Posted on 20.06.2026 Saturday, Time 08.29 PM Article World Yoga Day, by Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News
समग्र स्वास्थ्य की गारंटी योग
सर्वेश कुमार सिंह
योग विश्व को भारत की अमूल्य देन है। कई हजार साल की खोज, अनुसंधान और प्रमाणित परिणामों के बाद भारत के ऋषि,मुनियों ने योग को प्रतिपादित किया। योग के महत्व और समग्र स्वास्थ्य की रक्षा के लिए भारतीय जनमानस इसे सदियों से अपना रहा है। लेकिन आधुनिक भारत में योग से विश्व को परिचित कराने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को है। उनके सदप्रयासों और दूरदृष्टि से योग को संयुक्त राष्ट्र महासभा में मान्यता मिली और 21 जून विश्व योग दिवस घोषित हो सका।
संयुक्त राष्ट्र महासभा का सर्वसम्मत प्रस्ताव
योग ऐसा विषय है, जिसे विश्व ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया है। आम तौर पर संयुक्त राष्ट्र महासभा के संकल्प और प्रस्ताव मतदान से पारित और स्वीकृत होते है। लेकिन 21 जून को विश्व योग दिवस घोषित करने का प्रस्ताव मतदान से नहीं बल्कि 193 सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से पारित किया। इस प्रस्ताव को जब औपचारिक रूप से 27 सितंबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महासभा की 69वीं बैठक में अपने भाषण के बाद प्रस्तुत किया तो 177 देश प्रस्ताव के सह प्रायोजक बने। इसके बाद 11 दिसंबर 2014 को महासभा ने सर्वसम्मत निर्णय लिया कि 21 जून विश्व योग दिवस होगा।
भारतीय ज्ञान परंपरा में शीर्ष पर
भारत ज्ञान और विज्ञान के शीर्ष पर रहा है। प्राचीन ज्ञान के रूप में आध्यामिक चेतना के साथ ही योग ने मानव के समग्र विकास, समग्र स्वास्थ्य और समग्र उन्नयन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रमाणित की है। पतंजलि के अष्टांग योग में सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य के उपाय सिर्फ आसन ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान के तत्व मौजूद है। ये आठ अंग यम, नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि मानव के संपूर्ण स्वास्थ्य और व्यक्तित्व का निर्माण करते है। योग समाज में एकात्मकता और कार्यकुशलता निर्माण करने का केंद्रीय तत्व है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में योग का वर्णन करते हुए कहा है “योग: कर्मसुकौशलम”। योग यूज धातु से बना शब्द है, जिसका अर्थ है, जोड़ना। योग को “यूज्यतेसौ योग:” कहा है। अर्थात जो युक्त करे उसे योग कहते हैं। पतंजलि योग दर्शन कहता है “योगषःचित्तवृत्ति निरोध:”।
विश्व में योग का प्रसार
योग के आदि जनक भगवान शिव है। योग को आदि, वैदिक और पौराणिक काल में भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही महर्षि पाराशर, व्यास जी, अष्टावक्र और पतंजलि ने अलग अलग समय और युग में प्रतिपादित किया। इनके द्वारा रचित और उद्बोधित साहित्य में योग वर्णित है। इनमें प्रमुख रूप से उपनिषद, योग वशिष्ठ, योग सूत्र, भगवद्गीता, योग दर्शन आदि है।
आधुनिक विश्व में गत लगभग दो सौ वर्ष में भारत के अनेक ऋषि, सन्यासी और आध्यात्मिक गुरुओं ने इसे प्रचारित और प्रसारित किया। इन महानुभावों ने योग की महत्ता से पश्चिमी जगत को परिचित कराया। इन महापुरुषों में स्वामी विवेकानंद, स्वामी शिवानंद, स्वामी यतीश्वरानंद, स्वामी रंगनाथानंद, महर्षि महेश योगी, परमहंस योगानंद, श्रीश्री रविशंकर प्रमुख है। भारत में योग को 21वीं सदी में लोकप्रिय बनाने में बाबा रामदेव का उल्लेखनीय योगदान है।
गीता प्रेस का योगदान
योग पर साहित्य प्रकाशन में गोरखपुर का गीता प्रेस संस्थान अग्रणी है। गीता प्रेस ने यूं तो सनातन संस्कृति की सेवा में अनेक ग्रंथों, पुस्तकों का प्रकाशन किया है। लेकिन उसके द्वारा योग पर प्रकाशित साहित्य अतुलनीय है। गीता प्रेस ने योग पर चार उपयोगी, संग्रहणीय विशेषांक प्रकाशित किए है। कल्याण पत्रिका के विशेषांकों के रूप में गीता प्रेस ने 1935 में “योगांक” प्रकाशित किया। इसमें 141 लेख समाहित हैं। 1980 में “निष्काम कर्मयोग” विशेषांक प्रकाशित किया। इसमें 177 लेख समाहित हैं। इसके बाद 1999 में “योगतत्त्व अंक” प्रकाशित किया। इसमें 170 लेख समाहित हैं।


