Editorial 26.06.2026 By Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News
अयोध्या में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर बने भव्य दिव्य मंदिर से चढ़ावा चोरी की घटना अत्यंत कष्टकारी और स्तब्ध करने वाली है। ये बात कल्पना से भी बाहर है कि कोई सनातन समाज का व्यक्ति ही सपने आराध्य को अर्पित श्रद्धालुओं के अर्पण को चुरा लेगा। लेकिन ऐसा हुआ, ये दुर्भाग्यपूर्ण और समस्त हिन्दू समाज को लज्जित करने वाला है। मामले में गुरुवार (25 जून) को एफआईआर दर्ज हो गई है। सभी 8 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है। अयोध्या कोतवाली में दर्ज एफआईआर में चोरी, संगठित अपराध, धोखाधड़ी की गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। मामले की जांच विशेष जांच दल ने की थी। इसकी अध्यक्षता लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत ने की। एसआईटी का गठन 13 जून को हुआ और 23 जून को प्रारंभिक रिपोर्ट प्रस्तुत हो गई। एसआईटी का गठन श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुरोध पर प्रदेश सरकार ने किया था।
यह प्रकरण 7 जून को चर्चा में आया, जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक बयान जारी कर आरोप लगाया कि मंदिर के चढ़ावे से 7 करोड़ की चोरी हुई है। हालांकि मंदिर ट्रस्ट को पहले ही गड़बड़ का शक हो गया था और आंतरिक जांच की शुरुआत कर दी गई थी। यह बात ही अखिलेश यादव तक पहुंची और उन्होंने इसमें धनराशि का उल्लेख अपनी तरफ से कर दिया। उन्हें एक मौका मिल गया कि वे संघ, विहिप और राममंदिर आंदोलन को बदनाम कर सके तथा 2027 के चुनाव में इस मुद्दे को भुना सकें। वे बार बार प्रभुश्रीराम के दान चोरी की बात कर रहे है अब भगवान श्रीराम में उनकी अगाध श्रद्धा उमड़ रही है, लेकिन मंदिर बनने से लेकर आजतक प्रभु के दर्शन को नहीं गए। खैर वे राजनीतिज्ञ है और राजनीतिक नफा नुकसान की दृष्टि से ही मुद्दों को देखेंगे।
अब मामला एफआईआर तक पहुंच गया है। एसआईटी की विस्तृत जांच रिपोर्ट भी शीघ्र आ जाएगी। लेकिन मुख्य प्रश्न ये है कि मंदिर की व्यवस्था में फिर कोई सेंधमारी न हो, ये प्रबंध कैसे हों। इसका एक उपाय तो श्रीराम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र (सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी) ने बताया है। उनका सुझाव है कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के प्रबंध की व्यवस्था के लिए किसी अधिकारी को विशेष कार्याधिकारी या मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) नियुक्त किया जाय। दूसरा सुझाव विश्व हिंदू परिषद के कार्याध्यक्ष एडवोकेट आलोक कुमार ने दिया है। उनका कहना है कि मंदिर का प्रबंध केवल आस्था से नहीं हो सकता। इसके लिए एक विस्तृत एस ओ पी की जरूरत है। एक विशेष मानक संचालन प्रणाली बनानी होगी। इसके लिए अनुभवी लोगों का सहयोग लेना होगा। इन दोनों सुझावों पर निर्णय अंतिम रूप से ट्रस्ट की कार्यकारिणी को लेना है। हिंदू समाज की चिंता सब ये है कि कोई भी उपाय किया जाए। कोई भी व्यवस्था हो, वह त्रुटिरहित और आस्था को संरक्षण देनी वाली हो। फिर कोई ऐसा समाचार नहीं मिले जो श्रद्धालुओं की आस्था को चोट पहुंचा सके। इसी से जुड़ा प्रश्न विश्व हिंदू परिषद और मंदिर आंदोलन की साख को बचाने का भी है। पांच सौ साल के संघर्ष का तेज और 40 साल के आंदोलन की प्रतिष्ठा भी बची रहनी चाहिए। अगर ये धूमिल हुई तो शेष दो धर्म स्थल काशी और मथुरा की आकांक्षा प्रभावित हो सकती है।


