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उचित निर्णय

July 26, 2026

उचित निर्णय

Editorial 26.07.2026 Time 10.21 AM, Sunday, by Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र पूर्णतः उचित और समझदारी का निर्णय है। इसे दवाब में लिया गया निर्णय कहकर एक वर्ग द्वारा प्रचारित किया जा रहा है। वस्तुत: यह दवाब में लिया गया निर्णय नहीं अपितु युवाओं की वाणी और भावनाओं का सम्मान है। इस निर्णय को इस रूप में भी नहीं देखना चाहिए कि सरकार झुक गई। सरकार लोकतंत्र, लोकतांत्रिक मूल्यों और असहमति की भावना का सम्मान करती स्पष्ट दिखाई दी है।

यह बात बिल्कुल सही है कि 3 मई को हुई नीट परीक्षा का पेपर लीक के बाद जब 12 मई को इसे रद्द किया गया तो लाखों परीक्षार्थियों के सपने टूटे। वे आहत हुए, सदमे में आए, भविष्य के लिए चिंतित हुए। इसी अवसाद की स्थिति में एक दर्जन से अधिक परीक्षार्थियों ने आत्म हत्या कर ली। ये इस प्रकरण का दुखद पहलू है। इसके बाद पूरे देश की भावनाएं इस प्रकरण से जुड़ गईं। परीक्षार्थियों से सहानुभूति हो गई।

ये भावनात्मक लगाव और सहानुभूति ही कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को ऊर्जा देने वाले साबित हुए। कॉकरोच जनता पार्टी और उसके संस्थापकों ने मात्र एक माह 19 दिन में आंदोलन को सफलता के शिखर पर पहुंचा दिया। कल 25 जुलाई को इनकी सभी मांगें मान ली गईं। ये आंदोलन की उपलब्धि है। मोदी सरकार के 12 साल में ये दूसरा और सबसे कम समय चला पहला आंदोलन है जो अपनी मांगें मनवाने के बाद ही समाप्त हुआ है। पहला ऐसा आंदोलन किसानों का था। जिसमें तीन कृषि कानूनों को सरकार ने अधिसूचित करने के बाद वापस लिया था।

दोनों आंदोलनों में दो बातें समान हैं। पहली ये कि आंदोलनकारियों द्वारा बार बार पुलिस को उकसाया गया, ऐसे हालात पैदा किए गए की पुलिस संयम तोड़ दे और अधिकतम बल प्रयोग करे। याद है 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर किसान आंदोलन में घुसे पंजाब के कुछ युवाओं ने लालकिले पर राष्ट्रीय ध्वज हटा दिया था और निशान साहिब स्थापित कर दिए थे। वहां तक किसान ट्रैक्टर लेकर पहुंचे थे, पुलिस जवानों को रौंदने की कोशिश हुई थी। लेकिन दिल्ली पुलिस ने संयम दिखाया था। अन्यथा हालत ऐसे थे कि लालकिले की सुरक्षा के लिए पुलिस बल गोली भी चला सकते थे। लेकिन पुलिस ने सूझबूझ का परिचय दिया। हालांकि कुछ तत्व यही चाहते थे कि पुलिस संयम खो दे और विश्व में भारत की छवि को खराब करे तथा देश में माहौल बिगाड़ दें।

यही बात सीजेपी के आंदोलन में भी हुई। संसद मार्च के लिए 20 जुलाई,ठीक उसी दिन का चयन हुआ, जिस दिन संसद का मानसून सत्र शुरू होना था। जंतर मंतर पर धरना चल रहा था। इससे सरकार या दिल्ली पुलिस को कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन जब संसद मार्च हुआ तो इसमें गैर छात्रों और राजनीतिक विचार के युवाओं और कुछ अधेड़ उम्र के लोगों की घुसपैठ हो गई। ये हर हाल में माहौल बिगाड़ने पर आमादा थे। संसद कूच में इन लोगों ने दो बेरीकेड तोड़ दिए, तीसरे को तोड़कर संसद पहुंचना चाहते थे। जहां मानसून सत्र शुरू हुआ था। इनकी योजना संसद भवन में घुसने की थी, ताकि पुलिस नेपाल की तरह अधिकतम बल प्रयोग कर दे, यानि फायरिंग हो जाए। लेकिन पुलिस ने इन्हें जब तीसरे बैरिकेड पर रोका तो ये पुलिस से भिड़ गए। यहां पुलिस पर पथराव हुआ। पुलिस जवानों को पीटा गया, हमले किए गए। जवाब में पुलिस ने लाठी चार्ज किया। इस पूरे टकराव में 118 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। आंदोलनकारी भी घायल हुए। पुलिस ने उतना ही बल प्रयोग किया जितना सामान्य रूप से किसी भी जुलूस या मार्च को संसद जाने से रोकने के लिए किया जाता है। यहां भी पुलिस ने संयम दिखाया, अन्यथा हालात बहुत खराब हो सकते थे।

दोनों आंदोलनों में दूसरी समान बात ये है कि सरकार ने मांगे मानने के लिए उस खुफिया इनपुट को महत्व दिया, जिसमें बताया गया कि आंदोलन में बाहरी हस्तक्षेप हो गया है। बाहरी और देशविरोधी शक्तियां आंदोलन को उग्र करके अशांति पैदा करना चाहती हैं। ये तत्व चिन्हित भी किए गए, जो आंदोलन को बैक डोर से सपोर्ट कर रहे थे। दोनों आंदोलनों में मांगों से अधिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाना बनाने की भरसक कोशिश हुई।

शिक्षा मंत्री पद से त्यागपत्र देते समय धर्मेंद्र प्रधान ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया कि वे राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित होकर त्यागपत्र दे रहे हैं। आंदोलन के नाम पर कुछ लोग अशांति पैदा कर सकते है। दूसरी तरफ आंदोलन समाप्ति पर देश भर से सकारात्मक प्रतिक्रियाएं हुई हैं सभी ने त्यागपत्र और आंदोलन समाप्ति को उचित बताया है। लेकिन ये युवाओं की अच्छी छवि लेकर समाप्त नहीं हुआ। आंदोलन में अश्लील भाषा, अश्लील पोस्टर और अभद्रता, आक्रामकता, पत्रकारों पर हमले की घटनाएं हुई, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए शोभा नहीं देती हैं। इस पहलू पर कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं को विचार करना चाहिए। भविष्य की राजनीति के लिए वे ऐसे तत्वों से दूरी बना लें, तो बेहतर होगा। क्योंकि अभिजीत दीपके को अंततः राजनीति ही करनी है।

The resignation of Union Education Minister Dharmendra Pradhan is entirely appropriate and prudent. It is being propagated by a section as a decision taken under pressure. In fact, it is not a decision taken under pressure but out of respect for the voice and sentiments of the youth. This decision should also not be seen as the government bowing down. The government has been clear in respecting democracy, democratic values and the spirit of dissent.

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh