POSTED ON 21.04.2026 TIME 09.00 AM
शंकराचार्य के जीवन का प्रधान लक्ष्य वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा तथा प्रचार था। उन्होंने अपने प्रखर व्यक्तित्व के बल पर इन समस्त अवैदिक अथवा अर्धवैदिक तथा नास्तिक सिद्धान्तों को जन सामान्य में अलोकप्रिय बना दिया और उनकी निःसारता प्रमाणित कर दी तथा वेद-प्रतिपाद्य अद्वैतमत का विपुल सृजन कर वैदिक धर्म को लोकप्रिय बना दिया। यही कारण है कि उन्हें साक्षात् भगवान शिव का अवतार मानता गया है। अपनी विलक्षण दार्शनिक प्रतिभा के द्वारा शंकराचार्य ने एक ऐसे दार्शनिक सिद्धान्त की स्थापना की है जो न एकदम भौतिकवाद है, न कोरा कर्मवाद और न शुष्क ज्ञानवाद। उनका अद्वैतवाद भक्ति, कर्म और ज्ञान, स्थूल और सूक्ष्म का समन्वयभूत सिद्धान्त है।
वैदिक ग्रंथ दुरुह तथा क्लिष्ट संस्कृत प्रधान होने के कारण जनसामान्य के लिए उपेक्षित बने हुए थे। आचार्य शंकर ने उपनिषदों की विशदव्याख्या कर जिस साहित्य की सृजना की वह भारतीय चिरन्तन संस्कृति की अमूल्यनिधि है। ब्रह्मसूत्र और गीता पर उन्होंने अपने सुबोध भाष्यों का प्रणयन किया। वेदान्त-दर्शन के क्षेत्र में भाष्य-प्रणयन का उनका प्रयास सर्वप्रथम तथा सर्वोत्तम है। आज जिन रामानुज आचार्यों के दार्शनिक सिद्धान्तों की तुलना शंकराचार्य के दार्शनिक सिद्धान्तों से की जाती है उनको भी भाष्य रचना की प्रेरणा आचार्य शंकर से प्राप्त हुई है। इस प्रकार वेदान्त दर्शन के क्षेत्र में भाष्य-प्रणयन परम्परा के मूल प्रवर्तक हैं।
साधारण लोगों के लिए उन्होंने प्रकरण ग्रन्थों की रचना कर अपने सिद्धान्त को बोधगम्य भाषा में सरल, सरस श्लोकों के द्वारा अभिव्यक्त किया है। इतना ही नहीं, वेदान्त शास्त्र के सिद्धान्तों के विपुल प्रचार की अभिलाषा से उन्होने अपने भाष्य ग्रन्थों पर वृत्ति तथा वार्तिक लिखने के लिए विद्वानों को प्रोत्साहित किया। शिष्यों के हृदय में उनकी प्रेरणा प्रभावशालिनी सिद्ध हुई। उन लोगों ने आचार्य से प्रेरणा ग्रहण कर जिस विपुल ग्रन्थ राशि का अद्वैत-प्रतिपादन के लिए प्रणयन किया है, उसकी रचना की प्रेरणा का मूलस्रोत आचार्य के ग्रन्थों में प्रवाहित हो रहा है। इस प्रकार अद्वैत साहित्य को जन्म देकर शंकर ने ऐसा प्रबन्ध कर दिया कि जिससे समग्र देश की जनता उनके द्वारा प्रचारित धर्म का मर्म समझे और कोई भी अद्वैत तत्त्व के उपदेश से वंचित न रह जाय। अत: शंकराचार्य न केवल एक महान् नेता है बल्कि वह जन भावनाओं को अधिगृहीत करते हुए प्रतीत होते हैं।
धर्म-संस्थापन कार्य को स्थायी बनाने के लिए शंकर ने सन्यासियों को संघबद्ध करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। अपनी शिक्षा-दीक्षा, उपासना तथा निवृत्ति के कारण सन्यासी समाज ही भलीभाँति उपदेशक हो सकता है। आचार्य ने इसीलिए उसे संघबद्ध करने का सफल प्रयास किया। वस्तुत: विरक्त पुरुष ही धर्म का सच्चा उपदेश दे सकता है तथा अपना जीवन वैदिक धर्म के अभ्युदय एवं विकास में लगा सकता है। शंकर ने इस विरक्त सन्यासी वर्ग को एकत्र कर एक संघ के रूप में संगठित कर वैदिक धर्म के भविष्यगत कल्याण के लिए महान् कार्य किया। सन्यासी संघ की स्थापना राष्ट्र एवं धर्म के हित में शंकर का अत्यन्त गौरवशाली कार्य है।
चार मठों की स्थापना
आचार्य शंकराचार्य ने भारतवर्ष की धार्मिक व्यवस्था को अक्षुण्य बनाये रखने के लिये प्रख्यात तीर्थ-स्थानों में मठों की स्थापना की। चारों धाम के पास आचार्य ने चार विख्यात मठों की स्थापना की।
- गोवर्धनमठ : भारत के पूर्वी भाग में जगन्नाथ पुरी में प्रतिष्ठापित है।
- ज्योतिर्मठ : (प्रचलित नाम जोशी मठ) बदरिकाश्रम के पास उत्तर में स्थित है।
- शारदामठ : काठियावाड में द्वारिकापुरी में वर्तमान है।
- श्रृंगेरीमठ : मैसूर में दक्षिण भारत में है।
उसी दक्षिण भारत में सप्तमोक्षपुरियों में अन्यतम श्रीकाच्ची में भी मठ प्रतिष्ठापित है तथा तुङ्गभद्रा के नीर में कुडलि मठ स्थित है।
इसी तरह अन्यान्य स्थानों में भी कई मठ स्थापित हैं। इन पीठो के अधिपतियों का मुख्य कर्त्तव्य अंतर्भुक्त प्रान्तों के निवासियों को धर्मोपदेश करना तथा वैदिक मार्ग के ऊपर सुचारु रूप से चलने की व्यवस्था करना था। प्रत्येक मठ का कार्यक्षेत्र पृथक्-पृथक् रखा गया था, परन्तु पारस्परिक सहयोग खूब था। मठ के अध्यक्षों का आज भी यह प्रधान कार्य है। अपने क्षेत्र के अंतर्गत वर्णाश्रम धर्मावलम्बियों में धर्म की प्रतिष्ठा को दृढ़ रखना तथा तदनुकूल उपदेश देना, ये अध्यक्ष आचार्य शंकर के प्रतिनिधि रूप हैं। इसी कारण ये भी शंकराचार्य कहलाते हैं।[1] मठों की स्थापना के अनन्तर आचार्य ने अपने चारों पट्ट-शिष्यो को इनका अध्यक्ष नियुक्त किया, यह सर्वसम्मत बात है।
मठों के आदि आचार्य और उनकी नियुक्ति
वैदिक सम्प्रदाय सें वेदों का सम्बन्ध भिन्न-भिन्न दिशाओं के साथ माना जाता है। ऋग्वेद का सम्बन्ध पूर्व दिशा से है, यजुर्वेद का दक्षिण दिशा से, सामवेद का पश्चिम से तथा अथर्ववेद का उत्तर से है। योगानुष्ठान के अवसर पर यही पद्धति प्रचलित है। शंकराचार्य ने शिष्यों की नियुक्ति मनमाने ढंग से नहीं की किन्तु इस चुनाव में उन्होंने एक विशिष्ट वैदिक नियम का पालन किया है। जिस शिष्य का जो वेद था, उसकी नियुक्ति उसी वेद से संबद्ध दिशा से की गयी। आचार्य पद्मपाद काश्यपगोत्रीय ऋग्वेदी ब्राह्मण थे, अतः आचार्य ने उनकी प्रतिष्ठा ऋग्वेद से संबद्ध पूर्व दिशा के गोवर्धन मठ के अध्पक्ष पद पर की।[2]
दक्षिण के श्रृंगेरी मठ में सुरेश्वराचार्य की नियुक्ति प्रमाण-सम्मत प्रतीत होती है। इस कारण नहीं कि प्रधान पीठ पर सर्वप्रधान शिष्य को रखना न्याय संगत था, बल्कि उनके वेद के कारण ही। सुरेशवर शुक्ल यजुर्वेद के अन्तर्गत शाखाध्यायी ब्राह्मण थे। आचार्य शंकराचार्य ने सुरेश्वर को दो उपनिषद् भाष्यों पर वार्तिक लिखने का आदेश दिया था–एक तैतीरीय उपनिषद भाष्य पर, क्योंकि शंकराचार्य की अपनी शाखा तैत्तीरीय थी, दूसरी बृहदारण्यक भाष्य पर, क्योंकि सुरेश्वर की शाखा काण्व शाखा थी और वृहदारएयक उपनिषद् इसी यजुर्वेद शाखा से संबद्ध है। यजुर्वेद से संबद्ध दिशा दक्षिण है। इसीलिये आचार्य ने काण्व शाखीय यजुर्वेदीय सुरेश्वर को श्रृंगेरी मठ का अध्यक्ष बनाया।[3]
तोटकाचार्य उत्तर दिशा में स्थित ज्योतिर्मठ के अध्यक्ष बनाये गए थे। यह चुनाव इनके अथर्ववेदी होने के कारण किया गया था।
हस्तामलकाचार्य की नियुक्ति द्वारिकापुरी के शारदामठ के अध्यक्ष पद पर की गयी। इस नियुक्ति में भी उनके वेद का संबंध ही प्रधान कारण प्रतीत होता है। आदि आचार्यों की यही परम्परा न्यायानुमोदित प्रतीत होती है। अतः इन चारों मठों के आदि आचार्यों की निम्नलिखित व्यवस्था प्रामाणिक है –
| आचार्य | वेद | दिशा | मठ |
| पद्मपाद | ऋग्वेदी | पूर्व दिशा | गोवर्धनमठ |
| सुरेश्वर | यजुर्वेदी | दक्षिण | श्रृंगेरीमठ |
| हस्तामलक | सामवेदी | पश्चिम | शारदामठ |
| तोटक | अथर्ववेदी | उत्तर | ज्योतिर्मठ |
(पुस्तक – श्री शंकराचार्य, बलदेव उपाध्याय, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, पृष्ठ 193)
ये मठ आज भी भारत की आध्यात्मिक एकता के प्रतीक हैं। समस्त देश को धार्मिक दृष्टि से विभाजित कर उन्हें इन्हीं पीठों के अध्यक्षों के अधीन कर दिया था, जिससे समस्त भारतीय जनता में सदैव धार्मिक जागृति समान रूप से बनी रहे। पीठ के प्रधान आचार्य अद्यपर्यन्त शंकराचार्य ही कहलाते हैं और जो कि घूम घृमकर लोगों में धार्मिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार करते रहे हैं। इस प्रकार उनके द्वारा स्थापित चारों पीठों की भूमिका धर्म संस्कृति तथा शिक्षा का प्रसार करने वाले विश्वविद्यालय के समान रही है। वास्तव में आचार्य शंकर का यह पीठ-स्थापन-कार्य जनशिक्षा की दृष्टि से विश्व-शिक्षा के इतिहास में अद्वितीय उदाहरण है।[4]
[1] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 191
[2] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 192
[3] बलदेव उपाध्याय, श्री शंकराचार्य, हिन्दुस्तान एकेडेमी इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1963, पृष्ठ 192
[4] भीष्म दत्त शर्मा, महान शिक्षा दार्शनिक के रूप में आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य, अनु प्रकाशन, मेरठ, प्रथम संस्करण, 1985, पृष्ठ 57

