाद लोकेच्छा की नदी कभी अपने तटों का अतिक्रमण कर संकट का कारण नहीं बनेगी”।

आज के सोशल मीडिया युग में इसका महत्व

दीनदयाल उपाध्याय जी अपने वर्तमान सन्दर्भों को बताते हुए कहते हैं कि  वर्तमान परिस्थिति का सबसे प्रमुख कारण राष्ट्र-जीवन की आत्मा का साक्षात्कार न करते हुए उसके ऊपर विदेशी और विजातीय विचारधाराओं एवं जीवनमूल्यों को थोपने का प्रयत्न है। शीघ्र उन्नति की आतुरता में दूसरे देशों का अंधानुकरण करने और ‘स्व’ के तिरस्कार की प्रवृत्ति पैदा हुई है। इससे राष्ट्रमानस में कुंठा घर कर गई है।

दीनदयाल जी के समय सोशल मीडिया नहीं था, लेकिन आज की परिस्थितियों में उनके विचार का एक नया संदर्भ बनता है।

आज WhatsApp, YouTube, Instagram, X आदि माध्यमों पर कोई सूचना कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुँच सकती है। ऐसे वातावरण में तीन स्थितियाँ बन सकती हैं—

सूचना → विचार → जनमत

लेकिन यदि सूचना गलत या अधूरी हो तो प्रक्रिया हो सकती है—

अधूरी सूचना → भावनात्मक प्रतिक्रिया → भ्रमित जनमत

इसलिए आज लोकमत परिष्कार का पहला आधार है:

“सूचना से पहले सत्यापन।”

नागरिकों को यह देखना चाहिए कि सूचना का स्रोत क्या है, उसके पीछे प्रमाण क्या हैं और क्या अलग-अलग विश्वसनीय स्रोत उसी तथ्य की पुष्टि करते हैं।

“भीड़ की राय” और “लोकमत” में अंतर

यहाँ दीनदयाल जी का विचार विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है।

उन्होंने लोकतंत्र के सामने mobocracy (भीड़तंत्र) और autocracy (निरंकुशता) दोनों को चुनौती के रूप में देखा। उनके विचार में लोकतंत्र को इन दोनों अतियों के बीच स्वस्थ जनमत के आधार पर चलना चाहिए।

आज इसका उदाहरण सोशल मीडिया पर देखा जा सकता है।

किसी विषय पर हजारों लोग एक ही बात लिख दें, तो इससे वह बात स्वतः सत्य नहीं हो जाती।

इसलिए—

वायरल होना ≠ सत्य होना

बहुमत की आवाज ≠ हमेशा विवेकपूर्ण लोकमत

लोकमत परिष्कार का उद्देश्य भीड़ की प्रतिक्रिया को विवेकपूर्ण जनमत में बदलना है।

दीनदयाल जी और “जनमत का सम्मान”

दीनदयाल जी के विचार में लोकतंत्र को केवल संख्यात्मक बहुमत तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है। उपलब्ध स्रोत में उनके विचार को इस रूप में दर्ज किया गया है कि लोकतांत्रिक शासन को लोकप्रिय जनमत के अनुरूप चलना चाहिए, न कि केवल तत्कालीन बहुमत या अल्पमत की गणना के आधार पर।

इसका आधुनिक अर्थ यह हो सकता है कि सरकारें केवल चुनाव के समय जनता से संवाद न करें, बल्कि लगातार—

जनता की समस्याएँ सुनें,

नागरिक समाज से संवाद करें,

आलोचना को स्थान दें,

नीतियों के प्रभाव का मूल्यांकन करें,

और आवश्यकता पड़ने पर नीतियों में सुधार करें।

एकात्म मानववाद और लोकमत परिष्कार

दीनदयाल जी का मानना है कि भारतीय संस्कृति एकात्मवादी है। सृष्टि की विभिन्न सत्ताओं तथा जीवन के विभिन्न अंगों के दृश्य-भेद स्वीकार करते हुए वह उनके अंतर में एकता की खोज कर उनमें समन्वय की स्थापना करती है। परस्पर विरोध और संघर्ष के स्थान पर वह परस्परावलंबन, पूरकता, अनुकूलता और सहयोग के आधार पर सृष्टि की क्रियाओं का विचार करती है। वह एकांगी न होकर सर्वांगीण है। उसका दृष्टिकोण सांप्रदायिक अथवा वर्गवादी न होकर सर्वात्मक एवं सर्वोत्कर्षवादी है। एकात्मकता उसकी धुरी है।

दीनदयाल उपाध्याय जी राष्ट्र की आत्मा-चिति के रूप में देखते हैं और वे कहते हैं कि समाज की चिति स्वयं को अभिव्यक्त करने तथा व्यक्तियों को विभिन्न पुरुषार्थी के संपादन की सुविधा प्राप्त कराने के लिए अनेक संस्थाओं को जन्म देती है। समाज में इनकी वही स्थिति है, जो शरीर में विभिन्न अंगों की। जाति, वर्ण, पंचायत, संप्रदाय, संघ, पूग, विवाह, संपत्ति, राज्य आदि इसी प्रकार की संस्थाएँ हैं। राज्य महत्त्वपूर्ण है, किंतु सर्वोपरि नहीं।

लोकमत परिष्कार को दीनदयाल जी के एकात्म मानववाद से भी जोड़ा जा सकता है। उनकी दृष्टि में मनुष्य केवल आर्थिक आवश्यकताओं वाला प्राणी नहीं है। मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समग्र विकास की बात उनके एकात्म मानववाद में आती है। उपलब्ध स्रोत में उनके विचार को “Complete Man” यानी समग्र मनुष्य के विकास से जोड़ा गया है।

इस दृष्टि से लोकमत भी केवल—

रोटी + रोजगार + आर्थिक हित

तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें—

नैतिकता + संस्कृति + सामाजिक उत्तरदायित्व + राष्ट्रबोध + मानवीय संवेदना

का भी समावेश होना चाहिए।

लोक शिक्षा और लोकमत परिष्कार

  • दीनदयाल जी के विचार में जनमत को शिक्षित करना महत्वपूर्ण है। इस सन्दर्भ में वे लोक शिक्षा की बात करते हैं – शालेय अध्ययन के अतिरिक्त लोक-संस्कार, स्वाध्याय, लोकमत परिष्कार भी शिक्षा के साधन हैं। इस दृष्टि से रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, संगीत तथा पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकालयों, क्लबों आदि का भरपूर उपयोग किया जा सकता है। इनकी योग्य व्यवस्था की ओर राज्य को ध्यान देना चाहिए।
  • रेडियो और टेलीविजन को सरकारी विभाग के स्थान पर एक स्वायत्त निगम के रूप में चलाना चाहिए।
  • चित्रपट लोक-शिक्षा का एक अत्यंत प्रभावी साधन है। अभिव्यक्ति के इस माध्यम का विकास करना चाहिए। किंतु शासन को यह ध्यान रखना चाहिए कि चित्रपट लोकमत-परिष्कार तथा सुरुचि पैदा करने के साधन बनने के स्थान पर लोगों की रुचि बिगाड़नेवाले न बनें।

लोकमत परिष्कार और राष्ट्रहित

दीनदयाल जी के चिंतन में व्यक्ति और राष्ट्र को अलग-अलग नहीं देखा जाता। एकात्म मानववाद में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के बीच संबंध महत्वपूर्ण है।

इसलिए लोकमत परिष्कार का अर्थ नागरिकों को किसी एक राजनीतिक विचार में ढालना नहीं, बल्कि ऐसी चेतना विकसित करना है जिसमें नागरिक यह समझ सके कि— “मेरी स्वतंत्रता के साथ मेरा सामाजिक दायित्व भी है।”

उदाहरण के लिए पर्यावरण, स्वच्छता, मतदान, सार्वजनिक संपत्ति, कर-व्यवस्था, महिला सम्मान, सामाजिक समरसता और कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता—ये सभी लोकमत परिष्कार के विषय हैं।

आज के संदर्भ में दीनदयाल जी के विचार की सबसे बड़ी प्रासंगिकता

आज जब AI-generated content, deepfakes, misinformation और तेजी से फैलने वाली अफवाहें जनमत को प्रभावित कर सकती हैं, लोकमत परिष्कार का महत्व और बढ़ जाता है।

इस संदर्भ में दीनदयाल जी के विचार को एक सूत्र में इस प्रकार समझ सकते हैं:

“जागरूक नागरिक → विवेकपूर्ण जनमत → उत्तरदायी लोकतंत्र → जनहितकारी शासन।”

और इसका उल्टा भी संभव है—

“भ्रामक सूचना → भावनात्मक प्रतिक्रिया → भ्रमित जनमत → कमजोर लोकतांत्रिक निर्णय।”

इसलिए आज लोकमत परिष्कार का आधुनिक रूप डिजिटल नागरिकता और तथ्य-जांच से भी जुड़ता है।

दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में लोकमत परिष्कार को जनता को प्रभावित करने की राजनीतिक तकनीक के रूप में समझना अधूरा होगा। उनके विचारों में इसका अधिक व्यापक अर्थ है—जनता की चेतना को शिक्षित, जागरूक और विवेकपूर्ण बनाना तथा शासन को वास्तविक जनमत के प्रति उत्तरदायी बनाना।

आज के संदर्भ में इसकी आवश्यकता इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि जनमत निर्माण के साधन पहले की तुलना में अत्यंत शक्तिशाली और तीव्र हो गए हैं।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन के संदर्भ में लोकमत परिष्कार को समाज की चेतना के विकास की प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है। इसका लक्ष्य केवल किसी राजनीतिक मत का प्रचार नहीं, बल्कि नागरिकों में विवेक, कर्तव्यबोध, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र के प्रति सकारात्मक दृष्टि विकसित करना है।

लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब जनता केवल मतदाता न रहकर जागरूक और उत्तरदायी नागरिक बने। इस दृष्टि से लोकमत परिष्कार लोकतांत्रिक समाज के स्वस्थ विकास का महत्वपूर्ण आधार है।

दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की व्यापक दृष्टि में व्यक्ति और समाज के बीच संबंध, सामाजिक समरसता, भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि और राष्ट्रजीवन की एकात्मता महत्वपूर्ण हैं। इन्हीं मूल्यों के आधार पर लोकमत को अधिक विवेकपूर्ण, सकारात्मक और रचनात्मक बनाया जा सकता है।

वस्तुतः “लोकमत परिष्कार का उद्देश्य केवल जनता की राय बदलना नहीं, बल्कि जनता की चेतना को जागरूक, विवेकपूर्ण और राष्ट्रहितोन्मुख बनाना है।

 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सम्पूर्ण वांग्मय में “लोकमत परिष्कार” का संकलन

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के संपूर्ण वाङ्मय में “लोकमत परिष्कार” की अवधारणा को लोकतंत्र की शुद्धि, मर्यादा और उसकी सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। वाङ्मय के विभिन्न खंडों में से केवल “लोकमत परिष्कार” विषय से संबंधित संदर्भों का पृष्ठवार (अंकों में) और संदर्भ के साथ संकलित विवरण नीचे दिया गया है:

1. खंड 10 (Volume 10)

इस खंड में मुख्य रूप से चुनावों की पृष्ठभूमि में मतदाताओं को जागरूक करने और राजनीतिक दलों के कर्तव्यों के रूप में ‘लोकमत परिष्कार’ की चर्चा की गई है:

  • पृष्ठ 11 (संपादकीय)

संदर्भ: वर्ष 1962 के तृतीय आम चुनावों की पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए संपादक लिखते हैं कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी चुनाव (निर्वाचन पर्व) को ‘लोकमत परिष्कार’ का सबसे उपयुक्त और सर्वोत्तम अवसर मानते थे। मतदाताओं को जागरूक करने के उद्देश्य से उन्होंने ‘ऑर्गनाइज़र’ और ‘पाञ्चजन्य’ पत्रिकाओं में ‘आपका मत’ शीर्षक से 9 लेखों की एक लंबी वैचारिक लेखमाला लिखी थी, ताकि जनता अपने मत के मूल्य को समझ सके।

  • पृष्ठ 19 (भूमिका – ‘दीनदयालजी का राजनीतिक प्रबोधन’)

संदर्भ: लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाताओं के प्रबोधन की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए यहाँ लिखा गया है कि देश का साधारण मतदाता ही वास्तविक भाग्यविधाता और देव स्वरूप है। इसी प्रसंग में दीनदयाल जी लिखते हैं कि “‘लोकमत परिष्कार’ प्रत्येक राजनीतिक दल का एक प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।” राजनीतिक दलों का वास्तविक कार्य केवल चुनाव जीतना या उम्मीदवार खड़े करना नहीं, बल्कि जनता के चिंतन और व्यावहारिक व्यवहार के स्तर को ऊपर उठाना है।

आपका मत’ लेखमाला और लोकमत परिष्कार

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी द्वारा लिखित ‘आपका मत’ लेखमाला भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में मतदाताओं के प्रबोधन, लोकमत परिष्कार और राजनीतिक चेतना के प्रसार को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैचारिक दस्तावेज है। वर्ष 1962 के तृतीय आम चुनावों के ऐतिहासिक अवसर पर मतदाताओं को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सचेत करने के उद्देश्य से उन्होंने यह विशिष्ट लेखमाला लिखी थी।

 

लेखमाला की पृष्ठभूमि

  • चुनाव और लोकमत परिष्कार: पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी चुनाव (निर्वाचन पर्व) को केवल मतों के गणित या राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं मानते थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि चुनाव का समय संपूर्ण राष्ट्र में विचारों के आदान-प्रदान, लोक-संस्कार और ‘लोकमत परिष्कार’ का सबसे उपयुक्त तथा योग्यतम अवसर होता है।
  • प्रकाशन: मतदाताओं को जागरूक करने के पावन ध्येय से दीनदयाल जी ने तत्कालीन प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ‘ऑर्गनाइज़र’ (Organiser) और ‘पाञ्चजन्य’ में ‘आपका मत’ शीर्षक से नौ लेखों की एक लंबी श्रृंखला लिखी थी।

लेखमाला के सभी 9 लेखों का विस्तृत विवरण

  1. आपका मत-1: “मताधिकार कागज़ का टुकड़ा नहीं, लोकाज्ञा है”
  • प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 29 जनवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 57)
  • संदर्भ: इस प्रथम लेख में दीनदयाल जी स्पष्ट करते हैं कि लोकतंत्र में मताधिकार कोई मामूली कागज का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह मतदाता की ओर से एक पवित्र ‘लोकाज्ञा’ (जनता का आदेश) है। वे मतदाताओं का प्रबोधन करते हुए कहते हैं कि मतदाता देश का भाग्यविधाता और देव स्वरूप है, इसलिए उसे अपने मत का प्रयोग बिना किसी प्रलोभन या दबाव के, केवल देशहित में अपने सद्विवेक और अंतरात्मा की पुकार पर करना चाहिए।
  1. आपका मत-2: “मतदाता समय की चुनौती का उत्तर देंगे?”
  • प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 5 फ़रवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 63)
  • संदर्भ: द्विसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों के समाप्त होने की पृष्ठभूमि में दीनदयाल जी मतदाताओं को सचेत करते हैं कि अब उन्हें बहुत सोच-समझकर अपने प्रतिनिधियों का चयन करना होगा। वे ‘बिजली के खंभे का युग बीत गया’ उपशीर्षक के अंतर्गत कांग्रेस के प्रति अंध-समर्थन की तीखी आलोचना करते हैं और मतदाताओं से अपील करते हैं कि वे केवल प्रत्याशियों के व्यक्तिगत गुणों को न देखें, बल्कि एक अच्छे, अनुशासित और सिद्धांतवादी दल को चुनें।
  1. आपका मत-3: “दक्षिणपंथ व वामपंथ के आधार पर दलों का विभाजन अनुचित”
  • प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 12 फ़रवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 70)
  • संदर्भ: इस लेख में वे पाश्चात्य राजनीतिक शब्दावली ‘दक्षिणपंथ’ (Right-wing) और ‘वामपंथ’ (Left-wing) के आधार पर भारतीय राजनीतिक दलों के वर्गीकरण को भ्रामक और अनुचित मानते हैं। उनका तर्क है कि भारतीय राजनीति को विदेशी ढाँचों या वैचारिक नकल के सहारे चलाने के बजाय भारत के मूल राजदर्शन और प्राचीन संस्कृति के आधार पर परिष्कृत किया जाना चाहिए।
  1. आपका मत-4: “राष्ट्र की सुरक्षा के प्रश्न को सर्वोपरि महत्त्व दिया जाए”
  • प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 22 जनवरी, 1962 [मूल रूप से ऑर्गनाइज़र में 25 दिसंबर, 1961 को प्रकाशित] (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 18)
  • संदर्भ: चीन द्वारा भारतीय सीमाओं के अतिक्रमण की गंभीर पृष्ठभूमि में लिखा गया यह लेख देश की बाह्य सुरक्षा और अखंडता पर केंद्रित है। दीनदयाल जी चेतावनी देते हैं कि जो दल या नेता देश की सीमाओं की सुरक्षा के प्रति उदासीन हैं, वे राष्ट्र का कल्याण नहीं कर सकते। वे सेना के आधुनिकीकरण और सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को चुनावी विमर्श का मुख्य मुद्दा बनाने पर बल देते हैं।
  1. आपका मत-5: “अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की संज्ञाएँ घातक हैं”
  • प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 15 जनवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 8)
  • संदर्भ: वे स्पष्ट करते हैं कि भारत ‘एक राष्ट्र और एक संस्कृति’ की भूमि है। समाज को राजनीतिक लाभ के लिए ‘अल्पसंख्यक’ और ‘बहुसंख्यक’ जैसी कृत्रिम व सांप्रदायिक संज्ञाओं में विभाजित करना राष्ट्र की एकात्मता के लिए अत्यंत घातक है। वे तत्कालीन कांग्रेस सरकार की अवसरवादी और तुष्टीकरण की नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए राष्ट्रीय एकता का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
  1. आपका मत-6: “उद्देश्य में समानता परंतु साधनों में विचलन”
  • प्रकाशन: ऑर्गनाइज़र, 15 जनवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 14)
  • संदर्भ: इस लेख में विभिन्न राजनीतिक दलों (कांग्रेस, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, स्वतंत्र पार्टी और जनसंघ) के चुनावी घोषणा-पत्रों और उनकी आर्थिक नीतियों (समाजवाद बनाम पूँजीवाद) का गहरा तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। वे भारतीय जनसंघ के विकेंद्रीकृत आर्थिक मॉडल को देश की आवश्यकताओं के अनुकूल बताते हैं।
  1. आपका मत-7: “योजनाओं के प्रति भारतीय जनसंघ का दृष्टिकोण व्यावहारिक”
  • प्रकाशन: ऑर्गनाइज़र, गणतंत्र दिवस विशेषांक, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 38)
  • संदर्भ: देश के योजनाबद्ध विकास (पंचवर्षीय योजनाओं) पर चर्चा करते हुए दीनदयाल जी लिखते हैं कि विकास और तकनीक का ढाँचा विदेशों से आयातित होने के बजाय देश की सांस्कृतिक मर्यादा और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। वे भारी उद्योगों के स्थान पर लघु व कुटीर उद्योगों और कुटीर औद्योगिकीकरण को प्राथमिकता देने की वकालत करते हैं।
  1. आपका मत-8: “दल और किसान; सरकार की ओर से कृषि और किसानों की उपेक्षा जारी”
  • प्रकाशन: ऑर्गनाइज़र, 29 जनवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 46)
  • संदर्भ: भारत की लगभग 72 प्रतिशत कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का संदर्भ देते हुए वे तत्कालीन सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र की उपेक्षा को रेखांकित करते हैं। वे भूमि सुधारों, किसानों की क्रय शक्ति बढ़ाने, सहकारी खेती (Cooperative Farming) के खतरों और किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने की मांग उठाते हैं।
  1. आपका मत-9: “हर मतदाता को निभानी है भूमिका”
  • प्रकाशन: ऑर्गनाइज़र, 12 फ़रवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 73)
  • संदर्भ: चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में मतदाताओं के अंतिम प्रबोधन के रूप में लिखा गया यह लेख बताता है कि लोकतंत्र की शुद्धि में मतदाता की भूमिका कितनी केंद्रीय है। वे मतदाताओं से अपील करते हैं कि वे विभिन्न दलों के घोषणा-पत्रों का गहराई से तुलनात्मक अध्ययन करें, निष्पक्ष रहें और सकारात्मक व रचनात्मक रूप से राष्ट्र निर्माण में अपना मत देकर ‘लोकमत परिष्कार’ के इस महापर्व को सफल बनाएं।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की यह पूरी लेखमाला इस बात का जीवंत उदाहरण है कि लोकमत परिष्कार केवल एक नारा नहीं था, बल्कि मतदाताओं को उनके कर्तव्यों, राष्ट्र की आर्थिक प्राथमिकताओं, सुरक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरूक करने का एक व्यावहारिक और बौद्धिक अभियान था।

2. खंड 11 (Volume 11)

  • पृष्ठ संख्या: 247 (अनुभाग: ‘लोकशिक्षा’)

संदर्भ:  इस पृष्ठ में ‘लोक शिक्षा’ शीर्षक के अंतर्गत यह बताया गया है कि स्कूली शिक्षा के अतिरिक्त लोक-संस्कार, स्वाध्याय और ‘लोकमत-परिष्कार’ भी शिक्षा के महत्वपूर्ण साधन हैं। इसके लिए रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, संगीत, पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकालयों और क्लबों का भरपूर उपयोग किया जाना चाहिए और राज्य को इनकी सुयोग्य व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। इसमें यह विशेष सुझाव भी दिया गया है कि रेडियो और टेलीविजन को सरकारी विभाग के बजाय एक स्वायत्त निगम (autonomous corporation) के रूप में चलाया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, चित्रपट (सिनेमा) को लोक-शिक्षा का एक अत्यंत प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा गया है कि शासन को यह ध्यान रखना चाहिए कि सिनेमा लोगों की रुचि बिगाड़ने के स्थान पर लोकमत-परिष्कार तथा समाज में सुरुचि (अच्छी रुचि) पैदा करने का साधन बने।

3. खंड 15 (Volume 15)

इस खंड का अध्याय 13 (पृष्ठ 89 से 92) पूरी तरह से “लोकमत-परिष्कार” विषय पर ही केंद्रित है, जो दीनदयाल उपाध्याय जी की पुस्तक ‘राष्ट्र जीवन की दिशा’ (1971) से लिया गया है। इसका दार्शनिक और व्यावहारिक विश्लेषण निम्नलिखित पृष्ठों पर मिलता है:

  • पृष्ठ 89

संदर्भ: अध्याय की शुरुआत दिल्ली विधानसभा को समाप्त करने के नेहरू जी और एक शिष्टमंडल के संवाद से होती है। दीनदयाल जी प्रश्न उठाते हैं कि जब समाज के अलग-अलग वर्ग अपने स्वार्थों के लिए परस्पर विरोधी माँगें करते हैं, तो ‘जनता की वास्तविक इच्छा’ किसे माना जाए? वे चेतावनी देते हैं कि लोकतंत्र में बिना किसी मर्यादा के केवल अपनी इच्छाओं को ही सर्वोपरि मानकर अड़ जाना अराजकता और अंततः निरंकुश शासन (तानाशाही) को जन्म देता है।

  • पृष्ठ 90

संदर्भ: यहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं है, बल्कि यह दूसरों के दृष्टिकोण को आदरपूर्वक समझने और विचार-विमर्श की तैयारी है। इसके लिए वे भारतीय ज्ञान परंपरा के सूत्र ‘वादे-वादे जायते तत्त्वबोधः’ का संदर्भ देते हैं। दृष्टिकोण में इस सामंजस्य को लाने के लिए मानव जीवन में ‘संयम’ की आवश्यकता होती है, जो लोकमत परिष्कार का अनिवार्य हिस्सा है।

  • पृष्ठ 91

संदर्भ: दीनदयाल जी बताते हैं कि लोकतंत्र को भीड़तंत्र या तानाशाही में बदलने से रोकने के लिए प्राचीन भारतीय मनीषियों ने ‘लोकमत-परिष्कार’ की एक अद्वितीय व्यवस्था की थी। भारत ने इसका सबसे उत्कृष्ट समाधान यह निकाला था— “राज्य (शासन/सरकार) के हाथ से लोकमत-निर्माण के साधन छीनकर।” उनका तर्क था कि लोकमत परिष्कार का कार्य सरकार या राजनीतिक दल नहीं कर सकते क्योंकि वे स्वयं सत्ता के लोभ में लिप्त होते हैं। यह कार्य केवल “वीतरागी, द्वंद्वातीत संन्यासियों और निष्पक्ष विचारकों” का है जो सांसारिक लालसाओं से मुक्त होकर निस्वार्थ भाव से समाज को धर्म, मर्यादा और संस्कारों की सीख देते हैं।

 

  • पृष्ठ 92

संदर्भ: वे अध्याय का निष्कर्ष निकालते हुए लिखते हैं कि जनता को सुसंस्कृत करने और ‘लोकमत परिष्कार’ का महत्त्व सर्वोपरि है। जब तक इस कार्य को निष्ठापूर्वक करने वाले, राज्य के मोह से दूर और भय से मुक्त महापुरुष तथा संगठनकर्ता समाज में सक्रिय रहेंगे, तब तक लोकमत अपनी सही और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ता रहेगा।

 

हिंदू हृदय सम्राट – अशोक सिंघल

27 सितंबर (जन्म जयंती) पर विशेष-
मृत्युंजय दीक्षित
27 सितम्बर 1926 को आगरा में माँ विद्यावती तथा पिता श्री महावीर के पुत्र रूप में जन्में राष्ट्रवादी विचारधारा के वाहक, श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के माध्यम से बहुसंख्यक हिंदू समाज को स्वाभिमान से खड़ा करने वाले विश्व हिंदू परिषद के संस्थापक अशोक सिंघल नेअपना जीवन हिंदू समाज के लिए खपा दिया। अशोक जी के व्यक्तित्व व उनके ओजस्वी विचारों का ही परिणाम है कि आज हिंदू समाज में सामाजिक समरसता का भाव दिखलायी पड़ रहा है। संत समाज व विभिन्न अखाड़ा परिषदों को एक मंच पर लाने का दुष्कर कार्य अशोक जी से ही संभव हो सका। यह उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि आज देश का बहुसंख्यक समाज अपने आप को गर्व से हिंदू कहता है।
1942 में अशोक जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और स्वयं को हिन्दुत्व और भारत के एक सच्चे आराधक के रूप में विकसित किया। उन्होंने 1950 बनारस हिंदू विश्वविद्यालय इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (अब, आई आई टी) से धातुकर्म में इंजीनियरिंग पूरी की किन्तु इसके पश्चात उन्होंने इंजीनियर की नौकरी करने के स्थान पर राष्ट्र और समाज सेवा का मार्ग चुना और संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गये। प्रचारक के रूप में उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य किया और फिर दिल्ली-हरियाणा में प्रांत प्रचारक बने। संघ के तत्कालीन सर संघचालक श्री गुरुजी ने 1964 में जाने- माने संत महात्माओं के साथ मिलकर विश्व हिंदू परिषद की स्थापना की। 1966 में विश्व हिंदू परिषद में अशोक जी का पदार्पण हुआ। वे 1986 में विहिप के महामंत्री और बाद में इसके अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बने। उन्होंने 20 वर्षों तक इस पद पर रहकर संगठन का विस्तार किया। अद्भुत योजक क्षमता,संगठन कुशलता, निर्भीकता, अडिग व्यक्तित्व और सबको साथ लेकर चलने की अशोक जी की विराटता का ही परिणाम है कि आज पूरे विश्व में सबसे प्रखर हिंदू संगठन के रूप में विश्व हिंदू परिषद का नाम लिया जा रहा है।
वर्ष 1975 से 1977 तक देश में आपातकाल लगा और संघ पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया। आपातकाल के दौरान अशोक सिंघल भूमिगत हो गए तथा इसके विरोध में निरंतर और सक्रिय संघर्ष किया। 1981 में दिल्ली में एक विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ जिसके पीछे सारा सामर्थ्य और शक्ति अशोक सिंघल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की थी। इस सम्मलेन के बाद अशोक सिंघल जी ने विश्व हिन्दू परिषद के काम के काम को नई धार देने का लक्ष्य रखा। उन्होंने परिषद के काम में धर्म जागरण, सेवा, संस्कृत प्रसार, परावर्तन (घर वापसी), गोरक्षा जैसे अनेक नये और महत्वपूर्ण आयाम जोड़े। इनमें हिन्दू जागरण और एकता के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बना श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन, जिससे परिषद का काम गाँव-गाँव, घर-घर तक पहुँच गया। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ ने देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा को पूरी तरह बदल दिया।
वर्ष 1984 में अशोक जी ने श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन का श्रीगणेश किया। इसके लिए दिल्ली के विज्ञान भवन में एक धर्म संसद का आयोजन किया गया। सिंहल जी इस के मुख्य संयोजक तथा संचालक थे। यहीं पर राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की रणनीति तय की गई। यहीं से सिंघल जी ने पूरी योजना के साथ कारसेवकों को अपने साथ जोड़ना शुरू किया। प्रारंभिक चरण में ही उन्होंने देश भर से 50 हजार कारसेवक जुटा लिए। इन सभी कारसेवकों ने देश की प्रमुख नदियों के किनारों पर खड़े होकर उनका जल अंजुली में भरकर राम जन्मभूमि मुक्त करा कर वहां पर भव्य राम मंदिर की स्थापना करने की शपथ ली।
यह आन्दोलन विभिन्न चरणों को पार करते हुए 31 अक्टूबर और 2 नवम्बर 1990 तक पहुंचा जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अपने मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए अयोध्या नगरी को एक छावनी में बदल दिया और अपने राजनैतिक स्वार्थ के चलते शांतिपूर्वक राम धुन गाते हुए, पैदल चलते रामभक्तों पर गोलियां चलवा दीं और सैकड़ों की संख्या में निहत्थे रामभक्तों को मौत के घाट उतार दिया।
इस घटना से दुःख, क्षोभ, आक्रोश और पराजय की मिश्रित भावनाओं में डूब गए हिन्दू समाज और साधु- संतों को सिंघल जी ने पुनः समेटा, और 6 दिसंबर 1992 को पुनः कारसेवा का आह्वान किया। एक बड़े वर्ग को लग रहा था कि 2 नवम्बर 1990 की घटना के बाद कौन अयोध्या आएगा? किन्तु अशोक जी के प्रति हिन्दू समाज में जो विश्वास था वह एक बार पुनः हजारों हजार हिन्दुओं को कारसेवा के लिए अयोध्या ले आया और इस बार जो हुआ वो हिन्दू संस्कृति के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिख गया। कारसेवकों ने बाबरी ढ़ांचे को गिराकर श्री जन्मभूमि को मुक्त कर दिया, उसको समतल कर अस्थायी राम मंदिर का निर्माण कर दिया । बाद में माननीय सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने भी नौ नवंबर 2019 को एक स्वर से उसी स्थान को श्रीराम जन्मभूमि स्वीकार किया और समस्त हिन्दू समाज का स्वपन साकार हो गया। आज अयोध्या में गगनचुम्बी भव्य एवं दिव्य श्रीराम मंदिर गर्व से खड़ा है और उस पर धर्म ध्वज लहरा रहा रहा है।
अशोक सिंघल ने देश, समाज, हिंदू संस्कृति और संस्कार के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। उन्होने श्री रामजन्मभूमि की मुक्ति तथा उस पर श्री राम मंदिर निर्माण के लिए आंदोलनों की झड़ी लगा दी। जनसभाओं व कार्यक्रमों में अशोक जी के ओजस्वी भाषणों को सुनने के लिए भारी भीड़ जमा होती थी जब यह भीड़ घरों की ओर प्रस्थान करती थी तो उसमें एक नयापन व ताजगी की उमंग होती थी ।अशोक जी में सभी को साथ लेकर चलने की अभूतपूर्व कला थी। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण और उसके प्रति संपूर्ण हिंदू समाज को जागरुक करने में खपा दिया।
केवल भारत ही नहीं विश्व हिन्दू परिषद के उनके कार्यकाल में हुए प्रयासों का ही परिणाम है कि आज पाकिस्तान, बांग्लादेश और विश्व के अन्य देशों में होने वाली हिंदू विरोधी या भारत विरोधी घटनाएं प्रकाश में आती है। वे जहां भारत में अपनी संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करने के लिए संघर्षरत रहते थे वे वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के प्रति किये जा रहे अत्याचारों के खिलाफ भी पूरे जोर शोर से आवाज उठाते थे। जम्मू- कश्मीर के हिंदुओं की समस्या के प्रति वे निरंतर गंभीर रहते तथा उनके दुखों को दूर करने का प्रयास भी करते थे।
अशोक सिंघल अपने आंदोलनों के दौरान गंगा नदी की अविरलता के लिए व गौ हत्या के खिलाफ भी पुरजोर आवाज उठाई थी। इतना ही नहीं वे अपनी संस्थाओं के माध्यम से कन्याओं के विवाह आदि संस्कार भी संपन्न करवाते थे और 42 अनाथालयों के माध्यम से 2000 से अधिक बच्चों को आश्रय दिया जाता था जो अनवरत जारी है। सुरक्षा हेतु जन जागरण के द्वारा 10 लाख से अधिक गोवंश की सुरक्षा की गयी।
हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए सामाजिक समरसता के कार्यक्रम भी अशोक जी की प्रेरणा से चलाये गये। दलित बस्तियों में विहिप के सेवा कार्य व पर्व आदि अभी भी उन्हीं की प्रेरणा से अनवरत जारी हैं। अशोक जी के प्रयासों से ही विहिप के काम में धर्म जागरण, सेवा, संस्कृत परावर्तन आदि अनेक नये आयाम जुड़े। यह उन्हीं का प्रयास है कि आज अमेरिका, इंग्लैंड, सूरीनाम, कनाडा, नीदरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया , श्रीलंका आदि 80 देशों में विहिप का संपर्क है।देशभर में 53532 समितियां कार्यरत हैं।
स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण अशोक जी दिसंबर 2011 में विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष पद से दायित्व मुक्त हो गए थे। लंबी बीमारी के बाद 17 नवंबर 2015 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया। अशोक जी का हिंदू समाज के लिए अप्रतिम योगदान है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

प्रेषकः-मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं.- 09198571540

September 16, 2026

मोदी होना आसान नहीं

नरेंद्र मोदी
जन्मदिन पर विशेष
सुरेश हिंदुस्तानी
कोई भी व्यक्ति जन्म से महान नहीं बनता, उसके द्वारा किए गए कर्म ही उसकी छवि बनाते हैं। भाग्य कुछ नहीं होता, कर्म से सब प्राप्त किया जा सकता है। गुजरात के निर्धन परिवार में जन्म लेने वाले नरेंद्र मोदी के व्यापक विस्तार की कहानी भी ऐसी ही है। मोदी ने अपने और अपने परिवार के बारे में कभी नहीं सोचा। उनके चिंतन के केंद्र में आम आदमी प्रमुखता से है। संभवतः वे पंडित दीनदयाल जी की उस उक्ति को धरती पर लाने का उपक्रम कर रहे हैं, जिसमें अंतिम छोर पर निवास करने वाले व्यक्ति का उत्थान छुपा हुआ है। तभी तो नरेंद्र मोदी कहते हैं कि 140 करोड़ देशवासी उनका परिवार है। इतना ही नहीं, वे अपने आपको प्रधान सेवक मानने में गौरव का अनुभव करते हैं। उन्होंने जनता के साथ जुड़ाव बनाने वाला यह कथन अपने जीवन में समाहित कर लिया है। ऐसा जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति सामान्य नहीं हो सकता। इसलिए कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी होना आसान नहीं है।
किसी व्यक्ति के जीवन में प्राप्त होने वाला पद बड़ा हो सकता है, लेकिन पद से बड़ा होता है उसका व्यक्तित्व। कुर्सी शक्ति दे सकती है, किंतु उस शक्ति को धैर्य, संयम और संकल्प के साथ साधना हर किसी के लिए संभव नहीं होता। भारत की राजनीति में नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व इसी कारण अलग दिखाई देता है। उनके समर्थकों के लिए वे संघर्ष से निकली उस यात्रा के प्रतीक हैं, जिसमें अभावों से उठकर व्यक्ति देश के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंचता है। सच कहें तो मोदी होना आसान नहीं है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने वर्तमान राजनीतिक चुनौतियां नई नहीं हैं। सत्ता के गलियारों में जितनी प्रशंसा मिलती है, उतनी ही तीखी आलोचना भी उनका पीछा करती है। राजनीतिक प्रहारों की निरंतरता किसी भी व्यक्ति के धैर्य की परीक्षा ले सकती है। लेकिन मोदी की राजनीतिक शैली की एक प्रमुख विशेषता यह रही है कि वे अपने समर्थकों की अपेक्षाओं और विरोधियों के आक्रोश के बीच अपना संतुलन बनाए रखने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। राजनीति में विरोध आवश्यक है। लोकतंत्र में सत्ता से प्रश्न पूछे जाने चाहिए। नीतियों की सकारात्मक आलोचना होनी चाहिए। लेकिन राजनीतिक असहमति जब व्यक्तिगत कटुता का रूप लेती है, तब लोकतंत्र की गरिमा प्रभावित होती है। ऐसे वातावरण में भी स्वयं को संयमित रखना किसी नेता के लिए सामान्य बात नहीं। आज की राजनीति केवल मोदी का समर्थन या विरोध पर ही केंद्रित हो गई है। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि मोदी का प्रचार विपक्षी दलों ने अधिक किया है।
मोदी की राजनीतिक यात्रा का सबसे प्रेरक पक्ष उनका संघर्ष है। एक सामान्य परिवार से निकलकर देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की कहानी भारतीय लोकतंत्र की उस शक्ति को रेखांकित करती है, जिसमें किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि उसकी अंतिम सीमा तय नहीं करती। अभावों में पला व्यक्ति भी अपने परिश्रम, अनुशासन और संकल्प के बल पर राष्ट्र के नेतृत्व तक पहुंच सकता है। यही मोदी की कहानी का सबसे बड़ा संदेश है।
संघर्ष व्यक्ति को तोड़ता नहीं, यदि उसके भीतर संकल्प जीवित हो तो वही संघर्ष उसे गढ़ता है।
मोदी के व्यक्तित्व की चर्चा करते समय उनके परिवार और व्यक्तिगत जीवन का पक्ष भी सामने आता है। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनका परिवार सत्ता के केंद्र में दिखाई नहीं देता। सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए पारिवारिक जीवन को राजनीतिक लाभ से दूर रखने की उनकी छवि उनके समर्थकों के लिए विशेष महत्व रखती है। भारतीय राजनीति में जहां परिवारवाद लंबे समय से बहस का विषय रहा है, वहां मोदी की व्यक्तिगत राजनीतिक यात्रा एक अलग उदाहरण प्रस्तुत करती है।
मोदी की कहानी केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है। आज विश्व मंच पर भारत की उपस्थिति पहले से अधिक प्रभावशाली दिखाई देती है। अनेक देशों के साथ भारत के संबंधों का विस्तार हुआ है। वैश्विक मंचों पर भारत की शक्तिशाली भूमिका को लेकर चर्चा बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की आवाज को गंभीरता से सुना जाना उस बदलते भारत का संकेत है, जो अपनी क्षमता, अपने हितों और अपनी सभ्यता की पहचान के साथ विश्व समुदाय के सामने खड़ा होना चाहते हैं। वे जब विदेश दौरा करते हैं, तब वे भारतीय मूल के नागरिकों से अवश्य मिलते हैं। इस दौरान भारतीय मूल के व्यक्तियों के चेहरे बहुत ही प्रफुल्लित दिखाई देते हैं। वे सभी मोदी को एक सफल नायक की श्रेणी में देखते हैं। अपनेपन का यह भाव मोदी के स्वभाव का ही परिणाम है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए विदेश यात्राओं या कूटनीतिक मुलाकातों का विषय नहीं है। यह उस आत्मविश्वास का विषय है, जिसके साथ भारत आज विश्व समुदाय से संवाद कर रहा है।
एक समय था जब दुनिया के अनेक शक्तिशाली देश भारत को मुख्यतः एक विकासशील राष्ट्र के रूप में देखते थे। आज भारत की अर्थव्यवस्था, उसकी युवा शक्ति, उसकी तकनीकी क्षमता, उसका विशाल बाजार और उसकी सामरिक भूमिका विश्व की चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस परिवर्तन का पूरा श्रेय किसी एक व्यक्ति को देना उचित नहीं होगा, लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने भारत की इस वैश्विक प्रस्तुति को निश्चित रूप से एक विशिष्ट राजनीतिक दिशा दी है। और यही मोदी की विशेषता का एक महत्वपूर्ण आयाम है। वे भारत को केवल वर्तमान के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व जितना मुखर है, उतना ही व्यक्तिगत जीवन में सादगी और अनुशासन की छवि से जुड़ा हुआ भी है। सार्वजनिक जीवन में निरंतर सक्रियता, दैनिक रूप से लंबे कार्य घंटे, देश-विदेश की यात्राएं और करोड़ों लोगों की अपेक्षाओं का भार, प्रधानमंत्री का जीवन किसी सामान्य नौकरी की तरह नहीं होता। प्रत्येक निर्णय के पीछे राजनीतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय परिणाम जुड़े होते हैं।
और इसीलिए प्रधानमंत्री होना केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं है। यह हर दिन स्वयं को कटघरे में खड़ा करना भी है। एक ओर समर्थकों की अपेक्षाएं, दूसरी ओर विरोधियों के सवाल। एक ओर देश की आकांक्षाएं, दूसरी ओर विश्व की निगाहें। एक ओर वर्तमान की चुनौतियां, दूसरी ओर भविष्य के भारत की जिम्मेदारी। इन सबके बीच संतुलन बनाना ही नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा है।
नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर उनके जीवन को देखने का सबसे सार्थक तरीका यही है कि हम उनके संघर्ष, संकल्प और नेतृत्व की यात्रा को समझें। मतभेद लोकतंत्र की सुंदरता हैं। उनके भीतर एक ऐसा नेतृत्व दिखाई देता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता। उनके आलोचक चाहे उनके निर्णयों से सहमत हों या नहीं, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि नरेंद्र मोदी आज भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली और चर्चित चेहरों में से एक हैं। उनकी यात्रा हमें एक महत्वपूर्ण बात सिखाती है कि ऊंचाई पर पहुंचना कठिन है, लेकिन उस ऊंचाई पर टिके रहकर निरंतर आगे बढ़ते रहना उससे भी कठिन है।
मोदी होना इसलिए आसान नहीं है। मोदी होने के निहितार्थ यही हैं संघर्ष को शक्ति में बदलना। आलोचना को सहने का धैर्य रखना। सफलता के बीच जमीन से जुड़े रहना। भारत की आकांक्षाओं को विश्व के सामने आत्मविश्वास से रखना। और सबसे बढ़कर, स्वयं से बड़ी किसी राष्ट्रीय आकांक्षा के लिए निरंतर काम करते रहना।
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर उन्हें देखने का एक दृष्टिकोण यह भी है कि एक साधारण पृष्ठभूमि से निकला व्यक्ति किस प्रकार भारतीय लोकतंत्र की यात्रा में असाधारण राजनीतिक पहचान बना सकता है। राजनीति के निर्णयों का मूल्यांकन इतिहास करेगा। नीतियों की समीक्षा समय करेगा। उपलब्धियों और कमियों का आकलन आने वाली पीढ़ियां करेंगी। लेकिन संघर्ष की कहानी अपनी जगह रहती है। और नरेंद्र मोदी की कहानी का यही सबसे बड़ा भाव है, एक साधारण शुरुआत से असाधारण शिखर तक की यात्रा। इसलिए जन्मदिन के इस अवसर पर एक वाक्य सहज ही मन में उभरता है कि मोदी होना आसान नहीं।
Suresh Hindustani Journalist

सुरेश हिन्दुस्तानी वरिष्ठ पत्रकार

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