न्यूयॉर्क, 29 अगस्त 2026, दोपहर 2 बजे, जब दुनिया के सबसे प्रसिद्ध मंचों में से एक – न्यूयॉर्क का मेडिसन स्क्वायर गार्डन – में 5000 से ज्यादा भारतीय-अमेरिकी, 26 अलग-अलग भाषाओं में शाखा चलाने वाले स्वयंसेवक और 250 से ज्यादा हिंदू, योग, मंदिर और इंटरफेथ संगठनों के प्रतिनिधि जुटे, तो लगा जैसे इतिहास खुद को दोहरा रहा है।
133 साल पहले, 11 सितंबर 1893 को, शिकागो के Art Institute में 7000 लोगों के सामने एक 30 साल के संन्यासी ने कहा था – “Sisters and Brothers of America!”
और कल उसी अमेरिका में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा –
> “अगर कोई हिंदू सोचता है कि भारत में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा। अगर आप खुद को हिंदू कहना चाहते हैं, तो आपको मानना होगा कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। Diversity is a decoration of our inner unity, it must be preserved.”
ये दो वाक्य एक ही सूत्र के दो छोर हैं।
1. मंच एक, संदेश एक
*विवेकानंद 1893:* World Parliament of Religions. 12 भारतीय प्रतिनिधि थे – बौद्ध, जैन, ब्रह्म समाज, मुस्लिम, ईसाई भी। पर जिसने तालियों की गड़गड़ाहट 2 मिनट तक रुकने नहीं दी, वो थे विवेकानंद। उनका मूल मंत्र था – “I am proud to belong to a religion which has taught the world both tolerance and universal acceptance. We believe not only in universal toleration, but we accept all religions as true.”
उन्होंने गीता का श्लोक सुनाया – “यो यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्” – जो जैसे मेरे पास आता है, मैं वैसे ही उसे अपनाता हूँ।
उन्होंने मेंढक और कुएं (कूप मंडूक) की कहानी सुनाई – हर पंथ अपने कुएं को ही पूरा समंदर समझता है।
*भागवत 2026:* Universal Oneness Celebration, आयोजक – American Hindus for Engagement and Dialogue (AHEAD). रक्षाबंधन के दिन। थीम – वसुधैव कुटुम्बकम्।
आरएसएस के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने पहले ही कहा था – “This is an interfaith gathering with diverse, multicultural audience, reflecting Bharatiya ethos which is fundamentally inclusive.”
भागवत जी ने वहीं से आगे बढ़ाया:
“All humanity is one. Diversity is the rule of nature, but unity is the truth underpinning it.”
विवेकानंद ने सहिष्णुता (tolerance) की बात की थी, भागवत जी ने संरक्षण (preservation) की। 1893 में कहना था कि दूसरों को सहो, 2026 में कहना है कि दूसरों की पहचान को अपनी तरह ही बचाओ।
2. डेटा क्या कहता है – क्यों अब ये बात जरूरी है?
– अमेरिका में आज भारतीय मूल के 54 लाख से ज्यादा लोग हैं। 2023 में US Census के अनुसार, उनमें से 48% हिंदू पहचान रखते हैं। ये दुनिया का सबसे शिक्षित और सबसे अधिक आय वाला डायस्पोरा है – औसत घरेलू आय $145,000।
– पर Pew Research 2024 के अनुसार, 31% हिंदू-अमेरिकियों ने कहा कि पिछले साल उन्हें धर्म के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ा। यानी शिकागो में जो सवाल था – “हिंदू कौन है?” – वही सवाल आज न्यूयॉर्क में भी है।
– आरएसएस का शताब्दी वर्ष 2025-26 है। संगठन 1925 से शुरू हुआ, आज 65,000+ शाखाएं। पिछले 8 महीनों में दत्तात्रेय होसबाले जी अमेरिका, UK, जर्मनी में बुद्धिजीवियों से मिले। भागवत जी की ये यात्रा उसी वैश्विक संवाद का हिस्सा है।
3. शिकागो से साकेत तक का सेतु
विवेकानंद ने अमेरिका को भारत का आध्यात्मिक परिचय दिया था। तब भारत गुलाम था। आज भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है, पर नैरेटिव की लड़ाई वही है।
1893 में Professor John Henry Wright ने विवेकानंद को कहा था – “To ask for your credentials is like asking the sun to state its right to shine.”
2026 में न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और USCIRF ने भागवत जी के वीज़ा रद्द करने की मांग की। आरएसएस का उत्तर वही रहा – “We invite anyone interested in learning more to participate in these open forums of dialogue.”
यही तो फर्क है – विरोध के जवाब में संवाद।
निष्कर्ष: एक ही मंत्र का विस्तार
विवेकानंद ने कहा था – “सब रास्ते एक ही सच तक जाते हैं।”
भागवत जी ने कहा – “सबकी पहचान को बचाना ही उस सच तक पहुंचने का तरीका है।”
एक ने दुनिया को बताया कि हिंदू धर्म क्या सोचता है, दूसरे ने दुनिया को दिखाया कि हिंदू समाज कैसे जीता है – शाखा में, सेवा में, विविधता में।
1893 में तालियां बजीं थीं क्योंकि अमेरिका ने पहली बार सहिष्णुता सुनी थी। 2026 में मेडिसन स्क्वायर गार्डन खचाखच भरा था क्योंकि अमेरिका अब सहिष्णुता से आगे – एकता का अनुभव करना चाहता है।

