
✍️ प्रणय विक्रम सिंह
इतिहास का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह युद्धभूमि में दिखाई देने वाले दृश्य को ही अंतिम सत्य मान लेता है। किंतु भारत की सभ्यता ने कभी केवल दृश्य को सत्य नहीं माना। उसने परिणाम से पहले उद्देश्य को देखा, विजय से पहले धर्म को देखा और पराक्रम से पहले बुद्धि को स्थान दिया।
यही कारण है कि इस भूमि ने उस पुरुष को भी भगवान कहा, जिसे उसके विरोधियों ने कभी ‘रणछोड़’ कहकर उपहास का विषय बनाया था।
कितना विचित्र है कि जिन श्री कृष्ण को गीता के उपदेशक, धर्म के संस्थापक, महाभारत के सूत्रधार और अधर्म के अंत का नायक माना जाता है, उन्हीं कृष्ण के नाम के साथ ‘रणछोड़’ शब्द भी जुड़ा। यदि केवल तत्कालीन जनमत से इतिहास लिखा जाता, तो शायद लोग यही कहते कि कृष्ण युद्धभूमि छोड़कर भाग गए। जरासंध स्वयं भी शायद यही समझ बैठा होगा कि उसने अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी को पराजित कर दिया है। लेकिन इतिहास कभी तत्कालीन शोर से नहीं लिखा जाता। इतिहास समय की अग्नि में तपकर अपना निर्णय देता है।
भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि प्रत्येक युद्ध रणभूमि में खड़े होकर नहीं जीता जाता। कभी-कभी एक कदम पीछे हटना ही अंतिम विजय की भूमिका बनता है। मथुरा से द्वारका का प्रस्थान ‘पलायन’ नहीं था, वह राष्ट्र, समाज और भविष्य की रक्षा के लिए लिया गया दूरदर्शी निर्णय था। उस समय जरासंध ने स्वयं को विजेता समझा होगा, पर इतिहास ने विजेता किसे माना? इतिहास ने रणछोड़दास को भगवान कहा, जरासंध को नहीं।
जरासंध की सबसे बड़ी भूल यह नहीं थी कि वह कृष्ण से लड़ता रहा। उसकी सबसे बड़ी भूल यह थी कि उसने हर बार पीछे हटते कृष्ण को पराजित समझ लिया। उसे दिखाई नहीं दिया कि कृष्ण युद्ध नहीं, समय चुन रहे हैं। यही कारण है कि उस दिन की जय-पराजय समय के साथ उलट गई। जरासंध अपने युग का विजेता कहलाया, लेकिन इतिहास का नायक नहीं बन सका। कृष्ण उस क्षण ‘रणछोड़’ कहे गए, किंतु काल ने उन्हें योगेश्वर के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया।
भारत का दर्शन हमें सिखाता है कि पीछे हटना और हार जाना समानार्थी शब्द नहीं हैं। जो व्यक्ति अपने अहंकार की रक्षा के लिए समाज को संकट में डाल दे, वह विजेता होकर भी पराजित है। और जो व्यक्ति अपने सम्मान का त्याग करके समाज की रक्षा कर ले, वह तत्कालीन आलोचना झेलकर भी इतिहास में विजेता बनता है। इसी कारण इस देश ने श्री राम को वनवासी होकर भी मर्यादा पुरुषोत्तम कहा, श्री कृष्ण को रणछोड़ होकर भी भगवान कहा और छत्रपति शिवाजी महाराज की आगरा से रणनीतिक वापसी को कायरता नहीं, राष्ट्रनीति माना।
राजनीति में भी यही कसौटी लागू होती है। नेतृत्व का अर्थ केवल संघर्ष करना नहीं है। नेतृत्व का अर्थ यह भी है कि किस संघर्ष को कहां समाप्त करना है, किस विवाद को कितना बढ़ने देना है और किस क्षण स्वयं को पीछे करके राष्ट्रहित को आगे रखना है। जो राजनेता केवल इसलिए अड़ा रहे कि कहीं उसे झुकना न पड़ जाए, वह नेतृत्व नहीं कर रहा होता, वह अपने अहंकार की रक्षा कर रहा होता है। सच्चा नेतृत्व वह है, जो जानता है कि कब तलवार उठानी है और कब म्यान में रख देनी है।
आज जब हम केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को देखते हैं, तो उसे केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इस निर्णय के पीछे जो भी राजनीतिक परिस्थितियां रही हों, एक तथ्य स्पष्ट है कि उन्होंने पद को राष्ट्र से बड़ा नहीं माना। उन्होंने स्वयं को विवाद का केंद्र बनाए रखने के बजाय पद छोड़कर व्यवस्था को आगे बढ़ने का अवसर दिया। लोकतंत्र में इससे असहमति हो सकती है, लोग इसे अलग-अलग दृष्टि से देख सकते हैं, किंतु यह प्रश्न अवश्य पूछा जाएगा कि यदि कोई नेता अपने पद से चिपका नहीं रहता, बल्कि परिस्थितियों को सामान्य बनाने के लिए पीछे हटता है, तो क्या उसे पराजित कह देना न्याय होगा?
केंद्रीय शिक्षा मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान ने केवल एक मंत्रालय नहीं संभाला। नई शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकालने, मातृभाषा को सम्मान दिलाने, भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः स्थापित करने और इतिहास के अनेक उपेक्षित अध्यायों को शिक्षा के मुख्य विमर्श में लाने का प्रयास किया। दशकों तक जिस शिक्षा व्यवस्था पर वैचारिक एकरूपता का आरोप लगता रहा, उसमें विविध भारतीय दृष्टियों के लिए स्थान बनाने का प्रयास हुआ। इस दिशा में स्वाभाविक रूप से मतभेद भी हुए और समर्थन भी मिला।
शिक्षा पर बहस होनी चाहिए। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान भी होना चाहिए। विद्यार्थी यदि अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं तो वह लोकतांत्रिक अधिकार है। परीक्षा व्यवस्था में यदि कमियां हैं तो उनका कठोर सुधार भी होना चाहिए। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि छात्रों के वास्तविक प्रश्न किसी व्यापक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का साधन न बन जाएं। किसी भी लोकतंत्र में यह चिंता स्वाभाविक है कि युवाओं के असंतोष का उपयोग ‘वे’ लोग न करने लगें जिन्हें जनता ने चुनावों में स्वीकार नहीं किया, अथवा वे समूह जो किसी भी असंतोष को राजनीतिक अस्थिरता में बदलना चाहते हैं।
आज आवश्यकता उन प्रवृत्तियों को पहचानने की है जो छात्र आंदोलनों की ऊर्जा को अपने वैचारिक या राजनीतिक उद्देश्यों की दिशा में मोड़ने का प्रयास करती हैं। छात्र राष्ट्र की आशा हैं, उन्हें किसी भी प्रकार के राजनीतिक प्रयोग की प्रयोगशाला नहीं बनने देना चाहिए।
भारत का अनुभव यह भी बताता है कि हर जनभावना के साथ कुछ ऐसी राजनीतिक प्रवृत्तियां भी जुड़ जाती हैं, जो उस भावना को समाधान तक नहीं, टकराव तक ले जाना चाहती हैं। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां वास्तविक पीड़ा किसी और की थी और उसका राजनीतिक लाभ किसी तीसरे ने उठाया।
इतिहास गवाह है कि क्षणिक विजय के उत्सव अक्सर समय की धूल में खो जाते हैं, जबकि त्याग और धैर्य से लिए गए निर्णय पीढ़ियों तक स्मरण किए जाते हैं। जो लोग आज इस इस्तीफे को अंतिम विजय मान रहे हैं, उन्हें भी इतिहास के निर्णय की प्रतीक्षा करनी होगी। और जो लोग इसे अंतिम पराजय मानकर निराश हैं, उन्हें भी स्मरण रखना चाहिए कि भारत का इतिहास क्षणिक नारों से नहीं, दीर्घकालिक परिणामों से लिखा जाता है। जरासंध ने अपने समय में विजय का उद्घोष किया था। श्री कृष्ण ने नहीं। इतिहास ने दोनों का निर्णय स्वयं कर दिया।
मान-अपमान, जय-पराजय, पद-प्रतिष्ठा, ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। किंतु जो व्यक्ति राष्ट्र को स्वयं से बड़ा मानता है, वह इतिहास में कभी ‘छोटा’ नहीं होता। जरासंध को खुश होने दीजिए, विजय तो गुजरात वाले ‘रणछोड़दास’ को ही मिलेगी।