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भारतीय रेलवे में नई हाइड्रोजन क्रांति

July 18, 2026

भारतीय रेलवे में नई हाइड्रोजन क्रांति


प्रधानमंत्री ने कई रेलवे स्टेशनों का भी दिया उपहार
मृत्युंजय दीक्षित
जुलाई 17, 2026 का दिन भारतीय रेलवे के लिए एक स्मरणीय दिन बन गया है क्योंकि इस दिन रेल यातायात में विकसित भारत के नये युग का सूत्रपात हुआऔर भा रत को हाइड्रोजन ट्रेन का उपहार मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरियाणा के जींद रेलवे स्टेश्न से हरी झंडी दिखाकर इसका उद्घाटन किया। अब भारत उन चुनिन्दा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है जहां हाइड्रोजन ट्रेनों का संचालन हो रहा है।अभी तक जर्मनी, फ्रांस और चीन जैसे देश ही इस प्रकार की ट्रेनों का संचालन कर रहे थे ।
जींद-सोनीपत मार्ग पर चलने वाली यह ट्रेन शून्य कार्बन उत्सर्जन वाली 10 कोच और 3,200 हार्स पावर क्षमता वाली दुनिया की सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेनों मे शामिल है। यह ट्रेन पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से तैयार की गई है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक से चलने वाली इस ट्रेन में हाइड्रोजन से बिजली बनाई जाती है जिससे ट्रेन संचालित होती है। इस प्रक्रिया में केवल जलवाष्प निकलती है इसलिए इससे शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है। यह ट्रेन डीजल ट्रेनों की तुलना में प्रदूषण नहीं फैलाती, आवाज भी कम करती है और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करती है। इसके लिए पारपंरिक इलेक्ट्रिक ट्रेनों की तरह मार्ग पर ओवरहेड बिजली लाईन की जरूरत भी नहीं होती क्योकि बिजली ट्रेन के भीतर ही तैयार होती है। ऐसी ट्रेनों के संचालन से कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर निर्भरता कम होगी।
यह 10 कोच वाली दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेनों में शामिल है। यह अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त ट्रेन है जो बाहर से देखने में तो साधारण ट्रेनों की तरह ही लगती है किन्तु जब यात्री ट्रेन के कोच में बैठकर यात्रा करते हैं तो उन्हें एक अलग प्रकार की सुखद अनुभूति होती है। ट्रेन में आधुनिक सुरक्षा प्रणाली, हाइड्रोजन लीक डिटेक्शन सिस्टम और विशेष फ्यूल सेल तकनीक का उपयोग किया गया है। इस ट्रेन में यात्रियों के लिए टिकट का मूल्य 5 से 25 रुपए तक रखा गया है ताकि आम से खास तक सभी वर्ग के लोग इस पूर्ण रूप से स्वदेशी तथा प्रदूषण रहित ट्रेन की आरामदायक यात्रा का लाभ उठा सकें। भारतीय रेलवे की पहली हाइड्रोजन ट्रेन हरियाणा में जींद से सोनीपत के बीच 89 किमी प्रतिदिन दो राउंड ट्रिप यानी कुल 356 किमी का सफर तय करेगी। यह हाइड्रोजन ट्रेन जींद सिटी, गोहाना, पांडु पिंडारा, ललित खेड़ा, भंभेवा, इसापुर खेड़ी, बुटाना, खंडराई, राबरा, लाथ, मोहाना और सोनीपत स्टेशन पर रुकेगी।
भारत की स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन अन्य देशों की तुलना में सबसे कम लागत मात्र 136 करोड़ रुपए में बनी है। ट्रेन की सामान्य ऑपरेशनल स्पीड 75 किमी प्रति घंटा होगी। ट्रायल रन के दौरान इसने 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार प्राप्त की थी। यह ट्रेन एक घंटे में 90 किमी का सफर तय कर सकती है। जबकि कई पुराने डीजल इंजन वाली ट्रेनों को इतनी दूरी तय करने में लगभग दो घंटे लग जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेलवे में व्यापक बदलाव लाने का संकल्प लिया था जो अब धरातल पर उतरता दिख रहा है। भारतीय रेलवे आगामी वर्षों में और भी आधुनिक बनने की तैयारी कर रहा है। सरकार का लक्ष्य व संकल्प भारतीय रेलवे को अधिक सुरक्षित, तेज और पर्यावरण के अनुकूल बनाना है यह हाइड्रोजन ट्रेन उसी लक्ष्य की दिशा में ले जाने वाली पहल है।
संक्षिप्त इतिहास – भारत में पहली यात्री ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को मुंबई के बोरीबंदर स्टेशन से ठाणे के बीच चलाई गई थी। यह ट्रेन 34 किमी की दूरी तय करती थी इसमें 14 डिब्बे थे1 960 में भारतीय रेलवे ने डीजल इंजनों को अपनाना शुरू किया। इन इंजनों की मदद से लंबी दूरी की ट्रेनों का संचालन शुरू हुआ। मालगाड़ियों की क्षमता बढ़ी और रेलवे का विस्तार पहले की तुलना में तीव्रगति से हुआ। इसके पश्चात रेलवे में विद्युतीकरण का युग आया जिसमें बिजली से चलने वाले इंजन डीजल की तुलना में अधिक तीव्र ,कम प्रदूषण फैलाने वाले और ऊर्जा की दृष्टि से अधिक किफायती सिद्ध हुए। अब समय पूरी तरह से बदल चुका है। अब यात्रियों को सुविधाएं देने के लिए बेहतर तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, वंदेभारत एक्सप्रेस जैसी हाईस्पीड ट्रेनों,आधुनिक कोच, आटोमेटिक सिग्नल सिस्टम, कवच सुरक्षा प्रणाली, डिजिटल टिकटिंग और बेहतर स्टेशन सुविधाएं रेलवे को नई पहचान दे रही हैं। आगामी समय में बुलेट ट्रेनों की रफ्तार भी भारतीय जनमानस देखने वाला है। केवल यात्रियों के लिए ही नहीं भारतीय रेल अब माल ढुलाई के लिए भी आधुनिक ट्रेनों का संचालन कर रही है।
हाइड्रोजन ट्रेन के उद्घाटन के अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने जींद और पंजाब के जालंधर से रेलवे की विकास व बदलाव की कहानी बताई और साथ ही कांग्रेस सहित समस्त विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए राजनैतिक संदेश भी दिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि जो काम आज हो रहे हैं वो काम तो 30 -40 वर्ष पहले ही हो जाने चाहिए थे लेकिन पहले की सरकारों में यह काम प्राथमिकता में थे ही नहीं। इस पर पहले की सरकारें चर्चा ही नहीं करती थी। 2014 के बाद भाजपा सरकार ने स्थितियों को बदलना शुरू किया। आज पूरे भारत में रेलवे स्टेशनों का कायाकल्प किया जा रहा है। अमृत भारत स्टेशन योजना के अंतर्गत 1300 स्टेशनों का कायाकल्प किया जा रहा है आज ऐसे ही 75 स्टेशनों का लोकार्पण हुआ है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने अमृतसर -वाराणसी के बीच चलने वाली संत रविदास एक्सप्रेस ट्रेन सेवा को भी हरी झंडी दिखाई।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं. – 9198571540

July 12, 2026

दान का ‘हिसाब’ मांगने वाले कालनेमियों सुनो…!

Ram Mandir Ayodhya

राम मंदिर अयोध्या

प्रणय विक्रम सिंह

‘​स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकं परस्वत्वोत्पादनं दानम्’ के दिव्य उद्घोष से सिंचित इस धरा पर दान कोई भौतिक सौदा या व्यापार नहीं बल्कि आत्मा की परम शुद्धि और प्रभु के चरणों में सर्वस्व समर्पण का महामार्ग है, लेकिन आज राजनीति के कुछ आधुनिक कालनेमी प्रभु श्री राम के इस पावन दरबार में भी अपनी नफरत की दुकान चमकाने के लिए ‘कमीशन’ और ‘हिसाब’ का झूठा बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं।

सत्ता से दूर होकर छटपटा रहे इन दिशाहीनों को शायद सनातन का गौरवशाली इतिहास नहीं मालूम, वरना तकादा करने से पहले वे अपने पूर्वजों की उस महान विरासत को याद कर लेते जहां दैत्यराज बलि ने भगवान वामन को तीन पग भूमि दान करते समय गुरु शुक्राचार्य के प्रबल विरोध के बाद भी अपने कदम पीछे नहीं खींचे थे और सर्वस्व सौंपने के बाद कभी लौटकर स्वर्ग की ‘रसीद बुक’ नहीं मांगी थी।

ठीक इसी त्याग परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सूर्यपुत्र कर्ण ने अपने प्राणों की रक्षा करने वाले कवच-कुंडल हंसते-हंसते काटकर इंद्र को दे दिए थे पर कभी यह पूछने नहीं गए कि उन्हें किस अलमारी में छिपाकर रखा गया है, और इसी सत्य की रक्षा के लिए महाराज हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र को अपना पूरा राज्य सौंपकर श्मशान में चांडाल की नौकरी स्वीकार की, जहां उनकी पत्नी और बच्चे तक बिक गए लेकिन उन्होंने कभी राजकोष के ‘ऑडिट’ का इंचार्ज बनने की इच्छा नहीं जताई।

जब महर्षि दधीचि ने देवताओं के वज्र के लिए अपने प्राण त्यागकर हड्डियां दान कर दीं और महाराज शिबि ने एक शरणागत पक्षी के लिए अपने शरीर का जीवित मांस तौल दिया, तब इनमें से किसी ने भी तराजू और रसीद लेकर विधाता को कटघरे में खड़ा नहीं किया था क्योंकि वे भली-भांति जानते थे कि प्रभु के चरणों में अर्पित वस्तु पर फिर इस नश्वर संसार का कोई वैधानिक दावा नहीं रह जाता।

​परंतु आज की इस कलियुगी राजनीति में कुछ ‘प्रचारवीर’ चार साल बाद अचानक टीवी चैनलों पर बैठकर और हाथ में दान की तस्वीरें लहराकर चांदी की ईंटों और रसीदों का ऐसा हिसाब मांग रहे हैं जैसे उन्होंने प्रभु को दान नहीं बल्कि कोई कर्ज दिया हो। जिन्होंने खुद अपनी स्वेच्छा से समर्पण किया था, वे आज केवल अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए गबन का ढोंग रच रहे हैं क्योंकि वास्तव में यह पीड़ा राम मंदिर की सुरक्षा या उसकी मर्यादा की है ही नहीं, बल्कि यह पीड़ा मीडिया में ‘नाम चमकाने’ और अपने ‘अहंकार’ की तृप्ति न होने की छटपटाहट है।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने सात्विक दान की परिभाषा बताते हुए स्पष्ट कहा है कि श्रेष्ठ दान वही है जो बिना किसी बदले की भावना या सम्मान की लालसा के दिया जाए, और हमारी लोक-परंपरा भी यही कहती है कि दाहिने हाथ से दो तो बाएं हाथ को पता न चले, अन्यथा वह दान नहीं बल्कि एक घटिया प्रदर्शन मात्र बनकर रह जाता है। आज करोड़ों हिंदुओं के एक-एक रुपए के पवित्र संकल्प और अटूट आस्था से यह भव्य और गगनचुंबी मंदिर खड़ा हुआ है, और जिन्हें इस दिव्य शिखर की ऊंचाई में, धवल फर्शों की भव्यता में और रामलला के श्रीचरणों के अलौकिक अलंकरण में अपना समर्पण दिखाई नहीं दे रहा, दोष निश्चित ही उनकी नियत और आंखों के राजनीतिक मोतियाबिंद का है।

​भ्रम फैलाकर अपनी रोटियां सेकने वाले इन राजनीतिक गिद्धों को यह बात कान खोलकर सुन लेनी चाहिए कि राम मंदिर ट्रस्ट के एसबीआई लॉकर में सिंधी समाज द्वारा समर्पित सभी 200 चांदी की ईंटों के साथ-साथ कागभुशुंडि जी की दिव्य प्रतिमा, प्रभु का स्वर्ण धनुष-बाण, चरण पादुकाएं और भक्तों का अर्पित किया गया एक-एक आभूषण पूरी तरह सुरक्षित है।

इस सत्य को झुठलाने की कोशिश करने वाले भूल रहे हैं कि यह उत्तर प्रदेश है, जहां राम और राष्ट्र के आराधक योगी आदित्यनाथ जी महाराज मुख्यमंत्री की पद पर विराजमान हैं, जिनके राज में कोई चोर, कोई ठग या कोई कालनेमी बचकर निकल ही नहीं सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और मुख्यमंत्री योगी जी का अपना कोई निजी परिवार नहीं है बल्कि यह पूरा राष्ट्र ही उनका परिवार है जिसके स्वाभिमान और वैभव के लिए वे दिन-रात अपने तन-मन से जुटे हुए हैं। इसलिए समस्त रामभक्त इन देशद्रोहियों और बहरूपियों के बहकावे में न आएं और पूर्ण धैर्य रखें, क्योंकि रामजी के काम में विघ्न डालने वालों का समय आने पर इसी धरती पर दूध का दूध और पानी का पानी होगा और विधाता की लाठी से पाई-पाई का ऐसा मर्मभेदी हिसाब होगा जिसे इनकी आने वाली पीढ़ियां भी याद रखेंगी।

जय जय श्री राम
​राष्ट्रहित सर्वोपरि।
भारत माता की जय!
वंदे मातरम! जय हिंद!

July 11, 2026

Shri Ram Mandir: विश्वास, समर्पण और सार्वजनिक जीवन में सावधानी की सीख

Champatrai General Secretary Shri Ram Janmbhumi Teerth Kshetra Trust

अखिलेश शर्मा

श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें उन लोगों का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा जिन्होंने दशकों तक बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। ऐसे ही व्यक्तित्वों में विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का नाम प्रमुखता से आता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। संगठन, संघर्ष और सेवा के कारण वे करोड़ों रामभक्तों के बीच सम्मानित हैं।
हाल के दिनों में चंपत राय एक ऐसे विवाद के केंद्र में आ गए, जिसने यह संदेश दिया कि सार्वजनिक जीवन में केवल ईमानदारी ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि हर कदम पर सतर्कता भी आवश्यक होती है। चर्चा इस बात की रही कि वे अपने निकट के लोगों पर अत्यधिक विश्वास कर बैठे और इसी अति विश्वास ने उन्हें अनावश्यक विवादों में ला खड़ा किया। राजनीति, सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं में यह एक पुरानी कहावत है कि “विश्वास आवश्यक है, लेकिन सत्यापन उससे भी अधिक आवश्यक है।”
चंपत राय का व्यक्तित्व सदैव सादगी, अनुशासन और संगठन के प्रति समर्पण का रहा है। उन्होंने कभी व्यक्तिगत प्रचार को महत्व नहीं दिया और हमेशा स्वयं को रामकाज का एक साधारण कार्यकर्ता बताया। यही कारण है कि उनके समर्थकों का मानना है कि यदि उनसे कोई चूक हुई भी है तो वह किसी निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपने सहयोगियों पर अधिक भरोसा करने के कारण हुई।
सार्वजनिक जीवन में कार्य करने वाले लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि वे अपने आसपास ऐसे लोगों का चयन करें जो उनके विश्वास पर खरे उतरें। कई बार प्रतिष्ठित व्यक्तियों की वर्षों की कमाई हुई साख कुछ लोगों की लापरवाही या गलत आचरण के कारण प्रभावित हो जाती है। इसलिए किसी भी संस्था की मजबूती के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और समय-समय पर तथ्यों का परीक्षण आवश्यक माना जाता है।
राम मंदिर आंदोलन करोड़ों लोगों की आस्था का विषय रहा है। मंदिर निर्माण पूर्ण होने के बाद भी ट्रस्ट और उससे जुड़े प्रत्येक पदाधिकारी पर समाज की निगाह रहती है। ऐसे में किसी भी प्रकार का विवाद स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन जाता है। यही कारण है कि ट्रस्ट से जुड़े लोगों से सामान्य से भी अधिक सावधानी और पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है।
चंपत राय के समर्थकों का कहना है कि उनके दशकों के योगदान को किसी एक विवाद की कसौटी पर नहीं परखा जाना चाहिए। वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही की मांग करने वाले लोगों का मानना है कि जितना बड़ा पद, उतनी ही अधिक पारदर्शिता और उत्तरदायित्व भी आवश्यक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यही स्वस्थ परंपरा मानी जाती है।
यह पूरा घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि समर्पण और निष्ठा जितने आवश्यक हैं, उतनी ही आवश्यक विवेकपूर्ण सतर्कता भी है। किसी भी बड़े संगठन में व्यक्तिगत विश्वास के साथ-साथ संस्थागत व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए ताकि किसी प्रकार की भ्रांति या विवाद की संभावना कम हो।
भगवान श्रीराम के आदर्श भी यही सिखाते हैं कि धर्म, मर्यादा, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलते हुए प्रत्येक निर्णय पूरी सावधानी और निष्पक्षता के साथ लिया जाए। यदि इस घटना से कोई सीख निकलती है तो वह यही है कि सार्वजनिक जीवन में विश्वास और पारदर्शिता दोनों का संतुलन ही व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी होता है।

July 1, 2026

इच्छाधारी’ आस्था का चुनावी गणित

प्रणय विक्रम सिंह

अयोध्या के संदर्भ में विपक्ष की नई-नई जागी श्रद्धा को देखकर मुझे लगा कि रामचरितमानस में तुलसीदास जी से एक बहुत बड़ी चूक हो गई है।

वे मारीच, सुबाहु और कालनेमि जैसे दिव्य भेष बदलने वाले मायावियों को त्रेतायुग में ही निपटा गए। उन्हें जरा रुकना चाहिए था। वे आज के युग में आते, तो देखते कि भेष बदलने की यह कला अब केवल राक्षसों की बपौती नहीं रही, इसका लोकतांत्रिक विकास हो चुका है और अब इसके सबसे कुशल अभ्यासकर्ता हमारे राजनेता हैं।

सुना है, कल तक जो लोग भगवान राम को केवल एक अदालती एफेडेविट का ‘काल्पनिक पात्र’ मानते थे, आज वे चुनाव की आहट सुनते ही हाथ में आस्था का नया-नवेला थर्मामीटर लेकर घूम रहे हैं। वे ट्विटर पर अयोध्या को ‘अनुपम और अनुकरणीय धार्मिक नगरी’ बनाने की वैसी ही पवित्र कसमें खा रहे हैं, जैसी कसमें एक जेबकतरा अपनी ईमानदारी सिद्ध करने के लिए कोट कचहरी में खाता है।

इस दिव्य और त्वरित हृदय परिवर्तन को देखकर मुझे गिरगिटों की मानसिक स्थिति पर तरस आता है। बेचारे डिप्रेशन में होंगे कि जिस हुनर के लिए वे सदियों से बदनाम थे, उसमें कुछ सैफई ब्रांड समाजवादी इंसानों ने पीएचडी कर ली और उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा।

आखिर कोई उस राम-नाम का जाप इतनी पवित्रता से कैसे कर सकता है, जिसके राजनीतिक कुनबे का पूरा इतिहास ही राम-विरोध की खाद पर फला-फूला हो?

आजकल वे फीता लेकर निकले हैं। पूछ रहे हैं कि *अयोध्या से गोरखपुर कितनी दूर है?* नेताजी, दूरी नापने का यह शौक नया है। पर आप गलत नक्शा देख रहे हैं। अयोध्या से गोरखपुर की दूरी तो उतनी ही है, जितनी *सत्य और सनातन* के बीच होती है। यानी दोनों आपस में जुड़े हैं। पर आपके ‘पारिवारिक सिंडिकेट’ और रामराज्य के बीच की दूरी अनंत है, जिसे नापने के लिए आपके पास न तो नैतिक पैमाना है और न ही वैसा चरित्र। अच्छा होता कि आप इस दूरी को नापने से पहले यह बता पाते कि राम के प्रति आपकी खानदानी नफरत और आपके वोटबैंक के लालच के बीच कुल कितने किलोमीटर का फासला है?

जब आदमी को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती दिखती है, तो उसे इतिहास की कड़वी यादें भूलने का ‘अल्जाइमर’ रोग हो जाता है। लेकिन जनता की याददाश्त बहुत क्रूर होती है, नेताजी। जनता को आज भी याद है कि जब आपके पूज्य पिताजी की हुकूमत थी, तब अयोध्या की पावन गलियों में कोई भजन नहीं गूंज रहा था, बल्कि निहत्थे रामभक्तों का खून बह रहा था। तब आपकी सरकारी मशीनरी मंदिर के पत्थरों को ज़ब्त करने में वैसी ही मुस्तैदी दिखा रही थी, जैसी मुस्तैदी कोई डकैत माल समेटने में दिखाता है। और उसी पावन दौर में, पुलिस थानों और जेलों में कृष्ण जन्माष्टमी मनाने पर ऐसा प्रतिबंध था, मानो कंस खुद लखनऊ के सचिवालय में आकर बैठ गया हो।

जो लोग कल तक रामलला के प्राण-प्रतिष्ठा के निमंत्रण पत्र को अछूत मानकर ठुकरा रहे थे, आज वे ‘सियाराम-धाम’ के पुनरुद्धार का ठेका लेने की बात कर रहे हैं। यह वैसा ही है जैसे बिल्ली चूहों की सुरक्षा के लिए एक सर्वदलीय समिति बनाने का प्रस्ताव रखे।

राम की सेवा के लिए ‘भेष’ और ‘ट्वीट’ बदलने की नहीं, ‘भाव’ बदलने की जरूरत होती है। पर आपके पास तो वही पुराना हलफनामा है, जो आपने कभी सर्वोच्च न्यायालय में जमा किया था। आपकी पूरी राजनीतिक पूंजी ही यही रही है कि जब तक सत्ता में रहो, हिंदुओं की आध्यात्मिक भावनाओं को वैसे ही कुचलो जैसे रास्ते का कंकड़ कुचला जाता है, और जब चुनाव आ जाएं, तो माथे पर एक लंबा सा छद्म टीका लगाकर ‘इच्छाधारी रामभक्त’ की मुद्रा में जनता को सम्मोहित करने निकल पड़ो।

मेरी की एक बात हमेशा याद रखिएगा भैयाजी, आप भगवान को धोखा दे सकते हैं क्योंकि वे घट-घट वासी होकर भी चुप रहते हैं, पर जनता को नहीं, क्योंकि वह सब देखकर सही समय पर ईवीएम का बटन दबाती है।

सुना है, आपने तो अयोध्या का राजा ही बदल दिया। जबकि सभी सनातनियों के लिए त्रेता युग से आज तक अयोध्या के राजा श्री रामचन्द्र जी हैं। जो काम लंका का रावण अपनी पूरी दस खोपड़ियों की ताकत लगाकर नहीं कर पाया, वह आपने अपने वोटबैंक को खुश करने के लिए बड़ी सरलता से कर दिया। कई दिनों तक संसद में अपने बगल में उनको बैठाकर घुमाते रहे। राम से इतनी घृणा कि उन्हें अयोध्या के राजा के रूप में स्वीकार करने में आपकी छाती फटने लगती है, इसलिए आपने प्रतीकों का नया बाज़ार सजा लिया। आपका यह दोहरा चरित्र और अतीत उत्तर प्रदेश के हर रामभक्त के सीने में एक गहरे घाव की तरह आज भी टीस रहा है।

याद रखिए, इतिहास की स्याही बहुत पक्की होती है, वह आपके इन बनावटी और सुगठित ट्वीट्स के ‘थूक’ से नहीं धुलेगी। 10 नवंबर 1990 का वह अंधकारमय काला दिन, निहत्थों का रक्तपात, थानों में जन्माष्टमी पर पाबंदी और पावन पत्थरों का अपमान, यह सब आपके माथे पर वो अमिट कलंक हैं, जिन्हें धोने के लिए यदि आप सरयू का पूरा पानी भी इस्तेमाल कर लें, तो भी कम पड़ेगा।

अयोध्या अब सज चुकी है, दिव्य और भव्य हो चुकी है। वहां अब आपके पाखंड का कोहरा नहीं, बल्कि प्रभु राम का ‘परम प्रकाश’ जगमगा रहा है। और इतिहास गवाह है कि जब प्रकाश उदित होता है, तो अंधेरे के व्यापारियों का विसर्जन अपने आप हो जाता है। आपका भी होना निश्चित है।

June 20, 2026

Yoga Day विश्व को भारत की अनुपम देन योग

Posted on 20.06.2026 Saturday, Time 08.29 PM Article World Yoga Day, by Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News

समग्र स्वास्थ्य की गारंटी योग
सर्वेश कुमार सिंह
योग विश्व को भारत की अमूल्य देन है। कई हजार साल की खोज, अनुसंधान और प्रमाणित परिणामों के बाद भारत के ऋषि,मुनियों ने योग को प्रतिपादित किया। योग के महत्व और समग्र स्वास्थ्य की रक्षा के लिए भारतीय जनमानस इसे सदियों से अपना रहा है। लेकिन आधुनिक भारत में योग से विश्व को परिचित कराने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को है। उनके सदप्रयासों और दूरदृष्टि से योग को संयुक्त राष्ट्र महासभा में मान्यता मिली और 21 जून विश्व योग दिवस घोषित हो सका।
संयुक्त राष्ट्र महासभा का सर्वसम्मत प्रस्ताव
योग ऐसा विषय है, जिसे विश्व ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया है। आम तौर पर संयुक्त राष्ट्र महासभा के संकल्प और प्रस्ताव मतदान से पारित और स्वीकृत होते है। लेकिन 21 जून को विश्व योग दिवस घोषित करने का प्रस्ताव मतदान से नहीं बल्कि 193 सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से पारित किया। इस प्रस्ताव को जब औपचारिक रूप से 27 सितंबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महासभा की 69वीं बैठक में अपने भाषण के बाद प्रस्तुत किया तो 177 देश प्रस्ताव के सह प्रायोजक बने। इसके बाद 11 दिसंबर 2014 को महासभा ने सर्वसम्मत निर्णय लिया कि 21 जून विश्व योग दिवस होगा।
भारतीय ज्ञान परंपरा में शीर्ष पर
भारत ज्ञान और विज्ञान के शीर्ष पर रहा है। प्राचीन ज्ञान के रूप में आध्यामिक चेतना के साथ ही योग ने मानव के समग्र विकास, समग्र स्वास्थ्य और समग्र उन्नयन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रमाणित की है। पतंजलि के अष्टांग योग में सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य के उपाय सिर्फ आसन ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान के तत्व मौजूद है। ये आठ अंग यम, नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि मानव के संपूर्ण स्वास्थ्य और व्यक्तित्व का निर्माण करते है। योग समाज में एकात्मकता और कार्यकुशलता निर्माण करने का केंद्रीय तत्व है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में योग का वर्णन करते हुए कहा है “योग: कर्मसुकौशलम”। योग यूज धातु से बना शब्द है, जिसका अर्थ है, जोड़ना। योग को “यूज्यतेसौ योग:” कहा है। अर्थात जो युक्त करे उसे योग कहते हैं। पतंजलि योग दर्शन कहता है “योगषःचित्तवृत्ति निरोध:”।
विश्व में योग का प्रसार
योग के आदि जनक भगवान शिव है। योग को आदि, वैदिक और पौराणिक काल में भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही महर्षि पाराशर, व्यास जी, अष्टावक्र और पतंजलि ने अलग अलग समय और युग में प्रतिपादित किया। इनके द्वारा रचित और उद्बोधित साहित्य में योग वर्णित है। इनमें प्रमुख रूप से उपनिषद, योग वशिष्ठ, योग सूत्र, भगवद्गीता, योग दर्शन आदि है।
आधुनिक विश्व में गत लगभग दो सौ वर्ष में भारत के अनेक ऋषि, सन्यासी और आध्यात्मिक गुरुओं ने इसे प्रचारित और प्रसारित किया। इन महानुभावों ने योग की महत्ता से पश्चिमी जगत को परिचित कराया। इन महापुरुषों में स्वामी विवेकानंद, स्वामी शिवानंद, स्वामी यतीश्वरानंद, स्वामी रंगनाथानंद, महर्षि महेश योगी, परमहंस योगानंद, श्रीश्री रविशंकर प्रमुख है। भारत में योग को 21वीं सदी में लोकप्रिय बनाने में बाबा रामदेव का उल्लेखनीय योगदान है।
गीता प्रेस का योगदान
योग पर साहित्य प्रकाशन में गोरखपुर का गीता प्रेस संस्थान अग्रणी है। गीता प्रेस ने यूं तो सनातन संस्कृति की सेवा में अनेक ग्रंथों, पुस्तकों का प्रकाशन किया है। लेकिन उसके द्वारा योग पर प्रकाशित साहित्य अतुलनीय है। गीता प्रेस ने योग पर चार उपयोगी, संग्रहणीय विशेषांक प्रकाशित किए है। कल्याण पत्रिका के विशेषांकों के रूप में गीता प्रेस ने 1935 में “योगांक” प्रकाशित किया। इसमें 141 लेख समाहित हैं। 1980 में “निष्काम कर्मयोग” विशेषांक प्रकाशित किया। इसमें 177 लेख समाहित हैं। इसके बाद 1999 में “योगतत्त्व अंक” प्रकाशित किया। इसमें 170 लेख समाहित हैं।

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

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