एटा 25 अप्रैल उप्रससे। गंगा-यमुना की अंतर्वेदी में स्थित एटा जनपद सदियों से ऐतिहासिक, पौराणिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व साहित्यिक गाथा को अपने अंदर समाहित किए हुए है। अनेक राजवंशों का उत्थान-पतन हो या मुगल काल के आरम्भिक वर्षों में वल्लभाचार्य, विट्ठलनाथ, गोकुलनाथ, महात्मा बुद्ध, दयानंद सरस्वती, स्वामी विरजानंद दण्डी का आगमन। प्रख्यात साहित्यकारों की जन्मस्थली हो या मराठों का प्रवेश आदि अनेक घटनाओं से इस जनपद की विशिष्ट पहचान रही है। सन् 1852 ई० के अंत में मि०एफ०ओ० मेनी डिप्टी कलेक्टर तथा ज्वाइंट मजिस्ट्रेट ने पटियाली के स्थान पर एटा मुख्यालय को जिला बनाया था। इस मुख्यालय पर कैलाश मंदिर व आर्ष गुरुकुल मुख्य आकर्षण के केन्द्र बिन्दु हैं। संवत् 2005 सन् 1948 ई० में आर्य जगत के सुप्रसिद्ध विद्वान स्वामी ब्रह्मानंद दण्डी महाराज ने यहाँ पर ‘ चतुर्वेद ब्रह्म पारायण यज्ञ ‘ आयोजित किया था। यज्ञ के अवसर पर गुरुकुल की इस पुण्यभूमि पर तीन विशाल यज्ञशालाओं तथा 108 यज्ञकुण्डों का निर्माण कराया गया था और चौदह दिनों तक यज्ञ कर्म चलता रहा। वेदध्वनि अनवरत गूँजती रहे, भारतीय संस्कृति रक्षित रहे, इस भाव को साकार रूप देने के लिए स्वामी ब्रह्मानंद दण्डी महाराज ने वैशाख शुक्ल 2 संवत् 2005 ( 26 अप्रैल 1948ई० ) को इसी पुण्य भूमि पर आर्ष गुरुकुल की स्थापना कर दी थी।
‘ आर्ष ‘ शब्द ऋषि से व्युत्पन्न है , जिसका अर्थ है– ऋषियों से प्राप्त या ऋषियों द्वारा स्थापित। अत: आर्ष गुरुकुल का आशय ऐसी शिक्षा प्रणाली से है जो वेदों,उपनिषदों और ऋषि परम्परा पर आधारित हो। इस प्रकार यहाँ की शिक्षा वैदिक ज्ञान के प्रचार के साथ भारतीय संस्कृति का संरक्षण करते हुए नैतिक और चरित्रवान नागरिकों का निर्माण कर रही है। इसके विकास में आचार्यों और विद्वानों का अभूतपूर्व योगदान रहा है। इन आचार्यों ने वैदिक शिक्षा को जीवित रखा, छात्रों में संस्कारों का विकास तथा समाज में नैतिकता का संदेश दिया है। यहाँ का छात्र वेद, छन्द, ज्योतिष, निरुक्त का अध्ययन करके वैदिक धर्म का प्रचार करता है। इस संस्था में अध्ययनरत छात्र का जीवन जटा, शिखा धारण कर अत्यन्त अनुशासित और सादगीपूर्ण होता है। वे स्वयं दैनिक कार्य करते हैं, जिससे उनमें आत्मनिर्भरता का विकास होता है।
आज जब पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली का प्रभाव बढ़ रहा है तब इस गुरुकुल के वर्तमान प्रधान योगराज अरोड़ा के अथक श्रम व योगदान की सराहना करनी होगी, जिन्होंने महात्मा प्रभु आश्रित छात्रावास का निर्माण करवाकर 26 अप्रैल 2026 गुरुकुल स्थापना दिवस पर इसका विधिवत उद्घाटन कराने का निर्णय लिया है। गुरुकुल का हरा-भरा रमणीक वातावरण, व्यवस्थित छात्रावास, आचार्य, ब्रह्मचारी, आश्रम व्यवस्था गुरुकुल की संरचना को समयानुकूल ढालने का प्रशंसनीय रचनात्मक प्रयास है। आर्ष गुरुकुल जैसे संस्थानों की आज के समय में विशेष आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति और वैदिक परम्परा के इस जीवंत केन्द्र को यदि इसी भाँति उचित संसाधन और समर्थन प्राप्त होता रहे तो भारतीय संस्कृति के संरक्षण में, युवाओं को नैतिक और जिम्मेदार नागरिक बनाने में आर्ष गुरुकुल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

