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महिलाओं को आरक्षण से वंचित रखने का जिम्मेदार कौन?

April 19, 2026

महिलाओं को आरक्षण से वंचित रखने का जिम्मेदार कौन?

Women Reservation in Parliament

Posted on 19.04.2026, Time 10.16 AM Sunday, Indian women reservation bill in Parliament, Article by Sarvesh Kumar Singh, Senior Journalist, Lucknow

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

सर्वेश कुमार सिंह

लोकसभा में कल महिला आरक्षण बिल गिर गया। यानी कि 29 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को 33% आरक्षण मिलने की उम्मीद एक तरह से धूमिल हो गई है या यह सपना टूट गया है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सत्ता पक्ष की रणनीति कमजोर रही या इस बिल के गिरने से और महिला आरक्षण की उम्मीद को पूरा करने में क्या विपक्ष की भूमिका नकारात्मक रही? क्या इसके लिए विपक्ष जिम्मेदार है?

यह कई प्रश्न जनता के सामने है। सवाल यह है कि महिला आरक्षण के लिए जब लगभग तीन दशक से मांगे उठती रही। सत्ता पक्ष या विपक्ष बदलते रहे। लेकिन ये मांग स्थिर रही। चाहे कांग्रेस सत्ता में रही हो या एनडीए की सरकार भाजपा की सरकार सत्ता में रही हो या यह दोनों विपक्ष में रहे हो महिला आरक्षण के मुद्दे पर लगभग एक मत थे लेकिन उसके बावजूद पिछले तीन दशक में महिला आरक्षण महिलाओं को 33% आरक्षण नहीं मिल सका। एक प्रयास नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2023 में किया और नारी बंधन अधिनियम 2023 सरकार लेके आई जिसका आशय है कि सभी लोकसभा राज्यसभा विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा। लेकिन उसके साथ ही शर्त यह थी कि यह नए परिसीमन के बाद होगा। ऐसा संवैधानिक आवश्यकता भी थी। तो सरकार ने अब यह प्रयास किया एक विशेष सत्र सत्र तो चल ही रहा है बजट सत्र। उसमें विशेष चर्चा के लिए दो दिन का समय निर्धारित हुआ 16 और 17 अप्रैल का कि इसमें नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने के लिए जो प्रावधान है और जो संविधान संशोधन है वो किए जाएंगे और आरक्षण 2029 में लागू हो जाएगा। लेकिन वो प्रयास सफल नहीं हुआ। इसके लिए सरकार तीन विधेयक लेकर आई। दो दिन की चर्चा हुई। पहले दिन चर्चा हुई और उसके बाद विधेयक प्रस्तुत हुए। पहला जो विधेयक था जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण था ये था 131वा संशोधन विधेयक।

इसके अनुसार लोकसभा में सदस्यों की संख्या वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 किया जाना था। यानी कि इसके लिए विधेयक प्रस्तुत किया कि संसद में सदस्यों की संख्या को विस्तारित कर दिया जाए और उसके बाद फिर 33% आरक्षण उनको दिया जाएगा। यह विधेयक था। इसके साथ ही दो और सहायक विधेयक थे जिसमें एक दूसरा विधेयक है कि परिसीमन के लिए अनुमति संसद से ली जाए और परिसीमन आयोग बनाया जाए। वह लोकसभा क्षेत्रों का परिसीमन करें उसी 850 के अनुसार ताकि महिलाओं को उसमें आरक्षण दिया जा सके। 33% आरक्षण किया जा सके। जो तीसरा विधेयक था यह था केंद्र शासित प्रदेशों में भी परिसीमन करना और सीटों में वृद्धि करना। इसके लिए था। लेकिन जो पहला विधेयक था वही कल लोकसभा में मतदान के दौरान गिर गया। इसके पक्ष में 298 वोट पड़े और विपक्ष में 230 वोट पड़े। जबकि आवश्यकता 342 की थी। 54 मत कम रह गए जिसके कारण यह विधेयक गिर गया। जब यह विधेयक गिर गया तो सरकार ने जो बाकी दो विधेयक थे उनको भी वापस ले लिया। उनको प्रस्तुत ही नहीं किया। यह तो कल की प्रक्रिया रही। लेकिन अब इस पर एक नई बहस शुरू हो गई है कि आखिर ऐसे क्या कारण थे कि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के दूसरे दल इस बात पर आमादा थे कि यह विधेयक पारित ना हो।

विपक्षी दल बात तो करते हैं महिला आरक्षण की कि महिला आरक्षण मिलना चाहिए। हम हर हाल में तैयार हैं। लेकिन जब बिल आया तो बिल गिरा दिया। उनके तर्क क्या है? पहला तर्क है कि दक्षिण भारत के राज्यों के साथ इस बिल से अन्याय हो जाएगा। यानी कि जो परिसीमन होना है यह परिसीमन 2011 की जनसंख्या के आधार पर होना है। यानी 2011 में जो जनगणना हुई थी उसको आधार बनाकर परिसीमन हुआ। दक्षिण के राज्यों की चिंता यह है कि उनके यहां जनसंख्या का अनुपात लगातार घट रहा है। आबादी कम हो रही है और उत्तर भारत के राज्यों में आबादी का घनत्व बढ़ता चला जा रहा है। ऐसे में जब आबादी के आधार पर परिसीमन होगा तो दक्षिण के राज्यों में लोकसभा क्षेत्रों की संख्या वर्तमान से भी कम हो जाएगी। बढ़ने बढ़ेगी तो नहीं बढ़ने से भी और कम हो जाएगी। और उत्तर भारत में लगभग दो गुनी हो जाएगी। यह आशंका दक्षिण के राज्यों की है।

पूर्वोत्तर के राज्यों की भी ऐसी ही आशंकाएं हैं क्योंकि वहां भी आबादी का घनत्व नहीं है। उत्तराखंड में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति है। हिमाचल में भी ऐसी ही स्थिति है। ये एक बड़ी आशंका है। तो इसे विपक्ष ने आधार बना लिया। हालांकि इसका समाधान कल जब यह विधेयक पेश हुआ उससे पहले चर्चा का जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने बड़ा साफ कहा कि हम दक्षिण की इन चिंताओं से वाकिफ हैं और हम उनके साथ अन्याय नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा कि हम हर हाल में जनसंख्या भले ही कम हो दक्षिण के राज्यों में 50% सीटें बढ़ा देंगे। यह आश्वासन उन्होंने दिया। बल्कि उन्होंने तो यह कहा कि अभी एक घंटे में समर्थन अगर देने को तैयार हो विपक्ष तो मैं एक घंटे में ही नया विधेयक प्रस्तुत कर दूंगा और 50% संख्या हम दक्षिण के राज्यों की बढ़ा देंगे। लेकिन कांग्रेस इस पर नहीं मानी और जो उनके सहयोगी दल है वो भी नहीं माने

अंतत यह विधेयक गिर गया। कांग्रेस की जो दूसरी मांग है या उनका जो पक्ष है वह यह है कि इस आरक्षण को क्यों ना वर्तमान संख्या पर ही लागू कर दिया जाए। जो वर्तमान 543 की लोकसभा संख्या है उसमें सरकार आरक्षण क्यों नहीं देना चाहती वो तो साधारण बहुमत से भी हो जाएगा। हालांकि जो संविधान संशोधन था उसके लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत थी और वो दो तिहाई नहीं मिला तो गिर गया। लेकिन कांग्रेस ये भी कहती है कि इसमें शशि थरूर ने भी बड़ी साफ बात कही कि वर्तमान पर क्यों नहीं देते? इसे शशि थरूर ने कहा कि महिला आरक्षण को केंद्र सरकार ने एक कांटों से लिपटी हुई लिपटे हुए तोहफे के रूप में प्रस्तुत किया है। यानी कि बहुत जटिल बना दिया है। लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, राजनाथ सिंह ने इसके पक्ष में तर्क दिए और कहा कि यह आवश्यक है कि हम पहले इसका परिसीमन करें। सदस्यों की संख्या बढ़ाएं और ताकि कोई भी समुदाय और कोई भी वर्ग इससे प्रभावित ना हो और विस्तारित संसद में ही इसको आरक्षण को दिया जाए। लेकिन अब इस विधेयक के गिरने के बाद जो स्थिति है वो यह बन गई है कि अब 2029 के लोकसभा चुनाव में तो आरक्षण लागू नहीं हो पाया। क्योंकि अभी अब अगर यह नई जनसंख्या के आधार पर होगा तो जो जनगणना चल रही है जनगणना 2026 के परिणाम 2027 के अंत तक आएंगे। हो सकता है 2028 भी हो जाए। उसके बाद फिर विधेयक आएगा और परसीमन के लिए विधेयक पारित होगा। परसीमन होगा। परसीमन आयोग बनेगा। परसीमन आयोग के लिए समय चाहिए। पूरे देश में जगह-जगह जाकर उनको मीटिंग करनी पड़ेगी। उसमें भी कम से कम एक साल डेढ़ साल का समय चाहिए। तब तक लोकसभा चुनाव हो चुका होगा और 2029 में यह लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू नहीं हो पाएगा। एक तरह से यह सपना 2029 के लिए तो टूट गया। अब कांग्रेस यह भी कह रही है कि यह पूरा मुद्दा जो है चुनाव से संबंधित है।

भाजपा चुनाव में इसका लाभ लेना चाहती थी। इसलिए उसने यह विधेयक पेश किया। यह बात भी सही है कि सत्तारूढ़ दल ने जब यह विधेयक पेश किया तो उसने उतना होमवर्क नहीं किया जितना वो पहले करती थी और यह पहला विधेयक है जो नरेंद्र मोदी सरकार का गिरा है तो क्या केंद्र सरकार ने इस पूरे विधेयक को पेश करने से पहले पूरी प्रक्रिया और विपक्षी दलों के साथ और कुछ ऐसे दलों के साथ जो इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है उनके उनके साथ बातचीत नहीं की और वो पूरी तैयारी रणनीति क्यों नहीं बनी जो ये विधेयक पारित हो जाता कुछ भी हो, लेकिन ये एक कष्टकारी विषय है कि एक अच्छे उद्देश्य के लिए लाया गया विधेयक गिर गया। अब यह फैसला जनता के हाथ में है कि महिला आरक्षण को रोके जाने के दोषी जनता विपक्ष को मानेगी या सत्तारूढ़ दल की कमजोर रणनीति को मानेगी यह जनता के हाथ में है।

जनता इसका निर्णय करेगी। इस पर चिंतन होगा। लेकिन महिला आरक्षण बिल पास होना चाहिए था। हालांकि मांग तो यह थी कि महिलाओं को 50% आरक्षण दिया जाए। लेकिन 33% मिला तो 33% भी संतुष्ट करने वाला है। 33% अभी की जो संख्या है लोकसभा में या संसद में वो 14% महिलाएं ही हैं कुल संख्या की तो 33% होंगी। ये भी एक उपलब्धि होगी। लेकिन अब ये 2029 के चुनाव के बाद ही प्रक्रिया पूरी होगी। या सरकार अगर कोई ऐसा विधेयक ले आती है कि जो वर्तमान सदस्य संख्या पर ही लागू कर दिया जाए तब भले ही 2029 में आरक्षण मिल जाए। विपक्ष का एक वर्ग जिसमें समाजवादी पार्टी मुख्य रूप से है। इनका कहना यह है कि ये जो आरक्षण बिल मिले महिलाओं को वो आरक्षण के अंदर आरक्षण के साथ मिले। यानी कि महिला आरक्षण में भी ओबीसी आरक्षण लागू किया जाए। कई दलों ने तो धार्मिक आरक्षण की मांग कर दी। लेकिन कल गृह मंत्री अमित शाह ने बहुत साफ कहा कि किसी भी हालत में धार्मिक आरक्षण देश में किसी भी स्थिति में कहीं भी स्वीकार नहीं है और वो लागू नहीं किया जाएगा। ओबीसी आरक्षण को भी सरकार ने कहा कि हम ओबीसी जनसंख्या की गणना जरूर कराएंगे। जनगणना ओबीसी की होगी। लेकिन उन्होंने कहा कि जो महिला आरक्षण है उसमें एससी एसटी को आरक्षण मिलेगा और एससी एसटी की सीटें बढ़गी।

अब सरकार ने एक नया अपना पक्ष प्रस्तुत किया है विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने के लिए। अमित शाह ने कल कहा कि विपक्ष ने एससी एसटी के सदस्यों की संख्या को बढ़ने से रोक दिया है। एससी एसटी के साथ अन्याय किया है। महिलाओं के साथ अन्याय किया है। इसका जवाब जनता उनको देगी। महिलाएं उनको देंगी। देखते हैं आने वाले चुनाव में क्या इसका कोई असर होता है या जनता में किस तरह का जनमत बनता है। जनता विपक्ष को कड़कड़े में खड़ा करती है या सत्तारूढ़ दल को ही कट में खड़ा कर देगी कि आपने इतना जटिल इस पूरी प्रक्रिया को क्यों बना दिया है।

The Women’s Reservation Bill collapsed in the Lok Sabha yesterday. That is, has the hope of getting 33 per cent reservation for women in the 29th Lok Sabha elections been dashed in a way or has this dream been broken? Who’s responsible for this? Has the ruling party’s strategy been weak or has the opposition played a negative role in the fall of this bill and in fulfilling the hope of women’s reservation? Is the opposition responsible for this?

April 3, 2026

सपा का नया दांव

सर्वेश कुमार सिंह

पश्चिम उत्तर प्रदेश से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की राजनीति गर्मा गई है। दो दिन में पश्चिम में दो बड़ी रैलियां हुई हैं और दोनों रैलियां विरोधी पार्टियों की हुई है। दोनों ने चुनावी माहौल को गरमा दिया है। एक तरह से दोनों ने ही चुनावी अभियान का श्रीगणेश कर दिया है। एक रैली  हुई 28 अप्रैल को हुई, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधित किया,  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संबोधित किया। उसका अवसर था यह जेवर में इंटरनेशनल एयरपोर्ट के एक पहले टर्मिनल के उद्घाटन का था।

इस मौके पर क्षेत्र की जनता को एकत्रित किया गया। क्षेत्र की जनता वहां पहुंची भी। भारी संख्या में पहुंची और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाषण दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण एक तरह से पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर ही केंद्रित था। उन्होंने योगी आदित्यनाथ के कार्यों की और उत्तर प्रदेश की प्रगति की चर्चा की। वहीं उन्होंने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला और यहां तक कह दिया कि समाजवादी पार्टी की सरकार में नोएडा को एटीएम की तरह से यूज़ किया गया। यह बहुत बड़ी बात थी, बहुत महत्वपूर्ण बात थी।

इस पर अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया तत्काल आई उन्होंने कहा कि हम बुरा नहीं मानते हैं मेहमानों की बात का। लेकिन अखिलेश यादव ने आज अपनी रैली से सीधा भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को जवाब भी दिया। आज 29 तारीख को दादरी में एक बड़ी रैली हुई। यह रैली समाजवादी पार्टी की तरफ से आयोजित थी और समाजवादी पार्टी ने इसको भाईचारा सम्मेलन के रूप में आयोजित किया। इस सम्मेलन कोअखिलेश यादव ने संबोधित किया। अखिलेश यादव ने विचार व्यक्त किए और अखिलेश यादव ने तमाम आरोपों का जवाब दिया और सरकार पर भी आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि एयरपोर्ट का उद्घाटन हुआ। इसके पहले भी सात हवाई अड्डों का उद्घाटन किया गया था। उसमें से छह बंद हो गए।

उन्होंने उत्तर प्रदेश की योजनाओं में भी अनियमितताओं की बात की और कहा कि कल जो रैली हुई थी उस रैली में तमाम यूनिवर्सिटी के छात्रों को बुलाया गया था। लोगों को जबरदस्ती सरकारी कर्मचारी और अधिकारी लेकर आए। भीड़ जुटाई गई। भीड़ों को लाया गया। आज अखिलेश यादव ने एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि पीडीए की सरकार अगर बनेगी तो पीडीए के पीडीए समाज के जो नायक हैं उनकी प्रतिमाएं लगवाई जाएंगी। यानी कि पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक समाज के जो प्रमुख नेता रहे हैं या नायक रहे हैं उनकी सरकार आने पर वो उनकी प्रतिमाएं लगवाएंगे। उनको सम्मान प्रदान करेंगे। यह महत्वपूर्ण बात अखिलेश यादव ने कही और उन्होंने भी अपनी रैली में लगभग 32 जिलों के कार्यकर्ताओं को, नेताओं को आमंत्रित किया था। लगभग 140 विधानसभाएं इससे प्रभावित होती हैं। इस क्षेत्र को उन्होंने पूरी तरह से मथने का और मंथन करने के लिए इस रैली को आयोजित किया।

हालांकि इसको दादरी के और ग्रेटर नोएडा नोएडा के स्थानीय नेताओं ने इस रैली को आयोजित किया था। रैली दादरी के सम्राट मेहर भोज डिग्री कॉलेज में आयोजित थी। विशेष रूप से इसमें भारी संख्या में गुर्जर समाज के लोग एकत्रित हुए थे। देखते हैं इन दोनों रैलियों के बाद आने वाले समय में क्या रैलियों का दौर तेज होगा और चुनावी अभियान एक तरह से देखने को मिलेगा और मुद्दे भी अब सामने आने लगे हैं क्योंकि अखिलेश यादव ने एक लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक नारी सम्मान योजना की घोषणा की कि वो महिलाओं को चालीस हजार रुपये सालाना पेंशन देंगे। इसके साथ ही समाजवादी पेंशन फिर से शुरू करने की बात कह चुके हैं।

अब उन्होंने एक नया नारा दिया है कि पीडीए के नायकों की प्रतिमाएं लगवाएंगे। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी केंद्र के नेता और प्रदेश के नेता अपनी केंद्रीय सरकार की उपलब्धियां और राज्य सरकार की उपलब्धियों के बल पर चुनावी मैदान में उतर रहे हैं। सीधा मुकाबला समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच होना है। हालांकि समाजवादी पार्टी आने वाले चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सकती है। यह घोषणा अखिलेश यादव ने स्वयं ही की थी कि वो कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे। यानी इंडिया गठबंधन चुनाव लड़ेगा। देखते हैं आने वाले समय में प्रदर्शन क्या स्बवरुप होता है।

March 22, 2026

ईरान के खिलाफ अरब और यूरोप एकजुट

Posted on 22.03.2026 Time 07.00 PM, Sunday Article: Iran Israel war , Writer: Sarvesh Kumar Singh 

सर्वेश कुमार सिंह

ईरान अमेरिका के युद्ध के बीच ईरान गहरे आइसोलेशन में आ गया है। यानी कि उपेक्षा की स्थिति में है। ईरान पहले से ही अकेला लड़ रहा था। लेकिन अब उसके खिलाफ यूरोप और अरब देश एकजुट होने लगे हैं। यह आइसोलेशन ईरान के लिए बहुत ही मुश्किल वाला हो सकता है।

वजह साफ है ऊर्जा का संकट पूरी दुनिया में गहराता जा रहा है। ऊर्जा संकट के कारण अब जो देश अभी तक निरपेक्ष थे और केवल दृष्टा की स्थिति में थे, केवल युद्ध को देख रहे थे। अब उन देशों को भी कुछ ना कुछ रणनीति तय करनी पड़ रही है क्योंकि सबके सामने ऊर्जा संकट आता चला जा रहा है। एक कारण तो ऊर्जा संकट है और ऊर्जा संकट में महत्वपूर्ण भूमिका है, हॉर्मूज जलडमरू मध्य मार्ग की। इसे खुला रखना
ऊर्जा के लिए बहुत जरूरी है। ऊर्जा की आपूर्ति के लिए।

तो इस प्रकार दो कारण है जिनसे ईरान  को आइसोलेशन का सामना करना पड़ रहा है। पहला कारण जल डमरू मध्य होमस को खुला रखना है। ईरान ने चेतावनी दे रखी है कि वो अमेरिका, इजराइल और उसका समर्थन करने वाले देशों के जहाजों को इस मार्ग से नहीं गुजरने देगा। इसका असर यह हो रहा है कि ऊर्जा का संकट लगातार गहरा रहा है। तेल की आपूर्ति, गैस की आपूर्ति निर्बाध नहीं हो पा रही है। इससे जहां यूरोप के कई देश प्रभावित हो रहे हैं। वहीं जो अरब देश हैं उनकी आर्थिक स्थिति को भी यह प्रभावित कर रहा है।

जलडरू मध्य मार्ग को खुला रखने के लिए अमेरिका
ने एक अपील की थी दुनिया भर के देशों से। उस अपील का पहले तो कोई असर नहीं हुआ लेकिन जब देशों को लगा कई देशों को यह लगा यूरोप के कि वो भी इससे प्रभावित हो जाएंगे ऊर्जा की आपूर्ति को लेकर। तो उन्होंने एक निर्णय लिया और यह निर्णय है यूरोप के पांच देश एकजुट हुए हैं जिसमें ब्रिटेन,फ्रांस, जर्मनी,इटली और नीदरलैंड हैं एक और देश है जो जापान है। इसने भी इन देशों के साथ एकजुटता दिखाई है। और यह एकजुट इसलिए हुए हैं कि किसी भी कीमत पर इस जलडमरू मध्य मार्ग को खुला रखा जाए। हॉर्मूज को खुला रखने के लिए कुछ ना कुछ
रणनीति अब बनानी पड़ेगी। वो रणनीति क्या होगी? वो रणनीति के कई चरण हो सकते हैं। पहला यह छह देश ईरान से बात करेंगे। ईरान को इन्होंने संदेश दे भी दिया है कि इस मार्ग को खुला रखा जाए ताकि ऊर्जा की आपूर्ति निर्वाद बनी रहे। इसके अलावा ईरान से यह भी अपील की है उन्होंने कि जो ऊर्जा संयंत्रों पर ईरान की तरफ से हमले हो रहे हैं उनको भी बंद किया जाए। पहला चरण यह है। इसके अलावा फिर कूटनीतिक वार्ताएं होंगी। कूटनीतिक वार्ता से अगर बात नहीं बनेगी तो हो सकता है यह छह देश मिलकर कुछ अपनी सेना का या अपनी नेवी का अपना कुछ जहाजों को भेजकर भी वहां यह प्रैक्टिस कर सकते हैं और इस मार्ग को खुला रखने की बात जैसे कि अमेरिका ने कही थी डोनाल्ड ट्रंप ने कि वे अपनी सेना को भेजें अपने नौसैनिक बेड़े भेजें तो ये इस पर भी विचार हो सकता
है। तो ऐसे मामले में एक तो यूरोप यूरोप के सभी जो बड़े देश हैं वो एक तरह से उसमें फ्रांस भी शामिल है। तो जो देश शामिल हैं उसमें अब सभी लगभग यूरोप एकजुट हुआ है और वो ईरान के खिलाफ हुआ है। तो एक तरह से यूरोप में ईरान के लिए कोई समर्थन नहीं है और यूरोप एक तरह से विरोध में खड़ा हो गया है। दूसरा जो बड़ा क्षेत्र है वो अरब है। हालांकि ईरान ने साफ कहा कि हम अरब देशों पर हमले नहीं कर रहे हैं। लेकिन जो अमेरिका के सेंटर हैं, केंद्र हैं जो उनके सीआईए के केंद्र है या उनके एयर फोर्स के स्टेशन है या
उनके दूतावास हैं उन पर लगातार ईरान ने हमले किए हैं। लेकिन अब इधर ईरान ने अरब देशों के जो ऊर्जा संयंत्र हैं, तेल के कारखाने हैं, तेल उत्पादन के केंद्र हैं,
गैस उत्पादन के केंद्र हैं, उन पर भी हमले शुरू कर दिए हैं और बड़े हमले किए हैं। उससे यूरोप के साथ-साथ अब अरब देश भी ईरान के खिलाफ एकजुट होते चले जा रहे हैं। पहले भी वो ईरान के साथ नहीं थे, लेकिन वो तटस्थ स्थिति में थे। लेकिन अब वो ईरान के खिलाफ खुलकर बात करने लगे हैं। इस वजह से ऐसा लगने लगा है कि ये दोनों घटनाएं ऐसी हैं कि जिससे कि पूरा यूरोप और पूरा अरब अब ईरान के खिलाफ खुलकर सामने आ गया है और ईरान की मुश्किलें बढ़नी शुरू हो जाएंगी।

दूसरी तरफ एक और नया घटनाक्रम है। यह भी ईरान के लिए थोड़ा दिक्कत पैदा करने वाला है। यह घटनाक्रम है। संयुक्त अरब अमीरात यूएई की सरकार ने एक आतंकवादी नेटवर्क का खुलासा किया है। और यह आतंकवादी नेटवर्क लेबनान के हिजबुल्ला और ईरान की सरकार के सहयोग से संचालित हो रहा था। यह यूएई का दावा है। यूएई का दावा यह है कि जो आतंकवादी नेटवर्क के लोग गिरफ्तार हुए हैं, उनका
संबंध ईरान से था और हिजबुल्लाह से था। उनको ईरान के मारफत आर्थिक सहायता भी मिल रही थी। उनको समर्थन भी मिल रहा था और इस नेटवर्क को संचालित करने में इन दोनों का हाथ रहा है। यानी कि अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर आतंकवादी नेटवर्क का भी एक खुलासा यूएई ने कर दिया है। यूएई एक अरब देशों का प्रमुख देश है। प्रमुख ये जो देश है अरब के उनमें इसका संयुक्त अरब
अमीरात का बड़ा स्थान है। महत्वपूर्ण स्थान है। तो एक तरह से वह अरब और यूरोप दोनों के निशाने पर अब ईरान है और उसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब उसकी छवि भी खराब होने की संभावना है क्योंकि जो आतंकवादी नेटवर्क का खुलासा हुआ है इससे कोई भी दुनिया का देश ईरान का इस तरह समर्थन नहीं करेगा कि वो आतंकवादियों को फंडिंग करें। हालांकि अभी यह आरोप है यूएई का। इसके प्रमाण अभी सामने आएंगे तो पता चलेगा कि उसमें सच्चाई कितनी है। लेकिन अभी ये यूरोप ने इस तरह का संयुक्त अरब
अमीरात ने इस तरह का आरोप लगाया है।

एक और घटनाक्रम यह है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी संसद से इस युद्ध के लिए 200 अरब डॉलर की मांग की है। यानी कि इस युद्ध में अमेरिका को भारी धनराशि खर्च करनी पड़ रही है और आगे युद्ध जारी रखने के लिए 200 अरब डॉलर संसद से चाहिए, कांग्रेस से चाहिए। इसकी डिमांड डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने की है। क्योंकि यह युद्ध बहुत भारी पड़ता जा रहा है और महंगा युद्ध होता जा रहा है।

इसके अलावा भारत की भी सुरक्षा चिंताएं बहुत महत्वपूर्ण है और भारत सरकार इसके लिए सचेत है। जो भी आवश्यक कदम हैं यह भारत उठाता है। भारत के प्रधानमंत्री ने इस ऊर्जा संकट को दूर करने के लिए और ऊर्जा की आपूर्ति निर्बाद बनाए रखने के लिए ईरान
के राष्ट्रपति से भी बात की और उन्होंने क़तर के शेख से बात की है। उनको ईद की मुबारकबाद दी और इसके साथ ही कतर में जो बड़ा हमला ईरान की तरफ से हुआ है तेल संयंत्रों पर क्योंकि क़तर से बड़ी मात्रा में गैस की आपूर्ति भारत को होती है और कतर से तेल भी आता है तो कतर पर जो हमला हुआ है जो उनको नुकसान हुआ है उस पर चिंता व्यक्त की भारत ने और भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसकी निंदा भी की । तेल संयंत्रों पर हमले की भारत ने भी निंदा कर दी है तो एक तरह से जो ऊर्जा का मुद्दा है अब यह निर्णायक स्थिति में ले जाएगा। या तो देश तटस्थ रहे या फिर किसी ना किसी रूप से अपनी भूमिका निभाएं। क्योंकि ऊर्जा का जो ऐसा संकट है कि इससे हर देश प्रभावित होगा। हर व्यक्ति प्रभावित होगा। तो अब ईरान पर दबाव बढ़ना
लगातार शुरू हो गया है। और इस दबाव के आगे ईरान को संभवत झुकना पड़ेगा। क्योंकि ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने के लिए ईरान का जल डमरू मध्य को खुला रखना बहुत जरूरी है।  किसी भी कीमत पर तेल संयंत्रों पर हमले रोकने चाहिए।

इसमें अकेला ईरान ही जिम्मेदार नहीं है। ईरान के साथ-साथ इसमें इजराइल भी जिम्मेदार है और अमेरिका भी जिम्मेदार है। अमेरिका और इजराइल ने भी ईरान के तेल ठिकानों पे हमले किए। उसके जवाब में ईरान ने भी हमले किए। तो इसके लिए ऐसा नहीं है कि किसी एक को दोषी और किसी एक दूसरे को निर्दोष कहा जाए। दोषी तीनों हैं और इनको इस युद्ध में तेल क्षेत्रों पर ऊर्जा की जरूरतों को बचाना चाहिए था। जैसे नागरिक ठिकानों पर हमले नहीं करने चाहिए। अस्पतालों पर नहीं करने चाहिए। स्कूलों पर नहीं होने चाहिए। लेकिन इस युद्ध में सारी सीमाएं टूट गई हैं।
अस्पतालों पर भी हमले हो रहे हैं। स्कूलों पर भी हमले हो रहे हैं। तेल क्षेत्रों पर भी हमले हो रहे हैं। और यहां तक कि नेताओं पर भी हमले नहीं होते हैं युद्ध के दौरान। लेकिन नेताओं पर भी जो लीडरशिप है उस पर
भी हो रहे हैं। तो इस तरह से इस युद्ध में अब गंभीर ऊर्जा संकट सामने आने की आशंका है। ऐसे में अब ईरान अलग-थलग पड़ता जा रहा है और इसमें अब जो देश एकजुट हुए हैं उसमें अगर दूसरे देशों की भी संख्या बढ़ी तो ईरान को संभवत इस मामले पर झुकना पड़ेगा।

यह युद्ध जल्दी समाप्त होना चाहिए। नुकसान ईरान का भी बहुत हुआ है। इजराइल का भी हुआ है। अमेरिका तो क्योंकि दूर है लेकिन अमेरिका के जो ठिकाने हैं अरब क्षेत्रों में उन पर जरूर नुकसान हुआ है। उन पर हमले हुए हैं।

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

लेखक स्वतंत्र पत्रकार है

 

March 17, 2026

तानाशाही के नाम पर: युद्ध नियंत्रण की आवश्यकता : डाॅ०राकेश सक्सेना

Rakesh Saxena

Posted on 17.03.2026, Tuesday

एटा 17 मार्च उप्रससे। युद्ध आक्रामक कृत्य है जो किसी भी राष्ट्र की अस्मिता के विनाश से जोड़ता है। इस विचार को दृष्टिगत रखते हुए मानव सभ्यता के इतिहास में युद्ध एक जटिल पक्ष रहा है। समय बदलाव के साथ युद्ध की प्रवृत्ति, साधन, उद्देश्य व परिणाम में व्यापक परिवर्तन हुए। प्राचीन युद्धों में तलवार, भाला, धनुष-बाण, गदा आदि अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग होता था किन्तु आधुनिक युद्धों में टैंक, मिसाइलें, लड़ाकू विमान, परमाणु बम, ड्रोन और साइबर तकनीक जैसे अत्याधुनिक साधनों का प्रयोग होता है। प्राचीन काल में युद्ध के कुछ नैतिक नियम और मर्यादाएँ थीं। दिन में युद्ध और रात्रि में विश्राम, निहत्थे व शरणागत पर आक्रमण न करना, स्त्रियों, बच्चों व निर्दोष नागरिकों की रक्षा करना आदि नियमों का पूर्णरूपेण पालन किया जाता था किन्तु आधुनिक युद्धों में ये मर्यादाएँ तार-तार हो चुकीं हैं। युद्ध किसी भी समस्या के समाधान नहीं होते। आज के युग में युद्ध अत्यधिक विनाशकारी हो गए हैं, इसकी विभीषिका, इसका दुष्प्रभाव समूचे समाज, संस्कृति और मानव जीवन पर पड़ता है, हजारों-लाखों लोग अपने प्राण ग॔वा बैठते हैं, परिवार उजड़ जाते हैं, माताएँ अपने पुत्रों को खो देतीं हैं, बच्चे अनाथ हो जाते हैं, उद्योग धंधे नष्ट हो जाते हैं, जनता अभाव का जीवन जीने को विवश हो जाती है, भय, असुरक्षा और अशान्ति का वातावरण समाज में फैल जाता है, हिंसा व घृणा का वातावरण पनपता है।
आज भारत-पाकिस्तान, अफगान-पाकिस्तान, यूक्रेन-रूस, इजरायल-फिलिस्तीन, अमेरिका-ईरान, इजरायल-ईरान आदि देशों के युद्धों से दृष्टिगोचर हो रहा है कि दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी है। वैश्विक राजनीति में ऊर्जा संसाधनों विशेषकर तेल का महत्वपूर्ण स्थान है। औद्योगिक विकास, सैन्य शक्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा भाग तेल पर निर्भर करता है, इसी कारण तेल -समृद्ध क्षेत्रों पर नियंत्रण को लेकर विश्व की महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा रही है। अमेरिका की विदेश नीति में तेल राजनीति की बड़ी भूमिका रही है, जिसके कारण आज वह अपनी तानाशाही दिखा रहा है। ट्रम्प नाम का पक्षी जो अमेरिका में पाया जाता है, वह सारी दुनिया पर अपनी चोंच मारना चाहता है, इसलिए उसने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को रातों-रात उठा लिया, ईरान के सर्वोच्च नेता खामनेई को मार दिया और इसी की प्रजाति वाले ने कुछ वर्षों पूर्व ईराक के सद्दाम हुसैन को मार दिया था, फिर भी दुनिया चुप है। सन् 2025 में आयोजित ब्रिक्स बैठक में अमेरिका- इजरायल के ईरान पर हमलों को लेकर निंदा की गई थी लेकिन आज संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों व संगठनों की ओर से इस तानाशाही का विरोध नहीं हो रहा है, जो चिंता का विषय है।
मध्य पूर्व विश्व का सबसे बड़ा तेल भंडार क्षेत्र है। इस क्षेत्र के सऊदी अरब, ईराक, ईरान, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात के पास विशाल तेल संसाधन हैं, इसलिए तानाशाह अमेरिका इन क्षेत्रों पर अपना प्रभाव जमाए हुए है। परस्पर इन देशों में एकजुटता का अभाव है, महाशक्तियाँ पीड़ित देशों के सहयोग हेतु आगे नहीं आ रहीं हैं, नाटो, ब्रिक्स, एससीओ पीस मिशन, शंघाई संगठन मौन साधे दूरी बनाए हुए हैं। डालर में अमेरिका के प्राण बसते हैं, उसके रक्षार्थ वह कुछ भी करता रहे, इस अहंकार को तोड़ना आवश्यक है। अमेरिका ने ईरान पर हमला करके विश्व अर्थव्यवस्था के समक्ष संकट बढ़ा दिया है और यदि युद्ध लम्बा खिचता है तो वह स्वयं भी इस संकट के घेरे में आ जाएगा। वैश्विक तेल कारोबार पर आधिपत्य जमाना किसी भी दृष्टि से न्यायोचित नहीं है। वेनेजुएला की भाँति ईरान भी अपना तेल डालर में नहीं बेच रहे थे। डालर का वर्चस्व अमेरिका कायम न रख पाए इसलिए उस पर अंकुश लगाने के लिए दुनिया के देशों को आगे आना ही होगा।

March 7, 2026

नारी: शक्ति, संवेदना और सृजन -डाॅ० राकेश सक्सेना


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर

एटा 06 मार्च उप्रससे। सृष्टि के विकास में नर और नारी दोनों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। प्रकृतिस्वरूपा होने के कारण सृष्टि पहले से ही रहस्यात्मक थी किन्तु इसको गंभीरतम बनाने में नर-नारी का मिथुनस्वरूप सहायक सिद्ध हुआ। अपने पौरुष, साहस,शौर्य और तेज के कारण यदि नर एक भिन्न वर्ग में आ गया तो नारी भी अपनी दया, त्याग, उदारता, सहनशीलता, सुकुमारता और धैर्य के कारण एक अलग वर्ग में समझी जाने लगी। चुम्बक और धातु की तरह ये दोनों एक-दूसरे से आकृष्ट होने लगे, इसी कारण मानव जीवन में नर और नारी का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। नारी के बिना नर और नर के बिना नारी दोनों अपूर्ण हैं। नर यदि अग्नि है तो नारी ईंधन। नर यदि समुद्र है तो नारी किनारा। नर यदि दीपक है तो नारी प्रकाश। नर यदि वृक्ष है तो नारी उसका फल। दोनों का अपने-अपने स्थान पर महत्व है।
यौन आकर्षण को प्रजनन प्रेरणा के नाम से मानव जगत में पुकारा जाता है। प्रजनन जीव का महत्वपूर्ण कार्य है। गर्भ धारण करके संतान को जन्म देना,उसका पालन-पोषण करना मुख्यतः नारी का ही काम है,जो मानव जीवन की निरंतरता का आधार है। यह केवल जैविक प्रक्रिया नहीं बल्कि सृष्टि चक्र को आगे बढ़ाने वाली सृजनात्मक शक्ति है। प्रकृति ने नारी को मातृत्व का अद्भुत गुण प्रदान किया है। याज्ञवल्क्य मुनि का कथन है कि जिस तरह चने अथवा सीप का आधा दल दूसरे से मिलकर पूर्ण होता है उसी प्रकार पुरुष के सामने का खाली आकाश नारी के साथ मिलने से पूर्ण होता है। प्रकृति की इस मनोरम पुत्री ने अपने सौन्दर्य,व्यक्तित्व और कृतित्व के विविध रूपों से नर का पोषण किया है। माता, पत्नी, भगिनी, पुत्री, सखी, सेविका, परिचारिका, तपस्विनी आदि भूमिकाओं में नारी ने हमेशा ही संवेदनशीलता और समर्पण का परिचय दिया है। वह शक्ति,करुणा और सृजन का समन्वित रूप है।
भारतीय समाज व साहित्य में नारी को देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। भारतीय आदर्श जैसे विद्या का आदर्श सरस्वती, धन का लक्ष्मी में, पराक्रम का दुर्गा में, सौन्दर्य का रति में, पवित्रता का गंगा आदि नारी में ही समाहित है। इसीलिए महर्षि मनु ने कहा- ‘ यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ‘ अर्थात् जहाँ नारी का पूजन होता है वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ आदर नहीं होता वहाँ सभी कार्य विफल होते हैं, इसी अर्थ में फिर एक स्थान पर उन्होंने कहा-‘ शोचन्ति जाम यो यत्र विनश्यत्पाशु तत्कुलम् ‘ अर्थात् जिस घर में स्त्रियाँ शोक करतीं हैं, वह शीघ्र ही नष्ट होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि शक्ति, समृद्धि और ज्ञान की अधिष्ठात्री नारी केवल कोमलता नहीं अपितु साहस और आत्मबल की धनी है। आधुनिक युग में शिक्षा, विज्ञान, राजनीति, अंतरिक्ष और खेल आदि क्षेत्रों में भी वह शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाई दे रही है। शक्ति के साथ ही उसके हृदय में संवेदना, ममता और सहानुभूति का प्रवाह है जो परिवार,समाज और संस्कृति को मानवीय आधार प्रदान करती है। वह सम्बन्धों का निर्वाह ही नहीं करती बल्कि आत्मीयता से सींचती भी है। उसकी संवेदना का प्रथम रूप मातृत्व में ही दिखाई देता है जहाँ शिशु की पीड़ा को वह बिना शब्दों के ही समझ लेती है। परिवार को एकसूत्र में बाँधने का कार्य भी नारी ही करती है। आज की नारी शिक्षा और आत्मनिर्भरता के साथ आगे बढ़ रही है। वह अपने कार्यस्थल पर नेतृत्व करते हुए मानवीय मूल्यों को वरीयता प्रदान करती है, प्रेम की भाषा बोलती है, करुणा की ज्योति जलाए रखती है।
सृष्टि के मूल में नारी वह चेतना है जिसके बिना जीवन की कल्पना ही अधूरी है। वह जन्मदायिनी शक्ति के साथ हमारी संस्कृति, आदर्श और मूल्यों की भी सर्जक है, परिवार की शिक्षिका है। अपनी सृजनात्मक प्रतिभा से नारी ने साहित्य,चित्रकला, संगीत, नृत्य, नाट्यों, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, प्रशासन, शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों में नारी की सृजनशीलता हमारे समाज को नई दृष्टि प्रदान कर रही है। कहने का तात्पर्य यह है कि नारी शक्ति है क्योंकि वह संघर्ष में मुस्कुराती है, नारी संवेदना है क्योंकि वह टूटे सम्बन्धों को जोड़ती है,नारी सृजन है क्योंकि वह भविष्य को जन्म देती है। वह परिवार तक ही सीमित नहीं है अपितु समाज व राष्ट्र के उत्थान की प्रेरक शक्ति है। उसको जिस क्षेत्र में दायित्व सौंपा गया है वहाँ वह पुरुषों की तुलना में सफल व सक्षम सिद्ध हो रही है। उसने समाज को सोचने के लिए विवश कर दिया है कि वह नारी के प्रति अपना दृष्टिकोण बदले! उसको शिक्षित, स्वावलंबी, सुयोग्य, समुन्नत बनाने पर ध्यान दे।

डाॅ०राकेश सक्सेना, पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001*

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