Editorial 22 June 2026 Monday, Topic Inpotance of Yoga, by Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News
भारतीय ज्ञान परंपरा द्वारा प्रतिपादित योग ने 21 जून का दिन अमृत तुल्य निधि से आच्छादित किया। विश्व भर में बड़े ही उत्साह के साथ योग दिवस मनाया गया। भारत के कोने कोने में जहां योग दिवस की धूम रही, वहीं विश्व के सभी प्रमुख देशों की राजधानियों और शहरों में योग किया गया। पार्कों, क्लबों में योग की विभिन्न मुद्राओं के चित्र आज समाचार पत्रों, सोशल मीडिया में देखे जा सकते है। जर्मनी के बर्लिन और चीन के शंघाई जैसे शहरों में भी योग की गूंज सुनाई दी।
मानव जीवन के लिए योग की महत्ता को आज विश्व स्वीकार कर रहा है। स्वस्थ्य शरीर और शांत चित्त के लिए योग इतर कोई और श्रेष्ठ मार्ग नहीं है। यौगिक जीवन कर्मप्रधान व्यक्तिव का निर्माण करता है। योगी राज कृष्ण ने अपनी वाणी में कहा है, श्रीमद्भगदगीता में योग को कुशलता से किया जाने वाला कर्म कहा है। उन्होंने अर्जुन से कहा था “योग: कर्मसुकौशलम”। ध्यान योग की व्याख्या करते हुए सांख्य दर्शन के प्रतिपदक महर्षि कपिल ने बताया कि “ध्यान निर्विषयम मन:”। यानि कि मन के विषय रहित होने की स्थिति ध्यान योग है। इससे चित्त की एकाग्रता आती है। मन के संयम और चित्तवृत्तियां को नियंत्रित करने के लिए, महर्षि पतंजलि ने कहा “योगस्स चित्तवृत्ति निरोध:”।
कल योग दिवस पर प्रधानमंत्री ने कोलकाता के रेडरोड पर योग किया। हजारों लोगों के बीच उन्होंने योग का संदेश भी दिया और सामूहिक योग में सम्मिलित हुए। इसके एक दिन पहले हुगली में उन्होंने योग के लिए बंगाल की देन का उल्लेख करते हुए स्वामी विवेकानंद, परमहंस योगानंद, रामकृष्ण परमहंस, लाहिड़ी महाराज का स्मरण किया। वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने झांसी के ऐतिहासिक किला मैदान में योग किया।
योग की महत्ता जीवन को निरोग, दीर्घायु बनाने में सर्वोपरि है। इसीलिए इसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। प्रथम विश्व योग दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया। तब से निरंतर योग अपनाने वालों की विश्व संख्या बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 11 दिसंबर 2014 को सर्वसम्मति से 21 जून का दिन विश्व योग दिवस घोषित किया था। यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ। जिसे हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69बे अधिवेशन में प्रस्तुत किया था।
योग भारत के विश्व शांति और सर्वेभवन्तु सुखिन: के संदेश का शाश्वत, चिरंतर और निरंतर का ही प्रकटीकरण है।


