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प्रधानमंत्री की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय बैठक

September 13, 2026

प्रधानमंत्री की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय बैठक

Posted Date:- Sep 12, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर चीन जनवादी गणराज्य के राष्ट्रपति महामहिम श्री शी जिनपिंग के साथ मुलाकात की।

दोनों नेताओं ने अगस्त 2025 में तियानजिन में हुई अपनी पिछली बैठक के बाद से भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में हुई निरंतर प्रगति का स्वागत किया। उन्होंने दोहराया कि दोनों देशों को अपने संबंधों के प्रति रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। मतभेदों को विवादों का रूप नहीं लेना चाहिए। प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि दोनों पक्षों को तीन पारस्परिकताओं—पारस्परिक सम्मान, पारस्परिक संवेदनशीलता और पारस्परिक हित—से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता द्विपक्षीय संबंधों के निरंतर विकास का एक आवश्यक आधार बनी हुई है। उन्होंने सीमा से संबंधित मुद्दों पर मौजूदा समझौतों और सहमतियों का दोनों पक्षों द्वारा पालन किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। दोनों नेताओं ने अपने समग्र द्विपक्षीय संबंधों के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और दोनों देशों के लोगों के दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए सीमा प्रश्न के निष्पक्ष, तर्कसंगत और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

दोनों नेताओं ने जन-से-जन संबंधों में हुई प्रगति का संज्ञान लिया और दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, कारोबारी संबंधों तथा लोगों की अधिक आवाजाही को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। आर्थिक और व्यापारिक संबंधों के संबंध में, उन्होंने संरचनात्मक व्यापार असंतुलन और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े मुद्दों सहित एक-दूसरे की चिंताओं का समाधान करने तथा सार्थक और पूर्वानुमेय बाजार पहुंच को सुगम बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

दोनों नेताओं ने सहमति व्यक्त की कि दोनों पक्षों को क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों तथा चुनौतियों के समाधान के लिए साझे आधार का लगातार विस्तार करते रहना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के लिए चीन के समर्थन और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन-2026 की सफलता में उसके योगदान की सराहना की।

18th BRICS Summit Session: Inclusive Global Governance and Strengthening के दौरान प्रधानमंत्री के Opening Remarks

Posted Date:- Sep 12, 2026

Your Highness,
Excellencies,
नमस्कार!

भारत में आप सभी का स्वागत और अभिनंदन करते हुए मुझे अत्यंत खुशी हो रही है।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता people-centric और humanity first approach पर आधारित है। Resilience, Innovation, Cooperation और Sustainability हमारी प्राथमिकताएं रही हैं। इन प्राथमिकताओं के साथ, हमने BRICS सहयोग को सामान्य जन से जोड़ने पर विशेष बल दिया है।

इसी सोच के साथ साढ़े तीन सौ से अधिक बैठकों का आयोजन किया गया। लगभग तीस शहरों में आपकी टीम्स का स्वागत करने का हमें अवसर मिला। भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता को सफल बनाने में सक्रिय योगदान और समर्थन के लिए मैं आप सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।

Friends,

इस वर्ष की ब्रिक्स Summit एक ऐतिहासिक पड़ाव है। हम ब्रिक्स की बीसवीं वर्षगांठ मना रहे हैं। मानव जीवन में बीस वर्ष की आयु, maturity और responsibility के नए चरण का आरंभ होती है। यह वह अवस्था होती है, जब सपनों के साथ जिम्मेदारियाँ जुड़ती हैं, सामर्थ्य को नई दिशा मिलती है।

आज ब्रिक्स भी अपने ‘coming of age’ के क्षण में है। पिछले बीस वर्षों में ब्रिक्स ने वैश्विक मंच पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। हम एक-दूसरे के दृष्टिकोण का सम्मान करते हैं और consensus से आगे बढ़ते हैं। हम किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने की सोच के साथ आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।

अब समय है, कि हम ब्रिक्स में हमारी एकता और सहमति को वैश्विक मंच पर ठोस परिणामों में बदलें। अगले बीस वर्षों के लिए हमें एक नए और ambitious agenda पर काम करना होगा। इसकी शुरुआत हमें अपने खुद के वर्किंग सिस्टम से करनी होगी।

ब्रिक्स की अध्यक्षता हर वर्ष बदलती है, किन्तु इसकी वजह से हमारा institutional momentum नहीं रुकना चाहिए। मैं BRICS Continuity and Implementation Mechanism का प्रस्ताव रखता हूँ। इसके तहत Troika के माध्यम से सभी initiatives और outcomes का follow up हो सकेगा।

हम एक secure digital repository बना सकते हैं। इसमें हर निर्णय के साथ nodal point, समय-सीमा और implementation status दर्ज किया जा सकता है।

Friends,

ब्रिक्स को मजबूत करते हुए, हमें global reform की दिशा भी तय करनी होगी। Global Governance का वर्तमान structure, एक pyramid जैसा दिखाई देता है। इसके ऊपरी भाग में power और decision making केंद्रित हैं, और निचले भाग में वे देश हैं जो इन decisions से प्रभावित तो होते हैं, लेकिन उन्हें आकार नहीं दे पाते।

Global South आज वैश्विक संकटों की front row में है, लेकिन decision-making की back row में। हमें इस “pyramid of privilege” को “platform of partnership” में बदलना है, जहां हर देश की आवाज़ हो, हर सदस्य का stake हो और हर प्रयास के केंद्र में मानवता का विकास हो।

इस उद्देश्य से मैं प्रस्ताव रखता हूँ कि हम मिलकर global governance reform के दस proposals तैयार करें, जिसे हम अगली Summit तक एक BRICS Reform Roadmap का रूप देने का प्रयास कर सकते हैं।

इस roadmap को बनाने में हमें तीन मुख्य पहलुओं- Representation, Responsiveness and Rule-making का ध्यान रखना होगा।

पहला, Representation के संबंध में मैं कहना चाहूंगा, UN Security Council में reform अब और टाला नहीं जा सकता। इस विषय पर text-based negotiations को निश्चित समय-सीमा और स्पष्ट परिणाम से जोड़ना होगा।

उसी तरह, financial institutions में voting power, leadership positions और policy priorities आज की इकोनॉमिक रियेलिटीज़ के अनुसार होनी चाहिए। जो देश global economic growth को गति देते हैं, उन्हें global economic governance को दिशा देने में भी उचित भूमिका मिलनी चाहिए।

दूसरा, Responsiveness। वैश्विक संस्थानों में मानवता का विश्वास तभी बनेगा जब वे समस्याओं का प्रभावी समाधान करने में सक्षम होंगे। हमें collective response के speed, scale और last mile impact पर ध्यान देना होगा।

Seafarers का वैश्विक व्यापार में बहुत बड़ा योगदान है, किन्तु अक्सर मुश्किल समय में उन्हें सहारे की कमी महसूस होती है। मेरा प्रस्ताव है कि क्या हम Seafarers Emergency Support Network बना सकते हैं? इसके माध्यम से संबंधित देशों की Maritime authorities और missions को जोड़ा जाएगा। इससे distress alerts, medical assistance, परिवारों को सूचना तथा evacuation में सहयोग दिया जा सकता है।

और तीसरी मैं कहना चाहता हूँ Rule Making के संबंध में। भविष्य के global rules तय करने में समान भागीदारी सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

AI, cyberspace, outer space, biotechnology और critical technologies, भविष्य के अवसरों के साथ भविष्य के नियम भी तय कर रहे हैं।

हमें ग्लोबल साउथ को rule-taker से rule-shaper बनाने के लिए प्रयास करने होंगे। ब्रिक्स के माध्यम से हम ग्लोबल साउथ के देशों के युवा diplomats और policymakers को negotiations skills, practical training और legal expertise प्रदान कर सकते हैं।

सुखद संयोग से आज United Nations Day for South-South Cooperation है। Global South को समर्पित इस दिन पर ऐसा निर्णय लिया जाना विशेष महत्व रखता है। भारत इस विषय में lead लेने के लिए तैयार है।

Friends,

भारत में आयोजित इस ब्रिक्स समिट का संदेश स्पष्ट होना चाहिए: यदि हमारा भविष्य साझा है, तो उसके निर्माण का अधिकार भी साझा होना चाहिए।

From voice to impact. From privilege to partnership.

यही ब्रिक्स at 20 का संकल्प हो।

बहुत-बहुत धन्यवाद।

हिंदी और एक राजभाषा का प्रश्न

Rajrishi Purushottam Das Tandon

लेख प्रकाशित 13.09.2026, रविवार

सर्वेश कुमार सिंह

भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रवाह हिन्दी में गतिमान है। हिंदी ही भारत की राष्ट्रीय पहचान है। किंतु इसे अभी तक भारत में एकमेव राजभाषा का गौरव नहीं मिल सका है। राजनीतिक तिकड़म और अंग्रेजी प्रेमी नेताओं ने हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी को भी सहायक राजभाषा का दर्जा दिया हुआ है। इसे समाप्त किए जाने की आवश्यकता है तभी हिंदी भारत की अकेली राजभाषा बन सकेगी। वर्ष 1963 का संसद द्वारा पारित विधेयक इस राह का सबसे बड़ा रोड़ा है।

हम हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते हैं। क्योंकि इसी दिन 1949 में संविधान सभा ने लंबी बहस के बाद अनुच्छेद 343 (1) के तहत हिंदी को भारत की राजभाषा स्वीकार किया था। इसमें लिखा गया कि देवनागरी में लिखी गई हिंदी भारत की राजभाषा होगी। इसी उपलक्ष्य में 1953 में पहली बार वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया। तभी से हम हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते हैं।

स्वतंत्र भारत में हिंदी को न्याय और यथोचित स्थान देने की कोशिश हुई, किंतु अंग्रेजी प्रेमी नेतृत्व का विदेशी भाषा से मोह नहीं टूटा। उन्होंने 1950 में ये निर्णय ले लिया कि आगामी 15 वर्ष तक हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी भी सहायक राजभाषा रहेगी। ये 15 वर्ष अंतहीन हो गए हैं और आज तक समाप्त नहीं हुए हैं। परिणाम ये हुआ कि हिंदी की समानांतर राज भाषा बनकर अंग्रेजी ने भारत की राजव्यवस्था से लेकर समस्त शिक्षा व्यवस्था को अपने चंगुल में जकड़ लिया। जब अंग्रेजी के लिए निर्धारित समय सीमा निकट आई तो एक बार फिर हिंदी के साथ छल हुआ। वर्ष 1963 में संसद में विधेयक पारित किया गया कि हिंदी के साथ तब तक अंग्रेजी भी राजभाषा बनी रहेगी जब तक दक्षिण भारत के राज्य हिंदी को राजभाषा मानने पर सहमत ना हो जाएं। ये विधेयक ऐसा बैरियर है जो हिंदी को उसके यथोचित सम्मान की दिशा में प्रगति को बाधित करता है।

उत्तर भारत खासकर उत्तर प्रदेश में हिंदी को राजभाषा से आगे राष्ट्र भाषा का गौरव दिलाने का प्रश्न स्वाभिमान से जुड़ा रहा है। इसी कड़ी में 1910 में राजऋषि पुरुषोत्तम दास टंडन ने हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की। इसमें अनेक हिंदी प्रेमियों ने हिंदी की शाश्वत ज्वाला को प्रज्ज्वलित किया हुआ है। हिंदी को राजभाषा का आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए भी राजऋषि पुरुषोत्तम दास टंडन ने संविधान सभा में लंबी और निर्णायक पैरवी की। प्रखर समाजवादी नेता और चिंतक डॉ राममनोहर लोहिया ने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चलाया। डा लोहिया का कहना था कि लोकभाषा के बगैर लोकराज असंभव है। पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1900 में संयुक्त प्रांत में हिंदी को शासकीय और न्यायालय की भाषा का दर्जा दिलाया। इन प्रयासों से आज हिंदी गौरवान्वित है।

देवनागरी के शासकीय प्रयोग की शताब्दी पर लखनऊ के रवींद्रालय में 18 अप्रैल 2000 को आयोजित समारोह में हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल पंडित विष्णुकांत शास्त्री ने कहा था कि आज अखिल भारतीय स्तर पर अंग्रेजी जीत रही है। भारतीय बाधाएं पिछड़ रही हैं। अंग्रेजी प्रतिष्ठा की प्रतीक बन गई है। उन्होंने कहा कि कोई भी स्वाभिमानी देश अपने देश के बच्चों को विदेशी भाषा में शिक्षा नहीं देता। उन्होंने सुझाव दिया कि हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति बनाई जानी चाहिए और हिंदी का प्रयोग नहीं करने पर दंड की व्यवस्था होनी चाहिए।

हिंदी के विकास को कैसे अवरुद्ध किया गया इस पर प्रख्यात साहित्यकार डॉ विद्यानिवास मिश्र ने एक लेख में अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने रायबरेली में 30 सितंबर से 1 अक्टूबर 2000 तक आयोजित उप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन के अवसर पर एक लेख प्रेषित किया, जिसे आयोजकों ने पत्रक के रूप में प्रकाशित कर वितरित किया। इसमें डॉ मिश्रा ने कहा कि अंग्रेजी को 15 वर्ष से आगे बनाए रखने के लिए हिंदी शब्दावली आयोग बना दिए गए। कहा गया हिंदी को तो अभी बनना है। ये आयोग हिंदी के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए नहीं बने, बल्कि मार्ग के रोड़े बने। ये बहाने बने की हिंदी का निर्माण करना है। तत्कालीन एक मंत्री ने कहा था कि हिंदी तो वन की शकुंतला है, इसे राज दरबार में आना है तो इसे राज दरबार के अनुरूप आना होगा।

आज लगभग 77 साल बाद भी राजभाषा का प्रश्न ज्यों का त्यों है। इसे न तो संसद और न ही राजनीतिक दल तय कर सके हैं। हां समाज और समय ने इसे न्याय देने का प्रयास किया है। समाज ने हिंदी को अपने अंतर्मन में स्थान दिया है, इसे अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाए रखा है। समय ने भी न्याय किया है। कंप्यूटर युग और इसमें भारतीय भाषा टूल यूनिकोड आदि मील के पत्थर साबित हुए हैं। इस प्रयास में भारत सरकार का योगदान रहा और हिन्दी कंप्यूटर की सुगम भाषा बनकर उभरी है।

वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व से अपेक्षा है कि हिंदी को एकमेव राजभाषा का संविधानिक दर्जा प्रदान करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दें।

लेखक परिचय : सर्वेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार लखनऊ

September 11, 2026

भलुअनी में खूनी वारदात, युवक की चाकू से गोदकर हत्या, घर में मचा कोहराम

देवरिया कार्यालय

देवरिया/भलुअनी। थाना क्षेत्र के कस्बे में देर रात विवाद के बाद चाकू से हमला कर 23 वर्षीय युवक मनीष सिंह उर्फ मोनू सिंह की हत्या कर दी गई। चाकू के कई वार से गंभीर रूप से घायल मनीष को परिजन आनन-फानन में अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। युवक की मौत की खबर मिलते ही परिवार में कोहराम मच गया। वहीं, घटना के बाद गांव में आक्रोश और तनाव का माहौल बन गया। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। मामले में कुछ युवकों को हिरासत में लेकर पूछताछ किए जाने की बात सामने आई है।
मिली जानकारी के अनुसार भलुअनी थाना क्षेत्र निवासी मनीष सिंह उर्फ मोनू सिंह (23) पुत्र प्रेम सिंह का गांव के ही कुछ युवकों से विवाद हो गया था। बताया जा रहा है कि विवाद के बाद रात करीब नौ बजे कुछ युवकों ने मनीष पर चाकू से हमला कर दिया। हमले में वह गंभीर रूप से घायल होकर मौके पर गिर पड़ा। वारदात के बाद हमलावर मौके से फरार हो गए।
घटना की जानकारी मिलते ही परिजन मौके पर पहुंचे और घायल मनीष को इलाज के लिए अस्पताल ले गए। अस्पताल में चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मौत की सूचना मिलते ही परिवार में चीख-पुकार मच गई। देखते ही देखते गांव में मातम के साथ आक्रोश का माहौल बन गया।
इधर, वारदात की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और घटनास्थल की छानबीन शुरू की। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक अभिजीत आर. शंकर, अपर पुलिस अधीक्षक सुनील सिंह और सीओ बरहज रंजना सचान भी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने घटनास्थल का जायजा लेकर पुलिसकर्मियों से घटना की जानकारी ली और मामले में आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।
बताया जा रहा है कि पुलिस ने पूछताछ के लिए कुछ युवकों को हिरासत में लिया है। पुलिस घटना के पीछे के विवाद, हमले में शामिल लोगों और हत्या के कारणों की पड़ताल कर रही है। फिलहाल पुलिस की जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही घटना की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

भारतीय ज्ञान पंरपराः स्वामी विवेकानन्द और डा मोहन भागवत की समदृष्टि

Swami Vivekanand

लेख पोस्टेड दिनांक 11.09.2026

सर्वेश कुमार सिंह

आज 11 सितम्बर है, शिकागो में  स्वामी विवेकानन्द द्वारा विश्व धर्म सम्मेलन में 1893 को दिये गए ऐतिहासिक भाषण की 133 वीं जयंती। यह भाषण आज भी केवल शिकागो नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व पटल पर भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रतीक स्वर के रूप मे गूंज रहा है। इस भाषण ने विश्व को यह बताया था कि भारत की मूल सोच क्या है, भारत में बन्धुत्व और अपनेपन के तत्व क्या हैं और उनका भारतीय ज्ञान परंपरा में स्रोत क्या है। इस भाषण के ठीक 133 साल बाद एक और संत प्रकृति के भारतीय चिंतक, हिन्दू समाज को सर्वस्व अर्पित कर चुके डा मोहन भागवत ने उक्त पंक्तियों को न्यूयार्क में 29 अगस्त 2026 को दोहराया है। डा भागवत ने भारत के एकत्व (Oneness) दर्शन को 6000 अमेरिकी नागरिकों के सम्मुख प्रस्तुत किया। दोनों के भाषणों में तीन समानताएं हैं, दोनों अमेरिका की धरती पर हुए, दोनों में श्रोताओं की संख्या लगभग समान थी। शिकागो धर्म सम्मेलन में 7000 लोग उपस्थित थे, जबकि न्यूयार्क के सम्मेलन में उपस्थिति 6000 थी। तीसरी समानता यह है कि स्वामी जी के सम्मुख विश्व के सभी धर्मों के प्रमुख वक्ता, दार्शनिक उपस्थित थे, डा मोहन भागवत के सम्मुख विश्व के 30 देशों के 180 धार्मिक नेता उपस्थित थे। संदेश समान-किसी से भेदभाव नहीं, सभी में अपनत्व का दर्शन।

स्वामी जी जिस समय अमेरिका गए थे। उस दौर में भारतीय दर्शन और चिंतन के प्रति विश्व स्तर पर उतनी जागरूकता नहीं थी जितनी आज है। वह युग संचार क्रांति का भी नहीं था। लेकिन, स्वामी जी ने उस समय वह संदेश दे दिया, जिसमें भारत का मूल तत्व समाया हुआ है। स्वामी जी ने अपने भाषण की शुरुआत में ही कहा- मैं आपको भारत की प्रचीन संत परंपरा की ओर से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी (सनातन धर्म) की ओर से धन्यवाद देता हूं। उन्होंने कहा कि मुझे एक ऐसे धर्म से होने पर गर्व है जिसने दुनिया को सहिष्णुता (Tolerance) और सार्वभौमिक स्वीकार्यता (Universal Acceptance) दोनों का पाठ पढाया है। हम केवल सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं करते, बल्कि हम दुनिया के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग के लिए वैविध्य में एकत्व का दर्शन प्रस्तुत किया। गीता का श्लोक और श्रुति के ज्ञान का उल्लेख किया।

DR MOHAN BHAGWAT SRSANGHCHALAK RSS

एकत्व यानि के वननैस का यहीं संदेश लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत न्यूयार्क पहुंचे। उनके भाषण में वही तत्व समाहित हैं जोकि स्वामी विवेकानन्द के भाषण में हैं। न्यूयार्क के मैडिसन स्क्ववायर गार्डन में 29 अगस्त 2026 को अमेरिकन हिन्दूज फार एंगेजमेंट एंड  डायलाग (एहेड फोरम) द्वारा आयोजित यूनिवर्सल वननैस सेलिब्रेशन में डा. मोहन भागवत ने जब संबोधन किया तो लगा एक बार फिर स्वामी विवेकानन्द का प्रकटीकरण हुआ है। उन्होंने उन्हीं शब्दों को दोहराया और वही भाव व्यक्त किया जो स्वामी जी ने 133 साल पहले किया था। डा मोहन भागवत ने कहा कि एक शब्द की प्रायः चर्चा होती है बहुलवाद (Pluralism) वहीं जब हम भारत की बात करते हैं तो एक दूसरा शब्द या वाक्यांश सामने आता है – यूनिटी इन डायवर्सिटी (विविधता में एकता) । उन्होंने कहा कि भारत के लिए एकता और विविधता, दोनों उसके डीएनए में हैं।

भारतीय दृष्टि की चर्चा करते हुए डा भागवत ने कहा कि हर राष्ट्र की एक नियति होती है, जिसे उसे पूरा करना होता है। भारत को जो नियति मिली है, वह है विविधता में एकता के सत्य को साकार करना और समय समय पर पूरी दुनिया को भी इस एकत्व का बोध कराना। उन्होंने आगे कहा कि हम एक हैं और विविधता के कारण हमारी वह एकता और भी सुसज्जित होती है। इसलिए विविधता का उत्सव मनाया जाना चाहिए, उसका सम्मान किया जाना चाहिए और उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। डा भागवत ने कहा कि वह सिद्धांत जो सबको जोडता है, सबको आत्मसात करता है, किसी  प्रकार का विभाजन उत्पन्न नहीं करता , सभी के बीच संतुलन बनाये रखता है और मध्यमार्ग दिखाता है, वही धर्म है।

आज स्वामी विवेकानन्द के शिकागो भाषण की जयंती अवसर पर जहां हमें उस भाषण को पढ़ने, चिंतन और मनने करके आत्मसात करने की आवश्यकता है, वहीं डा मोहन भागवत के न्यूयार्क भाषण को भी पूरा पढने, चिंतन और मनन करने के बाद हिन्दुत्व की मूल भावना और सर्वग्राह्यता के संदेश को समझना आवश्यक है। कुछ लोग डा मोहन भागवत के न्यूयार्क भाषण को पढे बगैर, उसके मूल तत्व को समझे बगैर चर्चा, परिचर्चा और विमर्श कर रहे हैं। उन्हें पहले इसे पूरा पढ़ना चाहिए। इसके बाद सभी तरह के भ्रम समाप्त हो जाएंगे।

लेखक परिचयः स्वतंत्र पत्रकार, राज्य मुख्यालय लखनऊ।

 

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