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नरेंद्र मोदी सरकार के उत्कृष्ट 12 वर्ष

June 10, 2026

नरेंद्र मोदी सरकार के उत्कृष्ट 12 वर्ष

Narendra Modi Prime Minister

सर्वेश कुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने आज देश के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना दिया। उन्होंने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का 4398 दिन के कार्यकाल का रिकॉर्ड तोड़ा है। इसके साथ ही उनके प्रधानमंत्री के कार्यकाल को 12 वर्ष 15 दिन आज पूरे हुए। श्री मोदी ने 26 मई 2014 को भाजपा नीत राजग गठबंधन के नेता के रूप में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। दूसरी बार 30 मई 2019 और तीसरी बार 9 जून 2024 को शपथ ली।

मोदी ने अपने 12 साल के कार्यकाल में भाजपा के मुख्य और चिरप्रतीक्षित मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया और उन मांगों को पूरा किया। इसमें सबसे प्रमुख श्रीरामजंभुमि मंदिर निर्माण, कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति शामिल है। एक और ऐसा मुद्दा और मांग है जिसे भाजपा और संघ विचार परिवार उठाता रहा है, वह है देश में समान नागरिक संहिता लागू करना। ये अभी कुछ राज्यों में लागू हुआ है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय कानून की आवश्यकता है।

अगर हम मोदी जी के कार्यकाल को सफलता और विकास के पैमाने पर मापने की कोशिश करे तो ये उत्कृष्ट कार्यकाल है। किसी भी देश की प्रगति उसकी तीन तरह की सुरक्षा पर निर्भर करती है। सामाजिक,आर्थिक सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा और बाहरी सुरक्षा। मोदी सरकार इन तीनों में खरी साबित हुई है। सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर मोदी सरकार ने जो काम किए है वे इससे पहले की किसी सरकार ने ना तो सोचे और ना ही क्रियान्वित हुए। समाज के तीनों वर्गों किसान और मजदूर, व्यापारी और उद्योग तथा सेवा क्षेत्र सभी के लिए मोदी सरकार ने कोई न कोई नई और लाभकारी योजना शुरू की है। इसमें किसान सम्मान निधि, उज्ज्वला योजना, गांव में हर घर शौचालय, और हर नल से पानी, संपूर्ण विद्युतीकरण जैसी योजनाओं को धरातल पर उतारा है। किसान सम्मान निधि के रूप में गत 12 साल में 4 लाख 30 हजार करोड़ रुपए वितरित हुए है। लगभग 9 करोड़ किसान परिवार लाभान्वित हो रहे है।

व्यापारियों के लिए मुद्रा ऋण, जीएसटी का सरलीकरण, आयकर में छूट की सीमा बढ़ाना शामिल है। विश्व व्यापार को बढ़ावा देने के लिए नए विश्व बाजार की खोज कर निर्यात को बढ़ाया गया है। सेवा क्षेत्र सर्वाधिक प्रगति वाला क्षेत्र बना हुआ है। इसमें यूपीआई लेनदेन ने क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। आज हमारी अर्थव्यवस्था का आकार 345 लाख करोड़ के आसपास है,जोकि वर्ष 2014 में 180 लाख करोड़ था। गत वित्तीय वर्ष में जीडीपी की वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही है। विदेशी मुद्रा भंडार जून के प्रथम सप्ताह में 682 अरब डॉलर है, ये 2014 में 304 अरब डॉलर था। मोदी सरकार के 12 साल में स्वर्ण भंडार भी दो गुना हो गया है। वर्तमान स्वर्ण भंडार 880 मीट्रिक टन है जोकि 2914 में 557 मीट्रिक टन था।

आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर भारत के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियां थीं। एक जम्मू कश्मीर में आतंकवाद पर नियंत्रण और दूसरी माओवादी उग्रवादियों नक्सलियों का खत्मा। दोनों मोर्चों पर मोदी सरकार ने गृहमंत्री अमित शाह के कुशल नेतृत्व को प्रोत्साहित कर और उन्हें खुली छूट देकर निर्णायक प्रहार कर दिया। जम्मू कश्मीर में कानून व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में है। वहां अब सेना और सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी नहीं होती बल्कि वहां अब वंदे भारत जैसी आधुनिक रेल संचालित हो रही है। नक्सलवाद की समाप्ति एक दिवास्वप्न माना जाता था। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह ने तो एक बार कह दिया था कि नक्सलवाद देश की सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन उनकी सरकार कुछ कर नहीं सकी। मोदी सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति, सुरक्षाबलों के संयुक्त अभियान, अमित शाह की सफल रणनीति से आज देश नक्सलवाद मुक्त हो गया है। अमित शाह ने तारीख तय करके इस समस्या को जड़ मूल से उखाड़ फेंका। उन्होंने 31 मार्च 2026 की तारीख तय की थी नक्सलवाद की समाप्ति के लिए और इसी तारीख को संसद में नक्सलमुक्त भारत होने की घोषणा कर दी। पाक प्रायोजित और आईएसआई से संचालित नेटवर्क को भी मोदी सरकार ने तोड़ दिया है। बाहरी सुरक्षा के क्षेत्र में भारत की ताकत को मई 2025 में सम्पूर्ण विश्व ने ऑपरेशन सिंदूर के रूप में देख लिया। आज हम रक्षा क्षेत्र में आयातक देश से निर्यातक देश बन गए है। हम ब्रह्मोस मिसाइल और तेजस विमान निर्यात करने की तैयारी में है।

मोदी है तो मुमकिन है, ये नारा अब 2047 में विकसित भारत के स्वप्न को भी साकार करेगा। हम अगले दो वित्तीय वर्ष में यानी कि लगभग 2030 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएंगे। सामाजिक,आर्थिक, और आंतरिक सुरक्षा के लिए देश को एक समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण कानून की भी सख्त आवश्यकता है। ये उम्मीद भी मोदी जी ही निकट भविष्य में पूरी करेंगे।

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

June 5, 2026

राजनैतिक तथा सामाजिक बदलाव के 12 वर्ष

Posted on 05.06.2026
मृत्युंजय दीक्षित
बारह वर्ष पूर्व 26 मई को भारतीय राजनीति में एक स्वर्णिम अध्याय का आरम्भ हुआ । देश में पहली बार पूर्ण बहुमत की विशुद्ध गैर कांग्रेसी सरकार बनी। वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्र प्रथम की भावना से ओतप्रोत राजनीति का मंगल युग आरम्भ हुआ, जिसने भारत के जन जन आकांक्षाओं विस्तार दिया। सरकारी फाइलों में दब चुके सपनों ने चन्द्रमा पर उतर कर भारतीय ध्वज फहरा दिया, अंतरिक्ष की सैर कर आए और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था बनने की ओर चल पड़े। ये भारत के “फ्रेजाइल फाइव” से “टॉप फाइव” की यात्रा के बारह वर्ष हैं। मोदी सरकार का यह 12 वर्षों का कार्यकाल राष्ट्र के पुनर्निर्माण का काल है। भारत वैश्विक पटल पर एक ग्लोबल लीडर के रूप में स्थापित हो रहा है। आज युद्ध और राजनैतिक अस्थिरता के समय भी जब विश्व के कई देशों में सत्ता परिवर्तन हो रहे हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बनी हुई है।
सामान्य नागरिक जीवन से राष्ट्र जीवन तक एक भी ऐसा पक्ष नहीं है जो नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी विचारों से अछूता रहा हो – स्वच्छ भारत मिशन और मेक इन इंडिया से लेकर रक्षा आत्मनिर्भरता, आयुष्मान भारत और सांस्कृतिक पुनरोदय तक सभी नए भारत को गढ़ रहे हैं संकल्प से सिद्धि की यह यात्रा अद्भुत है।
भाजपा के तीन पारंपरिक संकल्पों की सिद्धि: सनातन समाज के श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ को राजनैतिक समर्थन देने के श्री लाल कृष्ण अडवाणी के निर्णय के बाद भाजपा का राजनैतिक कद तेजी से बढ़ा। श्री राम जन्मभूमि स्थल पर भव्य श्री राममंदिर का निर्माण भाजपा के एजेंडे में आया। परिस्थितियां ऐसी हो गयीं कि विरोधी, “मंदिर वहीं बनायेंगे” के नारे में “लेकिन तारीख नहीं बताएँगे“ जोड़कर पार्टी और उसके समर्थकों का उपहास करने लगे। आज श्री रामजन्मभूमि स्थल पर भव्य श्री राम मंदिर बन चुका है और पूरे विश्व के हिन्दू समाज को गर्व की अनुभूति करा रहा है।
इसी प्रकार भाजपा का दूसरा प्रमुख नीतिगत विषय धारा 370 रहा जिसके लिए डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जे अपना जीवन तक अर्पित कर दिया। कश्मीर की विभाजनकारी पार्टियाँ चुनौती देती रहीं कि 370 हटी तो कोई यहाँ तिरंगा उठाने वाला नहीं रहेगा लेकिन 370 भी हटी, 35 ए भी हटी और आज कश्मीर राष्ट्र की मुख्यधारा में बह रहा है। समान नागरिक संहिता भाजपा का तीसरा परंपरागत मुद्दा था जिस पर भाजपा की सशक्त राज्य सरकारें एक -एक कर निर्णय ले रही हैं और राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू होती जा रही है।
आतंकवाद के विरुद्ध शुन्य सहनशीलता तथा रक्षा आत्मनिर्भरता : भारत में 2014 के बाद भी कुछ बड़े आतंकी हमले हुए किंतु मोदी काल में भारत ने उनका भीषण प्रतिकार किया। वर्ष 2025 में पहलगाम में हुए हमले के प्रतिरोध में किए गए भारत के ऑपरेशन सिंदूर की धमक पूरे विश्व में सुनाई दी । नया भारत शत्रु के घर में घुसकर वार करता है। भारत ने आतंकवाद व सीमा पार खतरों को देखते हुए अपनी सेनाओं को लगातार मजबूती प्रदान कर रहा है। अब भारत आधुनिकतम स्वदेशी मिसाइलों, ड्रोन तथा रक्षा तकनीक का विकास कर रहा है। सुरक्षा खतरों को देखते हुए अब स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम भी विकसित किये जा रहे हैं । उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में रक्षा गलियारे विकसित किये जा रहे हैं।
आत्मनिर्भर भारत : वर्तमान अनिश्चित वैश्विक परिस्थितियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का अभियान चला रहे हैं। मेक इन इंडिया के माध्यम से आयात पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जा रहा है। कोविड काल के बाद से लेकर अब तक सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों इलेक्ट्रानिक्स, फार्मास्युटिकल, ऑटोमोबाइल और टेक्सटाइल से लेकर सेमीकंडक्टर के निर्माण लिए विशेष योजनाओं का आरम्भ हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी ने एक तरफ “लोकल फॉर वोकल“ अभियान का श्रीगणेश किया दूसरी ओर “ईज ऑफ़ डुइंग बिजनेस” को प्राथमिकता दे रहे हैं।
अवस्थापना ढांचे में व्यापक बदलाव – मोदी सरकार ने जीवन की सरलता के लिए अवस्थापना ढांचे में व्यापक बढ़ोत्तरी करी है। आधुनिक एक्सप्रेस वे और विश्वस्तरीय एयरपोर्ट्स का जाल बिछाकर सरकार ने विकसित भारत को गति प्रदान की है। विज्ञान व अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी भारत अभूतपूर्व प्राग कर रहा है इसरो ने कई बड़े अभियान सफलतापूर्वक पूर्ण किए हैं। नया भारत नए उर्जा स्रोतों की ओर देख रहा है।
डिजिटल इंडिया अभियान – यूपीआई ने भारत की अर्थव्यवस्था को डिजिटल बनाया। आज दुनिया के कई देश भारत के डिजिटल मॉडल को अपना रहे हैं।
आर्थिक सुधार : जीएसटी की अर्थव्यवस्था ने देश की अर्थव्यवस्था को पारदर्शी बनाया है। जीएसटी ने कई करों को समाप्त कर एक एकल कर प्रणाली लागू की जिससे “एक राष्ट्र एक कर“ का सपना साकार हुआ।
भारत की सॉफ्ट पॉवर: भारत की योग, अध्यात्म, कला , संस्कृति और खेलों जैसी सॉफ्ट पॉवर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की वैश्विक चमक को धार दी। 21 जून को पूरा विश्व योग दिवस मनाता है। विश्व के कोने कोने से लोग कुम्भ मेले को समझने आए। खेलो इंडिया ने भारत की युवा शक्ति को वैश्विक मंचों के लिए तैयार किया । भारत के हैंडीक्राफ्ट को विश्व के मंचों पर पहचान मिली। नारी सशक्तीकरण को यह सरकार एक नए सोपान पर ले गई – मोदी जी ने नारी के नेतृत्व में सशक्तीकरण की बात कही। ट्रिपल तलाक की कुप्रथा की समाप्ति से लेकर नारी शक्ति वंदन अधिनियम और लखपति दीदी की मुस्कराहट तक आज का भारत स्त्रियों के साथ और उनके नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है
माओवाद से मुक्ति: प्रधानमंत्री नेंद्र मोदी के कार्यकाल की बड़ी सफलताओं में यदि नक्सली आतंक के सफाए और माओवाद से मुक्ति की बात न की जाए तो ये चर्चा अधूरी रह जाएगी। मोदी जी के नेतृत्व में वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह ने संकल्प लेकर 31 मार्च 2026 को नाक्साली आतंक की समाप्ति की बात कही थी और उअसको सिद्ध करके दिखाया।
आज केवल भारत ही नहीं वरन पूरा विश्व प्रधानमंत्री मोदी की ओर आशा की दृष्टि से देखता है। कोविड काल में भारत ने जिस प्रकार से वसुधैव कुटुम्बकम के ध्येय वाक्य को दृष्टिगत रखते हुए विभिन्न देशों की सहायता की, अपनी दृष्टि और मित्रता के स्वरूप स्पष्ट रखे, आतंकवाद पर दोहरा रवैया नहीं अपनाया जिसके परिणाम स्वरुप मोदी जी को 32 राष्ट्र अपना विशिष्ट सम्मान दे चुके हैं। प्रधानमंत्री को मिलने वाला ऐसा प्रत्येक सम्मान भारत का सम्मान है।
प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं.- 9198571540

June 3, 2026

करुणानिधि की दिग्भ्रमित संतति

Article 03.06.26

सर्वेश कुमार सिंह

तमिल राजनीति में प्रमुख स्थान रखने वाली पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) का आधारभूत सिद्धांत नास्तिकवाद है। किंतु वर्तमान परिवेश और राजनीतिक लालसा ने इसे हिंदुत्व विरोध के रूप में परिवर्तित कर दिया है। हाल के चुनाव में पराजय का मुंह देखने के बावजूद पार्टी हिंदुत्व विरोध की राजनीति को सुचारू रखना चाहती है।

हालांकि यह पार्टी का मूल सिद्धांत नहीं था। द्रमुक ने उग्र दक्षिणवाद, तमिल अस्मिता और धर्मनिरपेक्षता को आधार बनाया था। एम करुणानिधि व्यक्तिगत तौर पर नास्तिक थे। वे किसी भगवान या धर्म में आस्थावान नहीं थे। हिंदी, हिंदू परंपराओं का उन्होंने विरोध किया, किंतु कभी हिंदुत्व या सनातन को समाप्त करने की बात नहीं कही, जैसी कि उनकी तीसरी पीढ़ी की संतति द्वारा कही जा रही है। बल्कि उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में हिंदू मंदिरों के संरक्षण, हिंदू मंदिरों की संपत्ति की रक्षा के लिया कानून बनाए गए।

उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री रहते हुए एम करुणानिधि ने एक जनवरी 2000 को इस शताब्दी और सहस्राब्दी के पहले दिन कन्याकुमारी में संत तिरुवल्लुवर की प्रतिमा का अनावरण किया था। वे हिन्दू संस्कृति और संत परंपरा के महान विभूति थे। यह प्रतिमा तीन सागरो, सिंधु सागर, गंगा सागर और हिंद महासागर के तट पर स्थापित हुई। प्रतिमा 133 फीट ऊंची और 7000 टन वजन की है। संत तिरुवल्लुवर ईशा पूर्व 30 में चेन्नई के मलयापुर नगर में रहते थे। इनके द्वारा लिखी गई पुस्तक तिरुक्कुरल है, जिसमें 1330 दोहे है। जिन्हें 10/10 दोहों के 133 अध्यायों में विभक्त किया गया है। इस पुस्तक का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। तमिलनाडु में तिरुवल्लुवर के जन्म के आधार पर काल गणना की जाती है। तमिलनाडु में मकर संक्रांति के दो दिन बाद तिरुवल्लुवर दिवस मनाया जाता है। सार्वजनिक अवकाश भी होता है। विधानसभा की कार्यवाही आरंभ होने से पूर्व तिरुवल्लुवर की स्तुति होती है। इस हिंदू संत की प्रतिमा अनावरण से एम करुणानिधि ने परहेज नहीं किया था।

उन्होंने अपने कार्यकाल में कई हिन्दू हित के निर्णय लिए। एम करुणानिधि यथार्थवादी थे। उन्होंने रामसेतु पर प्रतिकूल टिप्पणी भी की थी। श्रीराम को काल्पनिक बताने वालों में करुणानिधि भी थे। किंतु सरकार में प्रमुख की भूमिका में उन्होंने कई हिन्दू पक्ष में फैसले लिए। उन्होंने ही पुजारियों को वेतन और पेंशन शुरू की। मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया, कुम्भाभिषेकम आरम्भ कराया। मंदिरों की जमीन बेचने से रोकने के लिए कानून बनाया। यह भी उल्लेखनीय है कि रामानुचार्य पर बने धारावाहिक की पटकथा एम करुणानिधि ने लिखी थी।

आज उन्हीं की संतति और पार्टी के लोग सनातन और हिंदुत्व को खत्म करने की बात करते है। द्रमुक के ही एक नेता वीरमणि ने 26 अप्रैल 2019 को एक कार्यक्रम में श्रीकृष्ण पर टिप्पणी कर दी थी। उन्होंने डीएमके भवन ने आयोजित कार्यक्रम में श्रीकृष्ण की तुलना यौन उत्पीड़न और जबरन वसूली करने वालों से कर दी थी। यह कार्यक्रम तमिल साप्ताहिक तुगलक में प्रकाशित उस लेख का जवाब देने के लिए आयोजित था, जिसमें कहा गया था कि सांस्कृतिक पतन की शुरुआत पेरियार युग आरम्भ होने के साथ हुईं।

एम करुणानिधि की राजनीतिक धारा को उनकी संतति ठीक से समझ नहीं पाई। यही वजह है कि उनके पोते उदयनिधि नास्तिकवाद को हिंदू विरोध का पर्याय मानकर उसका विरोध कर रहे है। उन्हें ये समझ और जानकारी ही नहीं है कि नास्तिकवाद के लिए भी हिन्दू दर्शन में उचित स्थान मिला है। वे द्रमुक को धर्मनिरपेक्ष के बजाय हिंदू विरोधी बना रहे है।

इसीलिए पूर्व मुख्यमंत्री एम के स्टालिन के बेटे और एम करुणानिधि के पोते उदयनिधि स्टालिन ने 12 मई को विधानसभा में नेता विरोधी दल की हैसियत से दिए भाषण में सनातन को समाप्त करने की बात कही। उन्होंने इसका आधार और औचित्य ये बताया कि सनातन बांटने की बात करता है। विभाजनकारी है। सनातन और हिंदुत्व विरोध की बात उदयनिधि ने पहली बार नहीं कही है। बल्कि 2 सितंबर 2023 को भी सनातन विरोधी बयान दिया था। इसमें उन्होंने सनातन को डेंगू और मलेरिया बताया था और इसे जड़ से खत्म करने की बात कही थी।

उनके बयानों पर पिता एम के स्टालिन ने सफाई देने की कोशिश की है। उन्होंने कहा मेरी पत्नी दुर्गा नियमित मंदिर जाती है, मैने कभी नहीं कहा क्यों जाती है। लेकिन ये सफाई अपर्याप्त है। उदयनिधि को सनातन समाज से क्षमा मांगनी चाहिए। साथ दी दादा एम करुणानिधि की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों की समझ को आत्मसात करना चाहिए।

लेखक लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।

संपर्क 9140624166

May 30, 2026

लोकतंत्र की सुरक्षा में पत्रकारिता की अहम भूमिका

Dileep Shrivastava Journalist

पत्रकारिता दिवस पर विशेष-

पत्रकारिता कभी एक मुकद्दस किताब थी, पढ़ने लगे लोग उपन्यासों की तरह
भारत में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे

दिलीप कुमार श्रीवास्तव
पत्रकारिता एक ऐसी विधा है,जो जनसाधारण व सरकार के बीच बेहतर समंजस ही नही करती बल्कि लोकतंत्र की सुरक्षा के बचाव का सबसे बड़ा माध्यम भी है।
जहां तक भारतीय हिन्दी पत्रकारिता का सवाल है, तो पंडित युगल किशोर शुक्ला द्वारा 30 मई 1826 में ‘उदंड मार्तण्ड ,हिंदी साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया गया था । जिसके कारण 30 मई को भारत में पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। जिसके गौरवशाली इतिहास के 200 वर्ष पूरे होने जा रहे। वही 1830 में राजा राममोहन राय ने बहुभाषी हिंदी साप्ताहिक वंगदूत का प्रकाशन किया था।
वर्तमान दौर की पत्रकारिता कि जिसके संबंध में काफी समय पूर्व”” साहित्यकार, पत्रकार अवधेश श्रीवास्तव ने किसी मंच से कहा था एक समय था जब अखबार में छपी खबर गीता, कुरान तथा बाइबिल की तरह पवित्र व प्रमाणित मानी जाती थी और आम जनता उसे साक्ष्य के रूप में विभिन्न स्थानों पर प्रस्तुत करती थी”। किंतु वर्तमान दौर में लोग यह कहने में कोई संकोच नहीं करते कि ” अखबार में कुछ भी छप जाता है, और कुछ भी छुपवा लो”।
90 के दशक में अखबारों में छपी खबरों पर लोकसभा, राज्यसभा तथा विधानसभा में गरमा-गरम बहस व चर्चाएं होती थी तथा विपक्ष उन खबरों के बारे में सत्तापक्ष से जवाब मांगता था। वह सब गुजरी हुई बात अब हो गई है अब तो अखबारों में मुद्दों को समस्याओं पर संपादकीय भी देखने को नहीं मिलती है, बल्कि संपादकी ए सरकार के गुणगान से भरी होती है।
वर्तमान पत्रकारिता के गिरते स्तर और विश्वसनीयता के संकट के लिए कोई एक व्यक्ति या संस्था नहीं, बल्कि मीडिया संस्थानों का व्यावसायिक हित, राजनीतिक दबाव, सोशल मीडिया की जल्दबाजी और दर्शकों की बदलती पसंद सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं, पत्रकारिता की साख गिरने के मुख्य कारण व्यावसायिकरण और टीआरपी की दौड़,समाचार व पत्रकारिता अब जनसेवा व मिशन न होकर एक ‘उत्पाद’ बन गए हैं। विज्ञापन के दबाव में गंभीर मुद्दों के बजाय सनसनीखेज खबरों को प्राथमिकता दी जाती है। मीडिया घरानों के अपने व्यावसायिक और राजनीतिक हित हैं। पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग के कारण लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।सोशल मीडिया का प्रभाव-
फेसबुक, और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर ‘सबसे पहले’ खबर देने की होड़ में बिना पुष्टि के फर्जी खबरें प्रसारित हो जाती हैं।
पत्रकारों की नौकरी में असुरक्षा- अपवाद स्वरूप अगर कुछ संस्थाओं को छोड़ दिया जाए तो तमाम संस्थान अपने पत्रकार को वेतन एवं मानदेय तक नही देते। और न ही मीडिया संस्थान पत्रकार की योग्यता व शिक्षा पर ध्यान देते हैं बल्कि एजेंसी लो,विज्ञापन दो और पत्रकार बन जाओ की तर्ज पर कार्य करते । यही नही कई संस्थानों में पत्रकारों को पर्याप्त वेतन न मिलना और नौकरी की अनिश्चितता उन्हें दबाव में काम करने या समझौता करने के लिए मजबूर करती है। सनसनीखेज हेडलाइन डिजिटल मीडिया और यूट्यूब पर व्यूज पाने के लिए भ्रामक हेडलाइंस का उपयोग किया जाता है, जो पाठकों को गुमराह करते हैं।इस गिरावट में मीडिया मालिकों, संपादकों, राजनीतिक दलों और कहीं न कहीं उन दर्शकों/पाठकों की भी जिम्मेदारी है जो गंभीर विश्लेषण के बजाय मसालेदार खबरें देखना पसंद करते।

उदन्त मार्तण्ड: हिंदी पत्रकारिता के सूर्य का ‘द्विशताब्दी’ शंखनाद

 

✍️ प्रणय विक्रम सिंह

*​30 मई 1826…*
यह केवल एक तिथि नहीं, हिंदी चेतना के क्षितिज पर उगे उस प्रथम सूर्य का स्मृति-दिवस है, जिसने भारतीय भाषायी अस्मिता के अंधकार को पहली बार अपने स्वाभिमानी प्रकाश से आलोकित किया। कलकत्ता की औपनिवेशिक गलियों में जब अंग्रेजी सत्ता अपने साम्राज्य का विस्तार कर रही थी, तब उसी शहर से ‘उदन्त मार्तण्ड’ नामक एक ऐसा पत्र निकला, जिसने भारतीय मन की मौन वेदना को वाणी दी।​’उदन्त’ अर्थात समाचार और ‘मार्तण्ड’ अर्थात सूर्य। यह नाम ही अपने भीतर एक समूचा घोष समेटे हुए था… समाचारों का सूर्य, जनचेतना का सूर्य, हिंदी स्वाभिमान का सूर्य।

​कानपुर की मिट्टी में जन्मे साहसी विद्वान पंडित जुगल किशोर शुक्ल द्वारा संपादित यह साप्ताहिक पत्र प्रत्येक मंगलवार को प्रकाशित होता था। शुक्ल जी ने शायद तब यह नहीं सोचा होगा कि उनके हाथों से रोपा गया यह छोटा सा पौधा आगे चलकर हिंदी पत्रकारिता की विराट वटवृक्षीय परंपरा का बीज बन जाएगा।

​उस दौर में सत्ता की भाषा अंग्रेजी थी और प्रशासन की भाषा फारसी। हिंदी बोलने वाला समाज विशाल तो था, किंतु उसकी पीड़ा, उसकी परंपरा और उसके प्रश्न उपेक्षित थे। पत्रकारिता का आकाश विदेशी और क्षेत्रीय भाषायी पत्रों से भरा था, किंतु हिंदी वहां अनाथ-सी खड़ी थी। ऐसे समय ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन केवल एक पत्र का आरम्भ नहीं, बल्कि भाषायी पराधीनता के विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध का शंखनाद था।

​यह वह समय था जब छापाखाना तकनीक नहीं, विचारों का रणक्षेत्र हुआ करता था। हर छपी हुई पंक्ति सत्ता की आंखों में आंखें डालने का साहस रखती थी। ऐसे समय हिंदी में समाचार पत्र निकालना किसी दीपक का आंधियों से संघर्ष करने जैसा था। आर्थिक संकट, पाठकों की सीमित संख्या, वितरण की कठिनाइयां और अंग्रेजी शासन की उपेक्षा, इन सबके बीच उदन्त मार्तण्ड ने अपनी लौ जलाए रखी। अपनी तपिश कम नहीं होने दी।

​किन्तु विडंबना देखिए, जिस हिंदी समाज की आवाज बनने के लिए यह पत्र निकला था, अंग्रेजी सत्ता ने उसकी राह में कांटे बिछाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। डाक-व्यवस्था में सहयोग न मिलने और संसाधनों के अभाव के कारण लगभग डेढ़ वर्ष बाद, 4 दिसंबर 1827 को इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा। परंतु इतिहास में आयु नहीं, प्रभाव देखा जाता है।

​’उदन्त मार्तण्ड’ का जीवन भले अल्प रहा हो, किंतु उसकी ज्योति अमर हो गई। पत्रकारिता केवल समाचार का माध्यम नहीं रही। वह स्वतंत्रता संग्राम की शंखध्वनि बनी, सामाजिक सुधार का स्वर बनी, जनजागरण का जन्तर बनी। स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में हिंदी पत्रकारिता ने कलम को तलवार बना दिया। अंग्रेजों की बंदूकें जहां शरीरों को घायल करती थीं, वहीं हिंदी के पत्र साम्राज्यवाद की वैचारिक नींव पर प्रहार करते थे। गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रताप, माखनलाल चतुर्वेदी का कर्मवीर, और भारतेंदु की लेखनी ये सब उसी परंपरा की संततियां थीं, जिसकी पहली सांस उदन्त मार्तण्ड ने ली थी।

हिंदी पत्रकारिता का यह प्रथम सूर्य आगे चलकर एक ऐसे आकाश में बदल गया, जिसमें भारतेंदु हरिश्चंद्र, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, अज्ञेय, धर्मवीर भारती और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे असंख्य नक्षत्र चमके।

​आज जब ‘उदन्त मार्तण्ड’ के दो सौ वर्ष (द्विशताब्दी) के पड़ाव के समीप हम खड़े हैं, तब भारत एक नए संचार युग के द्वार पर है। मोबाइल की स्क्रीन ने मुद्रित पन्नों की जगह ले ली है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) समाचारों की गति तय कर रही है। सूचना का विस्फोट तो हुआ है, परंतु सत्य का संतुलन डगमगा रहा है। खबरें अब तथ्य से अधिक ‘एल्गोरिदम’ और ‘ट्रेंड’ का हिस्सा बन गई हैं।

​ऐसे समय ‘उदन्त मार्तण्ड’ की स्मृति हमें हमारे दायित्व की याद दिलाती है। यह सिखाता है कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, समाज को सजग करना है। आज जब हिंदी को ‘हिंग्लिश’ बनाने या अनुवाद की बैसाखियों पर टिकाने की कोशिश होती है, तब ‘मार्तण्ड’ हमें हमारी जड़ों की याद दिलाता है। यह स्मरण कराता है कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, भारत की सांस्कृतिक स्मृति की संवाहिका है।

​हिंदी पत्रकारिता का यह द्विशताब्दी क्षण आत्ममंथन का अवसर है। प्रश्न यह है कि क्या आज की पत्रकारिता उतनी ही जनपक्षधर है? क्या वह भाषा की आत्मा को बाजार के दबाव से बचा पा रही है? यदि इन प्रश्नों के उत्तर खोजने हैं, तो हमें उस छोटे-से साप्ताहिक पत्र की ओर लौटना होगा, जिसने बिना संसाधनों के भी सत्य की मशाल जलाई थी।

​’उदन्त मार्तण्ड’ केवल इतिहास का पन्ना नहीं, हिंदी आत्मा का प्रथम उच्चारण है। वह भारतीय पत्रकारिता के आकाश में उगा वह शाश्वत अरुणोदय है, जिसकी लालिमा आज भी हिंदी चेतना के क्षितिज को गौरवान्वित कर रही है।

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