प्रणय विक्रम सिंह
*अवध मा राना भयो मरदाना…*
रायबरेली 24 अगस्त 2026, कुछ नाम इतिहास के पन्नों पर लिखे जाते हैं और कुछ लोक की आत्मा में। ‘अवध केसरी’ राना बेनी माधव बख्श सिंह ऐसा ही नाम हैं, जिन्हें बैसवारे की माटी ने अपने स्वाभिमान में, लोक ने अपने गीतों में और पीढ़ियों ने अपनी स्मृतियों में सहेज रखा है।
1857 में जब मेरठ से उठी स्वाधीनता की चिंगारी अवध पहुंची, तब राना ऐसे सेनानायक बनकर सामने आए, जिनके लिए सत्ता से बड़ा स्वाभिमान और जीवन से बड़ी मातृभूमि थी। अंग्रेजी सत्ता के अपार सैन्य बल और संसाधनों के सामने उनके पास अपनी माटी के प्रति अगाध प्रेम और पराधीनता के विरुद्ध संघर्ष का अदम्य संकल्प था।
उन्होंने समझौते और समर्पण के बजाय संघर्ष चुना तथा अपना सामर्थ्य और संसाधन मातृभूमि की स्वतंत्रता के यज्ञ में अर्पित कर दिए। उनके लिए यह राजसत्ता की नहीं, भारत की अस्मिता और अपने जन के स्वाभिमान की लड़ाई थी।
इसीलिए उनका शौर्य इतिहास के अभिलेखों तक सीमित नहीं रहा, लोकगीतों और जनस्मृतियों में उतर गया। बैसवारे ने उन्हें केवल अपना राजा नहीं, अपने स्वाभिमान का प्रतीक माना। पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन उनकी वीरगाथा चौपालों और लोककंठ में जीवित रही।
राना बेनी माधव का जीवन शस्त्र और साधना, शौर्य और स्वाभिमान, संघर्ष और समर्पण का अद्भुत संगम था। मातृभूमि उनके लिए भूगोल नहीं, आराधना थी और यही भाव उन्हें इतिहास से आगे बढ़ाकर लोकमानस में अमर कर गया।
‘अवध केसरी’ राना बेनी माधव बख्श सिंह ने जिस माटी की अस्मिता के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाया और जिस जन के स्वाभिमान के लिए विदेशी सत्ता से लोहा लिया, उनकी 222वीं जयंती पर क्रांतिभूमि रायबरेली ने उसी गौरवशाली विरासत को कृतज्ञता से स्मरण किया।
रायबरेली में आयोजित ‘भाव समर्पण समारोह’ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राना के अप्रतिम शौर्य और राष्ट्रभक्ति को नमन करते हुए उनके स्वाभिमान और संघर्ष के संस्कारों को अंत्योदय, सामाजिक न्याय और विकास के वर्तमान संकल्प से जोड़ा।
समय बदला, परिस्थितियां बदलीं और शासन की भूमिका भी बदली, किंतु जनसम्मान का मूल भाव नहीं बदला। लोकतांत्रिक भारत में उस स्वाभिमान की सार्थक अभिव्यक्ति यही है कि विकास की पंक्ति में कोई अंतिम न रहे, शासन की योजनाओं से कोई वंचित न रहे और अभाव किसी व्यक्ति के सम्मानपूर्ण जीवन में बाधा न बने।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ₹21 करोड़ से अधिक की लागत से नवनिर्मित ‘राना बेनी माधव बख्श सिंह स्मृति सभागार’ का लोकार्पण कर उनकी गौरवशाली विरासत को स्थायी स्वरूप दिया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों एवं शहीदों के परिजनों का सम्मान तथा ‘अवध केसरी स्मारिका’ एवं विशेष आवरण का विमोचन इस भाव को और गहरा कर गया कि स्वतंत्रता केवल हमें मिला अधिकार नहीं, पूर्वजों के त्याग से प्राप्त उत्तराधिकार है।
यह केवल इतिहास को सहेजने का उपक्रम नहीं, स्वतंत्र वर्तमान पर बलिदानी अतीत के ऋण की स्वीकारोक्ति भी थी। यह सभागार आने वाली पीढ़ियों को राना की शौर्यगाथा से जोड़ेगा और बलिदानी परिवारों का सम्मान सदैव स्मरण कराएगा कि राष्ट्र अपने लिए सर्वस्व अर्पित करने वालों को कभी विस्मृत नहीं करता।
लेकिन राना की स्मृति को प्रणाम करने के साथ उनकी धरती के वर्तमान को संवारने का संकल्प इस आयोजन को विशेष अर्थ देता है। मुख्यमंत्री ने रायबरेली, बछरावां एवं हरचंदपुर विधान सभा क्षेत्रों में ₹879 करोड़ से अधिक लागत की 346 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण एवं शिलान्यास किया। यहां विकास केवल निर्माण कार्यों का हिसाब नहीं था, बल्कि उस विचार की अभिव्यक्ति था जिसमें विरासत आत्मविश्वास देती है और विकास उस आत्मविश्वास को भविष्य देता है।
विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों को DBT के माध्यम से ₹19 करोड़ का अंतरण, आयुष्मान कार्ड, लैपटॉप, स्वीकृति-पत्र और चाबी का वितरण इसी विकास-दृष्टि को व्यक्ति के जीवन तक ले गया। किसी जरूरतमंद को उपचार का भरोसा, किसी युवा के हाथ में तकनीक, किसी परिवार को योजना का अधिकार, यही अंत्योदय का वह व्यावहारिक स्वरूप है, जिसमें शासन की सफलता सबसे ऊपर खड़े व्यक्ति की समृद्धि से नहीं, सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक पहुंची सुविधा से मापी जाती है।
इस पूरी तस्वीर का सबसे मार्मिक पक्ष सपेरा समुदाय एवं अन्य वर्गों के 60 से अधिक आवास विहीन परिवारों को आवासीय पट्टों का आवंटन रहा। सामाजिक और आर्थिक हाशिए पर जीवन बिताते किसी परिवार के हाथ में अपनी भूमि का अधिकार पहुंचना केवल प्रशासनिक आवंटन नहीं है, यह सामाजिक न्याय को जमीन देना, अंत्योदय को अधिकार में बदलना और जीवन को स्वाभिमान से जोड़ना है। जिसके पास अपनी कही जा सकने वाली जमीन न हो, उसके लिए भूमि का छोटा-सा टुकड़ा भी केवल संपत्ति नहीं होता.. वह पहचान है, स्थायित्व है, आने वाली पीढ़ी की सुरक्षा है। कल इसी भूमि पर घर बनेगा, आंगन में बच्चे खेलेंगे, चौखट पर दीप जलेगा और वर्षों से ठिकाने की तलाश में रहा परिवार पूरे अधिकार से कह सकेगा कि यह हमारी जमीन है, यह हमारा घर है।
यहीं बैसवारे के मान ‘राना’ के संस्कार और वर्तमान शासन का संकल्प एक बिंदु पर मिलते दिखाई देते हैं।
राना ने अपनी माटी के स्वाभिमान के लिए संघर्ष किया था, आज उसी माटी पर अंतिम व्यक्ति के स्वाभिमान की रक्षा सुशासन का धर्म है। तब संघर्ष विदेशी सत्ता से मुक्ति का था, आज संकल्प गरीबी, वंचना और अवसरों की असमानता से मुक्ति का है। तब मातृभूमि की अस्मिता की रक्षा के लिए शस्त्र उठे थे, आज शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और विकास के माध्यम से प्रत्येक नागरिक की गरिमा को सामर्थ्य देना समय का दायित्व है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में रायबरेली का यह आयोजन इसी अर्थ में विशेष बन गया। राना की स्मृति को सम्मान मिला, उनकी धरती को विकास की सौगात मिली और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े परिवारों तक अधिकार पहुंचा। सांस्कृतिक स्वाभिमान और सामाजिक न्याय यहां अलग-अलग धाराएं नहीं रहे, बल्कि लोक-कल्याण के एक ही संकल्प में समाहित दिखाई दिए।
महापुरुषों का वास्तविक अनुगमन उनके नाम के स्मरण से नहीं, उनके संस्कार को अपने समय के कर्तव्य में उतारने से होता है। राना का शौर्य हमें स्वाभिमान का संस्कार देता है, अंत्योदय उसी स्वाभिमान को अंतिम व्यक्ति के सम्मान से जोड़ता है और विकास उसे आने वाली पीढ़ियों के सामर्थ्य में बदलता है।
रायबरेली की उस धरती पर, जहां राना की वीरता आज भी लोककंठ में जीवित है, विरासत, विकास और अंत्योदय का यह संगम एक सुंदर निरंतरता रचता है।
दो शताब्दियों के अंतराल में समय और चुनौतियां भले बदल गई हों, लेकिन लोकमंगल का मूल मंत्र वही है… अपने जन का सम्मान, अपनी माटी का गौरव और राष्ट्र सर्वोपरि। यही राना की विरासत का अनुगमन है, यही विरासत से विकास, स्वाभिमान से सम्मान और अंत्योदय से राष्ट्रोदय की यात्रा है।
