एटा 25 मार्च उप्रससे। भारतीय संस्कृति में पर्व समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन के आधार होते हैं। इन्हीं महत्वपूर्ण पर्वों में रामनवमी का विशिष्ट स्थान है जो धर्म और आदर्श जीवन के प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जन्मोत्सव रूप में मनाया जाता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमीं तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भारतीय जनमानस में आस्था, आदर्श और नैतिक मूल्यों का संवाहक है।प्राचीन भारतीय ग्रंथों विशेषकर वाल्मीक रामायण एवं गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस में भगवान राम के जन्म का वर्णन इस प्रकार मिलता है, उदाहरणार्थ’ ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतुनां षट समत्ययु:। ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नवमिके तिथौ। ‘ इस श्लोक के अनुसार यज्ञ के उपरांत चैत्र मास की नवमीं तिथि को राम का जन्म हुआ। गोस्वामी तुलसीदास ने राम के अवतरण को लोकमंगल की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है, यथा- भए प्रगट कृपाला दीनदयाला, कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी सुनि मन हारी, अद्भुत रूप विचारी।।
यह चौपाई केवल राम के जन्म का ही वर्णन नहीं करती अपितु यह संकेत देती है कि भगवान राम का अवतरण करुणा, धर्म और लोककल्याणार्थ हुआ है।
आधुनिक समाज में नैतिक मूल्यों के संकट की चर्चा अक्सर की जाती है। ऐसे समय में राम का चरित्र, आदर्श जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है। उनको मर्यादापुरुषोत्तम कहा गया क्योंकि उन्होंने पुत्रधर्म, भ्रातृप्रेम, दाम्पत्य निष्ठा, राजधर्म आदि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आदर्श स्थापित किए। राम के चरित्र का सार यह है कि जीवन में कर्तव्य सर्वोपरि होना चाहिए। इसी संदर्भ में महात्मा गाँधी का कथन उल्लेखनीय है। रामराज्य का अर्थ किसी विशेष धार्मिक शासन से नहीं बल्कि न्याय, सत्य और नैतिकता पर आधारित व्यवस्था से है। ‘ यह विचार आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। रामकथा में सामाजिक समरसता का सुन्दर चित्रण मिलता है। भगवान राम ने निषादराज,शबरी, हनुमान, सुग्रीव, वानर सेना आदि समाज के प्रत्येक वर्ग के साथ समान व्यवहार किया, जो यह दर्शाता है कि समाज की शक्ति उसकी विविधता और सहयोग में निहित है। रामधारीसिंह दिनकर ने राम के चरित्र की इसी विशेषता का संकेत करते हुए लिखा है– ‘ राम का व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति की समन्वयकारी शक्ति का प्रतीक है। ‘ आधुनिक वैश्विक संस्कृति के प्रभाव में प्राय: आदर्श और परम्पराएँ कमजोर पड़ने लगतीं हैं, ऐसी स्थिति में रामनवमी के सामूहिक आयोजनों में रामकथा समाज में एकता और भाईचारे की भावना को सुदृढ़ करती है तथा समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम भी करती है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी राम के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा था– ‘ राम भारतीय संस्कृति के आदर्श मनुष्य हैं जिनमें धर्म,नीति और करुणा का अद्भुत समन्वय है। ‘
रामनवमी के संदर्भ में रामराज्य की कल्पना भी महत्वपूर्ण है। रामराज्य न्याय, समानता और लोककल्याण पर आधारित आदर्श शासन का प्रतीक है। यदि रामराज्य की मूल भावना सत्य, पारदर्शिता, लोकहित और उत्तरदायित्व को अपनाया जाए तो आधुनिक समाज के प्रशासन और राजनीति के क्षेत्र में संतुलन और विश्वास स्थापित किया जा सकता है। रामकथा से जीवन-मूल्यों की शिक्षा मिलती है, सामाजिक एकता का माध्यम बनती है, परम्पराओं और लोकसंस्कृति को जीवित रखने में सहायक बनती है तथा भक्ति और आत्मिक शांति की अनुभूति कराती है। समग्र रूप से देखा जाए तो रामनवमी मात्र धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं अपितु राम के आदर्शों को अपनाकर न्यायपूर्ण, समरस, आदर्शोन्मुख नैतिक समाज की स्थापना करने का उत्सव है।

