Posted on 10.06.2026 Time 19.42PM Etah, Panchayat elections
एटा 10 जून उप्रससे। जनपद में पंचायत चुनावों को लेकर गांवों में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। हाईकोर्ट की टिप्पणी, शासन द्वारा जारी नए आदेश और पंचायत चुनाव में संभावित देरी को लेकर निवर्तमान ग्राम प्रधानों, राजनीतिक दलों के नेताओं तथा ग्रामीणों के बीच व्यापक चर्चा चल रही है। जहां कुछ लोग चुनाव होने तक प्रशासक व्यवस्था बनाए रखने के पक्ष में हैं, वहीं अधिकांश जनप्रतिनिधि जल्द चुनाव कराए जाने की मांग कर रहे हैं।
भाजपा का पक्षः न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान, समयबद्ध चुनावों की वकालत
भारतीय जनता पार्टी के जिला उपाध्यक्ष एवं अधिवक्ता प्रो. राहुल गुप्त ने कहा कि भाजपा लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करती है। उनका कहना है कि हाईकोर्ट के अंतिम आदेश के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी। उन्होंने कहा कि यदि किसी कानूनी या प्रशासनिक कारण से चुनाव प्रक्रिया में विलंब होता है तो विकास कार्य और जनहित योजनाएं बाधित न हों, इसके लिए सरकार द्वारा वैकल्पिक व्यवस्था की जा सकती है। हालांकि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों में ही निहित है, इसलिए परिस्थितियां अनुकूल होते ही पंचायत चुनाव कराना आवश्यक है।

सपा का आरोप: चुनाव टालना लोकतंत्र के खिलाफ
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव एवं एटा-कासगंज प्रभारी लोधी राकेश राजपूत ने भाजपा सरकार पर पंचायत चुनाव टालने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पंचायत चुनावों में देरी लोकतंत्र और संविधान की भावना के विपरीत है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा सरकार जनता के बीच बढ़ते असंतोष के कारण चुनावों से बच रही है। सपा नेता ने कहा चुनाव टालना लोकतंत्र के खिलाफ है। किसान, नौजवान, मजदूर और व्यापारी वर्ग सरकार की नीतियों से नाराज है और चुनाव होने पर इसका असर दिखाई देगा।
शीतलपुर ब्लॉक के ग्राम लभैटा के युवा प्रधान विवेक मिश्रा का कहना है कि अधिकांश निवर्तमान प्रधान चुनाव होने तक प्रशासक व्यवस्था बनाए रखने के पक्ष में हैं ताकि पंचायतों के प्रशासनिक कार्य प्रभावित न हों। हालांकि उनका मानना है कि चुनाव में अत्यधिक देरी गांवों के विकास के लिए उचित नहीं होगी। उन्होंने बताया कि गांवों में चुनावी माहौल पूरी तरह बन चुका है। संभावित प्रत्याशी और उनके समर्थक जनसंपर्क अभियान शुरू कर चुके हैं तथा चुनावी रणनीति तैयार की जा रही है।
निधौली कलां ब्लॉक के ग्राम झिनवार की ग्राम प्रधान श्रीमती कृष्णा उपाध्याय का कहना है कि यदि पंचायतों का संचालन प्रशासकों के माध्यम से होगा और प्रत्येक कार्य के लिए प्रशासनिक अनुमति लेनी पड़ेगी तो विकास कार्यों की गति प्रभावित होगी। उन्होंने कहा कि सड़क, नाली, पेयजल, सफाई और अन्य स्थानीय आवश्यकताओं से जुड़े कार्य समय पर नहीं हो पाएंगे। जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की भूमिका सीमित होने से लोकतांत्रिक व्यवस्था भी कमजोर होगी।
गांवों में चुनावी माहौल गर्म
जनपद के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत चुनाव को लेकर चर्चाएं तेज हैं। संभावित प्रत्याशी अपने समर्थकों के साथ सक्रिय हो गए हैं। कई गांवों में सामाजिक बैठकों, जनसंपर्क अभियानों और रणनीतिक चर्चाओं का दौर शुरू हो चुका है।
ग्रामीणों का मानना है कि चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही राजनीतिक गतिविधियां और तेज हो जाएंगी। निवर्तमान प्रधान भी अपने कार्यकाल के विकास कार्यों को जनता के सामने रखने में जुटे हुए हैं।
आरक्षण और आयोग की रिपोर्ट पर भी चर्चा
पिछड़ा वर्ग आरक्षण तथा आयोग की रिपोर्ट को लेकर जनपद में अलग-अलग राय सामने आ रही है। प्रधान संगठनों और संभावित प्रत्याशियों का एक वर्ग वर्तमान व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता महसूस कर रहा है, जबकि कुछ लोग सरकार और आयोग के अंतिम निर्णय का इंतजार करने की बात कह रहे हैं। राजनीतिक दल भी आरक्षण के मुद्दे को लेकर अपनी-अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।
चुनाव टलने के संभावित प्रभाव
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि पंचायत चुनाव अगले कुछ महीनों तक और टलते हैं तो विकास योजनाओं की गति धीमी पड़ सकती है। नई योजनाओं के प्रस्ताव, निर्माण कार्यों की स्वीकृति तथा स्थानीय स्तर पर लिए जाने वाले कई निर्णय प्रभावित हो सकते हैं। इसके साथ ही राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ेगी और गांवों में लंबे समय तक चुनावी माहौल बना रहेगा। हालांकि प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से आवश्यक जनहित कार्य जारी रखे जा सकते हैं, लेकिन अधिकांश जनप्रतिनिधियों का मानना है कि स्थायी समाधान केवल समयबद्ध पंचायत चुनाव ही हैं।
एटा जनपद में पंचायत चुनाव को लेकर राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं। भाजपा जहां न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक प्रतीक्षा की बात कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी चुनाव में देरी को लोकतंत्र के लिए नुकसानदायक बता रही है। दूसरी ओर अधिकांश ग्राम प्रधान प्रशासनिक व्यवस्था की निरंतरता के साथ-साथ जल्द पंचायत चुनाव कराने के पक्षधर दिखाई दे रहे हैं। गांवों में चुनावी माहौल पूरी तरह बन चुका है और सभी की निगाहें अब शासन, आयोग तथा न्यायालय के आगामी निर्णयों पर टिकी हैं।
