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ईरान के खिलाफ अरब और यूरोप एकजुट

March 22, 2026

ईरान के खिलाफ अरब और यूरोप एकजुट

Posted on 22.03.2026 Time 07.00 PM, Sunday Article: Iran Israel war , Writer: Sarvesh Kumar Singh 

सर्वेश कुमार सिंह

ईरान अमेरिका के युद्ध के बीच ईरान गहरे आइसोलेशन में आ गया है। यानी कि उपेक्षा की स्थिति में है। ईरान पहले से ही अकेला लड़ रहा था। लेकिन अब उसके खिलाफ यूरोप और अरब देश एकजुट होने लगे हैं। यह आइसोलेशन ईरान के लिए बहुत ही मुश्किल वाला हो सकता है।

वजह साफ है ऊर्जा का संकट पूरी दुनिया में गहराता जा रहा है। ऊर्जा संकट के कारण अब जो देश अभी तक निरपेक्ष थे और केवल दृष्टा की स्थिति में थे, केवल युद्ध को देख रहे थे। अब उन देशों को भी कुछ ना कुछ रणनीति तय करनी पड़ रही है क्योंकि सबके सामने ऊर्जा संकट आता चला जा रहा है। एक कारण तो ऊर्जा संकट है और ऊर्जा संकट में महत्वपूर्ण भूमिका है, हॉर्मूज जलडमरू मध्य मार्ग की। इसे खुला रखना
ऊर्जा के लिए बहुत जरूरी है। ऊर्जा की आपूर्ति के लिए।

तो इस प्रकार दो कारण है जिनसे ईरान  को आइसोलेशन का सामना करना पड़ रहा है। पहला कारण जल डमरू मध्य होमस को खुला रखना है। ईरान ने चेतावनी दे रखी है कि वो अमेरिका, इजराइल और उसका समर्थन करने वाले देशों के जहाजों को इस मार्ग से नहीं गुजरने देगा। इसका असर यह हो रहा है कि ऊर्जा का संकट लगातार गहरा रहा है। तेल की आपूर्ति, गैस की आपूर्ति निर्बाध नहीं हो पा रही है। इससे जहां यूरोप के कई देश प्रभावित हो रहे हैं। वहीं जो अरब देश हैं उनकी आर्थिक स्थिति को भी यह प्रभावित कर रहा है।

जलडरू मध्य मार्ग को खुला रखने के लिए अमेरिका
ने एक अपील की थी दुनिया भर के देशों से। उस अपील का पहले तो कोई असर नहीं हुआ लेकिन जब देशों को लगा कई देशों को यह लगा यूरोप के कि वो भी इससे प्रभावित हो जाएंगे ऊर्जा की आपूर्ति को लेकर। तो उन्होंने एक निर्णय लिया और यह निर्णय है यूरोप के पांच देश एकजुट हुए हैं जिसमें ब्रिटेन,फ्रांस, जर्मनी,इटली और नीदरलैंड हैं एक और देश है जो जापान है। इसने भी इन देशों के साथ एकजुटता दिखाई है। और यह एकजुट इसलिए हुए हैं कि किसी भी कीमत पर इस जलडमरू मध्य मार्ग को खुला रखा जाए। हॉर्मूज को खुला रखने के लिए कुछ ना कुछ
रणनीति अब बनानी पड़ेगी। वो रणनीति क्या होगी? वो रणनीति के कई चरण हो सकते हैं। पहला यह छह देश ईरान से बात करेंगे। ईरान को इन्होंने संदेश दे भी दिया है कि इस मार्ग को खुला रखा जाए ताकि ऊर्जा की आपूर्ति निर्वाद बनी रहे। इसके अलावा ईरान से यह भी अपील की है उन्होंने कि जो ऊर्जा संयंत्रों पर ईरान की तरफ से हमले हो रहे हैं उनको भी बंद किया जाए। पहला चरण यह है। इसके अलावा फिर कूटनीतिक वार्ताएं होंगी। कूटनीतिक वार्ता से अगर बात नहीं बनेगी तो हो सकता है यह छह देश मिलकर कुछ अपनी सेना का या अपनी नेवी का अपना कुछ जहाजों को भेजकर भी वहां यह प्रैक्टिस कर सकते हैं और इस मार्ग को खुला रखने की बात जैसे कि अमेरिका ने कही थी डोनाल्ड ट्रंप ने कि वे अपनी सेना को भेजें अपने नौसैनिक बेड़े भेजें तो ये इस पर भी विचार हो सकता
है। तो ऐसे मामले में एक तो यूरोप यूरोप के सभी जो बड़े देश हैं वो एक तरह से उसमें फ्रांस भी शामिल है। तो जो देश शामिल हैं उसमें अब सभी लगभग यूरोप एकजुट हुआ है और वो ईरान के खिलाफ हुआ है। तो एक तरह से यूरोप में ईरान के लिए कोई समर्थन नहीं है और यूरोप एक तरह से विरोध में खड़ा हो गया है। दूसरा जो बड़ा क्षेत्र है वो अरब है। हालांकि ईरान ने साफ कहा कि हम अरब देशों पर हमले नहीं कर रहे हैं। लेकिन जो अमेरिका के सेंटर हैं, केंद्र हैं जो उनके सीआईए के केंद्र है या उनके एयर फोर्स के स्टेशन है या
उनके दूतावास हैं उन पर लगातार ईरान ने हमले किए हैं। लेकिन अब इधर ईरान ने अरब देशों के जो ऊर्जा संयंत्र हैं, तेल के कारखाने हैं, तेल उत्पादन के केंद्र हैं,
गैस उत्पादन के केंद्र हैं, उन पर भी हमले शुरू कर दिए हैं और बड़े हमले किए हैं। उससे यूरोप के साथ-साथ अब अरब देश भी ईरान के खिलाफ एकजुट होते चले जा रहे हैं। पहले भी वो ईरान के साथ नहीं थे, लेकिन वो तटस्थ स्थिति में थे। लेकिन अब वो ईरान के खिलाफ खुलकर बात करने लगे हैं। इस वजह से ऐसा लगने लगा है कि ये दोनों घटनाएं ऐसी हैं कि जिससे कि पूरा यूरोप और पूरा अरब अब ईरान के खिलाफ खुलकर सामने आ गया है और ईरान की मुश्किलें बढ़नी शुरू हो जाएंगी।

दूसरी तरफ एक और नया घटनाक्रम है। यह भी ईरान के लिए थोड़ा दिक्कत पैदा करने वाला है। यह घटनाक्रम है। संयुक्त अरब अमीरात यूएई की सरकार ने एक आतंकवादी नेटवर्क का खुलासा किया है। और यह आतंकवादी नेटवर्क लेबनान के हिजबुल्ला और ईरान की सरकार के सहयोग से संचालित हो रहा था। यह यूएई का दावा है। यूएई का दावा यह है कि जो आतंकवादी नेटवर्क के लोग गिरफ्तार हुए हैं, उनका
संबंध ईरान से था और हिजबुल्लाह से था। उनको ईरान के मारफत आर्थिक सहायता भी मिल रही थी। उनको समर्थन भी मिल रहा था और इस नेटवर्क को संचालित करने में इन दोनों का हाथ रहा है। यानी कि अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर आतंकवादी नेटवर्क का भी एक खुलासा यूएई ने कर दिया है। यूएई एक अरब देशों का प्रमुख देश है। प्रमुख ये जो देश है अरब के उनमें इसका संयुक्त अरब
अमीरात का बड़ा स्थान है। महत्वपूर्ण स्थान है। तो एक तरह से वह अरब और यूरोप दोनों के निशाने पर अब ईरान है और उसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब उसकी छवि भी खराब होने की संभावना है क्योंकि जो आतंकवादी नेटवर्क का खुलासा हुआ है इससे कोई भी दुनिया का देश ईरान का इस तरह समर्थन नहीं करेगा कि वो आतंकवादियों को फंडिंग करें। हालांकि अभी यह आरोप है यूएई का। इसके प्रमाण अभी सामने आएंगे तो पता चलेगा कि उसमें सच्चाई कितनी है। लेकिन अभी ये यूरोप ने इस तरह का संयुक्त अरब
अमीरात ने इस तरह का आरोप लगाया है।

एक और घटनाक्रम यह है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी संसद से इस युद्ध के लिए 200 अरब डॉलर की मांग की है। यानी कि इस युद्ध में अमेरिका को भारी धनराशि खर्च करनी पड़ रही है और आगे युद्ध जारी रखने के लिए 200 अरब डॉलर संसद से चाहिए, कांग्रेस से चाहिए। इसकी डिमांड डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने की है। क्योंकि यह युद्ध बहुत भारी पड़ता जा रहा है और महंगा युद्ध होता जा रहा है।

इसके अलावा भारत की भी सुरक्षा चिंताएं बहुत महत्वपूर्ण है और भारत सरकार इसके लिए सचेत है। जो भी आवश्यक कदम हैं यह भारत उठाता है। भारत के प्रधानमंत्री ने इस ऊर्जा संकट को दूर करने के लिए और ऊर्जा की आपूर्ति निर्बाद बनाए रखने के लिए ईरान
के राष्ट्रपति से भी बात की और उन्होंने क़तर के शेख से बात की है। उनको ईद की मुबारकबाद दी और इसके साथ ही कतर में जो बड़ा हमला ईरान की तरफ से हुआ है तेल संयंत्रों पर क्योंकि क़तर से बड़ी मात्रा में गैस की आपूर्ति भारत को होती है और कतर से तेल भी आता है तो कतर पर जो हमला हुआ है जो उनको नुकसान हुआ है उस पर चिंता व्यक्त की भारत ने और भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसकी निंदा भी की । तेल संयंत्रों पर हमले की भारत ने भी निंदा कर दी है तो एक तरह से जो ऊर्जा का मुद्दा है अब यह निर्णायक स्थिति में ले जाएगा। या तो देश तटस्थ रहे या फिर किसी ना किसी रूप से अपनी भूमिका निभाएं। क्योंकि ऊर्जा का जो ऐसा संकट है कि इससे हर देश प्रभावित होगा। हर व्यक्ति प्रभावित होगा। तो अब ईरान पर दबाव बढ़ना
लगातार शुरू हो गया है। और इस दबाव के आगे ईरान को संभवत झुकना पड़ेगा। क्योंकि ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने के लिए ईरान का जल डमरू मध्य को खुला रखना बहुत जरूरी है।  किसी भी कीमत पर तेल संयंत्रों पर हमले रोकने चाहिए।

इसमें अकेला ईरान ही जिम्मेदार नहीं है। ईरान के साथ-साथ इसमें इजराइल भी जिम्मेदार है और अमेरिका भी जिम्मेदार है। अमेरिका और इजराइल ने भी ईरान के तेल ठिकानों पे हमले किए। उसके जवाब में ईरान ने भी हमले किए। तो इसके लिए ऐसा नहीं है कि किसी एक को दोषी और किसी एक दूसरे को निर्दोष कहा जाए। दोषी तीनों हैं और इनको इस युद्ध में तेल क्षेत्रों पर ऊर्जा की जरूरतों को बचाना चाहिए था। जैसे नागरिक ठिकानों पर हमले नहीं करने चाहिए। अस्पतालों पर नहीं करने चाहिए। स्कूलों पर नहीं होने चाहिए। लेकिन इस युद्ध में सारी सीमाएं टूट गई हैं।
अस्पतालों पर भी हमले हो रहे हैं। स्कूलों पर भी हमले हो रहे हैं। तेल क्षेत्रों पर भी हमले हो रहे हैं। और यहां तक कि नेताओं पर भी हमले नहीं होते हैं युद्ध के दौरान। लेकिन नेताओं पर भी जो लीडरशिप है उस पर
भी हो रहे हैं। तो इस तरह से इस युद्ध में अब गंभीर ऊर्जा संकट सामने आने की आशंका है। ऐसे में अब ईरान अलग-थलग पड़ता जा रहा है और इसमें अब जो देश एकजुट हुए हैं उसमें अगर दूसरे देशों की भी संख्या बढ़ी तो ईरान को संभवत इस मामले पर झुकना पड़ेगा।

यह युद्ध जल्दी समाप्त होना चाहिए। नुकसान ईरान का भी बहुत हुआ है। इजराइल का भी हुआ है। अमेरिका तो क्योंकि दूर है लेकिन अमेरिका के जो ठिकाने हैं अरब क्षेत्रों में उन पर जरूर नुकसान हुआ है। उन पर हमले हुए हैं।

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

लेखक स्वतंत्र पत्रकार है