Editorial 11.08.2026 by Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News
Posted on 11.08.2026
संसद में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को रोकने के लिए कांग्रेस और अन्य विपक्ष हर हथकंडा अपना रहा है। इस विधेयक को पारित कराने के लिए एनडीए सरकार पूरी कोशिश में है। इसके लिए का व्यवस्थित संचालन जरूरी है। लेकिन कांग्रेस लोकसभा और राज्यसभा दोनों को अव्यवस्थित बनाए रखना चाहती है। सदन सुचारू करने के लिए कांग्रेस ने मांग रखी कि गृह मंत्री अमित शाह सदन में आकर नीट पेपर लीक मामले में प्रदर्शनकारी छात्रों पर लाठी चार्ज पर बयान दें। जब सरकार इसके लिए सोमवार को तैयार हो गई तो कांग्रेस ने नई मांगें रख दी। अब कांग्रेस कह रही है कि लाठी चार्ज की जिम्मेदारी तय हो, पीएम मोदी माफी मांगें और राम मंदिर में चढ़ावा चोरी पर चर्चा हो तब सदन चलने देंगे। इससे ऐसा लगता है कि कांग्रेस जानबूझकर ऐसे मुद्दे और मांगे रख रही है, जिन्हें सत्ता पक्ष स्वीकार नहीं करेगा। परिणाम गतिरोध बरकरार रहेगा और महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पारित नहीं होगा। दरअसल कांग्रेस महिला आरक्षण की विरोधी है। वह शुरू से अड़ंगेबाजी करती रही है। इसलिए इस लोक महत्व का बिल को अटकाए रखना चाहती है। यह बिल दो तिहाई बहुमत से पारित होगा, जिसके लिए सरकार ने बहुमत जुटा लिया है। डीएमके, एनसीएपी, शिवसेना उद्धव गुट, टीएमसी का बागी गुट सरकार के साथ हैं। सरकार बिल आसानी से पास कर लेगी, इस बात को कांग्रेस अच्छी तरह जानती है। इसी लिए सदन को सुचारू नहीं होने दे रही, ताकि बिल अटका रहे। ये बिल अगर अभी पारित नहीं हुआ तो वर्ष 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू नहीं हो सकेगा। महिला आरक्षण भारत की राजनीति में 30 वर्ष पुराना मुद्दा है। इसे समय समय पर भाजपा और कांग्रेस दोनों उठती रही हैं। लेकिन जब इसे क्रियान्वयन का समय आया तो विपक्षी दल कांग्रेस ने अपना महिला विरोधी रुख स्पष्ट दिखा दिया। खास बात यह है कि इस बिल के विरोध में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल जैसी क्षेत्रीय पार्टियां भी है। महिला आरक्षण का विरोध करके इन दलों को कुछ भी हासिल नहीं होगा बल्कि राजनीतिक नुकसान ही होगा। लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकार और राहुल गांधी के सलाहकार ये समझने को तैयार नहीं हैं। कांग्रेस अब भी रुख बदल ले तो वह संभावित नुकसान को टाल सकती है।
