हाथरस। हाथरस जंक्शन कोतवाली क्षेत्र के गांव छौंक में स्कूल जा रहे बच्चों से भरा ई-रिक्शा पलटने के बाद दो पक्षों में जमकर मारपीट हो गई। लाठी-डंडों और पशुओं को बांधने वाली जंजीरों से हुए हमले में दोनों पक्षों के आधा दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए। सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची और घायलों को जिला अस्पताल में भर्ती कराया।
जानकारी के अनुसार गांव ततारपुर निवासी मनोज बच्चों को ई-रिक्शा से गांव फुलई स्थित विद्यालय छोड़ने जा रहे थे। गांव छौंक में एक ट्रैक्टर चालक द्वारा अचानक ई-रिक्शा के आगे ट्रैक्टर लगाने से वाहन असंतुलित होकर पलट गया। गनीमत रही कि बच्चों को गंभीर चोट नहीं आई। घटना के बाद ई-रिक्शा चालक और ट्रैक्टर चालक में कहासुनी हो गई, जो देखते ही देखते हिंसक झड़प में बदल गई।
मारपीट में एक पक्ष से देव प्रकाश, कमल और बच्ची नेहा तथा दूसरे पक्ष से भगवान सिंह, विनीत और कृष्णा घायल हुए हैं। सभी का चिकित्सकीय परीक्षण कराया जा रहा है। पुलिस का कहना है कि तहरीर मिलने पर संबंधित धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कर कार्रवाई की जाएगी। गांव में एहतियातन पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।
हाथरस। जनपद में पर्यावरण संरक्षण के दावे भले ही फाइलों में हरे-भरे दिखाई देते हों, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट नजर आ रही है। हरे-भरे पेड़ों पर धड़ल्ले से कुल्हाड़ी चल रही है और जिम्मेदार विभाग कुंभकरणीय नींद में सोया हुआ प्रतीत हो रहा है। कागजों में वृक्षारोपण, निरीक्षण और कार्रवाई की लंबी-चौड़ी रिपोर्ट तैयार हो रही है, मगर धरातल पर हरियाली तेजी से गायब हो रही है।
सूत्रों के अनुसार प्रतिदिन सैकड़ों से लेकर लगभग एक हजार तक पेड़ों का दोहन किया जा रहा है। बागों के ठेके लेकर रातों-रात पेड़ों को काटा जा रहा है और लकड़ी की खेप खुलेआम निकल रही है। हैरानी की बात यह है कि जिन रास्तों से ट्रैक्टर-ट्रॉली और ट्रक गुजरते हैं, वहां से प्रशासनिक निगाहें कैसे चूक जाती हैं? या फिर सबकुछ देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है?
जनपद में टीटीजेड के नाम पर उद्योगों पर सख्ती दिखाने वाले अधिकारी अवैध कटान के मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। सवाल ये उठ रहा है कि क्या कार्रवाई सिर्फ छोटे कारोबारियों तक सीमित है? पर्यावरण संरक्षण के नाम पर बैठकें और निर्देश तो जारी हो रहे हैं, लेकिन धरातल पर अमल नदारद है।
कुछ लोगों का दावा है कि इस खेल में मोटी कमाई का हिस्सा तय है, इसलिए शिकायतें भी फाइलों में दबकर रह जाती हैं। पूर्व में एक पर्यावरणविद के आंदोलन के दौरान कुछ समय के लिए कुल्हाड़ी की रफ्तार थमी थी, मगर अब फिर वही हाल है। यदि जिम्मेदार विभाग इसी तरह कागजी खानापूर्ति में उलझे रहे तो आने वाले समय में हाथरस की हरियाली इतिहास बनकर रह जाएगी।