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यूपी में प्रशासक ग्राम प्रधान

May 26, 2026

यूपी में प्रशासक ग्राम प्रधान

Edit 26 may 2026 Time 11.48 AM, Tuesday ,By Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News

Uttar Pradesh Map

UTTAR pRADESH

उत्तर प्रदेश में 2026 चुनावी वर्ष है। इसलिए सरकार हर फैसला चुनाव में मुद्दे को देखकर ले रही है। प्रदेश के चुनावों में ग्रामीण मतदाताओं की संख्या को दृष्टिगत रखते हुए मुख्यमंत्री ने पंचायती राज विभाग के प्रस्ताव को 25 मई को स्वीकृति प्रदान कर दी। इसके बाद 27 मई से यूपी के 57 हजार 694 प्रधान प्रशासक बन जाएंगे। क्योंकि इनका वर्तमान कार्यकाल 26 मई 2026 तक है। ये व्यवस्था यूपी में पहली बार हुई है। इसके पहले भी चुनाव में विलंब हुआ है लेकिन कभी पूर्व प्रधानों को प्रशासक नहीं बनाया गया। यह निर्णय यूपी में पहली बार हुआ है। इस निर्णय के दो प्रभाव होंगे पहला तो ये कि जब 11 जुलाई को जिला पंचायत अध्यक्षों और 19 जुलाई को ब्लॉक प्रमुखों का कार्यकाल समाप्त होगा तो वे भी प्रशासक बनने की मांग करेंगे। दूसरा ये कि ग्राम प्रधानों की कार्यप्रणाली से नाराज ग्रामीण इस फैसले से नाखुश होंगे। अब सरकार के इस फैसले की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि प्रधानों की लोकप्रियता उनके गांवों में कितनी है, और है भी नहीं।

सरकार ने प्रधानों को प्रशासक जरूर बना दिया है किंतु उनके अधिकार सीमित ही रहेंगे। वे कोई नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे। केवल रूटीन कार्य करने के ही अधिकार होंगे। विशेष और नीतिगत कार्यों के लिए उन्हें जिलाधिकारी से अनुमति लेनी होगी। ऐसी स्थिति में ग्राम प्रधान क्या प्रशासक के रूप में प्रभावी भूमिका निभा सकेंगे। ये आने वाले समय में पता चढ़लेगा। हालांकि वे पिछले लंबित कार्य और भुगतान अवश्य कर लेंगे।

इस व्यवस्था की मांग ग्राम प्रधान संगठनों और आल इंडिया पंचायती राज संगठन की ओर से ही की गई थी। जिसे सरकार ने मान लिया है। लेकिन क्या ये व्यवस्था पंचायती राज को सुदृढ़ करेगी या उसे कमजोर करेगी। वैसे उचित तो ये होता कि समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन छह माह पूर्व किया जाता और अब तक रिपोर्ट आ जाती तथा समय पर चुनाव होते। लेकिन ऐसा हुआ नहीं , अभी एक सप्ताह पूर्व समर्पित पिछड़ा वर आयोग गठित हुआ। ये 6 माह में रिपोर्ट देगा। तब चुनाव में आरक्षण तय होगा तथा चुनाव प्रक्रिया आरम्भ होगी। शायद सरकार की मंशा भी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पंचायत चुनाव नहीं कराने की रही हो।

पंचायतें ग्रामीण लोकतंत्र की रीढ़ है। इनके प्रति सरकारों को संवेदनशील रहना चाहिए। साथ ही पंचायत चुनाव में विलंब और नए प्रधानों के न होने से विकास कार्य प्रभावित होंगे। जैसे मनरेगा जो जुलाई से जी राम जी के रूप में कसम करेगा। अब इसका क्रियान्वयन काम चलाऊ प्रधानों के कारण प्रभावित हो सकता है। बजटीय कार्यों में स्वीकृति जिलाधिकारी से करानी होगी, जिसमें विलंब होगा। कुल मिलाकर इस व्यवस्था से ग्रामीण विकास की गति बाधित ही होगी।

May 25, 2026

नौतपा की तपिश

Editorial 25.05.2026, Tuesday, by Sarvesh Kumar Singh, Editor UP Web News

नौ दिन की भीषण गर्मी, लू और तपिश आज सोमवार 25 मई से शुरु हो गई है। आज नौतपा  का पहला दिन है। ये नौ दिन की भीषणतम गर्मी और तपिश का कालचक्र 2 जून तक रहेगा। इस दौरान प्राकृतिक तपिश का सामना करना है, इससे जूझना है। हालांकि प्रकृति के सिद्धान्त के अनुसार यह नौ दिन की भीषण गर्मी, लू और तपिश भी जरूरी है। इन नौ दिनों के उच्चतम तापमान के बाद ही मानसून आएगा। यह प्राकृतिक प्रक्रिया है कि गर्मी बढने से ही वर्षा के लिए जल संचय होता है जो वाष्पिकरण के बाद बरसता है। इसलिए इस भीषण गर्मी को भी आवश्यक मानकर झेलना है। किन्तु इसके लिए उपाय अपनाने होंगे।

समाज की जीवनशैली बदली है। प्राचीन पद्यतियों में काफी कुछ बदलाव आया है, औद्यौगिकीकरण ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है। वृक्षों के अंधाधुंध कटान ने गर्मी के स्तर को बढाया है। छायादार वृक्षों का अभाव हो गया है। शहरों के हालात यह हैं कि भीषण गर्मी और दोपहरी में यदि यात्री या आम नागरिक कहीं छांव में खड़ा होना चाहे या कुछ देर धूप से  बचना चाहे तो उसे कोई पेड़ दिखायी ही नहीं देगा। इसके अलावा पेयजल की गंभीर समस्या है। सामान्य आदमी यदि सड़क के किनारे कहीं पानी तलाशना चाहे तो बोतल बंद पानी के अलावा उसे कहीं पानी नहीं मिलेगा। इसका कारण यह है कि नगर निकायों ने सार्वजनिक स्थलों, चौराहों पर अब पीने के पानी के लिए सार्वजनिक टंकियां लगानी बंद कर दी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में, मार्गों में और प्रमुख स्थलों जैसे रेलवे स्टेशन, बस अड्डों, टैक्सी स्टैंडों, अस्पतालों, कोर्ट कचहरी में कहीं भी सार्वजनिक पानी की टंकियां दिखायी नहीं देती हैं। पहले इन स्थलों पर सरकारों, निकायों और सामाजिक संगठनों, व्पापारियों, प्रमुख समाजसेवियों द्वारा पियाऊ लगवायी जाती थीं। इसका प्रचलन भी समाप्त हो गया है। नौतपा हो या पूरा मई-जून का महीना सबको पानी और छांव की जरूरत है। इसके लिए प्रयास किये जाने चाहिए।

उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक गर्मी का प्रकोप पूर्वांचल और बुंदेलखण्ड के जिलों में होता है। इस बार भी बन्देलखंड सबसे ज्यादा तप रहा है। बांदा ने गर्मी का विश्व रिकार्ड बनाया है। कल के तापमान में भी बांदा 46.7 डिग्री सेल्शियस तक पहुंचा है। आगे भी चेतावनी है कि बुन्देलखंड के सभी जिलों में भीषण गर्मी पड़ेगी। बुन्देलखण्ड का सबसे बडा संकट पेयजल की आपूर्ति का है। यहां पहले से ही पानी का अभाव रहा है। किन्तु भारत सरकार के प्रयास से शुरु की गई जल जीवन मिशन योजना ने कुछ हद तक राहत पहुंचायी है। लेकिन, अभी भी स्थिति में काफी सुधार की गुंजाइश है। जल जीवन मिशन की प्रगति धीमी है। कुछ जगह पानी पहुंच रहा है तो कुछ स्थानों तक पेयजल पाइप लाइन बिछी है किन्तु पानी की आपूर्ति नहीं है। कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहां पाइप लाइन ही नहीं पहुंची है। सरकारी अनुश्रवण के अभाव में योजना से शत-प्रतिशत लाभ ग्रामीण जनता को नहीं मिल पा रहा है।

हालांकि पश्चिम उत्तर प्रदेश के आगरा और मथुरा जैसे जिले भी तप रहे हैं। यहां भी तेज गर्मी की चेतावनी है। पश्चिम उत्तर प्रदेश के हिमालय की तलहटी से सटे जिलों में गर्मी में भी कभी राहत रहती थी,लेकिन अब यहां भी अंधाधुंध शहरीकरण और पेडों की कटाई ने मौसम में बदलाव किया है। ये जिले बिजनौर, मुरादाबाद, अमरोहा, बरेली, शाहजहांपुर, पीलीभीत, लखमीपुर, बहराइच भी भीषण गर्मी की चपेट में हैं। सरकारों ने अपने स्तर से प्रयास किये हैं। स्कूलों की छुट्टियां करा दी गई हैं। सकारी कार्यालयों के समय में भी परिवर्तिन किया गया है। वर्क फ्राम होम की अनुमति दी जा रही है। इससे राहत मिलने की उम्मीद है। सरकार को दिहाड़ी मजदूरों, मनरेगा मजदूरों और निर्माण कारीगरों और मजदूरों को गर्मी से बचाने के लिए प्रयास करने चाहिए। यह आवश्यक किया जाना चाहिए कि इन कार्य स्थलों पर कुछ समय के लिए छांव में आराम करने और पर्याप्त पीने के पानी की व्यवस्था संबंधित कार्यदायी संस्था या स्वामी को करने के लिए निर्देश दिये जाएं। ताकि मजदूरों को गर्मी से बचाया जा सके। अलबत्ता यह मौसम का प्राकृतिक चक्र है लेकिन इसका व्यवस्थित तरीके से सामना करना हम सबका दायित्व है। (उप्रससे)

 

 

May 22, 2026

कॉकरोच पार्टी: युवाओं का आक्रोश या अवसरवाद

Cockroach Janata Party

Editorial 22 May 26, Time 11.05 AM

सर्वेश कुमार सिंह

जब भी किसी वर्ग को अपमानित किया जाएगा, या उसके अस्तित्व को चुनौती दी जाएगी तो प्रतिक्रिया और प्रतिकार जरूर होगा। इसी प्रतिक्रिया का एक डिजिटल स्वरूप है कॉकरोच जनता पार्टी। लेकिन क्या ये युवाओं के आक्रोश को प्रतिध्वनि देने का सही और सक्षम मार्ग है। क्या ये पार्टी युवाओं के सपनो को उनकी आकांक्षाओं को साकार रूप देने की सही दिशा है। सवाल अनेक है, लेकिन युवा और खासकर बेरोजगार नाराज है, उनपर सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने गैर जरूरी टिप्पणी की है। एक मामले की सुनवाई करते हुए 15 मई को न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने युवाओं की तुलना कॉकरोच से कर दी। उन्होंने कहा कि कुछ युवा बेरोजगार, फर्जी डिग्रियां लेकर मीडिया, सोशल मीडिया में घुस जाते है, या एक्टिविस्ट बन जाते है और कॉकरोच की तरह सिस्टम पर हमला करते है। इस टिप्पणी ने युवाओं, बेरोजगारों, मीडिया से जुड़े लोगों को आहत किया। उन्होंने खुद को अपमानित महसूस किया। वैसे आम तौर पर जजों की ये आदत हो गई है कि वे केस की सुनवाई के दौरान अपने ज्ञान का प्रकटीकरण करते हुए टिप्पणियां करते है । विषय पर टिप्पणी तो उचित है किंतु कभी कभी विषय इतर टिप्पणी विवाद खड़ा कर देती है। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ। हालांकि सीजेआई ने अपनी टिप्पणी पर स्पष्टीकरण भी दिया। लेकिन जो संदेश जाना था वह तो चला गया।

Abhijeet Deepke

अब इसकी प्रतिक्रिया और प्रतिशोध का पक्ष सामने आया। इस बयान में प्रमुख रूप से मीडिया क्षेत्र की अवहेलना और उपेक्षा का भाव निहित था। लेकिन मीडिया पक्ष से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। प्रतिक्रिया आई एक आईटी और सोशल मीडिया व्यवसाई की ओर से, इनका नाम है, अभिजीत दीपके। इन्होंने अपने व्यावसायिक अनुभव का लाभ उठाकर एक पार्टी बना दी और नाम रखा कॉकरोच जनता पार्टी। ये काम यू तो सीजेआई के बयान के अगले ही दिन यानि कि 16 मई को कर दिया। इस डिजिटल अभियान को चार दिन में बड़ी सफलता मिली। इंस्टाग्राम पर सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी) के 140 लाख फॉलोअर्स हो गए। एक्स (पूर्ववर्ती ट्विटर) पर भी भारी समर्थन मिला है। लेकिन भारत सरकार के अनुरोध पर 21 मई को सीजेपी का एक्स अकाउंट ब्लॉक कर दिया गया। अब उन्होंने नया अकाउंट बनाया है। कुल मिलकर कॉकरोच जनता पार्टी को गिजिटल समर्थन बढ़ रहा है।

इस जिजिटल पार्टी के संस्थापक दीपके ने सक्रिय राजनीति करने की घोषणा की है। वे डिजिटल आक्रोश को यथार्थ राजनीतिक परिणाम में बदलना चाहते है। लेकिन क्या वे इसमें सफल होंगे। ये राजनीति का अभिनव प्रयोग होगा। किंतु इस अभियान का मूल्यांकन वास्तव में जनता करेगी। हमारे लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी है। हमारे वोटर चाहे वे शहरी हों या ग्रामीण,उच्च शिक्षित हों या अल्पशिक्षित, युवा हों या बुजुर्ग, महिला हों या पुरुष ये सभी सही और गलत के चयन का विवेक रखते है। ये तथ्य भारत के मतदाताओं ने समय समय पर साबित किया है।कॉकरोच जनता पार्टी को इसी परीक्षा से गुजरना होगा। अभिजीत के अभियान की सफलता या असफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि वे क्या अतीत की अपनी छवि से उबर पाते है या नहीं। क्योंकि वे आम आदमी पार्टी के डिजिटल कैंपेनर रहे है। उन पर केजरीवाल का प्रभाव कितना दृष्टि गोचर होगा। क्या वे इस अभियान को राहुल गांधी, अखिलेश यादव और केजरीवाल की राजनीतिक भाषा और सोच से पृथक रख पाते है या नहीं। अगर उनकी पार्टी की राजनीतिक सोच, दिशा और भाषा विपक्ष का प्रतिबिंब बनी तो , तो हाल कांग्रेस, आप जैसा ही होगा। हां अगर उन्होंने सच्चाई से युवाओं और बेरोजगारों के आक्रोश को स्वर दिया तो परिणाम सकारात्मक हो सकते है। उनके अभियान को विपक्ष का टूल किट अभियान कहा जाने लगा है। इसमें कितनी सच्चाई है ये समय आने पर स्पष्ट होगा। यदि ऐसा नहीं है तो अभिजीत दीपके युवाओं की आशा की किरण बन सकते है।

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

May 19, 2026

नक्सलमुक्त बस्तर: अब विकास की राह पर

Editorial 19.05.2026, Tuesday, by Sarvesh Kumar Singh, Editor UP Web News

नक्सलवाद मुक्त भारत एक सपना था। भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती। ये देश के सामने एक ऐसी समस्या थी, जिसके बारे में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि नक्सलवाद देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। उसी नक्सलवाद को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तारीख तय करके समाप्त कर दिया है। उन्होंने अगस्त 2024 में घोषणा की थी कि 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त कर देंगे। यह कार्य तय समयसीमा से पहले ही पूरा हो गया। ऐसा देश के इतिहास में पहली बार हुआ है कि तारीख निश्चित करके किसी ऐसी समस्या का समाधान हुआ हो जहां सशस्त्र संघर्ष चलता हो, लेकिन ऐसा भारत में हुआ है। इसका श्रेय जहां सुरक्षा बलों के अदम्य साहस, वीरता और बलिदान को जाता है, वहीं कुशल रणनीति, योजना और दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाने के लिए अमित शाह को जाता है। अमित शाह ने देश से लाल आतंक को पोषित करने वाली माओवादी विचारधारा से वनवासियों को मुक्ति दिलाने के लिए मिशन मोड में काम किया। केंद्र और राज्य सरकारों का बेहतर समन्वय किया। योजनाओं को संबंधित तक पहुंचाया। सुरक्षा बलों को खुली छूट और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सूचना तंत्र को मजबूत किया। प्रतिफल दो साल से कम समय में लक्ष्य पूरा कर दिया, मिशन पूरा किया।

नक्सल आतंक से जो क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित थे। उनमें छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग सबसे प्रमुख रहा है। इस संभाग में 7 जिले है। गृह मंत्री अमित शाह ने अब इस क्षेत्र के समुचित विकास का बीड़ा उठाया है। क्योंकि जिन नक्सलवादियों ने हथियार डाले है। उनका पुनर्वास और उनके और परिवारों के रोजगार भी चाहिए। इन क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं की पहुंच नहीं थी। न तो राशन कार्ड थे, न मुफ्त मिलने वाला राशन मिल पता था और न ही 5 लाख की चिकित्सा सुविधा ही मिल रही थी। कारण था नक्सलवादी रोड़ा बने थे। वे स्कूल, अस्पताल,सड़क नहीं बनने दे रहे। अब बस्तर नक्सलमुक्त है तो ये सभी योजनाएं और सुविधाएं प्रदान की तैयारी की गई है। इसके लिए गृहमंत्री खुद बस्तर पहुंचे है। उन्होंने 18 और 19 मई को योजनाओं की शुरुआत कराई है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के साथ योजनाओं का उद्घाटन किया। जगदलपुर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि केंद्र ने बस्तर में 200 सुरक्षा कैंप खोले थे। अब इनमें से एक तिहाई यानी कि 70 को सेवा डेरा में परिवर्तित किया जा रहा। ये डेरा वीर शहीद गुंडाधर के नाम से होंगे। इनमें केंद्र और राज्य की सभी 371 योजनाओं का लाभ मिलेगा। ये कमान सर्विस सेंटर के रूप में काम करेंगे। ये सेंटर गांव के हर दरवाजे तक योजना का लाभ पहुंचाएंगे। उन्होंने कहा कि 5 साल में बस्तर की आय 6 हुआ बढ़ेगी। उन्होंने घोषणा की है कि हर आदिवासी महिला को एक गाय और एक भैंस दी जाएगी। डेयरी सेक्टर का नेटवर्क स्थापित करके आय बढ़ाएंगे। बैंक, एटीएम, पोस्ट ऑफिस खोले जा रहे है। सड़कें बनाई जा रही है। बस्तर को आतंक के अंतहीन समझे जाने वाले साए से निकालकर विकास की राह दिखाना निसंदेह उल्लेखनीय और सराहनीय कार्य है।

May 18, 2026

जातियों पर टिप्पणी से बचें नेता

सम्पादकीय 18.05.2026, Time 07.36 PM, Monday, by Sarvesh Kumar Singh, Editor UP Web News, Lucknow

राजनीति अब समाज का अभिन्न अंग बन चुकी है। यह केवल कुछ लोगों तक सीमित नहीं रह गई है। मीडिया के बदलते स्वरूप में इसका जहां स्वरूप व्यापक हुआ है वहीं नेताओं की हर बात तत्काल डिजिटल माध्यमों से जनता तक पहुंच रही है। इसके दोनों पक्ष हैं लाभकारी भी है और हानिकर भी। सोशल मीडिया के युग में नेताओं के लिए जुबान पर नियंत्रण करना समय की मांग है। अन्यथा वे अपने बयानों के कारण अपनी ही पार्टी और अपना वयक्तिगत नुकसान भी कर रहे हैं। वैसे भी एक पुरानी कहावत है कि “मुंह से निकली बात परायी हो जाती है”, जुबान से निकलने के बाद इस पर बोलने वाला का कोई नियंत्रण नहीं रहता। फिर दूसरे लोग इसकी व्याख्या और प्रचार प्रसार अपने ढंग से करते हैं।

ताजा मामला समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी से जुड़ा है। ये दो कार्यक्रमों में जातियों पर टिप्पणी करके फंस गए हैं। इनकी देशभर में न केवल आलोचना हो रही है, बल्कि मामला एफआईआर तक पहुंच गया है। इन्होंने मई महीने में ही पहले ब्राह्मण समाज पर प्रतिकूल टिप्पणी की, इसके एक सप्ताह बाद ही जाटों और खुद की जाति गुर्जरों पर प्रतिकूल टिप्पणी कर दी। दोनों टिप्पणियां न केवल अशोभनीय हैं बल्कि मानहानि कारक हैं और बगैर किसी संदर्भ की गई थीं। लेकिन विवाद गर्मा गया है। अब उनके पुतले जलाये जा रहे हैं। इन अनियंत्रित बयानों का असर समाजवादी पार्टी की राजनीति पर भी पडना अवश्यमभावी है, हालांकि अभी तक पार्टी के शीर्ष नेतृत्व कोई संज्ञान नहीं लिया है। इस पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है।

भाटी ने पहली टिप्पणी 5 मई को दिल्ली में जवाहर भवन में एक पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में ब्राह्मणों पर की। यह पुस्तक दो लेखकों डा.रफ रफ शकील अंसारी और जावेद अनवर लिखित है। इसका विषय है-“जाति और साम्प्रयादिकता के विषाणु” । पुस्तक विमोचन समारोह में राजकुमार भाटी के अलावा कई अन्य प्रमुख वयक्ति मौजूद थे। इनमें वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष, अभय कुमार दूबे, प्रो. रतन लाल, शीबा असलम, डा. हिलाल अहमद प्रमुख थे।

यहां राजकुमार भाटी ने जातियों में मुहावरे और दोहे बाले जाने की प्रवृत्ति की जिक्र किया और एक ऐसा दोहा सुना दिया जो ब्राह्मण समाज के लिए अपमान जनक था। दोहा इस प्रकार है-“ब्राह्मण भला न वेश्या, इनमें भला न कोय। और कोई कोई वेश्या तो भली, ब्राह्मण भला न कोय”। कार्यक्रम में जब यह दोहा सुनाया गया तो उपस्थित श्रोताओं और मंचस्थ विशिष्ट अतिथियों ने जोरदार ठहाका भी लगाया। खास बात यह भी रही कि मंच पर बैठे अभय कुमार दुबे और आशुतोष भी मौन साधे रहे।

दूसरा प्रकरण जाटों और गूर्जरों पर टिप्पणी से जुडा है। यह भी एक कार्यक्रम में ही हुआ। यह कार्यक्रम चौधरी चरण सिंह और चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत की पुण्य तिथि मनाने के लिए 14 मई को अन्तराष्ट्रीय जाट महासभा द्वारा दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित किया गया था। इसमें भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत और हरियाणा के प्रमुख जाट नेता सांसद दीपेन्द्र सिंह हुड्डा भी मौजूद थे। यहां राजकुमार भाटी ने जाटों और गूर्जरों के बीच एक प्रथा का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह तो सुना जाता है कि राजा महाराजाओं की कई-कई पत्नियां होती थीं, किन्तु एक पत्नी के कई-कई पति हों यह प्रथा जाटों और गूर्जरों में रही है। उन्होंने इसका संदर्भ महाभारत काल से जोडने की कोशिश की और बताया कि द्रोपदी के भी कई पति थे। यादव, जाट और गूर्जर महाभारत काल में एक ही जाति के थे। इस टिप्पणी से भी माहौल गर्मा गया। जाटों और गूर्जरों में भाटी के बयान से भारी नाराजगी है। उन्होंने इनके बयान को पूरी तरह से खारिज किया है और इसे समाज की महिलाओं का अपमान करने वाला बताया है। अब राजकुमार भाटी अपने दोनों बयानों के लिए सफाई दे रहे हैं। लेकिन, आक्रोश कम होने का नाम नहीं ले रहा है।

राजकुमार भाटी की इस बयानबाजी से पूरे पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति गर्मायी हुई है। खासकर जाट समाज में बहुत नाराजगी है। क्योंकि राकेश टिकैत खुद उस मंच पर उपस्थित थे, जहां जाटों की महिलाओं पर अभद्र और अशोभनीय टिप्पणी की गई थी। उनसे पूछा जा रहा है कि उन्होंने उसी समय इस बात का प्रतिवाद क्यों नहीं किया।

ऐसी ही एक टिप्पणी गत लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के गुजरात के राजकोट प्रत्याशी और पूर्व केन्द्रीय मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला ने 22 मार्च 2024 को एक जनसभा में की थी। य़हां उन्होंने राजा महाराजाओं और क्षत्रियों की नारियों पर अभद्र टिप्पणी कर दी थी। इससे उनके खिलाफ भी भारी आक्रोश पैदा हुआ था। उन्हें भी माफी मांगनी पडी थी।

अतः आश्यकता इस बात की है कि नेताओं को अपनी वाणी पर नियंत्रण और संयम रखना चाहिए। खासकर जाति और धर्म के मामले में टिप्पण करते समय, अन्यथा वे अपने और अपने दल की उन्नति करने के बजाय अवनति के कारक ही बनेंगे।

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