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लोकतंत्र में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका: सांसद तेजवीर सिंह चौधरी

May 30, 2026

लोकतंत्र में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका: सांसद तेजवीर सिंह चौधरी

उपज ने मनाया 200वां हिंदी पत्रकारिता दिवस
मथुरा। उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट (उपज) मथुरा के तत्वावधान में शनिवार को 200वां हिंदी पत्रकारिता दिवस, विचार गोष्ठी एवं सम्मान समारोह का भव्य आयोजन एक स्थानीय होटल में किया गया। कार्यक्रम में हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली 200 वर्षों के इतिहास, वर्तमान चुनौतियों और लोकतंत्र में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका पर विस्तृत चर्चा की गई।
कार्यक्रम में आयोजक एवं उपज जिलाध्यक्ष अतुल कुमार जिंदल ने मुख्य अतिथि राज्यसभा सांसद तेजवीर सिंह चौधरी, विशिष्ट अतिथि बलदेव विधायक पूरन प्रकाश, वरिष्ठ पत्रकार डॉ. प्रसून शुक्ला, उपज प्रदेश महामंत्री आनंद कर्ण, बलदेव ब्लॉक प्रमुख प्रतीक भरंगर, प्रदेश कोषाध्यक्ष बालमुकुंद तिवारी सहित अन्य अतिथियों का पटुका ओढ़ाकर एवं राधा-कृष्ण का छायाचित्र भेंट कर स्वागत एवं सम्मान किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि राज्यसभा सांसद तेजवीर सिंह चौधरी द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो समाज को जागरूक करने, जनसमस्याओं को उठाने और शासन-प्रशासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का महत्वपूर्ण कार्य करता है।
विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की गौरवशाली यात्रा को याद करते हुए पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, डिजिटल युग की चुनौतियों तथा निष्पक्ष एवं जनहितकारी पत्रकारिता की आवश्यकता पर अपने विचार रखे। साथ ही पत्रकारों के मानदेय, सुरक्षा एवं अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर भी गंभीरता से प्रकाश डाला गया।
समारोह के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाले पत्रकारों एवं समाजसेवियों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार सी.पी. सिकरवार, हेमंत अग्र हरि,विजय सिंघल, अनुज उपमन्यु, ऋषि पंडित सहित जिले भर के पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि एवं गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन केशवानंद त्रिपाठी ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन उपज के कोषाध्यक्ष विपिन अग्रवाल एवं अन्य पदाधिकारियों द्वारा व्यक्त किया गया। समारोह सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।

पुलिस पर जानलेवा हमले में तीन दोषियों को सजा

दो को 4-4 व एक को एक साल की सजा, तीनों पर उत्तराखंड में भी अपराधिक मामले
फास्ट ट्रैक कोर्ट-2 ने सुनाया निर्णय
Post on 30.5.26
Saturday Moradabad
Rajesh Bhatia,Time 6.45 pm

मुरादाबाद,उप्र समाचार सेवा

उत्तराखंड में वांछित अपराधी रहे तीन बदमाशों को पुलिस पार्टी पर हमले में दोषी करार दिया गया है।आरोपियों के खिलाफ दर्ज केसों की सुनवाई करते हुए फास्ट ट्रैक कोर्ट-2 धीरेन्द्र सिंह ने साक्ष्यों के आधार पर दोषी मानाऔर सजा सुनाई। इनमें दो को 4-4 और एक दोषी को एक साल की सजा मिली है।

19 दिसंबर,15 को कटघर क्षेत्र में डीयर पार्क के पास रफातपुर रोड की घटना है।कटघर पुलिस को बदमाशों का सुराग मिला। पुलिस मौके की तलाश में जुट गई।डीयर पार्क पर रफातपुर रोड पर बदमाशों की लोकेशन मिलीं।पुलिस टीम ने घेराबंदी की।टीम देख बदमाशों ने पुलिस पर फायरिंग की।इस दौरान पुलिस ने हमलावरों को घेरते हुए गिरफ्तार कर लिया।

मामले की सुनवाई एफटीसी कोर्ट-2 धीरेन्द्र सिंह की अदालत में हुईं।विशेष लोक अभियोजक महेंद्र सिंह कश्यप ने बताया कि अदालत में पुलिस रिपोर्ट व आरोपियों की अपराधिक मामलों से जुड़े साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने तीनों को दोषी ठहराया और सजा सुनाई। मूंढापांडे के आसिफ और अनमोल को पुलिस पर हमले में
चार चार साल और एक दोषी आशु को एक साल की सजा मिली। प्रत्येक दोषी पर ढाई हजार रुपए का जुर्माना लगाया।

वाराणसी के पत्रकारों के लिए बनेगा मीडिया हाउस: मंत्री हंसराज विश्वकर्मा

Posted on 30.05.2026 Time 10.00 PM

सरकार से पत्रकारों व समाचार पत्र कर्मियों के लिए कैश लेश चिकित्सकीय सुविधा की उठी मांग
– उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स द्वारा हिंदी पत्रकारिता दिवस का आयोजन
वाराणसी 30 मई 2026, वाराणसी के पत्रकारों हेतु मीडिया हाउस बनवाने का आश्वासन उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री हंसराज विश्वकर्मा ने दिया है। वह शनिवार को उत्तर प्रदेश एसोसिएशन आफ जर्नलिस्ट उपज वाराणसी इकाई द्वारा आज हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे। इसके साथ ही उन्होंने पत्रकारों के हितार्थ अपना सहयोग देने को कहा।
शिवपुर स्थित होटल रवींद्राया रेसिडेंसी में आयोजित पत्रकारिता दिवस पर काशी के मूर्धन्य पत्रकारों का सम्मान भी किया। जिसमें वरिष्ठ पत्रकार शुभकार दुबे, सुरेश प्रताप सिंह, योगेश कुमार गुप्त, विकास पाठक, शरद वाजपेयी एवं प्रदीप उपाध्याय को पत्रकारिता शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया।
मुख्य अतिथि ने कहा कि पत्रकारों की जो भी समस्याएं हैं उसको प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री तक पहुंचा कर उसे पूरा करने का प्रयत्न किया जाएगा उन्होंने उपज के महामंत्री मोनेश श्रीवास्तव से कहा कि वह एक प्रतिवेदन तैयार
कर उन्हें दे जिसे वे प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री तक प्रेषित कर उसे क्रियान्वित कराने का प्रयास करेंगे।
अपने उद्बोधन में विशिष्ट अतिथि कांची कामकोटि पीठ के प्रतिनिधि श्री बी एस सुब्रह्मण्यम मणि ने कहा कि जिस प्रकार भगवान भास्कर के दर्शन कर हम दिन की शुरुवात करते है,उसी प्रकार सुबह समाचार पत्रों के माध्यम से हमें देश विदेश की गतिविधियों से अवगत होते है। इसमें पत्रकारों की भूमिका अहम हो जाती है।
मुख्य वक्ता बीएचयू पत्रकारिता विभाग के आचार्य बाल लखेंद्र जी ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के लिए अंग्रेजियत छोड़नी होगी। आज पूरे देश में हिंदी पत्रकारिता अपना एक महत्वपूर्ण साख रखती है।
विशिष्ट अतिथि पूर्व विधान परिषद सदस्य श्री चेत नारायण सिंह ने कहा कि पत्रकारिता आज जोखिम का कार्य हो गई है फिर भी दुर्भाग्य है कि पत्रकारों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था आज भी नहीं है। उपज अध्यक्ष विनोद बागी ने मंत्री के समक्ष मांग रखी कि जिस प्रकार सभी को चिकित्सा सुविधा सरकार प्रदान कर रही है लेकिन आज पत्रकारों को कोई चिकित्सीय सुविधा न देना बहुत ही दुर्भाग्य है। सरकार से कैश लेश चिकित्सकीय सुविधा देने की मांग की गई।
इस अवसर पर विश्व प्रसिद्ध तबला वादक पंडित अशोक पांडे का तबलावादन एवं वायलिन पर संगति पंडित सुखदेव मिश्र जी ने की उन्होंने लोगों का मंत्र मुग्ध का दिया।
कार्यक्रम का संचालन महामंत्री ने, स्वागत उद्बोधन डॉ अरविंद कुमार सिंह ने एवं धन्यवाद उपाध्यक्ष अनिल जायसवाल जी ने किया।

लोकतंत्र की सुरक्षा में पत्रकारिता की अहम भूमिका

Dileep Shrivastava Journalist

पत्रकारिता दिवस पर विशेष-

पत्रकारिता कभी एक मुकद्दस किताब थी, पढ़ने लगे लोग उपन्यासों की तरह
भारत में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे

दिलीप कुमार श्रीवास्तव
पत्रकारिता एक ऐसी विधा है,जो जनसाधारण व सरकार के बीच बेहतर समंजस ही नही करती बल्कि लोकतंत्र की सुरक्षा के बचाव का सबसे बड़ा माध्यम भी है।
जहां तक भारतीय हिन्दी पत्रकारिता का सवाल है, तो पंडित युगल किशोर शुक्ला द्वारा 30 मई 1826 में ‘उदंड मार्तण्ड ,हिंदी साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया गया था । जिसके कारण 30 मई को भारत में पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। जिसके गौरवशाली इतिहास के 200 वर्ष पूरे होने जा रहे। वही 1830 में राजा राममोहन राय ने बहुभाषी हिंदी साप्ताहिक वंगदूत का प्रकाशन किया था।
वर्तमान दौर की पत्रकारिता कि जिसके संबंध में काफी समय पूर्व”” साहित्यकार, पत्रकार अवधेश श्रीवास्तव ने किसी मंच से कहा था एक समय था जब अखबार में छपी खबर गीता, कुरान तथा बाइबिल की तरह पवित्र व प्रमाणित मानी जाती थी और आम जनता उसे साक्ष्य के रूप में विभिन्न स्थानों पर प्रस्तुत करती थी”। किंतु वर्तमान दौर में लोग यह कहने में कोई संकोच नहीं करते कि ” अखबार में कुछ भी छप जाता है, और कुछ भी छुपवा लो”।
90 के दशक में अखबारों में छपी खबरों पर लोकसभा, राज्यसभा तथा विधानसभा में गरमा-गरम बहस व चर्चाएं होती थी तथा विपक्ष उन खबरों के बारे में सत्तापक्ष से जवाब मांगता था। वह सब गुजरी हुई बात अब हो गई है अब तो अखबारों में मुद्दों को समस्याओं पर संपादकीय भी देखने को नहीं मिलती है, बल्कि संपादकी ए सरकार के गुणगान से भरी होती है।
वर्तमान पत्रकारिता के गिरते स्तर और विश्वसनीयता के संकट के लिए कोई एक व्यक्ति या संस्था नहीं, बल्कि मीडिया संस्थानों का व्यावसायिक हित, राजनीतिक दबाव, सोशल मीडिया की जल्दबाजी और दर्शकों की बदलती पसंद सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं, पत्रकारिता की साख गिरने के मुख्य कारण व्यावसायिकरण और टीआरपी की दौड़,समाचार व पत्रकारिता अब जनसेवा व मिशन न होकर एक ‘उत्पाद’ बन गए हैं। विज्ञापन के दबाव में गंभीर मुद्दों के बजाय सनसनीखेज खबरों को प्राथमिकता दी जाती है। मीडिया घरानों के अपने व्यावसायिक और राजनीतिक हित हैं। पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग के कारण लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।सोशल मीडिया का प्रभाव-
फेसबुक, और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर ‘सबसे पहले’ खबर देने की होड़ में बिना पुष्टि के फर्जी खबरें प्रसारित हो जाती हैं।
पत्रकारों की नौकरी में असुरक्षा- अपवाद स्वरूप अगर कुछ संस्थाओं को छोड़ दिया जाए तो तमाम संस्थान अपने पत्रकार को वेतन एवं मानदेय तक नही देते। और न ही मीडिया संस्थान पत्रकार की योग्यता व शिक्षा पर ध्यान देते हैं बल्कि एजेंसी लो,विज्ञापन दो और पत्रकार बन जाओ की तर्ज पर कार्य करते । यही नही कई संस्थानों में पत्रकारों को पर्याप्त वेतन न मिलना और नौकरी की अनिश्चितता उन्हें दबाव में काम करने या समझौता करने के लिए मजबूर करती है। सनसनीखेज हेडलाइन डिजिटल मीडिया और यूट्यूब पर व्यूज पाने के लिए भ्रामक हेडलाइंस का उपयोग किया जाता है, जो पाठकों को गुमराह करते हैं।इस गिरावट में मीडिया मालिकों, संपादकों, राजनीतिक दलों और कहीं न कहीं उन दर्शकों/पाठकों की भी जिम्मेदारी है जो गंभीर विश्लेषण के बजाय मसालेदार खबरें देखना पसंद करते।

उदन्त मार्तण्ड: हिंदी पत्रकारिता के सूर्य का ‘द्विशताब्दी’ शंखनाद

 

✍️ प्रणय विक्रम सिंह

*​30 मई 1826…*
यह केवल एक तिथि नहीं, हिंदी चेतना के क्षितिज पर उगे उस प्रथम सूर्य का स्मृति-दिवस है, जिसने भारतीय भाषायी अस्मिता के अंधकार को पहली बार अपने स्वाभिमानी प्रकाश से आलोकित किया। कलकत्ता की औपनिवेशिक गलियों में जब अंग्रेजी सत्ता अपने साम्राज्य का विस्तार कर रही थी, तब उसी शहर से ‘उदन्त मार्तण्ड’ नामक एक ऐसा पत्र निकला, जिसने भारतीय मन की मौन वेदना को वाणी दी।​’उदन्त’ अर्थात समाचार और ‘मार्तण्ड’ अर्थात सूर्य। यह नाम ही अपने भीतर एक समूचा घोष समेटे हुए था… समाचारों का सूर्य, जनचेतना का सूर्य, हिंदी स्वाभिमान का सूर्य।

​कानपुर की मिट्टी में जन्मे साहसी विद्वान पंडित जुगल किशोर शुक्ल द्वारा संपादित यह साप्ताहिक पत्र प्रत्येक मंगलवार को प्रकाशित होता था। शुक्ल जी ने शायद तब यह नहीं सोचा होगा कि उनके हाथों से रोपा गया यह छोटा सा पौधा आगे चलकर हिंदी पत्रकारिता की विराट वटवृक्षीय परंपरा का बीज बन जाएगा।

​उस दौर में सत्ता की भाषा अंग्रेजी थी और प्रशासन की भाषा फारसी। हिंदी बोलने वाला समाज विशाल तो था, किंतु उसकी पीड़ा, उसकी परंपरा और उसके प्रश्न उपेक्षित थे। पत्रकारिता का आकाश विदेशी और क्षेत्रीय भाषायी पत्रों से भरा था, किंतु हिंदी वहां अनाथ-सी खड़ी थी। ऐसे समय ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन केवल एक पत्र का आरम्भ नहीं, बल्कि भाषायी पराधीनता के विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध का शंखनाद था।

​यह वह समय था जब छापाखाना तकनीक नहीं, विचारों का रणक्षेत्र हुआ करता था। हर छपी हुई पंक्ति सत्ता की आंखों में आंखें डालने का साहस रखती थी। ऐसे समय हिंदी में समाचार पत्र निकालना किसी दीपक का आंधियों से संघर्ष करने जैसा था। आर्थिक संकट, पाठकों की सीमित संख्या, वितरण की कठिनाइयां और अंग्रेजी शासन की उपेक्षा, इन सबके बीच उदन्त मार्तण्ड ने अपनी लौ जलाए रखी। अपनी तपिश कम नहीं होने दी।

​किन्तु विडंबना देखिए, जिस हिंदी समाज की आवाज बनने के लिए यह पत्र निकला था, अंग्रेजी सत्ता ने उसकी राह में कांटे बिछाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। डाक-व्यवस्था में सहयोग न मिलने और संसाधनों के अभाव के कारण लगभग डेढ़ वर्ष बाद, 4 दिसंबर 1827 को इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा। परंतु इतिहास में आयु नहीं, प्रभाव देखा जाता है।

​’उदन्त मार्तण्ड’ का जीवन भले अल्प रहा हो, किंतु उसकी ज्योति अमर हो गई। पत्रकारिता केवल समाचार का माध्यम नहीं रही। वह स्वतंत्रता संग्राम की शंखध्वनि बनी, सामाजिक सुधार का स्वर बनी, जनजागरण का जन्तर बनी। स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में हिंदी पत्रकारिता ने कलम को तलवार बना दिया। अंग्रेजों की बंदूकें जहां शरीरों को घायल करती थीं, वहीं हिंदी के पत्र साम्राज्यवाद की वैचारिक नींव पर प्रहार करते थे। गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रताप, माखनलाल चतुर्वेदी का कर्मवीर, और भारतेंदु की लेखनी ये सब उसी परंपरा की संततियां थीं, जिसकी पहली सांस उदन्त मार्तण्ड ने ली थी।

हिंदी पत्रकारिता का यह प्रथम सूर्य आगे चलकर एक ऐसे आकाश में बदल गया, जिसमें भारतेंदु हरिश्चंद्र, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, अज्ञेय, धर्मवीर भारती और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे असंख्य नक्षत्र चमके।

​आज जब ‘उदन्त मार्तण्ड’ के दो सौ वर्ष (द्विशताब्दी) के पड़ाव के समीप हम खड़े हैं, तब भारत एक नए संचार युग के द्वार पर है। मोबाइल की स्क्रीन ने मुद्रित पन्नों की जगह ले ली है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) समाचारों की गति तय कर रही है। सूचना का विस्फोट तो हुआ है, परंतु सत्य का संतुलन डगमगा रहा है। खबरें अब तथ्य से अधिक ‘एल्गोरिदम’ और ‘ट्रेंड’ का हिस्सा बन गई हैं।

​ऐसे समय ‘उदन्त मार्तण्ड’ की स्मृति हमें हमारे दायित्व की याद दिलाती है। यह सिखाता है कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, समाज को सजग करना है। आज जब हिंदी को ‘हिंग्लिश’ बनाने या अनुवाद की बैसाखियों पर टिकाने की कोशिश होती है, तब ‘मार्तण्ड’ हमें हमारी जड़ों की याद दिलाता है। यह स्मरण कराता है कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, भारत की सांस्कृतिक स्मृति की संवाहिका है।

​हिंदी पत्रकारिता का यह द्विशताब्दी क्षण आत्ममंथन का अवसर है। प्रश्न यह है कि क्या आज की पत्रकारिता उतनी ही जनपक्षधर है? क्या वह भाषा की आत्मा को बाजार के दबाव से बचा पा रही है? यदि इन प्रश्नों के उत्तर खोजने हैं, तो हमें उस छोटे-से साप्ताहिक पत्र की ओर लौटना होगा, जिसने बिना संसाधनों के भी सत्य की मशाल जलाई थी।

​’उदन्त मार्तण्ड’ केवल इतिहास का पन्ना नहीं, हिंदी आत्मा का प्रथम उच्चारण है। वह भारतीय पत्रकारिता के आकाश में उगा वह शाश्वत अरुणोदय है, जिसकी लालिमा आज भी हिंदी चेतना के क्षितिज को गौरवान्वित कर रही है।

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