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गो रक्षा का संकल्प

January 28, 2026

गो रक्षा का संकल्प

सम्पादकीय
सर्वेश कुमार सिंह
First Publised on : 06 November 2016 Time: 22:11   Tags: Editorial, Sarvesh Kumar Singh
सात नवम्बर को ही इस साल •ाी गोपाष्टमी है। यह गो रक्षा के संकल्प का दिन है। इस दिन पचास साल पहले भी गोपाष्टमी थी। गाय के प्राणों की रक्षा के लिए इस दिन दिल्ली में संसद •ावन पर विशाल प्रदर्शन हुआ था। एक लाख से अधिक एकत्रित हुए संतों पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने गोली चलवा दी थी। अनेकों साधू और गो भक्त मारे गए थे। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह संत शक्ति का अभी तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन था। देश भर के साधू पुरी के शंकराचार्य निरंजनदेव तीर्थ और प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी करपात्री जी तथा सुशील मुनि के नेतृत्व में सात नवम्बर को संसद भवन पर एकत्रित हुए थे। संत समाज ने मांग की थी कि गो हत्या निषेध के लिए केन्द्रीय कानून बनाया जाए। संतों के बलिदान के पचास पूरे होने के बाद भी यह मांग ज्यों की त्यों बरकरार है। बल्कि गो हत्या पहले की तुलना में और अधिक बढ़ गई है। यांत्रिक कत्लखाने खोलकर निरीह गो वंश की हत्या की जा रही है। दस राज्यों में गो हत्या रोकने के लिए कोई कानून नहीं है। कुछ राज्यों ने पूर्ण तो कुछ ने आशिंक रूप से गो हत्या पर प्रतिबंध लगा है। केन्द्र सरकार को संविधान की भावना के अनुरूप केन्द्रीय कानून बनाकर देशभर में गो हत्या रोकनी चाहिए। संविधान का अनुच्छेद-48 स्पष्ट कहता है कि गो हत्या निषेध के उपाय किये जाएं। अनुच्छेद में कहा गया है ‘राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टत: गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारु और वाहक पशुओं की नस्लों के परीरक्षण और सुधार के लिए और उनकी हत्या का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा।’ गो हत्या रोकने के लिए केन्द्रीय कानून बनाने के अलावा यह भी आवश्यक है कि देश से गो मांस का निर्यात पूर्णत: प्रतिबंधित किया जाए, सामूदायिक चारागाह का विकास हो तथा इनसे अवैध कब्जे हटाए जाएं। राष्ट्रीय चारा नीति बने और कृषि नीति में पशुधन के समुचित संरक्षण के प्रावधान जोड़े जाएं। विदेश से आने वाले दूध पाउडर, बटर आयल के आयात पर रोक लगाई जाए। गो पालन पर किसानों को अनुदान प्रदान किया जाए। यह अनुदान किसानों को भारत सरकार द्वारा हाल ही में लगाए गए किसान सेस टैक्स से दिया जा सकता है। केन्द्र की वर्तमान भाजपा सरकार के पास स्पष्ट बहुमत है। वह यह काम कर सकती है। यदि केन्द्र सरकार संतों के बलिदान के पचास साल पूरे होने के अवसर पर गो हत्या निषेध का केन्द्रीय कानून बनाती है तो यह बलिदानी संतों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

सर्वेश कुमार सिंह, स्वतंत्र पत्रकार

January 4, 2026

इस्लामी एजेण्डे पर ममदानी

न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी के कुरान पर हाथ रखकर शपथ लेने के एक दिन बाद ही उनका इस्लामी एजेण्डा उजागर हो गया है। ममदानी ने दिल्ली हिंसा के आरोपी उमर खालिद से सहानुभूति दिखाकर और उसके लिए कुछ करने की मंशा जाहिर करके अपने सेकुलर चेहरे से नकाब हटा दिया है। ममदानी अमेरिका के सबसे बड़े शहर के पहले मुसलमान मेयर बनने के बाद भारत के अलगवादी और दिल्ली हिंसा के आरोपी उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल से 9 दिसम्बर को मिले थे। इस दौरान उन्होंने उमर के विचारों का समर्थन करते हुए एक पत्र लिखा था। यह पत्र मेयर पद की शपथ लेने के दिन ही वायरल हुआ है। मेयर ममदानी का हस्तलिखित ये पत्र जिसमें खालिद की तारीफ की गई है, बनो ज्योत्सना लाहिड़ी ने जारी किया है जोकि उमर की साथी है।  पत्र से जाहिर होता है कि मेयर का चुनाव जीतने के तुरंत बाद  वे अब पूरी तरह से एक मुसलमान नेता के तौर पर अपने एजेण्डे पर आ गए हैं। उनकी इस हरकत ने जहां वैश्विक इस्लामी सोच को उजागर किया है, वहीं उन भारतवंशी न्यूयार्कवासियों की भी आंखें खोल दी हैं, जिन्होंने मेयर के चुनाव में ममदानी का इसलिए समर्थन किया था, क्योंकि वे भारतीय मूल के मुसलमान हैं। वे उनमें एक अच्छे नेक, सच्चे, सेकुलर मुसलमान की छवि देख रहे थे। यदि भारतवंशी हिन्दू और सिखों ने न्यूयार्क मेयर के चुनाव में ममदानी का समर्थन नहीं किया होता तो वे इस अमरीकी सबसे बड़े शहर के मेयर शायद नहीं बनते। भारतवंशियों को सबसे पहला झटका तब लगा जब ममदानी ने एक जनवरी को कुरान पर हाथ रखकर शपथ ली। दूसरा झटका अगले ही दिन लगा, जब ममदानी का  दिल्ली हिंसा के मास्टरमाइंड जेल में बंद जवाहरलाल विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र उमर खालिद को सहानुभूति में लिखा पत्र वायरल हुआ। बनो ज्योत्सना लाहिड़ी ने एक्स पर पोस्ट किया है। उमर खालिद का समर्थन सिर्फ इसलिए किया गया है क्योंकि वह मुसलमान है। ममदानी को इससे कोई मतलब नहीं है कि दिल्ली के जिन दंगों में वह आरोपी है, उनमें 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक घायल हुए थे। इन दंगों में एक आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की भी हत्या हुई थी। इतने बड़े दंगे के आरोपी का समर्थन और उससे सहानुभूति व्यक्त करने का सिर्फ एक मात्र कारण वैश्विक इस्लामी एडेण्डा है। यह एजेण्डा हर स्तर पर चलाया जा रहा है चाहे वह पाकिस्तान हो, बंगलादेश हो, यूरोप या अमेरिका। इनका एकमात्र उद्देश्य इस्लामी वर्चस्व कायम करना है चाहे वह कैसे भी हो, वोट से हो या बुलेट से। बस इस्लामी राज्य कायम होने चाहिए। लेकिन, भारत के सेकुलर बने बहुसंख्यक आज भी इस एजेण्डे को समझने को तैयार नहीं हैं। वे इससे अपनी आंखें मूंदे हैं। आसन्न खतरे का भी कोई एहसास उन्हें नहीं है। जरूरत ऐसे छद्म सेकुलर ममदानियों से सावधान रहने की है। वे चाहे अमेरिका, यूरोप में हों या भारत में हों। उन्हें उनकी अपनी भाषा में ही उत्तर समझ में आता है।

October 24, 2025

ताकि, याद रहे विभाजन की विभीषिका

यह फैसला बहुत देर से आया, लेकिन आ गया। यह संतोष की बात है। उन बलिदानियों, त्यागियों और सर्वस्व न्यौछावर करने वालों का स्मरण अब सरकार भी करेगी, जिन्होंने विभाजन की विभीषिका को झेला था। भारत विभाजन के समय एक हिस्से के करीब एक करोड़ लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा था । लगभग 25 लाख लोगों को जानें गंवानी पड़ी थीं। सर्वाधिक अत्याचार उन हिन्दुओं और सिखों पर हुए थे, जोकि पाकिस्तान के हिस्से में गए भू-भाग में रह गए थे। हमें तो 15 अगस्त 1947 को विभाजन की कीमत पर स्वतंत्रता मिल गई थी। किन्तु 14 अगस्त को जो कुछ हुआ , उसे कदापि भुलाया नहीं जा सकता । पाकिस्तान के निर्माण की घोषणा होते ही पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान दोनों जगहों पर हिन्दुओं और सिखों पर हमले शुरु हो गए थे। उन्हें भगाया गया । वे अपना घर-बार, जमीन-जायदाद सभी कुछ छोड़ कर स्वतंत्र हुए भारत की और भाग रहे थे। लेकिन, उन्हें सम्मानपूर्वक भारत भी नहीं आने दिया जा रहा था। जिहादियों और उन्मादियों ने हिन्दुओं और सिखों से कह दिया था कि जवान बेटियों, बहुओं और महिलाओं को छोड़ कर जाएं। बहुत थोड़ा सा सामान लेकर, सब कुछ छोड़ कर लोग भागे थे। इनके घर मकान कब्जाने की होड़ मच गई थी। हालात इतने खराब थे कि 14 अगस्त से पहले ही लोगों ने हिन्दुओं और सिखों के घरों को चिन्हित करना शुरु कर दिया था, कि ये लोग भागेंगे, तो किस घर में कौन रहेगा। कितने ही सम्पन पंजाबी और सिन्धी परिवारों ने अपने लाखों करोड़ों के कारोबार, दुकानें सब छोड़कर बैलगाडियों का सहारा लिया था । लेकिन, उन्हें रास्ते भर लूटा गया था । उनसे स्त्रियों को छीना गया था । तमाम लोगों ने अपनी और बेटियों की इज्जत बचाने के लिए अपने हाथों ही बेटियों को मार डाला था। ट्रेन भर कर लाशें भेजने की घटना को कैसे भुलाया जा सकता है। पाकिस्तान की नवगठित सरकार के प्रतिनिधि हाथ पर हाथ रखकर और आंखें मूंद कर बैठ गए थे। मुस्लिम लीग और कांग्रेस के उन मुस्लिम नेताओं की जुबानें सिल गई थीं, जोकि भारत विभाजन से पहले यह भरोसा दिला रहे थे कि नए बनने वाले देश पाकिस्तान में हिन्दु और सिखों को पूरी सुरक्षा दी जाएगी। हो रहे अत्याचारों को रोकने की बात तो दूर, ये लोग इनकी निंदा करने को भी तैयार नहीं थे। लार्ड माउंटबेटन ने भारत को उसके भाग्य पर छोड़ दिया था । भारत का नेतृत्व स्वतंत्रता का जश्न मनाने व्यस्त था । विस्थापन का दंश झेल कर भारत आ रहे लोगों की सुधि लेने की किसी को फुरसत नहीं थी। जिसे जहां जगह मिली, वह रहा। सड़कों पर, धर्मशालाओं में, मन्दिरों और गुरुद्वारों में लोगों ने शरण पायी थी। सरकारी स्तर पर किये गए प्रयास नाकाफी थे। विस्थापित होकर आये परिवारों ने मजदूरी की थी, बाजारों में साइकिलों से कपड़ा बेचा था। फेरियां लगाईं थी। जो लाहौर और करांची में लाखों करोड़ों के कारोबार करते थे वे दिहाड़ी मजदूर बन गए थे। बड़े किसानों के खेतों में फसले काट रहे थे। यह दंश झेला उस आबादी ने जो मांग रहे थे आजादी और मिला कभी ना भुला पाने वाला दंश। इतने सब के बाद भी जो लोग पाकिस्तान में रह गए। वे आज तक दंश झेल रहे हैं। पाकिस्तान निर्माण के समय वहां 21 प्रतिशत आबादी हिन्दू और सिखों की थी। आज दो प्रतिशत से भी कम है। कहां गए ये 21 प्रतिशत, कोई है दुनिया में पूछने वाला । या तो जबरन इस्लाम में परिवर्तित कर दिये गए, या मार दिये गए। अथवा उन्हें पाकिस्तान से भागना पड़ा है। कोई दिन ऐसा नहीं होता जब पाकिस्तान में किसी हिन्दू या सिख लड़की का अपहरण और जबरन निकाह ना होता हो। विभाजन की विभीषिका का यह दंश सतत है। अविराम है, यह रुकने वाला नहीं है। जब तक भारत अखंडता के संकल्प को लेकर एक बार फिर खड़ा नहीं होता। हम अखंड भारत दिवस के रूप में 14 अगस्त को मनाते रहे हैं। और, मनाते रहेंगे, क्योंकि यही दिन था , जब हमारा एक बड़ा भू-भाग दो राष्ट्र के सिद्धान्त के आधार पर इस्लामी राष्ट्र के रूप में परिर्वतित हो गया था । अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 14 अगस्त 2021 को यह घोषणा कर दी है कि ‘देश हर साल विभाजन विभीषिका दिवस के रूप में इस दिन को मनाएगा’। इससे यह सुनिश्चित हो जाएगा कि हमें अब हर साल और हमेशा इस दिन को याद करना है, उन बलिदानियों, त्यागियों का पुण्य स्मरण करना है। श्रद्धांजलि देनी है जिनके कष्टों और असहनीय पीड़ा की कीमत पर हम स्वतंत्र हुए थे। राष्ट्र ने उन लोगों का स्मरण करके कृतज्ञता प्रकट करने का दायित्व 75 साल बाद निभाया है। प्रधानमंत्री जी इस निर्णय के लिए साधुवाद के पात्र हैं।

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