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प्रधानमंत्री की अपील को स्वीकारना समय की मांग

May 17, 2026

प्रधानमंत्री की अपील को स्वीकारना समय की मांग

Posted on 15.05.2026 Time 11.30 AM Friday

Article by Sarvesh Kumar Singh, Lucknow

सर्वेश कुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से  संयममित उपभोग की अपील की है। यह अपील समय की मांग है। इसे स्वीकार करना हर भारतवासी का राष्ट्रहित में योगदान होगा। कारण बहुत स्पष्ट हैं किसी से कोई भी स्थिति छिपी हुई नहीं है। आज दुनिया का जो परिदृश्य बना हुआ है। उसमें  आसन्न संकट से बचने का एक मात्र उपाय संयमित उपभोग ही है।

प्रधानमंत्री ने 10 मई को हैदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में जनता से अपील की। कार्यक्रम हैदराबाद में अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन केन्द्र में आयोजित था, जहां उन्होंने 9400 करोड़ की विभिन्न विकास परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन किया। इसके बाद भाजपा की रैली को भी सम्बोधित किया। यहीं श्री मोदी ने वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कोविड काल जैसी व्यवस्थाओँ को अपनाने की अपील की। श्री मोदी ने कहा कि पेट्रोल, डीजल और गैस का संयमित उपयोग किया जाए। इसके साथ ही श्री मोदी ने यह भी कहा कि कोविड काल में जैसे वर्क फ्राम होम की व्यवस्था की गई थी, वैसे ही इसे फिर से अपनाया जाना समय की मांग है। उन्होंने आनलाइन बैठकों, वीडियो कांफ्रेंसिंग को अपनाने की भी बात कही। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री ने किसानों से भी अपील की। उन्होंने कहा कि किसानों को रायायनिक खादों का उपयोग 50 प्रतिशत तक कम करना चाहिए। इसके लिए प्राकृतिक खेती को अपनाना एक अच्छा उपाय है। सिंचाई के लिए डीजल पंप के स्थान पर सोलर पंप अपनाए जाएं। इससे डीजल की बचत होगी।

प्रधानमंत्री ने उसके एक ही दिन बाद इसी अपील को फिर दिल्ली में दोहराया। उन्होंने जो भी कहा वह राष्ट्रीय परिदृश्य,देश की अर्थव्यवस्था, भविष्य की चुनौतियों और आसन्न संकट की चेतावनियों को देखते हुए कहा है। क्योंकि हम 2047 तक विकसित भारत  का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। इसके लिए जरूरी है कि उच्च विकास दर बनी रहे। उच्च विकास दर तभी रह सकती है जब राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखा जाए।

पश्चिम एशिया संकट के कारण पूरी दुनिया गैस, पेट्रोल, डीजल, रायासयिक उर्वरकों के संकट का सामना कर रही है। कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। पश्चिम एशिया संकट से पहले जहां कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल 70 डालर थी वह आज 126 डालर तक पहुंच गई है। लेकिन भारत सरकार ने घरेलू आपूति में दामों को नियंत्रित रखा है। इस कारण सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों इंडियन आयल, भारत प्रेट्रोलियम, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। यह घाटा प्रतिदिन 1600 से 1700 करोड़ रुपये है। अभी तक ये कंपनियां कुल एक लाख करोड़ रुपये का घाटा उठा चुकी हैं। तेल कंपनियों का घाटा सीधे तौर पर हमारे देश की विदेशी मुद्रा के स्तर को  प्रभावित करता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार कम होने की आशंका है, जोकि रणनीतिक रूप से उचित स्थिति नहीं होगी। भारत के पास वर्तमान में विदेशी मुद्रा का इतना भंडार है कि वह 11 महीने तक निर्बाध आयात कर सकता है। लेकिन इस स्थिति को सदैव स्थिर रखने की जरूरत होती है।

देश के मुद्रा भंडार को जो दूसरी सबसे बड़ी खरीद प्रभावित करती है वह सोना है। प्रधानमंत्री ने इसी लिए एक साल तक सोना न खरीदने की भी अपील की है ताकि भारत को विदेश से सोना आयात नहीं करना पड़े। क्योंकि मांग की पूति के लिए सोना आयात किया जाता है। इसे भी नियंत्रित रखना है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने देशवासियों से सहयोग की अपील की है। हालांकि इस अपील को भारत के विपक्ष ने स्वीकार करने के बजाय इस पर टीका टिप्पणी शुरु कर दी है। सबसे खराब टिप्पणी नेता विरोधी दल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने की है। उन्होंने कहा कि समझौतावादी पीएम के बस का देश चलाना नहीं है।

लेकिन, प्रधानमंत्री की अपील को देश की जनता स्वीकार कर रही है। जनता ने संयम दिखाना प्रारम्भ कर दिया है। राज्य सरकारों ने सकारात्मक रुख दिखाया है। अधिकांश राज्यों ने अपने मंत्रियों के काफिले छोटे कर दिये हैं। सप्ताह में एक दिन नो वेहिकल डे और दो दिन वर्क फ्राम होम की व्यवस्था लागू करने का फैसला ले लिया है। इससे पट्रोल, डीजल की बचत होगी।

आज दुनिया का परिदृश्य जिस तरह से बदल रहा है। भू राजनैतिक परिदृश्य में भी बदलाव हो रहे हैं। हमारे देश की सीमाओं पर हर समय तनाव बना हुआ है। आपरेश सिन्दूर के बाद चीन और पाकिस्तान का गठजोड़ उजागर हो चुका है। अमेरिका की छद्मनीति के चलते हम उस पर भरोसा नहीं कर सकते। इन हालातों में भारत की सुरक्षा  के लिए यह जरूरी है कि हम स्वयं सशक्त आर्थिक शक्ति, निजीं संसाधनों पर अधिक निर्भरता, विदेशी आयात की कम से कम जरूरतों पर निर्भर रहें। ताकि आसन्न चुनौतियों का सामना दृढ़ता से कर सकें। अतः प्रधानमंत्री की अपील को स्वीकार करना चाहिए।

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

May 15, 2026

एमपी हाईकोर्ट: भोजशाला सरस्वती मंदिर

Posted on 15.05.2026 Time 09.14 , Madhya Pradesh, Bhojdhala

धरम हेतु अवतरेहु गोसाईं

आचार्य ललित मुनि

हिन्दूओं के लिए आज बड़ा फैसला धार स्थित भोजशाला को लेकर आया। न्यायालय का निर्णय करोड़ों सनातनियों के लिए केवल एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि सदियों से संघर्षरत सांस्कृतिक चेतना की विजय के रूप में देखा जा रहा है।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि भोजशाला मूलतः देवी वाग्देवी अर्थात माँ सरस्वती का मंदिर और संस्कृत अध्ययन का केंद्र था। यह निर्णय उन ऐतिहासिक तथ्यों और पुरातात्विक प्रमाणों की पुष्टि करता है जिन्हें वर्षों से सनातन समाज उठाता रहा था।

न्यायालय ने अपने विस्तृत निर्णय में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट, ऐतिहासिक अभिलेखों, स्थापत्य अवशेषों और उपलब्ध साक्ष्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि भोजशाला का मूल स्वरूप एक हिंदू मंदिर और विद्या पीठ का था।

अदालत ने 2003 से लागू उस व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया जिसमें हिंदुओं और मुस्लिम पक्ष के लिए अलग-अलग दिनों में पूजा एवं नमाज की अनुमति दी गई थी। न्यायालय ने राज्य सरकार को परिसर का संरक्षण सुनिश्चित करने तथा व्यवस्था एवं शांति बनाए रखने के निर्देश भी दिए हैं। इस निर्णय को कई लोग ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित न्यायिक मान्यता के रूप में देख रहे हैं।

भोजशाला केवल पाषाण निर्मित स्मारक नहीं बल्कि यह उस भारत की स्मृति है जहाँ ज्ञान, संस्कृति, शास्त्र और साधना का संगम था। परमार राजा भोज के काल में यह विद्या और संस्कृति का एक महान केंद्र माना जाता था। यही कारण है कि हिंदू समाज इसे माँ सरस्वती की उपासना स्थली के रूप में मानता रहा है। वर्षों तक इस सत्य को “विवाद” कहकर दबाने का प्रयास हुआ, लेकिन अंततः न्यायालय ने ऐतिहासिक चरित्र को स्वीकार किया।

इस निर्णय को सनातन समाज इसलिए भी महत्वपूर्ण मान रहा है क्योंकि यह केवल आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि अभिलेखों, पुरातात्विक अवशेषों और ऐतिहासिक अध्ययन के आधार पर आया है। लंबे समय से यह कहा जाता रहा कि भारत के अनेक प्राचीन मंदिर आक्रमणों और सत्ता परिवर्तन के दौरान इस्लामिक इमारतों में बदले गए, लेकिन उन प्रश्नों पर चर्चा को अक्सर सांप्रदायिक कहकर टाल दिया गया। भोजशाला का निर्णय इस विमर्श को नई दिशा देता है।

यह फैसला उन लाखों लोगों की भावनात्मक जीत भी है जिन्होंने वर्षों तक माँ वाग्देवी के सम्मान और पूजा-अधिकार के लिए आवाज उठाई। हर बसंत पंचमी पर भोजशाला का प्रश्न राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनता रहा। हिंदू समाज का यह आग्रह केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा हुआ था।

इस निर्णय के बाद सनातन समाज में स्वाभाविक उत्साह दिखाई दे रहा है। इसे लोग “सत्य की विजय” और “सभ्यता के पुनर्जागरण” के रूप में देख रहे हैं। लंबे समय बाद न्यायपालिका ने इतिहास के उस पक्ष को भी महत्व दिया है जिसे सामान्यतः उपेक्षित माना जाता था।

धार की भोजशाला आज केवल एक स्थान नहीं रही। वह उस व्यापक भावबोध का प्रतीक बन चुकी है जिसमें सनातन समाज अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों, मंदिरों और सांस्कृतिक प्रतीकों के पुनर्स्थापन को अपने आत्मसम्मान से जोड़कर देख रहा है। यह निर्णय आने वाले समय में भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक पहचान के विमर्श में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हो सकता है। इसके प्रकाश में अन्य निर्णय भी आएंगे।

May 11, 2026

आसान नहीं होता है तारिक खान होना

Article Posted on 11.05.2026 Time 11.41 PM Monday, Tarique Khan

-रतिभान त्रिपाठी
पत्रकारिता के रास्ते से बढ़कर शिक्षा और रंगकर्म के जरिए समाज में अपना मुकाम बनाने वाले तारिक़ खान नहीं रहे। सोमवार को दोपहर बाद मिली यह खबर मेरे लिए किसी सदमे से कम नहीं क्योंकि मैंने जिस अखबार प्रयागराज टाइम्स के मार्फत पत्रकारिता में प्रवेश किया, तारिक़ खान उसके पहले संपादक थे। अखबार के संस्थापक डॉ. अनवार अहमद ने तारिक साहब से मेरी मुलाकात कराई थी। उन दिनों बड़े भाई समान नागेंद्र त्रिपाठी, सिद्धनाथ द्विवेदी, बैजनाथ त्रिपाठी, इफ्तेखार ज़मन, जमील अहमद, संजय श्रीवास्तव, संजय मासूम आदि साथी भी प्रयागराज टाइम्स में थे।
पत्रकारिता के पुरोधा रहे पंडित हेरंब मिश्र का आशीर्वाद हम सबको उन दिनों मिल रहा था। संभवतः हम सब पंडित हेरंब मिश्र जी से पत्रकारिता के गुर सीख रहे थे। हेरंब जी, जिन्हें हम सब बाबा कहते थे, वह एक दिन तारिक़ खान को लेकर माया पत्रिका के तत्कालीन संपादक बाबूलाल शर्मा के पास गए। कहा, मैं तारिक़ को पत्रकार मानता हूं। तुम चाहो तो इनका इम्तिहान ले सकते हो। बाबा की गारंटी के आगे आखिर बाबूलाल जी क्या कहते! तारिक़ खान माया पत्रिका में काम करने लगे लेकिन उनसे हम सबका जुड़ाव बना रहा।
हम सब अलग-अलग अखबारों में काम करने लगे लेकिन प्रतिभा में विविधता के संवाहक तारिक़ भाई का मन माया से बहुत जल्द ही भर गया। वहां नमस्ते किया और फिर नूरुल्ला रोड पर बेनहर स्कूल खोला। कुछ ही सालों में बेनहर‌ स्कूल तरक्की कर गया और उस इलाके के बहुत सारे बच्चे वहीं पढ़ने लग गए।
तारिक़ भाई प्रयोगधर्मी इंसान थे। उन्होंने स्कूल के साथ ही बाफ्टा नामक रंगकर्म की संस्था बनाई और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम आधारित “दास्तान-ए-राम” जैसा नाटक तैयार किया जिसके प्रयागराज, लखनऊ समेत अनेक शहरों में शो हुए। कई और नाटकों का मंचन भी बाफ्टा के बैनर तले चलता रहा। वह अपनी एक संस्था के जरिए साल में एक बार अलग अलग क्षेत्रों में अच्छा काम करने वाले लोगों को सम्मानित भी करते थे।
कुंभ 2019 के समय मेरे लेखन और संपादन में तीन पुस्तकें आई थीं। इसके लिए उन्होंने मुझे अपने स्कूल परिसर में सम्मानित किया था। उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर योगेश्वर तिवारी समेत कुछ और हस्तियों को भी सम्मानित किया गया था।
साल भर पहले वह लखनऊ आए थे। उन्होंने मुझसे अपनी खुशी साझा करते हुए बताया था कि उनकी बेटी यहीं लोहिया अस्पताल में डॉक्टर है। वह अक्सर यहां आते रहते हैं। अभी कुछ महीनों पहले उन्होंने यह भी वादा किया था कि अबकी बार बाफ्टा के बैनर तले होने वाले नाटक मंचन के समय बुलाएंगे। उन्होंने बुलाया भी लेकिन संयोग से मैं लखनऊ से बाहर था इसलिए पहुंच नहीं सका।
तकरीबन 65 साल के तारिक़ भाई अच्छे खासे सक्रिय रहते थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। रोज की तरह वह आज भी स्कूल गए थे। उन्हें दिल का दौरा पड़ा लेकिन बचाया नहीं जा सका। पत्रकारिता, शिक्षा और रंगकर्म के क्षेत्र में बेहतरीन और यादगार काम करने वाले तारिक़ खान भले ही भौतिक रूप से हम सबके बीच नहीं रहे लेकिन उनके कार्यों को भुलाया नहीं जा सकेगा। वह यादों में हमेशा रहेंगे। अलविदा तारिक़ भाई….

Ratibhan Tripathi Senior Journalist Ratibhan Tripathi Senior Journalist Lucknow

UP Politics: पीडीए फार्मूले को चुनौती देने की बीजेपी की कोशिश

Posted on 11.05.2026 , Time 02.33 PM, Monday, Article by Ratibhan Tripathi, Senior Journalist, Lucknow

पिछड़ों और दलितों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया गया, ब्राह्मण चेहरा भी शामिल कर ब्राह्मणों की कथित नाराजगी खत्म करने की दिशा में कदम

रतिभान त्रिपाठी
लखनऊ : देश के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में से तीन में अपनी जीत का परचम लहराने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश का रुख किया है, जहां अगले साल फरवरी महीने में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। रविवार को योगी सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार उसी रणनीति के तहत पहला कदम है जिसमें जरूरत के हिसाब से जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश की गई है। प्रदेश में भाजपा की मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी ने पीडीए फार्मूले का ढोल पहले से ही पीट रखा है। ताज़ा मंत्रिमंडल विस्तार उसी पीडीए फार्मूले को चुनौती देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
मंत्रिमंडल में उन जातियों को शामिल किया गया है जिनका प्रतिनिधित्व सरकार में कम माना जा रहा था। जैसे फतेहपुर से कृष्णा पासवान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से सुरेंद्र दिलेर को मंत्री बनाकर मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों का प्रतिनिधित्व सरकार में बढ़ाया गया तो भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को कैबिनेट मंत्री बनाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी के जाट चेहरे को महत्व दिया गया है। कृष्णा पासवान को मंत्री बनाकर केवल दलित समुदाय को ही नहीं महिलाओं की ओर से भी प्रतिनिधित्व दिया गया है।
ऐसे ही कैलाश सिंह राजपूत और हंसराज विश्वकर्मा को मंत्री बनाकर लोध और लोहार समाज को सरकार में महत्व देने की कोशिश की गई है। कैलाश राजपूत कन्नौज से आते हैं, जो अखिलेश यादव का लोकसभा क्षेत्र है। वहां से असीम अरुण दलित समाज से पहले से ही मंत्री हैं। अब लोध समाज के कैलाश राजपूत को मंत्री बनाकर पीडी फार्मूला स्पष्ट कर दिया है। वाराणसी क्षेत्र के हंसराज विश्वकर्मा को मंत्री बनाने से पूर्वांचल में उपरोक्त समुदाय के बीच एक अच्छा संदेश देने की कोशिश की गई है।
सपा के पीडीए में से भाजपा ने सरकार में पीडी को तो खूब महत्व दे रखा है, आखिरी अक्षर ए के हिस्से में सिर्फ एक मंत्री हैं दानिश अंसारी और भाजपा को मुस्लिम समाज को सरकार में इससे ज्यादा प्रतिनिधित्व देना भी नहीं है क्योंकि मुस्लिम समाज भाजपा को वोट तो देता ही नहीं, बल्कि चुनाव में खुलकर मुखालिफत करता है। अल्पसंख्यकों में से सिख कोटे से एक मंत्री बलदेव सिंह औलख पहले से ही हैं। वह भी दलित समुदाय से आते हैं। ऐसे में वह दलितों और अल्पसंख्यकों की एक साथ अगुवाई करते हैं। चूंकि 2027 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव पीडीए पीडीए चिल्ला रहे हैं, ऐसे में भाजपा इन समुदायों के बीच यह बताने में पीछे नहीं रहेगी कि उसकी सरकार में इन समुदायों को भरपूर महत्व दिया गया है।
गौरतलब है कि भाजपा की सरकार बनाने में गैर यादव पिछड़ों की अच्छी खासी भूमिका होती है इसलिए मौजूदा सरकार में उनकी भागीदारी अधिक बढ़ाकर पार्टी अगला चुनाव आसान बनाने में लगी हुई है।  इधर रायबरेली के ऊंचाहार से समाजवादी पार्टी से भाजपा में आए मनोज कुमार पाण्डेय को सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। जिस समय मनोज पाण्डेय ने सपा छोड़ी थी, उस समय उन्होंने अखिलेश यादव पर आरोप लगाया था कि वह न केवल राममंदिर मुद्दे पर हिंदुत्व के विरुद्ध काम कर‌ रहे हैं बल्कि स्वामी प्रसाद मौर्य के जरिए ब्राह्मणों को अपमानित करवा रहे हैं। इस बीच सरकार और भाजपा से ब्राह्मणों की कुछ नाराजगी की बात भी उभरकर सामने आने लगी थी तो मनोज पाण्डेय को मंत्रिमंडल में जगह देना असंतोष को कुछ हद तक दबाने की दिशा में कोशिश के रूप में माना जा रहा है। दो मंत्रियों का प्रमोशन करके उन्हें राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाया गया है। अब देखना है कि इस विस्तार और प्रतिनिधित्व का निकट भविष्य में कैसा प्रभाव होता है।

Ratibhan Tripathi Senior Journalist

May 6, 2026

विधान सभा चुनाव: संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ता विपक्ष

Logo Election 2026
Article Posted on 06 May 2026, Wednesday, Time 06.12 PM, Writer Suresh Hindustani
विपक्ष : मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू

The picture that has emerged after the assembly elections in five states, including West Bengal, is one of bitterness and sweetness. While the political parties in the opposition are tasting the sweetness of the mind-boggling results in Tamil Nadu and Kerala, all the opposition parties are doing the unconstitutional act of publicising the West Bengal election result as a BJP-sponsored victory. The biggest thing is that Trinamool Congress leader Mamata Banerjee has been given a mandate by the public to sit in the opposition this time, but Mamata Banerjee is not able to make up her mind to accept defeat in the style of clinging to the chair.

सुरेश हिंदुस्तानी
पश्चिम बंगाल के साथ पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के पश्चात् जो तस्वीर निर्मित हुई है, वह कड़वाहट और मिठास दोनों का ही स्वाद दे रही है। विपक्ष के राजनीतिक दल जहाँ एक ओर तमिलनाडु और केरल के मनमाफिक परिणाम देखकर मिठास का स्वाद ले रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम को सभी विपक्षी दल भाजपा की प्रायोजित जीत के रूप में प्रचारित करने का असंवैधानिक कार्य कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी को इस बार जनता ने विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है, लेकिन ममता बनर्जी कुर्सी से चिपके रहने के अंदाज में पराजय को स्वीकार करने का मानस नहीं बना पा रही हैं। लोकतान्त्रिक मर्यादा के तहत उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी का त्याग करना चाहिए। लेकिन ममता बनर्जी ऐसा न करके एक प्रकार से लोक के निर्णय को ठेंगा दिखाने का कार्य कर रही हैं। खास बात यह है कि विपक्ष के कुछ अन्य दल भी तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के इस कदम का समर्थन करती हुई लग रही हैं। लोकतंत्र में विरोध करने का सभी को अधिकार है, लेकिन यह विरोध संवैधानिक मर्यादायों के तहत ही होना चाहिए।
देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है, ज़ब चुनाव में पराजित हो जाने के बाद मुख्यमंत्री अपना त्याग पत्र देने से मना कर रहा है, ममता बनर्जी का यह रवैया निश्चित ही जनमत के साथ विश्वासघात ही कहा जाएगा। लोकतंत्र का असली आशय यही होता है कि जनता अपने बीच में से अपने प्रतिनिधि चुनकर अपनी सरकार बनाती है। जनता ने जनादेश दे दिया है। विपक्ष को भी यह स्वीकार करना चाहिए। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम यह संदेश प्रवाहित कर रहे हैं कि अब देश में तुष्टिकरण के दिन ख़त्म हो गए हैं। जनता भी ऐसा ही चाहती है। मजेदार तथ्य यह है कि बंगाल के चुनाव के साथ ही पांच राज्य असम, केरल, तमिलनाडु और पंडिचेरी में भी चुनाव हुए असम को छोड़ दिया जाए तो सभी राज्यों में परिणाम सत्ता के विरोध में ही आए, लेकिन सवाल यह है कि इन राज्यों के परिणाम पर कोई आरोप नहीं लगा रहा। इसके पीछे यही कारण माना जा रहा कि वहां भाजपा नहीं जीती। भाजपा की जीतना विपक्ष को कभी नहीं पचा। विपक्ष का व्यवहार ऐसा होता जा रहा है जैसे ये केवल सत्ता के लिए ही बने हैं। चुनाव में जय पराजय होती ही है, केवल एक को ही विजय मिलती है।
पश्चिम बंगाल के बारे में यह सभी जानते हैं कि ममता सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार चरम पर था। जनता भी इस भ्रष्टाचार से त्रस्त रही और प्रशासनिक अधिकारी भी। इसी के चलते तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के विरोध में एक राजनीतिक हवा बनी। भाजपा ने अपने प्रचार के दौरान ममता के भ्रष्टाचार को लेकर जमकर हमला बोला। इसके विपरीत विपक्ष के अन्य दल भी इन मुद्दों पर मुखर रहे। कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से ममता को निशाने पर लिया। इसका आशय स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार के विरोध में लहर थी। दूसरी एक और प्रमुख बात यह भी है कि पश्चिम बंगाल में पिछले जितने भी चुनाव हुए, उनमें हिंसा के माध्यम से मतदाताओं को भयभीत करने का काम भी खुलेआम हुआ। ऐसा कोई भी चुनाव नहीं हुआ, जिसे हिंसा मुक्त कहा जा सकता हो। इस बार के विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने हिंसा मुक्त चुनाव करके दिखा दिया। इसी कारण आम मतदाता बिना किसी भय के मतदान केंद्र तक पहुँचने में सफल हुआ। इसी ने भाजपा की राह आसान की।
पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत का एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है कि वहां की मतदाता सूची से फर्जी नाम विलोपित किए गए। इन नामों में कई तो ऐसे थे, जो इस दुनिया में नहीं हैं। हालांकि यह एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है, इसलिए इसे खास मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। प्रति वर्ष मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने का क्रम चलता है। बंगाल का मामला बांग्लादेशी घुसपैठियों से जुडा था, इसलिए वहां एसआईआर जरुरी था। इससे जहाँ विदेशी मतदाता चुनाव में वोट का प्रयोग करने से वंचित हो गया, वहीं ऐसे मतदाता भी चुनाव में हिस्सा नहीं ले सके, जो फर्जी थे। उल्लेखनीय है कि पूर्व के चुनाव में यह वोट भी उपयोग में आते थे, इनके वोट कैसे पड़ते थे और कौन उंगली से बटन दबाता था, इसमें भले ही संदेह हो, लेकिन इसका आरोप तृणमूल के कार्यकर्ताओं पर ही लगते थे। इसी हिंसा को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने सुरक्षा बलों की तैनाती कराई। सुरक्षा बल केवल नागरिक सुरक्षा एवं भय मुक्त मतदान के लिए ही लगाया, लेकिन ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सहित विपक्ष के कई राजनीतिक दलों ने उनकी निष्ठा पर ही सवाल उठा दिए।
पश्चिम बंगाल के इस बार के चुनाव में ऐसे कई कारण रहे जो भाजपा की जीत और तृणमूल कांग्रेस की हार में काफी प्रभावी रहे। उसमें तृणमूल सरकार विरोधी लहर तो थी ही, साथ ही जो मुस्लिम वोट पूरा का पूरा तृणमूल को मिलता था, इस बार नहीं मिल सका। उसके पीछे मुसलमान नेताओं की सक्रियता रही। इस चुनाव में एक ओर ओवैसी की पार्टी मैदान में थी, वहीं हुमायूं कबीर ने एक नई पार्टी बनाकर ममता की परेशानी में बढ़ोत्तरी की। इस कारण मुसलमान वर्ग के वोट निश्चित ही विभाजित हो गए। इसके साथ ही राज्य का हिन्दू मतदाता कुछ ज्यादा सक्रियता के साथ मैदान में उतर आया। यह मतदाता निश्चित ही भाजपा के पक्ष में गया। इसलिए विपक्ष की ओर से यह कहना कि एसआईआर के कारण या चुनाव आयोग द्वारा भाजपा का साथ देने के आरोप प्रथम दृष्टि में ही तर्कहीन से लगते हैं। अब ममता बनर्जी को अपनी हार की समीक्षा करनी ही चाहिए, जो कमियां रही, उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
चुनाव परिणाम के बाद आरोप प्रत्यारोप का खेल जारी है। इसमें विपक्ष बिना प्रमाण के भाजपा और चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहा है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा विरोधी अन्य राजनीतिक दल जिस प्रकार के आरोप लगा रहे हैं, वह केवल जुबानी ही हैं। उसके पुख्ता प्रमाण किसी के पास नहीं हैं। ऐसी राजनीति न तो लोकतंत्र को सुरक्षित रख सकती है और न ही देश का भला कर सकती है। विपक्ष को सच को स्वीकार करने की मानसिकता बनानी होगी। हर बात के लिए नकारात्मक राय रखना विपक्ष की मजबूरी हो सकती है, लेकिन इसे स्वस्थ लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। जो अच्छा है उसे अच्छा कहना ही होगा। क्योंकि जनता जिस सच के साथ रहती है, विपक्ष को भी उसी सच के साथ ही चलना होगा। विपक्ष को यह भी समझना चाहिए कि आज देश का वातावरण परिवर्तित हो चुका है या हो रहा है। विपक्ष निश्चित रूप से सरकार पर आरोप लगाए, लेकिन जन भावना का अनादर करने से बचना होगा, नहीं तो जैसा पश्चिम बंगाल का परिणाम आया, वैसा अन्य राज्यों का भी आ सकता है।
सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
103 अग्रवाल अपार्टमेंट
कैलाश टॉकीज के पास, नई सड़क
लश्कर ग्वालियर मध्यप्रदेश
पिन : 474001
मोबाइल : 9425101815
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