Web News

www.upwebnews.com

डिजिटल होते युग के बावजूद पेपर लेस कार्य संभव नहीं: अरविंद कुमार सिंह

May 31, 2026

डिजिटल होते युग के बावजूद पेपर लेस कार्य संभव नहीं: अरविंद कुमार सिंह

*भावी पीढ़ी का पुस्तकों से दूर होना चिंताजनक: डॉ.मंजूषा*

*वरिष्ठ पत्रकार विवेकानन्द पाण्डेय की पुस्तक उठान के दिन का हुआ समारोहपूर्वक विमोचन*

अयोध्या।
हिंदी पत्रकारिता के 200 गौरवशाली वर्ष के अवसर पर शहर के सिविल लाइंस स्थित एक होटल के सभागार में वरिष्ठ पत्रकार विवेकानन्द पाण्डेय की “उठान के दिन” पुस्तक का विमोचन समारोहपूर्वक आयोजित हुआ। इस दौरान पत्रकारिता परिचर्चा और संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
सोशल एक्शन फॉर प्रोग्रेसिव नेशन फाउंडेशन (सपना फाउंडेशन) की ओर से आयोजित समारोह के मुख्य अतिथि दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार व लेखक अरविंद कुमार सिंह ने कहा की संदर्भ, इतिहास और संस्मरणों को संजोने का सशक्त माध्यम पुस्तक होती है। किसी संस्मरणों को जब संजोया जाता है तब वह जीवंत हो उठते हैं। पत्रकारिता समाज के साथ इतिहास को गढ़ने का कार्य करती है। उन्होंने अपने कई संस्मरणों को साझा करते हुए विमोचित पुस्तक “उठान के दिन” को भविष्य के लिए मिल का पत्थर बताया। कहा कि डिजिटल होते युग में लेस पेपर तो संभव है, पर पेपर लेस कार्य संभव नहीं हैं। जिस दिन लेखन और पठन-पाठन बंद होगा समाज में अस्थिरता पैदा हो जाएगी।


अध्यक्षता कर रहीं राजा मोहन गर्ल्स पीजी कॉलेज (मनूचा) की प्राचार्या डॉ. मंजूषा मिश्रा ने कहा कि आज के दौर में हम पुस्तकों से दूर हो रहे हैं। जो भावी पीढ़ी के लिए बड़ी समय होगा। पुस्तकों का लेखन साहित्य के प्रति प्रेम को सहज ही प्रकट करता है। विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार त्रियुग नारायण तिवारी ने पुस्तक और पत्रकारिता के कई आयामों की विस्तार से चर्चा की। आकाशवाणी अयोध्या केंद्र के सहायक निदेशक (अभियांत्रिकी) अनिल सिंह, कार्यक्रम प्रमुख संजय धर द्विवेदी, उत्तर प्रदेश प्रधानाचार्य परिषद के प्रदेश अध्यक्ष मणि शंकर तिवारी और एसएसवी इंटर कॉलेज के अवकाश प्राप्त प्रधानाचार्य शिक्षाविद डॉ. वीरेंद्र कुमार त्रिपाठी ने भी समारोह को संबोधित किया।


इसके पहले आपस प्रकाशन के संपादक- प्रकाशक डॉ. विंध्यमणि ने उठान के दिन पुस्तक की विस्तार से चर्चा की। राज्य पुरस्कार से सम्मानित अध्यापक अनूप मल्होत्रा ने स्वागत और सपना फाउंडेशन अध्यक्ष डॉ.स्वदेश मल्होत्रा ने धन्यवाद व्यक्त किया। समारोह का संचालन उठान के दिन पुस्तक के लेखक वरिष्ठ पत्रकार विवेकानंद पाण्डेय विवेक ने किया। कार्यक्रम के आरंभ में अतिथियों ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्वलित किया। अतिथियों को अंग वस्त्र और स्मृति चिन्ह भेंट किए गए। समारोह में प्रमुख रूप से वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. उपेंद्र मणि त्रिपाठी, एडवोकेट शीतला पांडेय, पुलिस उपमहानिरीक्षक कार्यालय में कार्यरत खाकी वाले गुरु उप निरीक्षक रणजीत यादव, आर्ट ऑफ़ लिविंग के शिक्षक अनुज कुमार वैश्य भज्जा, शिक्षक वारिज नयन शर्मा, नंद किशोर उपाध्याय, रमाकांत पाण्डेय, शीला पाण्डेय, व्यवसायी विवेक जैन, रविंद्र कुमार पाण्डेय, भास्कर पाण्डेय, अभिज्ञान यादव, सचिन त्रिपाठी, रामकृष्ण सेवा फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष आकाश गुप्ता, बृजेंद्र दुबे, गायत्री पाण्डेय, सोनी पाण्डेय, प्रज्ञा, श्रद्धा, श्रेया, प्रिया, शशांक मिश्रा, शिवम मिश्रा, सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे।

May 30, 2026

लोकतंत्र में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका: सांसद तेजवीर सिंह चौधरी

उपज ने मनाया 200वां हिंदी पत्रकारिता दिवस
मथुरा। उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट (उपज) मथुरा के तत्वावधान में शनिवार को 200वां हिंदी पत्रकारिता दिवस, विचार गोष्ठी एवं सम्मान समारोह का भव्य आयोजन एक स्थानीय होटल में किया गया। कार्यक्रम में हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली 200 वर्षों के इतिहास, वर्तमान चुनौतियों और लोकतंत्र में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका पर विस्तृत चर्चा की गई।
कार्यक्रम में आयोजक एवं उपज जिलाध्यक्ष अतुल कुमार जिंदल ने मुख्य अतिथि राज्यसभा सांसद तेजवीर सिंह चौधरी, विशिष्ट अतिथि बलदेव विधायक पूरन प्रकाश, वरिष्ठ पत्रकार डॉ. प्रसून शुक्ला, उपज प्रदेश महामंत्री आनंद कर्ण, बलदेव ब्लॉक प्रमुख प्रतीक भरंगर, प्रदेश कोषाध्यक्ष बालमुकुंद तिवारी सहित अन्य अतिथियों का पटुका ओढ़ाकर एवं राधा-कृष्ण का छायाचित्र भेंट कर स्वागत एवं सम्मान किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि राज्यसभा सांसद तेजवीर सिंह चौधरी द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो समाज को जागरूक करने, जनसमस्याओं को उठाने और शासन-प्रशासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का महत्वपूर्ण कार्य करता है।
विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की गौरवशाली यात्रा को याद करते हुए पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, डिजिटल युग की चुनौतियों तथा निष्पक्ष एवं जनहितकारी पत्रकारिता की आवश्यकता पर अपने विचार रखे। साथ ही पत्रकारों के मानदेय, सुरक्षा एवं अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भी गंभीरता से प्रकाश डाला गया।
समारोह के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाले पत्रकारों एवं समाजसेवियों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार सी.पी. सिकरवार, हेमंत अग्र हरि,विजय सिंघल, अनुज उपमन्यु, ऋषि पंडित सहित जिले भर के पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि एवं गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन केशवानंद त्रिपाठी ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन उपज के कोषाध्यक्ष विपिन अग्रवाल एवं अन्य पदाधिकारियों द्वारा व्यक्त किया गया। समारोह सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।

पुलिस पर जानलेवा हमले में तीन दोषियों को सजा

दो को 4-4 व एक को एक साल की सजा, तीनों पर उत्तराखंड में भी अपराधिक मामले
फास्ट ट्रैक कोर्ट-2 ने सुनाया निर्णय
Post on 30.5.26
Saturday Moradabad
Rajesh Bhatia,Time 6.45 pm

मुरादाबाद,उप्र समाचार सेवा

उत्तराखंड में वांछित अपराधी रहे तीन बदमाशों को पुलिस पार्टी पर हमले में दोषी करार दिया गया है।आरोपियों के खिलाफ दर्ज केसों की सुनवाई करते हुए फास्ट ट्रैक कोर्ट-2 धीरेन्द्र सिंह ने साक्ष्यों के आधार पर दोषी मानाऔर सजा सुनाई। इनमें दो को 4-4 और एक दोषी को एक साल की सजा मिली है।

19 दिसंबर,15 को कटघर क्षेत्र में डीयर पार्क के पास रफातपुर रोड की घटना है।कटघर पुलिस को बदमाशों का सुराग मिला। पुलिस मौके की तलाश में जुट गई।डीयर पार्क पर रफातपुर रोड पर बदमाशों की लोकेशन मिलीं।पुलिस टीम ने घेराबंदी की।टीम देख बदमाशों ने पुलिस पर फायरिंग की।इस दौरान पुलिस ने हमलावरों को घेरते हुए गिरफ्तार कर लिया।

मामले की सुनवाई एफटीसी कोर्ट-2 धीरेन्द्र सिंह की अदालत में हुईं।विशेष लोक अभियोजक महेंद्र सिंह कश्यप ने बताया कि अदालत में पुलिस रिपोर्ट व आरोपियों की अपराधिक मामलों से जुड़े साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने तीनों को दोषी ठहराया और सजा सुनाई। मूंढापांडे के आसिफ और अनमोल को पुलिस पर हमले में
चार चार साल और एक दोषी आशु को एक साल की सजा मिली। प्रत्येक दोषी पर ढाई हजार रुपए का जुर्माना लगाया।

वाराणसी के पत्रकारों के लिए बनेगा मीडिया हाउस: मंत्री हंसराज विश्वकर्मा

Posted on 30.05.2026 Time 10.00 PM

सरकार से पत्रकारों व समाचार पत्र कर्मियों के लिए कैश लेश चिकित्सकीय सुविधा की उठी मांग
– उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स द्वारा हिंदी पत्रकारिता दिवस का आयोजन
वाराणसी 30 मई 2026, वाराणसी के पत्रकारों हेतु मीडिया हाउस बनवाने का आश्वासन उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री हंसराज विश्वकर्मा ने दिया है। वह शनिवार को उत्तर प्रदेश एसोसिएशन आफ जर्नलिस्ट उपज वाराणसी इकाई द्वारा आज हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे। इसके साथ ही उन्होंने पत्रकारों के हितार्थ अपना सहयोग देने को कहा।
शिवपुर स्थित होटल रवींद्राया रेसिडेंसी में आयोजित पत्रकारिता दिवस पर काशी के मूर्धन्य पत्रकारों का सम्मान भी किया। जिसमें वरिष्ठ पत्रकार शुभकार दुबे, सुरेश प्रताप सिंह, योगेश कुमार गुप्त, विकास पाठक, शरद वाजपेयी एवं प्रदीप उपाध्याय को पत्रकारिता शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया।
मुख्य अतिथि ने कहा कि पत्रकारों की जो भी समस्याएं हैं उसको प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री तक पहुंचा कर उसे पूरा करने का प्रयत्न किया जाएगा उन्होंने उपज के महामंत्री मोनेश श्रीवास्तव से कहा कि वह एक प्रतिवेदन तैयार
कर उन्हें दे जिसे वे प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री तक प्रेषित कर उसे क्रियान्वित कराने का प्रयास करेंगे।
अपने उद्बोधन में विशिष्ट अतिथि कांची कामकोटि पीठ के प्रतिनिधि श्री बी एस सुब्रह्मण्यम मणि ने कहा कि जिस प्रकार भगवान भास्कर के दर्शन कर हम दिन की शुरुवात करते है,उसी प्रकार सुबह समाचार पत्रों के माध्यम से हमें देश विदेश की गतिविधियों से अवगत होते है। इसमें पत्रकारों की भूमिका अहम हो जाती है।
मुख्य वक्ता बीएचयू पत्रकारिता विभाग के आचार्य बाल लखेंद्र जी ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के लिए अंग्रेजियत छोड़नी होगी। आज पूरे देश में हिंदी पत्रकारिता अपना एक महत्वपूर्ण साख रखती है।
विशिष्ट अतिथि पूर्व विधान परिषद सदस्य श्री चेत नारायण सिंह ने कहा कि पत्रकारिता आज जोखिम का कार्य हो गई है फिर भी दुर्भाग्य है कि पत्रकारों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था आज भी नहीं है। उपज अध्यक्ष विनोद बागी ने मंत्री के समक्ष मांग रखी कि जिस प्रकार सभी को चिकित्सा सुविधा सरकार प्रदान कर रही है लेकिन आज पत्रकारों को कोई चिकित्सीय सुविधा न देना बहुत ही दुर्भाग्य है। सरकार से कैश लेश चिकित्सकीय सुविधा देने की मांग की गई।
इस अवसर पर विश्व प्रसिद्ध तबला वादक पंडित अशोक पांडे का तबलावादन एवं वायलिन पर संगति पंडित सुखदेव मिश्र जी ने की उन्होंने लोगों का मंत्र मुग्ध का दिया।
कार्यक्रम का संचालन महामंत्री ने, स्वागत उद्बोधन डॉ अरविंद कुमार सिंह ने एवं धन्यवाद उपाध्यक्ष अनिल जायसवाल जी ने किया।

हिंदी पत्रकारिता की सत्यनिष्ठा और स्वाभिमान के दो सौ साल

Ratibhan Tripathi Senior Journalist
-रतिभान त्रिपाठी

आज देश भर की हिंदी पट्टी में हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे होने का उत्सव मनाया जा रहा है। हम सब पत्रकार इस सुअवसर के साक्षी हैं और सौभाग्यशाली भी, कि हम सब हिंदी पत्रकारिता के संघर्ष में सहभागी हैं। दो सौ साल पहले 30 मई 1826 को कलकत्ता के अमरतल्ला मुहल्ले के मकान नंबर 37 में छोटे से दफ्तर से पंडित युगल किशोर सुकुल ने हिंदी का अखबार निकाला था, जिसका नाम था उदन्त मार्तण्ड। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में यह अखबार भारत में हिंदी के पहला अखबार के रूप में दर्ज है। यह कम दिलचस्प नहीं कि वाराणसी से 1845 में प्रकाशित हुए “बनारस अखबार” को बरसों तक हिंदी का पहला अखबार माना जाता रहा है लेकिन यशस्वी साहित्यकार और संपादक ठाकुर प्रसाद सिंह ने 30 मई 1976 को लखनऊ में एक बड़ा आयोजन कर घोषित किया कि हिंदी का पहला अखबार “उदन्त मार्तण्ड” है जो 30 मई 1826 को कलकत्ते से निकला था। उसके बाद ही वह अवस्थापना ध्वस्त हुई कि “बनारस अखबार” हिंदी का पहला अखबार है।

बहरहाल, इन दो सौ सालों के कालखण्ड में हिंदी पत्रकारिता अनेकानेक मोड़ों और संघर्षों से गुजरी है। भारत का जनमानस इसका साक्षी है। उदन्त मार्तण्ड के संस्थापक और संपादक पंडित युगल किशोर सुकुल जो मूलतः कानपुर के निवासी थे, ने अपने अखबार की स्थापना इसलिए नहीं की थी कि उन्हें मशहूर होना है, प्रतिष्ठा पानी है या कोई बिजनेस करना है। उन्होंने अखबार इसलिए शुरू किया था वह भारतीय आत्मा की आवाज को अपनी पूरी क्षमता के साथ लोगों तक पहुंचाएं, उन्हें जगाएं और जो हिंदी देश के बहुसंख्यक समुदाय की भाषा है, वह मुखरित हो, उसका संदेश जन-जन तक पहुंचे। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोई आवाज तो उठे। देर सबेर ही सही, भारत की आत्मा की आवाज जरूर गूंजेगी और गुलामी से मुक्ति मिले क्योंकि पत्रकारिता का चरम लक्ष्य अन्याय, अत्याचार, शोषण आदि के विरुद्ध मुखर होकर सच के पक्ष में खड़े होना है। यह बात अलग है कि एक लंबे कालखण्ड से उपरोक्त चरम लक्ष्य की दिशा बदल गई है या भटक गई है।

कल्पना कीजिए कि जिस युग में पंडित युगल किशोर सुकुल ने उदन्त मार्तण्ड के साथ पत्रकारिता की आवाज बुलंद की थी, वह बहुत कम पढ़े लिखों का समय था। भारत में गरीबी थी, भूख थी, अकाल थे, महामारियां थीं और अंग्रेजों की क्रूर हुकूमत थी। अंग्रेजों के राज में हिंदी का परचम लहराना अपने आप में अपराध कहा जा सकता था, भले ही अपनी हुकूमत चलाने के लिए हिंदी जानना अंग्रेजों की मजबूरी रहा हो या भारतीय अभिजात्य वर्ग को आगे करके उसी के सहारे हिंदी का आश्रय लेने की परिस्थिति रही हो। ऐसे में हिंदी पत्रकारिता करना कोई हंसी-खेल तो नहीं ही था, वह भी संसाधनविहीन एक सामान्य जन के लिए। लेकिन सुकुल जी ने हिम्मत जुटाकर यह काम शुरू किया। संसाधनविहीनता का ही परिणाम हुआ कि उदन्त मार्तण्ड दो साल के भीतर ही बंद करना पड़ा। लेकिन सुकुल जी ने हिंदी पत्रकारिता की जो लौ जलाई वह आज पूरे भारत को रोशन कर रही है।

यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस का इतिहास हिंदी के स्वाभिमान का इतिहास है। हिंदी की आत्मा के उत्कर्ष और उसकी चेतना के जन-जन में व्यापने का इतिहास है। जिस दौर में हिंदी पत्रकारिता जन्म ले रही थी, वह हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान की गुलामी का दौर था। उस समय तो जन-मानस में यह बात थी भी नहीं कि एक दिन भारत गुलामी से मुक्त होकर आत्मनिर्भर और स्वतंत्र होगा, पर पंडित युगल किशोर सुकुल के मन में कहीं न कहीं उसका बीजारोपण जरूर हो चुका था। यदि ऐसा न होता तो वह अखबार शुरू ही न करते। अब हम जिस दौर में जी रहे हैं, वह हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान का एक बेहतरीन दौर है। हिंदी स्वाभिमानिनी भाषा हो चुकी है। वह अपराधबोध की ग्रंथि से बाहर अपने चरम वैभव की ओर है और यह पत्रकारिता के लिए आत्ममंथन का दौर भी है। न केवल हिंदी पत्रकारिता के लिए बल्कि सभी भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी पत्रकारिता के लिए भी, कि वह जो कर रही है, कितना उपयुक्त, कितना युगांतरकारी और कितना सार्थक है।

राजनीतिक कलाबाजों के वर्ग की बात छोड़ दें तो देश दुनिया का एक बड़ा वर्ग है जो हिंदी अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के प्रति बहुत कम सद्भावना रख रहा है। यदि यह कहा जाए कि दुर्भावना रख रहा है तो ग़लत न होगा। वो राजनीतिक कलाबाज भी नहीं जो सत्ताओं से दूर हैं या वो राजनीतिक कलाबाज भी जो सच से ताल्लुक रखने की कोशिश करते हैं। इन हालात में अखबार हों, टेलीविजन चैनल हों या फिर डिजिटल मीडिया के रणबांकुरे, सबके लिए आत्ममंथन और गंभीरता से चिंतन करने का समय है। हिंदी पत्रकारिता के संस्थापकों और बाद सौ बरस के पत्रकारों की त्याग तपस्या इन हालात के लिए नहीं थी। उस समय भाषा गढ़ी जा रही थी। खड़ी बोली खड़ी हो रही थी। अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए संकल्पों के विकल्प सीमित थे। धन वैभव की लालसा हर युग में रही है, जाहिर है दो सौ साल पहले भी रही होगी लेकिन सत्यनिष्ठा और स्वाभिमान के संकल्प उससे भी अधिक मजबूत थे , इसीलिए अखबार नहीं चला, न चले लेकिन पंडित युगल किशोर किसी साहूकार या हुकूमत के सामने स्वाभिमान गिरवी रखने नहीं गए। उस युग में पत्रकारिता के लिए यह परिभाषाएं नहीं थीं कि पत्रकारिता चलती रहे, भले ही स्वाभिमान गिरवी रखना पड़े। भले ही आत्मा की आवाज को हवा में उड़ने दिया जाए।

दो सौ साल बाद उदन्त मार्तण्ड और पंडित युगल किशोर सुकुल को याद करना, हिंदी पत्रकारिता भर को याद करना नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास को याद करना है जिससे संकल्प गढ़े जा सकते हैं, आत्मसंयम बनाया और बचाया जा सकता है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना
भाषा के प्रति आत्मीयता और उसके पराक्रम को याद करना है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना उस सत्य को याद करना है जिसके बलबूते पत्रकारिता को सम्मान और गौरव मिला है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना हिंदी संसार को विकसित कर वैश्विक बनाने की मानसिकता को याद करना है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना उस रचनात्मकता को याद करना है जिन संकल्पों से सिद्धि मिलती है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना उन संपादकों और पत्रकारों की भावनाओं को याद करना है जिनके मन में देश और समाज को उस दिशा में ले जाने का संकल्प था जहां वैभव के साथ सत्य न्याय और धर्म का निश्छल आचरण स्पष्ट रूप से दिखाई दे। लेकिन इस दौर में उपरोक्त बातों का स्थान कहां और कितना है, यह सुधी पत्रकारों को स्वयं समझना और तय करना है। उदन्त मार्तण्ड को याद करते हुए हमें आशा और विश्वास बनाए रखना है। यह निराश होने का समय नहीं है, देश और समाज की उम्मीदों को फलीभूत होने देने का समय है।

भारत में हिंदी पत्रकारिता की जिम्मेदारी अन्य भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के मुकाबले कहीं ज्यादा है। अर्जुन को कर्मयोग की शिक्षा देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने
श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के 21वें श्लोक में कहा है – यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।। यह बात हिंदी पत्रकारिता पर विशेष रूप से लागू होती है। चूंकि हिंदी अपने को अन्य भारतीय भाषाओं की बड़ी बहन मानती है इसलिए उसकी जिम्मेदारी भी बड़ी है। वह जो आचरण करेगी, माना जाएगी कि दूसरी भाषाएं भी वैसा कर सकती हैं। इसलिए हिंदी पत्रकारिता में जहां कहीं खोट, खामी, खराबी, गिरावट आदि दिखती हो, उसे वहीं सुधारे, तब तो बात है। और कहने में संकोच नहीं कि खामी खराबी ने घर बना लिया है। उसे हटाकर ही गरिमा और गौरव हासिल किया जा सकता है। सम्मान चाटुकारिता से नहीं, सच्चाई के साथ रहकर स्वाभिमानी होने से मिलता है। और हां, सम्मान मिले न मिले, अपनी आत्मा न धिक्कारे, वही आचरण हिंदी पत्रकारिता को करना है।

यह इस बहस में उलझने का समय नहीं है कि अखबार सही हैं, चैनल गलत हैं। चैनल सही हैं डिजिटल मीडिया गलत है। डिजिटल मीडिया सही है, अखबार गलत हैं। समय यह भी नहीं कहता है पत्रकारिता में पैसा नहीं है। जीवनयापन के लिए कुछ न कुछ करना है। ऐसी दलीलें पेश करने वालों को पत्रकारिता के क्षेत्र में एक पल भी रहने का अधिकार नहीं है। पत्रकारिता बेशक पेशा है लेकिन यह कंटेंट यानी तथ्यों का पेशा है। तथ्य गलत हों पत्रकारिता खारिज समझिए। कृष्ण बिहारी नूर का वो शेर याद कीजिए – सच घटे या बढ़े तो सच न रहे, झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं! इसलिए ऐसी दलीलें और गवाहियां देने वाले पत्रकारिता के लिए हो ही नहीं सकते हैं, भले ही वह कोई और काम कर लें। यदि न्याय बिकने लगे, पत्रकारिता बिकने लगे तो आजादी की लड़ाई के दौर में प्रयागराज से प्रकाशित होने वाले “स्वराज” अखबार की उस घोषणा का क्या अर्थ रह जाता है जिसमें कहा गया था कि हमें आवश्यकता है एक ऐसे संपादक की जिसे खाने के लिए दो रोटियां और पीने के लिए एक गिलास पानी मिलेगा लेकिन हर संपादकीय पर जेल जाने के लिए तैयार रहना होगा। याद कीजिए उन संकल्पवानों के संकल्प को कि उस समय एक-एक करके आठ संपादकों को जेल जाना पड़ा। यदि वह भी वैसी दलीलें पेश कर रहे होते भला सौ साल बाद हम उन्हें क्यों याद कर रहे होते।

कहा जा सकता है कि वह दौर अलग था। आवश्यकताएं और इच्छाएं कम थीं, इसलिए उस समय के लोग वैसा कर पाए। यह बात आत्मतोष के लिए हो सकती है, सच नहीं। आज का दौर भी वैसा ही है, बस संदर्भ बदल गए हैं। बदले संदर्भों में हिंदी पत्रकारिता का दायित्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। उसकी व्यापकता बढ़ गई है, उसका संसार बढ़ गया है। इसलिए किसी भी पत्रकार को कोई उपदेश नहीं देना है। सबको संकेत देना है और कर्तव्य को बारंबार याद दिलाना है। उदन्त मार्तण्ड जो बीजारोपण कर गया है, उसकी रक्षा करते हुए फलीभूत करते रहना है ताकि हिंदी पत्रकारिता के हमारे पुरखों की आत्मा सुकून में रहे। उन्होंने जो लौ जलाई थी, वह जाज्ज्वल्यमान रहे और हिंदी संसार का गौरव बढ़ता रहे।
हिंदी पत्रकारिता के इन दो सौ सालों की यात्रा के लिए आपको, हमको और सबको बहुत बहुत बधाई।

« Newer PostsOlder Posts »