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मुजफ्फरनगर में रोके गए कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय

January 15, 2026

मुजफ्फरनगर में रोके गए कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय

मुजफ्फरनगर, 15 जनवरी 2026, पिछड़ा वर्ग के युवक की मृत्यु पर संवेदना व्यक्त करने उसके घर जा रहे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को पुलिस ने खतौली में एक चेक पोस्ट पर रोक लिया। उन्हें आगे नहीं जाने दिया गया।

श्री राय पिछड़ा वर्ग के युवक रोहित कश्यप उर्फ सोनू (29) की मृत्यु होने पर उसके घर जाना चाहते थे। युवक का शव जली हुई अवस्था में मेरठ के सरधना क्षेत्र के जंगल से बरामद हुआ था। वह मूल रूप से मुजप्फरनगर जनपद का निवासी था। श्री राय ने कहा है कि वे सिर्फ संवेदना व्यक्त करने के लिए मृतक के परिवार से मिलने जाना चाहते थे।

अकेले चुनाव लड़ेगी बसपाः मायावती

भविष्य के सभी चुनाव हम अकेले लड़ेंगे, गठबंधन से होता है नुकसान

70nth Birth Day of BSP Chief Ms Mayawati

बसपा सुप्रीमो मायावती को उनके 70वें जन्म दिवस पर पुष्प गुच्छ भेंट करते पार्टी नेता सतीश चन्द्र मिश्र और आकाश आनन्द

लखनऊ, 15 जनवरी 2026 ( UP Samachar Sewa). बहुजन समाज पार्टी की मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा है कि वर्ष 2027 में होने वाले विधान सभा चुनाव हम अकेले लड़ेंगे। किसी भी दल से गठबंधन नहीं किया जाएगा। सुश्री मायावती अपने 70वें जन्म दिवस के अवसर पर आयोजित पत्रकार वार्ता को सम्बोधित कर रही थीं। इस अवसर पर उनके साथ वरिष्ठ नेता सतीश चन्द्र मिश्र और पार्टी के कोर्डिनेटर और मायावती के उत्तराधिकारी आकाश आनन्द भी मौजूद थे।

जन्म दिवस पर पार्टी नेताओं ने मायावती को पुष्प गुच्छ भेंट कर उनका स्वागत किया। इसके बाद बसपा सुप्रीमो ने ब्लू बुक के 21वें संस्करण का विमोचन किया। ब्लू बुक सुश्री मायावती की जीवनी है। इसमें उनकें जीवन, पार्टी के लिए संघर्ष और नीतियों का विवरण दिया जाता है। पत्रकारों से इस अवसर पर बातचीत में उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि आगामी चुनाव 2027 में वे किसी से गठबंधन नहीं करेंगीं। क्योंकि उन्हें गठबंधन से नुकसान होता है।

सुश्री मायावती ने कहा कि गठबंधन करने से उनका वोट तो दूसरी पार्टियों को ट्रांसफर हो जाता है लेकिन, अपर कास्ट का वोट उनके प्रत्याशियों को ट्रांसफर नहीं होता है। इससे हमें नुकसान होता है। उन्होंने कहा कि हम आगे होने वाले सभी चुनाव तब तक अकेले लडेंगे जब तक कि यह भरोसा नहीं हो जाएगा कि अपर कास्ट का वोट भी हमें ट्रांसफर होगा।

फाल्स सीलिंग में आग से मायावती की प्रेस कांफ्रेंस में अफरा तफरी

मायावती की प्रेस कांफ्रेंस में फाल्स सीलिंग में लगी आग बुझाते सुरक्षाकर्मी

मायावती की प्रेस कांफ्रेंस में फाल्स सीलिंग में लगी आग बुझाते सुरक्षाकर्मी

लखनऊ, 15 जनवरी 2026, पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा की सुप्रीमो मायावती की जन्म दिवस पर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में सभागार की फाल्स सीलिंग में आग गई। इससे उठे धुंए से प्रेस कांफ्रंस में अफरा तफरी मच गई।

जानकारी के अनुसार मायावती की पत्रकार वार्ता जब चल रही थी, तभी फाल्स सीलिंग से धुंआ निकलता दिखायी दिया। कुछ ही देर में धुंआ सभागार में फैल गया। इसके बाद सुरक्षा कर्मचारियों ने तत्काल फायर फाइटिंग उपकरणों से फाल्स सीलिंग में लगी आग पर काबू पा लिया। इसके पूर्व धुंआ उठता देख सुरक्षा कर्मचारियों ने मायावती को सुरक्षित बाहर निकाल लिया और सभागार को भी खाली करा लिया गया।

फाल्स सीलिंग में धुंआ उठने का कारण सार्ट सर्किट से लगी आग बतायी जा रही है।

मकर संक्रांति त्योहारों की परम्परा का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पर्व : मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री ने गोरखपुर में मकर संक्रांति के अवसर पर पत्रकारों से बात की

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गुरुवार को गोरखनाथ मन्दिर में गुरु गोरखनाथ को खिचडी प्रसाद अर्पित करते हुए

लखनऊ, 15 जनवरी, 2026   मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  ने प्रदेशवासियों को मकर संक्रांति के पावन पर्व की बधाई और शुभकामनाएं देते हुए कहा कि विगत दिवस से ही प्रदेश के लाखों श्रद्धालुगण पवित्र धर्म स्थलों पर जाकर अपनी आस्था का नमन कर रहे है। उनका सौभाग्य है कि ब्रह्म मुहूर्त में प्रातः 04 बजे श्री भगवान गोरखनाथ जी को आस्था की पवित्र खिचड़ी चढ़ाने का अवसर प्राप्त हुआ है। मुख्यमंत्री आज श्री गोरखनाथ मन्दिर, गोरखपुर में मकर संक्रांति के अवसर पर मीडिया प्रतिनिधियों को सम्बोधित कर रहे थेमुख्यमंत्री जी ने कहा कि शिवावतार भगवान गोरखनाथ जी को लाखों श्रद्धालु अपनी आस्था की पवित्र खिचड़ी चढ़ाने के लिए आये हुए हैं और वह निरन्तर पवित्र खिचड़ी चढ़ा रहे हैं। इसी प्रकार प्रयागराज संगम में लाखों श्रद्धालु, कल्पवासी और पूज्य संतजन प्रयागराज की धरती पर उपस्थित होकर न केवल अपनी साधना में रत हैं, अपितु भगवान वेणी माधव, भगवान प्रयागराज, मां गंगा, मां यमुना, मां सरस्वती के सान्निध्य में संगम में आस्था की पवित्र डुबकी लगा रहे हैं। यह सिलसिला लगातार आज भी जारी है।

मकर संक्रांति त्योहारों की परम्परा का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पर्व : मुख्यमंत्री

मकर संक्रांति पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में खिचड़ी प्रसाद अर्पित किया

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि मकर संक्रांति भारत के पर्व और त्योहारों की परम्परा का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पर्व है। वास्तव में भगवान सूर्य इस जगत की आत्मा है। जगतपिता सूर्य की उपासना का यह पर्व समस्त शुभ व मांगलिक कार्यों के लिए प्रशस्त तिथि मानी जाती है। अर्थात आज के बाद से सनातन धर्म की परम्परा में सभी मांगलिक कार्यक्रम प्रारम्भ हो जाएंगे। ज्योतिषीय परम्परा के अनुसार सूर्य का अयन वृत्त 12 विभिन्न भागों में विभाजित है। एक राशि से दूसरी राशि में सूर्यदेव का संक्रमण संक्रांति कहलाती है। जब भगवान सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में संक्रमण होता है, तब यह संक्रमण मकर संक्रांति कहलाती है। अर्थात अगले 06 माह मकर राशि से मिथुन राशि तक भगवान सूर्य उत्तरायण रहेंगे। उत्तरायण के समय दिन बड़े तथा रात्रि छोटी होती है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि जीवन्तता के लिए सूर्य का प्रकाश कितना महत्वपूर्ण है और भारत की ऋषि परम्परा ने जीवन के लिए कितना महत्व दिया है, इसका अनुमान इस पर्व के माध्यम से लगा सकते हैं। मकर संक्रांति का पर्व देश के पूरब, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण सभी हिस्सों में अलग-अलग नाम और रूप से आयोजित होता है। पूरब में बिहू या तिलवा संक्रांति, पश्चिम में लोहड़ी या मकर संक्रांति, दक्षिण भारत में पोंगल तथा उत्तर भारत में खिचड़ी संक्रांति के रूप में श्रद्धालुजन मकर संक्रांति का आयोजन श्रद्धाभाव से करते हैं। शुभ मुहूर्त कल सायं काल से ही प्रारम्भ हो चुका है। हमारे सनातन धर्म की परम्परा में मुहूर्त का शुभ लगन सूर्योदय के साथ प्रारम्भ होता है। आज ब्रह्म मुहूर्त से मकर संक्रांति में खिचड़ी चढ़ाने का मुहूर्त प्रारम्भ हो चुका है।

साम्राज्यवाद के विरुद्ध खड़ा होता ईरान

ईरान, ट्रंप और प्रतिरोध की राजनीति

सत्यवान सौरभ, लेखक, स्वतंत्र पत्रकार

डॉ. सत्यवान सौरभ
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ संघर्ष केवल सीमाओं या संसाधनों तक सीमित नहीं होते, वे विचारधाराओं, सत्ता-संतुलन और नैतिकता की भी परीक्षा लेते हैं। ईरान और अमेरिका के बीच दशकों से चला आ रहा टकराव ऐसा ही एक संघर्ष है, जो समय-समय पर नए रूपों में सामने आता रहा है। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान यह टकराव जिस तीव्रता और आक्रामकता के साथ उभरा, उसने वैश्विक राजनीति को एक बार फिर शीतयुद्धोत्तर दौर की अस्थिरता की याद दिला दी।
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही ईरान अमेरिका की रणनीतिक और वैचारिक राजनीति का लक्ष्य रहा है। अमेरिका ने ईरान को केवल एक राष्ट्र-राज्य के रूप में नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक राजनीतिक मॉडल के रूप में देखा—ऐसा मॉडल जो पश्चिमी प्रभुत्व, इज़राइल-केन्द्रित पश्चिम एशिया नीति और अमेरिकी साम्राज्यवादी सोच को चुनौती देता है। यही कारण है कि ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध, कूटनीतिक अलगाव और सैन्य दबाव लंबे समय से अमेरिकी विदेश नीति का हिस्सा रहे हैं।
डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में यह नीति और अधिक कठोर, असंवेदनशील और टकरावपूर्ण हो गई। 2015 में ईरान और विश्व शक्तियों के बीच हुए परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका का एकतरफा हटना न केवल कूटनीतिक असंतुलन का उदाहरण था, बल्कि यह भी दर्शाता था कि ट्रंप प्रशासन अंतरराष्ट्रीय सहमति और बहुपक्षीयता को किस हद तक नज़रअंदाज़ करने को तैयार था। इसके बाद ईरान पर “अधिकतम दबाव नीति” लागू की गई, जिसका उद्देश्य ईरानी अर्थव्यवस्था को घुटनों पर लाना और शासन को आंतरिक विद्रोह की ओर धकेलना था।
लेकिन इतिहास साक्षी है कि दबाव हमेशा झुकाव पैदा नहीं करता। कई बार वह प्रतिरोध को जन्म देता है। ईरान के मामले में भी यही हुआ। आर्थिक कठिनाइयों, प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के बावजूद ईरान ने अपने राजनीतिक अस्तित्व, संप्रभुता और वैचारिक पहचान को बनाए रखा। यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि ईरान का विरोध केवल अमेरिका की नीतियों से नहीं है, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था से है जिसमें कुछ गिने-चुने देश स्वयं को न्यायाधीश और शेष दुनिया को अभियुक्त मान लेते हैं।
“जैसी करनी वैसी भरनी” का सिद्धांत केवल नैतिक कहावत नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी गहराई से लागू होता है। पश्चिम एशिया में दशकों तक किए गए अमेरिकी हस्तक्षेप—इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया—ने क्षेत्र को स्थिरता नहीं, बल्कि अराजकता दी। लोकतंत्र के नाम पर सत्ता परिवर्तन, मानवाधिकारों के नाम पर सैन्य आक्रमण और आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के नाम पर निर्दोष नागरिकों की हत्या—इन सबने अमेरिका की नैतिक साख को गहरा नुकसान पहुँचाया। ऐसे में जब ईरान अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देता है, तो वह केवल अपनी रक्षा नहीं कर रहा, बल्कि उस व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है, जो ताकत को ही न्याय मानती है।
ट्रंप की विदेश नीति का एक और खतरनाक पहलू उसका व्यक्तिवादी और आवेगपूर्ण स्वभाव था। कूटनीति संवाद और धैर्य से चलती है, जबकि ट्रंप की राजनीति ट्वीट, धमकी और शक्ति-प्रदर्शन पर आधारित थी। ईरानी जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या इसी मानसिकता का परिणाम थी। यह घटना न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन थी, बल्कि इसने पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया। इसके बाद ईरान की प्रतिक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब वह केवल सहने की नीति पर नहीं चल रहा।
ईरान की राजनीति को अक्सर पश्चिमी मीडिया में कट्टर, दमनकारी और पिछड़ा बताकर प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन यह चित्रण अधूरा और एकांगी है। ईरान की जनता ने बार-बार यह साबित किया है कि वे बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगे, चाहे वह कितनी भी आकर्षक शब्दावली में क्यों न लपेटा गया हो। ईरान में सरकार की आलोचना होती है, विरोध होते हैं, लेकिन जब बात राष्ट्रीय संप्रभुता की आती है, तो जनता और सत्ता एकजुट दिखाई देते हैं। यही वह तत्व है जिसे पश्चिमी रणनीतिकार अक्सर समझने में चूक जाते हैं।
भारत जैसे देशों के लिए यह पूरा परिदृश्य एक गंभीर चेतावनी भी है और अवसर भी। ईरान भारत का पारंपरिक मित्र रहा है—ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क (चाबहार बंदरगाह) और मध्य एशिया तक पहुँच के लिहाज़ से ईरान का महत्व असंदिग्ध है। लेकिन अमेरिका के दबाव में भारत का ईरान से दूरी बनाना उसकी स्वतंत्र विदेश नीति पर प्रश्न खड़े करता है। किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को किसी तीसरे देश की नाराज़गी के डर से गिरवी न रखे।
आज वैश्विक राजनीति एक संक्रमण काल से गुजर रही है। एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था की पकड़ ढीली पड़ रही है और बहुध्रुवीयता का उदय हो रहा है। ऐसे में ईरान जैसे देश, जो लंबे समय से दबाव और प्रतिबंधों के बीच खड़े रहे हैं, नए शक्ति-संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। रूस-चीन-ईरान के बढ़ते समीकरण इस बदलाव के संकेत हैं। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अब दुनिया केवल वाशिंगटन के इशारों पर नहीं चलेगी।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि ईरान सही है या अमेरिका गलत। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या वैश्विक राजनीति में शक्ति ही न्याय का एकमात्र पैमाना होगी, या फिर अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और समानता के सिद्धांतों को वास्तविक सम्मान मिलेगा। यदि बड़े राष्ट्र अपनी करनी से दुनिया को डराते रहेंगे, तो भरनी के रूप में उन्हें अस्थिरता, अविश्वास और प्रतिरोध ही मिलेगा।
ईरान और ट्रंप के दौर की अमेरिकी राजनीति हमें यही सिखाती है कि दमन से स्थायित्व नहीं आता, और धमकी से सम्मान नहीं मिलता। इतिहास अंततः उसी का पक्ष लेता है जो अपनी संप्रभुता, आत्मसम्मान और जनता की चेतना के साथ खड़ा रहता है। और शायद यही “जैसी करनी वैसी भरनी” का सबसे बड़ा राजनीतिक अर्थ है।
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