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हिंदू हृदय सम्राट – अशोक सिंघल

September 25, 2026

हिंदू हृदय सम्राट – अशोक सिंघल

27 सितंबर (जन्म जयंती) पर विशेष-
मृत्युंजय दीक्षित
27 सितम्बर 1926 को आगरा में माँ विद्यावती तथा पिता श्री महावीर के पुत्र रूप में जन्में राष्ट्रवादी विचारधारा के वाहक, श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के माध्यम से बहुसंख्यक हिंदू समाज को स्वाभिमान से खड़ा करने वाले विश्व हिंदू परिषद के संस्थापक अशोक सिंघल नेअपना जीवन हिंदू समाज के लिए खपा दिया। अशोक जी के व्यक्तित्व व उनके ओजस्वी विचारों का ही परिणाम है कि आज हिंदू समाज में सामाजिक समरसता का भाव दिखलायी पड़ रहा है। संत समाज व विभिन्न अखाड़ा परिषदों को एक मंच पर लाने का दुष्कर कार्य अशोक जी से ही संभव हो सका। यह उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि आज देश का बहुसंख्यक समाज अपने आप को गर्व से हिंदू कहता है।
1942 में अशोक जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और स्वयं को हिन्दुत्व और भारत के एक सच्चे आराधक के रूप में विकसित किया। उन्होंने 1950 बनारस हिंदू विश्वविद्यालय इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (अब, आई आई टी) से धातुकर्म में इंजीनियरिंग पूरी की किन्तु इसके पश्चात उन्होंने इंजीनियर की नौकरी करने के स्थान पर राष्ट्र और समाज सेवा का मार्ग चुना और संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गये। प्रचारक के रूप में उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य किया और फिर दिल्ली-हरियाणा में प्रांत प्रचारक बने। संघ के तत्कालीन सर संघचालक श्री गुरुजी ने 1964 में जाने- माने संत महात्माओं के साथ मिलकर विश्व हिंदू परिषद की स्थापना की। 1966 में विश्व हिंदू परिषद में अशोक जी का पदार्पण हुआ। वे 1986 में विहिप के महामंत्री और बाद में इसके अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बने। उन्होंने 20 वर्षों तक इस पद पर रहकर संगठन का विस्तार किया। अद्भुत योजक क्षमता,संगठन कुशलता, निर्भीकता, अडिग व्यक्तित्व और सबको साथ लेकर चलने की अशोक जी की विराटता का ही परिणाम है कि आज पूरे विश्व में सबसे प्रखर हिंदू संगठन के रूप में विश्व हिंदू परिषद का नाम लिया जा रहा है।
वर्ष 1975 से 1977 तक देश में आपातकाल लगा और संघ पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया। आपातकाल के दौरान अशोक सिंघल भूमिगत हो गए तथा इसके विरोध में निरंतर और सक्रिय संघर्ष किया। 1981 में दिल्ली में एक विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ जिसके पीछे सारा सामर्थ्य और शक्ति अशोक सिंघल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की थी। इस सम्मलेन के बाद अशोक सिंघल जी ने विश्व हिन्दू परिषद के काम के काम को नई धार देने का लक्ष्य रखा। उन्होंने परिषद के काम में धर्म जागरण, सेवा, संस्कृत प्रसार, परावर्तन (घर वापसी), गोरक्षा जैसे अनेक नये और महत्वपूर्ण आयाम जोड़े। इनमें हिन्दू जागरण और एकता के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बना श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन, जिससे परिषद का काम गाँव-गाँव, घर-घर तक पहुँच गया। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ ने देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा को पूरी तरह बदल दिया।
वर्ष 1984 में अशोक जी ने श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन का श्रीगणेश किया। इसके लिए दिल्ली के विज्ञान भवन में एक धर्म संसद का आयोजन किया गया। सिंहल जी इस के मुख्य संयोजक तथा संचालक थे। यहीं पर राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की रणनीति तय की गई। यहीं से सिंघल जी ने पूरी योजना के साथ कारसेवकों को अपने साथ जोड़ना शुरू किया। प्रारंभिक चरण में ही उन्होंने देश भर से 50 हजार कारसेवक जुटा लिए। इन सभी कारसेवकों ने देश की प्रमुख नदियों के किनारों पर खड़े होकर उनका जल अंजुली में भरकर राम जन्मभूमि मुक्त करा कर वहां पर भव्य राम मंदिर की स्थापना करने की शपथ ली।
यह आन्दोलन विभिन्न चरणों को पार करते हुए 31 अक्टूबर और 2 नवम्बर 1990 तक पहुंचा जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अपने मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए अयोध्या नगरी को एक छावनी में बदल दिया और अपने राजनैतिक स्वार्थ के चलते शांतिपूर्वक राम धुन गाते हुए, पैदल चलते रामभक्तों पर गोलियां चलवा दीं और सैकड़ों की संख्या में निहत्थे रामभक्तों को मौत के घाट उतार दिया।
इस घटना से दुःख, क्षोभ, आक्रोश और पराजय की मिश्रित भावनाओं में डूब गए हिन्दू समाज और साधु- संतों को सिंघल जी ने पुनः समेटा, और 6 दिसंबर 1992 को पुनः कारसेवा का आह्वान किया। एक बड़े वर्ग को लग रहा था कि 2 नवम्बर 1990 की घटना के बाद कौन अयोध्या आएगा? किन्तु अशोक जी के प्रति हिन्दू समाज में जो विश्वास था वह एक बार पुनः हजारों हजार हिन्दुओं को कारसेवा के लिए अयोध्या ले आया और इस बार जो हुआ वो हिन्दू संस्कृति के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिख गया। कारसेवकों ने बाबरी ढ़ांचे को गिराकर श्री जन्मभूमि को मुक्त कर दिया, उसको समतल कर अस्थायी राम मंदिर का निर्माण कर दिया । बाद में माननीय सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने भी नौ नवंबर 2019 को एक स्वर से उसी स्थान को श्रीराम जन्मभूमि स्वीकार किया और समस्त हिन्दू समाज का स्वपन साकार हो गया। आज अयोध्या में गगनचुम्बी भव्य एवं दिव्य श्रीराम मंदिर गर्व से खड़ा है और उस पर धर्म ध्वज लहरा रहा रहा है।
अशोक सिंघल ने देश, समाज, हिंदू संस्कृति और संस्कार के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। उन्होने श्री रामजन्मभूमि की मुक्ति तथा उस पर श्री राम मंदिर निर्माण के लिए आंदोलनों की झड़ी लगा दी। जनसभाओं व कार्यक्रमों में अशोक जी के ओजस्वी भाषणों को सुनने के लिए भारी भीड़ जमा होती थी जब यह भीड़ घरों की ओर प्रस्थान करती थी तो उसमें एक नयापन व ताजगी की उमंग होती थी ।अशोक जी में सभी को साथ लेकर चलने की अभूतपूर्व कला थी। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण और उसके प्रति संपूर्ण हिंदू समाज को जागरुक करने में खपा दिया।
केवल भारत ही नहीं विश्व हिन्दू परिषद के उनके कार्यकाल में हुए प्रयासों का ही परिणाम है कि आज पाकिस्तान, बांग्लादेश और विश्व के अन्य देशों में होने वाली हिंदू विरोधी या भारत विरोधी घटनाएं प्रकाश में आती है। वे जहां भारत में अपनी संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करने के लिए संघर्षरत रहते थे वे वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के प्रति किये जा रहे अत्याचारों के खिलाफ भी पूरे जोर शोर से आवाज उठाते थे। जम्मू- कश्मीर के हिंदुओं की समस्या के प्रति वे निरंतर गंभीर रहते तथा उनके दुखों को दूर करने का प्रयास भी करते थे।
अशोक सिंघल अपने आंदोलनों के दौरान गंगा नदी की अविरलता के लिए व गौ हत्या के खिलाफ भी पुरजोर आवाज उठाई थी। इतना ही नहीं वे अपनी संस्थाओं के माध्यम से कन्याओं के विवाह आदि संस्कार भी संपन्न करवाते थे और 42 अनाथालयों के माध्यम से 2000 से अधिक बच्चों को आश्रय दिया जाता था जो अनवरत जारी है। सुरक्षा हेतु जन जागरण के द्वारा 10 लाख से अधिक गोवंश की सुरक्षा की गयी।
हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए सामाजिक समरसता के कार्यक्रम भी अशोक जी की प्रेरणा से चलाये गये। दलित बस्तियों में विहिप के सेवा कार्य व पर्व आदि अभी भी उन्हीं की प्रेरणा से अनवरत जारी हैं। अशोक जी के प्रयासों से ही विहिप के काम में धर्म जागरण, सेवा, संस्कृत परावर्तन आदि अनेक नये आयाम जुड़े। यह उन्हीं का प्रयास है कि आज अमेरिका, इंग्लैंड, सूरीनाम, कनाडा, नीदरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया , श्रीलंका आदि 80 देशों में विहिप का संपर्क है।देशभर में 53532 समितियां कार्यरत हैं।
स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण अशोक जी दिसंबर 2011 में विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष पद से दायित्व मुक्त हो गए थे। लंबी बीमारी के बाद 17 नवंबर 2015 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया। अशोक जी का हिंदू समाज के लिए अप्रतिम योगदान है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

प्रेषकः-मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं.- 09198571540