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हिंदी पत्रकारिता की सत्यनिष्ठा और स्वाभिमान के दो सौ साल

May 30, 2026

हिंदी पत्रकारिता की सत्यनिष्ठा और स्वाभिमान के दो सौ साल

Ratibhan Tripathi Senior Journalist
-रतिभान त्रिपाठी

आज देश भर की हिंदी पट्टी में हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे होने का उत्सव मनाया जा रहा है। हम सब पत्रकार इस सुअवसर के साक्षी हैं और सौभाग्यशाली भी, कि हम सब हिंदी पत्रकारिता के संघर्ष में सहभागी हैं। दो सौ साल पहले 30 मई 1826 को कलकत्ता के अमरतल्ला मुहल्ले के मकान नंबर 37 में छोटे से दफ्तर से पंडित युगल किशोर सुकुल ने हिंदी का अखबार निकाला था, जिसका नाम था उदन्त मार्तण्ड। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में यह अखबार भारत में हिंदी के पहला अखबार के रूप में दर्ज है। यह कम दिलचस्प नहीं कि वाराणसी से 1845 में प्रकाशित हुए “बनारस अखबार” को बरसों तक हिंदी का पहला अखबार माना जाता रहा है लेकिन यशस्वी साहित्यकार और संपादक ठाकुर प्रसाद सिंह ने 30 मई 1976 को लखनऊ में एक बड़ा आयोजन कर घोषित किया कि हिंदी का पहला अखबार “उदन्त मार्तण्ड” है जो 30 मई 1826 को कलकत्ते से निकला था। उसके बाद ही वह अवस्थापना ध्वस्त हुई कि “बनारस अखबार” हिंदी का पहला अखबार है।

बहरहाल, इन दो सौ सालों के कालखण्ड में हिंदी पत्रकारिता अनेकानेक मोड़ों और संघर्षों से गुजरी है। भारत का जनमानस इसका साक्षी है। उदन्त मार्तण्ड के संस्थापक और संपादक पंडित युगल किशोर सुकुल जो मूलतः कानपुर के निवासी थे, ने अपने अखबार की स्थापना इसलिए नहीं की थी कि उन्हें मशहूर होना है, प्रतिष्ठा पानी है या कोई बिजनेस करना है। उन्होंने अखबार इसलिए शुरू किया था वह भारतीय आत्मा की आवाज को अपनी पूरी क्षमता के साथ लोगों तक पहुंचाएं, उन्हें जगाएं और जो हिंदी देश के बहुसंख्यक समुदाय की भाषा है, वह मुखरित हो, उसका संदेश जन-जन तक पहुंचे। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोई आवाज तो उठे। देर सबेर ही सही, भारत की आत्मा की आवाज जरूर गूंजेगी और गुलामी से मुक्ति मिले क्योंकि पत्रकारिता का चरम लक्ष्य अन्याय, अत्याचार, शोषण आदि के विरुद्ध मुखर होकर सच के पक्ष में खड़े होना है। यह बात अलग है कि एक लंबे कालखण्ड से उपरोक्त चरम लक्ष्य की दिशा बदल गई है या भटक गई है।

कल्पना कीजिए कि जिस युग में पंडित युगल किशोर सुकुल ने उदन्त मार्तण्ड के साथ पत्रकारिता की आवाज बुलंद की थी, वह बहुत कम पढ़े लिखों का समय था। भारत में गरीबी थी, भूख थी, अकाल थे, महामारियां थीं और अंग्रेजों की क्रूर हुकूमत थी। अंग्रेजों के राज में हिंदी का परचम लहराना अपने आप में अपराध कहा जा सकता था, भले ही अपनी हुकूमत चलाने के लिए हिंदी जानना अंग्रेजों की मजबूरी रहा हो या भारतीय अभिजात्य वर्ग को आगे करके उसी के सहारे हिंदी का आश्रय लेने की परिस्थिति रही हो। ऐसे में हिंदी पत्रकारिता करना कोई हंसी-खेल तो नहीं ही था, वह भी संसाधनविहीन एक सामान्य जन के लिए। लेकिन सुकुल जी ने हिम्मत जुटाकर यह काम शुरू किया। संसाधनविहीनता का ही परिणाम हुआ कि उदन्त मार्तण्ड दो साल के भीतर ही बंद करना पड़ा। लेकिन सुकुल जी ने हिंदी पत्रकारिता की जो लौ जलाई वह आज पूरे भारत को रोशन कर रही है।

यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस का इतिहास हिंदी के स्वाभिमान का इतिहास है। हिंदी की आत्मा के उत्कर्ष और उसकी चेतना के जन-जन में व्यापने का इतिहास है। जिस दौर में हिंदी पत्रकारिता जन्म ले रही थी, वह हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान की गुलामी का दौर था। उस समय तो जन-मानस में यह बात थी भी नहीं कि एक दिन भारत गुलामी से मुक्त होकर आत्मनिर्भर और स्वतंत्र होगा, पर पंडित युगल किशोर सुकुल के मन में कहीं न कहीं उसका बीजारोपण जरूर हो चुका था। यदि ऐसा न होता तो वह अखबार शुरू ही न करते। अब हम जिस दौर में जी रहे हैं, वह हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान का एक बेहतरीन दौर है। हिंदी स्वाभिमानिनी भाषा हो चुकी है। वह अपराधबोध की ग्रंथि से बाहर अपने चरम वैभव की ओर है और यह पत्रकारिता के लिए आत्ममंथन का दौर भी है। न केवल हिंदी पत्रकारिता के लिए बल्कि सभी भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी पत्रकारिता के लिए भी, कि वह जो कर रही है, कितना उपयुक्त, कितना युगांतरकारी और कितना सार्थक है।

राजनीतिक कलाबाजों के वर्ग की बात छोड़ दें तो देश दुनिया का एक बड़ा वर्ग है जो हिंदी अंग्रेजी और अन्य भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के प्रति बहुत कम सद्भावना रख रहा है। यदि यह कहा जाए कि दुर्भावना रख रहा है तो ग़लत न होगा। वो राजनीतिक कलाबाज भी नहीं जो सत्ताओं से दूर हैं या वो राजनीतिक कलाबाज भी जो सच से ताल्लुक रखने की कोशिश करते हैं। इन हालात में अखबार हों, टेलीविजन चैनल हों या फिर डिजिटल मीडिया के रणबांकुरे, सबके लिए आत्ममंथन और गंभीरता से चिंतन करने का समय है। हिंदी पत्रकारिता के संस्थापकों और बाद सौ बरस के पत्रकारों की त्याग तपस्या इन हालात के लिए नहीं थी। उस समय भाषा गढ़ी जा रही थी। खड़ी बोली खड़ी हो रही थी। अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए संकल्पों के विकल्प सीमित थे। धन वैभव की लालसा हर युग में रही है, जाहिर है दो सौ साल पहले भी रही होगी लेकिन सत्यनिष्ठा और स्वाभिमान के संकल्प उससे भी अधिक मजबूत थे , इसीलिए अखबार नहीं चला, न चले लेकिन पंडित युगल किशोर किसी साहूकार या हुकूमत के सामने स्वाभिमान गिरवी रखने नहीं गए। उस युग में पत्रकारिता के लिए यह परिभाषाएं नहीं थीं कि पत्रकारिता चलती रहे, भले ही स्वाभिमान गिरवी रखना पड़े। भले ही आत्मा की आवाज को हवा में उड़ने दिया जाए।

दो सौ साल बाद उदन्त मार्तण्ड और पंडित युगल किशोर सुकुल को याद करना, हिंदी पत्रकारिता भर को याद करना नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास को याद करना है जिससे संकल्प गढ़े जा सकते हैं, आत्मसंयम बनाया और बचाया जा सकता है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना
भाषा के प्रति आत्मीयता और उसके पराक्रम को याद करना है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना उस सत्य को याद करना है जिसके बलबूते पत्रकारिता को सम्मान और गौरव मिला है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना हिंदी संसार को विकसित कर वैश्विक बनाने की मानसिकता को याद करना है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना उस रचनात्मकता को याद करना है जिन संकल्पों से सिद्धि मिलती है। उदन्त मार्तण्ड को याद करना उन संपादकों और पत्रकारों की भावनाओं को याद करना है जिनके मन में देश और समाज को उस दिशा में ले जाने का संकल्प था जहां वैभव के साथ सत्य न्याय और धर्म का निश्छल आचरण स्पष्ट रूप से दिखाई दे। लेकिन इस दौर में उपरोक्त बातों का स्थान कहां और कितना है, यह सुधी पत्रकारों को स्वयं समझना और तय करना है। उदन्त मार्तण्ड को याद करते हुए हमें आशा और विश्वास बनाए रखना है। यह निराश होने का समय नहीं है, देश और समाज की उम्मीदों को फलीभूत होने देने का समय है।

भारत में हिंदी पत्रकारिता की जिम्मेदारी अन्य भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के मुकाबले कहीं ज्यादा है। अर्जुन को कर्मयोग की शिक्षा देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने
श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के 21वें श्लोक में कहा है – यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।। यह बात हिंदी पत्रकारिता पर विशेष रूप से लागू होती है। चूंकि हिंदी अपने को अन्य भारतीय भाषाओं की बड़ी बहन मानती है इसलिए उसकी जिम्मेदारी भी बड़ी है। वह जो आचरण करेगी, माना जाएगी कि दूसरी भाषाएं भी वैसा कर सकती हैं। इसलिए हिंदी पत्रकारिता में जहां कहीं खोट, खामी, खराबी, गिरावट आदि दिखती हो, उसे वहीं सुधारे, तब तो बात है। और कहने में संकोच नहीं कि खामी खराबी ने घर बना लिया है। उसे हटाकर ही गरिमा और गौरव हासिल किया जा सकता है। सम्मान चाटुकारिता से नहीं, सच्चाई के साथ रहकर स्वाभिमानी होने से मिलता है। और हां, सम्मान मिले न मिले, अपनी आत्मा न धिक्कारे, वही आचरण हिंदी पत्रकारिता को करना है।

यह इस बहस में उलझने का समय नहीं है कि अखबार सही हैं, चैनल गलत हैं। चैनल सही हैं डिजिटल मीडिया गलत है। डिजिटल मीडिया सही है, अखबार गलत हैं। समय यह भी नहीं कहता है पत्रकारिता में पैसा नहीं है। जीवनयापन के लिए कुछ न कुछ करना है। ऐसी दलीलें पेश करने वालों को पत्रकारिता के क्षेत्र में एक पल भी रहने का अधिकार नहीं है। पत्रकारिता बेशक पेशा है लेकिन यह कंटेंट यानी तथ्यों का पेशा है। तथ्य गलत हों पत्रकारिता खारिज समझिए। कृष्ण बिहारी नूर का वो शेर याद कीजिए – सच घटे या बढ़े तो सच न रहे, झूठ की कोई इन्तहा ही नहीं! इसलिए ऐसी दलीलें और गवाहियां देने वाले पत्रकारिता के लिए हो ही नहीं सकते हैं, भले ही वह कोई और काम कर लें। यदि न्याय बिकने लगे, पत्रकारिता बिकने लगे तो आजादी की लड़ाई के दौर में प्रयागराज से प्रकाशित होने वाले “स्वराज” अखबार की उस घोषणा का क्या अर्थ रह जाता है जिसमें कहा गया था कि हमें आवश्यकता है एक ऐसे संपादक की जिसे खाने के लिए दो रोटियां और पीने के लिए एक गिलास पानी मिलेगा लेकिन हर संपादकीय पर जेल जाने के लिए तैयार रहना होगा। याद कीजिए उन संकल्पवानों के संकल्प को कि उस समय एक-एक करके आठ संपादकों को जेल जाना पड़ा। यदि वह भी वैसी दलीलें पेश कर रहे होते भला सौ साल बाद हम उन्हें क्यों याद कर रहे होते।

कहा जा सकता है कि वह दौर अलग था। आवश्यकताएं और इच्छाएं कम थीं, इसलिए उस समय के लोग वैसा कर पाए। यह बात आत्मतोष के लिए हो सकती है, सच नहीं। आज का दौर भी वैसा ही है, बस संदर्भ बदल गए हैं। बदले संदर्भों में हिंदी पत्रकारिता का दायित्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। उसकी व्यापकता बढ़ गई है, उसका संसार बढ़ गया है। इसलिए किसी भी पत्रकार को कोई उपदेश नहीं देना है। सबको संकेत देना है और कर्तव्य को बारंबार याद दिलाना है। उदन्त मार्तण्ड जो बीजारोपण कर गया है, उसकी रक्षा करते हुए फलीभूत करते रहना है ताकि हिंदी पत्रकारिता के हमारे पुरखों की आत्मा सुकून में रहे। उन्होंने जो लौ जलाई थी, वह जाज्ज्वल्यमान रहे और हिंदी संसार का गौरव बढ़ता रहे।
हिंदी पत्रकारिता के इन दो सौ सालों की यात्रा के लिए आपको, हमको और सबको बहुत बहुत बधाई।

May 29, 2026

हिन्दी पत्रकारिता: ध्येय यात्रा के गौरवशाली 200 वर्ष

Article Posted on 29.05.2026, Friday, by Sarvesh Kumar Singh, Hindi Patrakarita Divas

सर्वेश कुमार सिंह
हिंदी पत्रकारिता यात्रा के 200 वर्ष पूर्ण कर रही है। इस यात्रा में हिंदी पत्रकारिता ने न केवल खुद को नित नए आयाम के रूप में गढ़ा बल्कि दायित्व बोध को भी बगैर थके, बगैर रुके निभाया। भाषा,शैली, व्याकरण और साहित्य को इन 200 सालों में उन्नत किया। हिंदी पत्रकारिता ने स्वातंत्र्य पूर्व काल में ध्येयपूर्ण (मिशनरी) भाव से स्वाधीनता की अलख जगाई। समाज में सुधारवादी आंदोलनों के लिए जनजागरण किया। स्त्री शिक्षा, बाल विवाह जैसे मुद्दों पर राष्ट्रीय नेताओं की अपील को स्वर दिया। स्वाधीन भारत में लोकतंत रक्षक की भूमिका में हिंदी पत्रकारिता सबसे आगे खड़ी हुई।
तीस मई 1826 को जब पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कानपुर से कोलकाता जाकर पहला हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र “उदंत मार्तंड” प्रकाशित किया, तो किसी को नहीं मालूम था कि एक दिन हिंदी पत्रकारिता भारत के जन-जन, गांव-गांव, शहर-कस्बों की आवाज बन जाएगी। सूचना और संवाद का ये माध्यम समाज सुधार से लेकर, जन समस्याओं के निराकरण का माध्यम और लोकतंत्र का प्रहरी बन जाएगा।
हिंदी पत्रकारिता को पुष्पित, पल्लवित करने में अनेक महान संपादकों और साहित्यकारों ने न केवल योगदान किया, बल्कि अपने जीवन को भी इस ध्येय के लिए समर्पित कर दिया। ये सफल विकास यात्रा शून्य से शिखर तक जिन संपादकों की मेधा और अथक परिश्रम से आज यश पा रही है, उनमें पंडित जुगल किशोर शुक्ल,भारतेंदु हरिश्चंद्र, दुर्गा प्रसाद मिश्र,बाबू राव विष्णु राव पराड़कर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, मुंशी प्रेमचंद्र, हनुमान प्रसाद पोद्दार, पंडित अटल बिहारी वाजपेयी, विद्यानिवास मिश्र, हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, धर्मवीर भारती, राजेंद्र अवस्थी,रघुवीर सहाय, राजेंद्र यादव, शिवपूजन सहाय, बनारसी दास चतुर्वेदी,महात्मा गांधी, पंडित मदन मोहन मालवीय, प्रताप नारायण मिश्रा, वचनेश त्रिपाठी का स्मरण समीचीन है।
हिंदी पत्रकारिता के उद्भव में जिन नगरों और महानगरों के प्रबुद्ध समाज, व्यवसायियों और राज घरानों का योगदान अग्रणी है, उनमें वाराणसी सबसे महत्वपूर्ण है। कोलकाता, आगरा, कानपुर, लखनऊ, प्रयागराज, गोरखपुर, जबलपुर, मिर्जापुर , मेरठ, बरेली,मुरादाबाद से भी शुरुआती दौर में कई प्रमुख हिंदी पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हुई। उत्तर प्रदेश में पहला हिंदी दैनिक हिंदुस्तान प्रतापगढ़ जनपद की रियासत काला कांकर से 1885 में राजा रामपाल सिंह ने प्रकाशित किया था। इसके संपादक पंडित मदन मोहन मालवीय थे।
हिंदी के कुछ समाचारपत्र अल्प अवधि तक प्रकाशित हुए, किंतु ये हिंदी पत्रकारिता की नींव बन गए। इनका उल्लेख किए बिना 200 साल की यात्रा का स्मरण और सिंहावलोकन अधूरा है। ये समाचार पत्र और पत्रिकाएं उदंत मार्तंड के प्रकाशन से शुरू होकर अनवरत जारी है। बनारस अखबार, सरस्वती, सुधाकर, बुद्धि प्रकाश, समाचार सुधा वर्षण, प्रजा हितैषी, कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र चंद्रिका,,बाल बोधिनी, आनंद कादम्बिनी,ब्राह्मण, भारत मित्र, हिंदुस्तान, नवभारत, अभ्युदय, प्रताप, कर्मवीर, आज, कल्याण, पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, वीर अर्जुन, स्वदेश, भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला , हंस, विशाल भारत, धर्मयुग, दिनमान, कादम्बिनी, सारिका, अरुण का हिंदी पत्रकारिता में अतुलनीय योगदान है।
आज हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने पर जब हम उदंत मार्तंड का स्मरण कर रहे हैं। तब हमें पिछले 100 का भी स्मरण स्वाभाविक रूप से होता है। सौ वर्ष पूर्व हिंदी पत्रकारिता से जुड़ी दो घटनाएं और हुई जिन्हें याद करने से गौरव की अनुभूति होती है। वर्ष 1926 में यानी ठीक 100 साल पहले गोरखपुर से धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक चेतना को जागृत रखने के लिए “कल्याण” पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। हालांकि पहला अंक 1926 में मुंबई से निकला, लेकिन 1927 के बाद से इसका प्रकाशन गोरखपुर से हो रहा है। हिंदी की आध्यात्मिक पत्रकारिता का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण कल्याण बना हुआ है। इस पत्रिका के 100 वर्ष में लगभग 90 विशिष्ट अंक तथा अनगिनत विशेषांक प्रकाशित हुए है। इन अंकों ने भारत के आध्यात्मिक, पौराणिक, वैदिक ज्ञान को सहेजने का काम किया है। इसके लिए जयदयाल गोयनका और हनुमान प्रसाद पोद्दार की जितनी प्रशंसा की जाय कम ही है। कल्याण भी इस वर्ष अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर रहा है।
इसी के साथ ही 1925 में “हिंदी साहित्य सम्मेलन” के तत्वावधान में “प्रथम संपादक सम्मेलन” वृंदावन (मथुरा) में हुआ था। इसे भी 101 साल पूरे हो रहे है। इस सम्मेलन में हिंदी के मूर्धन्य विद्वान और संपादक बाबू राव विष्णु राव पराड़कर जी का ऐतिहासिक भाषण हुआ। वे इस सम्मेलन के अध्यक्ष थे। उन्होंने 100 साल पहले आज की हिंदी पत्रकारिता की “दशा और दिशा” की भविष्यवाणी की थी। भविष्य के संपादकों के प्रबंधकों के प्रभाव में रहने की आशंका भी व्यक्त की थी। जो आज सच साबित हो रही है। इस संपादक सम्मेलन में पराड़कर जी ने बताया था कि “समाचार पत्र के दो मुख्य धर्म है – “एक तो समाज का चित्र खींचना और दूसरा उसे सद उपदेश देना”। हमारा दूसरा कार्य “लोक-शिक्षण हमारा सच्चा धर्म है”। इसी के द्वारा हम देश की और जनता की सच्ची सेवा कर सकते हैं। “हमें अपने पत्रों में सदा सर्व प्रकार से उच्च आदर्श को स्थान देना चाहिए”
आज की हिंदी पत्रकारिता तकनीकी युग में है। तकनीक के अनेक उपायों से सज्जित है। इससे जो मुख्य परिवर्तन हुआ है, वह दो स्तरीय है। एक प्रकाशन की कागज पर निर्भरता कम हुई है। पत्र-पत्रिकाएं डिजिटल स्वरूप में हमारे सामने है। आसानी से उपलब्ध भी है। पहुंच की गति तीव्र हुई है। हमें अब 24 घंटे इंतजार नहीं करना है, बल्कि इंटरनेट से हिंदी समाचार तत्काल मिल रहे है। ये अच्छी स्थिति है,लेकिन चिंताजनक ये है कि इस डिजिटल युग में पत्रिकाओं का युग समाप्तप्राय: हो गया है।
हमारी हिंदी की 200 साल की पत्रकारिता गौरवशाली रही है। इस गौरव को बनाए रखने और इसमें श्रीवृद्धि करने का दायित्व आज की पीढ़ी पर है। हिंदी पत्रकारिता को शब्दों की दृष्टि से समृद्ध करने, भाषा और व्याकरण की शुद्धता को बनाए रखने की आवश्यकता है। साथ ही हिंदी पत्रकारिता की पूंजी विश्वसनीयता है। दायित्वबोध के साथ तथ्यात्मक और निष्पक्ष पत्रकारिता को अपना धर्म बनाकर हम अगली शताब्दियों को और अधिक गौरवशाली बना सकते है।
लेखक परिचय: सर्वेश कुमार सिंह,स्वतंत्र पत्रकार, लखनऊ,
संपर्क E mail : sarveshksingh61@gmail.com
Mob 9140624166

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

May 25, 2026

नक्सलमुक्ति के बाद विकास का नया सूर्योदय

ARTICLE  25.05.2026, Wednesday , by Sarvesh Kumar Singh

-सर्वेश कुमार सिंह-

भारत को नक्सलवाद के ग्रहण से मुक्ति मिली है। इसके साथ ही उन क्षेत्रों में जहां कभी बंदूकों की दहशत व्याप्त रहती थी। अब विकास का नया सूर्योदय हो रहा है। यह नया सवेरा भी उसी “मिशन मोड” में साकार हो रहा है, जिस “मिशन मोड” में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह की योजना, रणनीति और दृढ इच्छाशक्ति ने भारत को नक्सलमुक्त कर दिया है। यहां अब दिल्ली से लेकर रायपुर तक की सरकारें अपनी सभी 371 योजनाओं को लेकर नक्सलमुक्त क्षेत्र में उतरी हैं। छत्तीसगढ़ का “बस्तर” वह क्षेत्र है जहां नक्सलवाद दैनिक जीवन का पर्याय और आतंक के साये में जीना दिनचर्या बन गया था। इस परिस्थिति को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान करके बदल दिया,यानि की तारीख तय करके नक्सलवाद से भारत को मुक्ति दिला दी। अब यहां विकास की गंगा बह रही है।

असंभव दिखने वाला सपना साकार हुआ

नक्सलवाद मुक्त भारत एक सपना था। भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती। ये देश के सामने एक ऐसी समस्या थी, जिसके बारे में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि “नक्सलवाद देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है”। उसी नक्सलवाद को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तारीख तय करके समाप्त कर दिया है। उन्होंने अगस्त 2024 में घोषणा की थी कि 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त कर देंगे। यह कार्य तय समयसीमा से पहले ही पूरा हो गया। ऐसा देश के इतिहास में पहली बार हुआ है कि तारीख निश्चित करके किसी ऐसी समस्या का समाधान हुआ हो, जहां सशस्त्र संघर्ष चलता हो, लेकिन ऐसा भारत में हुआ है। इसका श्रेय जहां सुरक्षा बलों के अदम्य साहस, वीरता और बलिदान को जाता है, वहीं कुशल रणनीति, योजना और दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाने के लिए अमित शाह को जाता है।

छत्तीसगढ में 13 दिसम्बर 2023 को भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी। मुख्यमंत्री बने विष्णु देव साय, भाजपा सरकार आने के बाद नक्सलवाद की समाप्ति को प्राथमिकता का कार्य और जिम्मेदारी मान कर अभियान शुरु हुआ। कमान संभाली केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने, उन्होंने 24 अगस्त 2024 को देश के सभी पुलिस महानिदेशकों/पुलिस महानिरीक्षकों की उच्च स्तरीय बैठक बुलाई। इस बैठक में तय हुआ कि नक्सलवाद को समय सीमा निर्धारित करके समाप्त करना है। यह समय सीमा खुद अमित शाह ने घोषित की और यह थी 31 मार्च 2026, तारीख तय होने के बाद रणनीति बनी, संसाधन बढ़ाये गए, सामाजिक, आर्थिक स्तर पर सुधार किये गए। परिणाम देश के सामने है कि ठीक 31 मार्च 2026 को गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में घोषणा कर दी कि भारत अब नक्सलवाद-माओवाद के आतंक से मुक्त है। यह विचारधारा सात दशक बाद पराजित हो गई।

अमित शाह ने देश से लाल आतंक को पोषित करने वाली माओवादी विचारधारा से वनवासियों को मुक्ति दिलाने के लिए मिशन मोड में काम किया। केंद्र और राज्य सरकारों का बेहतर समन्वय किया। योजनाओं को संबंधित पात्र लाभार्थियों तक पहुंचाया। सुरक्षा बलों को खुली छूट और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सूचना तंत्र को मजबूत किया। प्रतिफल दो साल से कम समय में लक्ष्य पूरा कर दिया, मिशन पूरा किया।

बस्तर में सेवा डेरा, नये सूर्योदय के केन्द्र

नक्सलवाद से प्रभावित जो क्षेत्र रहे हैं, उनमें छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग प्रमुख है। यहां अनेक खुंखार माओवादी-नकस्लवादी समूह और उनके नेता रहे हैं। अब ये आत्मसमर्मपण कर चुके हैं या सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड में मारे जा चुके हैं। इस क्षेत्र से नक्सलवाद समाप्त होने के बाद जो आवश्यक कार्य है, उसपर अब भारत सरकार ने काम शुरु कर दिया है। इस काम को करने की जिम्मेदारी भी गृहमंत्री अमित शाह ने अपने हाथों में ली है। वह कार्य है हथियार डाल चुके पूर्व नक्सलियों का पुनर्वास, उनका रोजगार और विकास की गंगा को शेष देश के समानान्तर इस क्षेत्र में भी प्रवाहित करना। यह कार्य शुरु हो गया है। यह सरकार के उस दायित्व का हिस्सा है, जो किसी भी समस्या के उन्मूलन के बाद किया जाना अवश्यम्भावी होता है।

नक्सल आतंक से जो क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित थे। उनमें छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग सबसे प्रमुख रहा है। इस संभाग में 7 जिले हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने अब इस क्षेत्र के समुचित विकास का बीड़ा उठाया है। इन क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं की पहुंच नहीं थी। न तो राशन कार्ड थे, न मुफ्त मिलने वाला राशन मिल पता था और न ही 5 लाख की चिकित्सा सुविधा ही मिल रही थी। कारण था नक्सलवादी रोड़ा बने थे। वे स्कूल, अस्पताल,सड़क नहीं बनने दे रहे थे। अब बस्तर नक्सलमुक्त है तो ये सभी योजनाएं और सुविधाएं प्रदान करने की तैयारी की गई है। इसके लिए गृहमंत्री खुद बस्तर पहुंचे है। उन्होंने 18 और 19 मई को योजनाओं की शुरुआत कराई है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के साथ योजनाओं का उद्घाटन किया। जगदलपुर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि केंद्र ने बस्तर में 200 सुरक्षा कैंप खोले थे। अब इनमें से एक तिहाई यानी कि 70 को प्रथम चरण में सेवा डेरा में परिवर्तित किया जा रहा। ये डेरा वीर शहीद गुंडाधुर के नाम से होंगे। इनमें केंद्र और राज्य की सभी 371 योजनाओं का लाभ मिलेगा। ये कमान सर्विस सेंटर के रूप में काम करेंगे। ये सेंटर गांव के हर दरवाजे तक योजना का लाभ पहुंचाएंगे।

पांच साल में छह गुना बढ़ेगी बस्तर की आय

पत्रकार वार्ता में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 5 साल में बस्तर की आय 6 गुना बढ़ेगी। उन्होंने घोषणा की है कि हर आदिवासी महिला को एक गाय और एक भैंस दी जाएगी। डेयरी सेक्टर का नेटवर्क स्थापित करके आय बढ़ाएंगे। बैंक, एटीएम, पोस्ट ऑफिस खोले जा रहे है। सड़कें बनाई जा रही है। सेवा डेरा में स्थापित सीएससी “कामन सर्विस सेन्टर” के साथ-साथ यहां पैक्स (प्राथमिक कृषि ऋण सहकारी समिति) भी बनेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर इस आदिवासी-जनजाति क्षेत्र में सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए “बस्तर पंडुम” की शुरुआत की जा रही है। इससे बस्तर की मूल संस्कृति, लोक कला, गीत, संगीत, लोक नृत्य, खानपान को संरक्षित और समृद्ध किया जाएगा।

बस्तर को आतंक के अंतहीन समझे जाने वाले साए से निकालकर विकास की राह दिखाना निसंदेह उल्लेखनीय और सराहनीय कार्य है।

 

लेखक परिचयः स्वतंत्र पत्रकार, राज्य मुख्यालय, लखनऊ

निवास- 3/11 आफीसर्स कालोनी कैसरबाग, लखनऊ-226001

मोबाइलः 9140624166, ई-मेल-sarveshksingh61@gmail.com

 

 

गंगा दशहरा और भारतीय लोकजीवन की परम्पराएँ – डाॅ० राकेश सक्सेना

Rakesh Saxena

एटा 25 मई उप्रससे। गंगा दशहरा का पर्व ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह भारतीय लोकजीवन, धार्मिक चेतना और सामाजिक समरसता का अद्भुत पर्व है। मान्यता है कि इसी दिन राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुईं थीं। स्कंदपुराण के अनुसार– ‘ ज्येष्ठे मासि शुक्ल पक्षे दशम्यां हस्तसंयुते। हरते दश पापानि तस्माद् दशहरा स्मृतम्।। ‘ अर्थात् ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान दस प्रकार के पापों ( हिंसा, चोरी, व्यभिचार, कटु वचन, झूठ, चुगली, बकवास, परद्रव्य चिंतन, दूसरों का बुरा सोचना, नास्तिकता ) का नाश करता है इसलिए इसे दशहरा कहा गया। भारतीय लोकजीवन में पर्व धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं होते, वे सामुदायिक जीवन, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता के वाहक होते हैं। गंगा दशहरा भी इसी परम्परा का जीवंत उदाहरण है।
लोकआस्था के इस पर्व पर लाखों श्रद्धालु मंत्रोच्चार के साथ गंगा स्नान करते हैं, गंगा में दीप प्रवाहित किए जाते हैं। यह दीपदान श्रद्धा, आशा और आत्मिक प्रकाश का प्रतीक है। गंगा आरती के समय घंटों, शंखों और मंत्रों की ध्वनि वातावरण को आध्यात्मिक बना देती है। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएँ लोकगीतों व भजनों को गाती हैं तथा परिवार के सुख -समृद्धि की कामना करतीं हैं।इस पर्व पर जलदान, अन्नदान,वस्त्रदान की परम्परा का निर्वाह किया जाता है। ज्येष्ठ मास की प्रचण्ड गर्मी में पथिकों को शीतल जल, शर्बत पिलाया जाता है, जो भारतीय समाज की करुणा और सहअस्तित्व की भावना को दर्शाती है। हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी, कानपुर, पटना, गढ़मुक्तेश्वर आदि अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं जो भारतीय लोकसंस्कृति के जीवंत केन्द्र होते हैं। यहाँ पर लोककला, लोकसंगीत, हस्तशिल्प और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। गंगातट पर बड़े-बड़े भव्य पण्डालों में गंगा अवतरण की कथा, भजन, कीर्तन की परम्परा लोकजीवन को धार्मिक चेतना से जोड़ती है।
गंगा भारतीय सभ्यता का प्रमुख केन्द्र रही है। इसने अपने तटों पर केवल नगर ही नहीं बसाए अपितु कृषि, व्यापार और परिवहन को भी विकसित किया। इसी कारण गंगा को भारतीय संस्कृति की जीवन रेखा कहा जाता है। उत्तर भारत की सांस्कृतिक चेतना में गंगा का विशेष योगदान रहा है। कवि और साहित्यकारों ने भी इसको भारतीय संस्कृति की आत्मा कहा है। यह पर्व अमीर-गरीब, जाति-वर्ग और क्षेत्रीय भेद को मिटाकर वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को सशक्त करता है। भारतीय लोकजीवन में गंगा को माँ कहा जाता है। यह मातृभाव भारतीय संस्कृति की संवेदनशीलता का द्योतक है।
आधुनिक भौतिकवादी, उपभोक्तावादी युग में गंगा दशहरा मनुष्य को प्रकृति, आस्था और समाज से जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। आज गंगा प्रदूषण एक गम्भीर समस्या बन चुकी है अत: अपनी आस्था के साथ इस पर्व को गंगा संरक्षण संकल्प दिवस बनाने की आवश्यकता है। यदि गंगा स्वच्छ व अविरल रहेगी तभी भारतीय संस्कृति की यह धारा जीवित रहेगी। सरकार द्वारा नमामि गंगे जैसी योजनाएँ संचालित हैं किन्तु जनसहभागिता के अभाव में सफलता पाना सम्भव नहीं है। गंगा में कचरा न डालना, प्लास्टिक का उपयोग न करना, जल संरक्षण करना, स्वच्छता बनाए रखना आदि बातों का प्रत्येक नागरिक को संकल्प लेना चाहिए। पापों को धोने वाले इस पवित्र नीर में जहर न घोलें! इसके आँचल को स्वच्छ और साफ रहने दें।

May 17, 2026

भोजशाला : जब इतिहास की राख से फिर उठी सभ्यता बोल उठी

प्रणय विक्रम सिंह

सभ्यताएं केवल पत्थरों, प्राचीरों और पुरातात्विक अवशेषों से नहीं बनतीं। वे स्मृतियों, श्रद्धा, ज्ञान और आत्मा के उन अदृश्य सूत्रों से निर्मित होती हैं, जिन्हें तलवारें काट नहीं सकतीं, फरमान मिटा नहीं सकते और आक्रमण पराजित नहीं कर सकते।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भोजशाला-कमाल मौला कॉम्प्लेक्स की धार्मिक प्रकृति को भगवती वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर माना है। यह राजा भोज (परमार वंश) द्वारा स्थापित संस्कृत शिक्षा केंद्र था।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला परिसर की धार्मिक प्रकृति को भगवती वाग्देवी (माँ सरस्वती) का मंदिर मानना केवल एक न्यायिक निर्णय नहीं, बल्कि उस सभ्यतागत सत्य की पुनर्पुष्टि है, जिसे सदियों तक धूल, ध्वंस और दमन के नीचे दबाने का प्रयास किया गया, किन्तु जिसे मिटाया नहीं जा सका।

यह वही भोजशाला है, जिसे परमार वंश के महान प्रतापी राजा भोज ने ज्ञान, संस्कृत और माँ वाग्देवी की आराधना के केंद्र के रूप में स्थापित किया था। यहां केवल पूजा नहीं होती थी, यहां भारत की वैदिक चेतना श्वास लेती थी। यहां शब्द साधना थी, शास्त्रार्थ था, संस्कृत की स्वर लहरियां थीं, और ज्ञान को ईश्वर मानने वाली भारतीय सभ्यता का आलोक था। यह केवल मंदिर नहीं था, यह भारतीय बौद्धिकता, भारतीय ज्ञान और भारतीय अध्यात्म का समन्वित विश्वविद्यालय था। किंतु भारत के इतिहास का एक लंबा कालखंड ऐसा भी रहा, जब बाहरी आक्रमणकारियों ने इस भूमि की आत्मा को तोड़ने का प्रयास किया। मंदिरों को केवल पत्थरों का ढांचा नहीं समझा गया, उन्हें भारतीय समाज की सांस्कृतिक रीढ़ मानकर लक्ष्य बनाया गया। क्योंकि आक्रमणकारी जानते थे कि यदि किसी सभ्यता की स्मृतियों, प्रतीकों और आस्था केंद्रों को ध्वस्त कर दिया जाए, तो उसके आत्मविश्वास को घायल किया जा सकता है।

सोमनाथ से काशी तक, मथुरा से मार्तंड तक और भोजशाला से नालंदा तक इतिहास के पन्नों पर ऐसे असंख्य रक्तरंजित अध्याय अंकित हैं, जहां केवल इमारतें नहीं टूटीं, बल्कि भारतीय अस्मिता को अपमानित करने का सुनियोजित प्रयास हुआ। आक्रमण केवल भूभाग पर नहीं, भारत की स्मृति पर था।

पुस्तकालय जलाए गए, विद्यापीठ ध्वस्त किए गए, मूर्तियों को खंडित किया गया, और सभ्यता की स्मृतियों पर पराये प्रतीकों का आवरण चढ़ाने का प्रयास किया गया। भोजशाला भी उसी पीड़ा की साक्षी बनी। जहां कभी सरस्वती वंदना गूंजती थी, वहां इतिहास को बदलने के प्रयास हुए। जहां ज्ञान का दीप प्रज्वलित था, वहां पहचान का अंधकार थोपा गया। किन्तु सनातन की विशेषता यही है कि वह पराजित नहीं होता। वह प्रतीक्षा करता है। वह सहता है। वह समय के गर्भ में सत्य को सुरक्षित रखता है।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने उपलब्ध ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्यों, सतत उपासना परंपरा और वैज्ञानिक जांच के आधार पर यह स्पष्ट किया कि भोजशाला माँ वाग्देवी का प्राचीन मंदिर एवं संस्कृत शिक्षा का केंद्र थी। यह निर्णय किसी भावनात्मक आवेग का परिणाम नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया, पुरातात्विक परीक्षण और न्यायिक विवेक की कसौटी पर आया हुआ निर्णय है।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि न्यायालय ने ASI जैसी विशेषज्ञ संस्था की जांच, दोनों पक्षों की दलीलों, ऐतिहासिक प्रमाणों और प्रत्यक्ष निरीक्षण के बाद यह निर्णय दिया। यह बताता है कि भारत का संविधान और न्यायपालिका सत्य तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं, यदि धैर्य और विश्वास बनाए रखा जाए।

यह निर्णय सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक भारत में ऐतिहासिक सत्य पर चर्चा को ही विवाद बना दिया गया। सभ्यतागत पीड़ा की अभिव्यक्ति को सांप्रदायिकता कहकर दबाने का प्रयास हुआ। मंदिर विध्वंसों की स्मृतियों को ‘अतीत भूल जाओ’ कहकर ढंकने का प्रयास किया गया। लेकिन कोई भी समाज अपने घावों को स्वीकार किए बिना स्वस्थ नहीं हो सकता।

भोजशाला का निर्णय इस बात का संकेत है कि आधुनिक भारत अब अपनी सभ्यता के इतिहास से आंखें चुराने के बजाय उसका संतुलित और तथ्याधारित पुनर्पाठ करने को तैयार है।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह निर्णय भारत की बदलती चेतना का प्रतीक है। यह उस ‘नए भारत’ का संकेत है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों को लेकर संकोचग्रस्त नहीं है। जो यह मानता है कि विकास और विरासत साथ-साथ चल सकते हैं। जो मंदिरों को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्मृति और सभ्यतागत पहचान के केंद्र के रूप में देखता है।

यह निर्णय उन करोड़ों भारतीयों के मन में विश्वास भी जगाता है, जिन्होंने दशकों तक यह अनुभव किया कि उनकी आस्था, उनकी पीड़ा और उनकी सांस्कृतिक स्मृतियां सार्वजनिक विमर्श में उपेक्षित रहीं। भोजशाला का निर्णय उन्हें यह आश्वासन देता है कि संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया के भीतर रहते हुए भी ऐतिहासिक न्याय संभव है।

इस निर्णय का सबसे बड़ा संदेश यह है कि सनातन केवल पूजा पद्धति नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता है। उसे तलवारों से घायल किया जा सकता है, लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता।

आज भोजशाला का प्रश्न केवल एक मंदिर का प्रश्न नहीं है। यह भारत की उस ज्ञान परंपरा का प्रश्न है, जिसने विश्व को व्याकरण दिया, दर्शन दिया, गणित दिया, अध्यात्म दिया। यह उस सांस्कृतिक अस्मिता का प्रश्न है, जिसे बार-बार मिटाने का प्रयास हुआ, लेकिन जो हर बार और अधिक तेजस्विता के साथ पुनः खड़ी हो गई।

न्यायालय द्वारा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में स्थापित मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने की दिशा में विचार करने संबंधी टिप्पणी भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह प्रतिमा केवल मूर्ति नहीं है, वह भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। उसका पुनः भोजशाला में स्थापित होना वस्तुतः इतिहास की टूटी हुई कड़ी का पुनर्संयोजन होगा। वह केवल प्रतिमा की वापसी नहीं होगी, वह भारतीय आत्मा की घर-वापसी होगी।

किन्तु इस निर्णय को प्रतिशोध या पराजय के भाव से नहीं देखा जाना चाहिए। यह किसी समुदाय की हार नहीं है। यह ऐतिहासिक सत्य की स्वीकृति है।

अब आवश्यकता भोजशाला को पुनः ज्ञान और संस्कृत साधना के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की है। वहां पुनः वेदों की ऋचाएं गूंजें। वहां पुनः संस्कृत का अध्ययन हो। वहां पुनः भारत की ज्ञान परंपरा विश्व को दिशा दे। वहां पुनः यह सिद्ध हो कि यह भूमि केवल आस्था की नहीं, ज्ञान की भी जननी है। तभी यह निर्णय अपने पूर्ण अर्थ को प्राप्त करेगा।

भोजशाला हमें याद दिलाती है कि इतिहास का सत्य देर से लौट सकता है, लेकिन लौटता अवश्य है। और जब सत्य लौटता है, तब केवल एक भवन नहीं जीतता… सभ्यता मुस्कुराती है, इतिहास की राख से फिर सरस्वती उठ खड़ी होती हैं।

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