Article : : UP News | UP Web News | Page 2

Web News

www.upwebnews.com

एआई सम्मेलन – भारत की अभूतपूर्व सफलता और व्यथित कांग्रेस

February 25, 2026

एआई सम्मेलन – भारत की अभूतपूर्व सफलता और व्यथित कांग्रेस

India AI Impact Summit 2026, New Delhi
मृत्युंजय दीक्षित
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एआई शिखर सम्मेलन में आए विश्व के बड़े बड़े नेता इस पहल से अचंभित थे और भारत की प्रगति की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे। बड़ी बड़ी एआई कंपनियां व निवेशक भारत के साथ समझौते कर रही थीं। जन सामान्य गर्वित हो रहा था क्योंकि यहाँ भारत की युवा प्रतिभाओं की सराहना हो रही थी। सदा से ही राष्ट्र विमुख रही कांग्रेस पार्टी से ये देखा नहीं गया और उनके कुछ चुनिंदा कार्यकर्ता वहां अर्धनग्न होकर प्रदर्शन करने पहुँच गए। वास्तव में अब कांग्रेस पार्टी अब प्रधानमंत्री मोदी व भाजपा का विरोध करते -करते पूरी तरह भारत विरोधी हो गई है।
कांग्रेस का यह विरोध ऐसा ही था जैसे जब प्राचीन काल में जब ऋषि गण अपने आश्रमो मे किसी अच्छे कार्य के लिए यज्ञादि करते थे तो कुछ राक्षस उस यज्ञ को अपवित्र करने के लिए यज्ञकुंड में हड्डियां डालकर उसे अपवित्र करने का प्रयास करते थे। कांग्रेस ने जो कृत्य विदेशी मेहमानों के समक्ष किया है उससे स्पष्ट है कि कांग्रेस घोर अराजकतावादी बन चुकी है जिसकी अब सारी उम्मीदें समाप्त होती जा रही हैं।
एआई समिट कांग्रेस द्वारा की गई इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से भारत का जेन- जी भी नाराज़ है जिसको भड़काकर कांग्रेस सड़क पर लाना चाहत है। भाजपा कांग्रेस द्वारा दिए गए इस अवसर को गंवाना नहीं चाहती । पार्टी की तरफ से संपूर्ण भारत में कांग्रेस कर्यालयों के बाहर धरना -प्रदर्शन आयोजित हो रहे हैं। मेरठ में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी भी कांग्रेस पर हमलावर हुए ओैर कहा कि कांग्रेस ने एआई समिट को अपनी नग्न राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। उन्होंने कांग्रेस से पूछा कि देश तो जानता ही है कि आप पहले से ही नंगे हो फिर कपड़े उतारने की जरूरत क्यों पड़ी? यह दिखाता है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अब वैचारिक रूप से कितनी दिवालिया और दरिद्र हो गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने मीडिया से अपील करते हुए कहा कि जब मैं कांग्रेस की आलोचना करता हूं तो ऐसी सुर्खियां न चलाएं कि मोदी ने विपक्ष पर हमला बोला। कांग्रेस को बचाने की ये चालाकियां बंद करें।
इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस को सपा बसपा सहित कई अन्य छोटे क्षेत्रीय दलो का समर्थन नहीं मिला है जिनको कांग्रेस इंडी ब्लॉक की पार्टियाँ कहती है। कांग्रेस के इस कृत्य का लालू यादव की पार्टी राजद ने भी कड़ा विरोध किया है। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी विरोध किया है। कांग्रेस ने इस तरह का प्रदर्शन करके सहयोगी दलों के बीच भी अपनी फजीहत करवा ली है। आगामी समय में यह दल कांग्रेस से दूरी बनाने पर विचार भी कर सकते हैं यही कारण हे कि इन सभी दलों की प्रधानमंत्री मोदी ने सराहना की है।
कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता जिस प्रकार टी वी चैनलों व सोशल मीडिया पर इस हरकत को सही ठहरा रहे हैं उससे स्पष्ट है कि यह कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की ही योजना थी। उनका कहना है कि लोकतंत्र मे अपनी बात कहने और सरकार का विरोध करने का अधिकार सबको है, उन्होंने अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग किया है। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की इस हरकत से पुराने परंपरागत कांग्रेसी से भी खुश नहीं हैं और अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे है। पुराने कांग्रेस नेताओं को इस घटना से कोई हैरानी नहीं है अपितु उनका कहना है कि यह बदली हुई कांग्रेस की बदलती हुई संस्कृति की निशानी है। कांग्रेस नेता शशि थरूर भी एआई समिट को अत्यंत सफल आयोजन बता रहे हैं और कांग्रेस के अर्धनग्न प्रदर्शन की निंदा कर रहे हैं। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी की छवि को नुकसान पहुंचाने के चक्कर में कांग्रेस ने भारत की छवि व भारतीय संस्कृति को नुकसान पहुंचाया और इस तरह होली के स्वागत में अपने मुंह पर ही कालिख मल ली।
कांग्रेस के नेताओं की दिली इच्छा रही है कि किसी न किसी प्रकार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भारत की छवि को पूरी दुनिया में खराब किया जाए और भारत में बांग्लादेश व नेपाल जैसी अराजकता का वातावरण पैदा कर अपना स्वार्थ सिद्ध किया जाए किंतु उसका यह सपना पूरा नहीं हो पा रहा है और यही कारण है कि कांग्रेस हताश होकर नंगी राजनीति पर उतर आई है।

Mratunjay Dixit, Journalist lucknow

मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं. – 9198571540

February 24, 2026

शादी की बदलती तस्वीर: दिखावे, अहंकार और टूटते रिश्ते

Freelance writer

– डॉ० प्रियंका सौरभ
भारतीय समाज में शादी केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं रही है, बल्कि इसे हमेशा से परिवार, समाज और संस्कारों से जुड़ी एक पवित्र संस्था माना गया है। विवाह को जीवनभर का साथ, सुख-दुख में एक-दूसरे का संबल और सामाजिक स्थिरता की आधारशिला समझा जाता रहा है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस संस्था की तस्वीर तेजी से बदली है। आज शादी का मतलब साथ निभाने का संकल्प कम और सामाजिक प्रदर्शन अधिक होता जा रहा है। परिणामस्वरूप रिश्ते कमजोर हो रहे हैं और तलाक या अलगाव के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
आज यह एक कड़वी सच्चाई है कि लोग शादी पर 20–25 लाख रुपये या उससे भी अधिक खर्च कर रहे हैं, लेकिन उसी शादी के कुछ महीनों या दिनों तक चलने की कोई गारंटी नहीं रह गई है। आंकड़े बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में लगभग 40 से 50 प्रतिशत वैवाहिक रिश्ते टूटने की कगार पर हैं या पहले ही टूट चुके हैं। यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक समस्या का संकेत है, जिसे नज़रअंदाज़ करना आने वाले समय में भारी पड़ सकता है।
इस संकट का सबसे बड़ा कारण है दिखावे की संस्कृति। शादी अब एक निजी निर्णय नहीं, बल्कि एक भव्य इवेंट बन चुकी है, जिसमें होटल, डेस्टिनेशन वेडिंग, महंगे कपड़े, फोटोशूट और सोशल मीडिया पोस्ट सबसे अहम हो गए हैं। लोग यह सोचने में अधिक समय लगाते हैं कि मेहमान क्या कहेंगे, रिश्तेदार कितने प्रभावित होंगे और इंस्टाग्राम पर तस्वीरें कैसी दिखेंगी। लेकिन यह सोचने का समय नहीं निकालते कि जिस इंसान के साथ पूरी ज़िंदगी बितानी है, उसके विचार, स्वभाव, सहनशीलता और जीवन के प्रति दृष्टिकोण क्या हैं।
सोशल मीडिया ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। हर व्यक्ति खुद को बेहतर दिखाने की कोशिश में अपनी वास्तविकता छिपा रहा है। शादी से पहले बनाई गई यह “परफेक्ट इमेज” शादी के बाद धीरे-धीरे टूटती है और जब सच्चाई सामने आती है, तब निराशा, टकराव और असंतोष जन्म लेता है। लोग समझ पाते हैं कि वे जिस इंसान से शादी कर बैठे हैं, वह वैसा नहीं है जैसा उन्होंने कल्पना की थी।
दूसरा बड़ा कारण है धैर्य की कमी और अहंकार की अधिकता। आज के समय में लोगों का पेशेंस लेवल लगभग शून्य पर आ गया है, जबकि ईगो का स्तर सौ पर पहुंच चुका है। छोटी-छोटी बातों पर रिश्तों में दरार आ जाती है। संवाद करने, समझाने और समझने की जगह लोग तुरंत निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि यह रिश्ता काम नहीं करेगा। “मैं क्यों समझौता करूँ?” और “मेरी खुशी सबसे ऊपर है” जैसी सोच रिश्तों को खोखला कर रही है।
पहले रिश्तों में समस्याएं आती थीं, लेकिन उन्हें सुलझाने की कोशिश की जाती थी। आज समस्याएं आते ही लोग अलग होने को सबसे आसान समाधान मान लेते हैं। रिश्तों को निभाने की जगह उन्हें बदल देने की मानसिकता बढ़ती जा रही है। यह उपभोक्तावादी सोच केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब रिश्तों में भी प्रवेश कर चुकी है।
एक और महत्वपूर्ण कारण है संयुक्त परिवार प्रणाली का टूटना और एकल परिवारों का बढ़ना। संयुक्त परिवारों में बच्चे बचपन से ही बड़ों को देखकर सहनशीलता, त्याग, जिम्मेदारी और रिश्तों को निभाने की कला सीखते थे। मतभेद होते थे, लेकिन उन्हें बातचीत और समझदारी से सुलझाया जाता था। आज एकल परिवारों में पले-बढ़े बच्चों को यह व्यवहारिक प्रशिक्षण बहुत कम मिल पाता है।
इसका मतलब यह नहीं कि एकल परिवार गलत हैं, लेकिन यह सच है कि उनमें सामूहिक जीवन का अनुभव सीमित होता है। परिणामस्वरूप जब युवा शादी के बाद नए रिश्तों और नई जिम्मेदारियों का सामना करते हैं, तो वे मानसिक रूप से उसके लिए तैयार नहीं होते। थोड़ी-सी असहमति भी उन्हें असहनीय लगने लगती है।
इसके साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्रता और बदलती सामाजिक भूमिका भी रिश्तों पर असर डाल रही है। आज महिलाएं आत्मनिर्भर हैं, जो एक सकारात्मक बदलाव है, लेकिन इसके साथ ही अपेक्षाओं का टकराव भी बढ़ा है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों को लेकर अधिक सजग हैं, जो सही भी है, लेकिन जब यह आपसी सम्मान और संवाद के बिना होता है, तब टकराव की स्थिति बन जाती है। बराबरी का अर्थ सहयोग होना चाहिए, न कि प्रतिस्पर्धा।
एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि आज की पीढ़ी लंबे समय तक किसी एक निर्णय पर टिके रहने से डरती है। करियर हो, शहर हो या रिश्ता—हर जगह “अगर बेहतर विकल्प मिल जाए” वाली सोच हावी है। यही सोच शादी जैसे स्थायी संबंध को अस्थिर बना रही है। जब हर समय यह भावना बनी रहे कि इससे बेहतर कुछ और मिल सकता है, तो किसी भी रिश्ते में संतोष और स्थिरता संभव नहीं रह जाती।
इन सभी कारणों के चलते यह आशंका बढ़ रही है कि आने वाले समय में लोग शादी जैसी संस्था से ही दूरी बनाने लगेंगे। कुछ लोग पहले ही विवाह को बोझ या जोखिम के रूप में देखने लगे हैं। यदि यह प्रवृत्ति यूँ ही बढ़ती रही, तो इसका असर केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक ढांचे पर भी पड़ेगा। परिवार, जो समाज की सबसे छोटी इकाई है, यदि कमजोर होगा तो समाज की स्थिरता भी खतरे में पड़ जाएगी।
हालांकि, यह कहना गलत होगा कि समस्या का कोई समाधान नहीं है। असल समस्या शादी में नहीं, बल्कि शादी के प्रति हमारी सोच और प्राथमिकताओं में है। जरूरत है दिखावे और फिजूलखर्ची को कम कर, आपसी समझ, संवाद और भावनात्मक जुड़ाव को प्राथमिकता देने की। शादी से पहले एक-दूसरे को समय देना, खुलकर बातचीत करना और अपेक्षाओं को स्पष्ट रखना बेहद जरूरी है।
इसके साथ ही समाज और परिवारों को भी यह समझना होगा कि शादी केवल रस्मों और परंपराओं का पालन नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों को मानसिक रूप से जोड़ने की प्रक्रिया है। युवाओं को यह सिखाने की आवश्यकता है कि रिश्ते परफेक्ट नहीं होते, उन्हें धैर्य, सम्मान और समझदारी से मजबूत बनाया जाता है।
अंततः यह समय आत्ममंथन का है। यदि हम आज भी केवल दिखावे, अहंकार और जल्दबाजी को ही प्राथमिकता देते रहे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए रिश्ते केवल अस्थायी समझौते बनकर रह जाएंगे। लेकिन यदि हम समय रहते अपनी सोच बदले, तो शादी जैसी संस्था को फिर से विश्वास, स्थिरता और सम्मान का आधार बनाया जा सकता है। समाज का भविष्य इसी संतुलन पर निर्भर करता है।
 (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

February 16, 2026

Bangladesh Election ढाका में बदलाव, भारत के सामने नई कसौटी

New Government of Bangladesh
Posted on 16.02.2026, Monday Time 10.07 AM , Dhaka, Writer Priyanka Saurabh 
(सत्रह वर्षों बाद सत्ता में लौटी बीएनपी ने बांग्लादेश की राजनीति की दिशा बदली है; भारत के सामने अब अवसरों के साथ नई अनिश्चितताएँ भी खड़ी हैं।)
 डॉ. प्रियंका सौरभ
बांग्लादेश के हालिया आम चुनावों में बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (बीएनपी) Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने तारिक रहमान Tarik Rehman के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। सत्रह वर्षों के लंबे निर्वासन के बाद राजनीति में लौटे तारिक रहमान ने अपनी माँ और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया Khalida Jiya की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए पार्टी को दो-तिहाई से अधिक सीटें दिलाईं। यह जीत न केवल एक चुनावी सफलता है, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति में सत्ता संतुलन के व्यापक पुनर्संयोजन और एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत का संकेत भी देती है। भारत के लिए यह परिणाम अवसरों के साथ-साथ कई रणनीतिक अनिश्चितताएँ भी लेकर आया है, जिनका प्रबंधन आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों की दिशा तय करेगा।
पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय तक बांग्लादेश की राजनीति पर अवामी लीग और शेख हसीना Sheikh Hasina का वर्चस्व रहा। इस अवधि में स्थिरता, आर्थिक विकास और क्षेत्रीय सहयोग के साथ-साथ सत्ता के केंद्रीकरण, विपक्ष के दमन और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने के आरोप भी लगातार लगते रहे। लंबे समय तक एक ही राजनीतिक धारा के प्रभुत्व ने मतदाताओं में प्रशासनिक थकान और परिवर्तन की आकांक्षा को जन्म दिया। बीएनपी की जीत को इसी व्यापक जन-असंतोष और राजनीतिक विकल्प की तलाश के परिणाम के रूप में देखा जा सकता।
तारिक रहमान लंबे समय से बांग्लादेश की राजनीति में एक प्रभावशाली, किंतु विवादास्पद चेहरा रहे हैं। निर्वासन काल के दौरान उन पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और कट्टरपंथी तत्वों से संबंधों जैसे आरोप लगे, जिनके कारण उनकी छवि धूमिल हुई। हालांकि दिसंबर 2025 में लंदन से स्वदेश वापसी के बाद उन्होंने अपने राजनीतिक दृष्टिकोण में बदलाव के संकेत दिए। उन्होंने पार्टी संगठन का पुनर्गठन किया, युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाया और जमीनी स्तर पर जन आंदोलन को पुनर्जीवित किया। निर्वासन काल के अनुभवों को उन्होंने राजनीतिक पूंजी में बदला और बीएनपी को चुनावी रूप से पुनर्स्थापित किया। इस संदर्भ में यह जीत केवल पारिवारिक विरासत का विस्तार नहीं, बल्कि रणनीतिक पुनर्संयोजन, संगठनात्मक अनुशासन और बदलते राजनीतिक यथार्थ को समझने की क्षमता की सफलता भी मानी जा रही है।
बीएनपी ने 13वें आम चुनावों में आर्थिक सुधार, भ्रष्टाचार उन्मूलन और अल्पसंख्यक सुरक्षा को अपने प्रमुख चुनावी मुद्दों के रूप में प्रस्तुत किया। बेरोज़गारी, महँगाई और शासन में पारदर्शिता की कमी जैसे मुद्दों ने मतदाताओं को गहराई से प्रभावित किया। पार्टी ने अपनी पारंपरिक कट्टरपंथी छवि से दूरी बनाने का प्रयास किया और हिंदू समुदाय सहित सभी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का आश्वासन दिया। यह जनादेश इस बात को रेखांकित करता है कि लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक वर्चस्व और प्रशासनिक थकान के बाद मतदाताओं ने परिवर्तन को प्राथमिकता दी। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से सत्ता परिवर्तन ने यह भी संकेत दिया कि बांग्लादेशी समाज स्थिरता के साथ-साथ उत्तरदायी शासन की अपेक्षा रखता है।
भारत के दृष्टिकोण से बीएनपी की यह जीत मिश्रित संकेत देती है। ऐतिहासिक रूप से भारत के संबंध अवामी लीग सरकार के साथ अधिक सहज और स्थिर रहे हैं। सीमा प्रबंधन, आतंकवाद-रोधी सहयोग और कनेक्टिविटी परियोजनाओं में शेख हसीना सरकार ने भारत के साथ घनिष्ठ तालमेल रखा। इसके विपरीत, बीएनपी को लेकर नई दिल्ली में हमेशा संदेह बना रहा है, विशेषकर 2001–06 के शासनकाल के अनुभवों के कारण। हालांकि हाल के वर्षों में तारिक रहमान ने भारत के प्रति अपेक्षाकृत संतुलित और व्यावहारिक रुख अपनाने के संकेत दिए हैं। चुनावों से पहले भारत द्वारा बीएनपी को अनौपचारिक रूप से “ग्रीन सिग्नल” देना इसी बदलते दृष्टिकोण को दर्शाता है। यह संकेत करता है कि भारत अब बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में किसी एक दल पर निर्भर रहने के बजाय बहुआयामी संवाद की नीति अपनाने को तैयार है।
आर्थिक दृष्टि से बीएनपी सरकार भारत के लिए नए अवसर खोल सकती है। बांग्लादेश भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और दक्षिण एशिया में भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति का अहम स्तंभ भी है। नई सरकार के कार्यकाल में द्विपक्षीय व्यापार के 20 अरब डॉलर तक पहुँचने की संभावना जताई जा रही है। कनेक्टिविटी परियोजनाओं, जलविद्युत सहयोग, सीमा व्यापार, डिजिटल कनेक्टिविटी और औद्योगिक निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई गति मिल सकती है। बांग्लादेश की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था भारतीय निवेश के लिए आकर्षक अवसर प्रस्तुत करती है। अल्पसंख्यक हितों की रक्षा को लेकर बीएनपी की सार्वजनिक प्रतिबद्धता भारत की सामाजिक और राजनीतिक चिंताओं को कुछ हद तक कम करती है।
इसके बावजूद, अनिश्चितताएँ बनी हुई हैं। बीएनपी पर कट्टरपंथी तत्वों के प्रति नरमी बरतने के आरोप लगते रहे हैं और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों की भूमिका को लेकर सतर्कता आवश्यक है। तारिक रहमान पर लगे पुराने भ्रष्टाचार आरोप, पाकिस्तान के साथ कथित संबंध और हालिया सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाती हैं। भारत–बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ, तस्करी, मानव तस्करी और आतंकवाद से जुड़े जोखिम भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। यदि इन मुद्दों पर ठोस और पारदर्शी कार्रवाई नहीं होती, तो द्विपक्षीय विश्वास प्रभावित हो सकता है।
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन का असर केवल भारत-बांग्लादेश संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव व्यापक दक्षिण एशियाई भू-राजनीति पर भी पड़ेगा। चीन और पाकिस्तान क्षेत्र में अपने प्रभाव को लगातार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में भारत के लिए आवश्यक होगा कि वह बांग्लादेश के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत रखे, ताकि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन भारत के प्रतिकूल न जाए। बहुपक्षीय मंचों और उप-क्षेत्रीय सहयोग पहलों के माध्यम से संवाद और सहयोग को सुदृढ़ किया जा सकता है।
ऐसे परिदृश्य में भारत के लिए संतुलित और सक्रिय कूटनीति अपनाना अनिवार्य होगा। अवामी लीग के साथ पुराने संबंधों को बनाए रखते हुए बीएनपी सरकार के साथ संवाद स्थापित करना भारत के दीर्घकालिक हित में है। एकतरफा झुकाव के बजाय संस्थागत और बहुदलीय संपर्क भारत को अधिक रणनीतिक लचीलापन प्रदान करेगा।
मानवाधिकार, अल्पसंख्यक सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के मुद्दों पर भारत को न तो उपेक्षा करनी चाहिए और न ही अत्यधिक हस्तक्षेप करना चाहिए। विवेकपूर्ण संतुलन ही भारत की प्रभावशीलता को बनाए रख सकता है।
तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी की यह जीत भारत के लिए न तो पूरी तरह जोखिमपूर्ण है और न ही पूर्णतः अवसर-प्रधान। यह एक संक्रमणकालीन दौर है, जिसमें सतर्कता, संवाद और व्यावहारिक कूटनीति के माध्यम से भारत न केवल अपने हितों की रक्षा कर सकता है, बल्कि भारत–बांग्लादेश संबंधों को एक नई और अधिक परिपक्व दिशा भी दे सकता है। यदि अनिश्चितताओं का प्रभावी प्रबंधन किया गया और सहयोग के क्षेत्रों को सुदृढ़ किया गया, तो यह राजनीतिक परिवर्तन न केवल द्विपक्षीय संबंधों को, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में स्थिरता और सहयोग की संभावनाओं को भी सशक्त कर सकता है।
Dr Priyanka Saurabh Writer, Poet

डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार

February 13, 2026

शिवरात्रि पर विशेष–सृष्टि के पालनहार हैं शिव

Barabanki Shivratri Pujan

Posted on 13.02.2026 Time 08.00 Friday, Barabanki, Shivratri, Dilip Kumar Shrivastava 
शिवरात्रि व्रतं नाम सर्व पापं प्रयाशनम्। आचाण्डाल मनुष्यापं मुक्ति प्रदायकं ।।
देवों के देव लोधेश्वर महादेव
दिलीप कुमार श्रीवास्तव
बाराबंकी । भोले भण्डारी शिव शंकर व माता पार्वती के विवाह के पीछे कई कथाएं धार्मिक ग्रंथों में पढ़ने व सुनने को मिलती है कि माँ पार्वती ने कठोर तप करके शंकर जी को प्राप्त किया था।शिवरात्रि के दिन ही भोले व पार्वती का विवाह हुआ था। उसी परम्परा को निभाते हुए हिन्दुओं द्वारा मंदिरो से भगवान शिव की बारात भव्य रूप से धूमधाम से निकाली जाती हैं। तथा धार्मिक रीति रिवाज से मंत्रोचारण के साथ शादी कराई जाती।
शिव शब्द बहुत सूक्ष्न होता है, इसके अर्थ की गरिमा इसकी गम्भीरता को प्रस्फुटित कर देती है। उसे और अधिक कल्याणकारी बना देती है। शम्भूका भावार्थ है, मंगलदायक। शंकर का तात्पय है आनन्द का स्रोत्र। यह तीनो कल्याणकारी, मंगलदायक और आनन्दधन परमात्मा की ओर इंगित करते है। भोले की इच्छा से ही रजोगुण रूपी ब्रह्मा, सत्गुण रूपी विष्णु और तमागुण रूपी रूद्र अवतरित होते है। जो कमशः सृजन, पालन और संहार का कार्य करते हैं। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। ग्रंथो के अनुसार सृष्टि के प्रारम्भ में इसी दिन मध्यरात्रि में रूद्ध के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव ताण्डव करते हुए ब्रह्माण्ड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते है। इस कारण इसे महाशिवरात्रि एवं कालरात्रि भी कहां जाता है। तीनो लोक की अपार सुन्दरी तथा शीलवती गौरा को अधीगिनी बनाने वाले शिव प्रेतो व पिशाचों से घिरे रहते है।
वैदिक ज्योतिषों के अनुसार भगवान शिव चतुर्दशी तिथि के स्वामी है, इसलिए प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि कहते है। फाल्गुन मास की चतुर्दशी महाशिवरात्रि होती है। पुराणों के अनुसार महाशिवरात्रि भगवान शिव के प्राकट्य मतान्तर से विवाहोत्सव का दिन है। शिव पुराण के अनुसार इस दिन भगवान शिव जी की पूजा अर्चना तथा अभिषेक अनन्त फलदायी होता है। चतुर्दशी के स्वामी शिव है. इस तिथि को रात्रि में व्रत किये जाने से इस व्रत का नाम शिवरात्रि होना सार्थक हो जाता है। यद्यपि प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी शिवरात्रि होती है। और शिव भक्त प्रत्येक कृष्ण चतुर्दशी व्रत करते ही है, किन्तु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के निशीथ (अर्धरात्रि) में शिवलिंगतयोदीभूत कोटिसूर्यसमप्रभः ईशानसंहिता के इस वाक्य के अनुसार जयोतिलिंग का प्रादुभाव हुआ था. इस कारण महाशिवरात्रि मानी जाती है।
सिद्वान्त रूप से आज के सूर्योदय से कल के सूर्योदय तक रहने वाली चतुर्दशी शुद्ध और अन्य विद्वा मानी गई है। उसमें भी प्रदोष (रात्रि का आरम्भ) और निशीथ (अर्धरात्रि) की चतुर्दशी ग्रह्य होती है। अर्धरात्रि की पूजा के लिए स्कंदपुराण में लिखा है कि ‘फाल्गुन कृष्ण 14 को निशिघ्रमन्ति भूतानि शक्तयः शूलभूद् यतः। अतस्तस्यां चतुर्दशी सत्यां तप्पूजनं भवत्।। अर्थात रात्रि के समय भूत, प्रेत, पिशाच जैसी शक्तियां और स्वयं शिव शंकर भ्रमण करते है, अतः उस समय इनका पूजन करने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते है। यदि (शिवरात्रि) त्रिस्पृशा (12-14-30 इन तीनो के स्पर्श की हो तो अतिधिक उत्तम होती है। पारण के लिए व्रतान्ते पारणम् तिथ्यन्ते पारणम् और तिथिमान्ते च पारणम् आदि वाक्यों के अनुसार व्रत की समाप्ति में पारण किया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार शिवरात्रि के दिन ही शिव व पार्वती का विवाह हुआ था यह दिवस परमात्मा के सृस्टि
पर अवतरित होने की स्मृति दिलाता है। जो हमे ज्ञान का प्रकाश विखेर का अज्ञानता ये दूर हटाता है। शिव का अर्थ है, कल्याण। भोले भण्डारी शिव सबका कल्याण करने वाले देवो के देव महादेव है। महाशिवरात्रि पर्व पर सरल उपाय करके भी शिव को प्रसन्न किया जा सकता है। ज्योतिष गणना के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चन्द्रमा अपनी क्षीण अवस्था में पहुँच जाता है, जिस कारण बलहीन चन्द्रमा सृष्टि को उर्जा देने में असमर्थ हो जाता है। चन्द्रमा का सीधा संबन्ध संताप प्राणी को घेर लेते है, तथा विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती। जिसके कारण कष्टो का सामना करना पड़ता है। चन्द्रमा शिव मस्तकपर सुशोभित है। अतः चन्द्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की शरण में जाने से सारे कष्ट दूर हो जाते है। महाशिवरात्रि तिथि शिव जी को सबसे अधिक प्रिय होती है। अपनी आत्मा को शुद्ध करने के लिए शिवरात्रि व्रत ही महाव्रत कहां जाता है। इस व्रत को करने से सभी पापो का नाश होता है, साथ ही हिंसक प्रवृति बदल जाती है, निरीह जीवों पर दया भाव उत्पन्न हो जाता। इंसान संहिता में इसके महत्व का उल्लेख है।
बाराबंकी से करीब 35 कि०मी दूर स्थित लोधेश्वर महादेव Lodheshwer Mahdev Mandir Barabanki का मंदिर है, जो <तहसील रामनगर से मात्र 05 किमी दूर पर स्थित हैं। जहाँ महाशिवरात्रि के दिन लाखों शिव भक्त कांवर लेकर दर्शन करने आते हैं। महाशिवरात्रि से 15 दिन पूर्व ही हरिद्वार, बितूर, कानपुर, से गंगाजल लेकर पैदल ही लोधेश्वर पहुँचते है। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के साथ ही उत्तराखण्ड़, बिहार, मध्यप्रदेश, तथा हिमाचल प्रदेश से भी शिव भक्त अपने कंधो पर कांवर लेकर पैदल ही महादेवा पहुँचते है।

February 9, 2026

संसद बनी बंधक- संविधान का अपमान कौन कर रहा है ?

Article UP Web News

आलेख

Posted on 09.02.2026 Monday, Time 08.13 AM by Admin, Writer Mratunjay Dixit, Lucknow 

वर्ष -2026 का बजट सत्र हल्ले-गुल्ले और अराजकता की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है। यहाँ बजट के अतिरिक्त अन्य सभी विषयों को उठाए जाने का प्रयास हो रहा है। स्थितियां इतनी विकट हैं कि संसदीय इतिहास में पहली बार राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री लोकसभा में उत्तर नहीं दे सके और राष्ट्रपति का अभिभाषण बिना किसी चर्चा के पारित हो गया। यद्यपि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में 97 मिनट लंबा और प्रभावशाली उत्तर दिया। राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने विपक्ष द्वारा की गई सभी टिप्पणियों का संज्ञान लेते हुए अपनी बात रखी। प्रधानमंत्री मोदी का यह संबोधन देश के स्वर्णिम भविष्य और विकास की दिशा को भी दर्शाता है।
राष्ट्रपति के अभिभाषण के समय हंगामा करके देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का अपमान करने के बाद जब समय आने पर राहुल गांधी को बोलने का अवसर दिया गया तो उन्होंने विषय से इतर जाकर पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक कोट करते हुए चीनी घुसपैठ का पुराना मुद्दा उछालने का प्रयास किया। लोकसभा अध्यक्ष द्वारा नियमों के अंतर्गत व्यवस्था दिए जाने के बाद भी राहुल गांधी अपनी बात पर अड़े रहे। यह एक आश्चर्यजनक व्यवहार है कि नेता प्रतिपक्ष राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने के स्थान पर पुराने मुद्दे उठाए और उनको भी आपत्तिजनक रूप से रखकर देश की सेना और सदन का अपमान करे। लोकसभा में कांग्रेस तथा इंडी गठबंधन की महिला सांसदों ने जिस प्रकार प्रधानमंत्री मोदी का रास्ता रोकने की योजना बनायी और लोकसभा अध्यक्ष को प्रधानमंत्री से सदन न आने का अनुरोध करना पड़ा वो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। विडम्बना ये है कि यही लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बाते करते हैं।
राज्यसभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस में भाग न लेकर विपक्षी दलों ने न केवल राष्ट्रपति पद का अपमान किया है अपितु एक गरीब परिवार से निकलकर आई आदिवासी महिला का भी अपमान किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में राहुल गांधी व कांग्रेस पर तीखा हमला बोला और केंद्रीय रेल राज्यमंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को ग़द्दार कहने पर भी राहुल गांधी घेरा। प्रधानमंत्री ने कहा कि इनका अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच गया है । कांग्रेस छोड़कर कितने ही लोग निकले हैं किसी और को तो ग़द्दार नहीं कहा, ये सिख हैं इसलिए कहा, ये सिखों का, गुरुओं का अपमान था। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि लोकसभा में चेयर पर कागज फेकें गए जब असम के सदस्य चेयर की कुर्सी पर विराजमान थे क्या यह असम का अपमान नहीं? जब आंध्र प्रदेश के एक दलित सदस्य चेयर की कुर्सी पर बैठे थे तब उन पर भी कागज फेंके गए क्या यह एक दलित बेटे और संविधान का अपमान नहीं है ?
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आखिर कांग्रेस उनके लिए कब्र खुदेगी का नारा क्यों देती है ? हमने जम्मू -कश्मीर से धारा 370 से हटाई इसलिए या हमने 25 करोड़ लोगों को गरीबी से उबारा है इसलिए? प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि ये कौन सी मोहब्बत की दुकान है जो देश के किसी नागरिक की कब्र खोदने के सपने देखती है? आजकल मोहब्बत की दुकान खोलने वाले “मोदी तेरी कब्र खुदेगी” के नारे लगा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं देश के युवाओं के लिए मजबूत जमीन तैयार कर रहा हूं तो कांग्रेस मोदी की कब्र खोदने के कार्यक्रम करवा रही है। हमने नार्थ ईस्ट में बम बंदूक और आतंक का जो साया बना रहता था वहां शांति और विकास की राह अपनाई इसलिए वह मोदी की कब्र खोद रहे हैं। पाकिस्तानी आतंकवादियो को घर में घुसकर मारते हैं, ऑपरेशन सिंदूर करते हैं और इसलिए वे मोदी की कब्र खोदना चाहते हैं। मोदी तेरी कब्र खुदेगी ये जो उनके भीतर नफरत भरी हुई है मोहब्बत की दुकान में जो आग भरी पड़ी हुई है, उसका कारण है किकांग्रेस इस बात को पचा नहीं पा रही है कि कोई और क्यों प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा है, ये तो हमारा पैतृक अधिकार था इसलिए वे हताशा में मोदी की कब्र खोदने के नारे लगा रहे हैं । प्रधानमंत्री ने आगे जोड़ा कि कांग्रेस को ये सहन नही हो रहा हे कि जो समस्याएं उसने 60 सालो में पाल- पोस कर बड़ी की थीं मोदी उनका एक- एक करके समाधान क्यों कर रहा है? कांग्रेस को ये सब पसंद नहीं आ रहा है इसलिए अब कांग्रेस के नेता मोदी तेरी कब्र खुदेगी का नारा लगा रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोपियन यूनियन और फिर अमेरिका के साथ जो व्यापार समझौते हुए उनके विषय में जानकारी देते हुए बताया कि अब पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है और समझौते कर रही है। कांग्रेस को भी यहअवसर मिला था, उन्होंने यह क्यों नही कर दिखाया?
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन के माध्यम से कांग्रेस,लेफ्ट व डीएमके सहित टीएमसी पर भी तीखा हमला बोला और उन्होंने बंगाल की टीएसमी सरकार को देश की सबसे निर्मम सरकार बताते हुए कहा कि यह लोग अपने अंदर नहीं झाकते अपितु हमको यहां बैठकर उपदेश देते हैं। प्रधानमंत्री ने राज्यसभा सांसद सदानंद मास्टर के भाषण का संज्ञान लेते हुए वैचारिक सहिष्णुता की चर्चा की, ज्ञातव्य है कि सदानंद मास्टर के दोनों पैर वामपंथी विचारधारा के लोगों ने निर्ममता से केवल उनकी विचारधारा अलग होने के कारण काट दिए थे।
संसद के वर्तमान सत्र में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और इंडी गठबंधन ने जो रवैया अपनाया है उसने देश के वास्तविक मुद्दों को उठाने का एक सुनहरा अवसर खो दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा को घेरने के बजे उन्होंने भाजपा व प्रधानमंत्री मोदी को ही अपने ऊपर आक्रमण करने का अवसर दे दिया है। भाजपा अब सिख व दलित सांसदों के अपमान का राजनैतिक लाभ उठाने का पूरा प्रयास करेगी। भाजपा चुनाव वाले राज्यों में विरोधी दलों के संसदीय आचरण को भी मुद्दा बनाएगी।
लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित , स्वतंत्र पत्रकार, लेखक हैं।

« Newer PostsOlder Posts »