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श्रद्धा-स्मरण / स्व. पूरन चंद्र जोशी

May 6, 2026

श्रद्धा-स्मरण / स्व. पूरन चंद्र जोशी

PC Joshi Prayagraj

राजनीतिक रुतबेबाजी से अलहदा एक सरल और संवेदनशील इंसान
-रतिभान त्रिपाठी
एक हैंडसम पर्सनालिटी, एक क्वालीफाइड इंजीनियर और फिर बिजनेसमैन, एक मुख्यमंत्री के दामाद, एक स्वतंत्रता सेनानी व सांसद सास के लाड़ले दामाद, एक मुख्यमंत्री व वरिष्ठ नेता के बहनोई और एक प्रोफेसर व मंत्री के पति, लेकिन न कोई घमंड, न कोई हनक दिखाने की मंशा। जबरदस्त जलवे के बावजूद रुतबेबाजी से कोसों दूर थे पूरन चंद्र जोशी। घर राजनीतिक कार्यकर्ताओं से भरा रहता लेकिन जोशी जी सबसे बड़ी सरलता से मिलते। उनसे कोई राजनीतिक चर्चा कर दे तो भले ही कोई शालीन जवाब दे देते लेकिन वह कोई शेखी बघारें, यह उनके स्वभाव में नहीं था।
बात हो रही है प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी के पति पूरन चंद्र जोशी जी की जिन्हें पूरा प्रयागराज पीसी जोशी के नाम से जानता है। आज उनके महाप्रयाण की दुखदाई खबर आई तो मन बहुत व्यथित हो गया। चार पांच दिन पहले अस्वस्थ हुए तो उन्हें पीजीआई लखनऊ में भर्ती कराया गया लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उन्हें बचाया नहीं जा सका। सोमवार की सुबह वह इस दुनिया से विदा हो गए।
मुझे ठीक से याद है कि नब्बे के दशक में जब प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी ने राजनीति में कदम रखा तो पीसी जोशी जी राजनीतिक गतिविधियों से दूर अपने बिजनेस में ही लगे रहते थे। रीता जी को कभी कभार उनकी किसी मदद की जरूरत पड़ी तो वह चुपचाप सहयोग करते रहे लेकिन राजनीतिक रुतबे में शामिल होना उनके स्वभाव से नहीं था। रीता जी इलाहाबाद की मेयर चुनी गई थीं। उन दिनों मोतीलाल वोरा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे। मैंने एक पुस्तक लिखी थी। उसका आमुख वोरा जी से इसलिए लिखवाना चाहता था कि नेता बनने से पहले वह पत्रकार हुआ करते थे।‌ वोरा जी रीता जी का बहुत सम्मान करते थे। मैं रीता जी के साथ इलाहाबाद से लखनऊ आया। पीसी जोशी जी भी साथ थे। रास्ते में जोशी जी से खूब संवाद हुआ। हम लोग रीता जी के लखनऊ स्थित आवास पर रुके और शाम को राजभवन गए। राज्यपाल वोरा जी के साथ भोजन करते समय पुस्तक को लेकर बात होने लगी तो जोशी जी ने उसका व्योरा दिया। वोरा जी ने आमुख लिखने के लिए सहर्ष हामी भरी। पाण्डुलिपि रखवा ली। दूसरे दिन सुबह सुबह देखा कि जोशी जी खुद चाय लेकर मेरे कमरे में आए। यह उनकी सरलता का उदाहरण है। मुझे संकोच भी हुआ लेकिन हम लोगों ने साथ बैठकर चाय पी और कई विषयों पर चर्चा की।
इसके बाद मैं जब कभी भी रीता जी के घर जाता और जोशी जी होते तो खूब बातें होतीं। उन्हें इस बात का कोई घमंड नहीं था कि वह देश के विख्यात नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हेमवती नंदन बहुगुणा के दामाद हैं या इलाहाबाद की मेयर के पति हैं।
एक वाकया याद आता है। जब प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी उत्तर प्रदेश सरकार में पर्यटन मंत्री थीं तो प्रयागराज में एक वैवाहिक समारोह में हम साथ साथ लखनऊ से गए। रास्ते में तय हुआ कि मेरी दोनों बेटियों स्मिता और अमृता को भी उस समारोह में जाना है। रीता जी चूंकि मेरे पूरे परिवार से बखूबी परिचित हैं। तो प्रयागराज पहुंच कर स्टैनली रोड स्थित मेरे घर से उन दोनों को साथ बैठाया गया। आगे चलकर मिंटो रोड पर रीता जी का घर है। जोशी जी को भी साथ जाना था, गाड़ी में वह भी आ गए। वैसे तो पीसी जोशी जी संकोची स्वभाव के थे लेकिन रास्ते में बेटियों से उनके खाने-पीने की आदतों, पसंद-नापसंद की बात करते रहे। यह बात उनके अपनेपन को दर्शाती है।
जोशी जी आदर्श पति कहे जा सकते हैं कि वह अपनी नेता धर्मपत्नी के लिए हमेशा सकारात्मक अंदाज में रहे। कभी किसी बात पर अड़चन नहीं डाली। आजीवन उनके एक अच्छे दोस्त की तरह रहे। दोनों के बीच एक अद्भुत केमिस्ट्री पूरे जीवन बनी रही, जिसके गवाह वह सभी लोग हैं जो रीता जी और उनके परिवार को ठीक से जानते हैं।
ऐसे सरलमना इंसान का जाना उन सबको दुखी कर गया जो उन्हें जीजा जी कहकर ही पुकारते थे। वह केवल विजय बहुगुणा और शेखर बहुगुणा के ही नहीं, रीता जी के समकक्षों और उनसे जुड़े लाखों लोगों के जीजा जी रहे हैं। उन्हें याद करते हुए मन भावुक हो रहा है। इन्हीं चंद शब्दों के साथ मैं पीसी जोशी जी की स्मृतियों को सादर नमन करता हूं। साथ ही ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह आदरणीया बहन रीता बहुगुणा जोशी जी और उनके परिवार को यह असीम दुख सहने की शक्ति प्रदान करे।

May 4, 2026

ममता का मिथक टूटा, मुखर्जी का मंत्र लौटा: केसरिया हुआ बंगाल

Article Posted on 04.05.2026 Time 06.30 PM Monday, West Bengal Election, Writer: Pranay Vikram Singh

प्रणय विक्रम सिंह

पश्चिम बंगाल का सियासी आसमान केसरिया हो गया। ‘ममता’ का अभेद्य महल ढह गया। दिल में ‘काबा’, नयन में ‘मदीना’ रखने वाली TMC आज बंगाल के सियासी समर में नेस्तनाबूद हो गई। जो बात वर्षों तक बंगाल के मन में थी, वह आज साहस के स्वर में ढलकर गूंज रही है कि हम हिंदू हैं… और अपने होने पर हमें गर्व है।

यह जनादेश TMC सरकार के संरक्षण में पल रहे तुष्टिकरण माफिया, सैंड माफिया, कोल माफिया, लैंड माफिया, घुसपैठ माफिया और कैटल माफिया के चंगुल में जकड़े बंगाल की मुक्ति का दस्तावेज है। इस विजय के साथ ही बंगाल की राजनीति का चक्र वहीं लौट आया है, जहां से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपनी वैचारिक यात्रा प्रारंभ की थी। यह जनादेश उनके बलिदान, उनकी दृष्टि और बंगाल के प्रति उनकी अटूट निष्ठा पर इतिहास की सबसे भव्य और भावपूर्ण मुहर है।

भारतीय जनता पार्टी की विजय केवल मतों का गणित नहीं, बल्कि मनों का मंथन और मान्यताओं का परिवर्तन है। बंगाल में रिकॉर्ड मतदान उद्घोष था कि इस बार लोग ‘डरे’ नहीं। लगभग 1 लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती ने मतदान केंद्रों पर सुरक्षा की ऐसी छाया दी, जिसमें मतदाता ने पहली बार ‘मन की मुहर’ खुलकर लगाई।

बंगाल की राजनीति का एक पक्ष लंबे समय तक रक्तरंजित रीतियों, रंजिशों और रसूख की राजनीति से जुड़ा रहा है। पोस्ट-पोल वायलेंस के घाव यहां गांव-गांव में दिखाई देते थे। क्लब कल्चर के नाम पर स्थानीय स्तर पर पनपे दबाव-तंत्र, संगठित समूहों का प्रभाव और प्रशासनिक संरचनाओं पर उनकी छाया लोकतंत्र को सीमित कर दिया था। किंतु इस जनादेश ने स्पष्ट कर दिया है कि जनता अब भय के उस फलक को तोड़कर विश्वास के विस्तार की ओर बढ़ चुकी है।

चुनाव परिणामों में भाजपा और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की सीटों का विशाल अंतर भले संख्यात्मक लगे, पर इसके भीतर मनोवैज्ञानिक बदलाव का विशाल आयाम छिपा है, नाराजगी से निर्णय तक की यात्रा। यह नाराजगी केवल शासन से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से थी जिसे तुष्टीकरण कहते हैं। बहुसंख्यक समाज के भीतर पनपी पीड़ा, अवसरों की असमानता की अनुभूति और प्रशासनिक असंतुलन का आभास ये सभी भाव लंबे समय से भीतर-ही-भीतर सुलगते रहे। इस चुनाव ने उस सुलगन को स्वर दिया।

इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय नेतृत्व की छाया भी स्पष्ट दिखती है। नरेंद्र मोदी का विकास-विश्वास-विस्तार का मंत्र, अमित शाह की संगठन-संरचना-संकल्प की सघनता और योगी आदित्यनाथ का सुरक्षा-सख्ती-सुशासन का मॉडल ने मिलकर एक ऐसा राजनीतिक प्रतिरूप रचा, जिसने बंगाल के मतदाता के मन में विकल्प की स्पष्टता दी।

अब नजर उस भविष्य पर है, जिसे यह जनादेश आकार देगा। विकास के मोर्चे पर यह जनादेश नई अपेक्षाएं लेकर आया है। बंद पड़े कारखानों की चिमनियां फिर से धुआं उगलें, बंदरगाहों की रफ्तार तेज हो और युवाओं के हाथों को काम मिले, यह उम्मीद अब हवा में तैरती है। राज्य का जीडीपी लगभग ₹17 लाख करोड़ के आसपास है, पर इसकी औद्योगिक वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से पीछे रही है। यदि नई सरकार गति, कनेक्टिविटी और रोजगार के त्रिकोण को प्राथमिकता देती है और कोलकाता पोर्ट, हल्दिया डॉक, दीनदयाल औद्योगिक कॉरिडोर और पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं तेज़ी पकड़ती हैं तो बंगाल पूर्वी भारत का आर्थिक इंजन बन सकता है। विदित हो कि निवेश वहीं जाता है, जहां नीतियां स्पष्ट और व्यवस्था विश्वसनीय हो और विश्वसनीयता का बीज सुरक्षा और स्थिरता की मिट्टी में ही पनपता है।

लेकिन बंगाल केवल अर्थशास्त्र नहीं है। वह एक संस्कृति-समृद्ध सभ्यता भी है। दुर्गा पूजा के ढाक की ध्वनि, काली मंदिरों की आरती और स्वामी विवेकानंद की वाणी इस भूमि की आत्मा रचते हैं। पूरी संभावना है कि नई सरकार के सहयोग से यह सभी मिलकर एक ऐसे सांस्कृतिक स्वाभिमान को जन्म देंगे, जहां पहचान पर संकट नहीं, बल्कि आत्मगौरव का आलोक होगा। जहां परंपरा प्रगति की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि प्रेरक शक्ति बनेगी। यह पुनर्जागरण ऐसा हो सकता है, जैसे राख से उठता हुआ फीनिक्स अपनी ही ज्वाला से नया जीवन पाता हुआ।

लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक सीमाएं हिंदी पट्टी तक सिमटी हुई हैं। परंतु बंगाल विजय ने इस मिथक को निर्णायक रूप से तोड़ दिया है। यह स्पष्ट संदेश है कि भाजपा अब एक ऐसी शक्ति है जो पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सक्षम है। गंगोत्री से गंगासागर तक भाजपा है।

इस परिणाम का सबसे तीखा प्रभाव विपक्षी राजनीति पर पड़ेगा। तृणमूल कांग्रेस जैसे गढ़ का ढहना केवल एक राज्य की हार नहीं, बल्कि उस पूरी वैचारिक संरचना का संकट है, जो भाजपा के विरोध को ही अपनी राजनीति का आधार मानती रही। अब विपक्ष के सामने केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न खड़ा है नेतृत्व कौन करेगा, दिशा क्या होगी और जनता को क्या विकल्प देगा? इससे विपक्षी दलों के बीच नेतृत्व और दिशा को लेकर असमंजस और गहरा सकता है।

इस जनादेश ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को भी नई राजनीतिक वैधता प्रदान की है। यह विजय केवल संगठनात्मक क्षमता का परिणाम नहीं, बल्कि उस विश्वास का प्रमाण है, जो जनता ने उनकी नीतियों, निर्णयों और दृष्टि पर जताया है। जब कोई राजनेता अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र से बाहर जाकर भी जनसमर्थन अर्जित करता है, तो वह केवल राजनेता नहीं रहता, वह एक राष्ट्रीय प्रवाह बन जाता है। वर्तमान समय में मोदी इस श्रेणी के एक मात्र राजनेता हैं।

बंगाल की इस जीत ने ‘डबल इंजन’ मॉडल को एक नए आयाम में परिवर्तित कर दिया है। अब उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के साथ उभरता Triple Engine Corridor केवल विचार नहीं, बल्कि ठोस नीति की दिशा बन चुका है। यह परिवर्तन पूर्वी भारत को नई आर्थिक ऊर्जा, औद्योगिक विस्तार और अवसंरचनात्मक सशक्तता प्रदान करते हुए आने वाले दशकों की विकास-दिशा तय करेगा।

इसके साथ ही यह परिणाम राष्ट्रीय विमर्श को भी प्रभावित करेगा। 2029 के आम चुनावों की दृष्टि से भी यह विजय अत्यंत महत्वपूर्ण है। बंगाल जैसे बड़े राज्य में भाजपा की सफलता का अर्थ है लोकसभा में संभावित सीटों की बढ़ोतरी, जो भविष्य की सत्ता-समीकरणों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकती हैं। यह जीत भाजपा को न केवल राजनीतिक बढ़त देती है, बल्कि मनोवैज्ञानिक बढ़त भी प्रदान करती है, जो किसी भी चुनावी युद्ध में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

अंततः यह परिणाम बंगाल की जीतने से अधिक ‘जागने’ की दास्तान है। यह भय से विश्वास, असंतोष से विकल्प और क्षेत्रीय राजनीति से व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि की ओर बढ़ते भारत की कहानी है।

April 29, 2026

प्रदेश के विकास का एक्सप्रेस वे बनेगा गंगा एक्सप्रेस वे मृत्युंजय दीक्षित

Mratunjay Dixit, Journalist lucknow

मृत्युंजय दीक्षित
उत्तर प्रदेश में अवस्थापना विकास के क्रम में निर्मित गंगा एक्सप्रेस वे आम जनमानस के लिए खुल रहा है जिसे प्रदेश के विकास में मील का पत्थर माना जा रहा है। 594 किलोमीटर लंबा गंगा एक्सप्रेस वे प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र (दिल्ली -एनसीआर) को पूर्वी क्षेत्र से जोड़ने वाला पहला सीधा हाई स्पीड एक्सप्रेस वे है। इस परियोजना पर 36,230 करोड़ की लागत आर्इ है। यह एक्सप्रेस वे मेरठ के बिजौली गाँव से प्रारंभ होकर बुलंदशहर, हापुड़, अमरोहा, शाहजहांपुर, संभल, बंदायू, उन्नाव, हरदोई, प्रतापगढ़, रायबरेली होते हुए प्रयागराज जिले के जुडापुर दांदू गांव तक जाएगा। इस एक्सप्रेस वे के प्रारंभ हो जाने के बाद देश के एक्सप्रेस वे नेटवर्क में यूपी की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत हो जाएगी और परियोजनाओं की कुल लंबाई 1910 किमी हो जाएगी। छह लेन का यह एक्सप्रेस वे पूरी तरह ग्रीनफील्ड व एक्सेस -कंट्रोल्ड है। इसमें 3.75 मीटर चौड़ी सर्विस रोड, 17 टोल प्लाजा 8 मुख्य पुल और 381 अंडरपास शामिल हैं।
यह भारत का पहला ऐसा एक्सप्रेस है जिस पर होटल, ढाबा और ईवी चार्जिंग स्टेशन से लेकर अस्पताल तक बनाए गए हैं। इस एक्सप्रेस वे पर विश्वस्तरीय फूड चेन और मोटेल तक की सुविधाएं मिलेगी। 594 किमी लंबे इस एक्सप्रेस वे का 80 प्रतिशत निर्माण अडानी इंटरप्राइजेज ने किया है।अडानी ने प्रयागराज से बदायूं तक 464 किमी लंबा एक्सप्रेस वे बनाया है जबकि शेष 20 प्रतिशत आईआरबी इंफ्रास्ट्रक्चर ने बनाया है।
एक्सप्रेस वे मतल्टीनेशनल चेन भी उपलब्ध – एक्सप्रेस वे पर लखनऊ के खानपान और चिकनकारी की झलक दिखाई पड़ेगी। इस वे पर एक बड़ा डाइनिंग फूड एरिया विकसित किया गया है। पहली बार किसी एक्सप्रेस वे पर ट्रक लेन बनाया गया है। मोटेल भी तैयार हो गया है जहां विश्राम के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त कमरे उपलब्ध हैं। स्टारबक्स जैसे बड़े ब्रांड के साथ गंगा भोग ढाबा भी है। इसमें लोकप्रिय मुरथल ढाबे को लाने का भी प्रयास चल रहा है। यहां पर एक ट्रामा सेन्टर भी तैयार किया गया है।एक्सप्रेस वे पर सुविधा केंद्रों में बच्चों के लिए चिल्ड्रन प्ले एरिया भी बनाया गया है जहां बच्चों के खेलने के लिए झूला पार्क भी बनाया गया है।ड्राइवरों के लिए भी अलग- अलग विश्राम एरिया बनाया गया है।हर क्षेत्र में वाहनों के लिए सर्विस सेंटर बनाया गया है।यह एक्सप्रेस वे 12 जिलों को जोड़ते हुए प्रयागराज से मेरठ की दूरी मात्र 6 घंटे में समेट देगा। वाहनों की 120 किमी प्रति घंटा गति, एयर स्ट्रिप, हाईटेक टेाल और दुर्घटना रोकने वाली अलर्ट स्ट्रिप्स जैसी आधुनिक सुविधाओं से लैस यह एक्सप्रेस वे प्रदेश की कनेक्टिविटी के परिदृश्य को बदलकर रख देगा।
वायुसेना के लिए भी अहम बनेगा एक्सप्रेस वे – यह एक्सप्रेस वे नागरिकों का सफर आसान बनाने के साथ ही भारतीय वायुसेना की ताकत भी बनने वाला है। एक्सप्रेस वे पर शाहजहांपुर के जलालाबाद में 3.5 किमी की हवाई पट्टी का भी निर्माण किया गया है। आपातकालीन स्थिति व युद्ध होने पर रणनीतिक तौर पर यह हवाई पट्टी लड़ाकू विमानों के उतरने व उड़ान भरने के लिए भी इस्तेमाल की जा सकेगी। इस हवाई पट्टी का निर्माण सभी प्रकार के लड़ाकू व परिवहन विमानों के हिसाब से किया गया है। इस पर राफेल सुखोई -0 एमकेआई मिराज 2000 जगुआर और मिग 29 जैसे लडाकू और सी -130 जे सुपर हरक्यूलिस और एएन -32 जैसे वायुसेना के विमान उतरने के साथ-साथ उड़ान भी भर सकेंगे। इस पर रात में भी लड़ाकू विमानो के उतरने और उड़ान भरने की सुविधा होगी। इसके लिए एक्सप्रेस वे पर प्रीसिज़न अप्रोच लाइंटिंग सिस्टम व उन्नत नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। साथ ही इाई इंटेसिटी रनवे लाइटिंग का उपयोग किया गया है। हवाई पट्टी की सुरक्षा के लिए 250 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। जो किसी भी आपातकालीन स्थिति पर नज़र रखने के लिए सहायक हैं।
इस एक्सप्रेस वे का संचालन पूरी तरह आरम्भ हो जाने के बाद 12 जिलों के औद्योगिक विकास को गति मिलेगी जिससे क्षेत्र के युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे तथा पलायन कम होगा। प्रदेश सरकार की योजना इसके किनारे 27 औद्योगिक क्लस्टर बनाने की है जिसके लिए भूमि का अधिग्रहण हो चुका है और आवंटन चल रहा है।इससे रसद आपूर्ति, खाद्य प्रसंस्करण वस्त्र उद्योग और विनिर्माण क्षेत्र को नई ऊर्जा मिलेगी। मेरठ के खेल उद्योग, हापुड़ के हथकरघा, बंदायू के जरी जरदोजी और प्रयागराज के कृषि उत्पादों को अब दिल्ली और पूर्वांचल के बाजारो तक पहुंचना आसान होगा।
प्रमुख विशेषताएं – इस एक्सप्रेस वे की पूरी सड़क पर जल संचयन प्रणाली लगाई गई है ताकि वर्षा का जल सीधे जमीन के अंदर जाए और भूजल स्तर पर बना रहे। यह भारत का सबसे लंबा निरंतर नियंत्रित प्रवेश एक्सप्रेस वे है जहां आवारा पशुओं व स्थानीय यातायत के अनियंत्रित प्रवेश को पूरी तरह से रोका गया है। यह परियोजना टिकाऊ इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन उदाहरण है। इसके निर्माण में भारी मात्रा में कोयले की राख का उपयोग किया गया है जो प्रदूषणा कम करने में सहायक है। पहले सभ्यताएं नदियों के किनारे बसती थीं किंतु अब एक्सप्रेस वे के किनारे होती हैं इसे ध्यान मे रखते हुए एक्सप्रेस वे किनारे 18 लाख से अधिक पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया है। गंगा एक्सप्रेस वे के निर्माण की गुणवत्ता को एक्सीलेंट रेटिंग मिली है ।
विशिष्ट सुरक्षा तकनीक भी – यहां पर विशिष्ट सुरक्षा तकनीक का प्रयोग किया गया है। सड़क के दोनों किनारों पर व्हाइट एलर्ट स्ट्रिप लगाई गई है। यदि किसी चालक को झपकी आ जाए और वाहन इन स्ट्रिप पर चढ़ जाए तो तेज कंपन और आवाज पैदा होगी जिससे चालक तुरंत सतर्क हो जाएगा और दुर्घटना टल जाएगी। इस सड़क पर चलने के दौरान झटके और कंपन महसूस नही होंगे।
मंदिर आर्थिकी व पर्यटन को गति मिलेगी – गंगा एक्सप्रेस वे का निर्माण हो जाने के बाद अब मंदिर आधारित आर्थिकी व पर्यटन को भी गति मिलेगी। यह एक्सप्रेस वे यात्रा को ही आसान नहीं करेगा अपितु प्रदेश में आध्यात्मिक व धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा देगा । 12 जिलों से होकर गुजरने वाले इस एक्सप्रेस वे से प्रमुख आध्यात्मिक व धार्मिक स्थल जुड़ रहे हैं – इनमें गढ़मुक्तेश्वर, कल्कि धाम, बेल्हा देवी धाम, चंद्रिकादेवी शक्ति पीठ और त्रिवेणी संगम शामिल हैं। एक्सप्रेस वे शुरू हो जाने के बाद श्रद्धालु इन तीर्थों के दर्शन आसानी से कर सकेंगे । आगामी समय में वाराणसी, मिर्जापुर और सोनभद्र तक इसका विस्तार किया जिससे वाराणसी , विन्ध्याचल और अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि होगी।

April 28, 2026

महिला आरक्षण से नारी का होगा सशक्तिकरण?

Reservation for Women in Parliament

Posted on 28.04.2026 Tuesday Time 08.25 AM. Reservation bill for Women, Article by Dileep Kumar Shrivastava, Barabanki 
निकाय चुनाव में महिलाओं का आरक्षण लागू होने के बाद भी, निर्वाचित महिलाएं घर बैठी, पिता, पति ,देवर व भाई प्रतिनिधि बनकर कर रहे हैं कार्य
दिलीप कुमार श्रीवास्तव
बाराबंकी। इन दिनो गली चौराहो तथा राजनीतिक गलियारों में महिला आरक्षण बिल की चर्चाएं आम है, जहां सत्ता पक्ष विपक्ष पर महिलाओं के सपनों को कुचलने की बात कर रहा है ,वहीं विपक्ष का कहना है जब 2023 में सर्वसम्मत से दोनों सदनों में महिला आरक्षण बिल पास हो चुका है तो उसमें संशोधन क्यों?।
लोकसभा व राज्यसभा में ‘नारी शक्ति वंधन अधिनियम पास हो चुका है तो उसे ढाई साल तक लागू क्यों नहीं किया गया।
सभी राजनीतिक दल महिला आरक्षण बिल पर सिर्फ वोट की राजनीति करते हैं।
वास्तव में अगर सभी राजनीतिक दल नारियों का सशक्तिकरण चाहते हैं तो निकाय चुनाव में लागू महिला आरक्षण के तहत निर्वाचित महापौर, अध्यक्ष, ग्राम प्रधान , सदस्य, सभासद, पार्षद ,ब्लॉक प्रमुख आदि पदों पर निर्वाचित महिलाओं के पति, पिता, देवर, भाई,भतीजे प्रतिनिधि बनकर निर्वाचित महिलाओं को घर बिठाकर सारे कार्य स्वयं क्यों निपटा रहे हैं। अगर कुछ अपवादों को किनारे कर दिया जाए तो 80% निर्वाचित महिलाएं सिर्फ घर के कार्य निपटा रही हैं, और उनके सारे कार्य उनके अपने सगे संबंधी कार्यालय में स्वयंभू बनकर निपटाते हैं, क्या ऐसे ही नारी सशक्तिकरण होगा।
जमीनी हकीकत से सभी राजनीतिक दल अंजान बने हुए हैं, वोट बैंक की राजनीति छोड़कर सभी दल एक स्वर से लोकसभा व विधानसभा में कानून बना दे कि निकाय चुनाव में निर्वाचित महिलाओं के सगे संबंधी पति-पिता देवर भाई प्रतिनिधि बनकर निकाय कार्यालय, बैठकों में प्रवेश नहीं करेंगे। अगर ऐसा कानून पारित हो जाए तो ही नारी का सशक्तिकरण होगा। तभी महिलाओं को अपने अधिकारों की सही जानकारी होगी और तभी वह सही निर्णय ले पाएंगी।
निकाय में निर्वाचित महिलाओं के सगे संबंधी ही आम जनता के आय, जाति, निवास प्रमाण पत्र स्वयं हस्ताक्षर करके बना रहे हैं।
अगर महिलाओं को शक्तिशाली बनाना है तो पहले उन्हें उनके अधिकार देने होंगे, लोकसभा विधानसभा में महिला आरक्षण बिल 2023 न लागू होने के बाद भी सभी राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट देने के लिए स्वतंत्र है, कौन रोक रहा उन्हें किन्तु जमीनी हकीकत में ऐसा होता नहीं है।

April 21, 2026

आदिगुरु शंकराचार्य की दिग्विजय यात्रा

आदि गुरु शंकराचार्य

POSTED ON 21.04.2026 TIME 09.02 AM

आदि शंकराचार्य को भारतीय संस्कृति में ‘एकता के देवदूत’ के रूप में देखा जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने विचारों, यात्राओं और कार्यों के माध्यम से पूरे भारत को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। आचार्य ने भारतवर्ष में सर्वत्र अद्वैत मत के प्रचार करने का संकल्प लिया और सम्पूर्ण भारत-भ्रमण किया विरोधियों से शास्त्रार्थ कर उन्हें परास्त लिया एवं सर्वत्र अद्वैत वेदांत की वैजयंती फहराई।

आचार्य शंकर के साथ उनके भक्त शिष्यों की एक वृहत मंडली थी। साथ ही साथ वैदिक धर्म के परम हितेषी राजा सुधन्वा भी आकस्मिक आपत्तियों से बचाने के लिए इस मंडली के साथ थे। इस प्रकार यह मंडली भारतवर्ष के प्रधान तीर्थ तथा धर्म क्षेत्र में जाती, विरोधियों की युक्तियों को आचार्य खंडन करते और अपने अद्वैत मत में दीक्षित करते। आचार्य शंकर का यह तीर्थ भ्रमण दिग्विजय के नाम से प्रख्यात है।  शंकर के चरितग्रंथों में इसी का विशेष रूप से वर्णन रहता था। इसीलिए वे शंकर दिग्विजय के नाम से प्रख्यात होते आए हैं।

आदिगुरु शंकराचार्य का प्रवास (मुख्य स्थान)

काशी : इस पुण्यमयी विश्वनाथपुरी के साथ शंकराचार्य का बड़ा ही घनिष्ठ सम्बन्ध है। आचार्य को अपने लक्ष्य की सिद्धि में काशीवास से बहुत ही लाभ हुआ। माधव के कथनानुसार भगवान्‌ विश्वनाथ की स्पष्ट आज्ञा से शंकर ने ब्रह्मसूत्रों पर भाष्य लिखने का संकल्प किया जिसे उन्होंने ‘उत्तर काशी’ में जाकर पूरा किया। आनन्दगिरि तो काशी को ही भाष्यों के प्रणयन का स्थान मानते हैं । यहीं रहते समय वेदव्यास से शंकराचार्य का साक्षात्कार हुआ था। यहीं आचार्य ने कर्म, चन्द्र, ग्रह, क्षपणक, पितृ, गरुड, शेष, सिद्ध-आदि नाना मतों के सिद्धान्तो का खण्डन कर वैदिक मार्ग की प्रतिष्ठा की थी। काशी में मणिकर्णिका घाट के ऊपर हो आचार्य का निवास था।[1]

उज्जैनी : यह स्थान आज भी धार्मिक महत्व रखता है। यह मालवा प्रांत का प्रधान नगर है। भारत की सप्तपुरियों में यह अन्यतम नगरी रही है। आचार्य के समय में यहां का कापालिक मत का विशेष प्रचार था। यहां उन्होंने दो महीने तक निवास किया। आनंद गिरि के कथन अनुसार उम्मत भैरव नामक शूद्र जाति का कापालिक यही रहता था। वह अपनी सिद्धि के सामने किसी को न तो उपासक ही मानता था न ही पंडित। उसे भी शंकर के हाथों पराजय स्वीकार करने पड़ी।[2]

इंद्रप्रस्थपुर : यह स्थान प्राचीन इंद्रप्रस्थ अर्थात आधुनिक दिल्ली है। शंकराचार्य के समय में यहां इंद्र के महत्व का प्रतिपादन करने वाले धार्मिक संप्रदाय का बोलबाला था। आचार्य के साथ इन लोगों का संघर्ष हुआ था। पराजित होकर उन्होंने अद्वैत मत को अंगीकार कर लिया।[3]  इसके साथ ही शंकराचार्य जी अयोध्या भी पधारे थे परन्तु इस स्थल की किसी भी घटना का उल्लेख नहीं है।

जगन्नाथ : सप्तपुरियों में यह अन्यतम पुरी है। उड़ीसा देश में समुद्र तट पर यह अवस्थित है। यह पुरी के ही नाम से विख्यात है यही कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की काष्ठ से बनी प्रतिमाएं हैं। शंकराचार्य जी के चार धामों में यह भी प्रधान धाम है। शंकराचार्य ने यहां पर अपना गोवर्धन पीठ स्थापित किया।[4]

द्वारका : भारत के पश्चिमी समुद्र के तीर पर द्वारकापुरी विराजमान है। यहां आचार्य ने अपना पीठ स्थापित किया जो शारदा पीठ के नाम से विख्यात है।[5] 

पंढरपुर : इस स्थान पर पांडुरंग की प्रसिद्ध प्रतिमा है। महाराष्ट्र देश में यह सबसे अधिक विख्यात वैष्णव क्षेत्र है। यहां का प्रसिद्ध मंत्र है पुंडरीक वरदे विट्ठल। विट्ठलनाथ कृष्ण के ही रूप है। शंकर ने पांडुरंग की स्तुति में एक स्तोत्र भी लिखा है।[6]

प्रयाग : माधव ने त्रिवेणी के तट पर मीमांसक कुमारिल भट्ट के साथ शंकर के भेंट करने की बात लिखी है। आनंद गिरि ने वरुण वायु आदि के उपासक शून्यवादी बराहमतानुयायी, लोक-गुण-सांख्य-योग तथा वह वैशेषिक मतवादियों के साथ शास्त्रार्थ करने की घटना का उल्लेख मिलता है।[7]

मायापुरी : इस स्थान को वर्तमान में हरिद्वार के नाम से जाना जाता है। इस स्थान से शंकराचार्य का विशेष संबंध रहा है। बद्रीनाथ जाते समय शंकराचार्य इधर से ही गए थे। ऐसी मान्यता है कि विष्णु की प्रतिमा को डाकुओं के डर से पुजारी लोगों ने गंगा के प्रवाह में डाल दिया था। शंकर ने इस प्रतिमा का उद्धार कर फिर इसकी प्रतिष्ठा की।[8]

श्रीपर्वत : आजकल यह स्थान मद्रास प्रांत के कर्नूल जिले का प्रसिद्ध देवस्थान है। यहां का शिव मंदिर बड़ा विशाल तथा भव्य है। प्राचीन काल में यह सिद्ध क्षेत्र माना जाता था। शंकराचार्य के समय में यह मुख्य केंद्र प्रतीत होता है। शंकराचार्य का उग्रभैरव के साथ यहीं पर संघर्ष हुआ था।[9]

वस्तुतः ये सभी स्थान धार्मिक महत्त्व के हैं, अतः शंकराचार्य का इन स्थानों में जाना तथा विरोधीमत वालों को परास्त करना स्वाभाविक प्रतीत होता है। द्वारिका, जगन्नाथपुरी, बदरी तथा रामेश्‍वर के पास तो उन्होंने मठों की स्थापना की।

नेपाल में शंकराचार्य

नेपाल से शंकराचार्य का घनिष्ठ संबंध रहा है। नेपाल में पशुपतिनाथ की पूजा यथार्थ रूप से नहीं हो रही थी। नेपाल बौद्ध धर्म का प्रधान प्रधान केंद्र माना जाता है। यहां के निवासी अधिकांश बौद्ध मत को मानने वाले थे अतः पशुपतिनाथ की वैदिक पूजा की उपेक्षा करना नितांत स्वाभाविक था। पशुपतिनाथ का अष्टमूर्ति शंकर में अन्यतम स्थान है। वे यजमान मूर्ति के प्रतिनिधि हैं। इसलिए उनकी मूर्ति मनुष्य आकृति है। यह स्थान प्राचीन काल से ही बड़ा पवित्र तथा गौरवशाली माना जाता था। यह पवित्रता आज भी अक्षुण्ण रूप से बनी हुई है। परंतु शंकर के समय में बौद्ध धर्म के बहुत प्रचार के कारण पशुपतिनाथ की पूजा में शैथिल्य आ गया था इसी को दूर करने के लिए शंकर अपने शिष्य मंडली के साथ नेपाल में पहुंचे। उस समय नेपाल में ठाकुर वंश के राजा राज्य करते थे। तत्कालीन राजा का नाम शिवदेव था। ये नरेंद्र देव वर्मा के पुत्र थे। उस समय नेपाल और चीन का घनिष्ठ राजनीतिक संबंध था। चीन के सम्राट ने नरेंद्रदेव को नेपाल का राजा स्वीकृत किया था। नेपाल नरेश ने शंकराचार्य जी की बड़ी अभ्यर्थना की और आचार्य चरण के आगमन से अपने देश को धन्य माना। आचार्य ने बौद्ध को परास्त कर उस स्थान को उनके प्रभाव से मुक्त कर दिया। पशुपतिनाथ की वैदिक पूजा की व्यवस्था उन्होंने ठीक ढंग से कर दी। आज भी पशुपतिनाथ के मंदिर के पास ही शंकराचार्य का मठ है और थोड़ी ही दूरी पर शंकर तथा दत्तात्रेय की मूर्तियां आज भी श्रद्धा तथा भक्ति से पूजी जाती है।[10]

 

[1] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 130

[2] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 127

[3] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 127

[4] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 131

[5] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 132

[6] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 132

[7] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 132

[8] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 134

[9] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 136

[10] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 139

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