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महिला आरक्षण से नारी का होगा सशक्तिकरण?

April 28, 2026

महिला आरक्षण से नारी का होगा सशक्तिकरण?

Reservation for Women in Parliament

Posted on 28.04.2026 Tuesday Time 08.25 AM. Reservation bill for Women, Article by Dileep Kumar Shrivastava, Barabanki 
निकाय चुनाव में महिलाओं का आरक्षण लागू होने के बाद भी, निर्वाचित महिलाएं घर बैठी, पिता, पति ,देवर व भाई प्रतिनिधि बनकर कर रहे हैं कार्य
दिलीप कुमार श्रीवास्तव
बाराबंकी। इन दिनो गली चौराहो तथा राजनीतिक गलियारों में महिला आरक्षण बिल की चर्चाएं आम है, जहां सत्ता पक्ष विपक्ष पर महिलाओं के सपनों को कुचलने की बात कर रहा है ,वहीं विपक्ष का कहना है जब 2023 में सर्वसम्मत से दोनों सदनों में महिला आरक्षण बिल पास हो चुका है तो उसमें संशोधन क्यों?।
लोकसभा व राज्यसभा में ‘नारी शक्ति वंधन अधिनियम पास हो चुका है तो उसे ढाई साल तक लागू क्यों नहीं किया गया।
सभी राजनीतिक दल महिला आरक्षण बिल पर सिर्फ वोट की राजनीति करते हैं।
वास्तव में अगर सभी राजनीतिक दल नारियों का सशक्तिकरण चाहते हैं तो निकाय चुनाव में लागू महिला आरक्षण के तहत निर्वाचित महापौर, अध्यक्ष, ग्राम प्रधान , सदस्य, सभासद, पार्षद ,ब्लॉक प्रमुख आदि पदों पर निर्वाचित महिलाओं के पति, पिता, देवर, भाई,भतीजे प्रतिनिधि बनकर निर्वाचित महिलाओं को घर बिठाकर सारे कार्य स्वयं क्यों निपटा रहे हैं। अगर कुछ अपवादों को किनारे कर दिया जाए तो 80% निर्वाचित महिलाएं सिर्फ घर के कार्य निपटा रही हैं, और उनके सारे कार्य उनके अपने सगे संबंधी कार्यालय में स्वयंभू बनकर निपटाते हैं, क्या ऐसे ही नारी सशक्तिकरण होगा।
जमीनी हकीकत से सभी राजनीतिक दल अंजान बने हुए हैं, वोट बैंक की राजनीति छोड़कर सभी दल एक स्वर से लोकसभा व विधानसभा में कानून बना दे कि निकाय चुनाव में निर्वाचित महिलाओं के सगे संबंधी पति-पिता देवर भाई प्रतिनिधि बनकर निकाय कार्यालय, बैठकों में प्रवेश नहीं करेंगे। अगर ऐसा कानून पारित हो जाए तो ही नारी का सशक्तिकरण होगा। तभी महिलाओं को अपने अधिकारों की सही जानकारी होगी और तभी वह सही निर्णय ले पाएंगी।
निकाय में निर्वाचित महिलाओं के सगे संबंधी ही आम जनता के आय, जाति, निवास प्रमाण पत्र स्वयं हस्ताक्षर करके बना रहे हैं।
अगर महिलाओं को शक्तिशाली बनाना है तो पहले उन्हें उनके अधिकार देने होंगे, लोकसभा विधानसभा में महिला आरक्षण बिल 2023 न लागू होने के बाद भी सभी राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट देने के लिए स्वतंत्र है, कौन रोक रहा उन्हें किन्तु जमीनी हकीकत में ऐसा होता नहीं है।

April 21, 2026

आदिगुरु शंकराचार्य की दिग्विजय यात्रा

आदि गुरु शंकराचार्य

POSTED ON 21.04.2026 TIME 09.02 AM

आदि शंकराचार्य को भारतीय संस्कृति में ‘एकता के देवदूत’ के रूप में देखा जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने विचारों, यात्राओं और कार्यों के माध्यम से पूरे भारत को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। आचार्य ने भारतवर्ष में सर्वत्र अद्वैत मत के प्रचार करने का संकल्प लिया और सम्पूर्ण भारत-भ्रमण किया विरोधियों से शास्त्रार्थ कर उन्हें परास्त लिया एवं सर्वत्र अद्वैत वेदांत की वैजयंती फहराई।

आचार्य शंकर के साथ उनके भक्त शिष्यों की एक वृहत मंडली थी। साथ ही साथ वैदिक धर्म के परम हितेषी राजा सुधन्वा भी आकस्मिक आपत्तियों से बचाने के लिए इस मंडली के साथ थे। इस प्रकार यह मंडली भारतवर्ष के प्रधान तीर्थ तथा धर्म क्षेत्र में जाती, विरोधियों की युक्तियों को आचार्य खंडन करते और अपने अद्वैत मत में दीक्षित करते। आचार्य शंकर का यह तीर्थ भ्रमण दिग्विजय के नाम से प्रख्यात है।  शंकर के चरितग्रंथों में इसी का विशेष रूप से वर्णन रहता था। इसीलिए वे शंकर दिग्विजय के नाम से प्रख्यात होते आए हैं।

आदिगुरु शंकराचार्य का प्रवास (मुख्य स्थान)

काशी : इस पुण्यमयी विश्वनाथपुरी के साथ शंकराचार्य का बड़ा ही घनिष्ठ सम्बन्ध है। आचार्य को अपने लक्ष्य की सिद्धि में काशीवास से बहुत ही लाभ हुआ। माधव के कथनानुसार भगवान्‌ विश्वनाथ की स्पष्ट आज्ञा से शंकर ने ब्रह्मसूत्रों पर भाष्य लिखने का संकल्प किया जिसे उन्होंने ‘उत्तर काशी’ में जाकर पूरा किया। आनन्दगिरि तो काशी को ही भाष्यों के प्रणयन का स्थान मानते हैं । यहीं रहते समय वेदव्यास से शंकराचार्य का साक्षात्कार हुआ था। यहीं आचार्य ने कर्म, चन्द्र, ग्रह, क्षपणक, पितृ, गरुड, शेष, सिद्ध-आदि नाना मतों के सिद्धान्तो का खण्डन कर वैदिक मार्ग की प्रतिष्ठा की थी। काशी में मणिकर्णिका घाट के ऊपर हो आचार्य का निवास था।[1]

उज्जैनी : यह स्थान आज भी धार्मिक महत्व रखता है। यह मालवा प्रांत का प्रधान नगर है। भारत की सप्तपुरियों में यह अन्यतम नगरी रही है। आचार्य के समय में यहां का कापालिक मत का विशेष प्रचार था। यहां उन्होंने दो महीने तक निवास किया। आनंद गिरि के कथन अनुसार उम्मत भैरव नामक शूद्र जाति का कापालिक यही रहता था। वह अपनी सिद्धि के सामने किसी को न तो उपासक ही मानता था न ही पंडित। उसे भी शंकर के हाथों पराजय स्वीकार करने पड़ी।[2]

इंद्रप्रस्थपुर : यह स्थान प्राचीन इंद्रप्रस्थ अर्थात आधुनिक दिल्ली है। शंकराचार्य के समय में यहां इंद्र के महत्व का प्रतिपादन करने वाले धार्मिक संप्रदाय का बोलबाला था। आचार्य के साथ इन लोगों का संघर्ष हुआ था। पराजित होकर उन्होंने अद्वैत मत को अंगीकार कर लिया।[3]  इसके साथ ही शंकराचार्य जी अयोध्या भी पधारे थे परन्तु इस स्थल की किसी भी घटना का उल्लेख नहीं है।

जगन्नाथ : सप्तपुरियों में यह अन्यतम पुरी है। उड़ीसा देश में समुद्र तट पर यह अवस्थित है। यह पुरी के ही नाम से विख्यात है यही कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की काष्ठ से बनी प्रतिमाएं हैं। शंकराचार्य जी के चार धामों में यह भी प्रधान धाम है। शंकराचार्य ने यहां पर अपना गोवर्धन पीठ स्थापित किया।[4]

द्वारका : भारत के पश्चिमी समुद्र के तीर पर द्वारकापुरी विराजमान है। यहां आचार्य ने अपना पीठ स्थापित किया जो शारदा पीठ के नाम से विख्यात है।[5] 

पंढरपुर : इस स्थान पर पांडुरंग की प्रसिद्ध प्रतिमा है। महाराष्ट्र देश में यह सबसे अधिक विख्यात वैष्णव क्षेत्र है। यहां का प्रसिद्ध मंत्र है पुंडरीक वरदे विट्ठल। विट्ठलनाथ कृष्ण के ही रूप है। शंकर ने पांडुरंग की स्तुति में एक स्तोत्र भी लिखा है।[6]

प्रयाग : माधव ने त्रिवेणी के तट पर मीमांसक कुमारिल भट्ट के साथ शंकर के भेंट करने की बात लिखी है। आनंद गिरि ने वरुण वायु आदि के उपासक शून्यवादी बराहमतानुयायी, लोक-गुण-सांख्य-योग तथा वह वैशेषिक मतवादियों के साथ शास्त्रार्थ करने की घटना का उल्लेख मिलता है।[7]

मायापुरी : इस स्थान को वर्तमान में हरिद्वार के नाम से जाना जाता है। इस स्थान से शंकराचार्य का विशेष संबंध रहा है। बद्रीनाथ जाते समय शंकराचार्य इधर से ही गए थे। ऐसी मान्यता है कि विष्णु की प्रतिमा को डाकुओं के डर से पुजारी लोगों ने गंगा के प्रवाह में डाल दिया था। शंकर ने इस प्रतिमा का उद्धार कर फिर इसकी प्रतिष्ठा की।[8]

श्रीपर्वत : आजकल यह स्थान मद्रास प्रांत के कर्नूल जिले का प्रसिद्ध देवस्थान है। यहां का शिव मंदिर बड़ा विशाल तथा भव्य है। प्राचीन काल में यह सिद्ध क्षेत्र माना जाता था। शंकराचार्य के समय में यह मुख्य केंद्र प्रतीत होता है। शंकराचार्य का उग्रभैरव के साथ यहीं पर संघर्ष हुआ था।[9]

वस्तुतः ये सभी स्थान धार्मिक महत्त्व के हैं, अतः शंकराचार्य का इन स्थानों में जाना तथा विरोधीमत वालों को परास्त करना स्वाभाविक प्रतीत होता है। द्वारिका, जगन्नाथपुरी, बदरी तथा रामेश्‍वर के पास तो उन्होंने मठों की स्थापना की।

नेपाल में शंकराचार्य

नेपाल से शंकराचार्य का घनिष्ठ संबंध रहा है। नेपाल में पशुपतिनाथ की पूजा यथार्थ रूप से नहीं हो रही थी। नेपाल बौद्ध धर्म का प्रधान प्रधान केंद्र माना जाता है। यहां के निवासी अधिकांश बौद्ध मत को मानने वाले थे अतः पशुपतिनाथ की वैदिक पूजा की उपेक्षा करना नितांत स्वाभाविक था। पशुपतिनाथ का अष्टमूर्ति शंकर में अन्यतम स्थान है। वे यजमान मूर्ति के प्रतिनिधि हैं। इसलिए उनकी मूर्ति मनुष्य आकृति है। यह स्थान प्राचीन काल से ही बड़ा पवित्र तथा गौरवशाली माना जाता था। यह पवित्रता आज भी अक्षुण्ण रूप से बनी हुई है। परंतु शंकर के समय में बौद्ध धर्म के बहुत प्रचार के कारण पशुपतिनाथ की पूजा में शैथिल्य आ गया था इसी को दूर करने के लिए शंकर अपने शिष्य मंडली के साथ नेपाल में पहुंचे। उस समय नेपाल में ठाकुर वंश के राजा राज्य करते थे। तत्कालीन राजा का नाम शिवदेव था। ये नरेंद्र देव वर्मा के पुत्र थे। उस समय नेपाल और चीन का घनिष्ठ राजनीतिक संबंध था। चीन के सम्राट ने नरेंद्रदेव को नेपाल का राजा स्वीकृत किया था। नेपाल नरेश ने शंकराचार्य जी की बड़ी अभ्यर्थना की और आचार्य चरण के आगमन से अपने देश को धन्य माना। आचार्य ने बौद्ध को परास्त कर उस स्थान को उनके प्रभाव से मुक्त कर दिया। पशुपतिनाथ की वैदिक पूजा की व्यवस्था उन्होंने ठीक ढंग से कर दी। आज भी पशुपतिनाथ के मंदिर के पास ही शंकराचार्य का मठ है और थोड़ी ही दूरी पर शंकर तथा दत्तात्रेय की मूर्तियां आज भी श्रद्धा तथा भक्ति से पूजी जाती है।[10]

 

[1] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 130

[2] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 127

[3] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 127

[4] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 131

[5] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 132

[6] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 132

[7] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 132

[8] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 134

[9] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 136

[10] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 139

आदि शंकराचार्य ने वैदिक धर्म की प्रतिष्ठापना की

आदि गुरु शंकराचार्य

POSTED ON 21.04.2026 TIME 09.00 AM

शंकराचार्य के जीवन का प्रधान लक्ष्य वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा तथा प्रचार था। उन्होंने अपने प्रखर व्यक्तित्व के बल पर इन समस्त अवैदिक अथवा अर्धवैदिक तथा नास्तिक सिद्धान्तों को जन सामान्य में अलोकप्रिय बना दिया और उनकी निःसारता प्रमाणित कर दी तथा वेद-प्रतिपाद्य अद्वैतमत का विपुल सृजन कर वैदिक धर्म को लोकप्रिय बना दिया। यही कारण है कि उन्हें साक्षात्‌ भगवान शिव का अवतार मानता गया है। अपनी विलक्षण दार्शनिक प्रतिभा के द्वारा शंकराचार्य  ने एक ऐसे दार्शनिक सिद्धान्त की स्थापना की है जो न एकदम भौतिकवाद है, न कोरा कर्मवाद और न शुष्क ज्ञानवाद। उनका अद्वैतवाद भक्ति, कर्म और ज्ञान, स्थूल और सूक्ष्म का समन्वयभूत सिद्धान्त है।

वैदिक ग्रंथ दुरुह तथा क्लिष्ट संस्कृत प्रधान होने के कारण जनसामान्य के लिए उपेक्षित बने हुए थे। आचार्य शंकर ने उपनिषदों की विशदव्याख्या कर जिस साहित्य की सृजना की वह भारतीय चिरन्तन संस्कृति की अमूल्यनिधि है। ब्रह्मसूत्र और गीता पर उन्होंने अपने सुबोध भाष्यों का प्रणयन किया। वेदान्त-दर्शन के क्षेत्र में भाष्य-प्रणयन का उनका प्रयास सर्वप्रथम तथा सर्वोत्तम है। आज जिन रामानुज आचार्यों के दार्शनिक सिद्धान्तों की तुलना शंकराचार्य के दार्शनिक सिद्धान्तों से की जाती है उनको भी भाष्य रचना की प्रेरणा आचार्य शंकर से प्राप्त हुई है। इस प्रकार वेदान्त दर्शन के क्षेत्र में भाष्य-प्रणयन परम्परा के मूल प्रवर्तक हैं।

साधारण लोगों के लिए उन्होंने प्रकरण ग्रन्थों की रचना कर अपने सिद्धान्त को बोधगम्य भाषा में सरल, सरस श्लोकों के द्वारा अभिव्यक्त किया है। इतना ही नहीं, वेदान्त शास्त्र के सिद्धान्तों के विपुल प्रचार की अभिलाषा से उन्होने अपने भाष्य ग्रन्थों पर वृत्ति तथा वार्तिक लिखने के लिए विद्वानों को प्रोत्साहित किया। शिष्यों के हृदय में उनकी प्रेरणा प्रभावशालिनी सिद्ध हुई। उन लोगों ने आचार्य से प्रेरणा ग्रहण कर जिस विपुल ग्रन्थ राशि का अद्वैत-प्रतिपादन के लिए प्रणयन किया है, उसकी रचना की प्रेरणा का मूलस्रोत आचार्य के ग्रन्थों में प्रवाहित हो रहा है। इस प्रकार अद्वैत साहित्य को जन्म देकर शंकर ने ऐसा प्रबन्ध कर दिया कि जिससे समग्र देश की जनता उनके द्वारा प्रचारित धर्म का मर्म समझे और कोई भी अद्वैत तत्त्व के उपदेश से वंचित न रह जाय। अत:  शंकराचार्य न केवल एक महान्‌ नेता है बल्कि वह जन भावनाओं को अधिगृहीत करते हुए प्रतीत होते हैं।

धर्म-संस्थापन कार्य को स्थायी बनाने के लिए शंकर ने सन्यासियों को संघबद्ध करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। अपनी शिक्षा-दीक्षा, उपासना तथा निवृत्ति के कारण सन्यासी समाज ही भलीभाँति उपदेशक हो सकता है। आचार्य ने इसीलिए उसे संघबद्ध करने का सफल प्रयास किया। वस्तुत: विरक्त पुरुष ही धर्म का सच्चा उपदेश दे सकता है तथा अपना जीवन वैदिक धर्म के अभ्युदय एवं विकास में लगा सकता है। शंकर ने इस विरक्त सन्यासी वर्ग को एकत्र कर एक संघ के रूप में संगठित कर वैदिक धर्म के भविष्यगत कल्याण के लिए महान्‌ कार्य किया। सन्यासी संघ की स्थापना राष्ट्र एवं धर्म के हित में शंकर का अत्यन्त गौरवशाली कार्य है।

चार मठों की स्थापना

आचार्य शंकराचार्य ने भारतवर्ष की धार्मिक व्यवस्था को अक्षुण्य बनाये रखने के लिये प्रख्यात तीर्थ-स्थानों में मठों की स्थापना की। चारों धाम के पास आचार्य ने चार विख्यात मठों की स्थापना की।

  1. गोवर्धनमठ : भारत के पूर्वी भाग में जगन्नाथ पुरी में प्रतिष्ठापित है।
  2. ज्योतिर्मठ : (प्रचलित नाम जोशी मठ) बदरिकाश्रम के पास उत्तर में स्थित है।
  3. शारदामठ : काठियावाड में द्वारिकापुरी में वर्तमान है।
  4. श्रृंगेरीमठ : मैसूर में दक्षिण भारत में है।

उसी दक्षिण भारत में सप्तमोक्षपुरियों में अन्यतम श्रीकाच्ची में भी मठ प्रतिष्ठापित है तथा तुङ्गभद्रा के नीर में कुडलि मठ स्थित है।

इसी तरह अन्यान्य स्थानों में भी कई मठ स्थापित हैं। इन पीठो के अधिपतियों का मुख्य कर्त्तव्य अंतर्भुक्त प्रान्तों के निवासियों को धर्मोपदेश करना तथा वैदिक मार्ग के ऊपर सुचारु रूप से चलने की व्यवस्था करना था। प्रत्येक मठ का कार्यक्षेत्र पृथक्‌-पृथक्‌ रखा गया था, परन्तु पारस्परिक सहयोग खूब था। मठ के अध्यक्षों का आज भी यह प्रधान कार्य है। अपने क्षेत्र के अंतर्गत वर्णाश्रम धर्मावलम्बियों में धर्म की प्रतिष्ठा को दृढ़ रखना तथा तदनुकूल उपदेश देना, ये अध्यक्ष आचार्य शंकर के प्रतिनिधि रूप हैं। इसी कारण ये भी शंकराचार्य कहलाते हैं।[1] मठों की स्थापना के अनन्तर आचार्य ने अपने चारों पट्ट-शिष्यो को इनका अध्यक्ष नियुक्त किया, यह सर्वसम्मत बात है।

मठों के आदि आचार्य और उनकी नियुक्ति

वैदिक सम्प्रदाय सें वेदों का सम्बन्ध भिन्न-भिन्न दिशाओं के साथ माना जाता है। ऋग्वेद का सम्बन्ध पूर्व दिशा से है, यजुर्वेद का दक्षिण दिशा से, सामवेद का पश्चिम से तथा अथर्ववेद का उत्तर से है। योगानुष्ठान के अवसर पर यही पद्धति प्रचलित है। शंकराचार्य ने शिष्यों की नियुक्ति मनमाने ढंग से नहीं की किन्तु इस चुनाव में उन्होंने एक विशिष्ट वैदिक नियम का पालन किया  है। जिस शिष्य का जो वेद था, उसकी नियुक्ति उसी वेद से संबद्ध दिशा से की गयी। आचार्य पद्मपाद काश्यपगोत्रीय ऋग्वेदी ब्राह्मण थे, अतः आचार्य ने उनकी प्रतिष्ठा ऋग्वेद से संबद्ध पूर्व दिशा के गोवर्धन मठ के अध्पक्ष पद पर की।[2]

दक्षिण के श्रृंगेरी मठ में सुरेश्वराचार्य की नियुक्ति प्रमाण-सम्मत प्रतीत होती है। इस कारण नहीं कि प्रधान पीठ पर सर्वप्रधान शिष्य को रखना न्याय संगत था, बल्कि उनके वेद के कारण ही। सुरेशवर शुक्ल यजुर्वेद के अन्तर्गत शाखाध्यायी ब्राह्मण थे। आचार्य  शंकराचार्य ने सुरेश्वर को दो उपनिषद्‌ भाष्यों पर वार्तिक लिखने का आदेश दिया था–एक तैतीरीय उपनिषद भाष्य पर, क्योंकि शंकराचार्य की अपनी शाखा तैत्तीरीय थी, दूसरी बृहदारण्यक भाष्य पर, क्योंकि सुरेश्वर की शाखा काण्व शाखा थी और वृहदारएयक उपनिषद्‌ इसी यजुर्वेद शाखा से संबद्ध है। यजुर्वेद से संबद्ध दिशा दक्षिण है। इसीलिये आचार्य ने काण्व शाखीय यजुर्वेदीय सुरेश्वर को श्रृंगेरी मठ का अध्यक्ष बनाया।[3]

तोटकाचार्य उत्तर दिशा में स्थित ज्योतिर्मठ के अध्यक्ष बनाये गए थे। यह चुनाव इनके अथर्ववेदी होने के कारण किया गया था।

हस्तामलकाचार्य की नियुक्ति द्वारिकापुरी के शारदामठ के अध्यक्ष पद पर की गयी। इस नियुक्ति में भी उनके वेद का संबंध ही प्रधान कारण प्रतीत होता है। आदि आचार्यों की यही परम्परा न्यायानुमोदित प्रतीत होती है। अतः इन चारों मठों के आदि आचार्यों की निम्नलिखित व्यवस्था प्रामाणिक है –

आचार्य          वेद     दिशा मठ
पद्मपाद ऋग्वेदी पूर्व दिशा गोवर्धनमठ
सुरेश्वर यजुर्वेदी दक्षिण श्रृंगेरीमठ
हस्तामलक सामवेदी पश्चिम शारदामठ
तोटक अथर्ववेदी उत्तर ज्योतिर्मठ

(पुस्तक – श्री शंकराचार्य, बलदेव उपाध्याय, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, पृष्ठ 193)

ये मठ आज भी भारत की आध्यात्मिक एकता के प्रतीक हैं। समस्त देश को धार्मिक दृष्टि से विभाजित कर उन्हें इन्हीं पीठों के अध्यक्षों के अधीन कर दिया था, जिससे समस्त भारतीय जनता में सदैव धार्मिक जागृति समान रूप से बनी रहे। पीठ के प्रधान आचार्य अद्यपर्यन्त शंकराचार्य ही कहलाते हैं और जो कि घूम घृमकर लोगों में धार्मिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार करते रहे हैं। इस प्रकार उनके द्वारा स्थापित चारों पीठों की भूमिका धर्म संस्कृति तथा शिक्षा का प्रसार करने वाले विश्वविद्यालय के समान रही है। वास्तव में आचार्य शंकर का यह पीठ-स्थापन-कार्य जनशिक्षा की दृष्टि से विश्व-शिक्षा के इतिहास में अद्वितीय उदाहरण है।[4]

[1] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 191

[2] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 192

[3] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 192

[4] भीष्म दत्त शर्मा, महान शिक्षा दार्शनिक के रूप में आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य, अनु प्रकाशन, मेरठ, प्रथम संस्करण, 1985, पृष्ठ 57

श्री आदिगुरु शंकराचार्य 

जयंती वैशाख शुक्ल पंचमी (21 अप्रैल 2026)

 Article Posted on 21,04,2026 Time 08.51 AM Tuesday

श्री आदिगुरु शंकराचार्य का जन्म दक्षिण भारत के केरल प्रदेश के कालड़ी (कालटी/कालादि) नामक ग्राम में हुआ ऐसा माना जाता है। बाल्यकाल से ही वे अत्यंत कुशाग्र बुद्धि और प्रतिभाशाली थे। उन्होंने अपनी मातृभाषा के साथ-साथ वेद, उपनिषद, पुराण और अन्य शास्त्रीय विषयों का अध्ययन अल्पायु में ही प्रारंभ कर दिया। उनके पिता का देहांत बचपन में ही हो गया, जिसके बाद उनकी माता ने उनका उपनयन संस्कार कराकर उन्हें गुरुकुल में विधिवत् शिक्षा हेतु भेजा। वहाँ उन्होंने वेद-शास्त्र, वेदांग, दर्शन आदि का गहन अध्ययन किया और शीघ्र ही अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण विद्वानों में प्रतिष्ठा प्राप्त की।

यद्यपि उनके जीवन से जुड़ी अनेक घटनाएँ परंपरागत कथाओं पर आधारित हैं, तथापि यह निर्विवाद है कि वे अत्यंत कम आयु में ही उच्च कोटि के विद्वान और आचार्य के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे। उनकी विद्वता और शिक्षण-कौशल के कारण अनेक जिज्ञासु उनके संपर्क में आए और उनसे प्रभावित हुए।

आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथों में उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र तथा श्रीमद्भगवद्गीता पर लिखे गए भाष्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। भाष्यकार के रूप में उनका स्थान भारतीय दर्शन के इतिहास में अद्वितीय है। उनकी व्याख्या-शैली तार्किक, गूढ़ और अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है। उनके ग्रंथ केवल दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन ही नहीं करते, बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

उन्होंने अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को सुदृढ़ रूप से स्थापित किया और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को एक नवीन दार्शनिक आधार प्रदान किया। उनके विचारों में समन्वय, एकत्व और सार्वभौमिकता का संदेश निहित है। इसी कारण वे केवल एक दार्शनिक ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक के रूप में “जगद्गुरु” के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

आदि शंकराचार्य ने ‘अद्वैत वेदांत’ का सिद्धांत दिया, जिसका मूल भाव है – ‘ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है, जीव और ब्रह्म एक हैं।‘ इस सिद्धांत ने यह स्पष्ट किया कि सभी जीवों में एक ही परमात्मा का अंश है, जिससे मानव मात्र की एकता का संदेश मिलता है।

 

 

जगदगुरु श्री शंकराचार्य पर विचार

दीनदयाल उपाध्याय

  • भारतीय राष्ट्र-जीवन में भगवान श्री कृष्ण के पश्चात श्री शंकराचार्य का ही आविर्भाव राष्ट्र की मूलभूत एकता को व्यावहारिक स्वरूप देने में समर्थ हुआ।
  • भगवान कृष्ण ने गीता के द्वारा भिन्न-भिन्न विचार-धाराओं में एकात्मता निर्माण करने का प्रयत्न किया तथा राष्ट्र की इस एकात्मता को धर्मराज युधिष्ठिर के चतुरन्त साम्राज्य के रूप में स्थापित किया। आचार्य शंकर ने यद्यपि धर्मराज के समान किसी राजनैतिक महापुरुष को भारतीय एकता का प्रतीक नहीं बनाया, किन्तु राष्ट्र-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एकता का निर्माण करके तथा उस एकता के संस्कारों को डालने वाली परम्परा को पुष्ट करके जो सांस्कृतिक जीवन की एकात्मता को शक्ति दी है, उसके कारण आज तक छिन्न-विच्छिन्न होने पर भी भारत आंतरिक एकता को सत्यसृष्टि में परिणत करने को लालायित है।
  • अनेक में एक के अपने प्राचीन सिद्धांत को आचार्य शंकर ही आत्मिक, भौतिक, नैतिक, धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में अपने अद्वैत के सिद्धान्त का प्रतिपादन करके व्यावहारिक जगत में लाये। यही सिद्धांत मानव मात्र की शांति और कल्याण का कारण होगा।[1]
  • आचार्य शंकर के सिद्धान्त और प्रयत्नों के परिणामस्वरूप भारतवर्ष एक ओर तो रूढ़िवादी कर्मकाण्ड और दूसरी ओर नास्तिकवादी जड़वाद के गर्त में गिरने से बच गया।
  • आचार्य शंकर ने भारतवर्ष का उद्धार किया, हम भी अपने इस महान राष्ट्र-पुरुष के प्रति इससे अच्छी कौन सी श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं कि उनके इस एकत्व के सिद्धान्त को अपने जीवन में लाकर पुनरपि भारतवर्ष को उन्नत एवं वैभवशाली बनावें।
  • बत्तीस वर्ष की आयु में इतना महान कार्य करने वाले आचार्य शंकर के अखण्ड कर्ममय जीवन से हमारे जीवन को भी कर्म की स्फूर्ति प्रदान हो तथा अपने पुरुषार्थ, निश्चय निष्ठा और त्याग के बल पर अद्वैत के सत्य सिद्धान्तों के द्वारा सम्पूर्ण संसार को सच्ची शान्ति का सुख देकर उन्हें जगद्‌गुरु के वास्तविक पद पर आसीन करावें। यही है उनका पुण्य स्मरण एवं उनकी सच्ची पूजा।[2]
  • शंकराचार्य ने समस्त हिन्दू-राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने एवं उसे संगठित करने का प्रयास किया। देश के चारों कोनों पर चार धामों के प्रति श्रद्धा केन्द्रित करते हुए उन्होंने सम्पूर्ण भारतवर्ष की, मातृ- भू की मूर्ति जन-जन के ह्रदय पर अंकित कर दी।… चार धामों के समान ही उन्होंने शंकराचार्यों की अध्यक्षता में भारत के चारों कोनों में चार मठ स्थापित किये।[3]

पं० बलदेव उपाध्याय

  • आद्य जगदुगुरु शंकराचार्य का जीवन-चरित्र भारतवासियों के लिए सदैव से प्रेरणास्रोत रहा है। आचार्य शंकर के जीवन चरित की आधुनिक युग में उपादेयता बताते हुए पं० बलदेव उपाध्याय लिखते हैं, “राजनीतिक आन्दोलन के इस युग में हम अपने धर्म संरक्षक तथा प्रतिष्ठापकों को एक प्रकार से भूलते चले जा रहे हैं परन्तु शंकराचार्य का पावन चरित्र भुलाने की वस्तु नहीं है, वह निरन्तर मनन करने की चीज है। आचार्य का हमारे ऊपर इतना अधिक उपकार है कि उनकी जयंती हमारे लिए राष्ट्रीय पर्व है, उनका चरित्र परमार्थ के मार्ग पर चलने वालों के लिए एक बहुमूल्य सम्बल है।“[4]

विष्णु प्रभाकर

  • अपनी पुस्तक ‘शंकराचार्य’ में प्रभाकर लिखते हैं, “सारे भारत में जिसने एक आत्मा की, एक ज्योति की, कल्पना की, सभी जीवों को जिसने ब्रह्म माना, उस अनोखे आचार्य को हम बार-बार प्रणाम करते हैं। जिसने केवल दिलों को नहीं हिलाया, दिमाग पर भी चोट की, बुद्धि के सहारे विवेचन किया और जनसाधारण के दिलों को जीत लिया, उस अनोखे जादूगर को हम बार-बार प्रणाम करते हैं।“[5]

[1] दीनदयाल उपाध्याय, जगदगुरू श्री शंकराचार्य, लोकहित प्रकाशन, पृष्ठ 102

[2] दीनदयाल उपाध्याय, जगदगुरू श्री शंकराचार्य, लोकहित प्रकाशन, पृष्ठ 102

[3] दीनदयाल उपाध्याय, जगदगुरू श्री शंकराचार्य, लोकहित प्रकाशन, भूमिका (मनोगत) से उद्धृत

[4] प. बलदेव उपाध्याय (चार शब्द), श्री शंकर दिग्विजय (माधवकृत) श्री श्रवणनाथ ज्ञानमंदिर, हरिद्वार, पृष्ठ 26

[5] विष्णु प्रभाकर, शंकराचार्य, पृष्ठ 36

April 19, 2026

ईरान की नापाक हरकत से भारत नाराज

Article Posted on 19.04.2026, Time 09.23 PM, Sunday Writer Sarvesh Kumar Singh, Senior Journalist

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

अमेरिका, इजराइल और ईरान के युद्ध के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नरम रुख अपनाए जाने के बाद भी ईरान की तरफ से कुछ ऐसी घटनाएं अंजाम दी जा रही हैं जो इस क्षेत्र में फिर से अशांति पैदा कर सकती है। भारत के साथ भी ईरान के संबंध तनावपूर्ण हो सकते यह घटनाक्रम कल हुआ है, जिससे भारत ईरान से बेहद नाराज है। अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए भारत के विदेश मंत्रालय ने, विदेश मंत्री विक्रम मिश्री ने कल ईरान के दिल्ली स्थित दूतावास से ईरान के राजदूत को तलब किया और अपनी नाराजगी जाहिर की।

Iran

घटना यह है कि कल हॉर्मूज जलडमरू मध्य मार्ग से भारत के 14 भारत आ रहे थे , जिसमें सात भारत के थे और बाकी कुछ दूसरे देशों के थे। लेकिन जो उसमें तेल, गैस और उर्वरक तीन चीजें लदी हुई थी। ये तीनों भारत ही आ रही थीं। यानी कि भारत के आपूर्ति की श्रंखला का यह हिस्सा थे। इनमें जो जहाज आ रहे थे उनको ईरान के (आईआरजीसी)  इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स ने अनुमति दी थी। लेकिन अचानक दो जहाजों पर ईरान की आईआरजीसी की नौकाओं ने लाइट मशीन गन से अटैक कर दिया। फायरिंग कर दी। इसमें एक जहाज को मामूली नुकसान भी हुआ।

लेकिन वो दोनों जहाज वापस लौट गए और दोनों ही नहीं लौटे। लगभग 13 जहाज जिसमें एलपीजी गैस, कच्चा तेल और यूरिया लगा हुआ था। ये फिर से फारस की खाड़ी की ओर वापस लौटने को मजबूर हुए। हालांकि भारतीय जहाज के जो नाविक थे, जहाज के कैप्टन थे उन्होंने आईआरजीसी से कहा कि हमें आपने पहले अनुमति दी अब आप अटैक क्यों कर रहे हैं? इसी बीच एक जहाज वहां से निकलने में सफल हो गया और वो भारत की ओर बढ़ रहा है। आ रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि एक जहाज इसमें ऐसा भी था जिसमें बहुत बड़ा टैंकर था और 20 लाख बैरल कच्चा तेल लदा था। यह इराक से भारत आ रहा था।

इसको भी वापस लौटना पड़ा। यह घटनाक्रम बहुत महत्वपूर्ण है। भारत ने पश्चिम एशिया के युद्ध में अपना संतुलित दृष्टिकोण और समर्थन बनाए रखा है। भारत की विदेश नीति बिल्कुल सही दिशा में थी और उसका ईरान के साथ भी बातचीत का क्रम जारी था और इजराइल के साथ भी जारी था। अमेरिका के साथ भी जारी था। भारत का पूरा प्रयास था कि युद्ध बंद होना चाहिए। शांति प्रयास बहाल होने चाहिए। इसके लिए भारत लगातार सक्रिय था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर लगातार ईरान के विदेश मंत्री से और ईरान के राष्ट्रपति से बातचीत कर रहे थे।

इसी बीच यह एक कष्टकारी और अप्रिय घटना भारत के सामने आई है। बताया ये जाता है कि जो शांति प्रयास चल रहे थे और लगभग युद्ध विराम की स्थिति थी तो ऐसे में ईरान ने अचानक स्टेट हॉर्मस को फिर से ब्लॉक क्यों कर दिया? और उसने यह रणनीति अपनाई है कि या तो टोल टैक्स दे या ईरान से अनुमति ले तब वहां से निकलेंगे। लेकिन सहमति यह हुई थी कि इसको निर्बाध आवाजाही के लिए खोल कर रखा जाएगा। डोनाल्ड ट्रंप ने भी यही बात कही थी। लेकिन ईरान का कहना यह है कि उसकी नौसेना की नाकेबंदी अमेरिका ने शुरू कर दी है। इसके बदले में हमने यह कारवाई की है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार अब इस युद्ध के बारे में अपना नरम रुख अपनाए हुए हैं। वे बार-बार कह रहे हैं कि युद्ध समाप्ति की ओर है। क्योंकि अब ईरान में लड़ने की क्षमता नहीं है। उनके पास नौसेना और वायु सेना नहीं है। नेतृत्व भी कोई बहुत मजबूत नहीं है। इसलिए युद्ध विराम बहुत जल्दी होगा और युद्ध समाप्त हो जाएगा। लेकिन ये जो कल की घटना है इससे तनावपूर्ण संबंध फिर से सामने आ सकते हैं और जैसा अटैक उन्होंने भारतीय जहाजों पर किया है, वो किसी और जहाज पर भी कर सकते हैं ।

इससे एक बार फिर पश्चिम एशिया में अशांति उत्पन्न हो जाएगी। डोनाल्ड ट्रंप के साथ भी भारत सरकार लगातार बात कर रही है । हालांकि एक बड़ा हिस्सा तेल का हमारे पास जो आता है वो खाड़ी देशों से ही आता है लेकिन अब रूस से भी तेल की आपूर्ति फिर से शुरू हो रही है तो इसलिए भारत को बहुत ज्यादा चिंता की तो जरूरत नहीं है लेकिन ये जो खाड़ी देशों से तेल आता है बहुत सारे सभी देशों से लगभग जो खाड़ी के देश हैं तेल उत्पादक देश हैं। उनसे हमारे यहां एलपीजी गैस, कच्चा तेल और इसके अलावा नेफ़्था जिससे यूरिया बनता है वो भी वहां से आता है। यूरिया भी गल्फ के कई देशों से हम आयात करते हैं। क्योंकि हमारे कृषि क्षेत्र के में यूरिया की बड़ी खपत है और यह कृषि उत्पादन को प्रभावित करता है। इसलिए स्टेट हॉर्बोज का खुला रहना भी जरूरी है। क्योंकि हमें जो यूरिया मिलता है वह इन्हीं क्षेत्रों से मिलता है। नेफा भी मिलता है।

यह जो घटनाक्रम है । इस घटनाक्रम की पुनरावत्ति ना हो और भारत के जहाजों का निर्बाध आवागमन बना रहे। यह पूरे पश्चिम एशिया के हित में है और भारत के भी हित में है और ईरान भारत के संबंधों के लिए यह आवश्यक भी है। ईरान को यह भी याद रखना चाहिए कि जब अमेरिका ने ईरान के एक जहाज को हिंद महासागर में डुबो दिया, नष्ट कर दिया था तो दूसरे जहाज को भारत ने ही शरण दी। भारत ने उसे बचा लिया अमेरिका के हमलों से। बावजूद इसके कि यह बात अमेरिका को नागवार गुजरी होगी। लेकिन भारत ने अपना धर्म निभाया और ईरान की संकट की घड़ी में मदद भी की। तो ऐसी स्थिति में ईरान के नेतृत्व को विचार करना चाहिए और ये जो घटना हुई है इसकी फिर से पुनरावृत्ति ना हो। शांति बहाल हो। पूरे विश्व के लिए यही आवश्यक है।

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