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नक्सलमुक्ति के बाद विकास का नया सूर्योदय

May 25, 2026

नक्सलमुक्ति के बाद विकास का नया सूर्योदय

ARTICLE  25.05.2026, Wednesday , by Sarvesh Kumar Singh

-सर्वेश कुमार सिंह-

भारत को नक्सलवाद के ग्रहण से मुक्ति मिली है। इसके साथ ही उन क्षेत्रों में जहां कभी बंदूकों की दहशत व्याप्त रहती थी। अब विकास का नया सूर्योदय हो रहा है। यह नया सवेरा भी उसी “मिशन मोड” में साकार हो रहा है, जिस “मिशन मोड” में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह की योजना, रणनीति और दृढ इच्छाशक्ति ने भारत को नक्सलमुक्त कर दिया है। यहां अब दिल्ली से लेकर रायपुर तक की सरकारें अपनी सभी 371 योजनाओं को लेकर नक्सलमुक्त क्षेत्र में उतरी हैं। छत्तीसगढ़ का “बस्तर” वह क्षेत्र है जहां नक्सलवाद दैनिक जीवन का पर्याय और आतंक के साये में जीना दिनचर्या बन गया था। इस परिस्थिति को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान करके बदल दिया,यानि की तारीख तय करके नक्सलवाद से भारत को मुक्ति दिला दी। अब यहां विकास की गंगा बह रही है।

असंभव दिखने वाला सपना साकार हुआ

नक्सलवाद मुक्त भारत एक सपना था। भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती। ये देश के सामने एक ऐसी समस्या थी, जिसके बारे में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि “नक्सलवाद देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है”। उसी नक्सलवाद को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तारीख तय करके समाप्त कर दिया है। उन्होंने अगस्त 2024 में घोषणा की थी कि 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त कर देंगे। यह कार्य तय समयसीमा से पहले ही पूरा हो गया। ऐसा देश के इतिहास में पहली बार हुआ है कि तारीख निश्चित करके किसी ऐसी समस्या का समाधान हुआ हो, जहां सशस्त्र संघर्ष चलता हो, लेकिन ऐसा भारत में हुआ है। इसका श्रेय जहां सुरक्षा बलों के अदम्य साहस, वीरता और बलिदान को जाता है, वहीं कुशल रणनीति, योजना और दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाने के लिए अमित शाह को जाता है।

छत्तीसगढ में 13 दिसम्बर 2023 को भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी। मुख्यमंत्री बने विष्णु देव साय, भाजपा सरकार आने के बाद नक्सलवाद की समाप्ति को प्राथमिकता का कार्य और जिम्मेदारी मान कर अभियान शुरु हुआ। कमान संभाली केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने, उन्होंने 24 अगस्त 2024 को देश के सभी पुलिस महानिदेशकों/पुलिस महानिरीक्षकों की उच्च स्तरीय बैठक बुलाई। इस बैठक में तय हुआ कि नक्सलवाद को समय सीमा निर्धारित करके समाप्त करना है। यह समय सीमा खुद अमित शाह ने घोषित की और यह थी 31 मार्च 2026, तारीख तय होने के बाद रणनीति बनी, संसाधन बढ़ाये गए, सामाजिक, आर्थिक स्तर पर सुधार किये गए। परिणाम देश के सामने है कि ठीक 31 मार्च 2026 को गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में घोषणा कर दी कि भारत अब नक्सलवाद-माओवाद के आतंक से मुक्त है। यह विचारधारा सात दशक बाद पराजित हो गई।

अमित शाह ने देश से लाल आतंक को पोषित करने वाली माओवादी विचारधारा से वनवासियों को मुक्ति दिलाने के लिए मिशन मोड में काम किया। केंद्र और राज्य सरकारों का बेहतर समन्वय किया। योजनाओं को संबंधित पात्र लाभार्थियों तक पहुंचाया। सुरक्षा बलों को खुली छूट और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सूचना तंत्र को मजबूत किया। प्रतिफल दो साल से कम समय में लक्ष्य पूरा कर दिया, मिशन पूरा किया।

बस्तर में सेवा डेरा, नये सूर्योदय के केन्द्र

नक्सलवाद से प्रभावित जो क्षेत्र रहे हैं, उनमें छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग प्रमुख है। यहां अनेक खुंखार माओवादी-नकस्लवादी समूह और उनके नेता रहे हैं। अब ये आत्मसमर्मपण कर चुके हैं या सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड में मारे जा चुके हैं। इस क्षेत्र से नक्सलवाद समाप्त होने के बाद जो आवश्यक कार्य है, उसपर अब भारत सरकार ने काम शुरु कर दिया है। इस काम को करने की जिम्मेदारी भी गृहमंत्री अमित शाह ने अपने हाथों में ली है। वह कार्य है हथियार डाल चुके पूर्व नक्सलियों का पुनर्वास, उनका रोजगार और विकास की गंगा को शेष देश के समानान्तर इस क्षेत्र में भी प्रवाहित करना। यह कार्य शुरु हो गया है। यह सरकार के उस दायित्व का हिस्सा है, जो किसी भी समस्या के उन्मूलन के बाद किया जाना अवश्यम्भावी होता है।

नक्सल आतंक से जो क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित थे। उनमें छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग सबसे प्रमुख रहा है। इस संभाग में 7 जिले हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने अब इस क्षेत्र के समुचित विकास का बीड़ा उठाया है। इन क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं की पहुंच नहीं थी। न तो राशन कार्ड थे, न मुफ्त मिलने वाला राशन मिल पता था और न ही 5 लाख की चिकित्सा सुविधा ही मिल रही थी। कारण था नक्सलवादी रोड़ा बने थे। वे स्कूल, अस्पताल,सड़क नहीं बनने दे रहे थे। अब बस्तर नक्सलमुक्त है तो ये सभी योजनाएं और सुविधाएं प्रदान करने की तैयारी की गई है। इसके लिए गृहमंत्री खुद बस्तर पहुंचे है। उन्होंने 18 और 19 मई को योजनाओं की शुरुआत कराई है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के साथ योजनाओं का उद्घाटन किया। जगदलपुर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि केंद्र ने बस्तर में 200 सुरक्षा कैंप खोले थे। अब इनमें से एक तिहाई यानी कि 70 को प्रथम चरण में सेवा डेरा में परिवर्तित किया जा रहा। ये डेरा वीर शहीद गुंडाधुर के नाम से होंगे। इनमें केंद्र और राज्य की सभी 371 योजनाओं का लाभ मिलेगा। ये कमान सर्विस सेंटर के रूप में काम करेंगे। ये सेंटर गांव के हर दरवाजे तक योजना का लाभ पहुंचाएंगे।

पांच साल में छह गुना बढ़ेगी बस्तर की आय

पत्रकार वार्ता में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 5 साल में बस्तर की आय 6 गुना बढ़ेगी। उन्होंने घोषणा की है कि हर आदिवासी महिला को एक गाय और एक भैंस दी जाएगी। डेयरी सेक्टर का नेटवर्क स्थापित करके आय बढ़ाएंगे। बैंक, एटीएम, पोस्ट ऑफिस खोले जा रहे है। सड़कें बनाई जा रही है। सेवा डेरा में स्थापित सीएससी “कामन सर्विस सेन्टर” के साथ-साथ यहां पैक्स (प्राथमिक कृषि ऋण सहकारी समिति) भी बनेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर इस आदिवासी-जनजाति क्षेत्र में सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए “बस्तर पंडुम” की शुरुआत की जा रही है। इससे बस्तर की मूल संस्कृति, लोक कला, गीत, संगीत, लोक नृत्य, खानपान को संरक्षित और समृद्ध किया जाएगा।

बस्तर को आतंक के अंतहीन समझे जाने वाले साए से निकालकर विकास की राह दिखाना निसंदेह उल्लेखनीय और सराहनीय कार्य है।

 

लेखक परिचयः स्वतंत्र पत्रकार, राज्य मुख्यालय, लखनऊ

निवास- 3/11 आफीसर्स कालोनी कैसरबाग, लखनऊ-226001

मोबाइलः 9140624166, ई-मेल-sarveshksingh61@gmail.com

 

 

गंगा दशहरा और भारतीय लोकजीवन की परम्पराएँ – डाॅ० राकेश सक्सेना

Rakesh Saxena

एटा 25 मई उप्रससे। गंगा दशहरा का पर्व ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह भारतीय लोकजीवन, धार्मिक चेतना और सामाजिक समरसता का अद्भुत पर्व है। मान्यता है कि इसी दिन राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुईं थीं। स्कंदपुराण के अनुसार– ‘ ज्येष्ठे मासि शुक्ल पक्षे दशम्यां हस्तसंयुते। हरते दश पापानि तस्माद् दशहरा स्मृतम्।। ‘ अर्थात् ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान दस प्रकार के पापों ( हिंसा, चोरी, व्यभिचार, कटु वचन, झूठ, चुगली, बकवास, परद्रव्य चिंतन, दूसरों का बुरा सोचना, नास्तिकता ) का नाश करता है इसलिए इसे दशहरा कहा गया। भारतीय लोकजीवन में पर्व धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं होते, वे सामुदायिक जीवन, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता के वाहक होते हैं। गंगा दशहरा भी इसी परम्परा का जीवंत उदाहरण है।
लोकआस्था के इस पर्व पर लाखों श्रद्धालु मंत्रोच्चार के साथ गंगा स्नान करते हैं, गंगा में दीप प्रवाहित किए जाते हैं। यह दीपदान श्रद्धा, आशा और आत्मिक प्रकाश का प्रतीक है। गंगा आरती के समय घंटों, शंखों और मंत्रों की ध्वनि वातावरण को आध्यात्मिक बना देती है। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएँ लोकगीतों व भजनों को गाती हैं तथा परिवार के सुख -समृद्धि की कामना करतीं हैं।इस पर्व पर जलदान, अन्नदान,वस्त्रदान की परम्परा का निर्वाह किया जाता है। ज्येष्ठ मास की प्रचण्ड गर्मी में पथिकों को शीतल जल, शर्बत पिलाया जाता है, जो भारतीय समाज की करुणा और सहअस्तित्व की भावना को दर्शाती है। हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी, कानपुर, पटना, गढ़मुक्तेश्वर आदि अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं जो भारतीय लोकसंस्कृति के जीवंत केन्द्र होते हैं। यहाँ पर लोककला, लोकसंगीत, हस्तशिल्प और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। गंगातट पर बड़े-बड़े भव्य पण्डालों में गंगा अवतरण की कथा, भजन, कीर्तन की परम्परा लोकजीवन को धार्मिक चेतना से जोड़ती है।
गंगा भारतीय सभ्यता का प्रमुख केन्द्र रही है। इसने अपने तटों पर केवल नगर ही नहीं बसाए अपितु कृषि, व्यापार और परिवहन को भी विकसित किया। इसी कारण गंगा को भारतीय संस्कृति की जीवन रेखा कहा जाता है। उत्तर भारत की सांस्कृतिक चेतना में गंगा का विशेष योगदान रहा है। कवि और साहित्यकारों ने भी इसको भारतीय संस्कृति की आत्मा कहा है। यह पर्व अमीर-गरीब, जाति-वर्ग और क्षेत्रीय भेद को मिटाकर वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को सशक्त करता है। भारतीय लोकजीवन में गंगा को माँ कहा जाता है। यह मातृभाव भारतीय संस्कृति की संवेदनशीलता का द्योतक है।
आधुनिक भौतिकवादी, उपभोक्तावादी युग में गंगा दशहरा मनुष्य को प्रकृति, आस्था और समाज से जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। आज गंगा प्रदूषण एक गम्भीर समस्या बन चुकी है अत: अपनी आस्था के साथ इस पर्व को गंगा संरक्षण संकल्प दिवस बनाने की आवश्यकता है। यदि गंगा स्वच्छ व अविरल रहेगी तभी भारतीय संस्कृति की यह धारा जीवित रहेगी। सरकार द्वारा नमामि गंगे जैसी योजनाएँ संचालित हैं किन्तु जनसहभागिता के अभाव में सफलता पाना सम्भव नहीं है। गंगा में कचरा न डालना, प्लास्टिक का उपयोग न करना, जल संरक्षण करना, स्वच्छता बनाए रखना आदि बातों का प्रत्येक नागरिक को संकल्प लेना चाहिए। पापों को धोने वाले इस पवित्र नीर में जहर न घोलें! इसके आँचल को स्वच्छ और साफ रहने दें।

May 17, 2026

भोजशाला : जब इतिहास की राख से फिर उठी सभ्यता बोल उठी

प्रणय विक्रम सिंह

सभ्यताएं केवल पत्थरों, प्राचीरों और पुरातात्विक अवशेषों से नहीं बनतीं। वे स्मृतियों, श्रद्धा, ज्ञान और आत्मा के उन अदृश्य सूत्रों से निर्मित होती हैं, जिन्हें तलवारें काट नहीं सकतीं, फरमान मिटा नहीं सकते और आक्रमण पराजित नहीं कर सकते।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भोजशाला-कमाल मौला कॉम्प्लेक्स की धार्मिक प्रकृति को भगवती वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर माना है। यह राजा भोज (परमार वंश) द्वारा स्थापित संस्कृत शिक्षा केंद्र था।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला परिसर की धार्मिक प्रकृति को भगवती वाग्देवी (माँ सरस्वती) का मंदिर मानना केवल एक न्यायिक निर्णय नहीं, बल्कि उस सभ्यतागत सत्य की पुनर्पुष्टि है, जिसे सदियों तक धूल, ध्वंस और दमन के नीचे दबाने का प्रयास किया गया, किन्तु जिसे मिटाया नहीं जा सका।

यह वही भोजशाला है, जिसे परमार वंश के महान प्रतापी राजा भोज ने ज्ञान, संस्कृत और माँ वाग्देवी की आराधना के केंद्र के रूप में स्थापित किया था। यहां केवल पूजा नहीं होती थी, यहां भारत की वैदिक चेतना श्वास लेती थी। यहां शब्द साधना थी, शास्त्रार्थ था, संस्कृत की स्वर लहरियां थीं, और ज्ञान को ईश्वर मानने वाली भारतीय सभ्यता का आलोक था। यह केवल मंदिर नहीं था, यह भारतीय बौद्धिकता, भारतीय ज्ञान और भारतीय अध्यात्म का समन्वित विश्वविद्यालय था। किंतु भारत के इतिहास का एक लंबा कालखंड ऐसा भी रहा, जब बाहरी आक्रमणकारियों ने इस भूमि की आत्मा को तोड़ने का प्रयास किया। मंदिरों को केवल पत्थरों का ढांचा नहीं समझा गया, उन्हें भारतीय समाज की सांस्कृतिक रीढ़ मानकर लक्ष्य बनाया गया। क्योंकि आक्रमणकारी जानते थे कि यदि किसी सभ्यता की स्मृतियों, प्रतीकों और आस्था केंद्रों को ध्वस्त कर दिया जाए, तो उसके आत्मविश्वास को घायल किया जा सकता है।

सोमनाथ से काशी तक, मथुरा से मार्तंड तक और भोजशाला से नालंदा तक इतिहास के पन्नों पर ऐसे असंख्य रक्तरंजित अध्याय अंकित हैं, जहां केवल इमारतें नहीं टूटीं, बल्कि भारतीय अस्मिता को अपमानित करने का सुनियोजित प्रयास हुआ। आक्रमण केवल भूभाग पर नहीं, भारत की स्मृति पर था।

पुस्तकालय जलाए गए, विद्यापीठ ध्वस्त किए गए, मूर्तियों को खंडित किया गया, और सभ्यता की स्मृतियों पर पराये प्रतीकों का आवरण चढ़ाने का प्रयास किया गया। भोजशाला भी उसी पीड़ा की साक्षी बनी। जहां कभी सरस्वती वंदना गूंजती थी, वहां इतिहास को बदलने के प्रयास हुए। जहां ज्ञान का दीप प्रज्वलित था, वहां पहचान का अंधकार थोपा गया। किन्तु सनातन की विशेषता यही है कि वह पराजित नहीं होता। वह प्रतीक्षा करता है। वह सहता है। वह समय के गर्भ में सत्य को सुरक्षित रखता है।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने उपलब्ध ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्यों, सतत उपासना परंपरा और वैज्ञानिक जांच के आधार पर यह स्पष्ट किया कि भोजशाला माँ वाग्देवी का प्राचीन मंदिर एवं संस्कृत शिक्षा का केंद्र थी। यह निर्णय किसी भावनात्मक आवेग का परिणाम नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया, पुरातात्विक परीक्षण और न्यायिक विवेक की कसौटी पर आया हुआ निर्णय है।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि न्यायालय ने ASI जैसी विशेषज्ञ संस्था की जांच, दोनों पक्षों की दलीलों, ऐतिहासिक प्रमाणों और प्रत्यक्ष निरीक्षण के बाद यह निर्णय दिया। यह बताता है कि भारत का संविधान और न्यायपालिका सत्य तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं, यदि धैर्य और विश्वास बनाए रखा जाए।

यह निर्णय सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक भारत में ऐतिहासिक सत्य पर चर्चा को ही विवाद बना दिया गया। सभ्यतागत पीड़ा की अभिव्यक्ति को सांप्रदायिकता कहकर दबाने का प्रयास हुआ। मंदिर विध्वंसों की स्मृतियों को ‘अतीत भूल जाओ’ कहकर ढंकने का प्रयास किया गया। लेकिन कोई भी समाज अपने घावों को स्वीकार किए बिना स्वस्थ नहीं हो सकता।

भोजशाला का निर्णय इस बात का संकेत है कि आधुनिक भारत अब अपनी सभ्यता के इतिहास से आंखें चुराने के बजाय उसका संतुलित और तथ्याधारित पुनर्पाठ करने को तैयार है।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह निर्णय भारत की बदलती चेतना का प्रतीक है। यह उस ‘नए भारत’ का संकेत है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों को लेकर संकोचग्रस्त नहीं है। जो यह मानता है कि विकास और विरासत साथ-साथ चल सकते हैं। जो मंदिरों को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्मृति और सभ्यतागत पहचान के केंद्र के रूप में देखता है।

यह निर्णय उन करोड़ों भारतीयों के मन में विश्वास भी जगाता है, जिन्होंने दशकों तक यह अनुभव किया कि उनकी आस्था, उनकी पीड़ा और उनकी सांस्कृतिक स्मृतियां सार्वजनिक विमर्श में उपेक्षित रहीं। भोजशाला का निर्णय उन्हें यह आश्वासन देता है कि संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया के भीतर रहते हुए भी ऐतिहासिक न्याय संभव है।

इस निर्णय का सबसे बड़ा संदेश यह है कि सनातन केवल पूजा पद्धति नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता है। उसे तलवारों से घायल किया जा सकता है, लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता।

आज भोजशाला का प्रश्न केवल एक मंदिर का प्रश्न नहीं है। यह भारत की उस ज्ञान परंपरा का प्रश्न है, जिसने विश्व को व्याकरण दिया, दर्शन दिया, गणित दिया, अध्यात्म दिया। यह उस सांस्कृतिक अस्मिता का प्रश्न है, जिसे बार-बार मिटाने का प्रयास हुआ, लेकिन जो हर बार और अधिक तेजस्विता के साथ पुनः खड़ी हो गई।

न्यायालय द्वारा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में स्थापित मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने की दिशा में विचार करने संबंधी टिप्पणी भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह प्रतिमा केवल मूर्ति नहीं है, वह भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। उसका पुनः भोजशाला में स्थापित होना वस्तुतः इतिहास की टूटी हुई कड़ी का पुनर्संयोजन होगा। वह केवल प्रतिमा की वापसी नहीं होगी, वह भारतीय आत्मा की घर-वापसी होगी।

किन्तु इस निर्णय को प्रतिशोध या पराजय के भाव से नहीं देखा जाना चाहिए। यह किसी समुदाय की हार नहीं है। यह ऐतिहासिक सत्य की स्वीकृति है।

अब आवश्यकता भोजशाला को पुनः ज्ञान और संस्कृत साधना के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की है। वहां पुनः वेदों की ऋचाएं गूंजें। वहां पुनः संस्कृत का अध्ययन हो। वहां पुनः भारत की ज्ञान परंपरा विश्व को दिशा दे। वहां पुनः यह सिद्ध हो कि यह भूमि केवल आस्था की नहीं, ज्ञान की भी जननी है। तभी यह निर्णय अपने पूर्ण अर्थ को प्राप्त करेगा।

भोजशाला हमें याद दिलाती है कि इतिहास का सत्य देर से लौट सकता है, लेकिन लौटता अवश्य है। और जब सत्य लौटता है, तब केवल एक भवन नहीं जीतता… सभ्यता मुस्कुराती है, इतिहास की राख से फिर सरस्वती उठ खड़ी होती हैं।

प्रधानमंत्री की अपील को स्वीकारना समय की मांग

Posted on 15.05.2026 Time 11.30 AM Friday

Article by Sarvesh Kumar Singh, Lucknow

सर्वेश कुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से  संयममित उपभोग की अपील की है। यह अपील समय की मांग है। इसे स्वीकार करना हर भारतवासी का राष्ट्रहित में योगदान होगा। कारण बहुत स्पष्ट हैं किसी से कोई भी स्थिति छिपी हुई नहीं है। आज दुनिया का जो परिदृश्य बना हुआ है। उसमें  आसन्न संकट से बचने का एक मात्र उपाय संयमित उपभोग ही है।

प्रधानमंत्री ने 10 मई को हैदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में जनता से अपील की। कार्यक्रम हैदराबाद में अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन केन्द्र में आयोजित था, जहां उन्होंने 9400 करोड़ की विभिन्न विकास परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन किया। इसके बाद भाजपा की रैली को भी सम्बोधित किया। यहीं श्री मोदी ने वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कोविड काल जैसी व्यवस्थाओँ को अपनाने की अपील की। श्री मोदी ने कहा कि पेट्रोल, डीजल और गैस का संयमित उपयोग किया जाए। इसके साथ ही श्री मोदी ने यह भी कहा कि कोविड काल में जैसे वर्क फ्राम होम की व्यवस्था की गई थी, वैसे ही इसे फिर से अपनाया जाना समय की मांग है। उन्होंने आनलाइन बैठकों, वीडियो कांफ्रेंसिंग को अपनाने की भी बात कही। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री ने किसानों से भी अपील की। उन्होंने कहा कि किसानों को रायायनिक खादों का उपयोग 50 प्रतिशत तक कम करना चाहिए। इसके लिए प्राकृतिक खेती को अपनाना एक अच्छा उपाय है। सिंचाई के लिए डीजल पंप के स्थान पर सोलर पंप अपनाए जाएं। इससे डीजल की बचत होगी।

प्रधानमंत्री ने उसके एक ही दिन बाद इसी अपील को फिर दिल्ली में दोहराया। उन्होंने जो भी कहा वह राष्ट्रीय परिदृश्य,देश की अर्थव्यवस्था, भविष्य की चुनौतियों और आसन्न संकट की चेतावनियों को देखते हुए कहा है। क्योंकि हम 2047 तक विकसित भारत  का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। इसके लिए जरूरी है कि उच्च विकास दर बनी रहे। उच्च विकास दर तभी रह सकती है जब राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखा जाए।

पश्चिम एशिया संकट के कारण पूरी दुनिया गैस, पेट्रोल, डीजल, रायासयिक उर्वरकों के संकट का सामना कर रही है। कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। पश्चिम एशिया संकट से पहले जहां कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल 70 डालर थी वह आज 126 डालर तक पहुंच गई है। लेकिन भारत सरकार ने घरेलू आपूति में दामों को नियंत्रित रखा है। इस कारण सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों इंडियन आयल, भारत प्रेट्रोलियम, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। यह घाटा प्रतिदिन 1600 से 1700 करोड़ रुपये है। अभी तक ये कंपनियां कुल एक लाख करोड़ रुपये का घाटा उठा चुकी हैं। तेल कंपनियों का घाटा सीधे तौर पर हमारे देश की विदेशी मुद्रा के स्तर को  प्रभावित करता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार कम होने की आशंका है, जोकि रणनीतिक रूप से उचित स्थिति नहीं होगी। भारत के पास वर्तमान में विदेशी मुद्रा का इतना भंडार है कि वह 11 महीने तक निर्बाध आयात कर सकता है। लेकिन इस स्थिति को सदैव स्थिर रखने की जरूरत होती है।

देश के मुद्रा भंडार को जो दूसरी सबसे बड़ी खरीद प्रभावित करती है वह सोना है। प्रधानमंत्री ने इसी लिए एक साल तक सोना न खरीदने की भी अपील की है ताकि भारत को विदेश से सोना आयात नहीं करना पड़े। क्योंकि मांग की पूति के लिए सोना आयात किया जाता है। इसे भी नियंत्रित रखना है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने देशवासियों से सहयोग की अपील की है। हालांकि इस अपील को भारत के विपक्ष ने स्वीकार करने के बजाय इस पर टीका टिप्पणी शुरु कर दी है। सबसे खराब टिप्पणी नेता विरोधी दल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने की है। उन्होंने कहा कि समझौतावादी पीएम के बस का देश चलाना नहीं है।

लेकिन, प्रधानमंत्री की अपील को देश की जनता स्वीकार कर रही है। जनता ने संयम दिखाना प्रारम्भ कर दिया है। राज्य सरकारों ने सकारात्मक रुख दिखाया है। अधिकांश राज्यों ने अपने मंत्रियों के काफिले छोटे कर दिये हैं। सप्ताह में एक दिन नो वेहिकल डे और दो दिन वर्क फ्राम होम की व्यवस्था लागू करने का फैसला ले लिया है। इससे पट्रोल, डीजल की बचत होगी।

आज दुनिया का परिदृश्य जिस तरह से बदल रहा है। भू राजनैतिक परिदृश्य में भी बदलाव हो रहे हैं। हमारे देश की सीमाओं पर हर समय तनाव बना हुआ है। आपरेश सिन्दूर के बाद चीन और पाकिस्तान का गठजोड़ उजागर हो चुका है। अमेरिका की छद्मनीति के चलते हम उस पर भरोसा नहीं कर सकते। इन हालातों में भारत की सुरक्षा  के लिए यह जरूरी है कि हम स्वयं सशक्त आर्थिक शक्ति, निजीं संसाधनों पर अधिक निर्भरता, विदेशी आयात की कम से कम जरूरतों पर निर्भर रहें। ताकि आसन्न चुनौतियों का सामना दृढ़ता से कर सकें। अतः प्रधानमंत्री की अपील को स्वीकार करना चाहिए।

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

May 15, 2026

एमपी हाईकोर्ट: भोजशाला सरस्वती मंदिर

Posted on 15.05.2026 Time 09.14 , Madhya Pradesh, Bhojdhala

धरम हेतु अवतरेहु गोसाईं

आचार्य ललित मुनि

हिन्दूओं के लिए आज बड़ा फैसला धार स्थित भोजशाला को लेकर आया। न्यायालय का निर्णय करोड़ों सनातनियों के लिए केवल एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि सदियों से संघर्षरत सांस्कृतिक चेतना की विजय के रूप में देखा जा रहा है।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि भोजशाला मूलतः देवी वाग्देवी अर्थात माँ सरस्वती का मंदिर और संस्कृत अध्ययन का केंद्र था। यह निर्णय उन ऐतिहासिक तथ्यों और पुरातात्विक प्रमाणों की पुष्टि करता है जिन्हें वर्षों से सनातन समाज उठाता रहा था।

न्यायालय ने अपने विस्तृत निर्णय में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट, ऐतिहासिक अभिलेखों, स्थापत्य अवशेषों और उपलब्ध साक्ष्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि भोजशाला का मूल स्वरूप एक हिंदू मंदिर और विद्या पीठ का था।

अदालत ने 2003 से लागू उस व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया जिसमें हिंदुओं और मुस्लिम पक्ष के लिए अलग-अलग दिनों में पूजा एवं नमाज की अनुमति दी गई थी। न्यायालय ने राज्य सरकार को परिसर का संरक्षण सुनिश्चित करने तथा व्यवस्था एवं शांति बनाए रखने के निर्देश भी दिए हैं। इस निर्णय को कई लोग ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित न्यायिक मान्यता के रूप में देख रहे हैं।

भोजशाला केवल पाषाण निर्मित स्मारक नहीं बल्कि यह उस भारत की स्मृति है जहाँ ज्ञान, संस्कृति, शास्त्र और साधना का संगम था। परमार राजा भोज के काल में यह विद्या और संस्कृति का एक महान केंद्र माना जाता था। यही कारण है कि हिंदू समाज इसे माँ सरस्वती की उपासना स्थली के रूप में मानता रहा है। वर्षों तक इस सत्य को “विवाद” कहकर दबाने का प्रयास हुआ, लेकिन अंततः न्यायालय ने ऐतिहासिक चरित्र को स्वीकार किया।

इस निर्णय को सनातन समाज इसलिए भी महत्वपूर्ण मान रहा है क्योंकि यह केवल आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि अभिलेखों, पुरातात्विक अवशेषों और ऐतिहासिक अध्ययन के आधार पर आया है। लंबे समय से यह कहा जाता रहा कि भारत के अनेक प्राचीन मंदिर आक्रमणों और सत्ता परिवर्तन के दौरान इस्लामिक इमारतों में बदले गए, लेकिन उन प्रश्नों पर चर्चा को अक्सर सांप्रदायिक कहकर टाल दिया गया। भोजशाला का निर्णय इस विमर्श को नई दिशा देता है।

यह फैसला उन लाखों लोगों की भावनात्मक जीत भी है जिन्होंने वर्षों तक माँ वाग्देवी के सम्मान और पूजा-अधिकार के लिए आवाज उठाई। हर बसंत पंचमी पर भोजशाला का प्रश्न राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनता रहा। हिंदू समाज का यह आग्रह केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा हुआ था।

इस निर्णय के बाद सनातन समाज में स्वाभाविक उत्साह दिखाई दे रहा है। इसे लोग “सत्य की विजय” और “सभ्यता के पुनर्जागरण” के रूप में देख रहे हैं। लंबे समय बाद न्यायपालिका ने इतिहास के उस पक्ष को भी महत्व दिया है जिसे सामान्यतः उपेक्षित माना जाता था।

धार की भोजशाला आज केवल एक स्थान नहीं रही। वह उस व्यापक भावबोध का प्रतीक बन चुकी है जिसमें सनातन समाज अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों, मंदिरों और सांस्कृतिक प्रतीकों के पुनर्स्थापन को अपने आत्मसम्मान से जोड़कर देख रहा है। यह निर्णय आने वाले समय में भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक पहचान के विमर्श में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हो सकता है। इसके प्रकाश में अन्य निर्णय भी आएंगे।

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