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पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी के निधन पर शोक सभा

July 26, 2026

पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी के निधन पर शोक सभा

Posted on 26.07.2026 Time 08.24 PM

लखनऊ, 26 जुलाई 2026 (उप्र समाचार सेवा)। पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा की धर्मपत्नी चिन्नमा देवेगौड़ा के निधन पर शोक सभा आयोजित की गई। जनता दल (एस) कार्यालय पर आयोजित शोक सभा में प्रदेश पदाधिकारियों और गणमान्य लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।

शोक सभा में स्व चिन्नम्मा देवेगौड़ा के सामाजिक कार्यों और सेवा के लिए समर्पण का स्मरण किया गया। जनता दल (एस) के प्रदेश अध्यक्ष ओंकार सिंह ने कहा कि स्व चिन्नमा देवेगौड़ा के निधन से समाज की अपूरणीय क्षति हुई है। उन्होंने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा ईश्वर स्व चिनम्मा देवेगौड़ा की आत्मा को सद्गति प्रदान करे और परिवार को इस दुख को सहने की शक्ति प्रदान करे।

स्व चिनम्मा देवेगौड़ा को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए कई प्रांतों से पार्टी कार्यकर्ता और पदाधिकारी एकत्रित हुए। शोक सभा में प्रदेश सचिव रविंद्र कुमार, बरेली से अल्पसंख्यक मोर्चा के इफ्तखारुद्दीन, राजेश सिंह, धर्मेंद्र रस्तोगी, अमरीश शुक्ल, राजेश सिंह आदि उपस्थित थे।

जरासंध’ की खुशी तात्कालिक है…

Dharmendra Pradhan Ex Education Minister

✍️ प्रणय विक्रम सिंह

इतिहास का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह युद्धभूमि में दिखाई देने वाले दृश्य को ही अंतिम सत्य मान लेता है। किंतु भारत की सभ्यता ने कभी केवल दृश्य को सत्य नहीं माना। उसने परिणाम से पहले उद्देश्य को देखा, विजय से पहले धर्म को देखा और पराक्रम से पहले बुद्धि को स्थान दिया।

यही कारण है कि इस भूमि ने उस पुरुष को भी भगवान कहा, जिसे उसके विरोधियों ने कभी ‘रणछोड़’ कहकर उपहास का विषय बनाया था।

कितना विचित्र है कि जिन श्री कृष्ण को गीता के उपदेशक, धर्म के संस्थापक, महाभारत के सूत्रधार और अधर्म के अंत का नायक माना जाता है, उन्हीं कृष्ण के नाम के साथ ‘रणछोड़’ शब्द भी जुड़ा। यदि केवल तत्कालीन जनमत से इतिहास लिखा जाता, तो शायद लोग यही कहते कि कृष्ण युद्धभूमि छोड़कर भाग गए। जरासंध स्वयं भी शायद यही समझ बैठा होगा कि उसने अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी को पराजित कर दिया है। लेकिन इतिहास कभी तत्कालीन शोर से नहीं लिखा जाता। इतिहास समय की अग्नि में तपकर अपना निर्णय देता है।

भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि प्रत्येक युद्ध रणभूमि में खड़े होकर नहीं जीता जाता। कभी-कभी एक कदम पीछे हटना ही अंतिम विजय की भूमिका बनता है। मथुरा से द्वारका का प्रस्थान ‘पलायन’ नहीं था, वह राष्ट्र, समाज और भविष्य की रक्षा के लिए लिया गया दूरदर्शी निर्णय था। उस समय जरासंध ने स्वयं को विजेता समझा होगा, पर इतिहास ने विजेता किसे माना? इतिहास ने रणछोड़दास को भगवान कहा, जरासंध को नहीं।

जरासंध की सबसे बड़ी भूल यह नहीं थी कि वह कृष्ण से लड़ता रहा। उसकी सबसे बड़ी भूल यह थी कि उसने हर बार पीछे हटते कृष्ण को पराजित समझ लिया। उसे दिखाई नहीं दिया कि कृष्ण युद्ध नहीं, समय चुन रहे हैं। यही कारण है कि उस दिन की जय-पराजय समय के साथ उलट गई। जरासंध अपने युग का विजेता कहलाया, लेकिन इतिहास का नायक नहीं बन सका। कृष्ण उस क्षण ‘रणछोड़’ कहे गए, किंतु काल ने उन्हें योगेश्वर के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया।

भारत का दर्शन हमें सिखाता है कि पीछे हटना और हार जाना समानार्थी शब्द नहीं हैं। जो व्यक्ति अपने अहंकार की रक्षा के लिए समाज को संकट में डाल दे, वह विजेता होकर भी पराजित है। और जो व्यक्ति अपने सम्मान का त्याग करके समाज की रक्षा कर ले, वह तत्कालीन आलोचना झेलकर भी इतिहास में विजेता बनता है। इसी कारण इस देश ने श्री राम को वनवासी होकर भी मर्यादा पुरुषोत्तम कहा, श्री कृष्ण को रणछोड़ होकर भी भगवान कहा और छत्रपति शिवाजी महाराज की आगरा से रणनीतिक वापसी को कायरता नहीं, राष्ट्रनीति माना।

राजनीति में भी यही कसौटी लागू होती है। नेतृत्व का अर्थ केवल संघर्ष करना नहीं है। नेतृत्व का अर्थ यह भी है कि किस संघर्ष को कहां समाप्त करना है, किस विवाद को कितना बढ़ने देना है और किस क्षण स्वयं को पीछे करके राष्ट्रहित को आगे रखना है। जो राजनेता केवल इसलिए अड़ा रहे कि कहीं उसे झुकना न पड़ जाए, वह नेतृत्व नहीं कर रहा होता, वह अपने अहंकार की रक्षा कर रहा होता है। सच्चा नेतृत्व वह है, जो जानता है कि कब तलवार उठानी है और कब म्यान में रख देनी है।

आज जब हम केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को देखते हैं, तो उसे केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इस निर्णय के पीछे जो भी राजनीतिक परिस्थितियां रही हों, एक तथ्य स्पष्ट है कि उन्होंने पद को राष्ट्र से बड़ा नहीं माना। उन्होंने स्वयं को विवाद का केंद्र बनाए रखने के बजाय पद छोड़कर व्यवस्था को आगे बढ़ने का अवसर दिया। लोकतंत्र में इससे असहमति हो सकती है, लोग इसे अलग-अलग दृष्टि से देख सकते हैं, किंतु यह प्रश्न अवश्य पूछा जाएगा कि यदि कोई नेता अपने पद से चिपका नहीं रहता, बल्कि परिस्थितियों को सामान्य बनाने के लिए पीछे हटता है, तो क्या उसे पराजित कह देना न्याय होगा?

केंद्रीय शिक्षा मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान ने केवल एक मंत्रालय नहीं संभाला। नई शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकालने, मातृभाषा को सम्मान दिलाने, भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः स्थापित करने और इतिहास के अनेक उपेक्षित अध्यायों को शिक्षा के मुख्य विमर्श में लाने का प्रयास किया। दशकों तक जिस शिक्षा व्यवस्था पर वैचारिक एकरूपता का आरोप लगता रहा, उसमें विविध भारतीय दृष्टियों के लिए स्थान बनाने का प्रयास हुआ। इस दिशा में स्वाभाविक रूप से मतभेद भी हुए और समर्थन भी मिला।

शिक्षा पर बहस होनी चाहिए। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान भी होना चाहिए। विद्यार्थी यदि अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं तो वह लोकतांत्रिक अधिकार है। परीक्षा व्यवस्था में यदि कमियां हैं तो उनका कठोर सुधार भी होना चाहिए। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि छात्रों के वास्तविक प्रश्न किसी व्यापक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का साधन न बन जाएं। किसी भी लोकतंत्र में यह चिंता स्वाभाविक है कि युवाओं के असंतोष का उपयोग ‘वे’ लोग न करने लगें जिन्हें जनता ने चुनावों में स्वीकार नहीं किया, अथवा वे समूह जो किसी भी असंतोष को राजनीतिक अस्थिरता में बदलना चाहते हैं।

आज आवश्यकता उन प्रवृत्तियों को पहचानने की है जो छात्र आंदोलनों की ऊर्जा को अपने वैचारिक या राजनीतिक उद्देश्यों की दिशा में मोड़ने का प्रयास करती हैं। छात्र राष्ट्र की आशा हैं, उन्हें किसी भी प्रकार के राजनीतिक प्रयोग की प्रयोगशाला नहीं बनने देना चाहिए।

भारत का अनुभव यह भी बताता है कि हर जनभावना के साथ कुछ ऐसी राजनीतिक प्रवृत्तियां भी जुड़ जाती हैं, जो उस भावना को समाधान तक नहीं, टकराव तक ले जाना चाहती हैं। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां वास्तविक पीड़ा किसी और की थी और उसका राजनीतिक लाभ किसी तीसरे ने उठाया।

इतिहास गवाह है कि क्षणिक विजय के उत्सव अक्सर समय की धूल में खो जाते हैं, जबकि त्याग और धैर्य से लिए गए निर्णय पीढ़ियों तक स्मरण किए जाते हैं। जो लोग आज इस इस्तीफे को अंतिम विजय मान रहे हैं, उन्हें भी इतिहास के निर्णय की प्रतीक्षा करनी होगी। और जो लोग इसे अंतिम पराजय मानकर निराश हैं, उन्हें भी स्मरण रखना चाहिए कि भारत का इतिहास क्षणिक नारों से नहीं, दीर्घकालिक परिणामों से लिखा जाता है। जरासंध ने अपने समय में विजय का उद्घोष किया था। श्री कृष्ण ने नहीं। इतिहास ने दोनों का निर्णय स्वयं कर दिया।

मान-अपमान, जय-पराजय, पद-प्रतिष्ठा, ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। किंतु जो व्यक्ति राष्ट्र को स्वयं से बड़ा मानता है, वह इतिहास में कभी ‘छोटा’ नहीं होता। जरासंध को खुश होने दीजिए, विजय तो गुजरात वाले ‘रणछोड़दास’ को ही मिलेगी।

जंतर-मंतर: अराजकता का अखाड़ा

प्रणय विक्रम सिंह

यह जंतर-मंतर की सड़क है। यहां हर सुबह एक नई ‘क्रांति’ की बोली लगती है, और हर शाम उसकी लाश पर वैचारिक भाषणों के कसीदे पढ़े जाते हैं। जो लोग इतिहास और समाज के सतही पन्नों को पढ़कर संतुष्ट हो जाते हैं, वे इस जमावड़े को ‘जन-आक्रोश’ कह सकते हैं। किंतु यदि आप थोड़ा ठहरकर, भीड़ के कोलाहल को चीरते हुए उसके भीतर झांकें, तो आपको यथार्थ का वह घिनौना रूप दिखेगा, जहां नीट (NEET) के मासूम परीक्षार्थियों का भविष्य केवल एक मोहरा है, और असली खिलाड़ी परदे के पीछे बैठे विदेशी व राजनीतिक आका हैं।

‘आंदोलन’ तो व्यवस्था की सड़ी-गली नसों में न्याय की खौलती धारा प्रवाहित करने वाला वो महा-मन्थन है, जो सत्ता के अहंकार को पिघलाकर जन-आकांक्षाओं की नींव रखता है। किंतु जब असंतोष की यह पवित्र आग भाड़े के उपद्रवियों के हाथ की मशाल बन जाए, तो इतिहास बदलता नहीं, केवल लोकतंत्र का चीरहरण होता है। हमें यह कड़वा सच कबूल करना होगा कि व्यवस्था का विरोध और अराजकता का नग्न तांडव कभी एक नहीं हो सकते।

विरोध तो मर्यादा की ढाल पहनकर सत्य की ढली हुई शमशीर से लड़ा जाता है, जबकि यह अराजकता तो व्यवस्था की छाती को नोच-नोचकर अपनी राजनीतिक हवस मिटाने वाला वो खूंखार भेड़िया है, जिसकी लार में मासूमों के भविष्य का लहू मिला हुआ है।

जरा इन उपद्रवियों के चेहरों को गौर से देखिए। हाथों में उछलते पत्थर, पुलिस की गाड़ियों पर बर्बरता से टूटती भीड़ और देश की सुरक्षा में तैनात वर्दी पर झपटते नापाक हाथ! क्या ये इस मुल्क का मुस्तकबिल गढ़ने वाले मेधावी छात्र हैं? क्या रातों की नींदें जलाकर जीवन-दान देने का ख़्वाब देखने वाले नौजवान अपने ही रक्षकों की हड्डियों को चटखाने पर आमादा होंगे? हरगिज नहीं! यह किसी परीक्षा का दर्द नहीं, यह तो ‘डीप स्टेट’ का बुना वो जहरीला सिंडिकेट है, जो हर जायज असंतोष को लाशों के ढेर में तब्दील करने का फन जानता है। पर्चा लीक होने से टूटे बच्चों के अवसाद की महज़ आड़ ली गई है। मक़सद साफ़ है, मासूमों के सीने पर अपनी सियासत की तोप रखना और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारत की आबरू का सौदा करना।

किंतु, इस पूरे ख़ूनी ड्रामे का सबसे नंगा, सबसे ज़लील दृश्य तब दिखा, जब सच का आइना लिए डटी एक निष्पक्ष महिला पत्रकार को उग्र भीड़ ने चारों तरफ से घेर लिया। ज़रा उस ख़ौफ़नाक लम्हे की आग को महसूस कीजिए, जब सच की तलाश में निकली एक बेटी पर भेड़ियों का झुंड टूट पड़ता है, जहां उसकी आबरू को तार-तार करने की हिंसक कोशिश होती है, जहां धक्के, अपशब्द और मॉब-लिंचिंग की सड़ांध उसकी सांसों तक पहुंचने लगती है! उस वक़्त सड़क पर केवल एक पत्रकार का उत्पीड़न नहीं हो रहा था, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ पर लात मारकर उसकी बची-कुची मर्यादा को लहूलुहान किया जा रहा था। जब सच बोलने वाली बेटी का गिरेबान खिंच रहा हो और कलम के मठाधीश ख़ामोश खड़े मुस्करा रहे हों, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र ज़िंदा नहीं, उसकी लाश का बाज़ार में सौदा हो चुका है!
उस वक़्त कहां दफ़्न हो गई थी निष्पक्षता के मसीहा बनने वाले इन मठाधीशों की आत्मा? अतीत में तमाचा खाकर जीवन भर ‘मज़लूमियत’ की भीख मांगने वाले आशुतोष हों, या रवीश, प्रसून और अजीत अंजुम जैसी पूरी जमात, सबकी बोलती पर ताले जड़े थे।

आंखों में अमानवीय शांति थी और मन में इस बात का घिनौना उल्लास कि शिकार उनके वैचारिक आकाओं के खेमे का नहीं था। जब थूककर चाटना ही पत्रकारिता का धर्म बन जाए, तो सहकर्मी की चीत्कार भी एजेंडे का संगीत लगती है। राजनीतिक आकाओं के जूठन पर पलने वाले इन नपुंसक चेहरों की रगों में अब निष्पक्षता का लहू नहीं, बल्कि चाटुकारिता का जहर दौड़ रहा है। जब कलम की स्याही सत्ता-विरोधी तुष्टीकरण और विदेशी फंडिंग के चेक से भरी जाने लगे, तो पत्रकार निर्भीक नहीं रहता, वह केवल एक वैचारिक भाड़े का टट्टू बनकर रह जाता है।
और इस पूरे अधर्म को खाद-पानी दे रही है आज की ‘रील-पीढ़ी’। इन राजनीतिक गिद्धों के लिए किसी छात्र की तबाह होती जिंदगी या किसी महिला पत्रकार की चीत्कार महज एक ‘डिजिटल अवसर’ है। मोबाइल का कैमरा ऑन हुआ तो बनावटी क्रांति का बाज़ार सज गया, और लाइव-स्ट्रीम बंद होते ही सारी वैचारिक निष्ठा कूड़ेदान में जा गिरी! इनके पास तर्कों का अकाल है, जबान पर गालियों का अमर्यादित शोर है, और न्याय की तड़प से बड़ा सोशल मीडिया का ‘एल्गोरिद्म’ हो चुका है। जो क्रांति, कैमरा ऑन होने पर शुरू और लाइव-स्ट्रीम बंद होने पर दम तोड़ दे, वह इतिहास की धारा नहीं मोड़ती… केवल डिजिटल कचरे का ढेर बनाती है!

स्याह झंडों और प्रायोजित सियासत के इस घिनौने खेल में आख़िर किसकी बलि चढ़ी? वही सच्चा छात्र! पचास हज़ार उपद्रवियों की एक घंटे की प्रायोजित हिंसा ने मुल्क की करोड़ों आंखों की स्वतःस्फूर्त सहानुभूति को एक ही झटके में जलाकर राख कर दिया। भीड़ में फेंका गया हर एक पत्थर व्यवस्था का कुछ नहीं बिगाड़ता, वह केवल किसी गरीब छात्र के घर में जलती हुई उम्मीद की मोमबत्ती को बुझा देता है। कल यह हिंसक भीड़ चली जाएगी, कुछ उग्र चेहरे नेता कहलायेंगे, कुछ डिजिटल दुनिया के सितारे बन जाएंगे और सियासी पार्टियां अपनी रोटियां सेंक कर निकल जाएंगी। लेकिन उस बदक़िस्मत छात्र का क्या? वह कल भी अपने कमरे में अधूरी किताबों और धुंधले भविष्य के साथ तन्हा बैठा था, और आज भी अनिश्चितता के अंबर तले अकेला ही अपनी किस्मत पर आंसू बहा रहा है!

रामायण के पन्ने पलटिए। रावण की दंभी सभा में जब सीता के सम्मान की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं, तब भी ज्ञानी कहलाने वाले मठाधीश चुपचाप उस अधर्म का आनंद ले रहे थे। आज का जंतर-मंतर उसी दंभी सभा का नया रूप है। लेकिन याद रखिए, गिद्धराज संपाती की तरह निष्पक्ष और दूरदर्शी सोच ही सत्य को बचाती है। रावण का अहंकार और उसकी सभा का सन्नाटा उसे महाविनाश से नहीं बचा पाया था।

फंडिंग के चेक एक दिन रीते होंगे, सियासी आकाओं का हाथ सिर से हटेगा और पत्थरों के दम पर खड़ा यह प्रायोजित तमाशा ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। सत्य का सूरज भले ही प्रायोजित बादलों में छुप जाए, लेकिन जब वह प्रकट होता है, तो झूठी क्रांतियों के सारे टिमटिमाते चिराग़ों को बेनूर कर देता है। जो आंदोलन न्याय की जगह ‘वायरल’ होने की होड़ में अपनी मर्यादा बेच देते हैं, वे कभी इतिहास का अमर पृष्ठ नहीं लिखते… वे महज इतिहास का सड़ता हुआ कचरा बनकर रह जाते हैं!

उचित निर्णय

Editorial 26.07.2026 Time 10.21 AM, Sunday, by Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र पूर्णतः उचित और समझदारी का निर्णय है। इसे दवाब में लिया गया निर्णय कहकर एक वर्ग द्वारा प्रचारित किया जा रहा है। वस्तुत: यह दवाब में लिया गया निर्णय नहीं अपितु युवाओं की वाणी और भावनाओं का सम्मान है। इस निर्णय को इस रूप में भी नहीं देखना चाहिए कि सरकार झुक गई। सरकार लोकतंत्र, लोकतांत्रिक मूल्यों और असहमति की भावना का सम्मान करती स्पष्ट दिखाई दी है।

यह बात बिल्कुल सही है कि 3 मई को हुई नीट परीक्षा का पेपर लीक के बाद जब 12 मई को इसे रद्द किया गया तो लाखों परीक्षार्थियों के सपने टूटे। वे आहत हुए, सदमे में आए, भविष्य के लिए चिंतित हुए। इसी अवसाद की स्थिति में एक दर्जन से अधिक परीक्षार्थियों ने आत्म हत्या कर ली। ये इस प्रकरण का दुखद पहलू है। इसके बाद पूरे देश की भावनाएं इस प्रकरण से जुड़ गईं। परीक्षार्थियों से सहानुभूति हो गई।

ये भावनात्मक लगाव और सहानुभूति ही कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को ऊर्जा देने वाले साबित हुए। कॉकरोच जनता पार्टी और उसके संस्थापकों ने मात्र एक माह 19 दिन में आंदोलन को सफलता के शिखर पर पहुंचा दिया। कल 25 जुलाई को इनकी सभी मांगें मान ली गईं। ये आंदोलन की उपलब्धि है। मोदी सरकार के 12 साल में ये दूसरा और सबसे कम समय चला पहला आंदोलन है जो अपनी मांगें मनवाने के बाद ही समाप्त हुआ है। पहला ऐसा आंदोलन किसानों का था। जिसमें तीन कृषि कानूनों को सरकार ने अधिसूचित करने के बाद वापस लिया था।

दोनों आंदोलनों में दो बातें समान हैं। पहली ये कि आंदोलनकारियों द्वारा बार बार पुलिस को उकसाया गया, ऐसे हालात पैदा किए गए की पुलिस संयम तोड़ दे और अधिकतम बल प्रयोग करे। याद है 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर किसान आंदोलन में घुसे पंजाब के कुछ युवाओं ने लालकिले पर राष्ट्रीय ध्वज हटा दिया था और निशान साहिब स्थापित कर दिए थे। वहां तक किसान ट्रैक्टर लेकर पहुंचे थे, पुलिस जवानों को रौंदने की कोशिश हुई थी। लेकिन दिल्ली पुलिस ने संयम दिखाया था। अन्यथा हालत ऐसे थे कि लालकिले की सुरक्षा के लिए पुलिस बल गोली भी चला सकते थे। लेकिन पुलिस ने सूझबूझ का परिचय दिया। हालांकि कुछ तत्व यही चाहते थे कि पुलिस संयम खो दे और विश्व में भारत की छवि को खराब करे तथा देश में माहौल बिगाड़ दें।

यही बात सीजेपी के आंदोलन में भी हुई। संसद मार्च के लिए 20 जुलाई,ठीक उसी दिन का चयन हुआ, जिस दिन संसद का मानसून सत्र शुरू होना था। जंतर मंतर पर धरना चल रहा था। इससे सरकार या दिल्ली पुलिस को कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन जब संसद मार्च हुआ तो इसमें गैर छात्रों और राजनीतिक विचार के युवाओं और कुछ अधेड़ उम्र के लोगों की घुसपैठ हो गई। ये हर हाल में माहौल बिगाड़ने पर आमादा थे। संसद कूच में इन लोगों ने दो बेरीकेड तोड़ दिए, तीसरे को तोड़कर संसद पहुंचना चाहते थे। जहां मानसून सत्र शुरू हुआ था। इनकी योजना संसद भवन में घुसने की थी, ताकि पुलिस नेपाल की तरह अधिकतम बल प्रयोग कर दे, यानि फायरिंग हो जाए। लेकिन पुलिस ने इन्हें जब तीसरे बैरिकेड पर रोका तो ये पुलिस से भिड़ गए। यहां पुलिस पर पथराव हुआ। पुलिस जवानों को पीटा गया, हमले किए गए। जवाब में पुलिस ने लाठी चार्ज किया। इस पूरे टकराव में 118 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। आंदोलनकारी भी घायल हुए। पुलिस ने उतना ही बल प्रयोग किया जितना सामान्य रूप से किसी भी जुलूस या मार्च को संसद जाने से रोकने के लिए किया जाता है। यहां भी पुलिस ने संयम दिखाया, अन्यथा हालात बहुत खराब हो सकते थे।

दोनों आंदोलनों में दूसरी समान बात ये है कि सरकार ने मांगे मानने के लिए उस खुफिया इनपुट को महत्व दिया, जिसमें बताया गया कि आंदोलन में बाहरी हस्तक्षेप हो गया है। बाहरी और देशविरोधी शक्तियां आंदोलन को उग्र करके अशांति पैदा करना चाहती हैं। ये तत्व चिन्हित भी किए गए, जो आंदोलन को बैक डोर से सपोर्ट कर रहे थे। दोनों आंदोलनों में मांगों से अधिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाना बनाने की भरसक कोशिश हुई।

शिक्षा मंत्री पद से त्यागपत्र देते समय धर्मेंद्र प्रधान ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया कि वे राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित होकर त्यागपत्र दे रहे हैं। आंदोलन के नाम पर कुछ लोग अशांति पैदा कर सकते है। दूसरी तरफ आंदोलन समाप्ति पर देश भर से सकारात्मक प्रतिक्रियाएं हुई हैं सभी ने त्यागपत्र और आंदोलन समाप्ति को उचित बताया है। लेकिन ये युवाओं की अच्छी छवि लेकर समाप्त नहीं हुआ। आंदोलन में अश्लील भाषा, अश्लील पोस्टर और अभद्रता, आक्रामकता, पत्रकारों पर हमले की घटनाएं हुई, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए शोभा नहीं देती हैं। इस पहलू पर कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं को विचार करना चाहिए। भविष्य की राजनीति के लिए वे ऐसे तत्वों से दूरी बना लें, तो बेहतर होगा। क्योंकि अभिजीत दीपके को अंततः राजनीति ही करनी है।

The resignation of Union Education Minister Dharmendra Pradhan is entirely appropriate and prudent. It is being propagated by a section as a decision taken under pressure. In fact, it is not a decision taken under pressure but out of respect for the voice and sentiments of the youth. This decision should also not be seen as the government bowing down. The government has been clear in respecting democracy, democratic values and the spirit of dissent.

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

 

July 25, 2026

सरकार सोमवार को लोकसभा में सार्वजनिक परीक्षाएं (अनुचित साधन रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पेश करेगी

नई दिल्ली, 25 जुलाई 2026, सरकार सोमवार को लोकसभा में सार्वजनिक परीक्षाएं (अनुचित साधन रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पेश करेगी। यह विधेयक सदन के सोमवार के कामकाज सूची में शामिल है। इस विधेयक का उद्येश्य ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधन रोकथाम) अधिनियम, 2024 में संशोधन करना है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह यह विधेयक पेश करेंगे।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के मामलों में कल फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित करने और कदाचार पर कड़ी सज़ा सुनिश्चित करने संबंधी विधेयक के मसौदे को मंज़ूरी दी थी।

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