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श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण में लगी विभूतियों का संघ ने किया सम्मान

April 28, 2026

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण में लगी विभूतियों का संघ ने किया सम्मान

Posted on 28.04.2026 Time 10.52 PM , Tuesday, Nagpur, RSS, Shri Ram janmbhumi Ayodhya

कोई देश भारत का उद्धार नहीं करेगा, भारत सारी दुनिया का उद्धार करेगा – डॉ. मोहन भागवत जी

नागपुर, 27 अप्रैल 2026, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति ने श्री क्षेत्र अवधपुरी में प्रभु श्रीरामचंद्र जी के जन्म स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण, जिन मान्यवरों के मार्गदर्शन में हुआ, उन प्रतिभाओं के सम्मान का कार्यक्रम आयोजित किया। अयोध्या में श्रीराम मंदिर कल्पना से भी अति भव्य बना है। हमको भी अपना काम ऐसे ही करना है। कल्पना से अधिक उत्तम, अधिक भव्य, अधिक सुंदर करना है। ताकि विश्व में धर्म की स्थापना हो। भारत का उत्थान भारत की संतान ही करेगी और कोई देश भारत का उद्धार नहीं करेगा। भारत बड़ा होकर सारी दुनिया का उद्धार करेगा। ये विधि लिखित है। उसको पूर्ण करने में हमारा हाथ लगना चाहिए।

रेशीमबाग स्थित महर्षि व्यास सभागृह में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत, गोविंददेव गिरी जी महाराज, भय्याजी जोशी (अध्यक्ष, डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति)., श्रीधर जी गाडगे (उपाध्यक्ष, डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति). उपस्थित रहे।

उन्होंने कहा कि मंदिर श्री राम जी की इच्छा से बना, जब तक सबकी लकड़ी नहीं लगती, गोवर्धन नहीं उठता। उनकी करांगुली तब तक काम नहीं करती, जब तक बाकी लोग लकड़ी नहीं लगाते। मंदिर भी ऐसे ही बना। राम मंदिर में भारतवर्ष के एक-एक व्यक्ति की लकड़ी लगी है। अब विश्व को धर्म देने वाला भारत खड़ा होना है। राम मंदिर बनने तक हिन्दुस्तान हिन्दू राष्ट्र है कहने पर हंसने वाले लोग थे। आज हंसने वाले लोग ही कह रहे हैं कि हिन्दुस्तान हिन्दुओं का देश है। हमको कहते है कि आप घोषित करो। हम कहते है घोषित करवाने की जरूरत नहीं, जो है सो है। सूरज पूरब से उगता है, ये घोषित करना चाहिए क्या? वह पूरब से ही उगता है। तो भारत हिन्दू राष्ट्र है, यह आज सबको मान्य है।

उन्होंने कहा कि विरोध मन में एक जोश पैदा करता है। उपेक्षा एक जिद पैदा करती है कि हम जो कह रहे हैं वो करके दिखाएंगे। लेकिन अनुकूलता में सुखासीनता आती है। अनुकूलता को नकार तो नहीं सकते। देश के लिए लाभ है, समाज के लिए लाभ है। परंतु उसमें अपने मन में समाधान नहीं आना चाहिए। राम राज्य केवल राजा के कारण नहीं होता। प्रजा के कारण भी होता है। मंदिर बनाने में जिन सब लोगों का योगदान हुआ, उस कृतज्ञता का ज्ञापन ही इस सत्कार समारंभ द्वारा हमने किया है। उन्होंने अपना काम किया, हमको अपना काम करना है।

मोहन भागवत जी ने कहा कि सनातन धर्म का उत्थान होने के लिए भारतवर्ष का उत्थान अवश्यम्भावी है। 150 साल पहले योगी अरविंद जी ने घोषित कर दिया है। जैसे-जैसे एक-एक लकड़ी लगेगी, वैसे-वैसे भगवान की करांगुली का बल इस संकल्प के पूर्ति के लिए प्रवाहित होता रहेगा। आप ऐसा विचार कीजिए कि 1857 से उत्थान की प्रक्रिया शुरू हो गई। 2014 में लंदन के गार्डियन ने लेख लिखा – ऑन दिस डे द इंडियंस हैव फाइनली सेड गुड बाय टू द ब्रिटिश टेक्निकली। हमने गुड बाय तो 15 अगस्त 1947 को ही कर दिया था, परंतु अभी भी हम निश्चित नहीं थे।

भारत का उत्थान होना है। लेकिन भारत क्या है? कौन सा उत्थान होना है? भारत इंडिया है क्या? इस पशोपेश में सारा समय जा रहा था। इतना बड़ा आंदोलन नहीं होता तो मंदिर बनता क्या? इतना बड़ा आंदोलन हो गया। लेकिन सत्ता में लोग राम मंदिर बनाने वाले नहीं बैठते तो राम मंदिर बनता क्या? राम मंदिर बनने का निर्णय हो गया, लेकिन नींव बनाने वाले नहीं मिलते तो आगे कैसे खड़ा होता? भारतवर्ष के एक-एक व्यक्ति की लकड़ी लगी है। तब श्री राम की करांगुली ने अपना चमत्कार दिखाया है। यह प्रक्रिया है, ये चलेगी।

उन्होंने कहा कि विश्व को धर्म देने वाला भारत खड़ा होना है। संघ की 100 साल की यात्रा कैसे चली? संघ के पास तो कुछ नहीं था। ना प्रसिद्धि थी, ना सत्ता थी, ना प्रचार था, ना साधन थे। डॉ. हेडगेवार जी को अनुयायी मिले और एक श्रद्धा व विश्वास ले चले – हिन्दुस्तान हिन्दू राष्ट्र है। शुरू में लोग हंसते थे, लेकिन आज मान रहे हैं। उस समय सब लोग खिल्ली उड़ाते थे। उस समय के कार्यकर्ताओं के मन में श्रद्धा थी, डॉ. जी के वचनों पर विश्वास था, उसके कारण सब बातों के बावजूद काम करते रहे। पतवार चलाते जाएंगे, मंजिल आएगी…आएगी, मंजिल कब आएगी किसी को पता नहीं, पर पतवार चलाना छूटा नहीं। श्रद्धा विश्वास के साथ शुरू किया और करते रहे।

उन्होंने कहा कि श्री राम के गुणों का वर्णन जैसे रामायण में है, राम राज्य के आधार के नाते वैसे राम राज्य की प्रजा कैसी थी, इसका भी वर्णन है। अयोध्या में मंदिर निर्माण हो गया, उसकी व्यवस्था के लिए एक विश्वस्त मंडल बना है। पर अब, प्रत्येक मन की अयोध्या बनाकर राष्ट्र का मंदिर खड़ा करना है, वह काम हम सबको करना पड़ेगा। राम राज्य की प्रजा जैसा आचरण मेरा बने, मेरे परिवार का बने और हमारे कारण अपने समाज में उस आचरण का प्रचार प्रसार हो। प्रत्यक्ष आचरण शुरू हो। यह हम करेंगे तो भगवान की इच्छा तो है ही कि दुनिया को धर्म देने वाला भारत खड़ा होना चाहिए। कितने जल्दी होगा, यह हमको तय करना है। हम सब लोग लगेंगे तो विश्व में फैले हिन्दू समाज की इतनी शक्ति है कि अगर सोच कर शुरू करेगा तो एक दिन में कर देगा।

छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्यारोहण के बाद देश में परिवर्तन

भय्याजी जोशी ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्यारोहण अवसर के बाद देश में एक परिवर्तन की प्रक्रिया गतिमान हुई थी। मुगलों का साम्राज्य समाप्त हुआ। अंग्रेजों का आगमन होना शुरू हुआ था। लेकिन एक संघर्ष का कालखंड लगभग समाप्त हुआ। उसके बाद भी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक लंबा अवसर गया, राह देखनी पड़ी। यह परिवर्तन की प्रक्रिया छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्यारोहण से शुरू हुई वो नित्य गतिमान होती रही और एक-एक कदम भारत आगे बढ़ता गया। सब प्रकार के आक्रांताओं की निशानियां वेदना दायक रहती है। ऐसे सारे चिन्हों को दूर करने का प्रयास भी एक कालखंड में प्रारंभ हुआ। उसी प्रक्रिया में अयोध्या के राम जन्मभूमि के स्थान पर मंदिर निर्माण किया गया। आक्रांताओं के एक चिन्ह मिटाने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। एक संघर्ष लंबा चला है और यह छोटा संघर्ष नहीं है। 400 वर्षों के निरंतर संघर्ष, एक लाख से अधिक लोगों का बलिदान और उसके बाद शुरू हुई कानूनी प्रक्रिया। उस कानूनी प्रक्रिया के बाद उस स्थान पर मंदिर निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।

भारत में मंदिरों की कमी नहीं है। राम मंदिर तो स्थान-स्थान पर है। लोग प्रश्न पूछते थे कि राम मंदिर तो इतने स्थानों पर है, अयोध्या की विशेष बात क्या है? तो एक अपमान के कलंक को मिटाए बिना राष्ट्र भाव प्रबल कैसे हो सकता है? और इसलिए राष्ट्रभक्त लोग राष्ट्र का प्रबल भाव अंतकरण में रखने वाले समाज के लोग खड़े हुए। यह मंदिर हिन्दू समाज की पुनः प्रतिष्ठा का प्रतीक है। हिन्दू समाज के सम्मान की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। इसलिए इस मंदिर का संदर्भ उत्तर प्रदेश अयोध्या वासी यहां तक सीमित नहीं है।

भगवान राम के जीवन के संदर्भ में तो हम बहुत कुछ बातें जानते ही हैं। आज भी आदर्श व्यवस्थाएं बताते समय राम राज्य की ही कल्पना को रखा जाता है। इसलिए जब कहा गया कि इस मंदिर से राष्ट्र निर्माण का कार्य तो राष्ट्र निर्माण में राज्य की भी एक भूमिका होती है। उस प्रकार का आदर्श हम सबके सामने रहे। यह अयोध्या के मंदिर का संदेश है। इसलिए केवल पत्थरों का और मजदूरों ने बनाया हुआ एक शिल्प के नाते नहीं है। शायद शिल्प के नाते भी अच्छे मंदिर भारत के अंदर होंगे। ये राष्ट्र भाव के प्रगटीकरण का एक प्रतीकात्मक शिल्प हम सबके सामने है।

गत पांच वर्षों से लगातार परिश्रम से इस भव्य मंदिर का निर्माण हुआ है। स्वाभाविक रूप से जिन्होंने बड़ी ऊर्जा शक्ति लगाई, ऐसे बंधुओं का नागपुर बुलाकर उनके योगदान का सम्मान किया जाए। सम्मान तो प्रतीकात्मक होता है। काम करने वाले आज यहां पर जितने हैं, उससे 100 गुना वहां पर थे। लेकिन एक प्रतीकात्मक रूप में कुछ लोगों को यहां पर निमंत्रित किया गया।

मंदिर निर्माण में भविष्य की चुनौतियों पर भी रखा गया ध्यान

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चम्पत राय जी ने कहा कि विचार भी था, विश्वास भी था, लेकिन यह कल्पना नहीं थी कि ऐसा बन जाएगा। यह विचार था कि 1000 साल आयु के लिए मंदिर बनना चाहिए। अब 1000 साल की बिल्डिंग कौन सी होती है? यह तो बात जानकारी में नहीं थी। इतना ही जानते थे कि रामेश्वरम, मदुरई, तंजावुर, कोणार्क 1000 साल से खड़े हैं। उससे भी अधिक आयु से खड़े हैं। तो विचार आया कि 1000 साल के लिए अगर बनाना है तो फिर उसमें लोहा नहीं हो सकता। मंदिर में एक ग्राम लोहे का भी उपयोग नहीं है। जमीन के नीचे भी नहीं है, जमीन के ऊपर भी नहीं है। विशेषज्ञों ने कहा कि सीमेंट की आयु 150 साल से ज्यादा नहीं है। उसके बाद वह शक्तिहीन हो जाता है। बाइंडिंग फोर्स खत्म हो जाती है। तो धरती के ऊपर कंक्रीट नहीं है और धरती के नीचे कंक्रीट है तो उसमें सीमेंट न्यूनतम से न्यूनतम है। पत्थर को पत्थर से कैसे जोड़ेंगे? तो जितनी पत्थर की आयु, उतनी आयु तांबा की होती है तो तांबे से जोड़ेंगे। अब यह टेक्निक कौन जानता है? कहीं इस प्रकार की तकनीक का अध्ययन नहीं है। कोई किताब नहीं, कहीं पढ़ाया नहीं जाता। तो यहां जो कुछ हुआ सब एक प्रकार का रिसर्च भी हुआ और कार्य भी हुआ। अगर केवल हम कहेंगे कि ट्रस्ट के माध्यम से हुआ तो शायद हम सच्चाई से बहुत दूर जाएंगे।

मंदिर निर्माण का दायित्व एलएंडटी ने लिया, उन्होंने कम से कम 250 वेंडर्स का सहयोग लिया और इन सब वेंडर्स के साथ 6000 कारीगर अपने-अपने स्थानों पर अयोध्या में काम करते रहे। यह समाज के स्वैच्छिक समर्पण से बना हुआ स्थान है। सबका योगदान है, 42 दिन में 10 करोड़ लोगों ने योगदान दिया। लगभग एक लाख कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर हाथ फैलाया, और शायद हिन्दुस्तान का पहला प्रयोग माना जाएगा कि 42 दिन में 3000 करोड़ बैंक में आ गया। स्टेट बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक की कम से कम 25,000 ब्रांच बैंक शाखाओं के माध्यम से धन ट्रांसफर होकर अयोध्या पहुंचा। मंदिर निर्माण के लिए समाज ने धन दिया है।

यह हिन्दुस्तान के गौरव का मंदिर है। आपके सम्मान का मंदिर है और हम सबको अपने को भाग्यशाली ही मानना चाहिए कि हमारे रहते हुए यह काम पूरा हुआ।

 

राम मंदिर यह पूर्णाहुति नही, अभी राम राज्य लाना है

गोविंददेव गिरी जी महाराज ने कहा कि डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति ने यद्यपि इसे सम्मान कहा होगा। हम पूज्य डॉक्टर जी के प्रसाद के रूप में उसका स्वीकार करते हैं। पूज्य डॉक्टर जी की प्रेरणा 100 वर्षों से कार्य कर रही है और उसी के फलीभूत हम आज उस ऊंचाई तक पहुंच गए हैं, जहां पहुंचना बहुत कठिन लगता था। बहुत कठिन लगता था क्योंकि वातावरण इस प्रकार का था। भगवान श्री राम का मंदिर बनाने का प्रयास तो हम लोग कर रहे थे। लेकिन ऐसे-ऐसे लोग सत्ता में बैठे थे जो सर्वोच्च न्यायालय में जाकर एफिडेविट दे रहे थे कि भगवान श्री राम काल्पनिक हैं। भगवान श्री राम हुए ही नहीं और रामसेतु भी मैनमेड नहीं है। भगवान श्री राम के अस्तित्व को नकारने, उनको काल्पनिक बताने जैसे वातावरण से यहां तक कि जो अत्यंत कठिन यात्रा हो सकी है। इसका कारण केवल और केवल संघ की शिक्षा और संघ की दीक्षा है। संघ ने हम लोगों को सहना सिखाया। सह करके भी प्रलोभनों से दूर रहना सिखाया। यह सिखाया कि जो कुछ करना है, वह अपने लिए नहीं करना है।

तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें, इस प्रकार के मंत्र को लेकर प्रयास करने वाले अगणित लोग एक शताब्दी तक काम करते रहे हैं। मंदिर का निर्माण केवल मंदिर निर्माण की प्रक्रिया  आरंभ हुआ, उससे नहीं हुआ है। एक शताब्दी तक जो यज्ञ चला है, उस यज्ञ की पूर्णाहुति के रूप में यह मंदिर खड़ा हुआ है। प्रतिनिधि के रूप में याद करना चाहता हूं। हमारे परम पूज्य अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास जी, हमारे सभी संतों के प्रतिनिधि हैं, प्रतीक हैं। इसलिए हम अपनी वाणी से उनका पूजन करते हैं। हम अपनी वाणी से उनका अभिनंदन करते हैं।

आजकल मैं अपनी कथा में कहते रहता हूं, मंदिर भव्य बनाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। यह तो हो गया। राम राज्य भी लाएंगे, यह अभी तक हम लोगों का कार्य बाकी है। राम जी का मंदिर यह पूर्णाहुति नहीं है। यह वाक्य का पूर्ण विराम नहीं है। अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र का जो न्यास बनाया गया, उसमें भी यह बात उल्लेखित है कि हम लोगों को आगे जो प्रयास करना है, वह राम राज्य के लिए करना है और इसलिए जिनका सम्मान किया गया, उन लोगों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि यह अंतरिम है, इंटरवल का प्रसाद है। आगे हम लोगों को अभी तक बहुत काम करना है। यह अब तक का प्रसाद है और आगे के लिए पाथेय है। यह मार्गक्रमण हम लोगों को करना ही होगा।

भगवान श्री राम हमारे राष्ट्र जीवन के सर्वोच्च आदर्श है। आसेतु हिमालय संपूर्ण भारत को बांधने वाला यदि कोई एक शब्द है तो वह शब्द राम ही हो सकता है। प्रभु ने सबको जोड़ कर अपना कार्य किया। लेकिन यह कार्य करते समय भगवान को भी तपना पड़ा। भगवान को भी बहुत बहुत कष्ट झेलने पड़े। उनको भी वनवास सहना पड़ा। इसीलिए राम बन गए। भगवान श्री राम के सारे गुणों की परीक्षा उनके वनवास काल में होती है।

संघ देशभक्ति पढ़ाने वाला एक खुला विश्वविद्यालय है और इसलिए इस देश की सेवा करना, इस देश की भक्ति करना या एकमात्र मंत्र देकर और सारे स्वयंसेवक अपने-अपने क्षेत्रों में जो-जो काम करते रहे हैं, उन कामों ने अब रंग लाया है। लेकिन अभी बहुत कुछ बाकी है। जो पाया वो अच्छा है, लेकिन जो खोया उसको भी भूल नहीं जाएं। ऐसा विचार करके सतत अभी भी कार्य करते रहना पड़ेगा।

इन विभूतियों का हुआ सम्मान

1). श्री नृपेन्द्र जी मिश्र, 2). श्री जगदीश जी आफळे, 3). श्री गिरीश जी सहस्त्रभोजनी, 4). श्री जगन्नाथ जी गुळवे, 5). श्री आशिष जी सोमपुरा, 6). श्री निखिल जी सोमपुरा, 7). श्री अरुण जी योगिराज, 8). श्री जय काकतीकर जी, 9). श्री मनिष जी त्रिपाठी, 10). श्री सत्यनारायण जी पाण्डे, 11). श्री अनिल जी सुतार, 12). श्री केशव जी शर्मा, 13). श्री विनोद जी शुक्ला, 14). श्री राजीव जी दुबे, 15). श्री मनीष जी दाधीच, 16). श्री विनोद जी मेहता, 17). श्री अंकुर जी जैन, 18). श्री राजू कुमार सिंह जी, 19). श्री ए. वी. एस. सूर्या श्रीनिवास जी, 20). श्री नरेश जी मालवीय, 21). श्री परेश जी सोमपुरा, 22). श्री नाथ अय्यर जी, 23). श्री संजय जी तिवारी, 24). श्री शरद बाबू जी, 25). श्री अनिल जी मिश्र, 26). श्री गोपाल जी, 27). श्री चम्पतराय जी, 28). पू. गोविंददेव गिरी महाराज जी, 29). श्री वासुदेव जी कामत, 30). श्री रमजानभाई जी

 

March 28, 2026

Ayodhya Yaja Fire: यज्ञ पंडाल में लगी आग, कोई जनहानि नहीं

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Posted on 28.03.2026 Time 04.13 PM Saturday, Ayodhya

अयोध्या, 28 मार्च 26, सरयू तट पर किए जा रहे लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के अंतिम दिन पंडाल में आग लग गई। पंडाल पूरी तरह जलकर राख हो गया। किसी जनहानि की सूचना नहीं है।

जानकारी के अनुसार प्रदेश के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने सरयू तट पर 1251 कुण्डी लक्ष्मी नारायण महायज्ञ आयोजित किया। आज यज्ञ का अंतिम दिन था। याद स्थल पर मंत्री के साथ स्थानीय विधायक अभय सिंह और अनेक बीजेपी नेता मौजूद थे।

यज्ञ की समाप्ति के बाद पंडाल में आग लग गई। इससे पूरा पंडाल धू धू कर जल उठा। हालांकि आग लगने से पहले लोग वहां से निकल चुके थे। फायर ब्रिगेड ने मौके पर पहुंच कर आग पर काबू पाया।

मंत्री दयाशंकर सिंह का कहना है कि यज्ञ पूर्ण होने के बाद आग लगी है। पूर्ण आहुति भी हो चुकी थी।अगले कारणों की जांच कराई जाएगी।

Ayodhya, March 28 A fire broke out at the pandal on the last day of the Laxmi Narayan Mahayagya being performed on the banks of the Saryu, on March 26. The pandal was completely burnt to ashes. No casualty has been reported. State Transport Minister Dayashankar Singh organised 1251 Kundi Laxmi Narayan Mahayagya at Saryu beach. Today was the last day of the Yajna. Local MLA Abhay Singh and several BJP leaders accompanied the minister at the memorial site.

March 19, 2026

राष्ट्रपति ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रीराम यंत्र की प्रतिष्ठापना की 

Posted on 19.03.2026 Time 08.48 PM Thursday, Ayodhya 
  • श्रीरामलला का दर्शन-पूजन किया
  • प्रभु श्रीराम ने इस अयोध्या नगरी में जन्म लिया, इसकी पवित्र धूलि का स्पर्श प्राप्त करना अत्यन्त सौभाग्य की बात : राष्ट्रपति
  • आज भारतीय नव सम्वत्सर की प्रथम तिथि पर, श्रीराम जन्मभूमि के परिपूर्ण होने के उपलक्ष्य में श्रीराम यंत्र की स्थापना की जा रही : मुख्यमंत्री
अयोध्या : 19 मार्च, 2026,  भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु  ने आज चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिवस एवं सनातन नव संवत्सर (विक्रम संवत्-2083) पर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रीराम यंत्र की प्रतिष्ठापना की तथा श्रीरामलला का दर्शन-पूजन किया।
राष्ट्रपति जी ने देश-विदेश में रहने वाले सभी भारतवासियों और श्रीराम भक्तों को नव वर्ष तथा आगामी रामनवमी पर्व की बधाई एवं शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि प्रभु श्रीराम ने इस अयोध्या नगरी में जन्म लिया। इसकी पवित्र धूलि का स्पर्श प्राप्त करना अत्यन्त सौभाग्य की बात है। ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’, अर्थात् प्रभु श्रीराम ने इस भूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ बताया था। इसी अयोध्या अर्थात् अवधपुरी और आसपास की लोकभाषा में सन्त तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना की थी। मानस में प्रभु श्रीराम सीता माता से कहते हैं कि ‘जद्यपि सब बैकुंठ बखाना, बेद पुरान बिदित जगु जाना, अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ, यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ’, अर्थात् सबने बैकुण्ठ का बखान किया है तथा वह वेद-पुराणों में वर्णित तथा जग प्रसिद्ध है, लेकिन बैकुण्ठ भी हमें अवधपुरी जैसा प्रिय लगता है।
राष्ट्रपति जी ने प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर प्रधानमंत्री जी को लिखे गये अपने पत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि उस पत्र में यह भाव व्यक्त किया गया था कि सौभाग्य की बात है कि हम सब अपने राष्ट्र की पुनर्स्थापना के नये काल चक्र के शुभारम्भ के साक्षी बन रहे हैं। उन्होंने कहा कि चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिवस एवं सनातन नव संवत्सर पर अयोध्या आकर स्वयं को कृतार्थ अनुभव कर रही हूं।
राष्ट्रपति जी ने कहा कि हम सभी एक समावेशी समाज और विकसित राष्ट्र के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। प्रभु श्रीराम के आशीर्वाद से वर्ष 2047 या सम्भवतः उससे पूर्व ही हम विकसित भारत के लक्ष्यों को प्राप्त कर सकेंगे। 21वीं सदी में हमारे समावेशी समाज और विकसित राष्ट्र की परिकल्पना राम राज्य के वर्णन में प्राप्त होती है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं, ‘नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना, नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना’, अर्थात् राम राज्य में कोई भी दुःखी, निर्धन, बुद्धिहीन और संस्कारहीन नहीं है। विगत दशक के दौरान देश के 25 करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी रेखा से उबारा गया। राम राज्य का आदर्श आर्थिक समृद्धि और समाजिक समरसता के उच्चतम मानकों को प्रस्तुत करता है। प्रभु श्रीराम का माता शबरी से भावपूर्ण मिलन, निषादराज से स्नेह-सम्बन्ध, युद्ध में कोल-भील, वानर समुदाय का सहयोग लेना, जटायु, जामवन्त आदि को सम्मान तथा स्नेह की प्रेरणा प्रदान करना जैसे अनेक प्रसंग सर्वस्व समावेशी जीवन दर्शन अपनाने का आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
राष्ट्रपति जी ने कहा कि वर्तमान सन्दर्भ में यह सुखद है कि सामाजिक समावेश तथा आर्थिक न्याय के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और जीव-जन्तुओं की सुरक्षा हेतु बड़े पैमाने पर तय किये गये लक्ष्यों को मूर्त रूप प्रदान किया जा रहा है। राम राज्य के आदर्शां पर चलते हुए हम सब नैतिकता और धर्माचरण पर आधारित राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे। प्रभु श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र का आदर्श वाक्य है, ‘रामो विग्रहवान् धर्मः‘, अर्थात् प्रभु श्रीराम धर्म के प्रतिमान स्वरूप हैं। धर्म के व्यापक अर्थों के आधार पर निजी और सामूहिक जीवन को संचालित करके ही हम प्रभु श्रीराम की सच्ची आराधना कर सकेंगे।
प्रभु श्रीराम के आशीर्वाद से इस मन्दिर तथा परिसर की भव्यता बढ़ती ही जा रही है। मैं माता अन्नपूर्णा, माँ दुर्गा, प्रभु श्रीराम परिसर तथा श्रीरामलला का दर्शन कर धन्य हो गयी हूँ। प्रभु श्रीराम की असीम कृपा से आज इस पावन परिसर में पुण्य लाभ की प्राप्ति हुई है। सप्त मन्दिर में माता शबरी, निषादराज, माता अहिल्या, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि विश्वामित्र तथा महर्षि अगस्त्य की पवित्र मूर्तियों का दर्शन करने व आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। सभी देवी-देवताओं की कृपा देशवासियों पर बनी रहे, हम सब आधुनिक विश्व में राम राज्य जैसी व्यवस्था स्थापित कर सकें। हम सब जनसामान्य की भाषा में सुनते रहे हैं कि ‘मुझमें राम, तुझमें राम, हम सबमें राम समाए‘। रामभक्ति के पवित्र बन्धन में जुड़कर पुण्य के भाव के साथ हम राष्ट्र का निर्माण करें।
इस दिव्य मन्दिर में द्वितीय तल पर श्रीराम यंत्र की स्थापना और पूजन करने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यह प्रभु श्रीराम की असीम कृपा का प्रमाण है। यह श्रीराम यंत्र कांची कामकोटि पीठम के पूज्य शंकराचार्य स्वामी श्री शंकर विजयेन्द्र सरस्वती जी द्वारा प्रदत्त है। प्रभु श्रीराम और भगवान शंकर के बीच दैवीय स्नेह के आदर्शों को उनके भक्तों ने अपनी उपासना पद्धतियों में बनाये रखा है।
राष्ट्रपति जी ने कहा कि श्री रामेश्वर में शिवलिंग की स्थापना और विधिवत पूजा करने के पश्चात स्वयं प्रभु श्रीराम ने गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में कहा कि ‘सिव समान प्रिय मोहि न दूजा‘। श्रीराम यंत्र भगवान शंकर की उपासना परम्परा से जुड़े कांची कामकोटि पीठ तथा श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के बीच प्रगाढ़ स्नेह का प्रतीक है। यह पारस्परिक स्नेह हमारी सनातन परम्परा की आधुनिक अभिव्यक्ति है। यह मन्दिर परिसर कला और शिल्प की अनुपम अभिव्यक्तियों से समृद्ध है। ऐसा लगता है कि मानो स्वयं भगवान विश्वकर्मा जी ने यहाँ विद्यमान निर्माण और शिल्प से जुड़ी संस्थाओं, शिल्पकारों और श्रमिकों को कुशलता और प्रेरणा प्रदान की है। सभी श्रमिक, शिल्पकार और निर्माण संस्थाएँ सराहना की पात्र हैं।

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने प्रदेशवासियों को भारतीय कालगणना के प्रथम दिवस पर प्रारम्भ हिन्दू नव संवत्सर पर शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि यह नववर्ष सभी के जीवन में नवचेतना, नवऊर्जा और नवसंकल्प का संचार करे। यह शुभ और पावन संयोग है कि श्रीराम मन्दिर के द्वितीय तल के गर्भगृह में श्रीराम यंत्र की स्थापना हो रही तथा हिन्दू नववर्ष का प्रथम प्रभात उदित हो रहा है।

मुख्यमंत्री जी ने ‘रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे, रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः’ श्लोक से अपने सम्बोधन की शुरूआत करते हुए कहा कि आज भारतीय नव सम्वत्सर की प्रथम तिथि पर, श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के परिपूर्ण होने के उपलक्ष्य में श्रीराम यंत्र की स्थापना की जा रही है। अब हम अयोध्या के बारे में वह बातें कह सकते हैं, जिन्हें प्रभु श्रीराम ने स्वयं कहा था कि ‘अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ, यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ, जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि, उत्तर दिसि बह सरजू पावनि’। सरयू माता इस अयोध्या धाम को अपने निर्मल जल से पवित्र करते हुए पूरे क्षेत्र को आलोकित कर रहीं हैं।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि प्रधानमंत्री जी नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण के लिए भूमि-पूजन, श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा, श्रीराम दरबार के पवित्र विग्रह की स्थापना, श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण के पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ध्वजारोहण तथा आज श्रीराम यंत्र की स्थापना का कार्य प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी को आनन्द से परिपूर्ण कर देता है।
भारत की आस्था अनेक प्रकार के संघर्षों व विप्लवों को झेलने के बाद भी 500 वर्षों तक निरन्तर बनी रही। शासन चाहे जिसका रहा हो, संघर्ष हमेशा जारी रहा। परिणामस्वरूप 500 वर्षों की प्रतीक्षा के उपरान्त श्रीरामलला अयोध्या धाम में अपने मन्दिर में विराजमान हुए हैं। श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर भव्य मन्दिर मात्र नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्र मन्दिर का प्रतीक बन चुका है। आज रामराज्य की अवधारणा साकार होती हुई दिखायी दे रही है। ‘राम राज बैठें त्रैलोका, हरषित भए गए सब सोका, बयरु न कर काहू सन कोई, राम प्रताप बिषमता खोई। बरनाश्रम निज निज धरम, निरत बेद पथ लोग, चलहिं सदा पावहिं सुखहि, नहिं भय सोक न रोग’।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि वर्तमान में दुनिया में अनेक जगह युद्ध चल रहे हैं। भय, अव्यवस्था व आर्थिक अराजकता है। हम भारत के अयोध्याधाम में भयमुक्त होकर राष्ट्रपति जी के सान्निध्य में श्रीराम यंत्र की स्थापना के कार्यक्रम में सहभागी बनकर रामराज्य की अनुभूति कर रहे हैं। हमारे ऋषि-मुनियों की तपस्या, अन्नदाता किसानों के परिश्रम, कारीगरों की उद्यमिता तथा लोगों की आस्था ने भारत को सदैव ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत‘ बनाये रखा है। श्रीराम जन्मभूमि यज्ञ की पूर्णाहुति कार्यक्रम से जुड़कर न केवल उत्तर प्रदेशवासी, बल्कि देश-दुनिया का प्रत्येक धर्मावलम्बी गौरव की अनुभूति कर रहा है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि वर्ष 2025 में प्रदेश में 156 करोड़ श्रद्धालु और पर्यटक आध्यात्मिक तथा धार्मिक स्थलों की यात्रा पर आए हैं। दुनिया के किसी भी देश की इतनी आबादी नहीं है। यह नया तथा बदलता हुआ भारत है। वर्तमान पीढ़ी सही दिशा में जा रही है। आज युवा नया वर्ष मनाने के लिए मन्दिरों में जाता है। यही उसके संस्कार हैं। यहाँ जो बात अम्मा जी ने कही है, वह नये भारत में अक्षरशः देखने को मिल रही है।

इस अवसर पर विदुषी माता अमृतानन्दमयी, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविन्ददेव गिरि तथा सन्तगण सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

February 23, 2026

देहरादून के वरिष्ठ पत्रकार रामप्रताप मिश्र साकेती नहीं रहे

Ram Pratap Mishra Saketi, Senior Journalist Dehradun

Posted on 23.02.2026, Monday, Time 07.59 PM, Dehradun, Ram Pratap Mishra Saketi, Ayodhya

देहरादून। वरिष्ठ पत्रकार मेरे सहयोगी रहे रामप्रताप मिश्र साकेती नहीं रहे। उनके निधन का समाचार जानकार बहुत कष्ट हुआ। बहुत ही स्पष्ट विचार, धुन के पक्के, अति स्वाभिमानी और गैर समझौतावादी साकेती का जीवन सीधा सपाट और विवाद रहित था। वे मेरे साथ 1988 में जुड़े थे, जब हम देहरादून में विश्व मानव दैनिक के प्रभारी थे। अखाड़ा बाजार के नारायण मार्केट में तीसरी मंजिल के कार्यालय में वे मिलने आए थे और फिर उसी दिन हमारे साथ संवाददाता के रूप में जुड़ गए थे। 100 कांवली रोड उनका पता था, जो उनकी पहचान बन गया था, क्योंकि वे बाहरी पत्र पत्रिकाओं में नियमित छपते थे और साथ ये पता भी। उन्होंने मेरे देहरादून रहने तक इस अखबार में काम किया। फिर दैनिक जागरण से जुड़े। जब मैं पाञ्चजन्य से जुड़ा तो वे देहरादून से पाञ्चजन्य का सहयोग करते थे। वे उत्तराखण सूचना विभाग से भी कुछवर्ष जुड़े रहे।
संप्रति भारतीय जनता पार्टी उत्तराखंड की पत्रिका देवकमल का संपादन कर रहे थे। देहरादून के मित्रों से मिली जानकारी के अनुसार उनका निधन कल बुलंदशहर में हुआ, जहां उनका बेटा नौकरी में है। साकेती जी मूल रूप से अयोध्या जनपद के निवासी थे। लगभग 45 साल पहले वे अयोध्या से देहरादून आ गए थे और यहीं के होकर रह गए।
साकेती जी को विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को सद्गति प्रदान करे। ॐ शांति शांति शांति।

February 15, 2026

अयोध्या: राममंदिर में 22 को संघ का घोष वादन

Posted on 15.02.2026 Time 03.55 PM Sunday, Ayodhya, Ram Mandir, RSS Ghosh

अयोध्या, 15 फरवरी। रामनगरी में 22 फरवरी को एक ऐतिहासिक क्षण दर्ज होने जा रहा है, जब पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घोष वादन श्रीराम जन्मभूमि परिसर में गूंजेगा। 21 से 23 फरवरी तक आयोजित रामार्चनम कार्यक्रम के तहत यह आयोजन होना है। दिल्ली प्रांत से आए 230 स्वयंसेवक रामपथ पर पथ संचलन करते हुए राम मंदिर में घोष वादन की प्रस्तुति देंगे। आयोजन को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं।
दिल्ली प्रांत के स्वयंसेवकों का दल 20 को रामनगरी पहुंच जाएगा। 21 को यह दल अभ्यास करेगा, जबकि 22 को राम मंदिर में आयोजन होगा। संघ के घोष दल की ओर से नगाड़ा, तुरही, शंख, बांसुरी, शृंग और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों के माध्यम से राष्ट्र भक्ति और सांस्कृतिक चेतना का संदेश दिया जाएगा। संघ के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में होने वाला घोष वादन मुख्य रूप से पारंपरिक वाद्य यंत्रों के समूह के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसे सैन्य बैंड की शैली में बजाया जाता है। निश्चित धुनों और तालों पर आधारित प्रस्तुति होगी। इस कार्यक्रम के लिए एक विशेष धुन तैयार की गई है।

विशेष बात यह है कि घोष वादन केवल संगीत नहीं, बल्कि अनुशासन, समन्वय और संगठन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। एक साथ सैकड़ों स्वयंसेवकों का एक लय में कदमताल और वादन, श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र रहेगा। घोष वादन के दौरान स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में सुसज्जित होकर अनुशासित पंक्तियों में प्रस्तुति देंगे, जो संगठन की एकात्मता को दर्शाता है। यह आयोजन यह भी दर्शाएगा कि राम मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भी प्रतीक बन रहा है।

तीन माह से चल रही थी तैयारी
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के घोष वादन कार्यक्रम को लेकर पिछले तीन माह से चल रही थी। कार्यकर्ताओं ने नियमित अभ्यास सत्रों में भाग लिया और विशेष समन्वय बैठकों के माध्यम से कार्यक्रम की रूपरेखा तय की गई। राम मंदिर परिसर में पहली बार होने जा रहे इस घोष वादन को अनुशासन और सांस्कृतिक गरिमा के साथ प्रस्तुत करने पर विशेष ध्यान दिया गया। प्रस्तावित पथ संचलन की रूट योजना, समय निर्धारण और सुरक्षा समन्वय को लेकर भी लगातार तैयारी होती रही।

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