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महिला आरक्षण: नारी शक्ति या सत्ता का नया मुखौटा?

April 19, 2026

महिला आरक्षण: नारी शक्ति या सत्ता का नया मुखौटा?

 (आरक्षण, नैतिकता और राजनीति का असली सवाल)
Dr Priyanka Saurabh Writer, Poet
– डॉ. प्रियंका सौरभ
देश में जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हुआ, तो इसे “ऐतिहासिक” बताया गया, संसद में तालियां बजीं और महिला सशक्तिकरण के नए युग की घोषणा की गई, लेकिन इस पूरे उत्सव के बीच एक असहज सवाल लगातार सिर उठाता रहा—क्या सच में महिलाओं के लिए राजनीति के दरवाजे खुले हैं, या केवल एक नया प्रतीकात्मक फ्रेम तैयार किया गया है जिसमें वही पुरानी सत्ता की तस्वीर फिट कर दी जाएगी। भारतीय राजनीति का चरित्र आदर्शवाद जितना नहीं, उससे कहीं अधिक यथार्थवादी और कई बार कठोर भी रहा है, जहां सिद्धांतों से ज्यादा समीकरण काम करते हैं और नैतिकता अक्सर सत्ता की सुविधा के हिसाब से बदलती रहती है, ऐसे में यह उम्मीद करना कि केवल आरक्षण से व्यवस्था का चरित्र बदल जाएगा, शायद एक भोला विश्वास हो सकता है। महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़नी चाहिए, यह एक बुनियादी लोकतांत्रिक आवश्यकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भागीदारी वास्तविक सशक्तिकरण में बदलेगी या फिर वही सत्ता संरचना उन्हें अपने ढांचे में ढाल लेगी, जैसा वह हर नए प्रवेशकर्ता के साथ करती आई है। राजनीति में प्रवेश का रास्ता आज भी बेहद जटिल है, जहां परिवार, पूंजी, संपर्क और दलगत निष्ठा का दबाव काम करता है, और महिलाओं के लिए यह राह और अधिक कठिन हो जाती है क्योंकि उन्हें सामाजिक बंधनों, चरित्र पर सवाल और अवसरों की कमी जैसे अतिरिक्त अवरोधों से गुजरना पड़ता है, ऐसे में यह मान लेना कि हर महिला जो आगे बढ़ेगी वह केवल समझौतों के रास्ते ही बढ़ेगी, यह न केवल सरलीकरण है बल्कि उन हजारों महिलाओं के संघर्ष का अपमान भी है जो अपनी मेहनत और योग्यता से जगह बना रही हैं।
असल समस्या यह है कि जिस सिस्टम में यह आरक्षण लागू हो रहा है, वह खुद पारदर्शी और निष्पक्ष नहीं है, राजनीतिक दलों के भीतर लोकतंत्र की कमी, टिकट वितरण में अपारदर्शिता और नेतृत्व का केंद्रीकरण यह सुनिश्चित करता है कि अवसर योग्यता से अधिक नजदीकियों के आधार पर बांटे जाते हैं, ऐसे में अगर महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित भी हो जाती हैं, तो यह जरूरी नहीं कि वे वास्तव में स्वतंत्र और सशक्त प्रतिनिधि बनकर उभरें, बल्कि यह भी संभव है कि वे उसी सत्ता खेल का हिस्सा बन जाएं जहां निर्णय कहीं और होते हैं और चेहरे कहीं और दिखते हैं। यही कारण है कि इस कानून को लेकर आशा के साथ-साथ आशंका भी स्वाभाविक है, क्योंकि अगर संरचना नहीं बदली, तो परिणाम भी वैसा ही रहेगा जैसा अब तक रहा है। राजनीति में नैतिकता का सवाल भी इस बहस के केंद्र में है, क्योंकि सत्ता के गलियारों में “संपर्क” और “समझौते” की संस्कृति लंबे समय से मौजूद है, और यह केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम में फैली हुई है, ऐसे में अगर इस संस्कृति को चुनौती नहीं दी गई, तो आरक्षण भी उसी ढांचे में समाहित होकर अपना मूल उद्देश्य खो सकता है।
यह भी समझना जरूरी है कि प्रतिनिधित्व बढ़ाने से परिवर्तन की गारंटी नहीं मिलती, कई बार नए लोग भी पुराने ढर्रे पर चलने लगते हैं क्योंकि व्यवस्था उन्हें वैसा बनने के लिए मजबूर करती है, इसलिए किसी भी सुधार का मूल्यांकन केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि उसके प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए, क्या महिलाओं की संख्या बढ़ने से नीतियों में संवेदनशीलता आएगी, क्या सामाजिक मुद्दों को प्राथमिकता मिलेगी, या फिर राजनीति केवल नए चेहरों के साथ पुरानी दिशा में चलती रहेगी, यह एक खुला सवाल है जिसका जवाब समय ही देगा। इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण तत्व जवाबदेही है, अगर कोई भी व्यक्ति, चाहे वह पुरुष हो या महिला, सत्ता का दुरुपयोग करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि हमारे संस्थान स्वतंत्र और मजबूत हों, जो बिना राजनीतिक दबाव के काम कर सकें, दुर्भाग्य से आज अपराध और राजनीति का गठजोड़ एक गंभीर समस्या बन चुका है, जहां कई मामलों में आरोपियों को संरक्षण मिलता है और पीड़ितों की आवाज दबा दी जाती है, ऐसे में यह उम्मीद करना कि केवल आरक्षण इस समस्या को खत्म कर देगा, यथार्थवादी नहीं है।
समाधान के रूप में हमें व्यापक सुधारों की जरूरत है, राजनीतिक दलों के भीतर पारदर्शिता लानी होगी, टिकट वितरण के स्पष्ट और निष्पक्ष मानदंड तय करने होंगे, महिलाओं के लिए सुरक्षित और स्वतंत्र शिकायत तंत्र विकसित करना होगा ताकि वे बिना डर के अपनी बात रख सकें, साथ ही उन्हें केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधि के रूप में नहीं बल्कि सक्षम और प्रशिक्षित नेतृत्व के रूप में तैयार करना होगा, इसके लिए राजनीतिक शिक्षा, संसाधन और संस्थागत समर्थन जरूरी है, और सबसे महत्वपूर्ण, समाज की मानसिकता में बदलाव लाना होगा क्योंकि जब तक महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक कोई भी कानून अपने उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाएगा। अंततः यह समझना होगा कि देश की समस्याओं का समाधान केवल सीटों की संख्या बढ़ाने में नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में है, क्योंकि एक सशक्त समाज ही एक सशक्त लोकतंत्र की नींव रख सकता है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक अवसर है, लेकिन यह अवसर तभी सार्थक होगा जब इसे ईमानदारी और दूरदर्शिता के साथ लागू किया जाएगा, अन्यथा यह भी एक नया मुखौटा बनकर रह जाएगा, जिसके पीछे वही पुरानी सत्ता की तस्वीर छिपी होगी।

छह माह के बेटे से बिछुड़ी मां, ससुराल पक्ष पर मारपीट व बच्चे को छीनने का आरोप

हाथरस। शहर के खोड़ा हजारी क्षेत्र की रहने वाली ममता ने अपने ससुराल पक्ष पर गंभीर आरोप लगाते हुए न्याय की गुहार लगाई है। पीड़िता का कहना है कि उसका 6 साल का बेटा उससे छीन लिया गया है, जिसके लिए वह दर-दर भटकने को मजबूर है।ममता के अनुसार उसकी शादी 4 दिसम्बर 2024 को मथुरा निवासी सचिन के साथ हुई थी। शादी के बाद से ही पति और ससुराल पक्ष द्वारा दहेज में गाड़ी की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया जाने लगा। पीड़िता ने आरोप लगाया कि कई बार उसके साथ मारपीट भी की गई।पीड़िता का कहना है कि ससुराल वालों ने मारपीट करते हुए उसके बच्चे को जबरन छीन लिया और उसे घर से निकाल दिया। इतना ही नहीं, आरोप है कि दबाव बनाकर उसका वीडियो भी बनाया गया, जिसमें उससे जबरन तलाक की बात कबूल कराई गई।ममता ने बताया कि उसने इस संबंध में हाथरस के महिला थाने में शिकायत की, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। पीड़िता ने प्रशासन से अपने बच्चे को वापस दिलाने और आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

Hathras News विहिप बैठक में धर्मांतरण व ‘लव जिहाद’ पर सख्त कानून की मांग

फोटो -धर्मांतरण के खिलाफ बैठक करते  पदाधिकारी

हाथरस। प्रखंड सासनी में विश्व हिंदू परिषद की एक बैठक दयानंद बाल विद्यालय में आयोजित की गई, जिसमें धर्मांतरण और तथाकथित ‘लव जिहाद’ के मुद्दों पर चर्चा करते हुए सख्त कानून बनाने की मांग उठाई गई।बैठक को संबोधित करते हुए जिला उपाध्यक्ष डॉ. अमित भार्गव ने कहा कि इन विषयों पर गंभीरता से कार्रवाई की आवश्यकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ संगठित समूहों द्वारा सुनियोजित तरीके से ऐसे मामलों को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही युवतियों को सतर्क रहने की सलाह भी दी गई।बजरंग दल के संयोजक अंकित उपाध्याय और सहसंयोजक विक्की कुशवाहा ने कहा कि इन मामलों को रोकने के लिए मौजूदा कानूनों को और अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए, ताकि दोषियों में भय बना रहे।कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रखंड अध्यक्ष योगेश वार्ष्णेय ने की, जबकि संचालन प्रखंड मंत्री जगदीश प्रसाद शर्मा ने किया। बैठक में विभिन्न पदाधिकारियों ने अपने विचार रखे और संगठन की ओर से समाज में जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया गया।इस दौरान विद्याभूषण गर्ग, हेमंत कौशल, सचिन भार्गव, जयपाल सिंह कुशवाह, जितेंद्र सिंह सहित कई कार्यकर्ता मौजूद रहे।

Hathras गदाखेड़ा में विवाहिता का शव फंदे पर मिला, मायके पक्ष का हंगामा

हाथरस। सासनी क्षेत्र के गांव गदाखेड़ा में करीब 20 वर्षीय एक विवाहिता का शव घर के अंदर फंदे पर लटका मिलने से इलाके में सनसनी फैल गई। घटना के बाद मौके पर ग्रामीणों की भीड़ जुट गई, वहीं सूचना मिलते ही मायके पक्ष के लोग भी पहुंच गए और आक्रोश जताया।प्राप्त जानकारी के अनुसार मृतका रेनू की शादी करीब दो वर्ष पूर्व गांव निवासी विक्की के साथ हुई थी। बताया जाता है कि विवाहिता की अभी कोई संतान नहीं थी। शनिवार दोपहर अज्ञात कारणों के चलते उसने घर के अंदर फांसी लगा ली, जिससे परिजनों में कोहराम मच गया।घटना की सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची और शव को फंदे से उतरवाकर कब्जे में लिया। इसके बाद पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय भेज दिया गया। उधर, मायके पक्ष के लोग सासनी कोतवाली पहुंच गए और ससुराल पक्ष पर गंभीर आरोप लगाते हुए जमकर हंगामा किया।प्रभारी निरीक्षक विपिन चौधरी ने लोगों को समझाकर शांत कराया और निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया। पुलिस के अनुसार प्रथम दृष्टया मामला आत्महत्या का प्रतीत हो रहा है, हालांकि मौत के सही कारणों का खुलासा पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगा।पुलिस ने बताया कि अभी तक मायके पक्ष की ओर से कोई लिखित तहरीर नहीं मिली है। तहरीर मिलने पर संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

सिकंद्राराऊ में भाकियू भानु गुट और पुलिस में झड़प, तोड़फोड़ का आरोप

हाथरस। सिकंद्राराऊ में शुक्रवार को उस समय तनाव की स्थिति बन गई, जब भारतीय किसान यूनियन (भानु गुट) के समर्थकों और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक हो गई। मामला बढ़ने पर धक्का-मुक्की और तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आईं।बताया गया कि गढ़मुक्तेश्वर में एक राजनेता द्वारा भानु गुट के राष्ट्रीय अध्यक्ष के खिलाफ कथित अभद्र टिप्पणी को लेकर संगठन में आक्रोश था। इसी क्रम में योगेश प्रताप सिंह ने फेसबुक लाइव के माध्यम से 17 अप्रैल को समर्थकों के साथ गढ़मुक्तेश्वर जाने का आह्वान किया था।शुक्रवार को सैकड़ों वाहनों के काफिले के साथ समर्थक जलेसर रोड होते हुए सिकंद्राराऊ पहुंचे। सूचना मिलते ही पुलिस प्रशासन अलर्ट हो गया और पुरदिल नगर अंडरपास के पास बैरिकेडिंग कर काफिले को रोकने का प्रयास किया। काफिला रोके जाने पर समर्थकों और पुलिस के बीच कहासुनी शुरू हो गई, जो जल्द ही धक्का-मुक्की में बदल गई। आरोप है कि कुछ समर्थकों ने पुलिस अधिकारियों के साथ अभद्रता की और वाहनों में तोड़फोड़ की।घटना के दौरान एक सब-इंस्पेक्टर रामनरेश कथित रूप से एक अर्टिगा कार के पहिए के नीचे आकर घायल हो गए। वहीं, सीओ एटा की गाड़ी में भी तोड़फोड़ की बात सामने आई है। पुलिस के अनुसार मामले में सैकड़ों लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की कार्रवाई की जा रही है।वहीं, योगेश प्रताप सिंह का कहना है कि समर्थकों को किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ या मारपीट न करने के निर्देश दिए गए थे और काफिला शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहा था। उन्होंने कहा कि सड़क पर सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस को उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए, ताकि किसी प्रकार की दुर्घटना न हो।

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