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Shri Ram Mandir: विश्वास, समर्पण और सार्वजनिक जीवन में सावधानी की सीख

July 11, 2026

Shri Ram Mandir: विश्वास, समर्पण और सार्वजनिक जीवन में सावधानी की सीख

Champatrai General Secretary Shri Ram Janmbhumi Teerth Kshetra Trust

अखिलेश शर्मा

श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें उन लोगों का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा जिन्होंने दशकों तक बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। ऐसे ही व्यक्तित्वों में विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का नाम प्रमुखता से आता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। संगठन, संघर्ष और सेवा के कारण वे करोड़ों रामभक्तों के बीच सम्मानित हैं।
हाल के दिनों में चंपत राय एक ऐसे विवाद के केंद्र में आ गए, जिसने यह संदेश दिया कि सार्वजनिक जीवन में केवल ईमानदारी ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि हर कदम पर सतर्कता भी आवश्यक होती है। चर्चा इस बात की रही कि वे अपने निकट के लोगों पर अत्यधिक विश्वास कर बैठे और इसी अति विश्वास ने उन्हें अनावश्यक विवादों में ला खड़ा किया। राजनीति, सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं में यह एक पुरानी कहावत है कि “विश्वास आवश्यक है, लेकिन सत्यापन उससे भी अधिक आवश्यक है।”
चंपत राय का व्यक्तित्व सदैव सादगी, अनुशासन और संगठन के प्रति समर्पण का रहा है। उन्होंने कभी व्यक्तिगत प्रचार को महत्व नहीं दिया और हमेशा स्वयं को रामकाज का एक साधारण कार्यकर्ता बताया। यही कारण है कि उनके समर्थकों का मानना है कि यदि उनसे कोई चूक हुई भी है तो वह किसी निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपने सहयोगियों पर अधिक भरोसा करने के कारण हुई।
सार्वजनिक जीवन में कार्य करने वाले लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि वे अपने आसपास ऐसे लोगों का चयन करें जो उनके विश्वास पर खरे उतरें। कई बार प्रतिष्ठित व्यक्तियों की वर्षों की कमाई हुई साख कुछ लोगों की लापरवाही या गलत आचरण के कारण प्रभावित हो जाती है। इसलिए किसी भी संस्था की मजबूती के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और समय-समय पर तथ्यों का परीक्षण आवश्यक माना जाता है।
राम मंदिर आंदोलन करोड़ों लोगों की आस्था का विषय रहा है। मंदिर निर्माण पूर्ण होने के बाद भी ट्रस्ट और उससे जुड़े प्रत्येक पदाधिकारी पर समाज की निगाह रहती है। ऐसे में किसी भी प्रकार का विवाद स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन जाता है। यही कारण है कि ट्रस्ट से जुड़े लोगों से सामान्य से भी अधिक सावधानी और पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है।
चंपत राय के समर्थकों का कहना है कि उनके दशकों के योगदान को किसी एक विवाद की कसौटी पर नहीं परखा जाना चाहिए। वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही की मांग करने वाले लोगों का मानना है कि जितना बड़ा पद, उतनी ही अधिक पारदर्शिता और उत्तरदायित्व भी आवश्यक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यही स्वस्थ परंपरा मानी जाती है।
यह पूरा घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि समर्पण और निष्ठा जितने आवश्यक हैं, उतनी ही आवश्यक विवेकपूर्ण सतर्कता भी है। किसी भी बड़े संगठन में व्यक्तिगत विश्वास के साथ-साथ संस्थागत व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए ताकि किसी प्रकार की भ्रांति या विवाद की संभावना कम हो।
भगवान श्रीराम के आदर्श भी यही सिखाते हैं कि धर्म, मर्यादा, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलते हुए प्रत्येक निर्णय पूरी सावधानी और निष्पक्षता के साथ लिया जाए। यदि इस घटना से कोई सीख निकलती है तो वह यही है कि सार्वजनिक जीवन में विश्वास और पारदर्शिता दोनों का संतुलन ही व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी होता है।

July 1, 2026

इच्छाधारी’ आस्था का चुनावी गणित

प्रणय विक्रम सिंह

अयोध्या के संदर्भ में विपक्ष की नई-नई जागी श्रद्धा को देखकर मुझे लगा कि रामचरितमानस में तुलसीदास जी से एक बहुत बड़ी चूक हो गई है।

वे मारीच, सुबाहु और कालनेमि जैसे दिव्य भेष बदलने वाले मायावियों को त्रेतायुग में ही निपटा गए। उन्हें जरा रुकना चाहिए था। वे आज के युग में आते, तो देखते कि भेष बदलने की यह कला अब केवल राक्षसों की बपौती नहीं रही, इसका लोकतांत्रिक विकास हो चुका है और अब इसके सबसे कुशल अभ्यासकर्ता हमारे राजनेता हैं।

सुना है, कल तक जो लोग भगवान राम को केवल एक अदालती एफेडेविट का ‘काल्पनिक पात्र’ मानते थे, आज वे चुनाव की आहट सुनते ही हाथ में आस्था का नया-नवेला थर्मामीटर लेकर घूम रहे हैं। वे ट्विटर पर अयोध्या को ‘अनुपम और अनुकरणीय धार्मिक नगरी’ बनाने की वैसी ही पवित्र कसमें खा रहे हैं, जैसी कसमें एक जेबकतरा अपनी ईमानदारी सिद्ध करने के लिए कोट कचहरी में खाता है।

इस दिव्य और त्वरित हृदय परिवर्तन को देखकर मुझे गिरगिटों की मानसिक स्थिति पर तरस आता है। बेचारे डिप्रेशन में होंगे कि जिस हुनर के लिए वे सदियों से बदनाम थे, उसमें कुछ सैफई ब्रांड समाजवादी इंसानों ने पीएचडी कर ली और उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा।

आखिर कोई उस राम-नाम का जाप इतनी पवित्रता से कैसे कर सकता है, जिसके राजनीतिक कुनबे का पूरा इतिहास ही राम-विरोध की खाद पर फला-फूला हो?

आजकल वे फीता लेकर निकले हैं। पूछ रहे हैं कि *अयोध्या से गोरखपुर कितनी दूर है?* नेताजी, दूरी नापने का यह शौक नया है। पर आप गलत नक्शा देख रहे हैं। अयोध्या से गोरखपुर की दूरी तो उतनी ही है, जितनी *सत्य और सनातन* के बीच होती है। यानी दोनों आपस में जुड़े हैं। पर आपके ‘पारिवारिक सिंडिकेट’ और रामराज्य के बीच की दूरी अनंत है, जिसे नापने के लिए आपके पास न तो नैतिक पैमाना है और न ही वैसा चरित्र। अच्छा होता कि आप इस दूरी को नापने से पहले यह बता पाते कि राम के प्रति आपकी खानदानी नफरत और आपके वोटबैंक के लालच के बीच कुल कितने किलोमीटर का फासला है?

जब आदमी को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती दिखती है, तो उसे इतिहास की कड़वी यादें भूलने का ‘अल्जाइमर’ रोग हो जाता है। लेकिन जनता की याददाश्त बहुत क्रूर होती है, नेताजी। जनता को आज भी याद है कि जब आपके पूज्य पिताजी की हुकूमत थी, तब अयोध्या की पावन गलियों में कोई भजन नहीं गूंज रहा था, बल्कि निहत्थे रामभक्तों का खून बह रहा था। तब आपकी सरकारी मशीनरी मंदिर के पत्थरों को ज़ब्त करने में वैसी ही मुस्तैदी दिखा रही थी, जैसी मुस्तैदी कोई डकैत माल समेटने में दिखाता है। और उसी पावन दौर में, पुलिस थानों और जेलों में कृष्ण जन्माष्टमी मनाने पर ऐसा प्रतिबंध था, मानो कंस खुद लखनऊ के सचिवालय में आकर बैठ गया हो।

जो लोग कल तक रामलला के प्राण-प्रतिष्ठा के निमंत्रण पत्र को अछूत मानकर ठुकरा रहे थे, आज वे ‘सियाराम-धाम’ के पुनरुद्धार का ठेका लेने की बात कर रहे हैं। यह वैसा ही है जैसे बिल्ली चूहों की सुरक्षा के लिए एक सर्वदलीय समिति बनाने का प्रस्ताव रखे।

राम की सेवा के लिए ‘भेष’ और ‘ट्वीट’ बदलने की नहीं, ‘भाव’ बदलने की जरूरत होती है। पर आपके पास तो वही पुराना हलफनामा है, जो आपने कभी सर्वोच्च न्यायालय में जमा किया था। आपकी पूरी राजनीतिक पूंजी ही यही रही है कि जब तक सत्ता में रहो, हिंदुओं की आध्यात्मिक भावनाओं को वैसे ही कुचलो जैसे रास्ते का कंकड़ कुचला जाता है, और जब चुनाव आ जाएं, तो माथे पर एक लंबा सा छद्म टीका लगाकर ‘इच्छाधारी रामभक्त’ की मुद्रा में जनता को सम्मोहित करने निकल पड़ो।

मेरी की एक बात हमेशा याद रखिएगा भैयाजी, आप भगवान को धोखा दे सकते हैं क्योंकि वे घट-घट वासी होकर भी चुप रहते हैं, पर जनता को नहीं, क्योंकि वह सब देखकर सही समय पर ईवीएम का बटन दबाती है।

सुना है, आपने तो अयोध्या का राजा ही बदल दिया। जबकि सभी सनातनियों के लिए त्रेता युग से आज तक अयोध्या के राजा श्री रामचन्द्र जी हैं। जो काम लंका का रावण अपनी पूरी दस खोपड़ियों की ताकत लगाकर नहीं कर पाया, वह आपने अपने वोटबैंक को खुश करने के लिए बड़ी सरलता से कर दिया। कई दिनों तक संसद में अपने बगल में उनको बैठाकर घुमाते रहे। राम से इतनी घृणा कि उन्हें अयोध्या के राजा के रूप में स्वीकार करने में आपकी छाती फटने लगती है, इसलिए आपने प्रतीकों का नया बाज़ार सजा लिया। आपका यह दोहरा चरित्र और अतीत उत्तर प्रदेश के हर रामभक्त के सीने में एक गहरे घाव की तरह आज भी टीस रहा है।

याद रखिए, इतिहास की स्याही बहुत पक्की होती है, वह आपके इन बनावटी और सुगठित ट्वीट्स के ‘थूक’ से नहीं धुलेगी। 10 नवंबर 1990 का वह अंधकारमय काला दिन, निहत्थों का रक्तपात, थानों में जन्माष्टमी पर पाबंदी और पावन पत्थरों का अपमान, यह सब आपके माथे पर वो अमिट कलंक हैं, जिन्हें धोने के लिए यदि आप सरयू का पूरा पानी भी इस्तेमाल कर लें, तो भी कम पड़ेगा।

अयोध्या अब सज चुकी है, दिव्य और भव्य हो चुकी है। वहां अब आपके पाखंड का कोहरा नहीं, बल्कि प्रभु राम का ‘परम प्रकाश’ जगमगा रहा है। और इतिहास गवाह है कि जब प्रकाश उदित होता है, तो अंधेरे के व्यापारियों का विसर्जन अपने आप हो जाता है। आपका भी होना निश्चित है।

June 20, 2026

Yoga Day विश्व को भारत की अनुपम देन योग

Posted on 20.06.2026 Saturday, Time 08.29 PM Article World Yoga Day, by Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News

समग्र स्वास्थ्य की गारंटी योग
सर्वेश कुमार सिंह
योग विश्व को भारत की अमूल्य देन है। कई हजार साल की खोज, अनुसंधान और प्रमाणित परिणामों के बाद भारत के ऋषि,मुनियों ने योग को प्रतिपादित किया। योग के महत्व और समग्र स्वास्थ्य की रक्षा के लिए भारतीय जनमानस इसे सदियों से अपना रहा है। लेकिन आधुनिक भारत में योग से विश्व को परिचित कराने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को है। उनके सदप्रयासों और दूरदृष्टि से योग को संयुक्त राष्ट्र महासभा में मान्यता मिली और 21 जून विश्व योग दिवस घोषित हो सका।
संयुक्त राष्ट्र महासभा का सर्वसम्मत प्रस्ताव
योग ऐसा विषय है, जिसे विश्व ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया है। आम तौर पर संयुक्त राष्ट्र महासभा के संकल्प और प्रस्ताव मतदान से पारित और स्वीकृत होते है। लेकिन 21 जून को विश्व योग दिवस घोषित करने का प्रस्ताव मतदान से नहीं बल्कि 193 सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से पारित किया। इस प्रस्ताव को जब औपचारिक रूप से 27 सितंबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महासभा की 69वीं बैठक में अपने भाषण के बाद प्रस्तुत किया तो 177 देश प्रस्ताव के सह प्रायोजक बने। इसके बाद 11 दिसंबर 2014 को महासभा ने सर्वसम्मत निर्णय लिया कि 21 जून विश्व योग दिवस होगा।
भारतीय ज्ञान परंपरा में शीर्ष पर
भारत ज्ञान और विज्ञान के शीर्ष पर रहा है। प्राचीन ज्ञान के रूप में आध्यामिक चेतना के साथ ही योग ने मानव के समग्र विकास, समग्र स्वास्थ्य और समग्र उन्नयन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रमाणित की है। पतंजलि के अष्टांग योग में सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य के उपाय सिर्फ आसन ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान के तत्व मौजूद है। ये आठ अंग यम, नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि मानव के संपूर्ण स्वास्थ्य और व्यक्तित्व का निर्माण करते है। योग समाज में एकात्मकता और कार्यकुशलता निर्माण करने का केंद्रीय तत्व है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में योग का वर्णन करते हुए कहा है “योग: कर्मसुकौशलम”। योग यूज धातु से बना शब्द है, जिसका अर्थ है, जोड़ना। योग को “यूज्यतेसौ योग:” कहा है। अर्थात जो युक्त करे उसे योग कहते हैं। पतंजलि योग दर्शन कहता है “योगषःचित्तवृत्ति निरोध:”।
विश्व में योग का प्रसार
योग के आदि जनक भगवान शिव है। योग को आदि, वैदिक और पौराणिक काल में भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही महर्षि पाराशर, व्यास जी, अष्टावक्र और पतंजलि ने अलग अलग समय और युग में प्रतिपादित किया। इनके द्वारा रचित और उद्बोधित साहित्य में योग वर्णित है। इनमें प्रमुख रूप से उपनिषद, योग वशिष्ठ, योग सूत्र, भगवद्गीता, योग दर्शन आदि है।
आधुनिक विश्व में गत लगभग दो सौ वर्ष में भारत के अनेक ऋषि, सन्यासी और आध्यात्मिक गुरुओं ने इसे प्रचारित और प्रसारित किया। इन महानुभावों ने योग की महत्ता से पश्चिमी जगत को परिचित कराया। इन महापुरुषों में स्वामी विवेकानंद, स्वामी शिवानंद, स्वामी यतीश्वरानंद, स्वामी रंगनाथानंद, महर्षि महेश योगी, परमहंस योगानंद, श्रीश्री रविशंकर प्रमुख है। भारत में योग को 21वीं सदी में लोकप्रिय बनाने में बाबा रामदेव का उल्लेखनीय योगदान है।
गीता प्रेस का योगदान
योग पर साहित्य प्रकाशन में गोरखपुर का गीता प्रेस संस्थान अग्रणी है। गीता प्रेस ने यूं तो सनातन संस्कृति की सेवा में अनेक ग्रंथों, पुस्तकों का प्रकाशन किया है। लेकिन उसके द्वारा योग पर प्रकाशित साहित्य अतुलनीय है। गीता प्रेस ने योग पर चार उपयोगी, संग्रहणीय विशेषांक प्रकाशित किए है। कल्याण पत्रिका के विशेषांकों के रूप में गीता प्रेस ने 1935 में “योगांक” प्रकाशित किया। इसमें 141 लेख समाहित हैं। 1980 में “निष्काम कर्मयोग” विशेषांक प्रकाशित किया। इसमें 177 लेख समाहित हैं। इसके बाद 1999 में “योगतत्त्व अंक” प्रकाशित किया। इसमें 170 लेख समाहित हैं।

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

June 18, 2026

पहले चंपतराय को जाने

Posted on 18.06.2026, Thursday, Champatray Vishva Hindu Parishad, aSecretary General Shri Ram Janmbhumi Teerth Kshetra Trust Ayodhya
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे को लेकर चर्चा है। सच क्या है एसआईटी जांच रिपोर्ट में पता चलेगा। लेकिन मीडिया, सोशल मीडिया में कई नामों को आरोपित किया जा रहा है। समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी ने ट्रस्ट, संघ और भाजपा को निशाना बनाया है। ये उनकी भविष्य की रणनीति है। संदेह पैदा हुआ है तो सच सामने आना चाहिए।
मुझे सिर्फ चंपत जी के बारे में बात करनी है। वह भी इसलिए कि बगैर किसी आधार, तथ्य और प्रमाण के उन पर आरोप लगाए जा रहे है। आज अखिलेश यादव ने एक वीडियो शेयर किया है,जिसमें आल्हा की तर्ज पर इस प्रकरण को किसी गायक से तैयार कराया गया है। इसमें सीधे चंपत जी को आरोपित करके उनकी मानहानि की गई है। इस गायक और शेयर करने वालों को एसआईटी जांच रिपोर्ट के बाद अपनी गलती का अहसास होगा।
मैं चंपत जी को केवल पत्रकार के रूप में नहीं एक विद्यार्थी और शिक्षार्थी के रूप में 49 साल से जानता हूं। यानी कि 1977 से जब मैं 11वीं का छात्र था। उस समय चंपत जी संघ में थे, लेकिन प्रचारक नहीं थे। वे धामपुर (बिजनौर) के आरएसएम डिग्री कॉलेज में फिजिक्स के प्रवक्ता था। यानी डिग्री कॉलेज में वेतनभोगी। उन्होंने 1980 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन विभाग प्रचारक (मुरादाबाद) ओमप्रकाश जी की प्रेरणा से प्रचारक जीवन स्वीकार किया। जिस दिन ओमप्रकाश जी ने उनसे कहा नौकरी छोड़ दो उसी दिन उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। प्रचारक बन गए। संघ ने परंपरा के विपरीत उन्हें सीधे देहरादून का जिला प्रचारक बनाया। संघ में आमतौर पर कोई सीधे जिला प्रचारक नहीं बनता है। वे नगीना के बेहद सामान्य परिवार से है, परिवार में उनके बड़े भाई इंजीनियर से सेवानिवृत्त हुए है। अगर चंपत जी को धन की लालसा होती तो वे नौकरी में रहते। आज डिग्री कॉलेज के प्रिंसिपल से सेवानिवृत्त होते।
1977 से मेरा चंपत जी से परिचय आरम्भ हुआ और आज तक यथावत है। मैने उन्हें जिस सादगी में 1977 के एक प्रशिक्षण में अमरोहा में जैसे देखा, वैसे ही आज भी है। कम लोग जानते है कि जब 1984 में दिल्ली की धर्म संसद के बाद श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को विश्व हिंदू परिषद ने अपने हाथ में लिया, तो संघ से अशोक सिंहल जी समेत कई प्रचारक विहिप में भेजे गए थे। उनमें चंपत जी भी थे। उन्हें पश्चिम उत्तर प्रदेश प्रांत का संगठन मंत्री बनाया गया था। इस आंदोलन से प्रत्यक्ष रूप में अनेक नाम जुड़े है लेकिन पर्दे के पीछे रहकर रणनीति बनाने, क्रियान्वित करने, मुकदमों की सिस्टेमेटिक पैरवी करने, तथ्य एकत्रित करने का काम चंपत जी ने किया। सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमे की हर तारीख से पहले वकीलों की दिल्ली में बैठके कराते थे। मैं उन दिनों दिल्ली में था।
विश्व हिन्दू परिषद पर 2017-18 में ऐतिहासिक संकट आया था। जब कार्यकारी अध्यक्ष डॉ प्रवीण तोगड़िया जी के साथ नेतृत्व का टकराव हुआ। उस संकट से विहिप को चंपत जी के नेतृत्व ने ही उबारा था। जिस दिन डा तोगड़िया जी ने आरके पुरम कार्यालय पहुंचने की घोषणा की थी। उस दिन में संयोग से वहीं था।
चंपत जी विहिप में उपाध्यक्ष भी है। वे अशोक जी के अध्यक्ष रहते उनके साथ संगठन महामंत्री और महामंत्री भी रहे। अशोक जी का उन पर अटूट विश्वास था। उनके संघ और विहिप में प्रचारक जीवन पर कोई आरोप प्रत्यारोप कभी प्रमाणित नहीं हो सकता क्योंकि उनका लक्ष्य संगठन कार्य रहा है, धन कमाना होता तो शिक्षक की नौकरी का त्याग नहीं करते।
श्रीराम मंदिर निर्माण की नींव रखी जाने से लेकर उसकी पूर्णता और प्राण प्रतिष्ठा पूर्ण कराने तक उन्होंने जिस मनोयोग और विज्ञान के शिक्षक होने के नाते कौशल से कार्य पूर्ण कराया है उसके लिए उनका अभिनंदन किया जाना चाहिए। चंपत राय होना आसान नहीं है, एक जीवन होम करने के बाद कोई चंपतराय होता है।
मुझे अपने साथियों से भी आग्रह करना है। हमें सूचना देनी है और ये धर्म भी है और व्यवसायिक दायित्व भी। लेकिन तथ्यों के साथ ही। अतिशयोक्ति और सुनी हुई बातों को प्रकाशित करने से पहले जांच परख भी लेना चाहिए। मैं अपने निजी विश्वास से कह सकता हूं कोई भी जांच हो जाए, चंपत जी की निष्ठा और ईमानदारी निःसंदेह है।
सर्वेश कुमार सिंह, पत्रकार लखनऊ

 

June 17, 2026

अमेरिका-ईरान समझौता और भारत के हित

Posted on 17.06.2026 Time 10.18 AM, Wednesday, by Sarvesh Kumar Singh

सर्वेश कुमार सिंह

सोमवार को अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की सहमति बन गई। इसकी घोषणा भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से उनके मीडिया प्लेटफार्म सोशल ट्रूथ पर हो गई है। अभी समझौते पर डिजिटल हस्ताक्षर हुए हैं यानिकि भौतिक हस्ताक्षर होना बाकी है। भौतिक हस्ताक्षर होने के बाद ही समझौते को अंतिम माना जाएगा। ये हस्ताक्षर 19 जून को जिनेवा में होंगे। लेकिन, डिजिटल हस्ताक्षर वाले समझौते को अस्थायी समझौता माना जा सकता है। इसे यह भी माना जा सकता है कि दोनों देश सैद्धान्तिक रूप से युद्धविराम और एक व्यापक समझौते के लिए सहमत हो गए हैं।

प्रारंभिक समझौते का दुनिया के अधिकाश देशों ने स्वागत किया है। अलबत्ता इस्राइल ने समझौता मानने और इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया है। इस्राइल के अपने हित हैं, वह उनकी अनदेखी नहीं कर सकता है। लेकिन, डोनाल्ड ट्रंप इस्राइल पर समझौता मानने का दवाब बना रहे हैं, जिसे इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होने कहा है कि हमें अपने हित देखने हैं। इस्राइल लेबनान, गाजा और सीरिया से पीछे नही हटेगा। जबकि ईरान चाहता है कि समझौते में इस्राइल को भी शामिल किया जाए और वह लेबनान में हमले बंद करे, वहां कब्जा की गई जमीन को छोड़े। लेकिन, इस्राइल ने साफ कह दिया है कि यह समझौता इस्राइल के लिए बाध्यकारी नहीं है। हालांकि इस्राइल ने जो मुद्दे उठाये हैं वे भी अहम हैं जैसे उसने कहा है कि आरंभिक समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने या उसके नियंत्रण की कोई बात शामिल नहीं है। क्योंकि इस्राइल इस बात के लिए कटिबद्ध है कि वह ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। उधर ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को रोकने के लिए भी अमेरिका ने कोई शर्त नहीं लगाई है।  बैंजामिन ने कहा है कि न तो आज और न ही कल हम ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देंगे। इसलिए समझौते को इस्राइल ने सिरे से खारिज कर दिया है। उसने अमेरिका को साफ बता दिया है क उसे इस्राइल के आंतरिक और सैन्य मामलों में हस्तक्षेप करने का उसे कोई अधिकार नहीं है। इतना कड़ा रुख अपनाने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि यह समझौता आधा अधूरा ही है और युद्ध की आशंका आगे भी बनी रहेगी। इस्राइल और ईरान के बीच फिर किसी भी समय युद्ध छिड़ सकता है।

सोशल ट्रूथ पर डोनाल्ड ट्रंप ने कह दिया है कि अब होर्मुज खुल गया है। तेल की स्वतंत्र रूप से आवाजाही होगी। कोई टोल नही लगेगा। ईरान होर्मुज से बारूदी सुरंगें हटाएगा और अमेरिका ईरान के समुद्री तटों की नाकेबंदी खत्म करेगा। इससे दुनिया को राहत मिलेगी। स्वतंत्र रूप से तेल के टैंकर वाले जहाज होर्मुज से निर्बाध आवाजाही कर सकेंगे। साथ ही ईरान से भी तेल खरीदा जा सकेगा। लेकिन ट्रंप इस बात पर मौन हैं कि ईरान के 60 प्रतिशत संबर्धित यूरेनियम का क्या होगा। उस पर किसका निंयत्रण होगा। क्या उसे ईरान नष्ट करेगा। क्योंकि ऊर्जा क्षेत्र के लिए सिर्फ 5 प्रतिशत संबंर्धित यूरेनियम की ही आवश्यकता होती है। हालांकि ईरान ने यह भी कहा है कि अगले दौर की बातचीत में परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा को शामिल किया जा सकता है। फिलहाल यह समझौता अगले साठ दिन के लिए लागू होने जा रहा है। इन साठ दिनों में अमेरिका और ईरान एक दूसरे पर हमले नहीं करेंगे। यह युद्ध एक तरह से 108 दिन बाद समाप्ति की ओर है। माना जाना चाहिए कि अब दोनों के बीच हवाई और मिसाइल हमले नहीं होंगे।

समझौते का विश्व के अन्य देशों और खासकर भारत पर क्या प्रभाव होगा। यह जानना भी जरूरी है। विश्व के सभी देश तेल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए मुख्य रूप से खाड़ी देशों पर निर्भर हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। भारत कौ गैस और पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति खाडी के देशो से होती है। इस युद्द के कारण यह आपूर्ति प्रभावित हुई। क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य को ईरान ने बंद कर दिया था। उधर अमेरिका ने ईरान के समुद्री तटों की नाकेबंदी कर दी थी। इसी नाकेबंदी के कारण भारत के तीन नाविकों की मृत्यु अमेरिकी हमले में हो गई थी। अमेरिका ने तीन विदेशी जहाजों पर ओमान के तट पर हमले किये थे, जिनपर भारतीय क्रू सवार थे। अब समझौते के बाद सभी तरह के प्रतिबंध हट जाएंगे। इससे भारतीय जहाजों को तेल और गैस लाने में कोई रोक टोक नहीं होगी। इसका असर पर देश में कच्चे तेल की कीमतो पर पड़ेगा। भारत का आयता बिल घटेगा और विदेशी मुद्रा की बचत होगी। कीमतें घटेंगीं तो घऱेलू बाजार में भी सरकार मूल्य घटाएगी। साथ ही आपूर्ति में कटौती और प्रतिंबध भी समाप्त हो जाएंगे। भारत को यूरिया की संभावित कमी का सामना भी नही करना पडेगा। कुल मिलाकर भारत के लिए और शेष विश्व के लिए यह समझौता लाभकारी है। हमें इस चर्चा में जाने की कोई जरूरत नहीं है कि इस समझौते में जीत अमेरिका की हुई है या ईरान की। विश्व के हित सुरक्षित हुए हैं यह संतोषजनक है।

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