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लोकमत परिष्कार : दीनदयाल उपाध्याय और वर्तमान संदर्भ

September 25, 2026

लोकमत परिष्कार : दीनदयाल उपाध्याय और वर्तमान संदर्भ

दीनदयाल उपाध्याय जी जयंती 

लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकमत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी लोकतंत्र की सफलता केवल चुनाव, राजनीतिक दलों और सरकारों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि समाज का सामान्य नागरिक देश, समाज और अपने दायित्वों के प्रति कितना जागरूक है। इसी संदर्भ में ‘लोकमत परिष्कार’ की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है।

लोकमत परिष्कार का सामान्य अर्थ है—जनता के विचारों, भावनाओं और दृष्टिकोण को सत्य, विवेक, नैतिकता, राष्ट्रहित और सामाजिक उत्तरदायित्व की दिशा में विकसित करना। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में समाज, राष्ट्र और व्यक्ति के बीच गहरे संबंध को महत्व दिया गया। उनके विचारों में ऐसी सामाजिक चेतना की आवश्यकता दिखाई देती है जो राष्ट्रजीवन को स्वस्थ और रचनात्मक दिशा प्रदान करे।

लोकमत परिष्कार का अर्थ

‘लोक’ का अर्थ है जनता और ‘मत’ का अर्थ है विचार या जनधारणा। इसलिए लोकमत का अर्थ हुआ—किसी विषय के प्रति समाज की सामूहिक धारणा।

‘परिष्कार’ का अर्थ है किसी विचार या दृष्टिकोण को अधिक शुद्ध, विवेकपूर्ण और सकारात्मक बनाना। अतः लोकमत परिष्कार का अर्थ है समाज के सामूहिक विचारों और जनभावनाओं को विवेक, सत्य, नैतिकता और व्यापक सामाजिक हित की दिशा में विकसित करना।

यह केवल किसी विशेष राजनीतिक विचार के समर्थन में जनमत तैयार करना नहीं है। व्यापक अर्थ में इसका उद्देश्य नागरिकों में विवेकपूर्ण निर्णय, कर्तव्यबोध, सामाजिक संवेदनशीलता और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व विकसित करना है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय राजनीतिक चिंतन के प्रमुख विचारकों में माने जाते हैं। उन्होंने भारतीय समाज और संस्कृति को आधार बनाकर आधुनिक समस्याओं को देखने का प्रयास किया। उनका प्रमुख दार्शनिक योगदान ‘एकात्म मानववाद’ है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी लोकमत परिष्कार को महत्वपूर्ण कार्य मानते हैं और कहते हैं कि “सबसे अधिक महत्त्व है जनता को सुसंस्कृत करने का, लोकमत परिष्कार का।“

दीनदयाल उपाध्याय जी कहते हैं कि “लोकमत-परिष्कार का कार्य वही कर सकता है जो लोकेषणाओं से ऊपर उठ चुका हो। भारत ने इसका समाधान खोज निकाला। भारत ने इस समस्या का समाधान राज्य के हाथ से लोकमत निर्माण के साधन छीन कर किया है। लोकमत-परिष्कार का कार्य है वीतरागी द्वन्द्वातीत संन्यासियों का। लोकमत के अनुसार चलने का काम है राज्य का। संन्यासी सदैव धर्म के तत्त्वों के अनुसार, जनता के ऐहिक एवं आध्यात्मिक समुत्कर्ष की कामना लेकर अपने वचनों एवं निरीह आचरण से जन-जीवन के ऊपर संस्कार डालते रहते हैं। उन्हें धर्म की मर्यादाओं का ज्ञान कराते रहते हैं। कोई मोह और लोभ न होने के कारण वे सत्य का उच्चारण सहज कर सकते हैं। लोक-शिक्षा और लोक-संस्कार के वही केन्द्र हैं। शिक्षा और संस्कार से ही समाज के जीवन-मूल्य बनते और सुदृढ़ होते हैं। इन मूल्यों को बांध रखने के बाद लोकेच्छा की नदी कभी अपने तटों का अतिक्रमण कर संकट का कारण नहीं बनेगी”।

आज के सोशल मीडिया युग में इसका महत्व

दीनदयाल उपाध्याय जी अपने वर्तमान सन्दर्भों को बताते हुए कहते हैं कि  वर्तमान परिस्थिति का सबसे प्रमुख कारण राष्ट्र-जीवन की आत्मा का साक्षात्कार न करते हुए उसके ऊपर विदेशी और विजातीय विचारधाराओं एवं जीवनमूल्यों को थोपने का प्रयत्न है। शीघ्र उन्नति की आतुरता में दूसरे देशों का अंधानुकरण करने और ‘स्व’ के तिरस्कार की प्रवृत्ति पैदा हुई है। इससे राष्ट्रमानस में कुंठा घर कर गई है।

दीनदयाल जी के समय सोशल मीडिया नहीं था, लेकिन आज की परिस्थितियों में उनके विचार का एक नया संदर्भ बनता है।

आज WhatsApp, YouTube, Instagram, X आदि माध्यमों पर कोई सूचना कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुँच सकती है। ऐसे वातावरण में तीन स्थितियाँ बन सकती हैं—

सूचना → विचार → जनमत

लेकिन यदि सूचना गलत या अधूरी हो तो प्रक्रिया हो सकती है—

अधूरी सूचना → भावनात्मक प्रतिक्रिया → भ्रमित जनमत

इसलिए आज लोकमत परिष्कार का पहला आधार है:

“सूचना से पहले सत्यापन।”

नागरिकों को यह देखना चाहिए कि सूचना का स्रोत क्या है, उसके पीछे प्रमाण क्या हैं और क्या अलग-अलग विश्वसनीय स्रोत उसी तथ्य की पुष्टि करते हैं।

“भीड़ की राय” और “लोकमत” में अंतर

यहाँ दीनदयाल जी का विचार विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है।

उन्होंने लोकतंत्र के सामने mobocracy (भीड़तंत्र) और autocracy (निरंकुशता) दोनों को चुनौती के रूप में देखा। उनके विचार में लोकतंत्र को इन दोनों अतियों के बीच स्वस्थ जनमत के आधार पर चलना चाहिए।

आज इसका उदाहरण सोशल मीडिया पर देखा जा सकता है।

किसी विषय पर हजारों लोग एक ही बात लिख दें, तो इससे वह बात स्वतः सत्य नहीं हो जाती।

इसलिए—

वायरल होना ≠ सत्य होना

बहुमत की आवाज ≠ हमेशा विवेकपूर्ण लोकमत

लोकमत परिष्कार का उद्देश्य भीड़ की प्रतिक्रिया को विवेकपूर्ण जनमत में बदलना है।

दीनदयाल जी और “जनमत का सम्मान”

दीनदयाल जी के विचार में लोकतंत्र को केवल संख्यात्मक बहुमत तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है। उपलब्ध स्रोत में उनके विचार को इस रूप में दर्ज किया गया है कि लोकतांत्रिक शासन को लोकप्रिय जनमत के अनुरूप चलना चाहिए, न कि केवल तत्कालीन बहुमत या अल्पमत की गणना के आधार पर।

इसका आधुनिक अर्थ यह हो सकता है कि सरकारें केवल चुनाव के समय जनता से संवाद न करें, बल्कि लगातार—

जनता की समस्याएँ सुनें,

नागरिक समाज से संवाद करें,

आलोचना को स्थान दें,

नीतियों के प्रभाव का मूल्यांकन करें,

और आवश्यकता पड़ने पर नीतियों में सुधार करें।

एकात्म मानववाद और लोकमत परिष्कार

दीनदयाल जी का मानना है कि भारतीय संस्कृति एकात्मवादी है। सृष्टि की विभिन्न सत्ताओं तथा जीवन के विभिन्न अंगों के दृश्य-भेद स्वीकार करते हुए वह उनके अंतर में एकता की खोज कर उनमें समन्वय की स्थापना करती है। परस्पर विरोध और संघर्ष के स्थान पर वह परस्परावलंबन, पूरकता, अनुकूलता और सहयोग के आधार पर सृष्टि की क्रियाओं का विचार करती है। वह एकांगी न होकर सर्वांगीण है। उसका दृष्टिकोण सांप्रदायिक अथवा वर्गवादी न होकर सर्वात्मक एवं सर्वोत्कर्षवादी है। एकात्मकता उसकी धुरी है।

दीनदयाल उपाध्याय जी राष्ट्र की आत्मा-चिति के रूप में देखते हैं और वे कहते हैं कि समाज की चिति स्वयं को अभिव्यक्त करने तथा व्यक्तियों को विभिन्न पुरुषार्थी के संपादन की सुविधा प्राप्त कराने के लिए अनेक संस्थाओं को जन्म देती है। समाज में इनकी वही स्थिति है, जो शरीर में विभिन्न अंगों की। जाति, वर्ण, पंचायत, संप्रदाय, संघ, पूग, विवाह, संपत्ति, राज्य आदि इसी प्रकार की संस्थाएँ हैं। राज्य महत्त्वपूर्ण है, किंतु सर्वोपरि नहीं।

लोकमत परिष्कार को दीनदयाल जी के एकात्म मानववाद से भी जोड़ा जा सकता है। उनकी दृष्टि में मनुष्य केवल आर्थिक आवश्यकताओं वाला प्राणी नहीं है। मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समग्र विकास की बात उनके एकात्म मानववाद में आती है। उपलब्ध स्रोत में उनके विचार को “Complete Man” यानी समग्र मनुष्य के विकास से जोड़ा गया है।

इस दृष्टि से लोकमत भी केवल—

रोटी + रोजगार + आर्थिक हित

तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें—

नैतिकता + संस्कृति + सामाजिक उत्तरदायित्व + राष्ट्रबोध + मानवीय संवेदना

का भी समावेश होना चाहिए।

लोक शिक्षा और लोकमत परिष्कार

  • दीनदयाल जी के विचार में जनमत को शिक्षित करना महत्वपूर्ण है। इस सन्दर्भ में वे लोक शिक्षा की बात करते हैं – शालेय अध्ययन के अतिरिक्त लोक-संस्कार, स्वाध्याय, लोकमत परिष्कार भी शिक्षा के साधन हैं। इस दृष्टि से रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, संगीत तथा पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकालयों, क्लबों आदि का भरपूर उपयोग किया जा सकता है। इनकी योग्य व्यवस्था की ओर राज्य को ध्यान देना चाहिए।
  • रेडियो और टेलीविजन को सरकारी विभाग के स्थान पर एक स्वायत्त निगम के रूप में चलाना चाहिए।
  • चित्रपट लोक-शिक्षा का एक अत्यंत प्रभावी साधन है। अभिव्यक्ति के इस माध्यम का विकास करना चाहिए। किंतु शासन को यह ध्यान रखना चाहिए कि चित्रपट लोकमत-परिष्कार तथा सुरुचि पैदा करने के साधन बनने के स्थान पर लोगों की रुचि बिगाड़नेवाले न बनें।

लोकमत परिष्कार और राष्ट्रहित

दीनदयाल जी के चिंतन में व्यक्ति और राष्ट्र को अलग-अलग नहीं देखा जाता। एकात्म मानववाद में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के बीच संबंध महत्वपूर्ण है।

इसलिए लोकमत परिष्कार का अर्थ नागरिकों को किसी एक राजनीतिक विचार में ढालना नहीं, बल्कि ऐसी चेतना विकसित करना है जिसमें नागरिक यह समझ सके कि— “मेरी स्वतंत्रता के साथ मेरा सामाजिक दायित्व भी है।”

उदाहरण के लिए पर्यावरण, स्वच्छता, मतदान, सार्वजनिक संपत्ति, कर-व्यवस्था, महिला सम्मान, सामाजिक समरसता और कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता—ये सभी लोकमत परिष्कार के विषय हैं।

आज के संदर्भ में दीनदयाल जी के विचार की सबसे बड़ी प्रासंगिकता

आज जब AI-generated content, deepfakes, misinformation और तेजी से फैलने वाली अफवाहें जनमत को प्रभावित कर सकती हैं, लोकमत परिष्कार का महत्व और बढ़ जाता है।

इस संदर्भ में दीनदयाल जी के विचार को एक सूत्र में इस प्रकार समझ सकते हैं:

“जागरूक नागरिक → विवेकपूर्ण जनमत → उत्तरदायी लोकतंत्र → जनहितकारी शासन।”

और इसका उल्टा भी संभव है—

“भ्रामक सूचना → भावनात्मक प्रतिक्रिया → भ्रमित जनमत → कमजोर लोकतांत्रिक निर्णय।”

इसलिए आज लोकमत परिष्कार का आधुनिक रूप डिजिटल नागरिकता और तथ्य-जांच से भी जुड़ता है।

दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में लोकमत परिष्कार को जनता को प्रभावित करने की राजनीतिक तकनीक के रूप में समझना अधूरा होगा। उनके विचारों में इसका अधिक व्यापक अर्थ है—जनता की चेतना को शिक्षित, जागरूक और विवेकपूर्ण बनाना तथा शासन को वास्तविक जनमत के प्रति उत्तरदायी बनाना।

आज के संदर्भ में इसकी आवश्यकता इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि जनमत निर्माण के साधन पहले की तुलना में अत्यंत शक्तिशाली और तीव्र हो गए हैं।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन के संदर्भ में लोकमत परिष्कार को समाज की चेतना के विकास की प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है। इसका लक्ष्य केवल किसी राजनीतिक मत का प्रचार नहीं, बल्कि नागरिकों में विवेक, कर्तव्यबोध, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र के प्रति सकारात्मक दृष्टि विकसित करना है।

लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब जनता केवल मतदाता न रहकर जागरूक और उत्तरदायी नागरिक बने। इस दृष्टि से लोकमत परिष्कार लोकतांत्रिक समाज के स्वस्थ विकास का महत्वपूर्ण आधार है।

दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की व्यापक दृष्टि में व्यक्ति और समाज के बीच संबंध, सामाजिक समरसता, भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि और राष्ट्रजीवन की एकात्मता महत्वपूर्ण हैं। इन्हीं मूल्यों के आधार पर लोकमत को अधिक विवेकपूर्ण, सकारात्मक और रचनात्मक बनाया जा सकता है।

वस्तुतः “लोकमत परिष्कार का उद्देश्य केवल जनता की राय बदलना नहीं, बल्कि जनता की चेतना को जागरूक, विवेकपूर्ण और राष्ट्रहितोन्मुख बनाना है।

 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सम्पूर्ण वांग्मय में “लोकमत परिष्कार” का संकलन

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के संपूर्ण वाङ्मय में “लोकमत परिष्कार” की अवधारणा को लोकतंत्र की शुद्धि, मर्यादा और उसकी सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। वाङ्मय के विभिन्न खंडों में से केवल “लोकमत परिष्कार” विषय से संबंधित संदर्भों का पृष्ठवार (अंकों में) और संदर्भ के साथ संकलित विवरण नीचे दिया गया है:

1. खंड 10 (Volume 10)

इस खंड में मुख्य रूप से चुनावों की पृष्ठभूमि में मतदाताओं को जागरूक करने और राजनीतिक दलों के कर्तव्यों के रूप में ‘लोकमत परिष्कार’ की चर्चा की गई है:

  • पृष्ठ 11 (संपादकीय)

संदर्भ: वर्ष 1962 के तृतीय आम चुनावों की पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए संपादक लिखते हैं कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी चुनाव (निर्वाचन पर्व) को ‘लोकमत परिष्कार’ का सबसे उपयुक्त और सर्वोत्तम अवसर मानते थे। मतदाताओं को जागरूक करने के उद्देश्य से उन्होंने ‘ऑर्गनाइज़र’ और ‘पाञ्चजन्य’ पत्रिकाओं में ‘आपका मत’ शीर्षक से 9 लेखों की एक लंबी वैचारिक लेखमाला लिखी थी, ताकि जनता अपने मत के मूल्य को समझ सके।

  • पृष्ठ 19 (भूमिका – ‘दीनदयालजी का राजनीतिक प्रबोधन’)

संदर्भ: लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाताओं के प्रबोधन की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए यहाँ लिखा गया है कि देश का साधारण मतदाता ही वास्तविक भाग्यविधाता और देव स्वरूप है। इसी प्रसंग में दीनदयाल जी लिखते हैं कि “‘लोकमत परिष्कार’ प्रत्येक राजनीतिक दल का एक प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।” राजनीतिक दलों का वास्तविक कार्य केवल चुनाव जीतना या उम्मीदवार खड़े करना नहीं, बल्कि जनता के चिंतन और व्यावहारिक व्यवहार के स्तर को ऊपर उठाना है।

आपका मत’ लेखमाला और लोकमत परिष्कार

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी द्वारा लिखित ‘आपका मत’ लेखमाला भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में मतदाताओं के प्रबोधन, लोकमत परिष्कार और राजनीतिक चेतना के प्रसार को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैचारिक दस्तावेज है। वर्ष 1962 के तृतीय आम चुनावों के ऐतिहासिक अवसर पर मतदाताओं को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सचेत करने के उद्देश्य से उन्होंने यह विशिष्ट लेखमाला लिखी थी।

 

लेखमाला की पृष्ठभूमि

  • चुनाव और लोकमत परिष्कार: पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी चुनाव (निर्वाचन पर्व) को केवल मतों के गणित या राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं मानते थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि चुनाव का समय संपूर्ण राष्ट्र में विचारों के आदान-प्रदान, लोक-संस्कार और ‘लोकमत परिष्कार’ का सबसे उपयुक्त तथा योग्यतम अवसर होता है।
  • प्रकाशन: मतदाताओं को जागरूक करने के पावन ध्येय से दीनदयाल जी ने तत्कालीन प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ‘ऑर्गनाइज़र’ (Organiser) और ‘पाञ्चजन्य’ में ‘आपका मत’ शीर्षक से नौ लेखों की एक लंबी श्रृंखला लिखी थी।

लेखमाला के सभी 9 लेखों का विस्तृत विवरण

  1. आपका मत-1: “मताधिकार कागज़ का टुकड़ा नहीं, लोकाज्ञा है”
  • प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 29 जनवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 57)
  • संदर्भ: इस प्रथम लेख में दीनदयाल जी स्पष्ट करते हैं कि लोकतंत्र में मताधिकार कोई मामूली कागज का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह मतदाता की ओर से एक पवित्र ‘लोकाज्ञा’ (जनता का आदेश) है। वे मतदाताओं का प्रबोधन करते हुए कहते हैं कि मतदाता देश का भाग्यविधाता और देव स्वरूप है, इसलिए उसे अपने मत का प्रयोग बिना किसी प्रलोभन या दबाव के, केवल देशहित में अपने सद्विवेक और अंतरात्मा की पुकार पर करना चाहिए।
  1. आपका मत-2: “मतदाता समय की चुनौती का उत्तर देंगे?”
  • प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 5 फ़रवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 63)
  • संदर्भ: द्विसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों के समाप्त होने की पृष्ठभूमि में दीनदयाल जी मतदाताओं को सचेत करते हैं कि अब उन्हें बहुत सोच-समझकर अपने प्रतिनिधियों का चयन करना होगा। वे ‘बिजली के खंभे का युग बीत गया’ उपशीर्षक के अंतर्गत कांग्रेस के प्रति अंध-समर्थन की तीखी आलोचना करते हैं और मतदाताओं से अपील करते हैं कि वे केवल प्रत्याशियों के व्यक्तिगत गुणों को न देखें, बल्कि एक अच्छे, अनुशासित और सिद्धांतवादी दल को चुनें।
  1. आपका मत-3: “दक्षिणपंथ व वामपंथ के आधार पर दलों का विभाजन अनुचित”
  • प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 12 फ़रवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 70)
  • संदर्भ: इस लेख में वे पाश्चात्य राजनीतिक शब्दावली ‘दक्षिणपंथ’ (Right-wing) और ‘वामपंथ’ (Left-wing) के आधार पर भारतीय राजनीतिक दलों के वर्गीकरण को भ्रामक और अनुचित मानते हैं। उनका तर्क है कि भारतीय राजनीति को विदेशी ढाँचों या वैचारिक नकल के सहारे चलाने के बजाय भारत के मूल राजदर्शन और प्राचीन संस्कृति के आधार पर परिष्कृत किया जाना चाहिए।
  1. आपका मत-4: “राष्ट्र की सुरक्षा के प्रश्न को सर्वोपरि महत्त्व दिया जाए”
  • प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 22 जनवरी, 1962 [मूल रूप से ऑर्गनाइज़र में 25 दिसंबर, 1961 को प्रकाशित] (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 18)
  • संदर्भ: चीन द्वारा भारतीय सीमाओं के अतिक्रमण की गंभीर पृष्ठभूमि में लिखा गया यह लेख देश की बाह्य सुरक्षा और अखंडता पर केंद्रित है। दीनदयाल जी चेतावनी देते हैं कि जो दल या नेता देश की सीमाओं की सुरक्षा के प्रति उदासीन हैं, वे राष्ट्र का कल्याण नहीं कर सकते। वे सेना के आधुनिकीकरण और सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को चुनावी विमर्श का मुख्य मुद्दा बनाने पर बल देते हैं।
  1. आपका मत-5: “अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की संज्ञाएँ घातक हैं”
  • प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 15 जनवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 8)
  • संदर्भ: वे स्पष्ट करते हैं कि भारत ‘एक राष्ट्र और एक संस्कृति’ की भूमि है। समाज को राजनीतिक लाभ के लिए ‘अल्पसंख्यक’ और ‘बहुसंख्यक’ जैसी कृत्रिम व सांप्रदायिक संज्ञाओं में विभाजित करना राष्ट्र की एकात्मता के लिए अत्यंत घातक है। वे तत्कालीन कांग्रेस सरकार की अवसरवादी और तुष्टीकरण की नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए राष्ट्रीय एकता का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
  1. आपका मत-6: “उद्देश्य में समानता परंतु साधनों में विचलन”
  • प्रकाशन: ऑर्गनाइज़र, 15 जनवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 14)
  • संदर्भ: इस लेख में विभिन्न राजनीतिक दलों (कांग्रेस, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, स्वतंत्र पार्टी और जनसंघ) के चुनावी घोषणा-पत्रों और उनकी आर्थिक नीतियों (समाजवाद बनाम पूँजीवाद) का गहरा तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। वे भारतीय जनसंघ के विकेंद्रीकृत आर्थिक मॉडल को देश की आवश्यकताओं के अनुकूल बताते हैं।
  1. आपका मत-7: “योजनाओं के प्रति भारतीय जनसंघ का दृष्टिकोण व्यावहारिक”
  • प्रकाशन: ऑर्गनाइज़र, गणतंत्र दिवस विशेषांक, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 38)
  • संदर्भ: देश के योजनाबद्ध विकास (पंचवर्षीय योजनाओं) पर चर्चा करते हुए दीनदयाल जी लिखते हैं कि विकास और तकनीक का ढाँचा विदेशों से आयातित होने के बजाय देश की सांस्कृतिक मर्यादा और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। वे भारी उद्योगों के स्थान पर लघु व कुटीर उद्योगों और कुटीर औद्योगिकीकरण को प्राथमिकता देने की वकालत करते हैं।
  1. आपका मत-8: “दल और किसान; सरकार की ओर से कृषि और किसानों की उपेक्षा जारी”
  • प्रकाशन: ऑर्गनाइज़र, 29 जनवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 46)
  • संदर्भ: भारत की लगभग 72 प्रतिशत कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का संदर्भ देते हुए वे तत्कालीन सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र की उपेक्षा को रेखांकित करते हैं। वे भूमि सुधारों, किसानों की क्रय शक्ति बढ़ाने, सहकारी खेती (Cooperative Farming) के खतरों और किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने की मांग उठाते हैं।
  1. आपका मत-9: “हर मतदाता को निभानी है भूमिका”
  • प्रकाशन: ऑर्गनाइज़र, 12 फ़रवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 73)
  • संदर्भ: चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में मतदाताओं के अंतिम प्रबोधन के रूप में लिखा गया यह लेख बताता है कि लोकतंत्र की शुद्धि में मतदाता की भूमिका कितनी केंद्रीय है। वे मतदाताओं से अपील करते हैं कि वे विभिन्न दलों के घोषणा-पत्रों का गहराई से तुलनात्मक अध्ययन करें, निष्पक्ष रहें और सकारात्मक व रचनात्मक रूप से राष्ट्र निर्माण में अपना मत देकर ‘लोकमत परिष्कार’ के इस महापर्व को सफल बनाएं।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की यह पूरी लेखमाला इस बात का जीवंत उदाहरण है कि लोकमत परिष्कार केवल एक नारा नहीं था, बल्कि मतदाताओं को उनके कर्तव्यों, राष्ट्र की आर्थिक प्राथमिकताओं, सुरक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरूक करने का एक व्यावहारिक और बौद्धिक अभियान था।

2. खंड 11 (Volume 11)

  • पृष्ठ संख्या: 247 (अनुभाग: ‘लोकशिक्षा’)

संदर्भ:  इस पृष्ठ में ‘लोक शिक्षा’ शीर्षक के अंतर्गत यह बताया गया है कि स्कूली शिक्षा के अतिरिक्त लोक-संस्कार, स्वाध्याय और ‘लोकमत-परिष्कार’ भी शिक्षा के महत्वपूर्ण साधन हैं। इसके लिए रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, संगीत, पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकालयों और क्लबों का भरपूर उपयोग किया जाना चाहिए और राज्य को इनकी सुयोग्य व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। इसमें यह विशेष सुझाव भी दिया गया है कि रेडियो और टेलीविजन को सरकारी विभाग के बजाय एक स्वायत्त निगम (autonomous corporation) के रूप में चलाया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, चित्रपट (सिनेमा) को लोक-शिक्षा का एक अत्यंत प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा गया है कि शासन को यह ध्यान रखना चाहिए कि सिनेमा लोगों की रुचि बिगाड़ने के स्थान पर लोकमत-परिष्कार तथा समाज में सुरुचि (अच्छी रुचि) पैदा करने का साधन बने।

3. खंड 15 (Volume 15)

इस खंड का अध्याय 13 (पृष्ठ 89 से 92) पूरी तरह से “लोकमत-परिष्कार” विषय पर ही केंद्रित है, जो दीनदयाल उपाध्याय जी की पुस्तक ‘राष्ट्र जीवन की दिशा’ (1971) से लिया गया है। इसका दार्शनिक और व्यावहारिक विश्लेषण निम्नलिखित पृष्ठों पर मिलता है:

  • पृष्ठ 89

संदर्भ: अध्याय की शुरुआत दिल्ली विधानसभा को समाप्त करने के नेहरू जी और एक शिष्टमंडल के संवाद से होती है। दीनदयाल जी प्रश्न उठाते हैं कि जब समाज के अलग-अलग वर्ग अपने स्वार्थों के लिए परस्पर विरोधी माँगें करते हैं, तो ‘जनता की वास्तविक इच्छा’ किसे माना जाए? वे चेतावनी देते हैं कि लोकतंत्र में बिना किसी मर्यादा के केवल अपनी इच्छाओं को ही सर्वोपरि मानकर अड़ जाना अराजकता और अंततः निरंकुश शासन (तानाशाही) को जन्म देता है।

  • पृष्ठ 90

संदर्भ: यहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं है, बल्कि यह दूसरों के दृष्टिकोण को आदरपूर्वक समझने और विचार-विमर्श की तैयारी है। इसके लिए वे भारतीय ज्ञान परंपरा के सूत्र ‘वादे-वादे जायते तत्त्वबोधः’ का संदर्भ देते हैं। दृष्टिकोण में इस सामंजस्य को लाने के लिए मानव जीवन में ‘संयम’ की आवश्यकता होती है, जो लोकमत परिष्कार का अनिवार्य हिस्सा है।

  • पृष्ठ 91

संदर्भ: दीनदयाल जी बताते हैं कि लोकतंत्र को भीड़तंत्र या तानाशाही में बदलने से रोकने के लिए प्राचीन भारतीय मनीषियों ने ‘लोकमत-परिष्कार’ की एक अद्वितीय व्यवस्था की थी। भारत ने इसका सबसे उत्कृष्ट समाधान यह निकाला था— “राज्य (शासन/सरकार) के हाथ से लोकमत-निर्माण के साधन छीनकर।” उनका तर्क था कि लोकमत परिष्कार का कार्य सरकार या राजनीतिक दल नहीं कर सकते क्योंकि वे स्वयं सत्ता के लोभ में लिप्त होते हैं। यह कार्य केवल “वीतरागी, द्वंद्वातीत संन्यासियों और निष्पक्ष विचारकों” का है जो सांसारिक लालसाओं से मुक्त होकर निस्वार्थ भाव से समाज को धर्म, मर्यादा और संस्कारों की सीख देते हैं।

 

  • पृष्ठ 92

संदर्भ: वे अध्याय का निष्कर्ष निकालते हुए लिखते हैं कि जनता को सुसंस्कृत करने और ‘लोकमत परिष्कार’ का महत्त्व सर्वोपरि है। जब तक इस कार्य को निष्ठापूर्वक करने वाले, राज्य के मोह से दूर और भय से मुक्त महापुरुष तथा संगठनकर्ता समाज में सक्रिय रहेंगे, तब तक लोकमत अपनी सही और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ता रहेगा।