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महिलाओं को आरक्षण से वंचित रखने का जिम्मेदार कौन?

April 19, 2026

महिलाओं को आरक्षण से वंचित रखने का जिम्मेदार कौन?

Women Reservation in Parliament

Posted on 19.04.2026, Time 10.16 AM Sunday, Indian women reservation bill in Parliament, Article by Sarvesh Kumar Singh, Senior Journalist, Lucknow

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

सर्वेश कुमार सिंह

लोकसभा में कल महिला आरक्षण बिल गिर गया। यानी कि 29 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को 33% आरक्षण मिलने की उम्मीद एक तरह से धूमिल हो गई है या यह सपना टूट गया है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सत्ता पक्ष की रणनीति कमजोर रही या इस बिल के गिरने से और महिला आरक्षण की उम्मीद को पूरा करने में क्या विपक्ष की भूमिका नकारात्मक रही? क्या इसके लिए विपक्ष जिम्मेदार है?

यह कई प्रश्न जनता के सामने है। सवाल यह है कि महिला आरक्षण के लिए जब लगभग तीन दशक से मांगे उठती रही। सत्ता पक्ष या विपक्ष बदलते रहे। लेकिन ये मांग स्थिर रही। चाहे कांग्रेस सत्ता में रही हो या एनडीए की सरकार भाजपा की सरकार सत्ता में रही हो या यह दोनों विपक्ष में रहे हो महिला आरक्षण के मुद्दे पर लगभग एक मत थे लेकिन उसके बावजूद पिछले तीन दशक में महिला आरक्षण महिलाओं को 33% आरक्षण नहीं मिल सका। एक प्रयास नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2023 में किया और नारी बंधन अधिनियम 2023 सरकार लेके आई जिसका आशय है कि सभी लोकसभा राज्यसभा विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा। लेकिन उसके साथ ही शर्त यह थी कि यह नए परिसीमन के बाद होगा। ऐसा संवैधानिक आवश्यकता भी थी। तो सरकार ने अब यह प्रयास किया एक विशेष सत्र सत्र तो चल ही रहा है बजट सत्र। उसमें विशेष चर्चा के लिए दो दिन का समय निर्धारित हुआ 16 और 17 अप्रैल का कि इसमें नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने के लिए जो प्रावधान है और जो संविधान संशोधन है वो किए जाएंगे और आरक्षण 2029 में लागू हो जाएगा। लेकिन वो प्रयास सफल नहीं हुआ। इसके लिए सरकार तीन विधेयक लेकर आई। दो दिन की चर्चा हुई। पहले दिन चर्चा हुई और उसके बाद विधेयक प्रस्तुत हुए। पहला जो विधेयक था जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण था ये था 131वा संशोधन विधेयक।

इसके अनुसार लोकसभा में सदस्यों की संख्या वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 किया जाना था। यानी कि इसके लिए विधेयक प्रस्तुत किया कि संसद में सदस्यों की संख्या को विस्तारित कर दिया जाए और उसके बाद फिर 33% आरक्षण उनको दिया जाएगा। यह विधेयक था। इसके साथ ही दो और सहायक विधेयक थे जिसमें एक दूसरा विधेयक है कि परिसीमन के लिए अनुमति संसद से ली जाए और परिसीमन आयोग बनाया जाए। वह लोकसभा क्षेत्रों का परिसीमन करें उसी 850 के अनुसार ताकि महिलाओं को उसमें आरक्षण दिया जा सके। 33% आरक्षण किया जा सके। जो तीसरा विधेयक था यह था केंद्र शासित प्रदेशों में भी परिसीमन करना और सीटों में वृद्धि करना। इसके लिए था। लेकिन जो पहला विधेयक था वही कल लोकसभा में मतदान के दौरान गिर गया। इसके पक्ष में 298 वोट पड़े और विपक्ष में 230 वोट पड़े। जबकि आवश्यकता 342 की थी। 54 मत कम रह गए जिसके कारण यह विधेयक गिर गया। जब यह विधेयक गिर गया तो सरकार ने जो बाकी दो विधेयक थे उनको भी वापस ले लिया। उनको प्रस्तुत ही नहीं किया। यह तो कल की प्रक्रिया रही। लेकिन अब इस पर एक नई बहस शुरू हो गई है कि आखिर ऐसे क्या कारण थे कि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के दूसरे दल इस बात पर आमादा थे कि यह विधेयक पारित ना हो।

विपक्षी दल बात तो करते हैं महिला आरक्षण की कि महिला आरक्षण मिलना चाहिए। हम हर हाल में तैयार हैं। लेकिन जब बिल आया तो बिल गिरा दिया। उनके तर्क क्या है? पहला तर्क है कि दक्षिण भारत के राज्यों के साथ इस बिल से अन्याय हो जाएगा। यानी कि जो परिसीमन होना है यह परिसीमन 2011 की जनसंख्या के आधार पर होना है। यानी 2011 में जो जनगणना हुई थी उसको आधार बनाकर परिसीमन हुआ। दक्षिण के राज्यों की चिंता यह है कि उनके यहां जनसंख्या का अनुपात लगातार घट रहा है। आबादी कम हो रही है और उत्तर भारत के राज्यों में आबादी का घनत्व बढ़ता चला जा रहा है। ऐसे में जब आबादी के आधार पर परिसीमन होगा तो दक्षिण के राज्यों में लोकसभा क्षेत्रों की संख्या वर्तमान से भी कम हो जाएगी। बढ़ने बढ़ेगी तो नहीं बढ़ने से भी और कम हो जाएगी। और उत्तर भारत में लगभग दो गुनी हो जाएगी। यह आशंका दक्षिण के राज्यों की है।

पूर्वोत्तर के राज्यों की भी ऐसी ही आशंकाएं हैं क्योंकि वहां भी आबादी का घनत्व नहीं है। उत्तराखंड में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति है। हिमाचल में भी ऐसी ही स्थिति है। ये एक बड़ी आशंका है। तो इसे विपक्ष ने आधार बना लिया। हालांकि इसका समाधान कल जब यह विधेयक पेश हुआ उससे पहले चर्चा का जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने बड़ा साफ कहा कि हम दक्षिण की इन चिंताओं से वाकिफ हैं और हम उनके साथ अन्याय नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा कि हम हर हाल में जनसंख्या भले ही कम हो दक्षिण के राज्यों में 50% सीटें बढ़ा देंगे। यह आश्वासन उन्होंने दिया। बल्कि उन्होंने तो यह कहा कि अभी एक घंटे में समर्थन अगर देने को तैयार हो विपक्ष तो मैं एक घंटे में ही नया विधेयक प्रस्तुत कर दूंगा और 50% संख्या हम दक्षिण के राज्यों की बढ़ा देंगे। लेकिन कांग्रेस इस पर नहीं मानी और जो उनके सहयोगी दल है वो भी नहीं माने

अंतत यह विधेयक गिर गया। कांग्रेस की जो दूसरी मांग है या उनका जो पक्ष है वह यह है कि इस आरक्षण को क्यों ना वर्तमान संख्या पर ही लागू कर दिया जाए। जो वर्तमान 543 की लोकसभा संख्या है उसमें सरकार आरक्षण क्यों नहीं देना चाहती वो तो साधारण बहुमत से भी हो जाएगा। हालांकि जो संविधान संशोधन था उसके लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत थी और वो दो तिहाई नहीं मिला तो गिर गया। लेकिन कांग्रेस ये भी कहती है कि इसमें शशि थरूर ने भी बड़ी साफ बात कही कि वर्तमान पर क्यों नहीं देते? इसे शशि थरूर ने कहा कि महिला आरक्षण को केंद्र सरकार ने एक कांटों से लिपटी हुई लिपटे हुए तोहफे के रूप में प्रस्तुत किया है। यानी कि बहुत जटिल बना दिया है। लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, राजनाथ सिंह ने इसके पक्ष में तर्क दिए और कहा कि यह आवश्यक है कि हम पहले इसका परिसीमन करें। सदस्यों की संख्या बढ़ाएं और ताकि कोई भी समुदाय और कोई भी वर्ग इससे प्रभावित ना हो और विस्तारित संसद में ही इसको आरक्षण को दिया जाए। लेकिन अब इस विधेयक के गिरने के बाद जो स्थिति है वो यह बन गई है कि अब 2029 के लोकसभा चुनाव में तो आरक्षण लागू नहीं हो पाया। क्योंकि अभी अब अगर यह नई जनसंख्या के आधार पर होगा तो जो जनगणना चल रही है जनगणना 2026 के परिणाम 2027 के अंत तक आएंगे। हो सकता है 2028 भी हो जाए। उसके बाद फिर विधेयक आएगा और परसीमन के लिए विधेयक पारित होगा। परसीमन होगा। परसीमन आयोग बनेगा। परसीमन आयोग के लिए समय चाहिए। पूरे देश में जगह-जगह जाकर उनको मीटिंग करनी पड़ेगी। उसमें भी कम से कम एक साल डेढ़ साल का समय चाहिए। तब तक लोकसभा चुनाव हो चुका होगा और 2029 में यह लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू नहीं हो पाएगा। एक तरह से यह सपना 2029 के लिए तो टूट गया। अब कांग्रेस यह भी कह रही है कि यह पूरा मुद्दा जो है चुनाव से संबंधित है।

भाजपा चुनाव में इसका लाभ लेना चाहती थी। इसलिए उसने यह विधेयक पेश किया। यह बात भी सही है कि सत्तारूढ़ दल ने जब यह विधेयक पेश किया तो उसने उतना होमवर्क नहीं किया जितना वो पहले करती थी और यह पहला विधेयक है जो नरेंद्र मोदी सरकार का गिरा है तो क्या केंद्र सरकार ने इस पूरे विधेयक को पेश करने से पहले पूरी प्रक्रिया और विपक्षी दलों के साथ और कुछ ऐसे दलों के साथ जो इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है उनके उनके साथ बातचीत नहीं की और वो पूरी तैयारी रणनीति क्यों नहीं बनी जो ये विधेयक पारित हो जाता कुछ भी हो, लेकिन ये एक कष्टकारी विषय है कि एक अच्छे उद्देश्य के लिए लाया गया विधेयक गिर गया। अब यह फैसला जनता के हाथ में है कि महिला आरक्षण को रोके जाने के दोषी जनता विपक्ष को मानेगी या सत्तारूढ़ दल की कमजोर रणनीति को मानेगी यह जनता के हाथ में है।

जनता इसका निर्णय करेगी। इस पर चिंतन होगा। लेकिन महिला आरक्षण बिल पास होना चाहिए था। हालांकि मांग तो यह थी कि महिलाओं को 50% आरक्षण दिया जाए। लेकिन 33% मिला तो 33% भी संतुष्ट करने वाला है। 33% अभी की जो संख्या है लोकसभा में या संसद में वो 14% महिलाएं ही हैं कुल संख्या की तो 33% होंगी। ये भी एक उपलब्धि होगी। लेकिन अब ये 2029 के चुनाव के बाद ही प्रक्रिया पूरी होगी। या सरकार अगर कोई ऐसा विधेयक ले आती है कि जो वर्तमान सदस्य संख्या पर ही लागू कर दिया जाए तब भले ही 2029 में आरक्षण मिल जाए। विपक्ष का एक वर्ग जिसमें समाजवादी पार्टी मुख्य रूप से है। इनका कहना यह है कि ये जो आरक्षण बिल मिले महिलाओं को वो आरक्षण के अंदर आरक्षण के साथ मिले। यानी कि महिला आरक्षण में भी ओबीसी आरक्षण लागू किया जाए। कई दलों ने तो धार्मिक आरक्षण की मांग कर दी। लेकिन कल गृह मंत्री अमित शाह ने बहुत साफ कहा कि किसी भी हालत में धार्मिक आरक्षण देश में किसी भी स्थिति में कहीं भी स्वीकार नहीं है और वो लागू नहीं किया जाएगा। ओबीसी आरक्षण को भी सरकार ने कहा कि हम ओबीसी जनसंख्या की गणना जरूर कराएंगे। जनगणना ओबीसी की होगी। लेकिन उन्होंने कहा कि जो महिला आरक्षण है उसमें एससी एसटी को आरक्षण मिलेगा और एससी एसटी की सीटें बढ़गी।

अब सरकार ने एक नया अपना पक्ष प्रस्तुत किया है विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने के लिए। अमित शाह ने कल कहा कि विपक्ष ने एससी एसटी के सदस्यों की संख्या को बढ़ने से रोक दिया है। एससी एसटी के साथ अन्याय किया है। महिलाओं के साथ अन्याय किया है। इसका जवाब जनता उनको देगी। महिलाएं उनको देंगी। देखते हैं आने वाले चुनाव में क्या इसका कोई असर होता है या जनता में किस तरह का जनमत बनता है। जनता विपक्ष को कड़कड़े में खड़ा करती है या सत्तारूढ़ दल को ही कट में खड़ा कर देगी कि आपने इतना जटिल इस पूरी प्रक्रिया को क्यों बना दिया है।

The Women’s Reservation Bill collapsed in the Lok Sabha yesterday. That is, has the hope of getting 33 per cent reservation for women in the 29th Lok Sabha elections been dashed in a way or has this dream been broken? Who’s responsible for this? Has the ruling party’s strategy been weak or has the opposition played a negative role in the fall of this bill and in fulfilling the hope of women’s reservation? Is the opposition responsible for this?

February 25, 2026

एआई सम्मेलन – भारत की अभूतपूर्व सफलता और व्यथित कांग्रेस

India AI Impact Summit 2026, New Delhi
मृत्युंजय दीक्षित
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एआई शिखर सम्मेलन में आए विश्व के बड़े बड़े नेता इस पहल से अचंभित थे और भारत की प्रगति की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे। बड़ी बड़ी एआई कंपनियां व निवेशक भारत के साथ समझौते कर रही थीं। जन सामान्य गर्वित हो रहा था क्योंकि यहाँ भारत की युवा प्रतिभाओं की सराहना हो रही थी। सदा से ही राष्ट्र विमुख रही कांग्रेस पार्टी से ये देखा नहीं गया और उनके कुछ चुनिंदा कार्यकर्ता वहां अर्धनग्न होकर प्रदर्शन करने पहुँच गए। वास्तव में अब कांग्रेस पार्टी अब प्रधानमंत्री मोदी व भाजपा का विरोध करते -करते पूरी तरह भारत विरोधी हो गई है।
कांग्रेस का यह विरोध ऐसा ही था जैसे जब प्राचीन काल में जब ऋषि गण अपने आश्रमो मे किसी अच्छे कार्य के लिए यज्ञादि करते थे तो कुछ राक्षस उस यज्ञ को अपवित्र करने के लिए यज्ञकुंड में हड्डियां डालकर उसे अपवित्र करने का प्रयास करते थे। कांग्रेस ने जो कृत्य विदेशी मेहमानों के समक्ष किया है उससे स्पष्ट है कि कांग्रेस घोर अराजकतावादी बन चुकी है जिसकी अब सारी उम्मीदें समाप्त होती जा रही हैं।
एआई समिट कांग्रेस द्वारा की गई इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से भारत का जेन- जी भी नाराज़ है जिसको भड़काकर कांग्रेस सड़क पर लाना चाहत है। भाजपा कांग्रेस द्वारा दिए गए इस अवसर को गंवाना नहीं चाहती । पार्टी की तरफ से संपूर्ण भारत में कांग्रेस कर्यालयों के बाहर धरना -प्रदर्शन आयोजित हो रहे हैं। मेरठ में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी भी कांग्रेस पर हमलावर हुए ओैर कहा कि कांग्रेस ने एआई समिट को अपनी नग्न राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। उन्होंने कांग्रेस से पूछा कि देश तो जानता ही है कि आप पहले से ही नंगे हो फिर कपड़े उतारने की जरूरत क्यों पड़ी? यह दिखाता है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अब वैचारिक रूप से कितनी दिवालिया और दरिद्र हो गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने मीडिया से अपील करते हुए कहा कि जब मैं कांग्रेस की आलोचना करता हूं तो ऐसी सुर्खियां न चलाएं कि मोदी ने विपक्ष पर हमला बोला। कांग्रेस को बचाने की ये चालाकियां बंद करें।
इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस को सपा बसपा सहित कई अन्य छोटे क्षेत्रीय दलो का समर्थन नहीं मिला है जिनको कांग्रेस इंडी ब्लॉक की पार्टियाँ कहती है। कांग्रेस के इस कृत्य का लालू यादव की पार्टी राजद ने भी कड़ा विरोध किया है। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी विरोध किया है। कांग्रेस ने इस तरह का प्रदर्शन करके सहयोगी दलों के बीच भी अपनी फजीहत करवा ली है। आगामी समय में यह दल कांग्रेस से दूरी बनाने पर विचार भी कर सकते हैं यही कारण हे कि इन सभी दलों की प्रधानमंत्री मोदी ने सराहना की है।
कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता जिस प्रकार टी वी चैनलों व सोशल मीडिया पर इस हरकत को सही ठहरा रहे हैं उससे स्पष्ट है कि यह कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की ही योजना थी। उनका कहना है कि लोकतंत्र मे अपनी बात कहने और सरकार का विरोध करने का अधिकार सबको है, उन्होंने अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग किया है। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की इस हरकत से पुराने परंपरागत कांग्रेसी से भी खुश नहीं हैं और अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे है। पुराने कांग्रेस नेताओं को इस घटना से कोई हैरानी नहीं है अपितु उनका कहना है कि यह बदली हुई कांग्रेस की बदलती हुई संस्कृति की निशानी है। कांग्रेस नेता शशि थरूर भी एआई समिट को अत्यंत सफल आयोजन बता रहे हैं और कांग्रेस के अर्धनग्न प्रदर्शन की निंदा कर रहे हैं। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी की छवि को नुकसान पहुंचाने के चक्कर में कांग्रेस ने भारत की छवि व भारतीय संस्कृति को नुकसान पहुंचाया और इस तरह होली के स्वागत में अपने मुंह पर ही कालिख मल ली।
कांग्रेस के नेताओं की दिली इच्छा रही है कि किसी न किसी प्रकार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भारत की छवि को पूरी दुनिया में खराब किया जाए और भारत में बांग्लादेश व नेपाल जैसी अराजकता का वातावरण पैदा कर अपना स्वार्थ सिद्ध किया जाए किंतु उसका यह सपना पूरा नहीं हो पा रहा है और यही कारण है कि कांग्रेस हताश होकर नंगी राजनीति पर उतर आई है।

Mratunjay Dixit, Journalist lucknow

मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं. – 9198571540

February 24, 2026

शादी की बदलती तस्वीर: दिखावे, अहंकार और टूटते रिश्ते

Freelance writer

– डॉ० प्रियंका सौरभ
भारतीय समाज में शादी केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं रही है, बल्कि इसे हमेशा से परिवार, समाज और संस्कारों से जुड़ी एक पवित्र संस्था माना गया है। विवाह को जीवनभर का साथ, सुख-दुख में एक-दूसरे का संबल और सामाजिक स्थिरता की आधारशिला समझा जाता रहा है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस संस्था की तस्वीर तेजी से बदली है। आज शादी का मतलब साथ निभाने का संकल्प कम और सामाजिक प्रदर्शन अधिक होता जा रहा है। परिणामस्वरूप रिश्ते कमजोर हो रहे हैं और तलाक या अलगाव के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
आज यह एक कड़वी सच्चाई है कि लोग शादी पर 20–25 लाख रुपये या उससे भी अधिक खर्च कर रहे हैं, लेकिन उसी शादी के कुछ महीनों या दिनों तक चलने की कोई गारंटी नहीं रह गई है। आंकड़े बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में लगभग 40 से 50 प्रतिशत वैवाहिक रिश्ते टूटने की कगार पर हैं या पहले ही टूट चुके हैं। यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक समस्या का संकेत है, जिसे नज़रअंदाज़ करना आने वाले समय में भारी पड़ सकता है।
इस संकट का सबसे बड़ा कारण है दिखावे की संस्कृति। शादी अब एक निजी निर्णय नहीं, बल्कि एक भव्य इवेंट बन चुकी है, जिसमें होटल, डेस्टिनेशन वेडिंग, महंगे कपड़े, फोटोशूट और सोशल मीडिया पोस्ट सबसे अहम हो गए हैं। लोग यह सोचने में अधिक समय लगाते हैं कि मेहमान क्या कहेंगे, रिश्तेदार कितने प्रभावित होंगे और इंस्टाग्राम पर तस्वीरें कैसी दिखेंगी। लेकिन यह सोचने का समय नहीं निकालते कि जिस इंसान के साथ पूरी ज़िंदगी बितानी है, उसके विचार, स्वभाव, सहनशीलता और जीवन के प्रति दृष्टिकोण क्या हैं।
सोशल मीडिया ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। हर व्यक्ति खुद को बेहतर दिखाने की कोशिश में अपनी वास्तविकता छिपा रहा है। शादी से पहले बनाई गई यह “परफेक्ट इमेज” शादी के बाद धीरे-धीरे टूटती है और जब सच्चाई सामने आती है, तब निराशा, टकराव और असंतोष जन्म लेता है। लोग समझ पाते हैं कि वे जिस इंसान से शादी कर बैठे हैं, वह वैसा नहीं है जैसा उन्होंने कल्पना की थी।
दूसरा बड़ा कारण है धैर्य की कमी और अहंकार की अधिकता। आज के समय में लोगों का पेशेंस लेवल लगभग शून्य पर आ गया है, जबकि ईगो का स्तर सौ पर पहुंच चुका है। छोटी-छोटी बातों पर रिश्तों में दरार आ जाती है। संवाद करने, समझाने और समझने की जगह लोग तुरंत निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि यह रिश्ता काम नहीं करेगा। “मैं क्यों समझौता करूँ?” और “मेरी खुशी सबसे ऊपर है” जैसी सोच रिश्तों को खोखला कर रही है।
पहले रिश्तों में समस्याएं आती थीं, लेकिन उन्हें सुलझाने की कोशिश की जाती थी। आज समस्याएं आते ही लोग अलग होने को सबसे आसान समाधान मान लेते हैं। रिश्तों को निभाने की जगह उन्हें बदल देने की मानसिकता बढ़ती जा रही है। यह उपभोक्तावादी सोच केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब रिश्तों में भी प्रवेश कर चुकी है।
एक और महत्वपूर्ण कारण है संयुक्त परिवार प्रणाली का टूटना और एकल परिवारों का बढ़ना। संयुक्त परिवारों में बच्चे बचपन से ही बड़ों को देखकर सहनशीलता, त्याग, जिम्मेदारी और रिश्तों को निभाने की कला सीखते थे। मतभेद होते थे, लेकिन उन्हें बातचीत और समझदारी से सुलझाया जाता था। आज एकल परिवारों में पले-बढ़े बच्चों को यह व्यवहारिक प्रशिक्षण बहुत कम मिल पाता है।
इसका मतलब यह नहीं कि एकल परिवार गलत हैं, लेकिन यह सच है कि उनमें सामूहिक जीवन का अनुभव सीमित होता है। परिणामस्वरूप जब युवा शादी के बाद नए रिश्तों और नई जिम्मेदारियों का सामना करते हैं, तो वे मानसिक रूप से उसके लिए तैयार नहीं होते। थोड़ी-सी असहमति भी उन्हें असहनीय लगने लगती है।
इसके साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्रता और बदलती सामाजिक भूमिका भी रिश्तों पर असर डाल रही है। आज महिलाएं आत्मनिर्भर हैं, जो एक सकारात्मक बदलाव है, लेकिन इसके साथ ही अपेक्षाओं का टकराव भी बढ़ा है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों को लेकर अधिक सजग हैं, जो सही भी है, लेकिन जब यह आपसी सम्मान और संवाद के बिना होता है, तब टकराव की स्थिति बन जाती है। बराबरी का अर्थ सहयोग होना चाहिए, न कि प्रतिस्पर्धा।
एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि आज की पीढ़ी लंबे समय तक किसी एक निर्णय पर टिके रहने से डरती है। करियर हो, शहर हो या रिश्ता—हर जगह “अगर बेहतर विकल्प मिल जाए” वाली सोच हावी है। यही सोच शादी जैसे स्थायी संबंध को अस्थिर बना रही है। जब हर समय यह भावना बनी रहे कि इससे बेहतर कुछ और मिल सकता है, तो किसी भी रिश्ते में संतोष और स्थिरता संभव नहीं रह जाती।
इन सभी कारणों के चलते यह आशंका बढ़ रही है कि आने वाले समय में लोग शादी जैसी संस्था से ही दूरी बनाने लगेंगे। कुछ लोग पहले ही विवाह को बोझ या जोखिम के रूप में देखने लगे हैं। यदि यह प्रवृत्ति यूँ ही बढ़ती रही, तो इसका असर केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक ढांचे पर भी पड़ेगा। परिवार, जो समाज की सबसे छोटी इकाई है, यदि कमजोर होगा तो समाज की स्थिरता भी खतरे में पड़ जाएगी।
हालांकि, यह कहना गलत होगा कि समस्या का कोई समाधान नहीं है। असल समस्या शादी में नहीं, बल्कि शादी के प्रति हमारी सोच और प्राथमिकताओं में है। जरूरत है दिखावे और फिजूलखर्ची को कम कर, आपसी समझ, संवाद और भावनात्मक जुड़ाव को प्राथमिकता देने की। शादी से पहले एक-दूसरे को समय देना, खुलकर बातचीत करना और अपेक्षाओं को स्पष्ट रखना बेहद जरूरी है।
इसके साथ ही समाज और परिवारों को भी यह समझना होगा कि शादी केवल रस्मों और परंपराओं का पालन नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों को मानसिक रूप से जोड़ने की प्रक्रिया है। युवाओं को यह सिखाने की आवश्यकता है कि रिश्ते परफेक्ट नहीं होते, उन्हें धैर्य, सम्मान और समझदारी से मजबूत बनाया जाता है।
अंततः यह समय आत्ममंथन का है। यदि हम आज भी केवल दिखावे, अहंकार और जल्दबाजी को ही प्राथमिकता देते रहे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए रिश्ते केवल अस्थायी समझौते बनकर रह जाएंगे। लेकिन यदि हम समय रहते अपनी सोच बदले, तो शादी जैसी संस्था को फिर से विश्वास, स्थिरता और सम्मान का आधार बनाया जा सकता है। समाज का भविष्य इसी संतुलन पर निर्भर करता है।
 (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

February 16, 2026

Bangladesh Election ढाका में बदलाव, भारत के सामने नई कसौटी

New Government of Bangladesh
Posted on 16.02.2026, Monday Time 10.07 AM , Dhaka, Writer Priyanka Saurabh 
(सत्रह वर्षों बाद सत्ता में लौटी बीएनपी ने बांग्लादेश की राजनीति की दिशा बदली है; भारत के सामने अब अवसरों के साथ नई अनिश्चितताएँ भी खड़ी हैं।)
 डॉ. प्रियंका सौरभ
बांग्लादेश के हालिया आम चुनावों में बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (बीएनपी) Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने तारिक रहमान Tarik Rehman के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। सत्रह वर्षों के लंबे निर्वासन के बाद राजनीति में लौटे तारिक रहमान ने अपनी माँ और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया Khalida Jiya की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए पार्टी को दो-तिहाई से अधिक सीटें दिलाईं। यह जीत न केवल एक चुनावी सफलता है, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति में सत्ता संतुलन के व्यापक पुनर्संयोजन और एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत का संकेत भी देती है। भारत के लिए यह परिणाम अवसरों के साथ-साथ कई रणनीतिक अनिश्चितताएँ भी लेकर आया है, जिनका प्रबंधन आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों की दिशा तय करेगा।
पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय तक बांग्लादेश की राजनीति पर अवामी लीग और शेख हसीना Sheikh Hasina का वर्चस्व रहा। इस अवधि में स्थिरता, आर्थिक विकास और क्षेत्रीय सहयोग के साथ-साथ सत्ता के केंद्रीकरण, विपक्ष के दमन और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने के आरोप भी लगातार लगते रहे। लंबे समय तक एक ही राजनीतिक धारा के प्रभुत्व ने मतदाताओं में प्रशासनिक थकान और परिवर्तन की आकांक्षा को जन्म दिया। बीएनपी की जीत को इसी व्यापक जन-असंतोष और राजनीतिक विकल्प की तलाश के परिणाम के रूप में देखा जा सकता।
तारिक रहमान लंबे समय से बांग्लादेश की राजनीति में एक प्रभावशाली, किंतु विवादास्पद चेहरा रहे हैं। निर्वासन काल के दौरान उन पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और कट्टरपंथी तत्वों से संबंधों जैसे आरोप लगे, जिनके कारण उनकी छवि धूमिल हुई। हालांकि दिसंबर 2025 में लंदन से स्वदेश वापसी के बाद उन्होंने अपने राजनीतिक दृष्टिकोण में बदलाव के संकेत दिए। उन्होंने पार्टी संगठन का पुनर्गठन किया, युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाया और जमीनी स्तर पर जन आंदोलन को पुनर्जीवित किया। निर्वासन काल के अनुभवों को उन्होंने राजनीतिक पूंजी में बदला और बीएनपी को चुनावी रूप से पुनर्स्थापित किया। इस संदर्भ में यह जीत केवल पारिवारिक विरासत का विस्तार नहीं, बल्कि रणनीतिक पुनर्संयोजन, संगठनात्मक अनुशासन और बदलते राजनीतिक यथार्थ को समझने की क्षमता की सफलता भी मानी जा रही है।
बीएनपी ने 13वें आम चुनावों में आर्थिक सुधार, भ्रष्टाचार उन्मूलन और अल्पसंख्यक सुरक्षा को अपने प्रमुख चुनावी मुद्दों के रूप में प्रस्तुत किया। बेरोज़गारी, महँगाई और शासन में पारदर्शिता की कमी जैसे मुद्दों ने मतदाताओं को गहराई से प्रभावित किया। पार्टी ने अपनी पारंपरिक कट्टरपंथी छवि से दूरी बनाने का प्रयास किया और हिंदू समुदाय सहित सभी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का आश्वासन दिया। यह जनादेश इस बात को रेखांकित करता है कि लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक वर्चस्व और प्रशासनिक थकान के बाद मतदाताओं ने परिवर्तन को प्राथमिकता दी। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से सत्ता परिवर्तन ने यह भी संकेत दिया कि बांग्लादेशी समाज स्थिरता के साथ-साथ उत्तरदायी शासन की अपेक्षा रखता है।
भारत के दृष्टिकोण से बीएनपी की यह जीत मिश्रित संकेत देती है। ऐतिहासिक रूप से भारत के संबंध अवामी लीग सरकार के साथ अधिक सहज और स्थिर रहे हैं। सीमा प्रबंधन, आतंकवाद-रोधी सहयोग और कनेक्टिविटी परियोजनाओं में शेख हसीना सरकार ने भारत के साथ घनिष्ठ तालमेल रखा। इसके विपरीत, बीएनपी को लेकर नई दिल्ली में हमेशा संदेह बना रहा है, विशेषकर 2001–06 के शासनकाल के अनुभवों के कारण। हालांकि हाल के वर्षों में तारिक रहमान ने भारत के प्रति अपेक्षाकृत संतुलित और व्यावहारिक रुख अपनाने के संकेत दिए हैं। चुनावों से पहले भारत द्वारा बीएनपी को अनौपचारिक रूप से “ग्रीन सिग्नल” देना इसी बदलते दृष्टिकोण को दर्शाता है। यह संकेत करता है कि भारत अब बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में किसी एक दल पर निर्भर रहने के बजाय बहुआयामी संवाद की नीति अपनाने को तैयार है।
आर्थिक दृष्टि से बीएनपी सरकार भारत के लिए नए अवसर खोल सकती है। बांग्लादेश भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और दक्षिण एशिया में भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति का अहम स्तंभ भी है। नई सरकार के कार्यकाल में द्विपक्षीय व्यापार के 20 अरब डॉलर तक पहुँचने की संभावना जताई जा रही है। कनेक्टिविटी परियोजनाओं, जलविद्युत सहयोग, सीमा व्यापार, डिजिटल कनेक्टिविटी और औद्योगिक निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई गति मिल सकती है। बांग्लादेश की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था भारतीय निवेश के लिए आकर्षक अवसर प्रस्तुत करती है। अल्पसंख्यक हितों की रक्षा को लेकर बीएनपी की सार्वजनिक प्रतिबद्धता भारत की सामाजिक और राजनीतिक चिंताओं को कुछ हद तक कम करती है।
इसके बावजूद, अनिश्चितताएँ बनी हुई हैं। बीएनपी पर कट्टरपंथी तत्वों के प्रति नरमी बरतने के आरोप लगते रहे हैं और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों की भूमिका को लेकर सतर्कता आवश्यक है। तारिक रहमान पर लगे पुराने भ्रष्टाचार आरोप, पाकिस्तान के साथ कथित संबंध और हालिया सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाती हैं। भारत–बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ, तस्करी, मानव तस्करी और आतंकवाद से जुड़े जोखिम भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। यदि इन मुद्दों पर ठोस और पारदर्शी कार्रवाई नहीं होती, तो द्विपक्षीय विश्वास प्रभावित हो सकता है।
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन का असर केवल भारत-बांग्लादेश संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव व्यापक दक्षिण एशियाई भू-राजनीति पर भी पड़ेगा। चीन और पाकिस्तान क्षेत्र में अपने प्रभाव को लगातार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में भारत के लिए आवश्यक होगा कि वह बांग्लादेश के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत रखे, ताकि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन भारत के प्रतिकूल न जाए। बहुपक्षीय मंचों और उप-क्षेत्रीय सहयोग पहलों के माध्यम से संवाद और सहयोग को सुदृढ़ किया जा सकता है।
ऐसे परिदृश्य में भारत के लिए संतुलित और सक्रिय कूटनीति अपनाना अनिवार्य होगा। अवामी लीग के साथ पुराने संबंधों को बनाए रखते हुए बीएनपी सरकार के साथ संवाद स्थापित करना भारत के दीर्घकालिक हित में है। एकतरफा झुकाव के बजाय संस्थागत और बहुदलीय संपर्क भारत को अधिक रणनीतिक लचीलापन प्रदान करेगा।
मानवाधिकार, अल्पसंख्यक सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के मुद्दों पर भारत को न तो उपेक्षा करनी चाहिए और न ही अत्यधिक हस्तक्षेप करना चाहिए। विवेकपूर्ण संतुलन ही भारत की प्रभावशीलता को बनाए रख सकता है।
तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी की यह जीत भारत के लिए न तो पूरी तरह जोखिमपूर्ण है और न ही पूर्णतः अवसर-प्रधान। यह एक संक्रमणकालीन दौर है, जिसमें सतर्कता, संवाद और व्यावहारिक कूटनीति के माध्यम से भारत न केवल अपने हितों की रक्षा कर सकता है, बल्कि भारत–बांग्लादेश संबंधों को एक नई और अधिक परिपक्व दिशा भी दे सकता है। यदि अनिश्चितताओं का प्रभावी प्रबंधन किया गया और सहयोग के क्षेत्रों को सुदृढ़ किया गया, तो यह राजनीतिक परिवर्तन न केवल द्विपक्षीय संबंधों को, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में स्थिरता और सहयोग की संभावनाओं को भी सशक्त कर सकता है।
Dr Priyanka Saurabh Writer, Poet

डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार

January 31, 2026

भारतीय न्याय शास्त्र और यूजीसी नियमों पर रोक

प्राचीन न्याय शास्त्र के आलोक में सुप्रीम कोर्ट Supreme Court द्वारा यूजीसी पर रोक का औचित्य

Dr Chandra Prakash Sharma, Milak Rampur

डा चंद्रप्रकाश शर्मा

Article Posted & Published on : 31.01.2026, Saturday , Time: 10.11 AM By Chandra Prakash Sharma

सर्वोच्च न्यायालय Supreme Court द्वारा 29 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग UGC के  “समता विनियम 2026” पर रोक यूजीसी के उन नियमों पर लगाई गई है जो उच्च शिक्षा संस्थानों Higher education Institution में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य बनाए गए थे।  उन्हें अस्पष्ट , दुरुपयोग की संभावना वाला और विभाजनकारी माना गया। 13 जनवरी 2026 को यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशंस 2026 Equity regulations को अधिसूचित किया गया । यह नियम उच्च शिक्षा में समानता को बढ़ावा देने के लिए था जिसमें इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर्स और कैंपस स्तरीय समितियां का गठन शामिल था।  लेकिन विवादास्पद रेगुलेशन 3(सी) ने जाति आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक केंद्रित कर दिया और सामान्य वर्ग को इससे बाहर रखा गया जिसके कारण पूरे देश में अनेक प्रदर्शन , राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और याचिकाएं दाखिल हुई जिसके फल स्वरुप मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत Chief Justice of India Justice Surykant और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची Justice Joymalya Bagchi की पीठ ने नियमों को पूर्णतः अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाला बताया।साथ ही पुराने 2012 नियमों को जारी रखने का आदेश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय का स्थगन आदेश प्राचीन न्यायशास्त्र के सिद्धांतों पर कितना खरा है, इसकी समालोचना व विश्लेषण समय की आवश्यकता है। प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्र का मूल Vedas वेदों, Upnishad उपनिषदों और Dharm Sutra धर्मसूत्रों में सन्निहित है जिसका व्यावहारिक रूप Smritiya स्मृतियों में दृष्टिगोचर होता है। लगभग 200 ईसा पूर्व की Manu Smrati मनुस्मृति जो राजनीतिक रूप से काफी विवादित है, न्याय को धर्म का प्रतिबिंब मानती है जबकि Yagvalkya Smrati याज्ञवल्क्य स्मृति अधिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक है क्योंकि यह व्यवहार अर्थात कानून, आचार अर्थात नैतिकता और प्रायश्चित यानी दंड के प्रावधानों से सम्प्रक्त है। लगभग 300 ईसा पश्चात की Narad Smrati नारद स्मृति विशेष रूप से फॉरेंसिक कानून पर आधारित है जिसमें अदालतों, गवाहों और दंड की प्रक्रिया का वर्णन है। मनुस्मृति के अध्याय 8 में राजा को न्याय करते समय पक्षपात रहित होना चाहिए,” राजा न्याय में पक्षपात न करें चाहे वह मित्र हो या शत्रु” यहां न्याय को धर्म रक्षक माना गया है। नारद स्मृति पूरी तरह कानूनी है जिसमें 18 शीर्षकों में न्याय प्रक्रिया का वर्णन है जिसमें झूठी शिकायतों के लिए दंड का प्रावधान है। प्राचीन शास्त्रों में न्याय के सिद्धांतों में,एक स्पष्टता-कानून अस्पष्ट न हो, दूसरी निष्पक्षता- सबके लिए समान, तीसरा सामाजिक सद्भाव- कानून समाज को एकजुट रखने वाले हों और चौथा राज धर्म- न्यायाधीश निडर और निष्पक्षहो, का समावेश था। सुप्रीम कोर्ट का स्थगनादेश प्राचीन सिद्धांतों के भी पूर्णता अनुरूप है। प्राचीन न्याय शास्त्रों के प्रथम सिद्धांत स्पष्टता के दृष्टिगत मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य में ही अस्पष्ट कानून को दुरुपयोग का माध्यम माना गया है यूजीसी नियमों में रेगुलेशन 3(सी) को कोर्ट ने पूर्णता “वाग” बताया जो झूठी शिकायतों को बढ़ावा दे सकता है। नारद स्मृति में झूठी शिकायतों के लिए दंड का प्रावधान है जो यहां अनुपस्थित था।न्यायालय ने कहा कि ऐसे नियम व्यक्तिगत बदले की भावना से प्रयुक्त हो सकते हैं जो प्राचीन शास्त्रों के अनुसार न्याय की आत्मा के विरुद्ध है। यूजीसी का नियम प्राचीन न्याय शास्त्रों के द्वितीय निष्पक्षता और समानता के सिद्धांत के विपरीत है।कोर्ट ने भी अनुच्छेद 14 का उल्लेख करते हुए कहा की यह नियम केवल कुछ वर्गों को सुरक्षा देता हैं तथा सामान्य वर्ग को बाहर रखकर समानता के नियम का उल्लंघन करता है जो भेदभावपूर्ण है और समाज को विभाजित करने वाला है जबकि मनुस्मृति के अध्याय 8 के श्लोक 124 में न्याय में सबके लिए समान दंड का प्रावधान है। नारद स्मृति के अनुसार यह कानून की विफलता है। प्राचीन शास्त्रों ने सामाजिक सद्भाव व एकता को न्याय का तीसरा प्रमुख सिद्धांत माना है जो मुख्य न्यायाधीश के कथन में ध्वनित होता है कि 75 वर्षों की स्वतंत्रता के बाद भी ऐसे नियम समाज को पीछे धकेलते हैं क्योंकि इन नियमों के बाद देश में बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए और लोगों में कटुता की भावना दृष्टिगोचर हुई। मुख्य न्यायाधीश का वक्तव्य याज्ञवल्क्य के उदार दृष्टिकोण से मेल खाता है। न्यायालय ने अनुच्छेद 142 (Article 142) का उपयोग कर अंतिम आदेश दिया जो प्राचीन राजधर्म से मेल खाता है जहां राजा निडर होकर न्याय करता था क्योंकि मनुस्मृति के अनुसार “राजा बिना भय या पक्षपात के निर्णय ले।” कोर्ट ने पुराने 2012 के नियमों को जारी रखा जो स्पष्ट और निष्पक्ष हैं, यह प्राचीन शास्त्रों की परंपरा का भी पालन है। भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा यूजीसी नियमों पर लगाई गई रोक वर्तमान विधि नियमों के साथ प्राचीन न्याय शास्त्रों की दृष्टि से भी पूर्णता औचित्य पूर्ण है क्योंकि यह स्पष्टतः,निष्पक्षता और सामाजिक एकता के सिद्धांतों पर आधारित है जिसका मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य,नारद स्मृति में भी उल्लेख है। इससे स्पष्ट होता है कि हमें नियम बनाते समय प्राचीन सिद्धांतों का भी अवलोकन कर उनसे भी प्रेरणा लेनी चाहिए ताकि नियम अधिक स्पष्ट ,प्रभावी और सर्वमान्य बन सकें। लेखक: डॉ.चन्द्रप्रकाश शर्मा,पूर्व सलाहकार हिन्दी, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय, भारत सरकार निवास -नसीराबाद,मिलक, रामपुर (उ.प्र.)-243701 मोबाइल -8273463656

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