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Bangladesh Election ढाका में बदलाव, भारत के सामने नई कसौटी

February 16, 2026

Bangladesh Election ढाका में बदलाव, भारत के सामने नई कसौटी

New Government of Bangladesh
Posted on 16.02.2026, Monday Time 10.07 AM , Dhaka, Writer Priyanka Saurabh 
(सत्रह वर्षों बाद सत्ता में लौटी बीएनपी ने बांग्लादेश की राजनीति की दिशा बदली है; भारत के सामने अब अवसरों के साथ नई अनिश्चितताएँ भी खड़ी हैं।)
 डॉ. प्रियंका सौरभ
बांग्लादेश के हालिया आम चुनावों में बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (बीएनपी) Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने तारिक रहमान Tarik Rehman के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। सत्रह वर्षों के लंबे निर्वासन के बाद राजनीति में लौटे तारिक रहमान ने अपनी माँ और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया Khalida Jiya की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए पार्टी को दो-तिहाई से अधिक सीटें दिलाईं। यह जीत न केवल एक चुनावी सफलता है, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति में सत्ता संतुलन के व्यापक पुनर्संयोजन और एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत का संकेत भी देती है। भारत के लिए यह परिणाम अवसरों के साथ-साथ कई रणनीतिक अनिश्चितताएँ भी लेकर आया है, जिनका प्रबंधन आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों की दिशा तय करेगा।
पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय तक बांग्लादेश की राजनीति पर अवामी लीग और शेख हसीना Sheikh Hasina का वर्चस्व रहा। इस अवधि में स्थिरता, आर्थिक विकास और क्षेत्रीय सहयोग के साथ-साथ सत्ता के केंद्रीकरण, विपक्ष के दमन और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने के आरोप भी लगातार लगते रहे। लंबे समय तक एक ही राजनीतिक धारा के प्रभुत्व ने मतदाताओं में प्रशासनिक थकान और परिवर्तन की आकांक्षा को जन्म दिया। बीएनपी की जीत को इसी व्यापक जन-असंतोष और राजनीतिक विकल्प की तलाश के परिणाम के रूप में देखा जा सकता।
तारिक रहमान लंबे समय से बांग्लादेश की राजनीति में एक प्रभावशाली, किंतु विवादास्पद चेहरा रहे हैं। निर्वासन काल के दौरान उन पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और कट्टरपंथी तत्वों से संबंधों जैसे आरोप लगे, जिनके कारण उनकी छवि धूमिल हुई। हालांकि दिसंबर 2025 में लंदन से स्वदेश वापसी के बाद उन्होंने अपने राजनीतिक दृष्टिकोण में बदलाव के संकेत दिए। उन्होंने पार्टी संगठन का पुनर्गठन किया, युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाया और जमीनी स्तर पर जन आंदोलन को पुनर्जीवित किया। निर्वासन काल के अनुभवों को उन्होंने राजनीतिक पूंजी में बदला और बीएनपी को चुनावी रूप से पुनर्स्थापित किया। इस संदर्भ में यह जीत केवल पारिवारिक विरासत का विस्तार नहीं, बल्कि रणनीतिक पुनर्संयोजन, संगठनात्मक अनुशासन और बदलते राजनीतिक यथार्थ को समझने की क्षमता की सफलता भी मानी जा रही है।
बीएनपी ने 13वें आम चुनावों में आर्थिक सुधार, भ्रष्टाचार उन्मूलन और अल्पसंख्यक सुरक्षा को अपने प्रमुख चुनावी मुद्दों के रूप में प्रस्तुत किया। बेरोज़गारी, महँगाई और शासन में पारदर्शिता की कमी जैसे मुद्दों ने मतदाताओं को गहराई से प्रभावित किया। पार्टी ने अपनी पारंपरिक कट्टरपंथी छवि से दूरी बनाने का प्रयास किया और हिंदू समुदाय सहित सभी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का आश्वासन दिया। यह जनादेश इस बात को रेखांकित करता है कि लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक वर्चस्व और प्रशासनिक थकान के बाद मतदाताओं ने परिवर्तन को प्राथमिकता दी। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से सत्ता परिवर्तन ने यह भी संकेत दिया कि बांग्लादेशी समाज स्थिरता के साथ-साथ उत्तरदायी शासन की अपेक्षा रखता है।
भारत के दृष्टिकोण से बीएनपी की यह जीत मिश्रित संकेत देती है। ऐतिहासिक रूप से भारत के संबंध अवामी लीग सरकार के साथ अधिक सहज और स्थिर रहे हैं। सीमा प्रबंधन, आतंकवाद-रोधी सहयोग और कनेक्टिविटी परियोजनाओं में शेख हसीना सरकार ने भारत के साथ घनिष्ठ तालमेल रखा। इसके विपरीत, बीएनपी को लेकर नई दिल्ली में हमेशा संदेह बना रहा है, विशेषकर 2001–06 के शासनकाल के अनुभवों के कारण। हालांकि हाल के वर्षों में तारिक रहमान ने भारत के प्रति अपेक्षाकृत संतुलित और व्यावहारिक रुख अपनाने के संकेत दिए हैं। चुनावों से पहले भारत द्वारा बीएनपी को अनौपचारिक रूप से “ग्रीन सिग्नल” देना इसी बदलते दृष्टिकोण को दर्शाता है। यह संकेत करता है कि भारत अब बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में किसी एक दल पर निर्भर रहने के बजाय बहुआयामी संवाद की नीति अपनाने को तैयार है।
आर्थिक दृष्टि से बीएनपी सरकार भारत के लिए नए अवसर खोल सकती है। बांग्लादेश भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और दक्षिण एशिया में भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति का अहम स्तंभ भी है। नई सरकार के कार्यकाल में द्विपक्षीय व्यापार के 20 अरब डॉलर तक पहुँचने की संभावना जताई जा रही है। कनेक्टिविटी परियोजनाओं, जलविद्युत सहयोग, सीमा व्यापार, डिजिटल कनेक्टिविटी और औद्योगिक निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई गति मिल सकती है। बांग्लादेश की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था भारतीय निवेश के लिए आकर्षक अवसर प्रस्तुत करती है। अल्पसंख्यक हितों की रक्षा को लेकर बीएनपी की सार्वजनिक प्रतिबद्धता भारत की सामाजिक और राजनीतिक चिंताओं को कुछ हद तक कम करती है।
इसके बावजूद, अनिश्चितताएँ बनी हुई हैं। बीएनपी पर कट्टरपंथी तत्वों के प्रति नरमी बरतने के आरोप लगते रहे हैं और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों की भूमिका को लेकर सतर्कता आवश्यक है। तारिक रहमान पर लगे पुराने भ्रष्टाचार आरोप, पाकिस्तान के साथ कथित संबंध और हालिया सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाती हैं। भारत–बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ, तस्करी, मानव तस्करी और आतंकवाद से जुड़े जोखिम भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। यदि इन मुद्दों पर ठोस और पारदर्शी कार्रवाई नहीं होती, तो द्विपक्षीय विश्वास प्रभावित हो सकता है।
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन का असर केवल भारत-बांग्लादेश संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव व्यापक दक्षिण एशियाई भू-राजनीति पर भी पड़ेगा। चीन और पाकिस्तान क्षेत्र में अपने प्रभाव को लगातार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में भारत के लिए आवश्यक होगा कि वह बांग्लादेश के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत रखे, ताकि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन भारत के प्रतिकूल न जाए। बहुपक्षीय मंचों और उप-क्षेत्रीय सहयोग पहलों के माध्यम से संवाद और सहयोग को सुदृढ़ किया जा सकता है।
ऐसे परिदृश्य में भारत के लिए संतुलित और सक्रिय कूटनीति अपनाना अनिवार्य होगा। अवामी लीग के साथ पुराने संबंधों को बनाए रखते हुए बीएनपी सरकार के साथ संवाद स्थापित करना भारत के दीर्घकालिक हित में है। एकतरफा झुकाव के बजाय संस्थागत और बहुदलीय संपर्क भारत को अधिक रणनीतिक लचीलापन प्रदान करेगा।
मानवाधिकार, अल्पसंख्यक सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों के मुद्दों पर भारत को न तो उपेक्षा करनी चाहिए और न ही अत्यधिक हस्तक्षेप करना चाहिए। विवेकपूर्ण संतुलन ही भारत की प्रभावशीलता को बनाए रख सकता है।
तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी की यह जीत भारत के लिए न तो पूरी तरह जोखिमपूर्ण है और न ही पूर्णतः अवसर-प्रधान। यह एक संक्रमणकालीन दौर है, जिसमें सतर्कता, संवाद और व्यावहारिक कूटनीति के माध्यम से भारत न केवल अपने हितों की रक्षा कर सकता है, बल्कि भारत–बांग्लादेश संबंधों को एक नई और अधिक परिपक्व दिशा भी दे सकता है। यदि अनिश्चितताओं का प्रभावी प्रबंधन किया गया और सहयोग के क्षेत्रों को सुदृढ़ किया गया, तो यह राजनीतिक परिवर्तन न केवल द्विपक्षीय संबंधों को, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में स्थिरता और सहयोग की संभावनाओं को भी सशक्त कर सकता है।
Dr Priyanka Saurabh Writer, Poet

डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार

February 13, 2026

शिवरात्रि पर विशेष–सृष्टि के पालनहार हैं शिव

Barabanki Shivratri Pujan

Posted on 13.02.2026 Time 08.00 Friday, Barabanki, Shivratri, Dilip Kumar Shrivastava 
शिवरात्रि व्रतं नाम सर्व पापं प्रयाशनम्। आचाण्डाल मनुष्यापं मुक्ति प्रदायकं ।।
देवों के देव लोधेश्वर महादेव
दिलीप कुमार श्रीवास्तव
बाराबंकी । भोले भण्डारी शिव शंकर व माता पार्वती के विवाह के पीछे कई कथाएं धार्मिक ग्रंथों में पढ़ने व सुनने को मिलती है कि माँ पार्वती ने कठोर तप करके शंकर जी को प्राप्त किया था।शिवरात्रि के दिन ही भोले व पार्वती का विवाह हुआ था। उसी परम्परा को निभाते हुए हिन्दुओं द्वारा मंदिरो से भगवान शिव की बारात भव्य रूप से धूमधाम से निकाली जाती हैं। तथा धार्मिक रीति रिवाज से मंत्रोचारण के साथ शादी कराई जाती।
शिव शब्द बहुत सूक्ष्न होता है, इसके अर्थ की गरिमा इसकी गम्भीरता को प्रस्फुटित कर देती है। उसे और अधिक कल्याणकारी बना देती है। शम्भूका भावार्थ है, मंगलदायक। शंकर का तात्पय है आनन्द का स्रोत्र। यह तीनो कल्याणकारी, मंगलदायक और आनन्दधन परमात्मा की ओर इंगित करते है। भोले की इच्छा से ही रजोगुण रूपी ब्रह्मा, सत्गुण रूपी विष्णु और तमागुण रूपी रूद्र अवतरित होते है। जो कमशः सृजन, पालन और संहार का कार्य करते हैं। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। ग्रंथो के अनुसार सृष्टि के प्रारम्भ में इसी दिन मध्यरात्रि में रूद्ध के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव ताण्डव करते हुए ब्रह्माण्ड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते है। इस कारण इसे महाशिवरात्रि एवं कालरात्रि भी कहां जाता है। तीनो लोक की अपार सुन्दरी तथा शीलवती गौरा को अधीगिनी बनाने वाले शिव प्रेतो व पिशाचों से घिरे रहते है।
वैदिक ज्योतिषों के अनुसार भगवान शिव चतुर्दशी तिथि के स्वामी है, इसलिए प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि कहते है। फाल्गुन मास की चतुर्दशी महाशिवरात्रि होती है। पुराणों के अनुसार महाशिवरात्रि भगवान शिव के प्राकट्य मतान्तर से विवाहोत्सव का दिन है। शिव पुराण के अनुसार इस दिन भगवान शिव जी की पूजा अर्चना तथा अभिषेक अनन्त फलदायी होता है। चतुर्दशी के स्वामी शिव है. इस तिथि को रात्रि में व्रत किये जाने से इस व्रत का नाम शिवरात्रि होना सार्थक हो जाता है। यद्यपि प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी शिवरात्रि होती है। और शिव भक्त प्रत्येक कृष्ण चतुर्दशी व्रत करते ही है, किन्तु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के निशीथ (अर्धरात्रि) में शिवलिंगतयोदीभूत कोटिसूर्यसमप्रभः ईशानसंहिता के इस वाक्य के अनुसार जयोतिलिंग का प्रादुभाव हुआ था. इस कारण महाशिवरात्रि मानी जाती है।
सिद्वान्त रूप से आज के सूर्योदय से कल के सूर्योदय तक रहने वाली चतुर्दशी शुद्ध और अन्य विद्वा मानी गई है। उसमें भी प्रदोष (रात्रि का आरम्भ) और निशीथ (अर्धरात्रि) की चतुर्दशी ग्रह्य होती है। अर्धरात्रि की पूजा के लिए स्कंदपुराण में लिखा है कि ‘फाल्गुन कृष्ण 14 को निशिघ्रमन्ति भूतानि शक्तयः शूलभूद् यतः। अतस्तस्यां चतुर्दशी सत्यां तप्पूजनं भवत्।। अर्थात रात्रि के समय भूत, प्रेत, पिशाच जैसी शक्तियां और स्वयं शिव शंकर भ्रमण करते है, अतः उस समय इनका पूजन करने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते है। यदि (शिवरात्रि) त्रिस्पृशा (12-14-30 इन तीनो के स्पर्श की हो तो अतिधिक उत्तम होती है। पारण के लिए व्रतान्ते पारणम् तिथ्यन्ते पारणम् और तिथिमान्ते च पारणम् आदि वाक्यों के अनुसार व्रत की समाप्ति में पारण किया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार शिवरात्रि के दिन ही शिव व पार्वती का विवाह हुआ था यह दिवस परमात्मा के सृस्टि
पर अवतरित होने की स्मृति दिलाता है। जो हमे ज्ञान का प्रकाश विखेर का अज्ञानता ये दूर हटाता है। शिव का अर्थ है, कल्याण। भोले भण्डारी शिव सबका कल्याण करने वाले देवो के देव महादेव है। महाशिवरात्रि पर्व पर सरल उपाय करके भी शिव को प्रसन्न किया जा सकता है। ज्योतिष गणना के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चन्द्रमा अपनी क्षीण अवस्था में पहुँच जाता है, जिस कारण बलहीन चन्द्रमा सृष्टि को उर्जा देने में असमर्थ हो जाता है। चन्द्रमा का सीधा संबन्ध संताप प्राणी को घेर लेते है, तथा विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती। जिसके कारण कष्टो का सामना करना पड़ता है। चन्द्रमा शिव मस्तकपर सुशोभित है। अतः चन्द्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की शरण में जाने से सारे कष्ट दूर हो जाते है। महाशिवरात्रि तिथि शिव जी को सबसे अधिक प्रिय होती है। अपनी आत्मा को शुद्ध करने के लिए शिवरात्रि व्रत ही महाव्रत कहां जाता है। इस व्रत को करने से सभी पापो का नाश होता है, साथ ही हिंसक प्रवृति बदल जाती है, निरीह जीवों पर दया भाव उत्पन्न हो जाता। इंसान संहिता में इसके महत्व का उल्लेख है।
बाराबंकी से करीब 35 कि०मी दूर स्थित लोधेश्वर महादेव Lodheshwer Mahdev Mandir Barabanki का मंदिर है, जो <तहसील रामनगर से मात्र 05 किमी दूर पर स्थित हैं। जहाँ महाशिवरात्रि के दिन लाखों शिव भक्त कांवर लेकर दर्शन करने आते हैं। महाशिवरात्रि से 15 दिन पूर्व ही हरिद्वार, बितूर, कानपुर, से गंगाजल लेकर पैदल ही लोधेश्वर पहुँचते है। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के साथ ही उत्तराखण्ड़, बिहार, मध्यप्रदेश, तथा हिमाचल प्रदेश से भी शिव भक्त अपने कंधो पर कांवर लेकर पैदल ही महादेवा पहुँचते है।

February 9, 2026

संसद बनी बंधक- संविधान का अपमान कौन कर रहा है ?

Article UP Web News

आलेख

Posted on 09.02.2026 Monday, Time 08.13 AM by Admin, Writer Mratunjay Dixit, Lucknow 

वर्ष -2026 का बजट सत्र हल्ले-गुल्ले और अराजकता की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है। यहाँ बजट के अतिरिक्त अन्य सभी विषयों को उठाए जाने का प्रयास हो रहा है। स्थितियां इतनी विकट हैं कि संसदीय इतिहास में पहली बार राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री लोकसभा में उत्तर नहीं दे सके और राष्ट्रपति का अभिभाषण बिना किसी चर्चा के पारित हो गया। यद्यपि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में 97 मिनट लंबा और प्रभावशाली उत्तर दिया। राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने विपक्ष द्वारा की गई सभी टिप्पणियों का संज्ञान लेते हुए अपनी बात रखी। प्रधानमंत्री मोदी का यह संबोधन देश के स्वर्णिम भविष्य और विकास की दिशा को भी दर्शाता है।
राष्ट्रपति के अभिभाषण के समय हंगामा करके देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का अपमान करने के बाद जब समय आने पर राहुल गांधी को बोलने का अवसर दिया गया तो उन्होंने विषय से इतर जाकर पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक कोट करते हुए चीनी घुसपैठ का पुराना मुद्दा उछालने का प्रयास किया। लोकसभा अध्यक्ष द्वारा नियमों के अंतर्गत व्यवस्था दिए जाने के बाद भी राहुल गांधी अपनी बात पर अड़े रहे। यह एक आश्चर्यजनक व्यवहार है कि नेता प्रतिपक्ष राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने के स्थान पर पुराने मुद्दे उठाए और उनको भी आपत्तिजनक रूप से रखकर देश की सेना और सदन का अपमान करे। लोकसभा में कांग्रेस तथा इंडी गठबंधन की महिला सांसदों ने जिस प्रकार प्रधानमंत्री मोदी का रास्ता रोकने की योजना बनायी और लोकसभा अध्यक्ष को प्रधानमंत्री से सदन न आने का अनुरोध करना पड़ा वो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। विडम्बना ये है कि यही लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बाते करते हैं।
राज्यसभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस में भाग न लेकर विपक्षी दलों ने न केवल राष्ट्रपति पद का अपमान किया है अपितु एक गरीब परिवार से निकलकर आई आदिवासी महिला का भी अपमान किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में राहुल गांधी व कांग्रेस पर तीखा हमला बोला और केंद्रीय रेल राज्यमंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को ग़द्दार कहने पर भी राहुल गांधी घेरा। प्रधानमंत्री ने कहा कि इनका अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच गया है । कांग्रेस छोड़कर कितने ही लोग निकले हैं किसी और को तो ग़द्दार नहीं कहा, ये सिख हैं इसलिए कहा, ये सिखों का, गुरुओं का अपमान था। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि लोकसभा में चेयर पर कागज फेकें गए जब असम के सदस्य चेयर की कुर्सी पर विराजमान थे क्या यह असम का अपमान नहीं? जब आंध्र प्रदेश के एक दलित सदस्य चेयर की कुर्सी पर बैठे थे तब उन पर भी कागज फेंके गए क्या यह एक दलित बेटे और संविधान का अपमान नहीं है ?
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आखिर कांग्रेस उनके लिए कब्र खुदेगी का नारा क्यों देती है ? हमने जम्मू -कश्मीर से धारा 370 से हटाई इसलिए या हमने 25 करोड़ लोगों को गरीबी से उबारा है इसलिए? प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि ये कौन सी मोहब्बत की दुकान है जो देश के किसी नागरिक की कब्र खोदने के सपने देखती है? आजकल मोहब्बत की दुकान खोलने वाले “मोदी तेरी कब्र खुदेगी” के नारे लगा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं देश के युवाओं के लिए मजबूत जमीन तैयार कर रहा हूं तो कांग्रेस मोदी की कब्र खोदने के कार्यक्रम करवा रही है। हमने नार्थ ईस्ट में बम बंदूक और आतंक का जो साया बना रहता था वहां शांति और विकास की राह अपनाई इसलिए वह मोदी की कब्र खोद रहे हैं। पाकिस्तानी आतंकवादियो को घर में घुसकर मारते हैं, ऑपरेशन सिंदूर करते हैं और इसलिए वे मोदी की कब्र खोदना चाहते हैं। मोदी तेरी कब्र खुदेगी ये जो उनके भीतर नफरत भरी हुई है मोहब्बत की दुकान में जो आग भरी पड़ी हुई है, उसका कारण है किकांग्रेस इस बात को पचा नहीं पा रही है कि कोई और क्यों प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा है, ये तो हमारा पैतृक अधिकार था इसलिए वे हताशा में मोदी की कब्र खोदने के नारे लगा रहे हैं । प्रधानमंत्री ने आगे जोड़ा कि कांग्रेस को ये सहन नही हो रहा हे कि जो समस्याएं उसने 60 सालो में पाल- पोस कर बड़ी की थीं मोदी उनका एक- एक करके समाधान क्यों कर रहा है? कांग्रेस को ये सब पसंद नहीं आ रहा है इसलिए अब कांग्रेस के नेता मोदी तेरी कब्र खुदेगी का नारा लगा रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोपियन यूनियन और फिर अमेरिका के साथ जो व्यापार समझौते हुए उनके विषय में जानकारी देते हुए बताया कि अब पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है और समझौते कर रही है। कांग्रेस को भी यहअवसर मिला था, उन्होंने यह क्यों नही कर दिखाया?
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन के माध्यम से कांग्रेस,लेफ्ट व डीएमके सहित टीएमसी पर भी तीखा हमला बोला और उन्होंने बंगाल की टीएसमी सरकार को देश की सबसे निर्मम सरकार बताते हुए कहा कि यह लोग अपने अंदर नहीं झाकते अपितु हमको यहां बैठकर उपदेश देते हैं। प्रधानमंत्री ने राज्यसभा सांसद सदानंद मास्टर के भाषण का संज्ञान लेते हुए वैचारिक सहिष्णुता की चर्चा की, ज्ञातव्य है कि सदानंद मास्टर के दोनों पैर वामपंथी विचारधारा के लोगों ने निर्ममता से केवल उनकी विचारधारा अलग होने के कारण काट दिए थे।
संसद के वर्तमान सत्र में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और इंडी गठबंधन ने जो रवैया अपनाया है उसने देश के वास्तविक मुद्दों को उठाने का एक सुनहरा अवसर खो दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा को घेरने के बजे उन्होंने भाजपा व प्रधानमंत्री मोदी को ही अपने ऊपर आक्रमण करने का अवसर दे दिया है। भाजपा अब सिख व दलित सांसदों के अपमान का राजनैतिक लाभ उठाने का पूरा प्रयास करेगी। भाजपा चुनाव वाले राज्यों में विरोधी दलों के संसदीय आचरण को भी मुद्दा बनाएगी।
लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित , स्वतंत्र पत्रकार, लेखक हैं।

February 4, 2026

भारत और अमेरिका के मध्य हुआ ऐतिहासिक समझौता 

Article UP Web News

आलेख

भारत ने फिर दिखाया सामर्थ्य

Posted on: 04.02.2026 Wednesday, Time 06.30 PM, Article by Matyunjay Dixit, Lucknow 
मृत्युंजय दीक्षित
भारत और अमेरिका के मध्य अप्रैल 2025 से प्रारंभ हुआ टैरिफ वॉर अब समझौते के साथ समापन की ओर अग्रसर हो रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प की ओर से भारत पर टैरिफ घटाने के ऐलान के साथ ही शेयर बाजार में उछल आया और निवेशकों के चेहरे खिल उठे। डॉलर के मुकाबले रुपए में भी मजबूती दिखी।
यूरोपियन यूनियन के 27 सदस्य देशों के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते के बाद से अनुमान लगाया जा रहा था कि अमेरिका दबाव में आ गया है और उसे भारत की व्यापार चिंताओं के सम्मान करना ही पड़ेगा और अंतत: ऐसा हुआ भी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर कहा कि यह मेरे लिए सम्मान की बात है कि प्रधानमंत्री मोदी ने हमसे बात की । वह मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में से एक हैं और अपने देश के शक्तिशाली नेता हैं। हमने एक नहीं कई मुद्दों पर बात की जिसमें व्यापर और रूस -यूक्रेन युद्ध को समाप्त करना भी शामिल था। मोदी के लिए दोस्ती और उनके सम्मान के चलते और उनकी मांग पर तत्काल प्रभाव से हम अमेरिका और भारत के बीच एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए हैं, जिसमें अमेरिका भारत पर लगाए गए टैरिफ को 25 से घटाकर 18 प्रतिशत कर रहा है। भारत के साथ हमारा अद्भुत संबंध आगे और मजबूत होगा। जैसे ही सोशल मीडिया पर अमेरिकी राष्ट्रपति का बयान आया वैसे ही भारत में भी हलचल तीव्र हो गई। एन डी ए संसदीय दल की बैठक में अमेरिका के साथ हो रहे समझौते पर प्रधानंमत्री मोदी ने कहा कि हमने बहुत समय तक धैर्य रखा जिसका परिणाम हम सभी के सामने है । अमेरिका की ओर से की गई इस घोषणा से दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच व्यापारिक तनाव को कम करने में सहायता मिलेगी।
भारत सर्वाधिक लाभ में- भारत और अमेरिका के बीच जो व्यापार समझौता हुआ है उसका सर्वाधिक लाभ भारत को ही मिलने जा रहा है। ट्रंप की भारत को लेकर की गए इस बड़ी टैरिफ घोषणा के बाद भारत अब इस मामले में पडोसी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले से अधिक लाभ मे आ गया है । चीन और पाकिस्तान की तुलना में भी भारत पर अब कम टैरिफ है। इंडोनेशिया, बांग्लादेश और वियतनाम भारत से अधिक टैरिफ वाले देश बन चुके हैं। वर्तमान समय में बांग्लादेश और वियतनाम पर 20, मलेशिया, कंबोडिया, थाईलैंड और पाकिस्तान पर 19 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ लगा हुआ है । समाचार यह भी है कि अब भारत भी अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ और गैर टैरिफ बाधाओं को कम करने के लिए प्रतिबद्ध है । कहा जा रहा है कि इसे संभावित रूप से शून्य तक ले जाया जा सकता है। यह भारत की वर्तमान व्यापार नीति में बाजार पहुंच के सबसे बड़े बदलावो में से एक है। जैसे ही भारत अमेरिकी उत्पादों के लिए अपने बाजार खोलेगा कई अमेरिकी वस्तुएं भारतीय उपभोक्ताओं के लिए काफी सस्ती हो जाएंगी।
भारतीय बाजार में लैपटाप, गैजेट्स और अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरण की कीमतें कम हो सकती हैं । घरेलू उपकरणों की पहुंच आसान हो जाएगी।निर्यात के मोर्चे पर भी भारत को बहुत लाभ होने जा रहा है।अमेरिका से टैरिफ कम हो जाने के बाद हमारे टैक्स्टाइल, आभूषण और रत्न निर्यात पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इन सेक्टर्स के अलावा भारत का चमड़ा और फुटवियर उद्योग अमेरिका को हर वर्ष 1.18 अरब, केमिकल उद्योग 2.34 अरब और इलेंक्टिक और मशीनरी उद्योग 9 अरब डॉलर का निर्यात करता है।
विश्लेषकों का अनुमान है कि भारत और अमेरिका के मध्य द्विपक्षीय व्यापार अगले कुछ वर्षों में 500 अरब डॉलर की ओर 5 गुना गति से बढ़ेगा ओैर नए व्यापार समझौते से भारी आर्थिक लाभ प्राप्त होंगे।अमेरिका के साथ डील फाइनल हो जाने के कारण अब एक नई सप्लाई चेन मिल गई है जिसका लाभ भी भारत को मिलेगा।
भारत -अमेरिका व्यापार समझौते के बाद भारत की जीडीपी वृद्धि बढ़कर 6.9 प्रतिशत हो सकती है। टैरिफ कटौती से भारत की आर्थिक वृद्धि निवेश, वातावरण और वाह्य संतुलन को समर्थन मिलेगा। गोल्डमैन एक्स का मानना है कि अगर यह टैरिफ लागू रहता है तो इससे भारत की अर्थव्यवस्था को व्यापक लाभ होगा। अब ट्रेड पॉलिसी को लेकर अनिश्चितता कम हो जाएगी । उद्योग जगत इसे भरोसा बढ़ाने वाला कदम मान रहा है ओैर एफआईआई की वापसी से बाजारों में सकारात्मक वातावरण बनने की संभावना बताई जा रही है।
भारत और अमेरिका के मध्य हुआ समझौता इंगित करता है कि अब पूरी दुनिया भारत में व्यापार के माध्यम से निवेश के नए अवसर खोज रही है। यह समझौता न सिर्फ भारत की विकास आकांक्षाओं को गति देगा बल्कि देश को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और नवाचरण का केंद्र बनाने के लक्ष्य को भी मजबूती देगा। भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत विकास पथ पर है और यह डील विकास को अतिरिक्त गति देगी। यह कदम भारत -अमेरिका आर्थिक संबंधों में भरोसा बढ़ाने वाला है और विकसित भारत – 2047 के विजन के अनुरूप दिख रहा है। इस समझौते के लागू हो जाने के बाद अब निवेश और रोजगार के नए अवसर भी सामने आयेंगे।
प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं. – 9198571540

February 3, 2026

संपादकीय: अप्रकाशित पुस्तक पर चर्चा का औचित्य

Leader of opposition Rahul Gandhi

लोकसभा में नेता विरोधी दल राहुल गांधी

Posted on : 03.02.2926 Tuesday, Time: 07.09 AM, Editorial by Sarvesh Kumar Singh, UP Web News, Un Published book of General Manoj Mukund Nanrvanee, #The Four Stars of Destiny 

संस्मरण पुस्तक “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” जिसके लेखक पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवने है। अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। हालांकि इस किताब की चर्चा खूब है। इस पर एक पत्रिका में टिप्पणी भी प्रकाशित हो चुकी है। पुस्तक प्रकाशन के लिए प्रकाशक के पास है। लेकिन रक्षा मंत्रालय से अनुमति लंबित होने के कारण अप्रकाशित है। ताजा उल्लेख इस किताब का इसलिए है कि इसके कुछ अंश जो अगस्त 2020 के लद्दाख क्षेत्र में चीन के साथ हुई हिंसक झड़प से जुड़े हैं और घुसपैठ के बारे में हैं, इनकी चर्चा नेता विरोधी दल राहुल गांधी सोमवार को लोकसभा में करना चाहते थे। उन्हें अध्यक्ष ने रोक दिया। उन्होंने जब एक पत्रिका में पुस्तक पर प्रकाशित टिप्पणी का उल्लेख करते हुए चीनी घुसपैठ की बात को उठाने की कोशिश की तो सरकार की ओर से विरोध हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने भी नियमों का हवाला देकर उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी। अन्ततः लोकसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई।

अब प्रश्न ये उठता है कि क्या किसी ऐसी किताब जो अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है। उसके विवरण पर लोकसभा में चर्चा करना उचित है? क्योंकि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा विवाद से जुड़ा है। इसका प्रभाव पड़ोसी देश के साथ राजनीतिक, कूटनीतिक, व्यापारिक संबंधों से भी है। और इन सबसे ज्यादा सेना के मनोबल से जुड़ा है। ऐसी स्थिति में क्या राहुल गांधी को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के अभिभाषण पर चर्चा के बजाय, किसी संवेदनशील मुद्दे को उठाना चाहिए था।

जब तक जनरल मनोज मुकुंद नरवने की पुस्तक को प्रकाशन हेतु रक्षा मंत्रालय समीक्षा के बाद अनुमति न दे, और जब तक किताब प्रकाशित न हो जाए, तब तक इस मुद्दे को संसद में उठाना कतई भी उचित नहीं है। यहां तक कि इसपर सोशल मीडिया में भी चर्चा नहीं होनी चाहिए।

देश की आंतरिक, बाहरी और सीमा सुरक्षा पर देश का जनमत और दृष्टिकोण भी वही होना चाहिए, जो हमारी सेना, सरकार का अधिकृत मत हो। अगस्त 2020 में जब गलवान और दोकलम में चीनी सेना से हिंसक झड़प हुई तो जनरल नरवाने भारत के थलसेनाध्यक्ष थे। निश्चित रूप से उनके पास आम जन से अधिक सूचनाएं होंगी। रणनीति भी उनकी होगी, और सीमा सुरक्षा की पहली जिम्मेवारी भी उन्हीं की थी। ऐसे में एक दायित्वधारी को पद से हटने के बाद सूचनाओं को सार्वजनिक करने में सावधानी बरतनी चाहिए। आजादी के बाद से अभी तक के सभी सेनाध्यक्ष अगर सब कुछ सार्वजनिक करते तो देश में बहुत बड़े विभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई होती। यही बात नेता विरोधी दल को भी समझनी चाहिए। उनसे राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।

 

 

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