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संगठित हो हिंदू समाज : डॉ. मोहन जी भागवत

February 17, 2026

संगठित हो हिंदू समाज : डॉ. मोहन जी भागवत

Dr Mohan Rao BhagwatPosted on 17.02.2026, Tuesday, Time 07.45 PM Lucknow, Dr Mohan Bhagwat

लखनऊ। हिंदू समाज को संगठित औऱ सशक्त होने की आवश्यकता है। हमको किसी से खतरा नहीं है, लेकिन सावधान रहना है। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत ने लखनऊ के निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में सामाजिक सद्भाव बैठक में बोलते हुए कही। हिंदुओं की घटती जनसंख्या पर चिंता जताते हुए उन्होंने लालच और जबरदस्ती हो रहे मतांतरण पर रोक लगाने की बात कही। उन्होंने कहा कि घर वापसी का काम तेज होना चाहिए। जो लोग हिंदू धर्म में लौटें, उनका ध्यान भी हमें रखना होगा। बढ़ती घुसपैठ पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि घुसपैठियों को डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट करना होगा। उन्हें रोजगार नहीं देना है। उन्होंने कहा कि हिंदुओं के कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए। वैज्ञानिकों के हवाले से उन्होंने कहा कि जिस समाज में औसतन तीन से कम बच्चे होते हैं, वह समाज भविष्य में समाप्त हो जाता है। यह बात हमारे परिवारों में नव दंपतियों को बताई जानी चाहिए। डॉ. भागवत ने कहा कि विवाह का उद्देश्य सृष्टि आगे चले, यह होना चाहिए, वासना पूर्ति नहीं। इसी भावना से कर्तव्य बोध आता है।

सद्भाव बढ़ाने की जरूरत

उन्होंने कहा कि सद्भाव ना रहने से भेदभाव होता है। हम सभी एक देश, एक मातृभूमि के पुत्र हैं। मनुष्य होने के नाते हम सब एक हैं। एक समय भेद नहीं था, लेकिन समय चक्र के चलते भेदभाव की आदत पड़ गई है, जिसे दूर करना होगा। उन्होंने कहा कि सनातन विचारधारा सद्भाव की विचारधारा है।
जो विरोधी हैं, उन्हें मिटाना है, ऐसा हम नहीं मानते। एक ही सत्य सर्वत्र है। इस दर्शन को समझ कर आचरण में लाने से भेदभाव समाप्त होगा।

मातृशक्ति परिवार का आधार

सरसंघचालक जी ने कहा कि घर-परिवार का आधार मातृशक्ति है। हमारी परंपरा में कमाई का अधिकार पुरुषों को था, लेकिन खर्च कैसे हो, यह मातायें तय करती थी। मातृशक्ति विवाह के बाद दूसरे घर में आकर सभी को अपना बना लेती है। महिला को हमें अबला नहीं मानना है, वह असुर मर्दिनी है। हमने स्त्री की, प्रकृति की जो कल्पना की, वह बलशाली है। महिलाओं को आत्म संरक्षण का प्रशिक्षण होना चाहिए। पश्चिम में महिलाओं का स्तर पत्नी से है, हमारे यहां उन्हें माता माना जाता है। उनका सौंदर्य नहीं, वात्सल्य देखा जाता है।

कानून सभी को मानना है

यूजीसी गाइडलाइन को लेकर किए गए एक प्रश्न के उत्तर में सरसंघचालक जी ने कहा कि कानून सभी को मानना चाहिए। यदि कानून गलत है तो बदलने का उपाय भी है। जातियां झगड़े का कारण नहीं बनना चाहिए। समाज में अपनेपन का भाव होगा तो इस तरह की समस्या नहीं होगी। जो नीचे गिरे हैं, उन्हें झुक कर ऊपर उठाना पड़ेगा। सभी अपने हैं, यह भाव मन में होना चाहिए। संघर्ष से नहीं, समन्वय से दुनिया आगे बढ़ती है। एक को दबाकर दूसरे को खड़ा करने का भाव नहीं होना चाहिए।

विश्व का मार्गदर्शन करेगा भारत

डॉ. भागवत जी ने कहा कि भारत निकट भविष्य में विश्व को मार्गदर्शन देगा। विश्व की अनेक समस्याओं का समाधान भारत के पास ही है।

नियमित हों समाजिक सद्भाव की बैठकें

डॉ. भागवत ने समाज की सज्जन शक्ति का आह्वान करते हुए कहा कि बस्ती स्तर पर सामाजिक सद्भाव से जुड़ी बैठकें नियमित होनी चाहिए। हम आपस में मिलेंगे तो गलतफहमियां दूर होंगी। इस प्रकार की बैठकों में रूढ़ियों से मुक्त होने पर चर्चा होनी चाहिए। जो समस्याएं सामने आएं, उनको दूर करने का प्रयास होना चाहिए। जो दुर्बल है, उनकी सहायता करना चाहिए।

विदेशी शक्तियों के प्रति चेताया

उन्होंने कहा कि अमेरिका और चीन जैसे देशों में बैठे कुछ लोग हमारी सद्भावना के विरुद्ध योजना बना रहे हैं। इससे हमें सावधान रहना होगा। एक दूसरे के प्रति अविश्वास समाप्त करना होगा। एक दूसरे के दुख दर्द में शामिल होना होगा।

सम्मलित हुए विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि

कार्यक्रम में सिक्ख,बौद्ध,जैन समाज के साथ ही रामकृष्ण मिशन, इस्कॉन, जय गुरुदेव, शिव शांति आश्रम, आर्ट ऑफ लिविंग, संत निरंकारी आश्रम, संत कृपाल आश्रम, कबीर मिशन, गोरक्षा पीठ, आर्य समाज, संत रविदास पीठ, दिव्यानंद आश्रम, ब्रह्म विद्या निकेतन, सहित विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए।

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#लखनऊ #सामाजिक_सद्भाव_बैठक #मोहन_भागवत_जी

February 16, 2026

संघ प्रमुख मोहन भागवत का दो दिवसीय लखनऊ प्रवास कल से

 

DR MOHAN BHAGWAT SRSANGHCHALAK RSS

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा मोहन भागवत

Posted on 16.06.2026 Time 10.10 PM Monday, Lucknow RSS Chief Dr Mohan Bhagwat
लखनऊ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी का दो दिवसीय प्रवास 17 फरवरी से शुरू हो रहा है। वे 18 फरवरी तक राजधानी में रहेंगे।
दी दिवसीय प्रवास में वे कुटुंब बैठक, सामाजिक सद्भाव और युवाओं के साथ संवाद करेंगे।

जयाप्रदा अभद्र टिप्पणी :अदालत में विवेचक हुए पेश, दिए बयान

Jaya Prada Nahata Actress

अभिनेत्री, पूर्व संसद जयाप्रदा

एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट में अब तक आठ की गवाही
Post on 16.2.26 Monday
Moradabad Rajesh Bhatia.

मुरादाबाद,16 फरवरी(उप्र समाचार सेवा)।
पूर्व सांसद अभिनेत्री जयाप्रदा अभद्र टिप्पणी केस में विवेचक कोर्ट में हाजिर हुए। केस में पहले विवेचक ने कोर्ट में बयान दर्ज कराएं। केस में अगली सुनवाई 24 फरवरी को निर्धारित की गई है।मामला 2019 का है।
छह साल पहले मुरादाबाद में मुस्लिम इंटर कॉलेज में आजम खां के जीत की खुशी में सम्मान समारोह आयोजित किया गया था। समारोह में फिल्म अभिनेत्री जयाप्रदा पर अभद्र टिप्पणी की गई। आडियो वायरल होते ही वादी की ओर से आजम खां, अब्दुल्ला आजम, डा. एसटी हसन समेत सपाइयों के खिलाफ मुकदमा कायम किया गया। केस की सुनवाई एमपी एमएलए स्पेशल कोर्ट एसीजेएम प्रथम एमपी सिंह की कोर्ट में चल रहीं हैं। विशेष लोक अभियोजक मोहनलाल विश्नोई ने बताया कि केस में अब तक वादी जया प्रदा के अलावा सात गवाहों के बयान हो चुके हैं। कोर्ट में केस से जुड़े विवेचकों के बयान होने हैं। पिछली तारीख पर विवेचकों की गैर हाजिरी पर अदालत ने गैर जमानती वारंट जारी किए। हालांकि सोमवार को प्रथम विवेचक ऋषिपाल सिंह कोर्ट में हाजिर हुए। विशेष लोक अभियोजक का कहना है कि विवेचक के अदालत में बयान दिए। गवाही पूरी होने के बाद अब दूसरे विवेचक को तलब किया गया है। केस की सुनवाई के लिए 24 फरवरी निर्धारित की गई है।

February 11, 2026

सरकार ने स्वीकृत किया अखंड वन्देमातरम

जन गण मन से पहले बजेगा वंदे मातरम्, सरकार ने तय किया राष्ट्र गीत का नया नियम
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर नया प्रोटोकॉल जारी किया है.

UP Web News

यूपी वेब न्यूज

Posted on 11.02.2026 Wednesday, Time 11.54 AM, Vandematram 
नई दिल्ली 11 फरवरी 2026, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर नया प्रोटोकॉल जारी किया है. इसके तहत राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के छह अंतरों वाला 3 मिनट 10 सेकंड का पूरा संस्करण कई आधिकारिक अवसरों पर बजाया या गाया जाना अब अनिवार्य होगा. मंत्रालय का यह 10 पन्नों का आदेश 28 जनवरी को जारी किया गया है, जो सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, मंत्रालयों और संवैधानिक संस्थाओं को भेजा गया है.
आदेश के अनुसार, तिरंगा फहराए जाने के समय, राष्ट्रपति के किसी कार्यक्रम में आगमन और प्रस्थान पर, राष्ट्र के नाम उनके संबोधन से ठीक पहले और बाद में, तथा राज्यपाल या उपराज्यपाल के आगमन-प्रस्थान और भाषणों से पहले-बाद में ‘वंदे मातरम्’बजाया या गाया जाएगा. अगर किसी कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ दोनों प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले ‘वंदे मातरम्’ और उसके बाद ‘जन गण मन’ होगा. इस दौरान उपस्थित लोगों को सावधान मुद्रा में खड़े रहना होगा.
वंदे मातरम् के समय खड़ा होना अनिवार्य
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जब ‘वंदे मातरम्’ का आधिकारिक संस्करण बजाया या गाया जाए, तो श्रोताओं को सम्मान में खड़ा होना चाहिए. हालांकि, अगर किसी समाचार फिल्म या डॉक्यूमेंट्री में यह गीत फिल्म का हिस्सा हो, तो दर्शकों से खड़े होने की अपेक्षा नहीं की जाएगी, ताकि कार्यक्रम में अव्यवस्था न हो.

दरअसल अब तक ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रोटोकॉल नहीं था, जबकि राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के लिए समय, धुन और प्रस्तुति के नियम पहले से तय हैं. यह पहली बार है जब छह अंतरों वाले विस्तारित संस्करण को आधिकारिक कार्यक्रमों में शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं.
तीन कैटेगरी में बांटे गए कार्यक्रम

आदेश में कार्यक्रमों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है. पहली श्रेणी में वे अवसर हैं, जहां राष्ट्रीय गीत केवल बजाया जाएगा, जैसे- नागरिक अलंकरण समारोह, राष्ट्रपति का औपचारिक राजकीय समारोहों में आगमन-प्रस्थान, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और बाद में, राज्यपाल या उपराज्यपाल का औपचारिक कार्यक्रमों में आगमन-प्रस्थान, परेड में राष्ट्रीय ध्वज लाए जाने के समय आदि.
दूसरी श्रेणी में वे कार्यक्रम शामिल हैं, जहां गीत को बजाने के साथ-साथ सामूहिक गायन भी होगा. इसमें राष्ट्रीय ध्वज फहराने के अवसर, सांस्कृतिक और औपचारिक समारोह (परेड को छोड़कर), तथा राष्ट्रपति का किसी सरकारी या सार्वजनिक कार्यक्रम में आगमन और प्रस्थान शामिल है. इसके लिए कोयर, साउंड सिस्टम और आवश्यकता होने पर गीत के बोल वितरित करने की भी सलाह दी गई है.
तीसरी श्रेणी में वे अवसर हैं, जहां ‘वंदे मातरम्’ गाया जा सकता है, जैसे स्कूलों के कार्यक्रम. आदेश में कहा गया है कि स्कूलों में दिन की शुरुआत सामूहिक रूप से राष्ट्रीय गीत गाकर की जा सकती है और छात्रों में राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान बढ़ाने के प्रयास किए जाएं.
वंदे मातरम् पर नए आदेश की खास बातें
केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर क्या नया आदेश जारी किया है?

गृह मंत्रालय ने निर्देश दिया है कि अब ‘वंदे मातरम्’ का छह अंतरों वाला, 3 मिनट 10 सेकंड का आधिकारिक संस्करण कई सरकारी और औपचारिक कार्यक्रमों में बजाया या गाया जाएगा.
किन-किन मौकों पर ‘वंदे मातरम्’ बजाना या गाना अनिवार्य होगा?

राष्ट्रपति के आगमन-प्रस्थान, तिरंगा फहराने, राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले-बाद, राज्यपाल/उपराज्यपाल के कार्यक्रमों और नागरिक अलंकरण समारोहों जैसे अवसरों पर.
अगर ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ दोनों बजें तो क्रम क्या होगा?

पहले ‘वंदे मातरम्’ और उसके बाद राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ बजाया जाएगा.

क्या सभी लोगों के लिए खड़ा होना जरूरी होगा?

हां, जब आधिकारिक रूप से गीत बजाया या गाया जाए तो सभी को सावधान मुद्रा में खड़ा होना होगा.
क्या हर स्थिति में खड़ा होना अनिवार्य है?

नहीं, अगर किसी डॉक्यूमेंट्री या न्यूज़रील में ‘वंदे मातरम्’ फिल्म का हिस्सा हो, तो खड़े होने की जरूरत नहीं होगी.
स्कूलों के लिए क्या निर्देश हैं?

स्कूलों में दिन की शुरुआत सामूहिक रूप से ‘वंदे मातरम्’ गाकर की जा सकती है.
पहले ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कोई प्रोटोकॉल था?
नहीं, अब तक इसके लिए कोई तय आधिकारिक नियम नहीं थे, जबकि ‘जन गण मन’ के लिए पहले से नियम मौजूद हैं.
वंदे मातरम् पर सरकार का जोर
यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब केंद्र सरकार ‘वंदे मातरम्’ को लोकप्रिय बनाने पर जोर दे रही है. हाल ही में संसद में राष्ट्रीय गीत की 150वीं जयंती पर लंबी बहस हुई थी और इस वर्ष गणतंत्र दिवस परेड का विषय भी ‘स्वतंत्रता का मंत्र – वंदे मातरम्’ रखा गया था.
बंगाली साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1870 के दशक में रचित इस गीत के पहले दो अंतरों को 1950 में भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया था. पिछले वर्ष संसद में वंदे मातरम् पर हुई चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि गीत के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ ने इसके महत्व को कमजोर किया और इसे देश के विभाजन से भी जोड़ा.
नए आदेश के साथ ‘वंदे मातरम्’ के सम्मान और प्रस्तुति को लेकर एक स्पष्ट और औपचारिक व्यवस्था तय हो गई है, जिसे देशभर में लागू किया जाएगा.

February 8, 2026

मन में 2047 में देश विभाजन का डर नहीं, अखंड भारत का संकल्प मजबूत बनाओ

सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत का उदघोष, 2047 में विभाजन का डर पालने की बजाए, अखंड भारत के उदय की कल्पना करो

DR MOHAN BHAGWAT SRSANGHCHALAK RSS

मुम्बई में संघ यात्रा के सौ वर्ष नए क्षितिज व्याख्यान माला के पहले सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा मोहन भागवत

Posted on 08.02.2026 Sunday, Time: 08.09 PM, RSS Rashtriya Swayamsevak Sangh, Sar Sanghchalak, Mumbai Samvad, #RSS100

मुंबई, 08 फरवरी। देश विरोधी शक्तियों के देश विभाजन के मंसूबों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक जी ने कहा कि आप 2047 में देश विभाजन का डर पालने की बजाय, अखंड भारत के उदय की कल्पना करो। जो 500 साल में सुल्तान बादशाह यहां रहकर नहीं कर सके, 200 साल में अंग्रेज नहीं कर सके। वह स्वतंत्र भारत में क्यों व कैसे होगा, यह 1947 नहीं है। हम बहुत आगे बढ़ गए हैं, अब भारत को तोड़ने वाले टूट जाएंगे। भारत जुड़ जाएगा, और यह होगा। यह संकल्प मन में मजबूत बनाओ। तो ये जो कुछ लोग दुस्वप्न देख रहे हैं, उनके मंसूबे कभी सफल नहीं होंगे। हम सब लोग हैं, हम होने नहीं देंगे।

संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘संघ यात्रा के १०० वर्ष : नए क्षितिज’ दो दिवसीय संवाद कार्यक्रम में मुंबई के ९०० से अधिक प्रतिष्ठित मान्यवरों को संबोधित किया। नेहरू सेंटर सभागार, वरळी में रविवार, ०८ फरवरी को संपन्न प्रश्नोत्तर सत्र में डॉ. मोहन भागवत जी ने उपस्थित सदस्यों द्वारा विभिन्न राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विषयों पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दिए। इस अवसर पर मंच पर पश्चिम क्षेत्र संघचालक डॉ. जयंतीभाई भाडेसिया, कोंकण प्रांत संघचालक अर्जुन चांदेकर, मुंबई महानगर संघचालक सुरेश भगेरिया उपस्थित थे। पूछे गए कुल १४३ प्रश्नों को १४ श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। इनमें संघ नीति, हिन्दुत्व, राष्ट्रीय परिदृश्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति, विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, संस्कृति, कला, खेल व भाषा, जीवनशैली, पर्यावरण आदि विभिन्न विषयों से जुड़े प्रश्न शामिल रहे।

बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार पर सरसंघचालक जी ने बांग्लादेश के सवा करोड़ हिन्दुओं से संगठित होने का आह्वान किया। ऐसा होने पर अत्याचार पर स्वतः ही रोक लग जाएगी।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र इनमें से कोई नहीं, बल्कि हिन्दू ही संघ का सरसंघचालक होगा। उन्होंने कहा कि संघ का सरसंघचालक बनने के लिए किसी भी जाति का होना न तो बाधा है और न ही कोई अनिवार्य योग्यता। भविष्य में अनुसूचित जाति या जनजाति के कार्यकर्ता भी सरसंघचालक बन सकते हैं।

जिन पर पीढ़ी दर पीढ़ी अन्याय या अत्याचार हुआ है, उनके सर्वांगीण उत्थान होने तक तथा उनके मन में सुरक्षा की भावना उत्पन्न होने तक संविधान सम्मत आरक्षण जारी रहना चाहिए, यह संघ की स्पष्ट भूमिका है।

संघ के स्वयंसेवकों को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों तथा सभी प्रकार के प्रयासों में सहभागी होना चाहिए, यह संघ की भूमिका है। किंतु केवल कानून बनाकर भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना कठिन है, इसके लिए संस्कारित समाज मन का निर्माण उतना ही महत्वपूर्ण है। साथ ही कोई भी व्यवस्था मूल रूप से भ्रष्ट नहीं होती, बल्कि उस व्यवस्था में कार्य करने वाले व्यक्तियों का मन भ्रष्ट होता है और उसी कारण व्यवस्था भ्रष्ट होती है।

जबरदस्ती या लालच देकर धर्मांतरण किया जाता है तो वह निंदनीय है और उसका प्रत्युत्तर घर वापसी होगा, यह स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा या स्वप्रेरणा से धर्म परिवर्तन करता है तो उसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। जनसंख्या का अनुपात केवल जन्मदर में कमी से नहीं बदलता, बल्कि धर्मांतरण और अवैध घुसपैठ के कारण भी बदलता है, इस ओर ध्यान दिलाते हुए अवैध घुसपैठ के संदर्भ में ‘डिटेक्ट एंड डिपोर्ट’ नीति को कठोरता से लागू करने का आह्वान किया।

हिन्दू और सिक्ख पहले से ही एक थे और आज भी उनके बीच रोटी-बेटी के संबंध हैं। उनका रक्त संबंध है। पूजा पद्धति अलग मानी जा सकती है, उनकी विशिष्टता को मान्यता दी जानी चाहिए, लेकिन वे अलग नहीं हैं। हम सभी धर्म एक ही परंपरा से आए हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में केवल सिक्ख गुरुओं की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के संतों की वाणी संकलित की गई है। ‘हिंद की चादर’ के रूप में पहचानी जाने वाली यह प्राचीन एकता पुनः स्थापित करनी है। समाज के नाते हम सभी एक हैं, यह ध्यान में रखना चाहिए। हिन्दू नाम से कोई अलग धर्म अस्तित्व में नहीं है। आज जिसे हिन्दू धर्म कहा जाता है, वही प्राचीन सनातन धर्म है। तथागत बुद्ध ने अपने उपदेशों के माध्यम से इसी सनातन धर्म में समयानुकूल सुधार किए। आधुनिक काल में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने भी इस ओर इंगित किया।

ईसा मसीह द्वारा प्रतिपादित ईसाईयत और पैगंबर मोहम्मद द्वारा बताए गए इस्लाम का स्वरूप आज उसी रूप में दिखाई नहीं देता। इसका कारण यह है कि उनके बाद इन दोनों पंथों पर तत्कालीन राजनीति का प्रभाव बढ़ गया। परिणामस्वरूप इन पंथों की आध्यात्मिकता पीछे रह गई और राजनीतिक हित अधिक प्रभावी हो गए। इन पंथों के मूल आध्यात्मिक तत्वों को प्रोत्साहन दिया जाए तो विश्वभर के राजनीतिक संघर्ष कम हो सकते हैं।

भारत रत्न सम्मान प्राप्त न होने पर भी स्वातंत्र्यवीर सावरकर करोड़ों भारतीयों के हृदय पर राज कर रहे हैं। किंतु यदि उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाता है, तो इस सम्मान की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

भाजपा के सत्ता में आने से संघ को कोई प्रत्यक्ष लाभ हुआ ऐसा नहीं है, बल्कि समाज में संघ की बढ़ती शक्ति और स्वीकार्यता का लाभ समान विचारधारा और भारतीय नीतियों का पालन करने वाले दलों को मिला है। संघ के स्वयंसेवकों के निरंतर परिश्रम तथा समाज द्वारा संघ को मिले स्नेह और विश्वास के कारण ही संघ का कार्य बढ़ा है। संघ से संबंधित संस्थाओं, संगठनों या दलों पर संघ दबाव नहीं डालता। यहां कार्य करने वाले स्वयंसेवकों को पर्याप्त स्वतंत्रता होती है, जिससे वे अपने क्षेत्र में आवश्यक निर्णय और प्रयोग जिम्मेदारी से कर सकते हैं। वे जो अच्छे कार्य करते हैं, उसका श्रेय उन्हीं को जाता है, लेकिन जहां कमियां रह जाती हैं, उसके प्रश्न अभिभावक के नाते हमारे पास आते हैं और उसकी नैतिक जिम्मेदारी हम लेते हैं। संघ का कार्य केवल व्यक्ति निर्माण का कार्य है। किसी विशेष क्षेत्र में कार्य करना संघ का कार्य नहीं है।

समान नागरिक संहिता पर अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि समाज की मानसिकता तैयार करके तथा सभी समाज घटकों को विश्वास में लेकर इस प्रकार का कानून लागू किया जाना चाहिए। उत्तराखंड तथा अन्य कुछ राज्यों में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं, इसलिए हम उसका स्वागत करते हैं। भारत विविधता में एकता को बनाए रखने वाला देश है, यह सिद्धांत ऐसे कानून बनाते समय प्राथमिकता से ध्यान में रखना चाहिए।

संघ के कार्यकर्ताओं की औसत आयु २८ वर्ष है और इसे २५ वर्ष से नीचे लाने का प्रयास चल रहा है। देश का युवा देशभक्त और नैतिक आचरण करने वाला है। यदि उन्हें उनकी भाषा में विषय समझाए जाएं, तो वे उन्हें स्वीकार करते हैं और उसका आचरण भी करते हैं। इसलिए तार्किक पद्धति से उन्हें अपने मूल विचारों तक पहुंचाया जाना चाहिए। उन्हें प्रयोग करने की स्वतंत्रता और अवसर देना चाहिए तथा यदि प्रयोग में कोई त्रुटि हो जाए तो उनके पीछे दृढ़ता से खड़ा रहना चाहिए। यदि वर्तमान पीढ़ी युवाओं की जिज्ञासा शांत करने की क्षमता विकसित करे, तो युवा पीढ़ी और वर्तमान पीढ़ी के समन्वय से भविष्य का सशक्त भारत निर्माण होगा। भारतीय दर्शन का प्रभाव अंतरात्मा तक पहुंचता है, जबकि पाश्चात्य प्रभाव बाहरी स्तर तक सीमित रहता है।

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