प्रणय विक्रम सिंह
अयोध्या के संदर्भ में विपक्ष की नई-नई जागी श्रद्धा को देखकर मुझे लगा कि रामचरितमानस में तुलसीदास जी से एक बहुत बड़ी चूक हो गई है।
वे मारीच, सुबाहु और कालनेमि जैसे दिव्य भेष बदलने वाले मायावियों को त्रेतायुग में ही निपटा गए। उन्हें जरा रुकना चाहिए था। वे आज के युग में आते, तो देखते कि भेष बदलने की यह कला अब केवल राक्षसों की बपौती नहीं रही, इसका लोकतांत्रिक विकास हो चुका है और अब इसके सबसे कुशल अभ्यासकर्ता हमारे राजनेता हैं।
सुना है, कल तक जो लोग भगवान राम को केवल एक अदालती एफेडेविट का ‘काल्पनिक पात्र’ मानते थे, आज वे चुनाव की आहट सुनते ही हाथ में आस्था का नया-नवेला थर्मामीटर लेकर घूम रहे हैं। वे ट्विटर पर अयोध्या को ‘अनुपम और अनुकरणीय धार्मिक नगरी’ बनाने की वैसी ही पवित्र कसमें खा रहे हैं, जैसी कसमें एक जेबकतरा अपनी ईमानदारी सिद्ध करने के लिए कोट कचहरी में खाता है।
इस दिव्य और त्वरित हृदय परिवर्तन को देखकर मुझे गिरगिटों की मानसिक स्थिति पर तरस आता है। बेचारे डिप्रेशन में होंगे कि जिस हुनर के लिए वे सदियों से बदनाम थे, उसमें कुछ सैफई ब्रांड समाजवादी इंसानों ने पीएचडी कर ली और उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा।
आखिर कोई उस राम-नाम का जाप इतनी पवित्रता से कैसे कर सकता है, जिसके राजनीतिक कुनबे का पूरा इतिहास ही राम-विरोध की खाद पर फला-फूला हो?
आजकल वे फीता लेकर निकले हैं। पूछ रहे हैं कि *अयोध्या से गोरखपुर कितनी दूर है?* नेताजी, दूरी नापने का यह शौक नया है। पर आप गलत नक्शा देख रहे हैं। अयोध्या से गोरखपुर की दूरी तो उतनी ही है, जितनी *सत्य और सनातन* के बीच होती है। यानी दोनों आपस में जुड़े हैं। पर आपके ‘पारिवारिक सिंडिकेट’ और रामराज्य के बीच की दूरी अनंत है, जिसे नापने के लिए आपके पास न तो नैतिक पैमाना है और न ही वैसा चरित्र। अच्छा होता कि आप इस दूरी को नापने से पहले यह बता पाते कि राम के प्रति आपकी खानदानी नफरत और आपके वोटबैंक के लालच के बीच कुल कितने किलोमीटर का फासला है?
जब आदमी को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती दिखती है, तो उसे इतिहास की कड़वी यादें भूलने का ‘अल्जाइमर’ रोग हो जाता है। लेकिन जनता की याददाश्त बहुत क्रूर होती है, नेताजी। जनता को आज भी याद है कि जब आपके पूज्य पिताजी की हुकूमत थी, तब अयोध्या की पावन गलियों में कोई भजन नहीं गूंज रहा था, बल्कि निहत्थे रामभक्तों का खून बह रहा था। तब आपकी सरकारी मशीनरी मंदिर के पत्थरों को ज़ब्त करने में वैसी ही मुस्तैदी दिखा रही थी, जैसी मुस्तैदी कोई डकैत माल समेटने में दिखाता है। और उसी पावन दौर में, पुलिस थानों और जेलों में कृष्ण जन्माष्टमी मनाने पर ऐसा प्रतिबंध था, मानो कंस खुद लखनऊ के सचिवालय में आकर बैठ गया हो।
जो लोग कल तक रामलला के प्राण-प्रतिष्ठा के निमंत्रण पत्र को अछूत मानकर ठुकरा रहे थे, आज वे ‘सियाराम-धाम’ के पुनरुद्धार का ठेका लेने की बात कर रहे हैं। यह वैसा ही है जैसे बिल्ली चूहों की सुरक्षा के लिए एक सर्वदलीय समिति बनाने का प्रस्ताव रखे।
राम की सेवा के लिए ‘भेष’ और ‘ट्वीट’ बदलने की नहीं, ‘भाव’ बदलने की जरूरत होती है। पर आपके पास तो वही पुराना हलफनामा है, जो आपने कभी सर्वोच्च न्यायालय में जमा किया था। आपकी पूरी राजनीतिक पूंजी ही यही रही है कि जब तक सत्ता में रहो, हिंदुओं की आध्यात्मिक भावनाओं को वैसे ही कुचलो जैसे रास्ते का कंकड़ कुचला जाता है, और जब चुनाव आ जाएं, तो माथे पर एक लंबा सा छद्म टीका लगाकर ‘इच्छाधारी रामभक्त’ की मुद्रा में जनता को सम्मोहित करने निकल पड़ो।
मेरी की एक बात हमेशा याद रखिएगा भैयाजी, आप भगवान को धोखा दे सकते हैं क्योंकि वे घट-घट वासी होकर भी चुप रहते हैं, पर जनता को नहीं, क्योंकि वह सब देखकर सही समय पर ईवीएम का बटन दबाती है।
सुना है, आपने तो अयोध्या का राजा ही बदल दिया। जबकि सभी सनातनियों के लिए त्रेता युग से आज तक अयोध्या के राजा श्री रामचन्द्र जी हैं। जो काम लंका का रावण अपनी पूरी दस खोपड़ियों की ताकत लगाकर नहीं कर पाया, वह आपने अपने वोटबैंक को खुश करने के लिए बड़ी सरलता से कर दिया। कई दिनों तक संसद में अपने बगल में उनको बैठाकर घुमाते रहे। राम से इतनी घृणा कि उन्हें अयोध्या के राजा के रूप में स्वीकार करने में आपकी छाती फटने लगती है, इसलिए आपने प्रतीकों का नया बाज़ार सजा लिया। आपका यह दोहरा चरित्र और अतीत उत्तर प्रदेश के हर रामभक्त के सीने में एक गहरे घाव की तरह आज भी टीस रहा है।
याद रखिए, इतिहास की स्याही बहुत पक्की होती है, वह आपके इन बनावटी और सुगठित ट्वीट्स के ‘थूक’ से नहीं धुलेगी। 10 नवंबर 1990 का वह अंधकारमय काला दिन, निहत्थों का रक्तपात, थानों में जन्माष्टमी पर पाबंदी और पावन पत्थरों का अपमान, यह सब आपके माथे पर वो अमिट कलंक हैं, जिन्हें धोने के लिए यदि आप सरयू का पूरा पानी भी इस्तेमाल कर लें, तो भी कम पड़ेगा।
अयोध्या अब सज चुकी है, दिव्य और भव्य हो चुकी है। वहां अब आपके पाखंड का कोहरा नहीं, बल्कि प्रभु राम का ‘परम प्रकाश’ जगमगा रहा है। और इतिहास गवाह है कि जब प्रकाश उदित होता है, तो अंधेरे के व्यापारियों का विसर्जन अपने आप हो जाता है। आपका भी होना निश्चित है।
