लखनऊ/लखीमपुर खीरी: उत्तर प्रदेश की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बेहद दर्दनाक तस्वीर राजधानी लखनऊ से सामने आई है, जहाँ लखीमपुर खीरी से रेफर होकर आए एक 4 वर्षीय गंभीर बच्चे को लखनऊ मेडिकल कॉलेज में इलाज और ऑक्सीजन बेड नहीं मिल पा रहा है। सरकार भले ही जनता से स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बड़े-बड़े वादे करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी गरीबों के लिए बेहद जानलेवा और मुश्किलों से भरी साबित हो रही है।प्राप्त जानकारी के अनुसार, लखीमपुर खीरी जनपद के थाना नीमगांव क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम गुलौला (पोस्ट टीकौला) के रहने वाले बाबू सिंह का 4 वर्षीय पोता अत्यंत गंभीर स्थिति में है। बच्चे की बिगड़ती हालत को देखते हुए जिला अस्पताल लखीमपुर खीरी के डॉक्टरों ने उसे बेहतर इलाज के लिए लखनऊ मेडिकल कॉलेज (KGMU) रेफर कर दिया था।
उम्मीद थी कि राजधानी के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज में मासूम को तुरंत इलाज मिलेगा, लेकिन यहाँ पहुँचने के बाद परिजनों को सिर्फ निराशा और दुत्कार हाथ लगी। अस्पताल में ऑक्सीजन बेड खाली न होने की बात कहकर बच्चे को भर्ती करने से मना कर दिया गया।
एम्बुलेंस में तड़प रहा मासूम, भटक रहे दादा
पीड़ित बाबू सिंह (मोबाइल नंबर: 8542803071) अपने मासूम पोते को एम्बुलेंस में लेकर लखनऊ के सरकारी अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं। बच्चे की हालत लगातार नाजुक बनी हुई है और उसे तुरंत ऑक्सीजन और आईसीयू सपोर्ट की जरूरत है। लेकिन लखनऊ के किसी भी बड़े सरकारी अस्पताल में इस गरीब परिवार की सुनने वाला कोई नहीं है। परिजन जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे बच्चे को गोद में लिए बेबस खड़े हैं।
दावों और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर
यह घटना सरकार के उन तमाम दावों पर करारा तमाचा है, जिसमें प्रदेश के हर नागरिक को बेहतर और त्वरित इलाज देने की बात कही जाती है। हकीकत यह है कि आज भी किसी गरीब को आपातकालीन स्थिति में सही समय पर इलाज मिलना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। रेफरल सिस्टम के नाम पर मरीजों को एक जिले से दूसरे जिले तो भेज दिया जाता है, लेकिन वहाँ उनके लिए बेड सुरक्षित हैं या नहीं, इसकी सुध लेने वाला कोई तंत्र मौजूद नहीं है।क्या एक 4 साल के मासूम की जान की कीमत इन सरकारी कागजी वादों से कम है? पीड़ित परिवार अब सिर्फ किसी चमत्कार या प्रशासन की नींद टूटने का इंतजार कर रहा है, ताकि उनके बच्चे की सांसें बचाई जा सकें।
