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सपा नेताओं की हिमाकत

May 13, 2026

सपा नेताओं की हिमाकत

Posted on 13.05.2026 Thursday, Time 21.07 PM, Editorial by Sarvesh Kumar Singh, SP Leader statements

समाजवादी पार्टी के नेता लगातार गैर जिम्मेदाराना और  विघटन पैदा करने वाले बयान देने की हिमाकत कर रहे हैं। सपा यूं तो खुद को लोहिया की विचारधारा और समाजवादी सिद्धान्तों का झंडावरदार कहते नहीं थकती किन्तु उसके नेताओं का कार्यों में बयानों में कहीं भी समाजवाद और लोहिया के विचार की झलक दिखायी नहीं देती। डा राममनोहर लोहिया जाति तोडने की बात करते थे किन्तु सपा नेता हर समया जातिवाद को बढ़ावा देने वाले बयान देते हैं और जातिवादी सोच से ग्रसित होकर ही राजनीति कर रहे हैं। इसके साथ ही वे पीडीए के नाम अन्य जातियों का अपमान कर रहे हैं। इस स्थिति से सपा का राष्ट्रीय नेतृत्व भी असहज तो है किन्तु वह कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है।

हाल का मामला दो घटनाओं का है। पहला समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी के उस बयान का है जिसमें उन्होंने ब्राह्मण समाज का घनघोर अपमान किया है। उन्होंने पांच मई को दिल्ली के जवाहर भवन में आयोजित राजीव फाउण्डेशन के पुस्तक विमोचन समारोह में अपना भाषण देते हुए ब्राह्मण समाज पर अपमानजनक टिप्पणी की। उन्होंने ब्राह्मणों के लिए बोला जाने वाला एक मुहावरा इस कार्यक्रम में सुनाया। इसमें ब्राह्मणों की तुलना वेश्या से की गई। उनके भाषण के अंश सोशल मीडिया में जारी होने के बाद और वीडियो वायरल होने से देशभर के ब्राह्मण समाज में आक्रोश फैल गया है। हालांकि उन्होंने ब्राह्मण समाज से माफी मांग ली है। किन्तु ब्राह्मण समाज में बहुत आक्रोश है। इसी मामले को लेकर मंगलवार 12 मई को उनके खिलाफ गाजियाबाद के कविनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज हो गई है।

दूसरा मामला महोबा का है जहां समाजवादी पार्टी के हमीरपुर-महोबा के सांसद अजेन्द्र सिंह लोधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अपमानजनक टिप्पणी कर दी। उन्होंने प्रधानमंत्री के अपमानजनक शब्द बोले यहां तक की उन्हें गाली भी दी। इस मामले में भी महोबा कोतवाली में सांसद अजेन्द्र सिंह लोधी के खिलाफ एफआईआर हो गई है। दोनों मामले जातीय वैमनस्य और अशिष्ट व्यवहार के हैं। खास बात यह कि ये दोनों घटनाएं ऐसे व्यक्तियों द्वारा अजाम दी गई हैं जो जिम्मेदार पदों पर एक सांसद हैं दूसरे पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। इस पार्टी के नेताओं और प्रवक्ताओं का यह व्यवहार आम है। ये किसी भी नेता या समाज पर कोई भी अभद्र टिप्पणी कर देते हैं।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि दोनों घटनाओं के बाद सपा का राष्ट्रीय नेतृत्व मौन है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव या किसी अन्य नेता की तरफ से दोनों मामलों पर कोई बयान जारी नहीं किया गया है। न तो इन नेताओं को कोई नसीहत दी गई है और न ही इसके लिए राष्ट्रीय नेतृत्व ने खेद व्यक्त किया है। ऐसा लगता है कि सपा के वरिष्ठ नेताओं ने ऐसी घटनाओं से आंखें मूंद कर उनके कृत्यों को मौन सहमति प्रदान की है। इस प्रवृत्ति के कारण ही सपा के नेता इस तरह की गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी करने की हिमाकत कर पा रहे हैं। लेकिन, इन जातीय बयानों और राजनीतिक अशिष्टता भरे बयानों को जनता देख रही है। वह समय पर बखूबी इन्हें जवाब देगी।

March 30, 2026

वेस्ट यूपी राज्य की मांग, कितना समर्थन

Editorial Posted on 30.03.2026, Time 06.26 AM , Monday, By Editor Sarvesh Kumar Singh 

West UP State

पश्चिम उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की बात एक बार फिर से उठी है और यह बात उठाई है बसपा की अध्यक्ष बहन मायावती ने। तो यह प्रश्न एक बार फिर यह चर्चा में आ गया है कि क्या उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव जो 2027 में होना है उसमें पश्चिम उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने का मुद्दा अहम रूप से उठेगा और क्या यह एक खास मुद्दा बन पाएगा।

बहन मायावती ने एक ट्वीट किया है। वैसे यह ट्वीट तो जो कल प्रधानमंत्री का भाषण हुआ, जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट का कल उद्घाटन हुआ । उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ,  राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और तमाम नेता वहां मौजूद थे। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए बहन मायावती ने ट्वीट में यह कहा है कि इस एयरपोर्ट का पूरा प्रोजेक्ट , नक्शा और इसकी भूमिका सब कुछ हमारी सरकार में बन चुकी थी। अगर केंद्र सरकार ने उस समय जो केंद्र में यूपीए की सरकार थी, कांग्रेस के नेतृत्व की सरकार थी, अगर उसने अड़ंगा ना लगाया होता और हमारा सहयोग किया होता, तो यह पहले ही बन चुका होता। यह जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट दरअसल बहुजन समाज पार्टी की कल्पना है और उसने ही इसकी भूमिका तैयार की थी। उसने ही निर्माण के लिए पहल भी की थी। उन्होंने कहा कि जिस तरह से आगरा एक्सप्रेसवे बना उसी तरह से यह भी अब तक बन चुका होता। इसके साथ ही उन्होंने समाजवादी पार्टी पर भी कटाक्ष किए। उन्होंने कह समाजवादी पार्टी की सरकार आई 2012 में और उसने हमारी सरकार द्वारा शुरू किए गए जन कल्याण के कार्य गरीबों के उत्थान के लिए कार्य और योजनाएं बंद करने का उन्हें पलटने का नाम बदलने का काम किया।  तमाम जो महापुरुषों के नाम पर हमने नगरों का नामकरण किया उन्हें बदल diya।

समाजवादी पार्टी सरकार ने दलित महापुरुषों के नाम हटा दिए गए और वह केवल बदले की भावना से ही काम करते रहे। इसके साथ ही मायावती ने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही है वह सबसे आखिर में अपने ट्वीट में कही है।मायावती जी ने कहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने का मुद्दा भी अहम है और यह बनना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट की बेंच की स्थापना की बात को भी बल दिया। यह दो मांगे बहुत लंबे समय से या कहा जाए तीन से चार दशक से चली आ रही है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की बेंच पश्चिम उत्तर प्रदेश में बने इसकी मांग तो लगभग 40 साल पुरानी है। लेकिन आज तक उस पर कोई सुनवाई नहीं हुई है। बड़ा राज्य होने के कारण दो या तीन राज्य बनाने की बात भी बार-बार होती रही है। पश्चिम उत्तर प्रदेश अलग राज्य होना चाहिए। यह मांग कई मंचों से उठी लेकिन कभी भी प्रभावी रूप से इसकी ना तो पैरवी हो पाई और ना ही कोई दल इसे प्रभावी रूप से उठाने के लिए तैयार हो पाया। हां, यह बात जरूर है कि बीच-बीच में समय-समय पर हरित प्रदेश के नाम पर इस मांग को राष्ट्रीय लोकदल उठाता रहा। लेकिन अब राष्ट्रीय लोकदल भी इसके बारे में कोई बात नहीं करता।

मायावती जी की जब सरकार थी तो उन्होंने तीन बार पश्चिम उत्तर प्रदेश को अलग करके एक नया राज्य बनाने की और पूरे उत्तर प्रदेश के विभाजन की की मांग रखी थी। उन्होंने इसके लिए विधानसभा से प्रस्ताव पारित करके केंद्र सरकार के पास भेजे भी थे। उन प्रस्तावों में पश्चिम उत्तर प्रदेश के साथ-साथ एक पूर्वांचल राज्य और बुंदेलखंड राज्य को अलग से बनाने की मांग की गई थी। लेकिन उस समय की केंद्र सरकारों ने इन प्रस्तावों पर भी कोई ध्यान नहीं दिया।

अब मायावती ने विधानसभा चुनाव से ऐन पहले इस मुद्दे को फिर से उठाकर अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है और यह उम्मीद भी जगा दी है पश्चिम उत्तर प्रदेश के लोगों में कि उनको एक नया राज्य मिल सकता है अगर बहुजन समाज पार्टी का साथ दें तो। इसके साथ ही बुंदेलखंड में भी यह मांग उठती रही है कि अलग राज्य बने। पूर्वांचल में भी इसकी मांग होती रही है।

भारतीय जनता पार्टी के अंदर भी चर्चा होती है। भारतीय जनता पार्टी भी यूं तो अलग राज्य के मुद्दे पर सैद्धांतिक रूप से सहमत है। लेकिन उत्तर प्रदेश को अलग करने के लिए अभी तक कोई निर्णय नहीं ले सकी है। पश्चिम उत्तर प्रदेश अगर बनता है तो ये पश्चिम की जनता के लिए एक बड़ा ही लाभकारी और सुविधाजनक राज्य होगा क्योंकि उत्तर प्रदेश बहुत बड़ा राज्य है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की दूरी भी बहुत ज्यादा है। तमाम वादकारियों को इलाहाबाद पहुंचने में बहुत कष्ट होता है। तो यूं तो इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच संभवत नहीं मिलेगी जब तक कि राज्य नहीं बनेगा। जब राज्य बनेगा तो स्वाभाविक रूप से हर राज्य का एक हाई कोर्ट होता है और वह हाई कोर्ट फिर पश्चिम उत्तर प्रदेश को स्वाभाविक रूप से मिल जाएगा। अब देखना पड़ेगा कि कितना समर्थन होता है। क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता मायावती जी की इस मांग के साथ खड़ी होती है और इस मांग के साथ ही इसको बल मिलता है।

यह बात भी स्पष्ट है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग करने के मुद्दे पर समाजवादी पार्टी कभी भी साथ नहीं आई है। समाजवादी पार्टी नीतिगत रूप से यह मानती है कि राज्य का विभाजन उचित नहीं है। यह बात मुलायम सिंह यादव जी ने भी स्पष्ट कर दी थी कि वह राज्य के विभाजन के पक्ष में नहीं है। देखना है कि राज्य का विभाजन होता है या नहीं होता है या यह चुनावी मुद्दा बनकर रह जाएगा और अगर चुनावी मुद्दा बनेगा भी तो यह कितना प्रभावी मुद्दा बनेगा आने वाले विधानसभा चुनाव में। लेकिन बहन मायावती ने एक बहुत ही गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर बहस छेड़ दी  चर्चा छेड़ दी है। इसके लिए जरूरी है,  जनमानस तैयार हो। लोग खड़े हो और लोग इस मांग को प्रभावी रूप से उठाएं तब शायद राजनीतिक निर्णय हो सकता है।

सर्वेश कुमार सिंह

The demand for a separate state for western Uttar Pradesh has been raised once again by BSP president Mayawati. So the question has once again come up as to whether the issue of western Uttar Pradesh as a separate state will figure prominently in the Uttar Pradesh Assembly elections to be held in 2027 and whether it will be able to become a major issue.

March 8, 2026

चुनावी सहानुभूति

Posted on 08.03.2026 Sunday Time 08.06 PM, Editorial By Sarvesh Kumar Singh

बसपा सुप्रीमो बहन मायावती की याद अखिलेश यादव जी को फिर से आई है। आखिर अचानक क्यों आई याद सपा प्रमुख को? और सिर्फ मायावती जी की ही याद नहीं आई, उन्होंने नीतीश कुमार जी को भी याद किया है।

नीतीश कुमार जी का जो राजनीतिक परिदृश्य में परिवर्तन सामने आ रहा है, उसको लेकर भी उन्होंने टिप्पणी की है और उनसे सहानुभूति जताई है। कल समाजवादी पार्टी कार्यालय में एक पत्रकार वार्ता थी, जिसमें अखिलेश यादव जी के साथ उनके चाचा शिवपाल यादव जी, लाल बिहारी यादव और राजेंद्र चौधरी भी मौजूद थे।

इस पत्रकार वार्ता की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अखिलेश जी ने अनायास कहा कि— “हम सपा-बसपा गठबंधन के दौर में मायावती जी को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे।” उनको प्रधानमंत्री बनाने के लिए ही एक तरह से गठबंधन हुआ था। यह बात 2019 की है।

लोकसभा चुनाव  2019 में सपा और बसपा ने आपसी दूरियों को कम करते हुए गठबंधन किया था। उन्होंने सपना देखा था कि मायावती जी को वो प्रधानमंत्री बनाएंगे। हालांकि गठबंधन की हार हुई, बसपा को कुछ सीटें मिलीं लेकिन सपा को अपेक्षा के अनुरूप सीटें नहीं मिलीं और मोदी जी फिर प्रधानमंत्री बने।

दूसरी महत्वपूर्ण बात उन्होंने नीतीश कुमार जी के राजनीतिक परिवर्तन पर कही। राज्यसभा के चुनाव हो रहे हैं और चर्चा है कि नीतीश कुमार जी मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देंगे और राज्यसभा जाएंगे।

इस पर अखिलेश जी ने कहा— “हम तो उनको प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे।” यानी इंडिया गठबंधन की योजना नीतीश जी को प्रधानमंत्री बनाने की थी, लेकिन वो नहीं माने। वो तो राज्यसभा पर अटक कर रह गए।

क्या यह सहानुभूति अनायास है या चुनावी रणनीति का हिस्सा? 2027 का चुनाव नजदीक है और अब लगभग एक वर्ष से थोड़ा कम समय बचा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक और जातीय समीकरण (सोशल इंजीनियरिंग) सबसे प्रमुख है।

2024 के चुनाव में अखिलेश जी के ‘PDA’ ने असर दिखाया। यादवों के बाद दूसरा प्रमुख मत प्रतिशत कुर्मी (पटेल) वोट का है। इसका रुख सपा के प्रति ज्यादा रहा। यही वजह है कि सपा के 7 कुर्मी सांसद जीते, जबकि भाजपा के 4।

भाजपा ने भी कुर्मी नेता पंकज चौधरी को जिम्मेदारी देकर अपनी रणनीति मजबूत की है। उधर सपा की नजर भी इसी वोट बैंक पर है। इसीलिए उन्होंने नीतीश जी का नाम लिया और सहानुभूति जताई क्योंकि नीतीश जी भी इसी समाज से आते हैं।

मायावती जी का नाम लेने के पीछे भी यही रणनीति है कि दलित और पिछड़ा वोट उनके साथ जुड़ जाए। 2024 में दलित वोट का कुछ हिस्सा कांग्रेस और सपा की ओर गया था। अखिलेश जी 2019 के गठबंधन का उल्लेख इसीलिए कर रहे हैं ताकि दलित समाज में संदेश जाए।

हालांकि, अखिलेश जी ने अब यह खुलासा किया है, लेकिन अगर यह बात इंडिया गठबंधन ने सार्वजनिक रूप से कही होती तो स्थिति अलग होती। उस समय कांग्रेस तो सिर्फ राहुल गांधी के नाम पर अड़ी हुई थी।

देखते हैं राजनीति किस करवट बैठती है।

 

February 3, 2026

संपादकीय: अप्रकाशित पुस्तक पर चर्चा का औचित्य

Leader of opposition Rahul Gandhi

लोकसभा में नेता विरोधी दल राहुल गांधी

Posted on : 03.02.2926 Tuesday, Time: 07.09 AM, Editorial by Sarvesh Kumar Singh, UP Web News, Un Published book of General Manoj Mukund Nanrvanee, #The Four Stars of Destiny 

संस्मरण पुस्तक “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” जिसके लेखक पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवने है। अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। हालांकि इस किताब की चर्चा खूब है। इस पर एक पत्रिका में टिप्पणी भी प्रकाशित हो चुकी है। पुस्तक प्रकाशन के लिए प्रकाशक के पास है। लेकिन रक्षा मंत्रालय से अनुमति लंबित होने के कारण अप्रकाशित है। ताजा उल्लेख इस किताब का इसलिए है कि इसके कुछ अंश जो अगस्त 2020 के लद्दाख क्षेत्र में चीन के साथ हुई हिंसक झड़प से जुड़े हैं और घुसपैठ के बारे में हैं, इनकी चर्चा नेता विरोधी दल राहुल गांधी सोमवार को लोकसभा में करना चाहते थे। उन्हें अध्यक्ष ने रोक दिया। उन्होंने जब एक पत्रिका में पुस्तक पर प्रकाशित टिप्पणी का उल्लेख करते हुए चीनी घुसपैठ की बात को उठाने की कोशिश की तो सरकार की ओर से विरोध हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने भी नियमों का हवाला देकर उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी। अन्ततः लोकसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई।

अब प्रश्न ये उठता है कि क्या किसी ऐसी किताब जो अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है। उसके विवरण पर लोकसभा में चर्चा करना उचित है? क्योंकि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा विवाद से जुड़ा है। इसका प्रभाव पड़ोसी देश के साथ राजनीतिक, कूटनीतिक, व्यापारिक संबंधों से भी है। और इन सबसे ज्यादा सेना के मनोबल से जुड़ा है। ऐसी स्थिति में क्या राहुल गांधी को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के अभिभाषण पर चर्चा के बजाय, किसी संवेदनशील मुद्दे को उठाना चाहिए था।

जब तक जनरल मनोज मुकुंद नरवने की पुस्तक को प्रकाशन हेतु रक्षा मंत्रालय समीक्षा के बाद अनुमति न दे, और जब तक किताब प्रकाशित न हो जाए, तब तक इस मुद्दे को संसद में उठाना कतई भी उचित नहीं है। यहां तक कि इसपर सोशल मीडिया में भी चर्चा नहीं होनी चाहिए।

देश की आंतरिक, बाहरी और सीमा सुरक्षा पर देश का जनमत और दृष्टिकोण भी वही होना चाहिए, जो हमारी सेना, सरकार का अधिकृत मत हो। अगस्त 2020 में जब गलवान और दोकलम में चीनी सेना से हिंसक झड़प हुई तो जनरल नरवाने भारत के थलसेनाध्यक्ष थे। निश्चित रूप से उनके पास आम जन से अधिक सूचनाएं होंगी। रणनीति भी उनकी होगी, और सीमा सुरक्षा की पहली जिम्मेवारी भी उन्हीं की थी। ऐसे में एक दायित्वधारी को पद से हटने के बाद सूचनाओं को सार्वजनिक करने में सावधानी बरतनी चाहिए। आजादी के बाद से अभी तक के सभी सेनाध्यक्ष अगर सब कुछ सार्वजनिक करते तो देश में बहुत बड़े विभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई होती। यही बात नेता विरोधी दल को भी समझनी चाहिए। उनसे राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।

 

 

January 31, 2026

भारतीय न्याय शास्त्र और यूजीसी नियमों पर रोक

प्राचीन न्याय शास्त्र के आलोक में सुप्रीम कोर्ट Supreme Court द्वारा यूजीसी पर रोक का औचित्य

Dr Chandra Prakash Sharma, Milak Rampur

डा चंद्रप्रकाश शर्मा

Article Posted & Published on : 31.01.2026, Saturday , Time: 10.11 AM By Chandra Prakash Sharma

सर्वोच्च न्यायालय Supreme Court द्वारा 29 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग UGC के  “समता विनियम 2026” पर रोक यूजीसी के उन नियमों पर लगाई गई है जो उच्च शिक्षा संस्थानों Higher education Institution में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य बनाए गए थे।  उन्हें अस्पष्ट , दुरुपयोग की संभावना वाला और विभाजनकारी माना गया। 13 जनवरी 2026 को यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशंस 2026 Equity regulations को अधिसूचित किया गया । यह नियम उच्च शिक्षा में समानता को बढ़ावा देने के लिए था जिसमें इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर्स और कैंपस स्तरीय समितियां का गठन शामिल था।  लेकिन विवादास्पद रेगुलेशन 3(सी) ने जाति आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक केंद्रित कर दिया और सामान्य वर्ग को इससे बाहर रखा गया जिसके कारण पूरे देश में अनेक प्रदर्शन , राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और याचिकाएं दाखिल हुई जिसके फल स्वरुप मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत Chief Justice of India Justice Surykant और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची Justice Joymalya Bagchi की पीठ ने नियमों को पूर्णतः अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाला बताया।साथ ही पुराने 2012 नियमों को जारी रखने का आदेश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय का स्थगन आदेश प्राचीन न्यायशास्त्र के सिद्धांतों पर कितना खरा है, इसकी समालोचना व विश्लेषण समय की आवश्यकता है। प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्र का मूल Vedas वेदों, Upnishad उपनिषदों और Dharm Sutra धर्मसूत्रों में सन्निहित है जिसका व्यावहारिक रूप Smritiya स्मृतियों में दृष्टिगोचर होता है। लगभग 200 ईसा पूर्व की Manu Smrati मनुस्मृति जो राजनीतिक रूप से काफी विवादित है, न्याय को धर्म का प्रतिबिंब मानती है जबकि Yagvalkya Smrati याज्ञवल्क्य स्मृति अधिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक है क्योंकि यह व्यवहार अर्थात कानून, आचार अर्थात नैतिकता और प्रायश्चित यानी दंड के प्रावधानों से सम्प्रक्त है। लगभग 300 ईसा पश्चात की Narad Smrati नारद स्मृति विशेष रूप से फॉरेंसिक कानून पर आधारित है जिसमें अदालतों, गवाहों और दंड की प्रक्रिया का वर्णन है। मनुस्मृति के अध्याय 8 में राजा को न्याय करते समय पक्षपात रहित होना चाहिए,” राजा न्याय में पक्षपात न करें चाहे वह मित्र हो या शत्रु” यहां न्याय को धर्म रक्षक माना गया है। नारद स्मृति पूरी तरह कानूनी है जिसमें 18 शीर्षकों में न्याय प्रक्रिया का वर्णन है जिसमें झूठी शिकायतों के लिए दंड का प्रावधान है। प्राचीन शास्त्रों में न्याय के सिद्धांतों में,एक स्पष्टता-कानून अस्पष्ट न हो, दूसरी निष्पक्षता- सबके लिए समान, तीसरा सामाजिक सद्भाव- कानून समाज को एकजुट रखने वाले हों और चौथा राज धर्म- न्यायाधीश निडर और निष्पक्षहो, का समावेश था। सुप्रीम कोर्ट का स्थगनादेश प्राचीन सिद्धांतों के भी पूर्णता अनुरूप है। प्राचीन न्याय शास्त्रों के प्रथम सिद्धांत स्पष्टता के दृष्टिगत मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य में ही अस्पष्ट कानून को दुरुपयोग का माध्यम माना गया है यूजीसी नियमों में रेगुलेशन 3(सी) को कोर्ट ने पूर्णता “वाग” बताया जो झूठी शिकायतों को बढ़ावा दे सकता है। नारद स्मृति में झूठी शिकायतों के लिए दंड का प्रावधान है जो यहां अनुपस्थित था।न्यायालय ने कहा कि ऐसे नियम व्यक्तिगत बदले की भावना से प्रयुक्त हो सकते हैं जो प्राचीन शास्त्रों के अनुसार न्याय की आत्मा के विरुद्ध है। यूजीसी का नियम प्राचीन न्याय शास्त्रों के द्वितीय निष्पक्षता और समानता के सिद्धांत के विपरीत है।कोर्ट ने भी अनुच्छेद 14 का उल्लेख करते हुए कहा की यह नियम केवल कुछ वर्गों को सुरक्षा देता हैं तथा सामान्य वर्ग को बाहर रखकर समानता के नियम का उल्लंघन करता है जो भेदभावपूर्ण है और समाज को विभाजित करने वाला है जबकि मनुस्मृति के अध्याय 8 के श्लोक 124 में न्याय में सबके लिए समान दंड का प्रावधान है। नारद स्मृति के अनुसार यह कानून की विफलता है। प्राचीन शास्त्रों ने सामाजिक सद्भाव व एकता को न्याय का तीसरा प्रमुख सिद्धांत माना है जो मुख्य न्यायाधीश के कथन में ध्वनित होता है कि 75 वर्षों की स्वतंत्रता के बाद भी ऐसे नियम समाज को पीछे धकेलते हैं क्योंकि इन नियमों के बाद देश में बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए और लोगों में कटुता की भावना दृष्टिगोचर हुई। मुख्य न्यायाधीश का वक्तव्य याज्ञवल्क्य के उदार दृष्टिकोण से मेल खाता है। न्यायालय ने अनुच्छेद 142 (Article 142) का उपयोग कर अंतिम आदेश दिया जो प्राचीन राजधर्म से मेल खाता है जहां राजा निडर होकर न्याय करता था क्योंकि मनुस्मृति के अनुसार “राजा बिना भय या पक्षपात के निर्णय ले।” कोर्ट ने पुराने 2012 के नियमों को जारी रखा जो स्पष्ट और निष्पक्ष हैं, यह प्राचीन शास्त्रों की परंपरा का भी पालन है। भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा यूजीसी नियमों पर लगाई गई रोक वर्तमान विधि नियमों के साथ प्राचीन न्याय शास्त्रों की दृष्टि से भी पूर्णता औचित्य पूर्ण है क्योंकि यह स्पष्टतः,निष्पक्षता और सामाजिक एकता के सिद्धांतों पर आधारित है जिसका मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य,नारद स्मृति में भी उल्लेख है। इससे स्पष्ट होता है कि हमें नियम बनाते समय प्राचीन सिद्धांतों का भी अवलोकन कर उनसे भी प्रेरणा लेनी चाहिए ताकि नियम अधिक स्पष्ट ,प्रभावी और सर्वमान्य बन सकें। लेखक: डॉ.चन्द्रप्रकाश शर्मा,पूर्व सलाहकार हिन्दी, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय, भारत सरकार निवास -नसीराबाद,मिलक, रामपुर (उ.प्र.)-243701 मोबाइल -8273463656

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