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संपादकीय: अप्रकाशित पुस्तक पर चर्चा का औचित्य

February 3, 2026

संपादकीय: अप्रकाशित पुस्तक पर चर्चा का औचित्य

Leader of opposition Rahul Gandhi

लोकसभा में नेता विरोधी दल राहुल गांधी

Posted on : 03.02.2926 Tuesday, Time: 07.09 AM, Editorial by Sarvesh Kumar Singh, UP Web News, Un Published book of General Manoj Mukund Nanrvanee, #The Four Stars of Destiny 

संस्मरण पुस्तक “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” जिसके लेखक पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवने है। अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। हालांकि इस किताब की चर्चा खूब है। इस पर एक पत्रिका में टिप्पणी भी प्रकाशित हो चुकी है। पुस्तक प्रकाशन के लिए प्रकाशक के पास है। लेकिन रक्षा मंत्रालय से अनुमति लंबित होने के कारण अप्रकाशित है। ताजा उल्लेख इस किताब का इसलिए है कि इसके कुछ अंश जो अगस्त 2020 के लद्दाख क्षेत्र में चीन के साथ हुई हिंसक झड़प से जुड़े हैं और घुसपैठ के बारे में हैं, इनकी चर्चा नेता विरोधी दल राहुल गांधी सोमवार को लोकसभा में करना चाहते थे। उन्हें अध्यक्ष ने रोक दिया। उन्होंने जब एक पत्रिका में पुस्तक पर प्रकाशित टिप्पणी का उल्लेख करते हुए चीनी घुसपैठ की बात को उठाने की कोशिश की तो सरकार की ओर से विरोध हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने भी नियमों का हवाला देकर उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी। अन्ततः लोकसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई।

अब प्रश्न ये उठता है कि क्या किसी ऐसी किताब जो अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है। उसके विवरण पर लोकसभा में चर्चा करना उचित है? क्योंकि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा विवाद से जुड़ा है। इसका प्रभाव पड़ोसी देश के साथ राजनीतिक, कूटनीतिक, व्यापारिक संबंधों से भी है। और इन सबसे ज्यादा सेना के मनोबल से जुड़ा है। ऐसी स्थिति में क्या राहुल गांधी को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के अभिभाषण पर चर्चा के बजाय, किसी संवेदनशील मुद्दे को उठाना चाहिए था।

जब तक जनरल मनोज मुकुंद नरवने की पुस्तक को प्रकाशन हेतु रक्षा मंत्रालय समीक्षा के बाद अनुमति न दे, और जब तक किताब प्रकाशित न हो जाए, तब तक इस मुद्दे को संसद में उठाना कतई भी उचित नहीं है। यहां तक कि इसपर सोशल मीडिया में भी चर्चा नहीं होनी चाहिए।

देश की आंतरिक, बाहरी और सीमा सुरक्षा पर देश का जनमत और दृष्टिकोण भी वही होना चाहिए, जो हमारी सेना, सरकार का अधिकृत मत हो। अगस्त 2020 में जब गलवान और दोकलम में चीनी सेना से हिंसक झड़प हुई तो जनरल नरवाने भारत के थलसेनाध्यक्ष थे। निश्चित रूप से उनके पास आम जन से अधिक सूचनाएं होंगी। रणनीति भी उनकी होगी, और सीमा सुरक्षा की पहली जिम्मेवारी भी उन्हीं की थी। ऐसे में एक दायित्वधारी को पद से हटने के बाद सूचनाओं को सार्वजनिक करने में सावधानी बरतनी चाहिए। आजादी के बाद से अभी तक के सभी सेनाध्यक्ष अगर सब कुछ सार्वजनिक करते तो देश में बहुत बड़े विभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई होती। यही बात नेता विरोधी दल को भी समझनी चाहिए। उनसे राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।

 

 

January 31, 2026

भारतीय न्याय शास्त्र और यूजीसी नियमों पर रोक

प्राचीन न्याय शास्त्र के आलोक में सुप्रीम कोर्ट Supreme Court द्वारा यूजीसी पर रोक का औचित्य

Dr Chandra Prakash Sharma, Milak Rampur

डा चंद्रप्रकाश शर्मा

Article Posted & Published on : 31.01.2026, Saturday , Time: 10.11 AM By Chandra Prakash Sharma

सर्वोच्च न्यायालय Supreme Court द्वारा 29 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग UGC के  “समता विनियम 2026” पर रोक यूजीसी के उन नियमों पर लगाई गई है जो उच्च शिक्षा संस्थानों Higher education Institution में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य बनाए गए थे।  उन्हें अस्पष्ट , दुरुपयोग की संभावना वाला और विभाजनकारी माना गया। 13 जनवरी 2026 को यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशंस 2026 Equity regulations को अधिसूचित किया गया । यह नियम उच्च शिक्षा में समानता को बढ़ावा देने के लिए था जिसमें इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर्स और कैंपस स्तरीय समितियां का गठन शामिल था।  लेकिन विवादास्पद रेगुलेशन 3(सी) ने जाति आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक केंद्रित कर दिया और सामान्य वर्ग को इससे बाहर रखा गया जिसके कारण पूरे देश में अनेक प्रदर्शन , राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और याचिकाएं दाखिल हुई जिसके फल स्वरुप मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत Chief Justice of India Justice Surykant और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची Justice Joymalya Bagchi की पीठ ने नियमों को पूर्णतः अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाला बताया।साथ ही पुराने 2012 नियमों को जारी रखने का आदेश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय का स्थगन आदेश प्राचीन न्यायशास्त्र के सिद्धांतों पर कितना खरा है, इसकी समालोचना व विश्लेषण समय की आवश्यकता है। प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्र का मूल Vedas वेदों, Upnishad उपनिषदों और Dharm Sutra धर्मसूत्रों में सन्निहित है जिसका व्यावहारिक रूप Smritiya स्मृतियों में दृष्टिगोचर होता है। लगभग 200 ईसा पूर्व की Manu Smrati मनुस्मृति जो राजनीतिक रूप से काफी विवादित है, न्याय को धर्म का प्रतिबिंब मानती है जबकि Yagvalkya Smrati याज्ञवल्क्य स्मृति अधिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक है क्योंकि यह व्यवहार अर्थात कानून, आचार अर्थात नैतिकता और प्रायश्चित यानी दंड के प्रावधानों से सम्प्रक्त है। लगभग 300 ईसा पश्चात की Narad Smrati नारद स्मृति विशेष रूप से फॉरेंसिक कानून पर आधारित है जिसमें अदालतों, गवाहों और दंड की प्रक्रिया का वर्णन है। मनुस्मृति के अध्याय 8 में राजा को न्याय करते समय पक्षपात रहित होना चाहिए,” राजा न्याय में पक्षपात न करें चाहे वह मित्र हो या शत्रु” यहां न्याय को धर्म रक्षक माना गया है। नारद स्मृति पूरी तरह कानूनी है जिसमें 18 शीर्षकों में न्याय प्रक्रिया का वर्णन है जिसमें झूठी शिकायतों के लिए दंड का प्रावधान है। प्राचीन शास्त्रों में न्याय के सिद्धांतों में,एक स्पष्टता-कानून अस्पष्ट न हो, दूसरी निष्पक्षता- सबके लिए समान, तीसरा सामाजिक सद्भाव- कानून समाज को एकजुट रखने वाले हों और चौथा राज धर्म- न्यायाधीश निडर और निष्पक्षहो, का समावेश था। सुप्रीम कोर्ट का स्थगनादेश प्राचीन सिद्धांतों के भी पूर्णता अनुरूप है। प्राचीन न्याय शास्त्रों के प्रथम सिद्धांत स्पष्टता के दृष्टिगत मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य में ही अस्पष्ट कानून को दुरुपयोग का माध्यम माना गया है यूजीसी नियमों में रेगुलेशन 3(सी) को कोर्ट ने पूर्णता “वाग” बताया जो झूठी शिकायतों को बढ़ावा दे सकता है। नारद स्मृति में झूठी शिकायतों के लिए दंड का प्रावधान है जो यहां अनुपस्थित था।न्यायालय ने कहा कि ऐसे नियम व्यक्तिगत बदले की भावना से प्रयुक्त हो सकते हैं जो प्राचीन शास्त्रों के अनुसार न्याय की आत्मा के विरुद्ध है। यूजीसी का नियम प्राचीन न्याय शास्त्रों के द्वितीय निष्पक्षता और समानता के सिद्धांत के विपरीत है।कोर्ट ने भी अनुच्छेद 14 का उल्लेख करते हुए कहा की यह नियम केवल कुछ वर्गों को सुरक्षा देता हैं तथा सामान्य वर्ग को बाहर रखकर समानता के नियम का उल्लंघन करता है जो भेदभावपूर्ण है और समाज को विभाजित करने वाला है जबकि मनुस्मृति के अध्याय 8 के श्लोक 124 में न्याय में सबके लिए समान दंड का प्रावधान है। नारद स्मृति के अनुसार यह कानून की विफलता है। प्राचीन शास्त्रों ने सामाजिक सद्भाव व एकता को न्याय का तीसरा प्रमुख सिद्धांत माना है जो मुख्य न्यायाधीश के कथन में ध्वनित होता है कि 75 वर्षों की स्वतंत्रता के बाद भी ऐसे नियम समाज को पीछे धकेलते हैं क्योंकि इन नियमों के बाद देश में बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए और लोगों में कटुता की भावना दृष्टिगोचर हुई। मुख्य न्यायाधीश का वक्तव्य याज्ञवल्क्य के उदार दृष्टिकोण से मेल खाता है। न्यायालय ने अनुच्छेद 142 (Article 142) का उपयोग कर अंतिम आदेश दिया जो प्राचीन राजधर्म से मेल खाता है जहां राजा निडर होकर न्याय करता था क्योंकि मनुस्मृति के अनुसार “राजा बिना भय या पक्षपात के निर्णय ले।” कोर्ट ने पुराने 2012 के नियमों को जारी रखा जो स्पष्ट और निष्पक्ष हैं, यह प्राचीन शास्त्रों की परंपरा का भी पालन है। भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा यूजीसी नियमों पर लगाई गई रोक वर्तमान विधि नियमों के साथ प्राचीन न्याय शास्त्रों की दृष्टि से भी पूर्णता औचित्य पूर्ण है क्योंकि यह स्पष्टतः,निष्पक्षता और सामाजिक एकता के सिद्धांतों पर आधारित है जिसका मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य,नारद स्मृति में भी उल्लेख है। इससे स्पष्ट होता है कि हमें नियम बनाते समय प्राचीन सिद्धांतों का भी अवलोकन कर उनसे भी प्रेरणा लेनी चाहिए ताकि नियम अधिक स्पष्ट ,प्रभावी और सर्वमान्य बन सकें। लेखक: डॉ.चन्द्रप्रकाश शर्मा,पूर्व सलाहकार हिन्दी, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय, भारत सरकार निवास -नसीराबाद,मिलक, रामपुर (उ.प्र.)-243701 मोबाइल -8273463656

January 29, 2026

आर्थिक सहयोग का एक नया युग

भारत -यूरोपियन यूनियन का ऐतिहासिक व्यापार समझौता

Published on 29.01.2026, Thursday, 10:05 PM, Article by Mratunjay Dixit, Lucknow, UP Samachar Sewa

मृत्युंजय दीक्षित
भारत और यूरोपियन यूनियन के मध्य 27 जनवरी 2026 को हुआ ससझौता एक व्यापक बदलाव वाला समझौता है। यह बहु प्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौता बिना किसी दबाव के, लम्बी सहज सरल वार्ताओं के उपरांत यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वान डेर लेयेन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में सपंन्न हुआ। इस समझौते से भारत और यूरोप के के मध्य व्यापारिक संबंधों के प्रगाढ़ होने की प्रबल सम्भावना है।
भारत और यूरोपियन यूनियन के साथ हुआ यह समझौता वर्ष 2027 में लागू होगा और तब तक सभी 27 सदस्य देशों की संसद के द्वारा इसका पारण किया जाएगा। यह समझौता कई दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है इससे सर्वाधिक लाभ कृषि व किसानों को होगा क्योंकि डेयरी सेक्टर आदि इससे मुक्त रखा गया है। इससे कपड़ा, चमड़ा व फुटवियर, हस्तशिल्प फर्नीचर आदि क्षेत्रो के लिए नए अवसर खुलेंगे। इलेक्ट्रानिक उत्पादों पर टैरिफ 14 प्रतिशत से घटकर शून्य रह जाएगा जिस कारण विनिर्माण क्षेत्र में तेजी से सहायता प्राप्त होगी। यूरोपीय बाजारों में आसान पहुंच से बिल्ड इन इंडिया आपूर्ति श्रृंखला को मजबूती मिलेगी और भारत तेजी से निर्यात बढ़ाने में सक्षम होगा। रत्न आभूषणों पर भी टैरिफ शून्य हो जाएगा जिस कारण डिजाइन और शुद्धता आधारित आभूषण निर्यात में यूरोपीय बाज़ारों के साथ वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़त मजबूत होगी। टैरिफ में कटौती से यूरोपीय बाज़ारों मे पहुंच होगी लागत कम होगी जिससे प्लेन सोने और जड़े हुए आभूषणों की ईयू में मांग बढ़ेगी। यूरोपीय थोक विक्रेता एवं बड़े ब्रांड के साथ गहरे संबंध बनाने और नए आर्डर पाने के अवसर भी मिलेंगे। मुक्त व्यापार समझौता कृषि और समुद्री खाद्य उत्पादों का निर्यात बढ़ाने में सक्षम होगा। किसानों और तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों की आय मे वृद्धि होगी। मछली पालन प्रोसेसिंग और लॉजिटिक्स क्षेत्र में नौकरियां बढेंगी। काली मिर्च और इलायची जैसे मसाले यूरोप में बेहतर पहुंच का लाभ उठा सकेंगे।समझौता लागू हो जाने के बाद फार्मा -मेडिकल उपकरणों से भी टैरिफ घटकर शून्य हो जाएगा ।
यह समझौता लागू हो जाने के बाद भारत के 17 राज्यों को इसका प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। इनमें पंजाब, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना ,पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों को बड़ा लाभ होगा। उत्तर प्रदेश को भी इस समझौते का बड़ा लाभ मिलेगा। ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते के कारण प्रदेश की ओद्यौगिक क्षमता कृषि उत्पादन और एसएमएमई सेक्टर को नई गति मिलने की सम्भावना है। अभी यूपी से होने वाले कुल निर्यात में यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 9 से 12 प्रतिशत है यानी अभी हर वर्ष 210 हजार करोड़ रु का निर्यात होता है जो आगामी पांच वर्ष में बढ़कर 40 हजार करोड़ रु होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। मुक्त व्यापार समझौता लागू हो जाने के बाद भारतीयों के लिए यूरोपीय कारें सस्ती और सुलभ हो जाएंगी।
यह एफटीए मात्र एक रणनीतिक दस्तावेज नहीं अपितु भारत और यूरोपियन यूनियन के लिए बदलते वैश्विक व्यापार वातावरण में आगे बढ़ाने का अवसर देने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस समझौते के धरातल पर उतरने के कारण एक नई आर्थिक क्रांति का उदय होगा। यूरोपियन बाज़ारों में 93 प्रतिशत भारतीय निर्यात को बिना शुल्क प्रवेश प्राप्त होने जा रहा है यह कोई सामान्य बात नहीं है। यही कारण है कि प्रधानंमंत्री नरेंद्र मोदी ने ”मन की बात” में उद्यमियो को गुणवत्ता (क्वालिटी, क्वालिटी और क्वालिटी) का मूल मंत्र दिया है। अब भारतीय उद्यमियों को अपने उत्पादों की गुणवत्ता और उत्पादकता का स्तर उन्नत करना ही होगा।
मुक्त व्यापार समझौता लागू होने के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह हमारे किसानों तथा छोटे उद्योगों की यूरोपीय बाज़ारों तक पहुँच आसान बनाएगा । मैन्युफैक्चरिंग में नए अवसर पैदा करेगा। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करेगा। यह सिर्फ व्यापार समझौता नही है यह साझा समृद्धि का नया ब्लू प्रिंट है। बदलती वैश्विक व्यवस्था, बढती भू राजनैतिक अनिश्चितता और अंतरराष्ट्रीय तनावों के बीच भारत और यूरोपीय संघ की यह ऐतिहासिक साझोदारी वैश्विक स्थिरता को मजबूती प्रदान करेगी। स्वाभाविक है कुछ वैश्विक ताकतें इस समझौते से असहज हैं। अमेरिका के टैरिफ वार के बीच भारत ने दुनिया के दूसरे देशों को एक नई राह दिखाई है। यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) की सहमति ने भारत के लिए 27 देशों के बाजारों को खोल दिया है। यह समझौता अब तक का सबसे बड़ा और प्रभावी व्यापार समझौता बन गया है। यही कारण है कि इसे मदर ऑफ़ ऑल डील्स कहा जा रहा है।
प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं. – 9198571540

January 28, 2026

उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (उपज),लोकतंत्र के प्रहरी, पत्रकारों की सशक्त आवाज

AJAY CHAUDHRY, JOURNALIST MEERUT

अजय चौधरी,  उपज प्रदेश उपाध्यक्ष, अध्यक्ष जिला मेरठ

Posted on : 28.01.2026, Wednesday Time: 09:53 PM,  Source:  Ajay Chaudhry
#UPAJ #ASSOCIATION #MEDIA #UP ASSOCIATION OF JOURNALISTS
अजय चौधरी
लोकतंत्र की आत्मा स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता में बसती है। जब तक प्रेस स्वतंत्र है, तब तक सत्ता जवाबदेह है और समाज सच से जुड़ा रहता है। पत्रकार केवल समाचारों के संवाहक नहीं होते, वे सत्ता और जनता के बीच वह सेतु हैं, जो सच को सामने लाता है और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाता है। ऐसे में पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों की रक्षा करना केवल किसी संगठन की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की जिम्मेदारी है। इसी दायित्वबोध के साथ उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (उपज) राज्य में पत्रकारों के हितों के लिए एक सशक्त और प्रतिबद्ध मंच के रूप में कार्य कर रहा है।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल, संवेदनशील और सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य में पत्रकारिता करना आसान नहीं है। कम मानदेय, असुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ, प्रशासनिक दबाव, उत्पीड़न और कई बार जानलेवा हमले—ये आज पत्रकारों की दैनिक चुनौतियाँ बन चुकी हैं। ऐसे समय में उपज ने पत्रकारों के लिए एक मजबूत ढाल की भूमिका निभाई है। यह संगठन न केवल समस्याओं को उजागर करता है, बल्कि उनके समाधान के लिए संगठित और निरंतर संघर्ष भी करता है।
पत्रकारों की सुरक्षा उपज के एजेंडे का केंद्र बिंदु है। संगठन राज्य में पत्रकार सुरक्षा बिल को लागू कराने के लिए सरकार पर लगातार दबाव बना रहा है। उपज का स्पष्ट और दो-टूक मत है कि बिना कानूनी संरक्षण के निर्भीक पत्रकारिता संभव नहीं है। यदि पत्रकार भय के माहौल में काम करेंगे, तो सच दबेगा और लोकतंत्र कमजोर होगा। इसलिए पत्रकारों को सुरक्षा देना किसी वर्ग विशेष का नहीं, बल्कि समाज और लोकतंत्र के हित का प्रश्न है।
उपज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी एकता और एकजुटता है। संगठन ने प्रदेश भर के पत्रकारों को एक साझा मंच पर जोड़ने का कार्य किया है, जहाँ उनकी आवाज़ सुनी जाती है और उनके अधिकारों के लिए सामूहिक संघर्ष किया जाता है। यही कारण है कि आज उपज प्रदेश के सबसे प्रभावशाली और भरोसेमंद पत्रकार संगठनों में गिना जाता है।
व्यावसायिक स्वतंत्रता पत्रकारिता की रीढ़ है। उपज पत्रकारों को बिना किसी भय, दबाव या लालच के अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए प्रेरित करता है। संगठन उन्हें नैतिक, वैचारिक और संगठनात्मक समर्थन प्रदान करता है और यह संदेश देता है कि सत्ता से सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि पत्रकार का संवैधानिक कर्तव्य है।
आज, जब पत्रकारिता कई स्तरों पर संकट से गुजर रही है—चाहे वह आर्थिक दबाव हो, राजनीतिक हस्तक्षेप हो या बढ़ती असहिष्णुता—ऐसे दौर में उपज जैसी संस्थाओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह संगठन न केवल पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा कर रहा है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की लड़ाई भी मजबूती से लड़ रहा है।
एक सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र पत्रकार ही सशक्त लोकतंत्र की आधारशिला होता है। उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (उपज) उसी आधारशिला को मजबूत करने के संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रहा है—पत्रकारों के साथ, पत्रकारों के लिए और लोकतंत्र के हित में है।

यूजीसी के समता संवर्धन विनियम-2026 से उभरता विरोध

UGC Regulations 2026

यूजीसी ने जारी किए नए नियम

Posted on : 28.01.2026, Wednesday Time: 03:26 PM, Writer Source:  Prof. Subhash Thaledi, Dehradun
– प्रो. (डॉ.) सुभाष चंद्र थलेडी
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु बनाए गए विनियम-2026 ने देशभर में सामान्य वर्ग के छात्रों और अभिभावकों के बीच एक नई और तीखी बहस को जन्म दे दिया है। 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित ये नियम 15 जनवरी से लागू भी कर दिए गए। यूजीसी का दावा है कि इन विनियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालय परिसरों में भेदभाव का उन्मूलन कर सभी छात्रों को समान अवसर उपलब्ध कराना है। किंतु इनके लागू होते ही सामान्य श्रेणी के छात्रों में असंतोष खुलकर सामने आने लगा है और कई राज्यों में संगठित विरोध के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं। इस पूरे विनियम की वैधानिक पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। सितंबर 2025 में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी नियम बनाने का निर्देश यूजीसी को दिया था। यह आदेश 2019 में दायर उस जनहित याचिका पर आया था, जिसे रोहित वेमुला और पायल ताडवी की माताओं ने दाखिल किया था। याचिका में 2012 के यूजीसी विनियमों के सख्त अनुपालन और ठोस उपायों की मांग की गई थी। इसी न्यायिक निर्देश के आलोक में यूजीसी ने 2012 के पुराने नियमों को निरस्त कर 2026 के नए समता विनियम लागू किए। इनके औचित्य को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से भी जोड़ा गया है, जो समता और समावेशन को शैक्षिक नीति की आधारशिला मानती है। विनियमों की प्रस्तावना में धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान और दिव्यांगता के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन की बात कही गई है। उद्देश्य के स्तर पर यह सर्वथा स्वीकार्य और आवश्यक है, किंतु समस्या तब उभरती है जब उद्देश्य और परिभाषाओं को साथ रखकर देखा जाता है।
यूजीसी के इस विनियम में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि यह नियामक ढांचा मुख्यतः इन्हीं वर्गों के संरक्षण पर केंद्रित है। यही बिंदु सामान्य श्रेणी के छात्रों में असुरक्षा और भय की भावना को जन्म देता है। आलोचकों का तर्क है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पहले से ही लागू है। ऐसे में एक अतिरिक्त विनियम, जिसमें झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के लिए कोई स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान नहीं है, एकतरफा व्यवस्था का रूप ले सकता है। सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना है कि इससे वे स्वतः ही संदेह के दायरे में आ जाते हैं। मेरठ में मीडिया शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थी नितेश तिवारी और टीना सोम का मानना है कि नई पीढ़ी में जातिगत भावनाएं पहले से ही कमजोर पड़ चुकी हैं, लेकिन ऐसे विनियम नई पीढ़ी को फिर से जातिवादी ढांचे में बाँध सकते हैं। इन विनियमों के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में समान अवसर केंद्र (ईओसी) और समता समिति का गठन अनिवार्य किया गया है। समितियों में अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है, किंतु सामान्य श्रेणी के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं बनाया गया। यही वह बिंदु है जिस पर आपत्ति सबसे अधिक मुखर है। सामान्य वर्ग के छात्रों का सवाल है कि जब निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं है, तो निष्पक्षता की गारंटी कैसे दी जा सकती है। विनियमों में सचल समता स्क्वॉड और 24×7 समता हेल्पलाइन की व्यवस्था भी की गई है। किंतु सामान्य श्रेणी के छात्रों के बीच इसे लेकर भी गहरी चिंता है। गोपनीय शिकायत और त्वरित कार्रवाई के प्रावधान उन्हें सुरक्षा से अधिक भय का वातावरण पैदा करने वाले प्रतीत होते हैं। मात्र एक आरोप से किसी छात्र या शिक्षक की शैक्षणिक और सामाजिक छवि को गंभीर क्षति पहुँच सकती है, भले ही बाद में आरोप निराधार सिद्ध हो जाए। झूठी शिकायतों से निपटने की स्पष्ट व्यवस्था का अभाव इस चिंता को और गहरा करता है।
इस विनियम को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों की आपत्ति मूलतः ‘समता’ की व्याख्या और उसके व्यावहारिक प्रभाव को लेकर है। उनका सवाल है कि ये विनियम वास्तव में सभी के लिए बराबरी सुनिश्चित नहीं करते हैं जिससे शैक्षिक संस्थानों में नए प्रकार के असंतुलन हो जायेगा। सामान्य वर्ग के छात्रों को आशंका है कि भविष्य में शैक्षणिक मूल्यांकन, छात्रावास आवंटन और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों जैसे मामलों को भी जातिगत दृष्टि से देखा जाएगा। इससे शिक्षक-छात्र संबंधों में अविश्वास बढ़ सकता है और विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक वातावरण प्रभावित हो सकता है।
कुछ शिक्षकों की चिंता शैक्षणिक गुणवत्ता और अकादमिक स्वतंत्रता को लेकर भी है। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों का मूल उद्देश्य ज्ञान, शोध और आलोचनात्मक चिंतन का विकास है। यदि प्रत्येक निर्णय पर निगरानी और दंड का दबाव रहेगा, तो संस्थागत स्वायत्तता प्रभावित होगी। इन नियमों का पालन न करने वाले शैक्षिक संस्थानों की डिग्री कार्यक्रम रोकने या मान्यता समाप्त करने जैसे प्रावधानों को वे प्रशासनिक नियंत्रण के विस्तार के रूप में देखते हैं। वैसे भी संकाय सदस्य पहले से ही अध्यापन-अध्ययन के अतिरिक्त अनेक समितियों के दायित्वों से बोझिल हैं।
यह भी चिंता का विषय है कि आजादी के 78 सालों के बाद भी इस प्रकार के जातिवादी चयनित विनियम बनाने की जरूरत बन रही है। इससे साफ जाहिर होता है कि इन 78 सालों में देश का इस दिशा में कोई विकास नहीं हुआ है। दूसरी ओर हम 2047 तक विकसित भारत का सपना देख रहे हैं। दरअसल यह विनियम शैक्षिक संस्थानों में सभी वर्ग के लिए बनाये जाते तो इसका स्वागत योग्य था। शैक्षिक संस्थानों में आज छात्रों के बीच सबसे अधिक भेदभाव क्षेत्रवाद को लेकर सामने आता है। जातिवादी सोच शैक्षिक संस्थानों से दूर हो रही है लेकिन इस प्रकार के नियमों से जातिवादी भावनाएं प्रबल होना स्वाभाविक है।
कानून विशेषज्ञों का भी कहना है कि यह विनियम ‘चयनित संरक्षण’ की अवधारणा को बढ़ावा देता है। एससी/एसटी कानूनों के दुरुपयोग की बहुत सारी शिकायतें पहले से ही न्यायालयों के सामने आती रही हैं। ऐसे में सामान्य वर्ग के छात्र अपने भविष्य और करियर को लेकर सशंकित हैं। उनका यह भी तर्क है कि यह विनियम संविधान में निहित समानता के अधिकार- अनुच्छेद 14 और 16- की भावना के प्रतिकूल है। इन्हीं आधारों पर कुछ कानूनविदों ने इस विनियम को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती भी दी है। उल्लेखनीय है कि 2012 के यूजीसी समता विनियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल नहीं था, जिसे 2026 में जोड़ा गया है। इससे भी विरोध के स्वर और प्रखर हुए हैं। साथ ही, विनियमों के उल्लंघन पर संस्थानों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का प्रावधान चिंता को और बढ़ाता है।
सोशल मीडिया पर इन नियमों को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और इससे जुड़े हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बरेली के एक वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री द्वारा विरोधस्वरूप इस्तीफे की खबर ने बहस को और तेज कर दिया है। बढ़ते विरोध के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि इन विनियमों से किसी के साथ भेदभाव नहीं होने दिया जाएगा। किंतु जब नियम पहले ही लागू हो चुके हों, तो मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं माने जा सकते।
 कुल मिलाकर, यूजीसी के समता विनियम-2026 उच्च शिक्षा के भविष्य को गहराई से प्रभावित करने वाले हैं। यदि इन्हें केवल कानूनी सख्ती के साथ लागू किया गया, तो असंतोष और बढ़ सकता है। समावेशन तभी टिकाऊ होगा, जब विनियम वास्तव में सभी के लिए संतुलित और न्यायपूर्ण हों। अब असली परीक्षा नीति-निर्माताओं की है कि क्या वे संतुलन की दिशा में कदम उठाएंगे या यह बहस और अधिक टकराव की ओर बढ़ेगी?
Prof. (Dr) Subhash Thaledi

डा. सुभाष थलेड़ी

(लेखक सामयिक विषयों के स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
#UGCRules
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