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स्वयंसेवक मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं: डॉ. मोहन भागवत

September 7, 2026

स्वयंसेवक मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं: डॉ. मोहन भागवत

लंदन, 7 सितम्बर 2026, न्यूयॉर्क, अमेरिका में 29 अगस्त तथा टोरंटो, कनाडा में 31 अगस्त को संबोधन के पश्चात्, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने 6 सितम्बर को यूनाइटेड किंगडम के लंदन में आयोजित ‘Celebration of Oneness’ (एकात्मता का उत्सव) कार्यक्रम के दौरान संघ की 100 वर्षों की यात्रा से संबंधित विभिन्न प्रश्नों के उत्तर देते हुए संघ की दृष्टि को रेखांकित किया। “संघ का ऐसा कौन-सा एक तत्व है, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है’ इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा, “यदि मुझे एक ही सिद्धांत का उल्लेख करना हो, तो मैं ‘अपनापन’ कहूंगा, जिसका अर्थ है सभी के प्रति शुद्ध, सात्त्विक प्रेम। व्यक्ति, समुदाय, समाज और समूची मानवता के प्रति प्रेम- यही हिन्दू का पारंपरिक स्वभाव है। हिन्दू विश्व को संतुलित दृष्टि प्रदान कर सकते हैं।”

संघ की सेवा गतिविधियों के संबंध में डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा,“स्वयंसेवक मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं, इसलिए उनके कार्य के पूरे विस्तार का सार प्रस्तुत करना कठिन है। राजनीतिक कारणों से हमारा विरोध करने वाले लोग भी हमारे कार्य तथा स्वयंसेवकों के गुणों और योगदान को स्वीकार करते हैं। समय-समय पर वे महत्वपूर्ण विषयों पर हम से सहयोग की अपेक्षा करते हैं और हमसे संवाद भी करते हैं। यह समाज के विभिन्न वर्गों में हमारे कार्य की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है। जहां कोई कुछ नहीं कर रहा होता, वहां संघ सेवा कर रहा होता है – लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक।”
अगले 100 वर्षों के लिए संघ के लिए एक प्रमुख संदेश के संबंध में पूछे गए प्रश्न पर उन्होंने कहा कि संघ को अगले सौ वर्षों तक भी वही कार्य निरंतर आगे बढ़ाना होगा, जो उसने अब तक किया है। उन्होंने कहा, “सबसे पहले मेरे मन में यह बात आती है कि सारे कार्यों को पूरा करने में इतना समय नहीं लगना चाहिए। अभी मेरी तीसरी पीढ़ी कार्य कर रही है। संघ में अब दो पीढ़ियां और भी साथ काम कर रही हैं। इस प्रकार पांच पीढ़ियां साथ काम कर रही हैं। सातवीं पीढ़ी आने से पहले हिन्दू समाज के संगठन का कार्य पूरा हो जाना चाहिए।”

‘विश्व के लिए हिन्दू सभ्यता का ऐसा क्या योगदान है, जिसकी विशेष आवश्यकता है” – इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा, “सभी हिन्दू विचार इसी एक सूत्र पर आधारित रहे हैं कि प्रत्येक कर्म के पीछे कोई कारण है। अस्तित्व वास्तव में एक है, यद्यपि वह विविध दिखाई देता है। विविधता हमारा स्वभाव है। इसलिए हमें उसे स्वीकार करना है और उसका सम्मान करना है। लेकिन विविधताओं के साथ इस बात को ध्यान में रखते हुए व्यवहार करना होगा कि ये अस्तित्व की एकता के विभिन्न शृंगार हैं। एक ही अनेक हुआ है, इसलिए अनेक का सम्मान किया जाता है। सब एक हैं। इसी आधार पर हम हर विषय को देखते और उससे व्यवहार करते हैं।”

उन्होंने कहा, “हिन्दू’ शब्द को हम किसी धार्मिक आचरण या जीवन-शैली के आधार पर नहीं समझ सकते। हिन्दू एक प्रकृति है। समाज को ऐसी प्रकृति की आवश्यकता है, जो सभी विविधताओं को स्वीकार करे और उनका सम्मान करे, क्योंकि उसका विश्वास है कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं। सभी विविधताएं एकता की ही विविध अभिव्यक्तियां हैं। इसलिए जब हम उस एकता को देखते हैं, तब सभी विविधताओं का सम्मान और स्वीकार करना संभव होता है। यही हिन्दू विचार है, यही हिन्दू प्रकृति है। हिन्दू समाज और भारत के इतिहास में यही दिखाई देता है। इसलिए जब हम हिन्दू कहते हैं, तो यह कोई धर्म नहीं है। यह केवल एक शब्द भी नहीं है। हिन्दू धर्म की विभिन्न परंपराएं अपनी विशिष्ट दर्शन-पद्धतियों और आचरण के साथ इस व्यापक हिन्दू सभ्यतागत परिवेश के भीतर अस्तित्व में रह सकती हैं।” उन्होंने यह बात ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘हिंदुत्व’ की अवधारणा से संबंधित प्रश्न के उत्तर में कही।
भविष्य की पीढ़ी की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि उन्हें नई पीढ़ी पर अधिक विश्वास है। उनमें दुनिया को बेहतर बनाने की तीव्र आकांक्षा है और इस उद्देश्य के लिए वे विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे मतभेदों से ऊपर उठने को तैयार हैं। “वे अधिक ईमानदार होते हैं। उम्र बढ़ने के साथ स्वाभाविक रूप से ऐसा होता है कि हम अनेक अनुभवों से गुजरते हैं और इसलिए अधिक सतर्क हो जाते हैं। हम हर समय खुलकर नहीं बोलते। हम यह सोचते रहते हैं कि आगे क्या होगा, क्योंकि हमें पता होता है कि क्या-क्या हो सकता है। युवा पीढ़ी के पास ऐसे अनुभव नहीं होते। यदि उन्हें कुछ सही लगता है, तो वे उसे सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं और उसी के अनुसार कार्य करते हैं। वे परिणामों को लेकर चिंतित नहीं होते, क्योंकि वे युवा हैं। इसलिए यदि हम उन्हें यह उद्देश्य दें और अपने अनुभव से प्राप्त आवश्यक ज्ञान तथा दृष्टि प्रदान करें, बिना उसे उन पर थोपे, तो हमें उन्हें अपना मार्ग स्वयं खोजने देना चाहिए।”
भारत के सामने भविष्य की चुनौतियों से निपटने में युवा हिन्दुओं की भूमिका के संबंध में सरसंघचालक जी ने कहा कि युवा पीढ़ी का दायित्व अपने मूल्यों के अनुसार जीवन जीना है। इसलिए सेवा के क्षेत्र में भी उन्हें यही भाव रखना होगा। “सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए। सेवा ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिससे आप महान बनते हैं। यह उपकार नहीं है और न ही यह ऐसा कुछ है जो आप मानवता पर किसी करुणा के रूप में कर रहे हैं। हम कहते हैं कि सेवा ईश्वर के निकट जाने का आपका अवसर है। आप जिनकी सेवा कर रहे हैं, उन पर कोई उपकार नहीं कर रहे। वे आपको सेवा का अवसर देकर आपके ऊपर बहुत बड़ा उपकार कर रहे हैं। इसलिए सेवा इसी भाव के साथ की जानी चाहिए।”

ब्रिटिश हिन्दुओं की निष्ठा को लेकर यूनाइटेड किंगडम में उठाए जाने वाले प्रश्न तथा एक ब्रिटिश स्वयंसेवक से संघ की अपेक्षाओं के संबंध में अंतिम प्रश्न पूछा गया। इसका उत्तर देते हुए सरसंघचालक जी ने कहा, “कोई संघर्ष नहीं है। यदि ब्रिटिश हिन्दू अच्छे, पक्के और सच्चे हिन्दू हैं, तो ब्रिटेन और भारत के हितों के बीच कभी कोई संघर्ष नहीं होगा। यदि कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो स्वाभाविक रूप से ब्रिटिश हिन्दू ब्रिटेन के साथ जाएंगे। अपवाद हो सकते हैं, लेकिन हिन्दुत्व इस विषय पर स्पष्ट है। आपकी कर्मभूमि ही वह स्थान है, जहां आपकी निष्ठा होती है। आपकी जन्मभूमि – अर्थात आपकी उत्पत्ति या जन्म का स्थान – और आपकी पुण्यभूमि वह स्थान है, जहां से आपको अपने मूल्य प्राप्त होते हैं। आपको उन्हीं मूल्यों को अपनी कर्मभूमि में जीना है और जिस भूमि पर आप रहते हैं, उसकी सेवा करनी है।”
हिन्दुओं के एकजुट न होने की धारणा तथा एकता के सार के संबंध में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में सरसंघचालक जी ने कहा, “यदि आप श्रोताओं को देखें या सामान्य रूप से समाज को देखें, तो मानव समाज में विविधता है और यह स्वाभाविक है। हमें इसके साथ चलना है। लेकिन अपना जोर इस बात पर होना चाहिए कि हमें क्या जोड़ता है, न कि इस बात पर कि हमें क्या विभाजित करता है। यदि हम ऐसा करेंगे, तो हमारे समुदाय, हमारा समाज समृद्ध होगा और दुनिया एक बेहतर स्थान बनेगी। हमें यही करना होगा।”
इस संवाद का संचालन यूनाइटेड किंगडम निवासी वेलनेस विशेषज्ञ ममता सुब्रह्मण्यम ने किया। हिन्दू स्वयंसेवक संघ, यूनाइटेड किंगडम (HSS UK) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 600 लोग उपस्थित रहे, उन्होंने 326 संगठनों का प्रतिनिधित्व किया। कार्यक्रम में हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य, सांसद (हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य), मेयर, काउंसिलर्स तथा यूनाइटेड किंगडम में भारत के उच्चायुक्त पेरियासामी कुमारन, उप उच्चायुक्त कार्तिक पांडे सहित समुदाय के अन्य प्रमुख नेता उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत नेपाल में आई बाढ़ के कारण जान गंवाने वाले लोगों तथा विस्थापित परिवारों की स्मृति में मौन रखकर हुई। कार्यक्रम के दौरान बताया गया कि Sewa UK ने नेपाल में राहत कार्यों के लिए अंश दान के माध्यम से 1,00,000 पाउंड जुटाए हैं।

सरसंघचालक जी की यह यात्रा आरएसएस के शताब्दी वर्ष के तहत सेवा, सामाजिक समरसता और साझा मूल्यों पर केंद्रित सभ्यतागत संवाद कार्यक्रम का हिस्सा है। लंदन प्रवास के दौरान सरसंघचालक जी ने विभिन्न धर्मों के प्रमुख नेताओं, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं तथा अन्य सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों से मुलाकात की। अंतरधार्मिक संवाद के अंतर्गत उन्होंने श्री स्वामीनारायण मंदिर, विल्सडन, खालसा जत्था ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारा तथा लंदन के अन्य धार्मिक स्थलों का भी दौरा किया। यूके में हिन्दू समाज के विभिन्न वर्गों और भाषायी विविधता का प्रतिनिधित्व करने वाले 11 भाषा-समुदायों ने भी इस कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

August 30, 2026

न्यूयॉर्क से शिकागो तक – वही सनातन ध्वनि: 1893 से 2026 तक

Dr Mohan Bhagwat, Sar Sanghchalak RSS

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक डा मोहन भागवत

न्यूयॉर्क, 29 अगस्त 2026, दोपहर 2 बजे, जब दुनिया के सबसे प्रसिद्ध मंचों में से एक – न्यूयॉर्क का मेडिसन स्क्वायर गार्डन – में 5000 से ज्यादा भारतीय-अमेरिकी, 26 अलग-अलग भाषाओं में शाखा चलाने वाले स्वयंसेवक और 250 से ज्यादा हिंदू, योग, मंदिर और इंटरफेथ संगठनों के प्रतिनिधि जुटे, तो लगा जैसे इतिहास खुद को दोहरा रहा है।

133 साल पहले, 11 सितंबर 1893 को, शिकागो के Art Institute में 7000 लोगों के सामने एक 30 साल के संन्यासी ने कहा था – “Sisters and Brothers of America!”

और कल उसी अमेरिका में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा –

> “अगर कोई हिंदू सोचता है कि भारत में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा। अगर आप खुद को हिंदू कहना चाहते हैं, तो आपको मानना होगा कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। Diversity is a decoration of our inner unity, it must be preserved.”

ये दो वाक्य एक ही सूत्र के दो छोर हैं।

1. मंच एक, संदेश एक

*विवेकानंद 1893:* World Parliament of Religions. 12 भारतीय प्रतिनिधि थे – बौद्ध, जैन, ब्रह्म समाज, मुस्लिम, ईसाई भी। पर जिसने तालियों की गड़गड़ाहट 2 मिनट तक रुकने नहीं दी, वो थे विवेकानंद। उनका मूल मंत्र था – “I am proud to belong to a religion which has taught the world both tolerance and universal acceptance. We believe not only in universal toleration, but we accept all religions as true.”

उन्होंने गीता का श्लोक सुनाया – “यो यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्” – जो जैसे मेरे पास आता है, मैं वैसे ही उसे अपनाता हूँ।

उन्होंने मेंढक और कुएं (कूप मंडूक) की कहानी सुनाई – हर पंथ अपने कुएं को ही पूरा समंदर समझता है।

*भागवत 2026:* Universal Oneness Celebration, आयोजक – American Hindus for Engagement and Dialogue (AHEAD). रक्षाबंधन के दिन। थीम – वसुधैव कुटुम्बकम्।

आरएसएस के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने पहले ही कहा था – “This is an interfaith gathering with diverse, multicultural audience, reflecting Bharatiya ethos which is fundamentally inclusive.”

भागवत जी ने वहीं से आगे बढ़ाया:
“All humanity is one. Diversity is the rule of nature, but unity is the truth underpinning it.”

विवेकानंद ने सहिष्णुता (tolerance) की बात की थी, भागवत जी ने संरक्षण (preservation) की। 1893 में कहना था कि दूसरों को सहो, 2026 में कहना है कि दूसरों की पहचान को अपनी तरह ही बचाओ।

2. डेटा क्या कहता है – क्यों अब ये बात जरूरी है?

– अमेरिका में आज भारतीय मूल के 54 लाख से ज्यादा लोग हैं। 2023 में US Census के अनुसार, उनमें से 48% हिंदू पहचान रखते हैं। ये दुनिया का सबसे शिक्षित और सबसे अधिक आय वाला डायस्पोरा है – औसत घरेलू आय $145,000।
– पर Pew Research 2024 के अनुसार, 31% हिंदू-अमेरिकियों ने कहा कि पिछले साल उन्हें धर्म के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ा। यानी शिकागो में जो सवाल था – “हिंदू कौन है?” – वही सवाल आज न्यूयॉर्क में भी है।
– आरएसएस का शताब्दी वर्ष 2025-26 है। संगठन 1925 से शुरू हुआ, आज 65,000+ शाखाएं। पिछले 8 महीनों में दत्तात्रेय होसबाले जी अमेरिका, UK, जर्मनी में बुद्धिजीवियों से मिले। भागवत जी की ये यात्रा उसी वैश्विक संवाद का हिस्सा है।

3. शिकागो से साकेत तक का सेतु

विवेकानंद ने अमेरिका को भारत का आध्यात्मिक परिचय दिया था। तब भारत गुलाम था। आज भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है, पर नैरेटिव की लड़ाई वही है।

1893 में Professor John Henry Wright ने विवेकानंद को कहा था – “To ask for your credentials is like asking the sun to state its right to shine.”

2026 में न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और USCIRF ने भागवत जी के वीज़ा रद्द करने की मांग की। आरएसएस का उत्तर वही रहा – “We invite anyone interested in learning more to participate in these open forums of dialogue.”

यही तो फर्क है – विरोध के जवाब में संवाद।

निष्कर्ष: एक ही मंत्र का विस्तार

विवेकानंद ने कहा था – “सब रास्ते एक ही सच तक जाते हैं।”
भागवत जी ने कहा – “सबकी पहचान को बचाना ही उस सच तक पहुंचने का तरीका है।”

एक ने दुनिया को बताया कि हिंदू धर्म क्या सोचता है, दूसरे ने दुनिया को दिखाया कि हिंदू समाज कैसे जीता है – शाखा में, सेवा में, विविधता में।

1893 में तालियां बजीं थीं क्योंकि अमेरिका ने पहली बार सहिष्णुता सुनी थी। 2026 में मेडिसन स्क्वायर गार्डन खचाखच भरा था क्योंकि अमेरिका अब सहिष्णुता से आगे – एकता का अनुभव करना चाहता है।

July 29, 2026

अमेरिकी बेस पर ईरान का मिसाइल हमला

वॉशिंगटन, 29 जुलाई 2026, अमरीका ने कहा है कि ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने कल रात पश्चिम एशिया क्षेत्र में तैनात अमरीकी बलों पर “अचानक हमले” के प्रयास में कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं।
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में, अमरीकी केंद्रीय कमान ने कहा कि सभी ईरानी मिसाइलों को  रोक दिया गया और अमरीकी बल सतर्क और उच्च स्तर की तैयारी में हैं। अमरीका ने यह भी दावा किया कि पिछले 72 घंटों में 30 से अधिक हवाई ड्रोन हमलों के साथ ही, अमरीका और सऊदी लड़ाकू विमानों ने पूर्वी इराक में कई रसद और हथियार स्थलों पर हमले किए।
पश्चिम एशिया क्षेत्र में हालिया हमले अमरीका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की व्हाइट हाउस में हुई मुलाकात के कुछ घंटों बाद हुए।

July 12, 2026

अमेरिकी हमलों के विरोध में ईरान ने हार्मुज बंद किया

Posted on 12.07.2026 Time 11.22 PM, Tehran, Hormuj strait

ईरान के 140 सैन्य ठिकानों पर अमेरिकी हमले

तेहरान, 12 जुलाई 2026, अमरीका ने आज सुबह ईरान पर फिर से हवाई हमले किए हैं। ये हमले ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य में एक वाणिज्यिक पोत पर हमला किए जाने के बाद किए गए। ईरान के हमले में पोत में आग लग गई थी और चालक दल को उसे छोड़ना पड़ा था।

अमरीकी सेंट्रल कमान ने बताया कि हमलों में ईरान के लगभग 140 सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिनमें मिसाइल, ड्रोन और संचार ढांचा शामिल हैं।

जवाबी कार्रवाई में ईरान ने बहरीन, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए। कतर और कुवैत ने कहा कि उन्होंने आने वाली मिसाइलों और ड्रोन को बीच में ही मार गिराया, जबकि बहरीन ने भी मिसाइल अलर्ट जारी किया। ईरान ने जॉर्डन स्थित एक अमरीकी सैन्य अड्डे पर भी हमला करने का दावा किया है।

ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड ने अगली सूचना तक होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा की है और चेतावनी दी है कि यदि अमरीकी हमले जारी रहे तो वह भी जवाबी कार्रवाई करेगा।

July 9, 2026

प्रधानमंत्री ने ऑस्ट्रेलिया-भारत सीईओ फोरम और इकोनॉमिक रोडमैप बिजनेस कार्यक्रम को संबोधित किया

Posted Date:- Jul 09, 2026, PM Narendra Modi, Australia, Melbourne

मेलबॉर्न (ऑस्ट्रेलिया) 09 जुलाई 2026, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री माननीय श्री एंथनी अल्बनीज ने 9 जुलाई 2026 को मेलबर्न में संयुक्त रूप से ऑस्ट्रेलिया-भारत सीईओ फोरम और इकोनॉमिक रोडमैप बिजनेस कार्यक्रम को संबोधित किया। इन दोनों कार्यक्रमों में भारत और ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख सीईओ व बिजनेस लीडर्स, ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख सुपरएनुएशन फंड तथा संस्थागत निवेशकों के प्रतिनिधियों और ऑस्ट्रेलिया के अग्रणी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने भाग लिया।

सीईओ फोरम को संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इस बात पर विशेष बल दिया कि भारत की सुदृढ़ आर्थिक वृद्धि, नीतिगत सुधार, डिजिटल परिवर्तन और इनोवेशन का बढ़ता इकोसिस्टम ऑस्ट्रेलियाई भागीदारों के लिए नए व्यावसायिक अवसर पैदा कर रहे हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्थाओं के बीच आपसी तालमेल को रेखांकित करते हुए, प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भारत में मैन्युफैक्चरिंग, स्वच्छ ऊर्जा, क्रिटिकल मिनरल्स, माइनिंग, इन्फ्रास्ट्रक्चर, शहरी विकास, एविएशन, लॉजिस्टिक्स, एडवांस्ड टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, फिनटेक, फ़ूड प्रोसेसिंग और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में उपलब्ध व्यापक अवसरों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत का बड़े पैमाने पर कार्य करने का सामर्थ्य और ऑस्ट्रेलिया की विशेषज्ञता मिलकर दोनों देशों के लिए एक परस्पर लाभकारी स्थिति का निर्माण करते हैं।

प्रधानमंत्री श्री मोदी ने ऑस्ट्रेलियाई निवेशकों को भारत में दीर्घकालिक निवेश के अवसरों का लाभ उठाने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने भारत में ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों की बढ़ती उपस्थिति का स्वागत किया और इस बात पर विशेष बल दिया कि उच्च शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और कौशल विकास में गहरा सहयोग न केवल दोनों देशों की प्रतिभाओं को भविष्य के लिए तैयार करेगा, बल्कि उन्हें वैश्विक अवसरों का लाभ उठाने में भी मदद करेगा।

सीईओ फोरम के बाद, प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इकोनॉमिक रोडमैप बिजनेस कार्यक्रम को भी संबोधित किया, जिसमें दोनों पक्षों के 200 से अधिक सीईओ और बिजनेस लीडर्स का एक बड़ा समूह शामिल था। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच स्वाभाविक तालमेल के बारे में बात करते हुए, उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि साझा लोकतांत्रिक मूल्य, हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए एक समान दृष्टिकोण, लोगों के बीच मजबूत संबंध (पीपल-टू-पीपल टाइज) और मजबूत राजनीतिक समझ ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक साझेदारी को एक साथ बढ़ने और समृद्ध होने के लिए एक एक अच्छा माहौल तैयार किया है। वर्ष 2022 के आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते (इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड ट्रेड एग्रीमेंट-ईसीटीए) पर आधारित व्यापार और निवेश संबंधों की वृद्धि पर संतोष व्यक्त करते हुए, उन्होंने प्रस्तावित व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (कॉम्प्रिहेन्सिव इकोनॉमिक कोऑपरेशन एग्रीमेंट-सीईसीए) को जल्द से जल्द अंतिम रूप देने का आह्वान किया, ताकि व्यावसायिक संबंधों को एक नए स्तर पर ले जाया जा सके। उन्होंने बिजनेस लीडर्स से दोनों पक्षों की विशिष्टताओं का लाभ उठाने और ग्लोबल समाधान तलाशने का आग्रह किया, विशेष रूप से रेयर अर्थ्स, लिथियम, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, ईवी (इलेक्ट्रिक वाहन), सेमीकंडक्टर्स, एआई और डिफेंस सप्लाई चेन के क्षेत्रों में। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने यह सुझाव भी दिया कि द्विपक्षीय व्यापारिक संबंधों को अगले स्तर पर ले जाने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि भारत के राज्य और ऑस्ट्रेलिया के प्रांत अपनी मूल क्षमताओं के आधार पर मजबूत आर्थिक साझेदारी स्थापित करें। दोनों मंचों पर हुई चर्चाओं से उत्पन्न आशावाद और सार्थक विचारों को रेखांकित करते हुए, प्रधानमंत्री श्री मोदी ने विश्वास व्यक्त किया कि भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक संबंध निरंतर समृद्ध होते रहेंगे।

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