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वन्देमातरम् को लेकर संग्राम क्यों?

August 23, 2026

वन्देमातरम् को लेकर संग्राम क्यों?

Vandematram
क्या कांग्रेस जिन्ना के मार्ग पर जा रही है?
सुरेश हिंदुस्तानी
वन्देमातरम आज विवाद का विषय बना दिया है। जबकि यह सत्य है कि जब बंकिम बाबू ने इसकी रचना की थी, तब उनके मन में किसी के मन को आहत करने का कोई विचार नहीं था। उनका भाव केवल मातृभूमि के वंदन का था। देश में वन्देमातरम के अंतिम दो भाग का पहली बार विरोध विभाजन की मानसिकता रखने वाले मोहम्मद अली जिन्ना ने किया। आज उसी मार्ग पर कांग्रेस कदम बढ़ाती दिख रही है। यह बात सही है कि देश का सम्मान करने वाली किसी भी बात पर राजनीति नहीं होना चाहिए, लेकिन केवल वोट की चाहत के चलते ऐसा करना और भी खतरनाक हो जाता है।
वन्दे मातरम् भारत की स्वतंत्रता चेतना, मातृभूमि के प्रति समर्पण और राष्ट्रीय स्वाभिमान का ऐसा उद्घोष है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में असंख्य भारतीयों के भीतर देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित की। यही कारण है कि आज जब वन्दे मातरम् के पूर्ण या आंशिक गायन को लेकर राजनीतिक बहस खड़ी होती है, तो प्रश्न केवल गीत की पंक्तियों का नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक दृष्टिकोण का भी बन जाता है।
आज सवाल यह है कि वन्दे मातरम् पर संग्राम क्यों? कांग्रेस की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि 1937 में इसके दो पदों के गायन को लेकर निर्णय हुआ था, इसलिए उसी परंपरा का पालन होना चाहिए। लेकिन 1937 की परिस्थितियों को 2026 के भारत पर उसी रूप में लागू करना कितना उचित है, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। 1937 में भारत स्वतंत्र नहीं था। अंग्रेजी शासन था, साम्प्रदायिक तनाव थे और देश की राजनीतिक परिस्थितियां अत्यंत जटिल थीं। कांग्रेस उस समय आज की तरह सत्ता प्राप्त करने वाला चुनावी राजनीतिक दल नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख राजनीतिक मंच थी। जिसमें सभी देश भक्त शामिल थे। आज की कांग्रेस उससे अलग है। वन्दे मातरम् को लेकर कांग्रेस के भीतर भी यह चर्चा हुई कि इसके कुछ अंशों को लेकर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग की आपत्तियों को कैसे देखा जाए। ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में इस विषय पर विचार किया था और सार्वजनिक अवसरों पर पहले दो पदों के प्रयोग की व्यवस्था बनी।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उस समय की राजनीतिक परिस्थिति आज के स्वतंत्र भारत के लिए भी अंतिम मानक होनी चाहिए?
भारत आज एक संप्रभु गणराज्य है। संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को वन्दे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान सम्मान देने की व्यवस्था की थी। वन्दे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है। इसलिए इसे केवल कांग्रेस, भाजपा या किसी अन्य राजनीतिक दल के चश्मे से देखना उचित नहीं है। यहां यह सवाल भी उठता है कि जब यह राष्ट्र गीत है, तब इसे लेकर अराष्ट्रीय कार्य करने की राजनीति क्यों की जा रही है। यह आत्म मंथन का विषय हो सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना भी आवश्यक है। वन्दे मातरम् संविधान के मूल पाठ में लिखकर नागरिकों के लिए अनिवार्य गायन के रूप में शामिल नहीं था। लेकिन चूँकि वन्देमातरम गाने को लेकर क़ानून बन गया है, तब सभी को इसका पालन करना ही चाहिए, कांग्रेस को भी। आज अगर कांग्रेस इसका विरोध करती है, तो इसे संविधान का अपमान ही कहा जाना उचित होगा। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गीत को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं और इसके पूर्ण छह अंतरे वाले संस्करण को सार्वजनिक प्रसारण में बढ़ावा दिया गया है। जुलाई 2026 में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण कानून में संशोधन का प्रस्ताव भी लाया गया, जिसमें राष्ट्रीय गीत को जानबूझकर रोकने या उसके गायन में व्यवधान डालने के विरुद्ध कानूनी संरक्षण देने की बात है। इसलिए बहस को तथ्यों के आधार पर ही आगे बढ़ाना चाहिए।
वन्दे मातरम् की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी पहचान किसी एक राजनीतिक दल से नहीं जुड़ी। कांग्रेस के अधिवेशनों में इसका गायन हुआ। 1896 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया था। स्वतंत्रता आंदोलन में यह अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना। ऐसे में यह कहना कि वन्दे मातरम् भाजपा की देन है, इतिहास के साथ अन्याय होगा। भाजपा तो स्वतंत्रता के बाद बनी; वन्दे मातरम् उससे बहुत पहले भारतीय राष्ट्रचेतना का हिस्सा बन चुका था। फिर वही प्रश्न उठता है कि आज इसके दो पदों या पूरे गीत को लेकर इतना राजनीतिक संघर्ष क्यों? क्या इसके पीछे वोट बैंक की राजनीति है? इस प्रश्न का उत्तर किसी एक दल के बारे में निश्चित रूप से देना उचित नहीं होगा, क्योंकि राजनीतिक मंशा का प्रमाण तथ्यों से ही स्थापित किया जा सकता है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जब राष्ट्रीय प्रतीकों को बार-बार चुनावी गणित से जोड़ दिया जाता है, तब राष्ट्रहित पीछे और राजनीतिक हित आगे दिखाई देने लगता है। वन्दे मातरम् का सम्मान करना किसी धर्म विशेष का समर्थन करना नहीं है। यह मातृभूमि के प्रति सम्मान और स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति से जुड़ा राष्ट्रीय भाव है।
भारत की शक्ति ही उसकी विविधता है। यहां पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, भाषाएं अलग हो सकती हैं, पर मातृभूमि के प्रति सम्मान का भाव साझा हो सकता है। इसलिए वन्दे मातरम् को हिन्दू बनाम मुस्लिम विवाद में बदल देना उसके ऐतिहासिक और राष्ट्रीय स्वरूप को छोटा करना है।
कांग्रेस के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है। यदि 1937 के निर्णय को आज भी राजनीतिक ढाल बनाया जाएगा, तो यह प्रश्न उठेगा कि क्या स्वतंत्र भारत की परिस्थितियों में भी वही दृष्टिकोण अपरिवर्तित रहना चाहिए? और यदि कांग्रेस स्वयं वन्दे मातरम् के इतिहास की भागीदार रही है, तो उसे इस गीत को लेकर अस्पष्टता के बजाय स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टिकोण सामने रखना चाहिए। इसी प्रकार सत्ता पक्ष को भी यह ध्यान रखना होगा कि राष्ट्रभक्ति किसी पर थोपी जाने वाली भावना नहीं है। राष्ट्रगीत का सम्मान बढ़े, उसके इतिहास को नई पीढ़ी जाने और उसके प्रति स्वाभाविक श्रद्धा विकसित हो, यह अधिक स्थायी रास्ता है। कानून और राजनीतिक आह्वान अपनी जगह हैं, लेकिन राष्ट्रभाव अंततः मन से पैदा होता है।
वन्दे मातरम् को राजनीति के अखाड़े से निकालकर राष्ट्रचेतना के केंद्र में स्थापित करने की आवश्यकता है। इसे कांग्रेस बनाम भाजपा का विषय बनाना भी गलत है और हिन्दू बनाम मुस्लिम का विषय बनाना भी। यह भारत की स्वतंत्रता यात्रा का अमूल्य अध्याय है।
कांग्रेस को अपने राजनीतिक उत्थान से आगे बढ़कर देश के उत्थान के बारे में सोचना चाहिए। वन्दे मातरम् किसी दल की संपत्ति नहीं, भारत की राष्ट्रीय विरासत है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पूछें
जब इसके शब्दों में मातृभूमि के प्रति वंदन है, इसके इतिहास में स्वतंत्रता का संघर्ष है और इसकी स्मृति में असंख्य देशभक्तों का त्याग है, तब इसे विवाद का नहीं, संवाद का विषय बनाया जाना चाहिए। राजनीति अपनी जगह रहे, लेकिन राष्ट्र सबसे ऊपर रहे। वन्दे मातरम् केवल गाया न जाए, उसकी भावना को जीवन में उतारा जाए। यही भारत के प्रति सच्ची वंदना होगी।
Suresh Hindustani Journalist

सुरेश हिन्दुस्तानी वरिष्ठ पत्रकार

सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार

August 20, 2026

वंदेमातरम् के राष्ट्रभाव से विमुख कांग्रेस

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Posted on 20.08.2026 Time 06.49 PM Article Vandematram by Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News

-सर्वेश कुमार सिंह-

कांग्रेस ने एक बार फिर यह साबित किया है कि वह राष्ट्रीय भावों और भारत के मन को नहीं समझ पा रही है, या जानबूझकर नासमझी का परिचय दे रही है। ऐसा कांग्रेस द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के तहत किया जा रहा है। लेकिन, काग्रेस यह भूल रही है कि वह ऐसा करके राष्ट्र की मुख्यधारा से बाहर होती चली जा रही है। अनेक राज्यों में राजनीति के हासिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस अपनी इसी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का परिणाम भुगत रही है।

कांग्रेस ने राष्ट्रभाव की उपेक्षा का एक और परिचय दिया है। गत दिवस नई दिल्ली में आयोजित कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति में वंदेमातरम् को लेकर जो प्रस्ताव पारित हुआ, वह उसकी राजनीतिक अपरिपक्वता और आत्मघाती कदम का परिचायक है। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव में कहा है कि पार्टी द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में तथा अन्य सार्वजनिक स्थलों पर वंदेमातरम् का केवल वही अंश गाया जाएगा, जोकि कांग्रेस कार्यसमिति ने कोलकाता (कलकत्ता) अधिवेशन में 28 अक्टूबर 1937 को स्वीकृत किया था। यानि कि, वंदेमातरम् के छह अंतरों में से केवल दो ही गाये जाएंगे। इस बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने की। इसमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत कांग्रेस के 88 नेता उपस्थित थे।

इसके पहले कांग्रेस अध्यक्ष खडगे और सोनियां गांधी ने 15 अगस्त को पार्टी कार्यालय में ध्वजारोहण और वंदेमातरम् के गायन के दौरान उस समय असहजता प्रकट की थी, जब पूरा वंदेमातरम् बजाया गया। यहां तक कि सोनिया गांधी ने इसे रोकने के लिए भी कहा। राष्ट्रीय भावों के विरोध का कांग्रेस का पुराना इतिहास रहा है। यह पहला अवसर नहीं है जब कांग्रेस ने वंदेमातरम् के साथ अन्याय किया है। कांग्रेस का इतिहास ही वंदेमातरम् के विरोध का रहा है।

कांग्रेस यूं तो एक पार्टी के नाते अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन राष्ट्रीय महत्व के विषयों और कानूनी प्रावधानों के अन्तर्गत उसे वे नियम मानने की भी बाध्यता है जोकि संसद द्वारा बनाये गए हैं और जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत करके अधिसूचित किया गया है। वंदेमातरम् के अनिवार्य गायन, पूरे छह अंतरों को गाने या बजाये जाने के लिए सरकार ने “राष्ट्रीय सम्मान, अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम 2026” पारित कराकर कानूनन वंदेमातरम् के विरोध को अपराध घोषित किया है। इसके अंतर्गत वंदेमातरम् का जानबूझ करअपमान करना दंडनीय अपराध होगा। इसमें पूर्ण वंदेमातरम् का गायन भी शामिल है। यह अध्यादेश 29 जुलाई 2026 को राज्य सभा में और 30 जुलाई 2026 को लोक सभा में पारित हुआ है। इसे राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने 12 अगस्त 2026 को स्वीकृति प्रदान कर दी है। इसके बाद यह कानून बन गया है। इसके पहले केन्द्रीय गृह मंत्रालय 28 जनवरी 2026 को एक विस्तृत आदेश जारी कर वंदेमातरम् का प्रोटोकाल जारी कर चुका है। इसके अनुसार सभी सार्वजनिक स्थानों पर जहां तिरंगा फहराया जाएगा अथवा राष्ट्रपति या राज्यपाल, उपराज्यपाल का कार्यक्रम होगा,उसमें राष्ट्रगीत से पहले पूर्ण वंदेमातरम् गाया जाएगा।

संसद द्वारा यह कानून बन जाने के बाद और गृह मंत्रालय के प्रोटोकाल जारी होने पर भी अगर कांग्रेस ने इसे नहीं मानने का दुस्साहस किया है तो यह आपराधिक और गंभीर मामला है। राष्ट्रीय प्रतीक के अपमान और राष्ट्रभाव की उपेक्षा, कानून की अवमानना की श्रेणी में आता है। ऐसा करके कांग्रेस ने गंभीर संवैधानिक संकट खड़ा किया है। क्योंकि कोई भी पार्टी संसद से ऊपर नहीं हो सकती। उसे संसद द्वारा बनाये गए नियमों और कानूनों को मानने की बाध्यता है। लेकिन, कांग्रेस ने ऐसा किया  है।

वंदेमातरम् पर कांग्रेस ने जो फैसला किया है वह कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता, क्योंकि कांग्रेस ने वंदेमातरम् के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार पहली बार नहीं किया है। यह कांग्रेस ही थी जिसने 1937 में वंदेमातरम् को खंडित करके राष्ट्रभाव को गहरी चोट पहुंचायी थी। कांग्रेस के एक अलगाववादी मुस्लिम नेता जो इस पार्टी के अध्यक्ष भी रहे उनके विरोध और मांग के चलते वंदेमातरम् के छह में से चार अंतरे हटा दिये गए थे। एक तरह से वंदेमातरम् की आत्मा पर ही कुठाराघात कर दिया गया था।

वंदेमातरम् और कांग्रेस के विरोध का लम्बा इतिहास है। इसके विरोध की शुरुआत 28 दिसम्बर 1923 से एक जनवरी 1924 तक काकीनाडा (आन्ध्र प्रदेश) में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में हुई। यहां पहली बार पार्टी के अध्यक्ष और अधिवेशन के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने वंदेमातरम् का विरोध किया था। इस अधिवेशन में पूर्व के अधिवेशनों की भांति ही वंदेमातरम् का गायन होना था। गायन के लिए प्रसिद्ध गायक, संगीतज्ञ पंडित विष्णु दिंगम्बर पुलस्कर को बुलाया गया था। पंडित जी ने जब गायन शुरु किया तो अध्यक्षता कर रहे मौलाना जौहर ने इसे रोकने का आदेश दिया। लेकिन, पुलस्कर जी वंदेमातरम् का गायन करते रहे। इस पर मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने सत्र की अध्यक्षता छोड़ दी और मंच से नीचे उतर कर बाहर चले गए। वे मंच पर तभी लौटे जब वंदेमातरम् पूर्ण हो गया। इस विरोध का कांग्रेस पर गहरा असर हुआ। कांग्रेस ने एक समिति बना  दी। इसी समिति की रिपोर्ट को आधार बनाकर 28 अक्टूबर 1937 को कलकत्ता अधिवेशन में वंदेमातरम् को खंडित करने का फैसला कर दिया गया। कल 19 अगस्त 2026 को कांग्रेस ने उसी प्रस्ताव को फिर से स्वीकार करने का फैसला किया है जोकि कलकत्ता अधिवेशन में पारित हुआ था।

वर्तमान में वंदेमातरम को लेकर देश में एक उत्साहपूर्ण वातावरण है। गत 7 नवम्बर 2025 को वंदेमातरम् की रचना को 150 वर्ष पूर्ण हुए तो देश भर में देशभक्ति का ज्वार उठ गया। वंदेमातरम् एक बार फिर अभियान बन गया। इसे अभियान के रूप में जनमानस में फिर से स्थापित करने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को है। उन्होंने ही 31 अक्टूबर 2025 को केवडिया (गुजरात) में सरदार बल्लभ भाई पटेल की जयंती में वंदेमातरम् को याद किया और बताया कि इसके 150 वर्ष पूर्ण  हो रहे हैं। इसे उत्साह पूर्वक मानाया जाएगा। इसे उन्होंने एक अभियान बना दिया और मिशन मोड में कार्य किया। पहले देश भर में शिक्षण संस्थाओं,पार्टी स्तर पर, संसद, विधानसभाओं में वंदेमाततरम् के 150 वर्ष पर कार्यक्रम आयोजित किये। फिर इसे अखण्ड स्वरूप में स्वीकार करने के लिए सरकार के स्तर पर प्रयास शुरु किये गए। ये प्रयास वर्ष 2026 में सफलता पूर्वक फलीभूत  हो गए।

इसी क्रम को आगे बढाते हुए 15 अगस्त 2026 को इस बार के स्वतंत्रता दिवस समारोह में लाल किले से वंदेमातरम् का पहली बार गायन हुआ। पूर्ण और अखंड वंदेमातरम् का गायन पहली बार राष्ट्रीय स्वीकृति प्रदान करने का प्रतीक बन गया। हालांकि इस बार के स्वतंत्रता दिवस समारोह से कांग्रेस के अध्यक्ष और प्रमुख नेताओं सोनिया गांधी, राहुल गांधी ने दूरी बनाये रखी। शायद वे इसीलिए कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हुए क्योंकि यहां वंदेमातरम् के सभी छह अंतरों का गायन होना था और कांग्रेस को यह स्वीकार नहीं है।

वंदेमातरम् का विरोध कांग्रेस को बहुत भारी पड़ेगा। यह राष्ट्रीय मन की अस्मिता का प्रतीक है। इसे यह राष्ट्रीय पार्टी नहीं समझ पा रही है। ये पार्टी और विपक्ष आज तक यह नहीं समझ सका कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पराजय और भाजपा के सत्तारूढ़ होने में वंदेमातरम् एक अहम फैक्टर रहा है। लेकिन, कांग्रेस के नेताओं और रणनीतिकारों ने शायद यह तय किया है कि वे इस प्राचीन पार्टी को नेस्तनाबूद करके ही रहेंगे। शायद ईश्वर कांग्रेस के नेताओं को सद्बुद्धि दे, कि वे राष्ट्रीय आंदोलन से उपजी पार्टी को स्थापना काल के भाव से पुनः जोड़ सकें।

लेखक परिचयः स्वतंत्र पत्रकार, लखनऊ,  20 अगस्त 2026

राष्ट्रभक्ति जगाने का मंत्र है वन्देमातरम्

Vandana Sen Writer

डॉ. वन्दना सेन

‘वन्देमातरम्’ केवल दो शब्दों का उद्घोष नहीं है। यह भारत की आत्मा से निकला वह स्वर है, जिसमें मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, समर्पण, गौरव और राष्ट्रभक्ति का भाव एक साथ अभिव्यक्त होता है। जिस भूमि ने हमें जन्म दिया, जिसने हमें अन्न, जल, वायु और जीवन प्रदान किया, उसके प्रति सम्मान प्रकट करना प्रत्येक नागरिक का स्वाभाविक और नैतिक कर्तव्य है। इसलिए ‘वन्देमातरम्’ को किसी राजनीतिक दल, विचारधारा के चश्मे से देखना उसके व्यापक राष्ट्रीय अर्थ को सीमित करना होगा।

भारत की स्वतंत्रता-चेतना के इतिहास में ‘वन्देमातरम्’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। स्वाधीनता आंदोलन के दौर में इसके उद्घोष ने असंख्य भारतीयों के भीतर राष्ट्रभक्ति की ऐसी लौ प्रज्वलित की, जिसने विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष को नई ऊर्जा प्रदान की। यह केवल गीत नहीं रहा; यह राष्ट्रीय जागरण का मंत्र बन गया था। इसके उच्चारण मात्र से लोगों के भीतर मातृभूमि के प्रति प्रेम और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का संकल्प जाग उठता था। यही कारण है कि ‘वन्देमातरम्’ भारतीय राष्ट्रीय चेतना के इतिहास में एक अमिट अध्याय के रूप में दर्ज है।

आज भी जब ‘वन्देमातरम्’ का स्वर वातावरण में गूँजता है तो उसके साथ देशभाव का उफान दिखाई देता है। विद्यालयों से लेकर सार्वजनिक समारोहों तक और स्वतंत्रता दिवस से लेकर राष्ट्रीय पर्वों तक, इसका उद्घोष लोगों को अपनी जड़ों और अपनी मातृभूमि से जोड़ता है। यह भाव किसी एक समुदाय, वर्ग या राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हो सकता। भारत की विविधता में एकता की जो विराट भावना है, ‘वन्देमातरम्’ उसी भावना का सशक्त प्रतीक है।

विडंबना यह है कि जिस ‘वन्देमातरम्’ को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने भी स्वीकार किया और जिसके स्वर ने स्वतंत्रता संघर्ष को ऊर्जा दी, आज उसी के प्रति कांग्रेस के कुछ नेताओं की असहजता दिखाई देती है। प्रश्न स्वाभाविक है कि जो राष्ट्रगीत और राष्ट्रभाव कभी स्वतंत्रता संघर्ष के संकल्प का हिस्सा था, उसे आज राजनीतिक विवाद का विषय क्यों बनाया जा रहा है? यदि किसी राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति सम्मान व्यक्त करने में संकोच होने लगे, तो यह केवल राजनीतिक मतभेद का विषय नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रभाव की व्यापक अवधारणा पर प्रश्न खड़ा करता है।

स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर नई दिल्ली स्थित कांग्रेस कार्यालय में ‘वन्देमातरम्’ के प्रसंग को लेकर दिखाई देने वाली असहजता ने भी अनेक प्रश्नों को जन्म दिया। राष्ट्रीय पर्वों का उद्देश्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को तीखा करना नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना को मजबूत करना होना चाहिए। ऐसे अवसर पर दलगत सीमाएँ पीछे छूटनी चाहिए और भारत की एकता, अखंडता तथा गौरव सर्वोपरि होना चाहिए।

यहाँ एक और महत्वपूर्ण प्रश्न संविधान के संदर्भ में उठता है। यदि ‘वन्देमातरम्’ के सम्मान या उसके उद्घोष को लेकर कोई विधिक व्यवस्था अस्तित्व में आती है, तो उसका पालन करना प्रत्येक नागरिक और संस्था का संवैधानिक दायित्व होगा। संविधान केवल राजनीतिक सुविधा के अनुसार उद्धृत करने की वस्तु नहीं है। संविधान अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों की भी स्मृति कराता है। इसलिए जो राजनीतिक शक्तियाँ संविधान की रक्षा का दावा करती हैं, उन्हें संविधान की भावना और उसके अनुशासन का समान रूप से सम्मान करना चाहिए।

वस्तुतः राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक किसी दल की राजनीतिक पूँजी नहीं हैं। वे करोड़ों भारतीयों की सामूहिक भावनाओं के प्रतीक हैं। ‘वन्देमातरम्’ के संदर्भ में भी यही दृष्टि अपनाई जानी चाहिए। इसके साथ किसी प्रकार का राजनीतिक लाभ-हानि का गणित जोड़ना उचित नहीं है। राष्ट्रभक्ति को वोट की राजनीति से जोड़ना स्वयं राष्ट्रभाव को संकीर्ण करना है।

भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। यहाँ अनेक भाषाएँ हैं, अनेक पंथ और परम्पराएँ हैं, अनेक जीवन-पद्धतियाँ हैं, फिर भी भारत की पहचान एक है। इस एकता को मजबूत करने वाले प्रतीकों और भावनाओं का सम्मान करना आवश्यक है। ‘वन्देमातरम्’ इसी एकता का भावात्मक सूत्र है। यह हमें स्मरण कराता है कि हमारी पहली पहचान हमारी मातृभूमि से है और उसके सम्मान में व्यक्त किया गया स्वर किसी विभाजन का नहीं, बल्कि जुड़ाव का स्वर है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि ‘वन्देमातरम्’ को विवाद का विषय बनाने के बजाय उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व को समझा जाए। यदि इसके उद्घोष से देशभक्ति का ज्वार पहले उठता था, तो आज भी उठ सकता है। यदि इसके स्वर ने स्वतंत्रता सेनानियों में त्याग और बलिदान की भावना जगाई थी, तो आज यह नई पीढ़ी में राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी और कर्तव्यबोध जागृत कर सकता है।

राष्ट्रभक्ति का अर्थ केवल नारे लगाना नहीं, बल्कि देश के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना है। किंतु जब कोई नागरिक अपनी मातृभूमि के सम्मान में ‘वन्देमातरम्’ कहता है, तो उसके उस भाव को संदेह की दृष्टि से देखना भी उचित नहीं। राष्ट्र के प्रति श्रद्धा को राजनीति की संकीर्ण सीमाओं में बाँधना भारत की विशाल सांस्कृतिक चेतना के साथ न्याय नहीं होगा।

‘वन्देमातरम्’ इसलिए किसी राजनीतिक दल का विषय नहीं है। यह भारत की पहचान, मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और राष्ट्रीय एकता का भावपूर्ण उद्घोष है। इसके स्वर में इतिहास की स्मृति भी है, स्वतंत्रता का संघर्ष भी, बलिदान की गाथा भी और भविष्य के भारत का संकल्प भी। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम इसे राजनीति के विवाद से ऊपर उठाकर राष्ट्रभाव की दृष्टि से देखें। जब करोड़ों कंठ एक स्वर में कहते हैं—‘वन्देमातरम्’—तो उसमें केवल शब्द नहीं होते, बल्कि एक राष्ट्र की आत्मा बोलती है।

लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं

August 19, 2026

पश्चिम बंगाल सरकार के 100 दिन- शुभेंदु के साहसिक निर्णयों से बदलता बंगाल

Mratunjay Dixit, Journalist lucknow
मृत्युंजय दीक्षित
पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अपने पहले सौ दिन सफलतापूर्वक पूर्ण कर लिए हैं। ये आरंभिक सौ दिन भरोसा दिलाते हैं कि साहसिक निर्णय लेते हुए ये सरकार अपने चुनावी संकल्प पत्र को अक्षरशः सिद्ध करेगी। बंगाल सरकार ने प्रदेश के नागरिकों के समक्ष लिए गए अपने उद्योग, स्वास्थ्य, शिक्षा, सेवा और सुशासन के संकल्पों को क्रियान्वित करना आरंभ कर दिया है। सीमा सुरक्षा के लिए बाड़ लगाने के काम के साथ-साथ प्रदेश के आम जन को सुरक्षा का वातावरण देने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। प्रदेश में भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता एवं भारतीय साक्ष्य अधिनिमय लागू कर दिया गया है। सेवा कार्यों के अंतर्गत पेंशन योजना में वृद्धि तथा मां आहार कैंटीन में मछली -चावल की व्यवस्था कर दी गई है। बंद पड़े उद्योग खुल रहे हैं।
जब शुभेंदु अधिकारी ने उत्तर प्रदेश के भगवा वस्त्र धारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चरण स्पर्श कर अपना कामकाज संभाला था तभी यह स्पष्ट हो गया था कि बंगाल भी योगी जी के पदचिन्ह्नों पर चलने वाला है। बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी अत्यंत तीव्रता के साथ त्वरित निर्णय लेकर हिंदू समाज का भरोसा जीत रहे हैं। बंगाल में सत्ता संभालते ही शुभेंदु ने कई निर्णय लिए जिनमें योगी जी के निर्णयों की झलक दिखाई पड़ रही है। धार्मिक स्थानो पर लाउडस्पीकर बंद करवाना तथा उनकी आवाज धीमी करवाना, अवैध बूचड़खानों पर बुलडोजर एक्शन, सभी विद्यालयों में सम्पूर्ण वंदेमातरम का गायन अनिवार्य करना इसके कुछ प्रमाण हैं। बंगाल की सड़कों पर नमाज व अन्य धार्मिक गतिविधियों पर पाबंदी भी लगा दी गई है जिसको लेकर मुस्लिम समाज के लोग सडकों पर उतर आए तथा कोलकाता में पुलिस चौकी पर हमला बोल दिया तथा शहर को दंगों की आग मे झोंकने का प्रयास किया। दंगाइयों से निपटने में भी शुभेंदु सरकार ने योगी जी जैसा संकल्प दिखाया।कोलकाता के जिस थाने पर दंगांइयो ने हमला करने का प्रयास किया था वहां मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी स्वयं पहुंचे और पुलिस बल का मनोबल हुए बढ़ाते हुए दंगाइयों व उपद्रवियों के प्रति जीरो टालरेंस नीति अपनाने को कहा।
सौ दिनों के अन्दर हुए निर्णयों में वर्ष 2021 के चुनावों के बाद बंगाल में हुई राजनैतिक हत्याओं व हिंसक घटनाओं की सभी फाइलें खोलने का आदेश जारी होना भी है। इस निर्णय से घबरा कर ममता बनर्जी हाईकोर्ट पहुंच गयीं और 2021 की हिंसा से ध्यान भटकाने के लिए 2026 के चुनाव के बाद घटी कुछ छिटपुट घटनाओं को सनसनीखेज बताने का असफल प्रयास किया। बंगाल में केंद्रीय जांच एजेंसियों का प्रवेश संभव गया है जिससे प्रदेश में पिछले 69 वर्षों मे हुए भ्रष्टाचार की जांच में गति आ रही है। ईडी ने ममता बनर्जी के कई बड़े नेताओं को हिरासत में भी ले लिया है।
बंगाल के मुख्यमंत्री शभेंदु अधिकारी ने पदभार ग्रहण करते ही सीमा क्षेत्र में 145 एकड़ भूमि बीएसफ को देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। सरकार का यह निर्णय बांग्लादेशी घुसपैठ की रोकथाम के लिए अहम है क्योंकि बंगाल की बांग्लादेश से लगी हुई जो लंबी सीमा खुली हुई थी उससे बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठिए आसानी से प्रवेश कर लेते थे और देश के अन्य हिस्सों में घुस जाते थे। अब इस सीमा पर फेंसिंग हो रही है।
बंगाल में मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देने वाली व धर्म के आधार पर चलने वाली सभी योजनाएं बंद कर दी गई हैं। नई सरकार वोटबैंक के पुराने ढर्रे को ध्वस्त करने के एजेंडे पर आगे बढ़ चुकी है। बंगाल कैबिनेट ने धर्म के आधार पर चलाई जा रही सभी वित्तीय सहायता योजनाओं को पूरी तरह से बंद कर दिया है। यह मात्र एक प्रशासनिक फैसला नहीं अपितु बंगाल की राजनीतिक दिशा को बदलने वाला एक वैचारिक परिवर्तन है।चुनावी बिसात पर इमामों, मुअज्जिनों और पुरोाहितों के लिए शुरू की गई मासिक भत्ता योजनाएं पूरी तरह से बंद कर दी गई हैं। उधर कोलकाता के युवाभारती क्रीडांगन परिसर में लगी व फुटबालर की आधी प्रतिमा को तोड़ने की घोषणा की है साथ ही इसे बंगाल सरकार की विभिन्न वेबसाइट से भी हटाया जा रहा है।
दिसंबर 22 में अर्जेटीना के फुटबॉलर मेसी के कार्यक्रम में मची भगदड़ और कुप्रबंधन की जांच की जाएगी, उस घटना की फाइलें खोलने के आदेश जारी हो चुके हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी व अन्य सभी सहयोगी मंत्री यह बात लगातार कह रहे हैं कि जिन लोगों ने बंगाल को लूटा और जनता के मन मे भय पैदा किया उन सभी पर कार्यवाही जरूर की जाएगी जिसका असर स्पष्ट रूप से दिख भी रहा है। बंगाल में पड़ोसी राज्यों से ट्रकों की आवाजाही के दौरान जो कटमनी टीएमसी के लोग वसूलते थे वह बंद हो चुकी है। बंगाल का आलू अब पूरे भारत मे भेजा जा सकेगा।
पूर्व मुख्यमंत्री के निजी अहंकार के कारण बंगाल की जनता आयुष्मान भारत जैसी महत्वपूर्ण योजना के लाभ से वंचित थी 15 अगस्त 2026 से आयुष्मान भारत योजना बंगाल में लागू हो चुकी है। भाजपा ने बंगाल की महिलाओं से किए गए वादों को पूरा करने की दिशा में भी काम करना आरंभ कर दिया है। एक जून 2026 से महिलाओं को 3000 रुपये की मासिक सहायता वाली अन्नपूर्णा योजना को मंजूरी दे दी गई है, बस में फ्री यात्रा की सुविधा भी प्रारंभ हो चुकी है।
बंगाल की धरती पर वंदेमातरम की गूंज व जयश्रीराम का नारा सुनाई दे रहा है। बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिरकारी की कार्य शैली में भाजपा के दो सर्वाधिक लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों योगी आदित्यनाथ व मुख्यमंत्री हिमंता की छाप दिख रही है। बंगाल परिवर्तन की डगर पर चल पड़ा है।
प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं. – 9198571540

August 7, 2026

सार्थक पहल

Editorial 07.08.2026 Time 09.37 AM, by Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News , UP News, UP Samachar Sewa

सर्वेश कुमार सिंह

गुरुवार को युवाओं से संवाद और युवा नीति विषयक सार्थक पहल हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने मुंबई में 2000 जेन जी और जेन अल्फा से संवाद किया। संवाद का आयोजन आईआईएम यूएस कैंपस की ओर से किया गया। इसमें 11 से 19 वर्ष के छात्रों को देश भर से आमंत्रित किया गया। इस पहल को करने का श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ही है, क्योंकि उनकी पहल पर ही यह कार्यक्रम आयोजित हुआ।

संघ के सरसंघचालक डॉ भागवत ने खुलकर अपने विचार रखे और प्रश्नों के उत्तर दिए। उन्होंने कहा आज की युवा पीढ़ी हमारी पीढ़ी से अधिक ईमानदार और देशभक्त है। आंदोलन और प्रदर्शन संविधानिक अधिकार है। उन्होंने आरक्षण पर भी अपना मत प्रकट किया। डा मोहन भागवत ने कहा आरक्षण असमानता दूर करने के लिए लागू किया गया था। अत: जब तक समाज में आर्थिक, सामाजिक असमानता है तब तक आरक्षण जारी रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग आरक्षण से सक्षम हो गए हैं उन्हें स्वेच्छा से आरक्षण का लाभ लेना छोड़ना चाहिए।

दूसरी पहल उत्तर प्रदेश से हुई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने युवा नीति बनाने और राज्य युवा आयोग के गठन की घोषणा की। उन्होंने अधिकारियों की बैठक बुलाकर निर्देश दिए कि युवा नीति बनाने के लिए विद्यार्थियों, युवा पेशेवरों, खिलाड़ियों, उद्यमियों से वार्ता की जाय। उन्होंने युवा आयोग बनाकर नीति निर्धारण की रूपरेखा प्रस्तुत करने की जानकारी दी। अब उम्मीद है कि शीघ्र ही उत्तर प्रदेश में युवा आयोग का गठन होगा। इसके बाद युवाओं के हितों के लिए युवा नीति बनाई जाएगी।

युवाओं से जुड़ी ये दोनों पहल सामयिक हैं। आज युवा उद्वेलित है। इसके कई कारण है। पहला कारण है सूचना का तीव्र प्रवाह। दूसरा है ऊंची उड़ान के सपने देखना। तीसरा तत्काल परिणाम की अभिलाषा। हालांकि ये सभी सार्थक और अपेक्षित हैं, किंतु इन्हें संतुलित होना चाहिए। हाल का नीट परीक्षा से जुड़ा आंदोलन और रांची का छात्र आंदोलन इन्हीं कारकों के परिणाम है। इन पर गंभीरता और ईमानदारी से चिंतन, मनन और निर्णय की आवश्यकता है। ये काम केंद्र सरकार को यथाशीघ्र आरम्भ करना चाहिए। लेकिन केंद्र सरकार किन्तु, परंतु में उलझी है। वह आंदोलनकारियों के सहयोगियों और मददगारों की खोज में लगी है। जबकि तत्काल कारण के मूल में जाने की जरूरत है। यह कार्य आरएसएस और यूपी सरकार ने शुरू कर दिया है। इसके लिए डा मोहन भागवत और योगी आदित्यनाथ की दूरदृष्टि पूर्ण पहल सराहनीय है। युवाओं को सही दिशा देना, उनके भविष्य के बारे में सोचना राज्य की जिम्मेदारी है।

आज जो सूचना युवा ग्रहण कर रहे हैं उसका स्रोत डिजिटल है। ये स्रोत अनियंत्रित और अप्रमाणित सूचनाओं के प्रवाह का समुद्र है। इसपर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। सरकार, समाज, संगठनों को ऐसे प्रयास करने होंगे कि युवाओं को प्रमाणित और सत्य सूचना मिले। ताकि वे उसी पर धारणा बनाएं। इसके लिए युवाओं में समाचार पत्र, पत्रिकाएं, पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति जगाने के लिए कार्य योजना बनानी होगी।

ऊंची उड़ान के सपने देखना हमेशा अच्छा होता है। इसलिए इसे सही दिशा देने की सार्थक रणनीति बनानी होगी। सपना कैसे पूरा हो इसके लिए उन्हें दक्ष बनाना होगा। तीसरा तत्काल परिणाम की लालसा को नियंत्रित करने के लिए युवाओं को बताना पड़ेगा कि कोई भी लक्ष्य मार्ग पर चलकर ही प्राप्त किया जा सकता है। तेज दौड़ या छलांग लगाकर नहीं।

देश और समाज ने इन विषयों पर समय रहते चिंतन कर लिया जाए और युवाओं को सदी दिशा दे दी तो ये ऊर्जा राष्ट्र निर्माण करेगी। भारत का चतुर्दिक विकास होगा। यदि विलम्ब या चूक हुई तो स्थिति प्रतिकूल भी हो सकती है।

सुकून की बात यह है कि विश्व के सबसे बड़े संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ये पहल कर दी है।

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