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सनातन के अपमान का दुस्साहस 

May 14, 2026

सनातन के अपमान का दुस्साहस 

Editorial

Editorial 14.05.2026, Thursday,Time 07.34 PM, by Sarvesh Kumar Singh, Editor From Lucknow 

सनातन के अपमान का फिर दुस्साहस हुआ है। वहीं जहां सितंबर 2023 में हुआ था। वही उदयनिधि स्टालिन जिसने तब कहा था। सनातन डेंगू और मलेरिया है। इसे खत्म करना होगा। थोड़ा विरोध, हल्ला गुल्ला हुआ। मामला शांत हो गया। अब फिर सनातन पर हमला। वही व्यक्ति उदयनिधि जब तमिलनाडु विधान सभा में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) विधायक दल का नेता चुना जाता है, और नेता विरोधी दल बनता है, तो पहले भाषण में ही सनातन को खत्म करने की बात कहता है। वह कहता है सनातन समाज को बांटता है। इसलिए इसे समाप्त करना जरूरी है।

जब तमिलनाडु विधान सभा में सनातन के अपमान का दुस्साहस होता है, तो विरोध का कोई स्वर सुनाई नहीं देता। यहां तक कि मुख्यमंत्री टी जोसेफ विजय भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। न ही प्रतिकार और न ही रोकने की कोई कोशिश। ऐसा लगता है कि तमिलनाडु विधानसभा सनातन विरोध का केंद्र बन गई है। दो बार उदयनिधि दुस्साहस कर चुके है। ये पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और द्रमुक संस्थापक के करुणानिधि के पौत्र हैं। इस परिवार ने दीर्घ काल तक तमिलनाडु में सरकार चलाई है। ईसाई मतावलंबी होने के बावजूद इस परिवार को तमिल हिंदुओं का समर्थन मिलता रहा है। लेकिन इस परिवार के आचार,व्यवहार और सोच में सहिष्णुता और सर्वधर्म समभाव का पूर्णतः अभाव है। अगर ऐसा नहीं होता तो एमके स्टालिन अपने बेटे को रोकते, टोकते और भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक विरासत की रक्षा की कोशिश करते मगर उन्होंने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। न अब जब 11 मई को उनके पुत्र ने सनातन का अपमान किया और न ही वर्ष 2023 में जब सनातन को डेंगू कहा गया।

भारत के सांस्कृतिक विकास क्रम में तमिल संस्कृति का अनूठा और अनुपम योगदान है। तमिल भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है। इस गौरव से संपूर्ण भारत गौरवान्वित है। तमिल संस्कृति के महत्व को देखते हुए ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में काशी-तमिल संगमम आयोजन किए। ये आयोजन उतर और दक्षिण की सनातन संस्कृति का मिलन ही नहीं। भारत की एकरूपता का संदेश है। लेकिन पीएम मोदी की इस भावना को समझने के लिए स्टालिन परिवार तैयार नहीं है।

आज आवश्यकता है कि सनातन संस्कृति पर बढ़ रहे आक्रमणों और नियोजित, प्रायोजित अपमान का संगठित रूप से लोकतांत्रिक मर्यादाओं में रहकर प्रतिकार किया जाए, अन्यथा ये दुस्साहस बढ़ता जाएगा।