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पश्चिम बंगाल सरकार के 100 दिन- शुभेंदु के साहसिक निर्णयों से बदलता बंगाल

August 19, 2026

पश्चिम बंगाल सरकार के 100 दिन- शुभेंदु के साहसिक निर्णयों से बदलता बंगाल

Mratunjay Dixit, Journalist lucknow
मृत्युंजय दीक्षित
पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अपने पहले सौ दिन सफलतापूर्वक पूर्ण कर लिए हैं। ये आरंभिक सौ दिन भरोसा दिलाते हैं कि साहसिक निर्णय लेते हुए ये सरकार अपने चुनावी संकल्प पत्र को अक्षरशः सिद्ध करेगी। बंगाल सरकार ने प्रदेश के नागरिकों के समक्ष लिए गए अपने उद्योग, स्वास्थ्य, शिक्षा, सेवा और सुशासन के संकल्पों को क्रियान्वित करना आरंभ कर दिया है। सीमा सुरक्षा के लिए बाड़ लगाने के काम के साथ-साथ प्रदेश के आम जन को सुरक्षा का वातावरण देने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। प्रदेश में भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता एवं भारतीय साक्ष्य अधिनिमय लागू कर दिया गया है। सेवा कार्यों के अंतर्गत पेंशन योजना में वृद्धि तथा मां आहार कैंटीन में मछली -चावल की व्यवस्था कर दी गई है। बंद पड़े उद्योग खुल रहे हैं।
जब शुभेंदु अधिकारी ने उत्तर प्रदेश के भगवा वस्त्र धारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चरण स्पर्श कर अपना कामकाज संभाला था तभी यह स्पष्ट हो गया था कि बंगाल भी योगी जी के पदचिन्ह्नों पर चलने वाला है। बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी अत्यंत तीव्रता के साथ त्वरित निर्णय लेकर हिंदू समाज का भरोसा जीत रहे हैं। बंगाल में सत्ता संभालते ही शुभेंदु ने कई निर्णय लिए जिनमें योगी जी के निर्णयों की झलक दिखाई पड़ रही है। धार्मिक स्थानो पर लाउडस्पीकर बंद करवाना तथा उनकी आवाज धीमी करवाना, अवैध बूचड़खानों पर बुलडोजर एक्शन, सभी विद्यालयों में सम्पूर्ण वंदेमातरम का गायन अनिवार्य करना इसके कुछ प्रमाण हैं। बंगाल की सड़कों पर नमाज व अन्य धार्मिक गतिविधियों पर पाबंदी भी लगा दी गई है जिसको लेकर मुस्लिम समाज के लोग सडकों पर उतर आए तथा कोलकाता में पुलिस चौकी पर हमला बोल दिया तथा शहर को दंगों की आग मे झोंकने का प्रयास किया। दंगाइयों से निपटने में भी शुभेंदु सरकार ने योगी जी जैसा संकल्प दिखाया।कोलकाता के जिस थाने पर दंगांइयो ने हमला करने का प्रयास किया था वहां मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी स्वयं पहुंचे और पुलिस बल का मनोबल हुए बढ़ाते हुए दंगाइयों व उपद्रवियों के प्रति जीरो टालरेंस नीति अपनाने को कहा।
सौ दिनों के अन्दर हुए निर्णयों में वर्ष 2021 के चुनावों के बाद बंगाल में हुई राजनैतिक हत्याओं व हिंसक घटनाओं की सभी फाइलें खोलने का आदेश जारी होना भी है। इस निर्णय से घबरा कर ममता बनर्जी हाईकोर्ट पहुंच गयीं और 2021 की हिंसा से ध्यान भटकाने के लिए 2026 के चुनाव के बाद घटी कुछ छिटपुट घटनाओं को सनसनीखेज बताने का असफल प्रयास किया। बंगाल में केंद्रीय जांच एजेंसियों का प्रवेश संभव गया है जिससे प्रदेश में पिछले 69 वर्षों मे हुए भ्रष्टाचार की जांच में गति आ रही है। ईडी ने ममता बनर्जी के कई बड़े नेताओं को हिरासत में भी ले लिया है।
बंगाल के मुख्यमंत्री शभेंदु अधिकारी ने पदभार ग्रहण करते ही सीमा क्षेत्र में 145 एकड़ भूमि बीएसफ को देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। सरकार का यह निर्णय बांग्लादेशी घुसपैठ की रोकथाम के लिए अहम है क्योंकि बंगाल की बांग्लादेश से लगी हुई जो लंबी सीमा खुली हुई थी उससे बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठिए आसानी से प्रवेश कर लेते थे और देश के अन्य हिस्सों में घुस जाते थे। अब इस सीमा पर फेंसिंग हो रही है।
बंगाल में मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देने वाली व धर्म के आधार पर चलने वाली सभी योजनाएं बंद कर दी गई हैं। नई सरकार वोटबैंक के पुराने ढर्रे को ध्वस्त करने के एजेंडे पर आगे बढ़ चुकी है। बंगाल कैबिनेट ने धर्म के आधार पर चलाई जा रही सभी वित्तीय सहायता योजनाओं को पूरी तरह से बंद कर दिया है। यह मात्र एक प्रशासनिक फैसला नहीं अपितु बंगाल की राजनीतिक दिशा को बदलने वाला एक वैचारिक परिवर्तन है।चुनावी बिसात पर इमामों, मुअज्जिनों और पुरोाहितों के लिए शुरू की गई मासिक भत्ता योजनाएं पूरी तरह से बंद कर दी गई हैं। उधर कोलकाता के युवाभारती क्रीडांगन परिसर में लगी व फुटबालर की आधी प्रतिमा को तोड़ने की घोषणा की है साथ ही इसे बंगाल सरकार की विभिन्न वेबसाइट से भी हटाया जा रहा है।
दिसंबर 22 में अर्जेटीना के फुटबॉलर मेसी के कार्यक्रम में मची भगदड़ और कुप्रबंधन की जांच की जाएगी, उस घटना की फाइलें खोलने के आदेश जारी हो चुके हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी व अन्य सभी सहयोगी मंत्री यह बात लगातार कह रहे हैं कि जिन लोगों ने बंगाल को लूटा और जनता के मन मे भय पैदा किया उन सभी पर कार्यवाही जरूर की जाएगी जिसका असर स्पष्ट रूप से दिख भी रहा है। बंगाल में पड़ोसी राज्यों से ट्रकों की आवाजाही के दौरान जो कटमनी टीएमसी के लोग वसूलते थे वह बंद हो चुकी है। बंगाल का आलू अब पूरे भारत मे भेजा जा सकेगा।
पूर्व मुख्यमंत्री के निजी अहंकार के कारण बंगाल की जनता आयुष्मान भारत जैसी महत्वपूर्ण योजना के लाभ से वंचित थी 15 अगस्त 2026 से आयुष्मान भारत योजना बंगाल में लागू हो चुकी है। भाजपा ने बंगाल की महिलाओं से किए गए वादों को पूरा करने की दिशा में भी काम करना आरंभ कर दिया है। एक जून 2026 से महिलाओं को 3000 रुपये की मासिक सहायता वाली अन्नपूर्णा योजना को मंजूरी दे दी गई है, बस में फ्री यात्रा की सुविधा भी प्रारंभ हो चुकी है।
बंगाल की धरती पर वंदेमातरम की गूंज व जयश्रीराम का नारा सुनाई दे रहा है। बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिरकारी की कार्य शैली में भाजपा के दो सर्वाधिक लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों योगी आदित्यनाथ व मुख्यमंत्री हिमंता की छाप दिख रही है। बंगाल परिवर्तन की डगर पर चल पड़ा है।
प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं. – 9198571540

August 7, 2026

सार्थक पहल

Editorial 07.08.2026 Time 09.37 AM, by Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News , UP News, UP Samachar Sewa

सर्वेश कुमार सिंह

गुरुवार को युवाओं से संवाद और युवा नीति विषयक सार्थक पहल हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने मुंबई में 2000 जेन जी और जेन अल्फा से संवाद किया। संवाद का आयोजन आईआईएम यूएस कैंपस की ओर से किया गया। इसमें 11 से 19 वर्ष के छात्रों को देश भर से आमंत्रित किया गया। इस पहल को करने का श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ही है, क्योंकि उनकी पहल पर ही यह कार्यक्रम आयोजित हुआ।

संघ के सरसंघचालक डॉ भागवत ने खुलकर अपने विचार रखे और प्रश्नों के उत्तर दिए। उन्होंने कहा आज की युवा पीढ़ी हमारी पीढ़ी से अधिक ईमानदार और देशभक्त है। आंदोलन और प्रदर्शन संविधानिक अधिकार है। उन्होंने आरक्षण पर भी अपना मत प्रकट किया। डा मोहन भागवत ने कहा आरक्षण असमानता दूर करने के लिए लागू किया गया था। अत: जब तक समाज में आर्थिक, सामाजिक असमानता है तब तक आरक्षण जारी रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग आरक्षण से सक्षम हो गए हैं उन्हें स्वेच्छा से आरक्षण का लाभ लेना छोड़ना चाहिए।

दूसरी पहल उत्तर प्रदेश से हुई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने युवा नीति बनाने और राज्य युवा आयोग के गठन की घोषणा की। उन्होंने अधिकारियों की बैठक बुलाकर निर्देश दिए कि युवा नीति बनाने के लिए विद्यार्थियों, युवा पेशेवरों, खिलाड़ियों, उद्यमियों से वार्ता की जाय। उन्होंने युवा आयोग बनाकर नीति निर्धारण की रूपरेखा प्रस्तुत करने की जानकारी दी। अब उम्मीद है कि शीघ्र ही उत्तर प्रदेश में युवा आयोग का गठन होगा। इसके बाद युवाओं के हितों के लिए युवा नीति बनाई जाएगी।

युवाओं से जुड़ी ये दोनों पहल सामयिक हैं। आज युवा उद्वेलित है। इसके कई कारण है। पहला कारण है सूचना का तीव्र प्रवाह। दूसरा है ऊंची उड़ान के सपने देखना। तीसरा तत्काल परिणाम की अभिलाषा। हालांकि ये सभी सार्थक और अपेक्षित हैं, किंतु इन्हें संतुलित होना चाहिए। हाल का नीट परीक्षा से जुड़ा आंदोलन और रांची का छात्र आंदोलन इन्हीं कारकों के परिणाम है। इन पर गंभीरता और ईमानदारी से चिंतन, मनन और निर्णय की आवश्यकता है। ये काम केंद्र सरकार को यथाशीघ्र आरम्भ करना चाहिए। लेकिन केंद्र सरकार किन्तु, परंतु में उलझी है। वह आंदोलनकारियों के सहयोगियों और मददगारों की खोज में लगी है। जबकि तत्काल कारण के मूल में जाने की जरूरत है। यह कार्य आरएसएस और यूपी सरकार ने शुरू कर दिया है। इसके लिए डा मोहन भागवत और योगी आदित्यनाथ की दूरदृष्टि पूर्ण पहल सराहनीय है। युवाओं को सही दिशा देना, उनके भविष्य के बारे में सोचना राज्य की जिम्मेदारी है।

आज जो सूचना युवा ग्रहण कर रहे हैं उसका स्रोत डिजिटल है। ये स्रोत अनियंत्रित और अप्रमाणित सूचनाओं के प्रवाह का समुद्र है। इसपर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। सरकार, समाज, संगठनों को ऐसे प्रयास करने होंगे कि युवाओं को प्रमाणित और सत्य सूचना मिले। ताकि वे उसी पर धारणा बनाएं। इसके लिए युवाओं में समाचार पत्र, पत्रिकाएं, पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति जगाने के लिए कार्य योजना बनानी होगी।

ऊंची उड़ान के सपने देखना हमेशा अच्छा होता है। इसलिए इसे सही दिशा देने की सार्थक रणनीति बनानी होगी। सपना कैसे पूरा हो इसके लिए उन्हें दक्ष बनाना होगा। तीसरा तत्काल परिणाम की लालसा को नियंत्रित करने के लिए युवाओं को बताना पड़ेगा कि कोई भी लक्ष्य मार्ग पर चलकर ही प्राप्त किया जा सकता है। तेज दौड़ या छलांग लगाकर नहीं।

देश और समाज ने इन विषयों पर समय रहते चिंतन कर लिया जाए और युवाओं को सदी दिशा दे दी तो ये ऊर्जा राष्ट्र निर्माण करेगी। भारत का चतुर्दिक विकास होगा। यदि विलम्ब या चूक हुई तो स्थिति प्रतिकूल भी हो सकती है।

सुकून की बात यह है कि विश्व के सबसे बड़े संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ये पहल कर दी है।

August 5, 2026

सदन की गरिमा

Editorial

Editorial Posted on 04.08.2026 Wednesday, Time 09.23 AM by Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News

उत्तर प्रदेश विधान सभा में मंगलवार को विपक्ष के व्यवहार और आचरण से लोकतांत्रिक और संसदीय परंपराओं को भारी क्षति हुई है। समाजवादी पार्टी के विधायकों ने मुख्यमंत्री के परंपरागत भाषण, जो बजट अथवा अनुपूरक बजट प्रस्तुत करने के बाद होता है, उसमें व्यवधान किया। इतना ही नहीं सपा सदस्य सचिन यादव ने मुख्यमंत्री योगी की तस्वीर सदन में लहराई जोकि संसदीय परंपरा के प्रतिकूल तो है ही, सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला व्यवहार भी है। ये घटना अत्यंत निंदनीय है। इसने विपक्ष खासकर सपा के चरित्र को उजागर किया है। उनका आचरण ये भी दर्शाता है कि सपा का लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं में विश्वास नहीं है। विपक्ष के इस आचरण पर अध्यक्ष सतीश महाना ने कार्यवाही स्थगित कर दी।

लोकसभा, राज्यसभा और राज्यों की विधानसभाओं की ये स्थापित परंपरा रही है कि नेता सदन और नेता विपक्ष के भाषण बगैर किसी व्यवधान के सम्पन्न होते हैं। दोनों पक्ष उन्हें सुनते हैं और फिर उत्तर देते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश में विपक्ष के गैर मर्यादित आचरण से ये परंपरा टूट रही है। उन्हें या तो संसदीय अनुशासन का ज्ञान नहीं है अथवा वे जानबूझकर अनुशासन हीनता कर रहे हैं। इस अनुशासनहीनता से समाज में विधायकों और सदन की छवि धूमिल होती है। क्योंकि आजकल सदन की कारवाही की लाइव स्ट्रीमिंग होती है।

दरअसल उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के पास मुख्यमंत्री के भाषण का उत्तर ही नहीं होता है। इसलिए वे शोर शराबे, हंगामे का सहारा लेते हैं। विपक्ष बजट या अनुपूरक बजट पर चर्चा ही नहीं करना चाहता। कल भी सपा ने बजट पर कोई प्रतिक्रिया या विरोध नहीं दर्शाया। बल्कि राम मंदिर के चढ़ावा प्रकरण पर हंगामा किया।

सपा विधायकों के इस आचरण से सदन की गरिमा को ठेस पहुंच ही रही है, उसकी स्वयं की छवि भी धूमिल हो रही है।

@upvidhansabha @ upassambly

July 26, 2026

जरासंध’ की खुशी तात्कालिक है…

Dharmendra Pradhan Ex Education Minister

✍️ प्रणय विक्रम सिंह

इतिहास का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह युद्धभूमि में दिखाई देने वाले दृश्य को ही अंतिम सत्य मान लेता है। किंतु भारत की सभ्यता ने कभी केवल दृश्य को सत्य नहीं माना। उसने परिणाम से पहले उद्देश्य को देखा, विजय से पहले धर्म को देखा और पराक्रम से पहले बुद्धि को स्थान दिया।

यही कारण है कि इस भूमि ने उस पुरुष को भी भगवान कहा, जिसे उसके विरोधियों ने कभी ‘रणछोड़’ कहकर उपहास का विषय बनाया था।

कितना विचित्र है कि जिन श्री कृष्ण को गीता के उपदेशक, धर्म के संस्थापक, महाभारत के सूत्रधार और अधर्म के अंत का नायक माना जाता है, उन्हीं कृष्ण के नाम के साथ ‘रणछोड़’ शब्द भी जुड़ा। यदि केवल तत्कालीन जनमत से इतिहास लिखा जाता, तो शायद लोग यही कहते कि कृष्ण युद्धभूमि छोड़कर भाग गए। जरासंध स्वयं भी शायद यही समझ बैठा होगा कि उसने अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी को पराजित कर दिया है। लेकिन इतिहास कभी तत्कालीन शोर से नहीं लिखा जाता। इतिहास समय की अग्नि में तपकर अपना निर्णय देता है।

भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि प्रत्येक युद्ध रणभूमि में खड़े होकर नहीं जीता जाता। कभी-कभी एक कदम पीछे हटना ही अंतिम विजय की भूमिका बनता है। मथुरा से द्वारका का प्रस्थान ‘पलायन’ नहीं था, वह राष्ट्र, समाज और भविष्य की रक्षा के लिए लिया गया दूरदर्शी निर्णय था। उस समय जरासंध ने स्वयं को विजेता समझा होगा, पर इतिहास ने विजेता किसे माना? इतिहास ने रणछोड़दास को भगवान कहा, जरासंध को नहीं।

जरासंध की सबसे बड़ी भूल यह नहीं थी कि वह कृष्ण से लड़ता रहा। उसकी सबसे बड़ी भूल यह थी कि उसने हर बार पीछे हटते कृष्ण को पराजित समझ लिया। उसे दिखाई नहीं दिया कि कृष्ण युद्ध नहीं, समय चुन रहे हैं। यही कारण है कि उस दिन की जय-पराजय समय के साथ उलट गई। जरासंध अपने युग का विजेता कहलाया, लेकिन इतिहास का नायक नहीं बन सका। कृष्ण उस क्षण ‘रणछोड़’ कहे गए, किंतु काल ने उन्हें योगेश्वर के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया।

भारत का दर्शन हमें सिखाता है कि पीछे हटना और हार जाना समानार्थी शब्द नहीं हैं। जो व्यक्ति अपने अहंकार की रक्षा के लिए समाज को संकट में डाल दे, वह विजेता होकर भी पराजित है। और जो व्यक्ति अपने सम्मान का त्याग करके समाज की रक्षा कर ले, वह तत्कालीन आलोचना झेलकर भी इतिहास में विजेता बनता है। इसी कारण इस देश ने श्री राम को वनवासी होकर भी मर्यादा पुरुषोत्तम कहा, श्री कृष्ण को रणछोड़ होकर भी भगवान कहा और छत्रपति शिवाजी महाराज की आगरा से रणनीतिक वापसी को कायरता नहीं, राष्ट्रनीति माना।

राजनीति में भी यही कसौटी लागू होती है। नेतृत्व का अर्थ केवल संघर्ष करना नहीं है। नेतृत्व का अर्थ यह भी है कि किस संघर्ष को कहां समाप्त करना है, किस विवाद को कितना बढ़ने देना है और किस क्षण स्वयं को पीछे करके राष्ट्रहित को आगे रखना है। जो राजनेता केवल इसलिए अड़ा रहे कि कहीं उसे झुकना न पड़ जाए, वह नेतृत्व नहीं कर रहा होता, वह अपने अहंकार की रक्षा कर रहा होता है। सच्चा नेतृत्व वह है, जो जानता है कि कब तलवार उठानी है और कब म्यान में रख देनी है।

आज जब हम केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को देखते हैं, तो उसे केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इस निर्णय के पीछे जो भी राजनीतिक परिस्थितियां रही हों, एक तथ्य स्पष्ट है कि उन्होंने पद को राष्ट्र से बड़ा नहीं माना। उन्होंने स्वयं को विवाद का केंद्र बनाए रखने के बजाय पद छोड़कर व्यवस्था को आगे बढ़ने का अवसर दिया। लोकतंत्र में इससे असहमति हो सकती है, लोग इसे अलग-अलग दृष्टि से देख सकते हैं, किंतु यह प्रश्न अवश्य पूछा जाएगा कि यदि कोई नेता अपने पद से चिपका नहीं रहता, बल्कि परिस्थितियों को सामान्य बनाने के लिए पीछे हटता है, तो क्या उसे पराजित कह देना न्याय होगा?

केंद्रीय शिक्षा मंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान ने केवल एक मंत्रालय नहीं संभाला। नई शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकालने, मातृभाषा को सम्मान दिलाने, भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः स्थापित करने और इतिहास के अनेक उपेक्षित अध्यायों को शिक्षा के मुख्य विमर्श में लाने का प्रयास किया। दशकों तक जिस शिक्षा व्यवस्था पर वैचारिक एकरूपता का आरोप लगता रहा, उसमें विविध भारतीय दृष्टियों के लिए स्थान बनाने का प्रयास हुआ। इस दिशा में स्वाभाविक रूप से मतभेद भी हुए और समर्थन भी मिला।

शिक्षा पर बहस होनी चाहिए। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान भी होना चाहिए। विद्यार्थी यदि अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं तो वह लोकतांत्रिक अधिकार है। परीक्षा व्यवस्था में यदि कमियां हैं तो उनका कठोर सुधार भी होना चाहिए। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि छात्रों के वास्तविक प्रश्न किसी व्यापक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का साधन न बन जाएं। किसी भी लोकतंत्र में यह चिंता स्वाभाविक है कि युवाओं के असंतोष का उपयोग ‘वे’ लोग न करने लगें जिन्हें जनता ने चुनावों में स्वीकार नहीं किया, अथवा वे समूह जो किसी भी असंतोष को राजनीतिक अस्थिरता में बदलना चाहते हैं।

आज आवश्यकता उन प्रवृत्तियों को पहचानने की है जो छात्र आंदोलनों की ऊर्जा को अपने वैचारिक या राजनीतिक उद्देश्यों की दिशा में मोड़ने का प्रयास करती हैं। छात्र राष्ट्र की आशा हैं, उन्हें किसी भी प्रकार के राजनीतिक प्रयोग की प्रयोगशाला नहीं बनने देना चाहिए।

भारत का अनुभव यह भी बताता है कि हर जनभावना के साथ कुछ ऐसी राजनीतिक प्रवृत्तियां भी जुड़ जाती हैं, जो उस भावना को समाधान तक नहीं, टकराव तक ले जाना चाहती हैं। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां वास्तविक पीड़ा किसी और की थी और उसका राजनीतिक लाभ किसी तीसरे ने उठाया।

इतिहास गवाह है कि क्षणिक विजय के उत्सव अक्सर समय की धूल में खो जाते हैं, जबकि त्याग और धैर्य से लिए गए निर्णय पीढ़ियों तक स्मरण किए जाते हैं। जो लोग आज इस इस्तीफे को अंतिम विजय मान रहे हैं, उन्हें भी इतिहास के निर्णय की प्रतीक्षा करनी होगी। और जो लोग इसे अंतिम पराजय मानकर निराश हैं, उन्हें भी स्मरण रखना चाहिए कि भारत का इतिहास क्षणिक नारों से नहीं, दीर्घकालिक परिणामों से लिखा जाता है। जरासंध ने अपने समय में विजय का उद्घोष किया था। श्री कृष्ण ने नहीं। इतिहास ने दोनों का निर्णय स्वयं कर दिया।

मान-अपमान, जय-पराजय, पद-प्रतिष्ठा, ये सब समय के साथ बदलते रहते हैं। किंतु जो व्यक्ति राष्ट्र को स्वयं से बड़ा मानता है, वह इतिहास में कभी ‘छोटा’ नहीं होता। जरासंध को खुश होने दीजिए, विजय तो गुजरात वाले ‘रणछोड़दास’ को ही मिलेगी।

जंतर-मंतर: अराजकता का अखाड़ा

प्रणय विक्रम सिंह

यह जंतर-मंतर की सड़क है। यहां हर सुबह एक नई ‘क्रांति’ की बोली लगती है, और हर शाम उसकी लाश पर वैचारिक भाषणों के कसीदे पढ़े जाते हैं। जो लोग इतिहास और समाज के सतही पन्नों को पढ़कर संतुष्ट हो जाते हैं, वे इस जमावड़े को ‘जन-आक्रोश’ कह सकते हैं। किंतु यदि आप थोड़ा ठहरकर, भीड़ के कोलाहल को चीरते हुए उसके भीतर झांकें, तो आपको यथार्थ का वह घिनौना रूप दिखेगा, जहां नीट (NEET) के मासूम परीक्षार्थियों का भविष्य केवल एक मोहरा है, और असली खिलाड़ी परदे के पीछे बैठे विदेशी व राजनीतिक आका हैं।

‘आंदोलन’ तो व्यवस्था की सड़ी-गली नसों में न्याय की खौलती धारा प्रवाहित करने वाला वो महा-मन्थन है, जो सत्ता के अहंकार को पिघलाकर जन-आकांक्षाओं की नींव रखता है। किंतु जब असंतोष की यह पवित्र आग भाड़े के उपद्रवियों के हाथ की मशाल बन जाए, तो इतिहास बदलता नहीं, केवल लोकतंत्र का चीरहरण होता है। हमें यह कड़वा सच कबूल करना होगा कि व्यवस्था का विरोध और अराजकता का नग्न तांडव कभी एक नहीं हो सकते।

विरोध तो मर्यादा की ढाल पहनकर सत्य की ढली हुई शमशीर से लड़ा जाता है, जबकि यह अराजकता तो व्यवस्था की छाती को नोच-नोचकर अपनी राजनीतिक हवस मिटाने वाला वो खूंखार भेड़िया है, जिसकी लार में मासूमों के भविष्य का लहू मिला हुआ है।

जरा इन उपद्रवियों के चेहरों को गौर से देखिए। हाथों में उछलते पत्थर, पुलिस की गाड़ियों पर बर्बरता से टूटती भीड़ और देश की सुरक्षा में तैनात वर्दी पर झपटते नापाक हाथ! क्या ये इस मुल्क का मुस्तकबिल गढ़ने वाले मेधावी छात्र हैं? क्या रातों की नींदें जलाकर जीवन-दान देने का ख़्वाब देखने वाले नौजवान अपने ही रक्षकों की हड्डियों को चटखाने पर आमादा होंगे? हरगिज नहीं! यह किसी परीक्षा का दर्द नहीं, यह तो ‘डीप स्टेट’ का बुना वो जहरीला सिंडिकेट है, जो हर जायज असंतोष को लाशों के ढेर में तब्दील करने का फन जानता है। पर्चा लीक होने से टूटे बच्चों के अवसाद की महज़ आड़ ली गई है। मक़सद साफ़ है, मासूमों के सीने पर अपनी सियासत की तोप रखना और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारत की आबरू का सौदा करना।

किंतु, इस पूरे ख़ूनी ड्रामे का सबसे नंगा, सबसे ज़लील दृश्य तब दिखा, जब सच का आइना लिए डटी एक निष्पक्ष महिला पत्रकार को उग्र भीड़ ने चारों तरफ से घेर लिया। ज़रा उस ख़ौफ़नाक लम्हे की आग को महसूस कीजिए, जब सच की तलाश में निकली एक बेटी पर भेड़ियों का झुंड टूट पड़ता है, जहां उसकी आबरू को तार-तार करने की हिंसक कोशिश होती है, जहां धक्के, अपशब्द और मॉब-लिंचिंग की सड़ांध उसकी सांसों तक पहुंचने लगती है! उस वक़्त सड़क पर केवल एक पत्रकार का उत्पीड़न नहीं हो रहा था, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़ पर लात मारकर उसकी बची-कुची मर्यादा को लहूलुहान किया जा रहा था। जब सच बोलने वाली बेटी का गिरेबान खिंच रहा हो और कलम के मठाधीश ख़ामोश खड़े मुस्करा रहे हों, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र ज़िंदा नहीं, उसकी लाश का बाज़ार में सौदा हो चुका है!
उस वक़्त कहां दफ़्न हो गई थी निष्पक्षता के मसीहा बनने वाले इन मठाधीशों की आत्मा? अतीत में तमाचा खाकर जीवन भर ‘मज़लूमियत’ की भीख मांगने वाले आशुतोष हों, या रवीश, प्रसून और अजीत अंजुम जैसी पूरी जमात, सबकी बोलती पर ताले जड़े थे।

आंखों में अमानवीय शांति थी और मन में इस बात का घिनौना उल्लास कि शिकार उनके वैचारिक आकाओं के खेमे का नहीं था। जब थूककर चाटना ही पत्रकारिता का धर्म बन जाए, तो सहकर्मी की चीत्कार भी एजेंडे का संगीत लगती है। राजनीतिक आकाओं के जूठन पर पलने वाले इन नपुंसक चेहरों की रगों में अब निष्पक्षता का लहू नहीं, बल्कि चाटुकारिता का जहर दौड़ रहा है। जब कलम की स्याही सत्ता-विरोधी तुष्टीकरण और विदेशी फंडिंग के चेक से भरी जाने लगे, तो पत्रकार निर्भीक नहीं रहता, वह केवल एक वैचारिक भाड़े का टट्टू बनकर रह जाता है।
और इस पूरे अधर्म को खाद-पानी दे रही है आज की ‘रील-पीढ़ी’। इन राजनीतिक गिद्धों के लिए किसी छात्र की तबाह होती जिंदगी या किसी महिला पत्रकार की चीत्कार महज एक ‘डिजिटल अवसर’ है। मोबाइल का कैमरा ऑन हुआ तो बनावटी क्रांति का बाज़ार सज गया, और लाइव-स्ट्रीम बंद होते ही सारी वैचारिक निष्ठा कूड़ेदान में जा गिरी! इनके पास तर्कों का अकाल है, जबान पर गालियों का अमर्यादित शोर है, और न्याय की तड़प से बड़ा सोशल मीडिया का ‘एल्गोरिद्म’ हो चुका है। जो क्रांति, कैमरा ऑन होने पर शुरू और लाइव-स्ट्रीम बंद होने पर दम तोड़ दे, वह इतिहास की धारा नहीं मोड़ती… केवल डिजिटल कचरे का ढेर बनाती है!

स्याह झंडों और प्रायोजित सियासत के इस घिनौने खेल में आख़िर किसकी बलि चढ़ी? वही सच्चा छात्र! पचास हज़ार उपद्रवियों की एक घंटे की प्रायोजित हिंसा ने मुल्क की करोड़ों आंखों की स्वतःस्फूर्त सहानुभूति को एक ही झटके में जलाकर राख कर दिया। भीड़ में फेंका गया हर एक पत्थर व्यवस्था का कुछ नहीं बिगाड़ता, वह केवल किसी गरीब छात्र के घर में जलती हुई उम्मीद की मोमबत्ती को बुझा देता है। कल यह हिंसक भीड़ चली जाएगी, कुछ उग्र चेहरे नेता कहलायेंगे, कुछ डिजिटल दुनिया के सितारे बन जाएंगे और सियासी पार्टियां अपनी रोटियां सेंक कर निकल जाएंगी। लेकिन उस बदक़िस्मत छात्र का क्या? वह कल भी अपने कमरे में अधूरी किताबों और धुंधले भविष्य के साथ तन्हा बैठा था, और आज भी अनिश्चितता के अंबर तले अकेला ही अपनी किस्मत पर आंसू बहा रहा है!

रामायण के पन्ने पलटिए। रावण की दंभी सभा में जब सीता के सम्मान की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं, तब भी ज्ञानी कहलाने वाले मठाधीश चुपचाप उस अधर्म का आनंद ले रहे थे। आज का जंतर-मंतर उसी दंभी सभा का नया रूप है। लेकिन याद रखिए, गिद्धराज संपाती की तरह निष्पक्ष और दूरदर्शी सोच ही सत्य को बचाती है। रावण का अहंकार और उसकी सभा का सन्नाटा उसे महाविनाश से नहीं बचा पाया था।

फंडिंग के चेक एक दिन रीते होंगे, सियासी आकाओं का हाथ सिर से हटेगा और पत्थरों के दम पर खड़ा यह प्रायोजित तमाशा ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। सत्य का सूरज भले ही प्रायोजित बादलों में छुप जाए, लेकिन जब वह प्रकट होता है, तो झूठी क्रांतियों के सारे टिमटिमाते चिराग़ों को बेनूर कर देता है। जो आंदोलन न्याय की जगह ‘वायरल’ होने की होड़ में अपनी मर्यादा बेच देते हैं, वे कभी इतिहास का अमर पृष्ठ नहीं लिखते… वे महज इतिहास का सड़ता हुआ कचरा बनकर रह जाते हैं!

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