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श्रद्धांजलि: मार्क टली सर.. आप बहुत याद आएंगे…..

January 26, 2026

श्रद्धांजलि: मार्क टली सर.. आप बहुत याद आएंगे…..

Mark Tuli, BBC Correspondent India

बीबीसी संवाददाता मार्क टुली (फाइल फोटो, वरिष्ठ पत्रकार रतिभान त्रिपाठी के साथ)

रतिभान त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार, राज्य मुख्यालय लखनऊ की फेसबुक वाल से साभार

Ratibhan Tripathi Senior Journalist

पत्रकारिता जगत में दैदीप्यमान नक्षत्र सरीखे पत्रकार और लेखक सर विलियम मार्क टली का रविवार को निधन हो गया। 90 वर्ष के मार्क टली भारत में बीबीसी के लिए काम करने वाले सबसे चर्चित पत्रकार रहे हैं। बीबीसी के लिए यूं तो वह अंग्रेजी में रिपोर्टिंग करते थे लेकिन उनका हिंदी ज्ञान ग़ज़ब का था। उनकी और मेरी पहली मुलाकात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, जाने-माने पत्रकार व लेखक और पंडित नेहरू व इंदिरा गांधी के करीब रहे पीडी टंडन के प्रयागराज स्थित आवास में हुई थी। संभवतः वह किसी फ्रांसीसी फिल्म निर्माता के साथ टंडन जी से मिलने आए थे। फिल्म निर्माता फिरोज गांधी पर कोई डाॅक्यूमेंट्री बनाने की तैयारी में थे। टंडन जी ने उसी वक्त मुझे भी अपने घर बुलाया था। तब मैं दैनिक जागरण में रिपोर्टिंग करता था। उन्होंने ही मार्क टली से मेरा परिचय कराया था।
अंग्रेज से अंग्रेजी भाषा में बोलने की अपेक्षा की जाती है लेकिन मार्क ने मुझसे हिंदी में बात की, अच्छी हिंदी में बात की। उनके बोल-चाल से लग ही नहीं रहा था कि वह अंग्रेज हैं। उनका उच्चारण विशुद्ध भारतीय था। उनका अंदाज देखकर मुझे बहुत सुखद अनुभूति हुई थी। वह तन से तो अंग्रेज थे लेकिन मन से भारतीय ही थे। ईसाई होते हुए भी वह एक हिंदू की तरह दाहिने हाथ में कलावा बांधते थे।
बातचीत में मार्क ने मुझे अपने जीवन की बहुत सारी बातें बताई थीं और अपना विजिटिंग कार्ड दिया था। मेरा नंबर भी लिया था। बाद में जब वह फिर से प्रयागराज आए तो मुझे फोन किया और जिस होटल में ठहरे थे, वहीं बुलाया। वह किसी रिपोर्टिंग के सिलसिले में ही आए थे। हम लोगों ने घंटों बातचीत की, चाय पी। उसी समय उन्होंने अपने साथ अयोध्या में हुई घटना का जिक्र करते हुए बताया था कि कारसेवकों ने उन्हें किस तरह बंधक बनाया था। फिर प्रशासन ने उन्हें कैसे मुक्त कराया था। पत्रकारिता के लिए उन्हें पहले पद्मश्री और फिर पद्मभूषण सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। उन्होंने भारतीय राजनीति समेत अनेक विषयों पर कई महत्वपूर्ण किताबें भी लिखी हैं।
मार्क टली को भारत और भारतीय परंपराओं का अच्छा ज्ञान था। उन्हें भारतीय परंपराओं से लगाव भी कम नहीं था। 1935 में कलकत्ता में जन्मे मार्क टली ने मुलाकात के दौरान बातचीत में मुझसे कहा था कि रतिभान जी, मैं हर हाल में भारत में रहना चाहता हूं। उनकी यह चाहत पूरी भी हुई। आज जब मार्क टली नहीं रहे तो उनकी यादों की बरात सी आ गई। उनके सान्निध्य में बिताए पल, उनकी बातचीत और हंसता मुस्कुराता चेहरा याद आ रहा है। अलविदा मार्क टली सर…आप बहुत याद आएंगे। आपकी पत्रकारिता और भारत के लिए प्रेम सदा याद किया जाएगा।

January 25, 2026

गणतंत्र के 77 वर्ष: उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ और भविष्य का संकल्प

 

– डॉ. सत्यवान सौरभ
Satywan Saurabh, Writer

सत्यवान सौरभ, लेखक, स्वतंत्र पत्रकार

भारत का गणतंत्र आज 77 वर्ष का हो चुका है। 26 जनवरी 1950 को लागू हुए संविधान ने एक नई भारत की नींव रखी, जो स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों से प्रेरित थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से हमने अनेक क्षेत्रों में प्रगति की—साहित्य, खेल, कृषि, विज्ञान-प्रौद्योगिकी से लेकर आर्थिक-सैन्य क्षमता तक। विविध संस्कृति को मजबूत करते हुए राष्ट्र ने वैश्विक पटल पर अपनी पहचान बनाई। चंद्रयान मिशनों से अंतरिक्ष विज्ञान में अग्रणी बने, यूपीआई जैसी डिजिटल क्रांति ने भुगतान व्यवस्था बदल दी, जबकि ओलंपिक-एशियाड में पदकों की बौछार ने खेलक्षेत्र में नई ऊंचाइयां छुईं। आज विश्व भारत को चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में देखता है, जहां सात से आठ प्रतिशत की विकास दर ने गरीबी उन्मूलन में योगदान दिया। लेकिन यह यात्रा सहज नहीं रही। आंतरिक चुनौतियां, सीमापार खतरे और सामाजिक विषमताएं बनी रहीं। गणतंत्र दिवस पर आत्मचिंतन आवश्यक है: हमने क्या पाया, क्या खोया और भविष्य के लिए क्या संकल्प लें?
भारत की पहली और सबसे बड़ी चुनौती थी—विविधता में एकता। महाद्वीप के आकार का यह देश सौ तीस करोड़ से अधिक लोगों, सैकड़ों भाषाओं-बोलियों, विविध धर्मों-संस्कृतियों का मेल था। स्वतंत्रता के समय आशंका थी कि यह एकजुट नहीं रहेगा। विभाजन की त्रासदी ने आशंकाओं को बल दिया, लाखों जानें गईं, लेकिन संविधान ने संघीय ढांचे से एकता सुनिश्चित की। अनुच्छेद एक ने ‘भारत एक अखंड राज्य’ घोषित किया। भाषाई राज्यों का पुनर्गठन, एकीकृत न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं को मुख्यधारा से जोड़ा। नक्सलवाद, अलगाववाद जैसी चुनौतियों के बावजूद हमने एकता बनाए रखी। पिछले 25 वर्षों में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना, पूर्वोत्तर में शांति प्रक्रियाएं इसका प्रमाण हैं। आज ‘एक देश, एक राशन’ जैसी योजनाएं विविधता को शक्ति बना रही हैं। यह उपलब्धि कम नहीं—विश्व के अधिकांश बहुलवादी देश टूट चुके, लेकिन भारत अटल खड़ा है।
दूसरी चुनौती थी—लोकतंत्र को जीवंत बनाना। संविधान ने वयस्क मताधिकार, मौलिक अधिकार, धर्मनिरपेक्षता प्रदान की। संसदीय प्रणाली अपनाई, जो ब्रिटिश मॉडल से प्रेरित किंतु भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप। नेहरू युग से चली आ रही परंपरा में अठारह लोकसभा चुनाव शांतिपूर्ण हुए। न्यायपालिका ने जनहित याचिका के माध्यम से गरीबों के अधिकार स्थापित किए—विशाखा दिशानिर्देशों से महिला सुरक्षा, शिक्षा का अधिकार से शिक्षा का अधिकार। महिला आरक्षण ने पंचायती राज में तैंतीस से पचास प्रतिशत क्रांति लाई, जो राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की प्रतीक्षा कर रहा। सूचना का अधिकार ने पारदर्शिता बढ़ाई, जबकि वस्तु एवं सेवा कर ने आर्थिक एकीकरण किया। चुनौतियां रहीं—आपातकाल जैसे काले अध्याय, लेकिन संस्थाओं ने पुनरुद्धार किया। आज त्रस्तंभ मजबूत हैं: चुनाव आयोग निष्पक्ष, भारतीय रिज़र्व बैंक आर्थिक स्थिरता का प्रहरी। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र ने साबित किया कि गरीबी और निरक्षरता के बावजूद प्रजातंत्र फल-फूल सकता है।
तीसरी चुनौती थी विकास। 1947 में सकल घरेलू उत्पाद दो लाख तीस हजार करोड़ था, आज चार सौ लाख करोड़ से अधिक। हरित क्रांति ने अन्न भंडार भरे, सफेद क्रांति ने दूध उत्पादन में विश्व रिकॉर्ड बनाया। इसरो के सौ से अधिक उपग्रह मिशन, कोविशील्ड वैक्सीन ने आत्मनिर्भरता दिखाई। डिजिटल भारत ने सौ करोड़ से अधिक आधार कार्ड जोड़े, जबकि स्टार्टअप भारत ने एक लाख से अधिक स्टार्टअप जन्मे। सामाजिक मोर्चे पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम ने अस्सी करोड़ को सस्ता अनाज दिया, स्वच्छ भारत ने बारह करोड़ शौचालय बनाए। आयुष्मान भारत ने पचास करोड़ गरीबों को स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया। लेकिन असमानता बनी—ऊपर दस प्रतिशत के पास सत्तावन प्रतिशत संपत्ति, जबकि निचले पचास प्रतिशत के पास तीन प्रतिशत। ग्रामीण-शहरी खाई, किसान आत्महत्याएं चिंताजनक। फिर भी, गरीबी रेखा से बाहर पच्चीस करोड़ लोग निकले—यह गर्व का विषय।
गणतंत्र की उपलब्धियां गर्व का कारण हैं, किंतु खोया भी बहुत। भ्रष्टाचार ने जड़ें जमा लीं—दो जी, कोयला आवंटन जैसी घोटालों ने अरबों लूटे। चुनावी बॉन्ड पर सवाल, नोटबंदी के बाद काला धन वापसी असफल। महिला असुरक्षा चरम पर—निर्भया से हाथरस तक बलात्कार की घटनाएं थम नहीं रही। जातिगत हिंसा, दलित अत्याचार जारी। किसान संकट गहरा: न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग, कर्जमाफी नाकाफी। युवा बेरोजगारी तीनों प्रतिशत पर, असंतोष से हिंसा भड़क रही। प्रदूषण घातक, प्रांतीयता का जहर बरकरार। अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर दुरुपयोग। नक्सलवाद, आतंकवाद बने सिरदर्द। ये घाव भारत माता को रक्तरंजित कर रहे।
खोया भले हो, लेकिन हल संभव। भ्रष्टाचार पर प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने रिसाव रोका। महिला सुरक्षा हेतु फास्ट-ट्रैक कोर्ट, निर्भया कोष उपयोग बढ़ाएं। किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, किसान उत्पादक संगठन मजबूत करें। रोजगार हेतु कौशल भारत, आत्मनिर्भर तीन से दस करोड़ नौकरियां सृजित संभव। सामाजिक सद्भाव हेतु संविधान जागरण अभियान चलाएं। प्रदूषण पर विद्युत वाहन नीति, नमामि गंगे को गति। पंचायती राज को सशक्त बनाएं—महिला प्रतिनिधित्व से स्थानीय शासन मजबूत। युवाओं को मुख्यधारा जोड़ें। कृत्रिम बुद्धिमत्ता-बिग डेटा से नफरत फैलाव रोका जा सकता। 2047 तक विकसित भारत का सपना साकार करने हेतु एकजुट हों।
गणतंत्र दिवस मात्र परेड-झंडारोहण नहीं, आत्मचिंतन का अवसर। हमने एकता, लोकतंत्र, विकास पाया; भ्रष्टाचार, असमानता खोया। लेकिन युवा शक्ति हमारा हथियार। आशावादी रहें—भारतीय मॉडल अपनाएं। राष्ट्रपिता गांधी, संविधान निर्माता अम्बेडकर के सिद्धांतों पर चलें। गणतंत्र को कंटीली झाड़ियों से निकालें, उज्ज्वल भविष्य बनाएं। जय हिंद, जय भारत!
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)

January 23, 2026

वाइफ स्वैपिंग और हमारे रिश्तों की टूटती नींव: समाज का आईना 

– डॉ. प्रियंका सौरभ
कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर लिखना आसान नहीं होता। वे केवल शब्दों की नहीं, बल्कि सामाजिक, मानसिक और नैतिक साहस की भी माँग करते हैं। यह विषय भी उन्हीं में से एक है, जहाँ चुनौती केवल प्रस्तुति की नहीं, बल्कि उस सच को सामने लाने की है जिसे समाज अक्सर ढककर रखना चाहता है। संस्कृति की आड़ में या आधुनिकता के नाम पर जिस चुपचाप गिरावट को स्वीकार किया जा रहा है, उस पर प्रश्न उठाना अब ज़रूरी हो गया है। आज जब परिवार की पवित्र संस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, ‘वाइफ स्वैपिंग’ जैसी प्रवृत्ति न केवल वैवाहिक बंधनों को चुनौती दे रही है, बल्कि पूरे समाज के मूल्यों को झकझोर रही है।
“वाइफ स्वप्पिंग” सुनते ही अधिकतर लोग इसे पश्चिमी संस्कृति या महानगरों तक सीमित मान लेते हैं। यह सोच हमें आत्मसंतोष देती है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक असहज और व्यापक है। क्या यह प्रवृत्ति वास्तव में केवल बड़े शहरों तक सीमित है, या फिर इसकी छाया गाँवों और छोटे कस्बों तक भी पहुँच चुकी है—बस हम उसे देखने से बच रहे हैं? उत्तर प्रदेश, केरल और लद्दाख जैसे क्षेत्रों से सामने आए मामले बताते हैं कि यह समस्या ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर मौजूद है।
यह विषय सनसनी फैलाने के लिए नहीं, बल्कि समाज के भीतर बदलते रिश्तों को समझने के लिए ज़रूरी है। यह विवाह संस्था की कमजोर होती नींव, रिश्तों में बढ़ती दरार और आधुनिकता के नाम पर मूल्यों की गलत व्याख्या की ओर ध्यान दिलाता है। यह केवल शारीरिक इच्छा का प्रश्न नहीं, बल्कि असुरक्षा, मानसिक अधूरापन, संवादहीनता और सामाजिक पाखंड का परिणाम भी है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसमें भावनात्मक शोषण, ईर्ष्या और विश्वास का पूर्ण विघटन होता है।
इस तरह के संवेदनशील विषय को संतुलित और मर्यादित भाषा में रखना अत्यंत आवश्यक है, ताकि गंभीरता बनी रहे। यह भी सामने आता है कि किस प्रकार सामान्य दिखने वाले परिवार धीरे-धीरे ऐसे कुचक्र में फँस जाते हैं, जहाँ रिश्ते भावनाओं की जगह समझौते और दिखावे का रूप ले लेते हैं। बैंगलोर, हापुड़ जैसे स्थानों से सामने आए मामले इसकी पुष्टि करते हैं।
आज यह मान लेना भूल होगी कि ऐसी प्रवृत्तियाँ केवल महानगरों तक सीमित हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट ने जहाँ स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोले हैं, वहीं मूल्यों के क्षरण को भी आसान बना दिया है। आभासी दुनिया में “सामान्य” लगने वाली भाषा, व्यवहार और रिश्ते वास्तविक जीवन में परिवारों की नींव हिला रहे हैं। आईटी क्रांति, उपभोक्तावादी संस्कृति और पश्चिमी प्रभाव ने युवा वर्ग में प्रयोग की होड़ बढ़ाई है। आर्थिक असमानता, संयुक्त परिवार का विघटन और महिलाओं की आर्थिक निर्भरता इसे बढ़ावा दे रही हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से यह यौन असंतोष, ईर्ष्या और रोमांच की तलाश से उपजता है।
भारतीय संदर्भ में यह पुरुषप्रधान समाज की देन है। पत्नियाँ डर के मारे चुप रहती हैं—तलाक का कलंक, आर्थिक असुरक्षा या परिवार का विघटन। सोशल मीडिया ग्रुप्स ने इसे संगठित रूप दिया है। टियर-2 शहरों में तकनीक-साक्षर युवा इसमें लिप्त हैं। इसके प्रभाव विनाशकारी हैं। वैवाहिक स्तर पर विश्वास टूटता है, ईर्ष्या बढ़ती है, भावनात्मक लगाव नए पार्टनर से हो जाता है। बच्चों पर असर लंबे समय तक रहता है—वे असुरक्षा और रिश्तों की अस्थिरता सीखते हैं। विस्तारित परिवार समर्थन छोड़ देता है। समाज स्तर पर यह नैतिक क्षय और महिलाओं के शोषण को बढ़ावा देता है। भारत में परिवार संरचना बदल रही है, लेकिन यह विकृति नई चुनौतियाँ ला रही है।
यह विमर्श केवल प्रश्न खड़े नहीं करता, बल्कि समाधान की ओर भी संकेत करता है। परिवार स्तर पर खुला संवाद, काउंसलिंग, भावनात्मक अंतरंगता आवश्यक है। समाज स्तर पर स्कूलों में नैतिक शिक्षा, महिलाओं का सशक्तिकरण ज़रूरी है। कानूनी स्तर पर IPC धाराओं का सख्त उपयोग, परिवार परामर्श नीतियाँ बनानी चाहिए।
यह विषय अश्लीलता नहीं, बल्कि समाज का आईना है। यह पाठक को असहज करता है, सोचने पर मजबूर करता है। शायद इसी असहजता में इसका सबसे बड़ा सामाजिक महत्व निहित है—कि हम अपने रिश्तों को पुनः परिभाषित करें। समय है जागने का।
  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

January 20, 2026

स्वतंत्रता आन्दोलन में डा. हेडगेवार जी का योगदान

प्रहार पर प्रहार जो करते है रात-दिन, आजादी में तुम्हारा, क्या योगदान है?
कितने ही भुलाए गए, कितने छिपाए गए,अनगिनत का समाया, इसमें प्राण दान है।

एक रीति-नीति से बद्ध ,सत्ता के करीबी थे जो,इतिहास ने उनका ही गाया गुणगान है।

हुंकार से हिल गईं,अंग्रेजी शासन की चूलें, उनको उग्रवादी कह,जाने क्यों बुलाया गया।
खून और पसीना जिनका, आजादी में है शामिल, ऐसे महापुरुषों को मेरा प्रणाम है।

मेरी स्वरचित ये पंक्तियां उद्घाटित करती है कि भारत की आजादी में अनेकानेक लोगों का योगदान है।कतिपय को इतिहास के पन्नों में उनके कार्य और बलिदान के अनुरूप उचित स्थान नहीं मिल पाया तो इसका कदापि ये अर्थ नहीं है कि वे वन्दनीय, स्मरणीय व स्तुत्य नहीं है। ऐसे ही महापुरुष हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम सरसंघचालक केशवराव बलिराम हेडगेवार। जिनके विषय में देश के कुछ दल और लोग कहते हैं कि देश की आजादी में संघ का कोई योगदान नहीं रहा। वास्तव में ऐसे लोग डॉ. हेडगेवार द्वारा आजादी हेतु किए गए संघर्ष को नकारकर देश में नकारात्मकता का वातावरण पैदा कर संघ के प्रति दुर्भावना जाग्रत करना चाहते हैं। आजादी के इस कालखंड के इतिहास का अवलोकन करने पर हमें ज्ञात होता हैं कि चाहेंं खिलाफत आंदोलन हो या असहयोग और नमक सत्याग्रह, सभी में डॉक्टर हेडगेवार जी ने अपने स्वयंसेवकों के साथ सक्रिय रूप से भाग लिया और जेल भी गए। “होनहार बिरवान के होत चिकने पात” कहावत के अनुसार डॉक्टर हेडगेवार जी में बचपन से ही राष्ट्रभक्ति और ब्रिटिश शासन के प्रति विद्रोह की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। इसे उनकी बचपन की दो घटनाएं रेखांकित करती हैं। प्रथम क्वीन विक्टोरिया की जयंती पर स्कूल में बांटी गई मिठाइयों को फेंक देना क्योंकि उनके मन में यह बात घर कर गई थी कि हम उनकी जयंती पर मिठाई क्यों खाएं? जिन्होंने हमें गुलाम बना रखा है और दूसरी घटना स्कूल में ब्रिटिश इंस्पेक्टर के आने पर उन्होंने सहपाठियों के साथ “वंदे मातरम” का उद्घोष किया जिसके कारण उनका स्कूल से निष्कासन हुआ। डॉक्टर साहब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की राष्ट्रभक्ति और हिंदू संस्कृति की विचारधारा से प्रभावित थे इसलिए उन्होंने 1910 में चिकित्सा शिक्षा के लिए कोलकाता जाने का निर्णय लिया जो उसे समय क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र था और वे क्रांतिकारी संस्था अनुशीलन समिति से जुड़े और क्रांतिकारी प्रशिक्षण प्राप्त किया। 1916 में नागपुर लौटने पर वे कांग्रेस से जुड़कर विदर्भ प्रांतीय कांग्रेस के सचिव बने और 1920 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव रखा जो उस समय पारित नहीं हुआ लेकिन यह प्रस्ताव कांग्रेस ने 9 साल बाद वर्ष 1929 के लाहौर अधिवेशन में पारित किया जिसके पारित होने पर डॉक्टर हेडगेवार ने तब संघ की सभी शाखों में कांग्रेस का अभिनंदन करने और 26 जनवरी 1930 को तिरंगा फहराने का निर्देश दिया। 1921 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले असहयोग आंदोलन में डॉक्टर हेडगेवार जी ने सक्रिय भागीदारी निभाई और “स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” जैसे नारे लगाने और भड़काऊ भाषणों के लिए उन्हें गिरफ्तार किया गया तथा 19 अगस्त 1921 से 11 जुलाई 1922 तक 1 साल जेल में रहे। जेल से रिहाई के बाद 12 जुलाई 1922 को मोतीलाल नेहरू, राजगोपालाचारी जैसे अनेक नेताओं की उपस्थिति में डॉक्टर साहब का भव्य स्वागत किया गया। 1925 में आरएसएस की स्थापना के बाद भी डॉक्टर साहब ने स्वतंत्रता संग्राम से दूरी नहीं बनाई बल्कि 1930 में गांधी जी के नमक सत्याग्रह के समांतर चले “जंगल सत्याग्रह” में सरसंघचालक पद से त्यागपत्र देकर सक्रिय भूमिका का निर्वहन किया और वन कानूनों का उल्लंघन करने के कारण 11 साथियों के साथ गिरफ्तार हुए और 9 महीने जेल में रहे ।यह मध्य प्रांत का सबसे सफलतम सत्याग्रह माना जाता है।महात्मा गांधी जी ने 8 अगस्त 1942 को गोवलिया टैंक मैदान ,मुंबई पर आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में “अंग्रेजों भारत छोड़ो” का नारा दिया जिससे महाराष्ट्र के अमरावती, वर्धा चंद्रपुर में विशेष आंदोलन हुए जिसका नेतृत्व संघ के अधिकारी दादा नायक बाबूराव, अण्णाजी ने किया और गोली लगने पर संघ के स्वयंसेवक बालाजी रायपुरकर का बलिदान हुआ। डॉ. हेडगेवार जी ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ-साथ 1925 को विजयादशमी के दिन हिंदू समाज को संगठित करने और उसके चरित्र निर्माण के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की क्योंकि उनका मानना था कि असंगठित समाज स्वतंत्रता को बनाए रखने में अक्षम है। शायद यही बात कुछ विशिष्ट विचारधारा वाले दलों के लोगों को अच्छी नहीं लगती है और वे डॉक्टर हेडगेवार जी के आजादी में योगदान को नकारते हैं जबकि डॉक्टर साहब बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे पहले क्रांतिकारी,फिर कांग्रेसी कार्यकर्ता और अंत में समाज सुधारक बने जो उनकी राष्ट्रभक्ति का द्योतक है। स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी तथा स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र को मजबूत रखने हेतु आरएसएस की स्थापना उनकी दूरगामी राष्ट्रवादी सोच का परिणाम है जिसके लिए वे वन्दनीय व अभिनन्दनीय हैं और उनका समग्र योगदान इतिहास में उचित स्थान पाने का हकदार है।

Chandra Prakash Sharma, Poet, Writer, Rampur, Uttar Pradesh

Chandra Prakash Sharma

डॉ.चन्द्रप्रकाश शर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार निवास -नसीराबाद (प्रकाश इण्टर कालेज),मिलक, रामपुर (उ.प्र.)-244701 मोबाइल -8273463656

January 15, 2026

बलिया का कस्बा जहां मुसलमान भी हैं सनातनी

स्नगरपंचायत जहां हिन्दू तो हिन्दू सात पीढियो से हजारो मुसलमान भी है सनातनी। सनातन धर्म और भगवान राम के सम्मान में नही बाजारों में बिकता है मांस, मछली, और नही कोई खाता है मांस मछली और अंडा।

संजय कुमार तिवारी

देश और दुनिया में सनातन धर्म की बढ़ती लोकप्रियता के बीच बलिया का अनोखा सनातन नगरी चितबड़ागांव नगर पंचायत जहां हिन्दू तो हिंदू मुसलमान भी सात पीढियो से सनातनी है । हिन्दू और मुसलमान भगवान राम और सनातन धर्म की आस्था में यहां मांस,मछली,और अंडा तक नही बिकता और नही यहां कोई इसका सेवन करता है यहां तक कि किसी कसाई को जमीन तक नही बेचता। नगर पंचायत के चेयरमैन ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर इस अनोखी सनातन नगरी को देश और दुनिया के पटल पर अयोध्या जैसे धार्मिक नगरी के रूप में विकसित करने का मांग किया है। तो वही मुसलमानो ने कहा वह भी सनातनी है और सनातन धर्म और भगवान की आस्था में यहां मांस, मछली, अंडा बेचना तो दूर इसका खुले तौर पर सात पीढियो से सेवन तक नही करते

बलिया मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर चितबड़ागांव आदर्श नगर पंचायत है जो देश और दुनिया का एक अनोखा नगर पंचायत है जो सनातन नगरी के रूप में मशहूर है। इस नगर पंचायत में यह समझना मुश्किल है कि कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान है।जिनकी जाती भले ही अलग है मगर धर्म सिर्फ सनातन है। इस अनोखी सनातन नगरी में भगवान राम और सनातन की आस्था में डूबे लोग आज तक मांस,मछली,और अंडा तक नही खाते है इतना ही नही बल्कि यहां के बाजारों में भी नही बिकता है। नगर पंचायत के चेयरमैन अमरजीत सिंह ने कहा 52 गांव का यह नगर पंचायत पूरे देश और दुनिया का एक अनोखा नगर पंचायत है जो सनातन नगरी के रूप में मशहूर है। देश के धार्मिक स्थलों पर मांस, मछली बिकने की रोक की भी मांग उठ रही है मगर इस सनातन नगरी में हिन्दू और मुसलमान सनातन और भगवान के सम्मान में स्वेच्छा से इनकी पीढियां दर पीढ़िया इसका सेवन खुले तौर पर नही करते न ही बाजारों में बिकता है।धार्मिक नगरी अयोध्या के तर्ज पर वह खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से मिलकर इस सनातन नगरी के विकास के लिए मांग किया है वही आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस नगरी में आने का न्योता दिया है। 50 हजार आबादी वाले इस नगर पंचायत में लगभग 6 हजार मुसलमान है जो सनातनी है।

सिर पर भले ही गोल टोपी हो मगर दिल सनातनी है यह हम नही सनातन नगरी चितबड़ागांव के मुसलमानों की माने तो यह धार्मिक और सूफी संतों की नगरी है जहाँ हिन्दू तो हिन्दू मुसलमान भी सनातन धर्म के सम्मान में मांस मछली का सेवन खुले तौर पर कभी नही करते यह परंपरा उनके पूर्वजो के समय से ही चली आ रही है जहा मुसलमानो की सात पीढ़िया सनातनी है।वह सनातन धर्म के सम्मान में किसी हिन्दू भाई को ठेस न पहुंचे इसलिए वह कभी मांस, मछली नही खाते और न ही आज़ाद भारत मे यहां के बाजारों में कभी बिका है यह तक कि किसी कसाई को यहां बसने के जमीन तक नही दी जाती है।

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