क्या कांग्रेस जिन्ना के मार्ग पर जा रही है?
सुरेश हिंदुस्तानी
वन्देमातरम आज विवाद का विषय बना दिया है। जबकि यह सत्य है कि जब बंकिम बाबू ने इसकी रचना की थी, तब उनके मन में किसी के मन को आहत करने का कोई विचार नहीं था। उनका भाव केवल मातृभूमि के वंदन का था। देश में वन्देमातरम के अंतिम दो भाग का पहली बार विरोध विभाजन की मानसिकता रखने वाले मोहम्मद अली जिन्ना ने किया। आज उसी मार्ग पर कांग्रेस कदम बढ़ाती दिख रही है। यह बात सही है कि देश का सम्मान करने वाली किसी भी बात पर राजनीति नहीं होना चाहिए, लेकिन केवल वोट की चाहत के चलते ऐसा करना और भी खतरनाक हो जाता है।
वन्दे मातरम् भारत की स्वतंत्रता चेतना, मातृभूमि के प्रति समर्पण और राष्ट्रीय स्वाभिमान का ऐसा उद्घोष है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में असंख्य भारतीयों के भीतर देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित की। यही कारण है कि आज जब वन्दे मातरम् के पूर्ण या आंशिक गायन को लेकर राजनीतिक बहस खड़ी होती है, तो प्रश्न केवल गीत की पंक्तियों का नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक दृष्टिकोण का भी बन जाता है।
आज सवाल यह है कि वन्दे मातरम् पर संग्राम क्यों? कांग्रेस की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि 1937 में इसके दो पदों के गायन को लेकर निर्णय हुआ था, इसलिए उसी परंपरा का पालन होना चाहिए। लेकिन 1937 की परिस्थितियों को 2026 के भारत पर उसी रूप में लागू करना कितना उचित है, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। 1937 में भारत स्वतंत्र नहीं था। अंग्रेजी शासन था, साम्प्रदायिक तनाव थे और देश की राजनीतिक परिस्थितियां अत्यंत जटिल थीं। कांग्रेस उस समय आज की तरह सत्ता प्राप्त करने वाला चुनावी राजनीतिक दल नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख राजनीतिक मंच थी। जिसमें सभी देश भक्त शामिल थे। आज की कांग्रेस उससे अलग है। वन्दे मातरम् को लेकर कांग्रेस के भीतर भी यह चर्चा हुई कि इसके कुछ अंशों को लेकर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग की आपत्तियों को कैसे देखा जाए। ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में इस विषय पर विचार किया था और सार्वजनिक अवसरों पर पहले दो पदों के प्रयोग की व्यवस्था बनी।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उस समय की राजनीतिक परिस्थिति आज के स्वतंत्र भारत के लिए भी अंतिम मानक होनी चाहिए?
भारत आज एक संप्रभु गणराज्य है। संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को वन्दे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान सम्मान देने की व्यवस्था की थी। वन्दे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है। इसलिए इसे केवल कांग्रेस, भाजपा या किसी अन्य राजनीतिक दल के चश्मे से देखना उचित नहीं है। यहां यह सवाल भी उठता है कि जब यह राष्ट्र गीत है, तब इसे लेकर अराष्ट्रीय कार्य करने की राजनीति क्यों की जा रही है। यह आत्म मंथन का विषय हो सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना भी आवश्यक है। वन्दे मातरम् संविधान के मूल पाठ में लिखकर नागरिकों के लिए अनिवार्य गायन के रूप में शामिल नहीं था। लेकिन चूँकि वन्देमातरम गाने को लेकर क़ानून बन गया है, तब सभी को इसका पालन करना ही चाहिए, कांग्रेस को भी। आज अगर कांग्रेस इसका विरोध करती है, तो इसे संविधान का अपमान ही कहा जाना उचित होगा। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गीत को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं और इसके पूर्ण छह अंतरे वाले संस्करण को सार्वजनिक प्रसारण में बढ़ावा दिया गया है। जुलाई 2026 में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण कानून में संशोधन का प्रस्ताव भी लाया गया, जिसमें राष्ट्रीय गीत को जानबूझकर रोकने या उसके गायन में व्यवधान डालने के विरुद्ध कानूनी संरक्षण देने की बात है। इसलिए बहस को तथ्यों के आधार पर ही आगे बढ़ाना चाहिए।
वन्दे मातरम् की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी पहचान किसी एक राजनीतिक दल से नहीं जुड़ी। कांग्रेस के अधिवेशनों में इसका गायन हुआ। 1896 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया था। स्वतंत्रता आंदोलन में यह अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना। ऐसे में यह कहना कि वन्दे मातरम् भाजपा की देन है, इतिहास के साथ अन्याय होगा। भाजपा तो स्वतंत्रता के बाद बनी; वन्दे मातरम् उससे बहुत पहले भारतीय राष्ट्रचेतना का हिस्सा बन चुका था। फिर वही प्रश्न उठता है कि आज इसके दो पदों या पूरे गीत को लेकर इतना राजनीतिक संघर्ष क्यों? क्या इसके पीछे वोट बैंक की राजनीति है? इस प्रश्न का उत्तर किसी एक दल के बारे में निश्चित रूप से देना उचित नहीं होगा, क्योंकि राजनीतिक मंशा का प्रमाण तथ्यों से ही स्थापित किया जा सकता है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जब राष्ट्रीय प्रतीकों को बार-बार चुनावी गणित से जोड़ दिया जाता है, तब राष्ट्रहित पीछे और राजनीतिक हित आगे दिखाई देने लगता है। वन्दे मातरम् का सम्मान करना किसी धर्म विशेष का समर्थन करना नहीं है। यह मातृभूमि के प्रति सम्मान और स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति से जुड़ा राष्ट्रीय भाव है।
भारत की शक्ति ही उसकी विविधता है। यहां पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, भाषाएं अलग हो सकती हैं, पर मातृभूमि के प्रति सम्मान का भाव साझा हो सकता है। इसलिए वन्दे मातरम् को हिन्दू बनाम मुस्लिम विवाद में बदल देना उसके ऐतिहासिक और राष्ट्रीय स्वरूप को छोटा करना है।
कांग्रेस के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है। यदि 1937 के निर्णय को आज भी राजनीतिक ढाल बनाया जाएगा, तो यह प्रश्न उठेगा कि क्या स्वतंत्र भारत की परिस्थितियों में भी वही दृष्टिकोण अपरिवर्तित रहना चाहिए? और यदि कांग्रेस स्वयं वन्दे मातरम् के इतिहास की भागीदार रही है, तो उसे इस गीत को लेकर अस्पष्टता के बजाय स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टिकोण सामने रखना चाहिए। इसी प्रकार सत्ता पक्ष को भी यह ध्यान रखना होगा कि राष्ट्रभक्ति किसी पर थोपी जाने वाली भावना नहीं है। राष्ट्रगीत का सम्मान बढ़े, उसके इतिहास को नई पीढ़ी जाने और उसके प्रति स्वाभाविक श्रद्धा विकसित हो, यह अधिक स्थायी रास्ता है। कानून और राजनीतिक आह्वान अपनी जगह हैं, लेकिन राष्ट्रभाव अंततः मन से पैदा होता है।
वन्दे मातरम् को राजनीति के अखाड़े से निकालकर राष्ट्रचेतना के केंद्र में स्थापित करने की आवश्यकता है। इसे कांग्रेस बनाम भाजपा का विषय बनाना भी गलत है और हिन्दू बनाम मुस्लिम का विषय बनाना भी। यह भारत की स्वतंत्रता यात्रा का अमूल्य अध्याय है।
कांग्रेस को अपने राजनीतिक उत्थान से आगे बढ़कर देश के उत्थान के बारे में सोचना चाहिए। वन्दे मातरम् किसी दल की संपत्ति नहीं, भारत की राष्ट्रीय विरासत है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पूछें
जब इसके शब्दों में मातृभूमि के प्रति वंदन है, इसके इतिहास में स्वतंत्रता का संघर्ष है और इसकी स्मृति में असंख्य देशभक्तों का त्याग है, तब इसे विवाद का नहीं, संवाद का विषय बनाया जाना चाहिए। राजनीति अपनी जगह रहे, लेकिन राष्ट्र सबसे ऊपर रहे। वन्दे मातरम् केवल गाया न जाए, उसकी भावना को जीवन में उतारा जाए। यही भारत के प्रति सच्ची वंदना होगी।
सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार


