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वरिष्ठ पत्रकार विनोद बागी की पत्नी का निधन

January 23, 2026

वरिष्ठ पत्रकार विनोद बागी की पत्नी का निधन

वाराणसी, 23 जनवरी। वरिष्ठ पत्रकार विनोद बागी की पत्नी श्रीमती माधुरी वर्मा (65) का 22 जनवरी की शाम निधन हो गया। वे काफी समय से अस्वस्थ थीं। कल शाम ही पार्थिव शरीर को अग्नि को समर्पित कर दिया गया।

श्री बागी उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (उपज) के प्रदेश उपाध्यक्ष और नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स इंडिया के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य हैं। वे वाराणसी इकाई के अध्यक्ष भी हैं। श्री बागी लोकतंत्र सेनानी हैं।

श्रीमती माधुरी वर्मा के निधन पर उपज के प्रदेश अध्यक्ष सर्वेश कुमार सिंह और महामंत्री आनंद कर्ण ने शोक व्यक्त करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की है।

पश्चिम उत्तर प्रदेश में बारिश से ठंड बढ़ी

मुरादाबाद, 23 जनवरी 2026, पश्चिम उत्तर प्रदेश में आज दोपहर से शुरू हुई बारिश से ठंड बढ़ गई है। मकर संक्रांति के बाद से इधर धूप खिलने से मौसम सुहावना हो गया था। लेकिन आज सुबह से ही सूरज नहीं निकला और दोपहर बाद शुरू हुई बूंदा बांदी बाद में तेज बारिश में बदल गई।

बारिश की वजह से लोग घरों में दुबक गए। ये मौसम पूरे पश्चिम में एक साथ खराब हुआ। आज बसंत पंचमी के दिन शादियां भी हैं। ऐसे में लोगों को कठिनाई भी गई है।

नाराजगी: सीजेएम के तबादला का विरोध, मुख्य न्यायमूर्ति के नाम ज्ञापन भेजा

Bar Association, Advocate Moradabad

जिला जज को ज्ञापन देने जाते हुए मुरादाबाद के वकील

मुरादाबाद, 23 जनवरी 2026, (उप्र समाचार सेवा) संभल के सीजेएम विभांशु सुधीर के तबादले का मुद्दा गरमाया हुआ है। एएसपी अनुज चौधरी व पुलिस कर्मियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज का आदेश देने वाले सीजेएम के अचानक तबादले से बार संगठन बेहद नाराज है। गुरुवार को जनरल हाउस की मीटिंग में देश के मुख्य न्यायाधीश और इलाहाबाद के न्यायमूर्ति को इस प्रकरण से अवगत कराने का निर्णय लिया गया।
संभल मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आकस्मिक स्थानांतरण के विरोध में शुक्रवार को दि बार एसोसिएशन एंड लाइब्रेरी के प्रतिनिधि मंडल ने जिला
जज के माध्यम से ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन की एक प्रति मुख्य न्यायाधीश महोदय, सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली को स्पीड पोस्ट के माध्यम से भेजी गई।
ज्ञापन में कहा कि न्यायिक आदेश पारित करने के उपरांत मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का स्थानांतरण अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है I इससे न्याय पालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता एवं आम जनता के न्याय व्यवस्था पर विश्वास को गहरा आघात पहुँचा है I दि बार एसोसिएशन एंड लाइब्रेरी मुरादाबाद के समस्त अधिवक्तागण तथा आम जनता ने इसका घोर विरोध कियाI
प्रतिनिधि मंडल में गंभीर चिंता व्यक्त की गई कि जनपद संभल में तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा कानून के अंतर्गत पारित एक न्यायिक आदेश के उपरांत उनका स्थानांतरण कर दिया गया । यह घटनाक्रम न केवल न्यायिक स्वतंत्रता बल्कि न्यायपालिका की निष्पक्षता, गरिमा व संस्थागत आत्मसम्मान के लिए भी बेहद चिंताजनक है।
एसोसिएशन का मत है कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी द्वारा अपने न्यायिक विवेक से पारित वैधानिक आदेशों के बाद इस प्रकार के प्रशासनिक निर्णय लिए जाते हैं तो इससे न्यायपालिका की निर्भीकता प्रभावित होती है। आम लोगों के मन में यह धारणा बनती है कि न्यायिक स्वतंत्रता पर दबाव डाला जा रहा है। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। न्यायपालिका लोकतंत्र का अंतिम और सबसे मजबूत स्तम्भ है, जिसकी स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार का आघात स्वीकार्य नहीं है।
ज्ञापन के माध्यम से यह भी प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया कि संभल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायिक आदेश की अवहेलना वाले बयान देने वाले अधिकारी के विरुद्ध माननीय उच्च न्यायालय स्वत: अवमानना की कार्यवाही कारित करें I
मांग की कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश के अनुपालन में तुरंत रिपोर्ट दर्ज कराने का आदेश पारित करने की कृपा करें I
इस दौरान अध्यक्ष आनंद मोहन गुप्ता , शाकिर अली, राकेश जोहरी, आदेश श्रीवास्तव, प्रभात गोयल, जुनैद एजाज, कमाल अख्तर, महेश चन्द्र त्यागी, परमाल सिंह, विनोद कुमार विकल, आबिद हुसैन, महावीर प्रसाद मौर्य, त्रिलोक चन्द्र दिवाकर, मुस्तर अली, प्रेमवीर सिंह, रफ़ीक अहमद, गोपाल कृष्ण दिवेदी, विनय खन्ना, फिरोजुद्दीन, मो. आरिफ, अमज़द अली, शरद सिन्हा, रघुवीर सिंह, पुनीत चौहान, जोगेंद्र सिंह चौहान, कमर रईस, मुज़म्मिल खान, शराफत हुसैन, चन्द्र वीर सिंह, अनिल कुमार सिंह, छत्रपाल सिंह, वीर सिंह सैनी, नदीम हुसैन, निखिल रंजन अग्रवाल, मनीष प्रताप सिंह, पंकज शर्मा, अजय बंसल, सारिफ मालिक, अरशद परवेज़, नसरुद्दीन, आसिफ हुसैन, मोहम्मद जकी खान, फ़िरोज़ हसन आदि अधिवक्ता रहे I

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आजादी की लड़ाई को नई गति प्रदान की

मुख्यमंत्री ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयन्ती ‘पराक्रम दिवस’ पर आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित किया
Neta Ji Subhash Chandra Bose

नेताजी की जयंती पराक्रम दिवस पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ

लखनऊ : 23 जनवरी, 2026, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भारत की आजादी के महानायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आज पावन जयन्ती है। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारत की आजादी का एक ऐसा नाम है, जिसके माध्यम से प्रत्येक भारतीय को उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व का बोध होता है। उनके व्यक्तित्व से राष्ट्र के प्रति निष्ठा का भाव, असीम साहस, वीरता और निःस्वार्थ सेवा की प्रेरणा प्राप्त होती है।
मुख्यमंत्री जी आज यहां नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयन्ती ‘पराक्रम दिवस’ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित कर रहे थे। इस अवसर पर मुख्यमंत्री जी ने प्रदेश सरकार व प्रदेशवासियों की ओर से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा के सम्मुख स्थित उनके चित्र पर पुष्प अर्पित उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि देश की स्वतंत्रता के अभियान में दिये गये योगदान के कारण प्रत्येक भारतवासी नेताजी के प्रति अत्यन्त श्रद्धा व सम्मान का भाव रखता है। हमें उनके व्यक्तित्व में ओज, तेज और किसी विपरीत परिस्थिति में भी देशद्रोही और देश विरोधी तत्वों के सामने न झुकने का दृढ़ संकल्प दिखाई देता है। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म सन् 1897 में कटक में एक प्रतिष्ठित अधिवक्ता परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा ब्रिटेन से प्राप्त की। नेताजी ने उस समय की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त होने के बावजूद, ब्रिटिश हुकूमत के अधीन कार्य करने से मना कर दिया और भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में कूद पड़े।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि जब पूरा देश गांधी जी के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन को एक नई दिशा देने की ओर अग्रसर था। उन परिस्थितियों में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने भारत के क्रान्तिकारियों के सिरमौर के रूप में आजादी की लड़ाई को नई गति प्रदान की थी। उन्होंने देश की आजादी के लिये भारत के अंदर तथा बाहर अभूतपूर्व योगदान दिया। देश की आजादी की लड़ाई के दौरान उनके द्वारा किया गया आह्वान कि ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ भारत के नागरिकों के लिये मंत्र बन गया था। इस नारे ने युवाओं को देश की आजादी की लड़ाई में भाग लेने के लिये अत्यन्त प्रोत्साहित किया।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का उद्घोष ‘दिल्ली चलो’ प्रत्येक भारतीय को आज भी प्रेरित करता है। आज भी ‘कदम कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा’ भारतीय सेना के रिक्रूट व कमीशन प्राप्त अधिकारी अपने दीक्षांत समारोह में बड़ी शान के साथ गाते हैं। यह भी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की देन है।
इस अवसर पर उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, लखनऊ की महापौर श्रीमती सुषमा खर्कवाल, विधायक नीरज बोरा व अमरेश कुमार, विधान परिषद सदस्य अवनीश कुमार सिंह, डॉ0 महेन्द्र कुमार सिंह, पवन कुमार सिंह तथा सलाहकार मुख्यमंत्री अवनीश कुमार अवस्थी सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

वाइफ स्वैपिंग और हमारे रिश्तों की टूटती नींव: समाज का आईना 

– डॉ. प्रियंका सौरभ
कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर लिखना आसान नहीं होता। वे केवल शब्दों की नहीं, बल्कि सामाजिक, मानसिक और नैतिक साहस की भी माँग करते हैं। यह विषय भी उन्हीं में से एक है, जहाँ चुनौती केवल प्रस्तुति की नहीं, बल्कि उस सच को सामने लाने की है जिसे समाज अक्सर ढककर रखना चाहता है। संस्कृति की आड़ में या आधुनिकता के नाम पर जिस चुपचाप गिरावट को स्वीकार किया जा रहा है, उस पर प्रश्न उठाना अब ज़रूरी हो गया है। आज जब परिवार की पवित्र संस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, ‘वाइफ स्वैपिंग’ जैसी प्रवृत्ति न केवल वैवाहिक बंधनों को चुनौती दे रही है, बल्कि पूरे समाज के मूल्यों को झकझोर रही है।
“वाइफ स्वप्पिंग” सुनते ही अधिकतर लोग इसे पश्चिमी संस्कृति या महानगरों तक सीमित मान लेते हैं। यह सोच हमें आत्मसंतोष देती है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक असहज और व्यापक है। क्या यह प्रवृत्ति वास्तव में केवल बड़े शहरों तक सीमित है, या फिर इसकी छाया गाँवों और छोटे कस्बों तक भी पहुँच चुकी है—बस हम उसे देखने से बच रहे हैं? उत्तर प्रदेश, केरल और लद्दाख जैसे क्षेत्रों से सामने आए मामले बताते हैं कि यह समस्या ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर मौजूद है।
यह विषय सनसनी फैलाने के लिए नहीं, बल्कि समाज के भीतर बदलते रिश्तों को समझने के लिए ज़रूरी है। यह विवाह संस्था की कमजोर होती नींव, रिश्तों में बढ़ती दरार और आधुनिकता के नाम पर मूल्यों की गलत व्याख्या की ओर ध्यान दिलाता है। यह केवल शारीरिक इच्छा का प्रश्न नहीं, बल्कि असुरक्षा, मानसिक अधूरापन, संवादहीनता और सामाजिक पाखंड का परिणाम भी है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसमें भावनात्मक शोषण, ईर्ष्या और विश्वास का पूर्ण विघटन होता है।
इस तरह के संवेदनशील विषय को संतुलित और मर्यादित भाषा में रखना अत्यंत आवश्यक है, ताकि गंभीरता बनी रहे। यह भी सामने आता है कि किस प्रकार सामान्य दिखने वाले परिवार धीरे-धीरे ऐसे कुचक्र में फँस जाते हैं, जहाँ रिश्ते भावनाओं की जगह समझौते और दिखावे का रूप ले लेते हैं। बैंगलोर, हापुड़ जैसे स्थानों से सामने आए मामले इसकी पुष्टि करते हैं।
आज यह मान लेना भूल होगी कि ऐसी प्रवृत्तियाँ केवल महानगरों तक सीमित हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट ने जहाँ स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोले हैं, वहीं मूल्यों के क्षरण को भी आसान बना दिया है। आभासी दुनिया में “सामान्य” लगने वाली भाषा, व्यवहार और रिश्ते वास्तविक जीवन में परिवारों की नींव हिला रहे हैं। आईटी क्रांति, उपभोक्तावादी संस्कृति और पश्चिमी प्रभाव ने युवा वर्ग में प्रयोग की होड़ बढ़ाई है। आर्थिक असमानता, संयुक्त परिवार का विघटन और महिलाओं की आर्थिक निर्भरता इसे बढ़ावा दे रही हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से यह यौन असंतोष, ईर्ष्या और रोमांच की तलाश से उपजता है।
भारतीय संदर्भ में यह पुरुषप्रधान समाज की देन है। पत्नियाँ डर के मारे चुप रहती हैं—तलाक का कलंक, आर्थिक असुरक्षा या परिवार का विघटन। सोशल मीडिया ग्रुप्स ने इसे संगठित रूप दिया है। टियर-2 शहरों में तकनीक-साक्षर युवा इसमें लिप्त हैं। इसके प्रभाव विनाशकारी हैं। वैवाहिक स्तर पर विश्वास टूटता है, ईर्ष्या बढ़ती है, भावनात्मक लगाव नए पार्टनर से हो जाता है। बच्चों पर असर लंबे समय तक रहता है—वे असुरक्षा और रिश्तों की अस्थिरता सीखते हैं। विस्तारित परिवार समर्थन छोड़ देता है। समाज स्तर पर यह नैतिक क्षय और महिलाओं के शोषण को बढ़ावा देता है। भारत में परिवार संरचना बदल रही है, लेकिन यह विकृति नई चुनौतियाँ ला रही है।
यह विमर्श केवल प्रश्न खड़े नहीं करता, बल्कि समाधान की ओर भी संकेत करता है। परिवार स्तर पर खुला संवाद, काउंसलिंग, भावनात्मक अंतरंगता आवश्यक है। समाज स्तर पर स्कूलों में नैतिक शिक्षा, महिलाओं का सशक्तिकरण ज़रूरी है। कानूनी स्तर पर IPC धाराओं का सख्त उपयोग, परिवार परामर्श नीतियाँ बनानी चाहिए।
यह विषय अश्लीलता नहीं, बल्कि समाज का आईना है। यह पाठक को असहज करता है, सोचने पर मजबूर करता है। शायद इसी असहजता में इसका सबसे बड़ा सामाजिक महत्व निहित है—कि हम अपने रिश्तों को पुनः परिभाषित करें। समय है जागने का।
  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
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