Article Posted on 11.05.2026 Time 11.41 PM Monday, Tarique Khan
-रतिभान त्रिपाठी
पत्रकारिता के रास्ते से बढ़कर शिक्षा और रंगकर्म के जरिए समाज में अपना मुकाम बनाने वाले तारिक़ खान नहीं रहे। सोमवार को दोपहर बाद मिली यह खबर मेरे लिए किसी सदमे से कम नहीं क्योंकि मैंने जिस अखबार प्रयागराज टाइम्स के मार्फत पत्रकारिता में प्रवेश किया, तारिक़ खान उसके पहले संपादक थे। अखबार के संस्थापक डॉ. अनवार अहमद ने तारिक साहब से मेरी मुलाकात कराई थी। उन दिनों बड़े भाई समान नागेंद्र त्रिपाठी, सिद्धनाथ द्विवेदी, बैजनाथ त्रिपाठी, इफ्तेखार ज़मन, जमील अहमद, संजय श्रीवास्तव, संजय मासूम आदि साथी भी प्रयागराज टाइम्स में थे।
पत्रकारिता के पुरोधा रहे पंडित हेरंब मिश्र का आशीर्वाद हम सबको उन दिनों मिल रहा था। संभवतः हम सब पंडित हेरंब मिश्र जी से पत्रकारिता के गुर सीख रहे थे। हेरंब जी, जिन्हें हम सब बाबा कहते थे, वह एक दिन तारिक़ खान को लेकर माया पत्रिका के तत्कालीन संपादक बाबूलाल शर्मा के पास गए। कहा, मैं तारिक़ को पत्रकार मानता हूं। तुम चाहो तो इनका इम्तिहान ले सकते हो। बाबा की गारंटी के आगे आखिर बाबूलाल जी क्या कहते! तारिक़ खान माया पत्रिका में काम करने लगे लेकिन उनसे हम सबका जुड़ाव बना रहा।
हम सब अलग-अलग अखबारों में काम करने लगे लेकिन प्रतिभा में विविधता के संवाहक तारिक़ भाई का मन माया से बहुत जल्द ही भर गया। वहां नमस्ते किया और फिर नूरुल्ला रोड पर बेनहर स्कूल खोला। कुछ ही सालों में बेनहर स्कूल तरक्की कर गया और उस इलाके के बहुत सारे बच्चे वहीं पढ़ने लग गए।
तारिक़ भाई प्रयोगधर्मी इंसान थे। उन्होंने स्कूल के साथ ही बाफ्टा नामक रंगकर्म की संस्था बनाई और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम आधारित “दास्तान-ए-राम” जैसा नाटक तैयार किया जिसके प्रयागराज, लखनऊ समेत अनेक शहरों में शो हुए। कई और नाटकों का मंचन भी बाफ्टा के बैनर तले चलता रहा। वह अपनी एक संस्था के जरिए साल में एक बार अलग अलग क्षेत्रों में अच्छा काम करने वाले लोगों को सम्मानित भी करते थे।
कुंभ 2019 के समय मेरे लेखन और संपादन में तीन पुस्तकें आई थीं। इसके लिए उन्होंने मुझे अपने स्कूल परिसर में सम्मानित किया था। उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर योगेश्वर तिवारी समेत कुछ और हस्तियों को भी सम्मानित किया गया था।
साल भर पहले वह लखनऊ आए थे। उन्होंने मुझसे अपनी खुशी साझा करते हुए बताया था कि उनकी बेटी यहीं लोहिया अस्पताल में डॉक्टर है। वह अक्सर यहां आते रहते हैं। अभी कुछ महीनों पहले उन्होंने यह भी वादा किया था कि अबकी बार बाफ्टा के बैनर तले होने वाले नाटक मंचन के समय बुलाएंगे। उन्होंने बुलाया भी लेकिन संयोग से मैं लखनऊ से बाहर था इसलिए पहुंच नहीं सका।
तकरीबन 65 साल के तारिक़ भाई अच्छे खासे सक्रिय रहते थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। रोज की तरह वह आज भी स्कूल गए थे। उन्हें दिल का दौरा पड़ा लेकिन बचाया नहीं जा सका। पत्रकारिता, शिक्षा और रंगकर्म के क्षेत्र में बेहतरीन और यादगार काम करने वाले तारिक़ खान भले ही भौतिक रूप से हम सबके बीच नहीं रहे लेकिन उनके कार्यों को भुलाया नहीं जा सकेगा। वह यादों में हमेशा रहेंगे। अलविदा तारिक़ भाई….


