प्रणय विक्रम सिंह
‘स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकं परस्वत्वोत्पादनं दानम्’ के दिव्य उद्घोष से सिंचित इस धरा पर दान कोई भौतिक सौदा या व्यापार नहीं बल्कि आत्मा की परम शुद्धि और प्रभु के चरणों में सर्वस्व समर्पण का महामार्ग है, लेकिन आज राजनीति के कुछ आधुनिक कालनेमी प्रभु श्री राम के इस पावन दरबार में भी अपनी नफरत की दुकान चमकाने के लिए ‘कमीशन’ और ‘हिसाब’ का झूठा बखेड़ा खड़ा कर रहे हैं।
सत्ता से दूर होकर छटपटा रहे इन दिशाहीनों को शायद सनातन का गौरवशाली इतिहास नहीं मालूम, वरना तकादा करने से पहले वे अपने पूर्वजों की उस महान विरासत को याद कर लेते जहां दैत्यराज बलि ने भगवान वामन को तीन पग भूमि दान करते समय गुरु शुक्राचार्य के प्रबल विरोध के बाद भी अपने कदम पीछे नहीं खींचे थे और सर्वस्व सौंपने के बाद कभी लौटकर स्वर्ग की ‘रसीद बुक’ नहीं मांगी थी।
ठीक इसी त्याग परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सूर्यपुत्र कर्ण ने अपने प्राणों की रक्षा करने वाले कवच-कुंडल हंसते-हंसते काटकर इंद्र को दे दिए थे पर कभी यह पूछने नहीं गए कि उन्हें किस अलमारी में छिपाकर रखा गया है, और इसी सत्य की रक्षा के लिए महाराज हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र को अपना पूरा राज्य सौंपकर श्मशान में चांडाल की नौकरी स्वीकार की, जहां उनकी पत्नी और बच्चे तक बिक गए लेकिन उन्होंने कभी राजकोष के ‘ऑडिट’ का इंचार्ज बनने की इच्छा नहीं जताई।
जब महर्षि दधीचि ने देवताओं के वज्र के लिए अपने प्राण त्यागकर हड्डियां दान कर दीं और महाराज शिबि ने एक शरणागत पक्षी के लिए अपने शरीर का जीवित मांस तौल दिया, तब इनमें से किसी ने भी तराजू और रसीद लेकर विधाता को कटघरे में खड़ा नहीं किया था क्योंकि वे भली-भांति जानते थे कि प्रभु के चरणों में अर्पित वस्तु पर फिर इस नश्वर संसार का कोई वैधानिक दावा नहीं रह जाता।
परंतु आज की इस कलियुगी राजनीति में कुछ ‘प्रचारवीर’ चार साल बाद अचानक टीवी चैनलों पर बैठकर और हाथ में दान की तस्वीरें लहराकर चांदी की ईंटों और रसीदों का ऐसा हिसाब मांग रहे हैं जैसे उन्होंने प्रभु को दान नहीं बल्कि कोई कर्ज दिया हो। जिन्होंने खुद अपनी स्वेच्छा से समर्पण किया था, वे आज केवल अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए गबन का ढोंग रच रहे हैं क्योंकि वास्तव में यह पीड़ा राम मंदिर की सुरक्षा या उसकी मर्यादा की है ही नहीं, बल्कि यह पीड़ा मीडिया में ‘नाम चमकाने’ और अपने ‘अहंकार’ की तृप्ति न होने की छटपटाहट है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने सात्विक दान की परिभाषा बताते हुए स्पष्ट कहा है कि श्रेष्ठ दान वही है जो बिना किसी बदले की भावना या सम्मान की लालसा के दिया जाए, और हमारी लोक-परंपरा भी यही कहती है कि दाहिने हाथ से दो तो बाएं हाथ को पता न चले, अन्यथा वह दान नहीं बल्कि एक घटिया प्रदर्शन मात्र बनकर रह जाता है। आज करोड़ों हिंदुओं के एक-एक रुपए के पवित्र संकल्प और अटूट आस्था से यह भव्य और गगनचुंबी मंदिर खड़ा हुआ है, और जिन्हें इस दिव्य शिखर की ऊंचाई में, धवल फर्शों की भव्यता में और रामलला के श्रीचरणों के अलौकिक अलंकरण में अपना समर्पण दिखाई नहीं दे रहा, दोष निश्चित ही उनकी नियत और आंखों के राजनीतिक मोतियाबिंद का है।
भ्रम फैलाकर अपनी रोटियां सेकने वाले इन राजनीतिक गिद्धों को यह बात कान खोलकर सुन लेनी चाहिए कि राम मंदिर ट्रस्ट के एसबीआई लॉकर में सिंधी समाज द्वारा समर्पित सभी 200 चांदी की ईंटों के साथ-साथ कागभुशुंडि जी की दिव्य प्रतिमा, प्रभु का स्वर्ण धनुष-बाण, चरण पादुकाएं और भक्तों का अर्पित किया गया एक-एक आभूषण पूरी तरह सुरक्षित है।
इस सत्य को झुठलाने की कोशिश करने वाले भूल रहे हैं कि यह उत्तर प्रदेश है, जहां राम और राष्ट्र के आराधक योगी आदित्यनाथ जी महाराज मुख्यमंत्री की पद पर विराजमान हैं, जिनके राज में कोई चोर, कोई ठग या कोई कालनेमी बचकर निकल ही नहीं सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और मुख्यमंत्री योगी जी का अपना कोई निजी परिवार नहीं है बल्कि यह पूरा राष्ट्र ही उनका परिवार है जिसके स्वाभिमान और वैभव के लिए वे दिन-रात अपने तन-मन से जुटे हुए हैं। इसलिए समस्त रामभक्त इन देशद्रोहियों और बहरूपियों के बहकावे में न आएं और पूर्ण धैर्य रखें, क्योंकि रामजी के काम में विघ्न डालने वालों का समय आने पर इसी धरती पर दूध का दूध और पानी का पानी होगा और विधाता की लाठी से पाई-पाई का ऐसा मर्मभेदी हिसाब होगा जिसे इनकी आने वाली पीढ़ियां भी याद रखेंगी।
जय जय श्री राम
राष्ट्रहित सर्वोपरि।
भारत माता की जय!
वंदे मातरम! जय हिंद!

