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हिंदी पत्रकारिता की सत्यनिष्ठा और स्वाभिमान के दो सौ साल

May 30, 2026

हिंदी पत्रकारिता की सत्यनिष्ठा और स्वाभिमान के दो सौ साल

Ratibhan Tripathi Senior Journalist
-रतिभान त्रिपाठी

आज देश भर की हिंदी पट्टी में हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे होने का उत्सव मनाया जा रहा है। हम सब पत्रकार इस सुअवसर के साक्षी हैं और सौभाग्यशाली भी, कि हम सब हिंदी पत्रकारिता के संघर्ष में सहभागी हैं। दो सौ साल पहले 30 मई 1826 को कलकत्ता के अमरतल्ला मुहल्ले के मकान नंबर 37 में छोटे से दफ्तर से पंडित युगल किशोर सुकुल ने हिंदी का अखबार निकाला था, जिसका नाम था उदन्त मार्तण्ड। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में यह अखबार भारत में हिंदी के पहला अखबार के रूप में दर्ज है। यह कम दिलचस्प नहीं कि वाराणसी से 1845 में प्रकाशित हुए “बनारस अखबार” को बरसों तक हिंदी का पहला अखबार माना जाता रहा है लेकिन यशस्वी साहित्यकार और संपादक ठाकुर प्रसाद सिंह ने 30 मई 1976 को लखनऊ में एक बड़ा आयोजन कर घोषित किया कि हिंदी का पहला अखबार “उदन्त मार्तण्ड” है जो 30 मई 1826 को कलकत्ते से निकला था। उसके बाद ही वह अवस्थापना ध्वस्त हुई कि “बनारस अखबार” हिंदी का पहला अखबार है।

बहरहाल, इन दो सौ सालों के कालखण्ड में हिंदी पत्रकारिता अनेकानेक मोड़ों और संघर्षों से गुजरी है। भारत का जनमानस इसका साक्षी है। उदन्त मार्तण्ड के संस्थापक और संपादक पंडित युगल किशोर सुकुल जो मूलतः कानपुर के निवासी थे, ने अपने अखबार की स्थापना इसलिए नहीं की थी कि उन्हें मशहूर होना है, प्रतिष्ठा पानी है या कोई बिजनेस करना है। उन्होंने अखबार इसलिए शुरू किया था वह भारतीय आत्मा की आवाज को अपनी पूरी क्षमता के साथ लोगों तक पहुंचाएं, उन्हें जगाएं और जो हिंदी देश के बहुसंख्यक समुदाय की भाषा है, वह मुखरित हो, उसका संदेश जन-जन तक पहुंचे। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोई आवाज तो उठे। देर सबेर ही सही, भारत की आत्मा की आवाज जरूर गूंजेगी और गुलामी से मुक्ति मिले क्योंकि पत्रकारिता का चरम लक्ष्य अन्याय, अत्याचार, शोषण आदि के विरुद्ध मुखर होकर सच के पक्ष में खड़े होना है। यह बात अलग है कि एक लंबे कालखण्ड से उपरोक्त चरम लक्ष्य की दिशा बदल गई है या भटक गई है।

कल्पना कीजिए कि जिस युग में पंडित युगल किशोर सुकुल ने उदन्त मार्तण्ड के साथ पत्रकारिता की आवाज बुलंद की थी, वह बहुत कम पढ़े लिखों का समय था। भारत में गरीबी थी, भूख थी, अकाल थे, महामारियां थीं और अंग्रेजों की क्रूर हुकूमत थी। अंग्रेजों के राज में हिंदी का परचम लहराना अपने आप में अपराध कहा जा सकता था, भले ही अपनी हुकूमत चलाने के लिए हिंदी जानना अंग्रेजों की मजबूरी रहा हो या भारतीय अभिजात्य वर्ग को आगे करके उसी के सहारे हिंदी का आश्रय लेने की परिस्थिति रही हो। ऐसे में हिंदी पत्रकारिता करना कोई हंसी-खेल तो नहीं ही था, वह भी संसाधनविहीन एक सामान्य जन के लिए। लेकिन सुकुल जी ने हिम्मत जुटाकर यह काम शुरू किया। संसाधनविहीनता का ही परिणाम हुआ कि उदन्त मार्तण्ड दो साल के भीतर ही बंद करना पड़ा। लेकिन सुकुल जी ने हिंदी पत्रकारिता की जो लौ जलाई वह आज पूरे भारत को रोशन कर रही है।

यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस का इतिहास हिंदी के स्वाभिमान का इतिहास है। हिंदी की आत्मा के उत्कर्ष और उसकी चेतना के जन-जन में व्यापने का इतिहास है। जिस दौर में हिंदी पत्रकारिता जन्म ले रही थी, वह हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान की गुलामी का दौर था। उस समय तो जन-मानस में यह बात थी भी नहीं कि एक दिन भारत गुलामी से मुक्त होकर आत्मनिर्भर और स्वतंत्र होगा, पर पंडित युगल किशोर सुकुल के मन में कहीं न कहीं उसका बीजारोपण जरूर हो चुका था। यदि ऐसा न होता तो वह अखबार शुरू ही न करते। अब हम जिस दौर में जी रहे हैं, वह हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान का एक बेहतरीन दौर है। हिंदी स्वाभिमानिनी भाषा हो चुकी है। वह अपराधबोध की ग्रंथि से बाहर अपने चरम वैभव की ओर है और यह पत्रकारिता के लिए आत्ममंथन का दौर भी है। न केवल हिंदी पत्रकारिता के लिए बल्कि सभी भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी पत्रकारिता के लिए भी, कि वह जो कर रही है, कितना उपयुक्त, कितना युगांतरकारी और कितना सार्थक है।

राजनीतिक कलाबाजों के वर्ग की बात छोड़ दें तो देश दुनिया का एक बड़ा वर्ग है जो हिंदी अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के प्रति बहुत कम सद्भावना रख रहा है। यदि यह कहा जाए कि दुर्भावना रख रहा है तो ग़लत न होगा। वो राजनीतिक कलाबाज भी नहीं जो सत्ताओं से दूर हैं या वो राजनीतिक कलाबाज भी जो सच से ताल्लुक रखने की कोशिश करते हैं। इन हालात में अखबार हों, टेलीविजन चैनल हों या फिर डिजिटल मीडिया के रणबांकुरे, सबके लिए आत्ममंथन और गंभीरता से चिंतन करने का समय है। हिंदी पत्रकारिता के संस्थापकों और बाद सौ बरस के पत्रकारों की त्याग तपस्या इन हालात के लिए नहीं थी। उस समय भाषा गढ़ी जा रही थी। खड़ी बोली खड़ी हो रही थी। अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए संकल्पों के विकल्प सीमित थे। धन वैभव की लालसा हर युग में रही है, जाहिर है दो सौ साल पहले भी रही होगी लेकिन सत्यनिष्ठा और स्वाभिमान के संकल्प उससे भी अधिक मजबूत थे , इसीलिए अखबार नहीं चला, न चले लेकिन पंडित युगल किशोर किसी साहूकार या हुकूमत के सामने स्वाभिमान गिरवी रखने नहीं गए। उस युग में पत्रकारिता के लिए यह परिभाषाएं नहीं थीं कि पत्रकारिता चलती रहे, भले ही स्वाभिमान गिरवी रखना पड़े। भले ही आत्मा की आवाज को हवा में उड़ने दिया जाए।

दो सौ साल बाद उदन्त मार्तण्ड और पंडित युगल किशोर सुकुल को याद करना, हिंदी पत्रकारिता भर को याद करना नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास को याद करना है जिससे संकल्प गढ़े जा सकते हैं, आत्मसंयम बनाया और बचाया जा सकता है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना
भाषा के प्रति आत्मीयता और उसके पराक्रम को याद करना है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना उस सत्य को याद करना है जिसके बलबूते पत्रकारिता को सम्मान और गौरव मिला है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना हिंदी संसार को विकसित कर वैश्विक बनाने की मानसिकता को याद करना है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना उस रचनात्मकता को याद करना है जिन संकल्पों से सिद्धि मिलती है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना उन संपादकों और पत्रकारों की भावनाओं को याद करना है जिनके मन में देश और समाज को उस दिशा में ले जाने का संकल्प था जहां वैभव के साथ सत्य न्याय और धर्म का निश्छल आचरण स्पष्ट रूप से दिखाई दे। लेकिन इस दौर में उपरोक्त बातों का स्थान कहां और कितना है, यह सुधी पत्रकारों को स्वयं समझना और तय करना है। उदन्त मार्तण्ड को याद करते हुए हमें आशा और विश्वास बनाए रखना है। यह निराश होने का समय नहीं है, देश और समाज की उम्मीदों को फलीभूत होने देने का समय है।

भारत में हिंदी पत्रकारिता की जिम्मेदारी अन्य भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के मुकाबले कहीं ज्यादा है। अर्जुन को कर्मयोग की शिक्षा देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने
श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के 21वें श्लोक में कहा है – यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।। यह बात हिंदी पत्रकारिता पर विशेष रूप से लागू होती है। चूंकि हिंदी अपने को अन्य भारतीय भाषाओं की बड़ी बहन मानती है इसलिए उसकी जिम्मेदारी भी बड़ी है। वह जो आचरण करेगी, माना जाएगी कि दूसरी भाषाएं भी वैसा कर सकती हैं। इसलिए हिंदी पत्रकारिता में जहां कहीं खोट, खामी, खराबी, गिरावट आदि दिखती हो, उसे वहीं सुधारे, तब तो बात है। और कहने में संकोच नहीं कि खामी खराबी ने घर बना लिया है। उसे हटाकर ही गरिमा और गौरव हासिल किया जा सकता है। सम्मान चाटुकारिता से नहीं, सच्चाई के साथ रहकर स्वाभिमानी होने से मिलता है। और हां, सम्मान मिले न मिले, अपनी आत्मा न धिक्कारे, वही आचरण हिंदी पत्रकारिता को करना है।

यह इस बहस में उलझने का समय नहीं है कि अखबार सही हैं, चैनल गलत हैं। चैनल सही हैं डिजिटल मीडिया गलत है। डिजिटल मीडिया सही है, अखबार गलत हैं। समय यह भी नहीं कहता है पत्रकारिता में पैसा नहीं है। जीवनयापन के लिए कुछ न कुछ करना है। ऐसी दलीलें पेश करने वालों को पत्रकारिता के क्षेत्र में एक पल भी रहने का अधिकार नहीं है। पत्रकारिता बेशक पेशा है लेकिन यह कंटेंट यानी तथ्यों का पेशा है। तथ्य गलत हों पत्रकारिता खारिज समझिए। कृष्ण बिहारी नूर का वो शेर याद कीजिए – सच घटे या बढ़े तो सच न रहे, झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं! इसलिए ऐसी दलीलें और गवाहियां देने वाले पत्रकारिता के लिए हो ही नहीं सकते हैं, भले ही वह कोई और काम कर लें। यदि न्याय बिकने लगे, पत्रकारिता बिकने लगे तो आजादी की लड़ाई के दौर में प्रयागराज से प्रकाशित होने वाले “स्वराज” अखबार की उस घोषणा का क्या अर्थ रह जाता है जिसमें कहा गया था कि हमें आवश्यकता है एक ऐसे संपादक की जिसे खाने के लिए दो रोटियां और पीने के लिए एक गिलास पानी मिलेगा लेकिन हर संपादकीय पर जेल जाने के लिए तैयार रहना होगा। याद कीजिए उन संकल्पवानों के संकल्प को कि उस समय एक-एक करके आठ संपादकों को जेल जाना पड़ा। यदि वह भी वैसी दलीलें पेश कर रहे होते भला सौ साल बाद हम उन्हें क्यों याद कर रहे होते।

कहा जा सकता है कि वह दौर अलग था। आवश्यकताएं और इच्छाएं कम थीं, इसलिए उस समय के लोग वैसा कर पाए। यह बात आत्मतोष के लिए हो सकती है, सच नहीं। आज का दौर भी वैसा ही है, बस संदर्भ बदल गए हैं। बदले संदर्भों में हिंदी पत्रकारिता का दायित्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। उसकी व्यापकता बढ़ गई है, उसका संसार बढ़ गया है। इसलिए किसी भी पत्रकार को कोई उपदेश नहीं देना है। सबको संकेत देना है और कर्तव्य को बारंबार याद दिलाना है। उदन्त मार्तण्ड जो बीजारोपण कर गया है, उसकी रक्षा करते हुए फलीभूत करते रहना है ताकि हिंदी पत्रकारिता के हमारे पुरखों की आत्मा सुकून में रहे। उन्होंने जो लौ जलाई थी, वह जाज्ज्वल्यमान रहे और हिंदी संसार का गौरव बढ़ता रहे।
हिंदी पत्रकारिता के इन दो सौ सालों की यात्रा के लिए आपको, हमको और सबको बहुत बहुत बधाई।

सुविधा। वन्दे भारत एक्सप्रेस का तीन जून से शाहजहांपुर में ठहराव

Rail

लखनऊ-देहरादून वंदे भारत ट्रेन में एक ठहराव बढ़ा
शाहजहांपुर में 3 जून को स्टेशन पर उद्घाटन समारोह की तैयारी

सांसद,विधायक समेत रेल अधिकारी दिखाएंगे हरी झंडी

लखनऊ से शाहजहांपुर-22545
समय- 7.34-7.38,

देहरादून से —
शाहजहांपुर- 22546
समय 20.04-20.06

मुरादाबाद। उप्र समाचार सेवा

आधुनिक व तेज रफ़तार वंदे भारत एक्सप्रेस के यात्रियों को नई सुविधा मिलने देने जा रही है। लखनऊ से देहरादून के बीच चलने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन में एक और ठहराव बढ़ा है।ट्रेन 3 जून से शाहजहांपुर स्टेशन पर भी रुकेंगी। इससे शाहजहांपुर में यात्रियों को दून तक ट्रेन कनेक्टिविटी मिलेगी।

बुधवार को ट्रेन के पहले ठहराव पर उद्धघाटन कार्यक्रम की तैयारी है।सांसद, विधायक समेत जनप्रतिनिधि हरी झंडी दिखाएंगे। मंडल रेल अधिकारी उद्घाटन की तैयारी में जुटे है।

मंडल में चलने वाली वंदे भारत एक्सवप्रेस ट्रेन में एक और स्टापेज का निर्णय लिया गया है।रेल मुख्यायल ने लखनऊ -देहरादून वंदे भारत शाहजहांपुर स्टेशन पर रुकेंगी।
लखनऊ से वंदे भारत अब बरेली से पहले शाहजहांपुर में भी रुकेंगी। इससे शाहजहांपुर के यात्रियों को देहरादून जाना आसान रहेगा।इसी तरह वापसी में देहरादून-लखनऊ जाने वाली ट्रेन का शाहजहांपुर में रात 8 बजे निर्धारित किया गया है।

सांसद,विधायक दिखाएंगे ट्रेन को हरी झंडी—

3 जून को ट्रेन का शाहजहांपुर विधिवत रुप से पहली बार ठहराव होगा।सांसद जतिन प्रसाद, विधायक मिथलेश कठेरिया व अन्य जनप्रतिनिधि भी ट्रेन को पहली बार शाहजहांपुर से हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। रेल प्रशासन उदघाटन कार्यक्रम की तैयारी में जुटा है।

वंदे भारत के सफर में दो स्टेशन और जुड़े —
ट्रेन का नजीबाबाद के बाद अब शाहजहांपुर भी शामिल किया गया है।
रेल मुख्यालय ने यात्रियों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए वंदे भारत ट्रेन के दो और
स्टापेज बढ़ाएं है। इस नए ठहराव से ट्रेन की ऑक्यूपेंसी भी बढ़ने से रेल राजस्व में वृद्धि होगी।

वर्जन-
लखनऊ-देहरादून वंदे भारत एक्सप्रेस 3 जून से शाहजहांपुर में भी रुकने लगेगी। वंदे भारत का शाहजहांपुर में आने जाने का समय निर्धारित कर लिया गया है। इस स्टेशन पर ट्रेन का दो मिनट का ठहराव रहेगा। इससे यात्रियों की ट्रेन की कनेक्टविटी भी बढ़ेगी।

महेश यादव सीनियर डीसीएम

रेल प्रशासन ने जिस विजिलेंस अफसर की घंटों की आवभगत, आखिरकार फर्जी निकला

युवक ने स्टेशन पर रौब झाड़ा मुआयना किया, आदर-सत्कार कराया,वीआईपी रूम में
नाश्ता खाया

मुआयना के लिए लिंक एक्सप्रेस में सेकंड एसी से रवाना, बाद में एक अधिकारी को सीधे सस्पेंड की धमकी से खुली फर्जीवाड़े की पोल
नजीबाबाद में पूछताछ में अफसर नहीं आईडी दिखा पाया,जीआरपी ने गिरफ़तार किया सीआईटी ने आईडी पूछी तो नकली निकला,पुलिस ने किया गिरफ़तार

Post on 29.5.29
Friday Moradabad
Rajesh Bhatia, Time 10.00 pm
मुरादाबाद,उप्र समाचार सेवा

मुरादाबाद स्टेशन पर रेलवे बोर्ड के विजिलेंस अफसर की एक मौजूदगी से रेल प्रशासन घंटों हलकान रहा। अफसर के रेलवे स्टेशन पहुंचने से अधिकारियों के हाथ पैर फूल गए।अफसर ने भी अपने रुतबे का रौब गांठा। स्टेशन देखा।अन्य‍ विभागों का निरीक्षण किया। खामी मिलने पर हड़काया। जिम्मेदारों ने भी अहमियत दी। वीआईपी रूम में पूरे प्रोटोकॉल के संग नाश्ता कराया। अफसर ने नजीबाबाद जाने की इच्छा जताई। तो लिंक एक्सप्रेस के सेकंड एसी कोच में बैठाकर रवाना किया।हालांकि बाद में मामले की भनक लगी तो पूछताछ हुई।अफसर को फर्जी मानते हुए रेल प्रशासन ने नजीबाबाद में जीआरपी के हवाले कर दिया गया।

शुक्रवार को मुरादाबाद में जावेद अली नाम के व्यक्ति ने रेलवे बोर्ड में विजिलेंस अफसर बताकर चार घंटों तक रेल प्रशासन को छकाए रखा।स्‍टेशन अधिकारी भी उसके आदेश का हाथ बांधे पालन करते रहे।अफसर ने स्टेशन, प्लेटफार्म का मुआयना किया। स्टेशन पर विभागों को देखा। कमी पर कार्रवाई की धौंस दी। जावेद अली को बोर्ड अफसर मानते हुए स्‍टेशन अधिकारी, चेकिंग स्टाफ समेत अन्य विभागीय स्टाफ उसका आदेश मानते हुए आगे पीछे दौड़ता रहा। नकली अफसर ने भी कमी नहीं छोड़ी।वीआईपी रूम में बैठकर छक कर नाश्ता डकारा।अफसर ने नजीबाबाद में मुआयना करने को कहा तो आनन फानन में लिंक एक्सप्रेस 14113 में सेकंड एसी कोच में बर्थ दी।अफसर भी ठाठ से नजीबाबाद के लिए रवाना हो गए।इस बीच सुबह अन्य अफसरों को सारा वाकया बताया गया। मामले की सुगबुगाहट रेल अफसरों को मिली तो पूछताछ शुरु हुई।ट्रेन में सवार अफसर ने ही पूछताछ कर रहे एक जिम्‍मेदार को ही सीधे बोर्ड के शीर्ष अधिकारी के नाम का हवाला देते हुए सस्पेंड कराने की धमकी दी। इसी पर शक हुआ। नजीबाबाद में इस अफसर से आईडी मांगी तो वह सकपका गया। बाद में स्टेशन अधिकारियों ने उसे जीआरपी के हवाले कर दिया गया। अब जीआरपी ने जावेद अली से पूछताछ में जुटी है।

वर्जन।–
सीनियर डीसीएम महेश यादव का कहना है कि विजिलेंस का अफसर का बताने का मामला सामने आया है। पड़ताल के बाद नजीबाबाद में उसे पकड़ा गया। जीआरपी पूछताछ कर रही है।

May 29, 2026

स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर मलखान सिंह की प्रतिमा का अनावरण

सेंगर समाज की दशकों पुरानी मांग हुई पूरी, भव्य समारोह में उमड़ा जनसैलाब

हाथरस। प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह द्वारा शुक्रवार को कैलौरा चौराहे पर महान स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर मलखान सिंह की प्रतिमा का अनावरण किया गया। लंबे समय से चली आ रही सेंगर समाज की मांग को सदर विधायक अंजुला सिंह माहौर के प्रयासों से साकार रूप मिलने पर समाज के लोगों में भारी उत्साह दिखाई दिया।कार्यक्रम के दौरान मंच से वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 2022 में सदर विधायक बनने के बाद अंजुला सिंह माहौर ने सेंगर समाज से किया गया वादा निभाते हुए इस ऐतिहासिक कार्य को पूरा कराया है। कार्यक्रम में “रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाए” के उद्घोष के साथ समाज के लोगों ने जोरदार तालियों से स्वागत किया।समारोह में मुख्य अतिथि पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह का सदर विधायक अंजुला सिंह माहौर द्वारा पटका एवं 51 किलो की विशाल फूलमाला पहनाकर भव्य स्वागत किया गया। वहीं सेंगर समाज की ओर से भी स्मृति चिन्ह भेंट कर उनका अभिनंदन किया गया।कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि “अलीगढ़ केसरी” के नाम से विख्यात ठाकुर मलखान सिंह महान स्वतंत्रता सेनानी, प्रख्यात शिक्षाविद, सफल अधिवक्ता एवं समर्पित समाजसेवी थे। स्वतंत्रता आंदोलन में अलीगढ़ और हाथरस क्षेत्र में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसके कारण आज भी उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।बताया गया कि प्रतिमा उत्तर प्रदेश पर्यटन एवं संस्कृति विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई, जबकि चौराहे का निर्माण सदर विधायक निधि से कराया गया। लोगों ने इसे क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत और स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम बताया।इस अवसर पर सांसद अनूप प्रधान, सिकंदराराऊ विधायक वीरेंद्र सिंह राणा, सादाबाद विधायक प्रदीप कुमार गुड्डू, भाजपा जिलाध्यक्ष प्रेम सिंह कुशवाह, पूर्व जिलाध्यक्ष गौरव आर्य, जिलाधिकारी अतुल वत्स, पुलिस अधीक्षक चिरंजीवी नाथ सिन्हा, मुख्य विकास अधिकारी सहित अनेक जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी मौजूद रहे।कार्यक्रम में भाजपा मंडल अध्यक्ष योगेश सेंगर, राजपाल सिंह, केपी सिंह, प्रमोद मदनवत, प्रमोद सेंगर, धर्मेश सेंगर, हेमंत सेंगर, अनिल सेंगर, सुनीता सिंह, रोरन सिंह, ललिता सेंगर, सुनील सेंगर सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित रहे।

UP: उपज के तत्वावधान में आयोजित होंगे हिंदी पत्रकारिता दिवस समारोह

Uttar Pradesh Association of Journalists (UPAJ)

लखनऊ, 29 मई, 2026 (उपज समाचार).। उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (उपज) के तत्वावधान में 30 मई शनिवार को प्रदेश भर में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने पर वृहद स्तर पर आयोजन होंगे। इन समारोहों में हिंदी पत्रकारिता में योगदान करने वाले वाले वरिष्ठ पत्रकारों का सम्मान किया जाएगा।

प्रदेश महामंत्री आनंद कर्ण ने बताया कि उपज की वाराणसी, भदोही, अम्बेडकरनगर, मेरठ, मथुरा, बागपत और मुरादाबाद जिला इकाइयों द्वारा 30 मई को कार्यक्रम आयोजित किए गए है।

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