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25 वर्षों में शिक्षा, स्वास्थ्य, नवाचार और रोजगारपरक शिक्षा का पर्याय बना टीएमयू

September 14, 2026

25 वर्षों में शिक्षा, स्वास्थ्य, नवाचार और रोजगारपरक शिक्षा का पर्याय बना टीएमयू

TMU

Teerthankar Mahaveer University Moradabad

एक कॉलेज से शुरू हुई यात्रा ने 16 हजार से अधिक स्टुडेंट्स वाली यूनिवर्सिटी का रूप लिया, 14 सितंबर को 26वें वर्ष में मंगल प्रवेश

वर्ष 2001 में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में तीर्थंकर महावीर इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी (टीएमआईएमटी) कॉलेज से शुरू हुई तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी (टीएमयू), मुरादाबाद की शैक्षणिक यात्रा 14 सितंबर 2026 को अपने 25 वर्ष पूर्ण कर 26वें वर्ष में मंगल प्रवेश कर लिया है। ढाई दशक की यह यात्रा केवल संस्थागत विस्तार की कहानी नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, नवाचार, कौशल विकास, रोजगार, खेल, सामाजिक उत्तरदायित्व और वैश्विक शैक्षणिक सहयोग के क्षेत्र में निरंतर उपलब्धियों की यात्रा रही है। करीब 130 एकड़ से अधिक क्षेत्र में विस्तृत हरे-भरे परिसर में आज देश के लगभग सभी प्रमुख राज्यों के साथ नेपाल और भूटान सहित विभिन्न क्षेत्रों के 16 हजार से अधिक स्टुडेंट्स शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यूनिवर्सिटी के विभिन्न संस्थानों में 850 से अधिक अनुभवी शिक्षक विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण एवम् रोजगारपरक शिक्षा प्रदान करने में जुटे हैं। जरूरतमंद, मेधावी और जैन स्टुडेंट्स के लिए आकर्षक छात्रवृत्ति योजनाएं भी संचालित हैं।

एक कॉलेज से यूनिवर्सिटी तक का सफर

वर्ष 2001 में कंप्यूटर, मैनेजमेंट, साइंस और तकनीकी पाठ्यक्रमों के साथ शुरू हुई यह यात्रा वर्ष 2005 में डेंटल कॉलेज और वर्ष 2008 में मेडिकल कॉलेज की स्थापना के साथ चिकित्सा शिक्षा तक पहुंची। इसी वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार से यूनिवर्सिटी की स्थापना को मंजूरी मिली। आज टीएमयू में डेंटल, मेडिकल, फार्मेसी, नर्सिंग, फिजियोथेरेपी, पैरामेडिकल साइंसेज, इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस, मैनेजमेंट, लॉ, फिजिकल एजुकेशन, एजुकेशन, फाइन आर्ट्स और एग्रीकल्चर सहित विभिन्न क्षेत्रों में उच्च शिक्षा उपलब्ध है। यूनिवर्सिटी के विभिन्न कॉलेजों के माध्यम से लगभग 150 स्नातक एवं परास्नातक व्यावसायिक पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। बदलती औद्योगिक आवश्यकताओं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और तकनीकी विकास को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रमों तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमों को निरंतर अपडेट किया जा रहा है।

रोजगारपरक शिक्षा और कौशल विकास पर विशेष जोर

टीएमयू की शिक्षा व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य स्टुडेंट्स को केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि उन्हें रोजगार और उद्यमशीलता के लिए तैयार करना रहा है। तकनीकी ज्ञान, व्यक्तित्व विकास, अंग्रेजी भाषा में दक्षता और व्यावहारिक कौशल के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। वर्ष 2019 में स्टुडेंट्स के व्यावहारिक अंग्रेजी ज्ञान को और मजबूत करने के लिए परिसर में सीटीएलडी विभाग की स्थापना की गई। देश और दुनिया में उद्योगों की बदलती जरूरतों पर नजर रखते हुए स्टुडेंट्स को इंडस्ट्री एक्सपोजर, औद्योगिक भ्रमण, गेस्ट लेक्चर और प्लेसमेंट के अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं। देश की प्रमुख कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रतिनिधि कैंपस में प्लेसमेंट के लिए पहुंचते हैं। टीएमयू के अनेक पूर्व स्टूडेंट्स देश-विदेश की प्रतिष्ठित कंपनियों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं।

शिक्षा के संग चिकित्सा सेवा भी बनी पहचान

टीएमयू की प्रमुख उपलब्धियों में शिक्षा के साथ चिकित्सा सेवा का विस्तार भी शामिल है। यूनिवर्सिटी से संबद्ध टीएमयू हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर एवम् मेडिकल कॉलेज क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। अस्पताल में जरूरतमंद मरीजों के लिए निशुल्क उपचार, बेड और भोजन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। वर्ष 2008 से अब तक लाखों मरीजों का उपचार एवम् पंजीकरण किया जा चुका है और बड़ी संख्या में जांच एवम् ऑपरेशन किए गए हैं। टीएमयू मेडिकल कॉलेज में 250 एमबीबीएस सीटें हैं, जबकि सर्जरी सहित 13 विषयों में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों को मान्यता प्राप्त है।

कोविड काल में निभाई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी

कोविड-19 महामारी के दौरान टीएमयू अस्पताल को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लेवल-3 कोविड अस्पताल घोषित कर अधिग्रहित किया गया था। उस समय मुरादाबाद मंडल में टीएमयू मेडिकल कॉलेज के अतिरिक्त कोई अन्य लेवल-3 अस्पताल नहीं था। महामारी के दौरान टीएमयू अस्पताल द्वारा प्रदान की गई सेवाओं की प्रदेश स्तर पर सराहना हुई और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा भी यूनिवर्सिटी प्रबंधन एवम् चिकित्सा टीम के प्रयासों की प्रशंसा की गई।

नवाचार और उद्यमशीलता को संस्थागत आधार

टीएमयू ने स्टुडेंट्स में नवाचार और उद्यमशीलता की संस्कृति विकसित करने के लिए संस्थागत स्तर पर कई पहल की हैं। यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट इन्नोवेशन काउंसिल को शिक्षा मंत्रालय के इन्नोवेशन सेल की मेंटर-मेंटी योजना के अंतर्गत पांच प्रतिष्ठित संस्थानों को मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए 2.25 लाख रुपये की वित्तीय सहायता मिली। बिजनेस इन्क्यूबेशन सेंटर स्टुडेंट्स के नए विचारों को स्टार्टअप और वास्तविक उद्यम में बदलने के लिए मार्गदर्शन, संसाधन और वित्तीय सहयोग उपलब्ध करा रहा है। सेंटर को स्टार्टइन यूपी, एमएसएमई, डीएसटी-आईटीबीआई और एमईआईटीवाई से मान्यता प्राप्त है। यूनिवर्सिटी की उपलब्धियों में पेटेंट, शोध, प्लेसमेंट और नवाचार भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से साझेदारी

टीएमयू ने स्टुडेंट्स को वैश्विक अवसर उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न विदेशी यूनिवर्सिटीज एवम् संस्थानों के साथ शैक्षणिक साझेदारियां स्थापित की हैं। ड्यूल डिग्री, ज्वाइंट डिग्री, क्रेडिट ट्रांसफर और स्टुडेंट एक्सचेंज जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से स्टुडेंट्स को अंतर्राष्ट्रीय एक्सपोजर दिया जा रहा है। फिलीपींस, ब्राजील, फ्रांस और यूके के संस्थानों सहित विभिन्न विदेशी संस्थानों के साथ सहयोग स्थापित किया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर आईआईटी इंदौर, दृष्टि सीपीएस फाउंडेशन और आईआईटी चेन्नई-मेकर भवन फाउंडेशन सहित प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ भी सहयोग किया गया है।

खेलों और समग्र विकास का प्रमुख केंद्र

टीएमयू परिसर में स्टुडेंट्स के लिए राष्ट्रीय स्तर की इंडोर और आउटडोर खेल सुविधाएं उपलब्ध हैं। यूनिवर्सिटी परिसर में रणजी ट्रॉफी, कूच बिहार ट्रॉफी, सीके नायडू ट्रॉफी, राष्ट्रीय पुरुष एवं महिला वॉलीबॉल चैंपियनशिप और राष्ट्रीय कैरम चैंपियनशिप जैसी प्रतिष्ठित प्रतियोगिताएं आयोजित हो चुकी हैं। स्टुडेंट्स के समग्र विकास के लिए छात्रावास, भोजनालय, पुस्तकालय, वातानुकूलित ऑडिटोरियम, जिम, अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं, खेल मैदान, अंतर्राष्ट्रीय स्तर का इंडोर स्टेडियम और अन्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। दिसंबर ,2022 में शुरू की गई लीडरशिप टॉक सीरीज के माध्यम से स्टुडेंट्स को देश-दुनिया के विशेषज्ञों एवम् प्रख्यात व्यक्तित्वों से सीधे संवाद का अवसर मिल रहा है।

संस्कार, संस्कृति और आध्यात्मिकता का समन्वय

आधुनिक एवम् तकनीकी शिक्षा के साथ टीएमयू ने भारतीय संस्कृति, संस्कार और आध्यात्मिक मूल्यों को भी महत्व दिया है। परिसर में जैन वाटिका और जिनालय के साथ पर्युषण पर्व जैसी गतिविधियों के माध्यम से स्टुडेंट्स  में अनुशासन, आध्यात्मिकता, नैतिक मूल्यों और सामुदायिक एकता की भावना विकसित करने का प्रयास किया जाता है। जैन स्टुडेंट्स के लिए धार्मिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विशेष व्यवस्थाएं भी की गई हैं।

देश की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों ने की यूनिवर्सिटी की सराहना

टीएमयू की विकास यात्रा में पूर्व राष्ट्रपति एवं मिसाइल मैन डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, श्रीश्री रविशंकर, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित पद्म पुरस्कार प्राप्त विभूतियों, राज्यपालों, केंद्रीय एवम् राज्य मंत्रियों, फिल्मी सितारों, संगीतज्ञों, नृत्यांगनाओं, थिएटर कलाकारों और खिलाड़ियों की सहभागिता रही है। यूनिवर्सिटी के भव्य इंफ्रास्ट्रक्चर की सराहना करते हुए एएमयू के तत्कालीन कुलपति एवम् सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल जमीरुद्दीन शाह ने एक अवसर पर कहा था, एएमयू ने 100 वर्षों में भी जितना इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा नहीं किया, उतना टीएमयू ने अपेक्षाकृत कम समय में हासिल कर लिया। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने टीएमयू के भव्य परिसर को देखकर इच्छा व्यक्त की थी कि काश वे भी टीएमयू के स्टुडेंट होते।

एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर श्री अक्षत जैन यूनिवर्सिटी के भविष्य का ख़ाका खींचते हुए बताते हैं, टीएमयू एआई एजुकेशन, एआई टेक्नोलॉजीज, स्टार्टअप्स, इन्नोवेशन में नए कीर्तिमान स्थापित करेगा। यूएनओ के सतत विकास लक्ष्य के 17 बिंदुओं को आत्मसात करने को यूनिवर्सिटी संकल्पित है। क्वालिटी एजुकेशन के प्रति प्रतिबद्ध है। इन उपलब्धियों के बूते यूनिवर्सिटी विश्व की टॉप 100 रैंकिंग में स्थान पाने के लिए लक्षित है। टाइम्स रैंकिंग में उल्लेखनीय स्थान प्राप्त किया है। यूनिवर्सिटी भविष्य में क्यूएस रैंकिंग में भी अपना स्थान बनाना चाहती है।

कुलाधिपति श्री सुरेश जैनः रोजगारपरक शिक्षा हमारी सफलता का मूलमंत्र

कुलाधिपति सुरेश जैन ने कहा, टीएमयू की सफलता का मूलमंत्र विद्यार्थियों को रोजगारपरक शिक्षा उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा, यूनिवर्सिटी की स्थापना से ही यह सोच रही है, ऐसे पाठ्यक्रम संचालित किए जाएं, जिन्हें पूरा करने के बाद स्टुडेंट्स बेहतर रोजगार प्राप्त करने के साथ अपना कारोबार या स्टार्टअप भी शुरू कर सकें। उच्च शिक्षित एवं अनुभवी शिक्षक छोटे कस्बों से लेकर महानगरों तक के स्टुडेंट्स को आधुनिक शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि तकनीकी ज्ञान, व्यक्तित्व विकास और अंग्रेजी भाषा में दक्षता के साथ विद्यार्थियों के समग्र विकास पर निरंतर काम किया जा रहा है।

ग्रुप वाइस चेयरमैन श्री मनीष जैनः टीएमयू एक संकल्प है

ग्रुप वाइस चेयरमैन मनीष जैन ने कहा, टीएमयू एक संकल्प है और सिद्धांतों की आधारशिला है। इसी विचार के साथ टीएमयू ने अपनी स्थापना से अब तक की यात्रा सभी के सहयोग और स्नेह से पूरी की है। आने वाले समय में भी हम सब साथ मिलकर इस सफलता की यात्रा के नए अध्यायों के साक्षी बनेंगे।

एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर श्री अक्षत जैनः शैक्षणिक गुणवत्ता हमारी सबसे बड़ी पूंजी

एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अक्षत जैन ने कहा, युवाओं को बदलते समय की तकनीक के साथ आत्मनिर्भर बनाना टीएमयू की प्राथमिकता है। यूनिवर्सिटी में नवाचार और कौशल विकास को विशेष महत्व दिया जा रहा है। उन्होंने कहा, एआई, रोबोटिक्स और उद्योगों की बदलती आवश्यकताओं पर यूनिवर्सिटी की लगातार नजर है। उन्होंने कहा, राष्ट्रीय एवम् अंतर्राष्ट्रीय एमओयू, रैंकिंग, पेटेंट, प्लेसमेंट और इंडस्ट्री कनेक्ट के क्षेत्र में यूनिवर्सिटी ने उल्लेखनीय प्रगति की है। उद्योग जगत के विशेषज्ञ समय-समय पर गेस्ट लेक्चर के लिए यूनिवर्सिटी आते हैं और स्टुडेंट्स को इंडस्ट्री एक्सपोजर प्रदान करने के लिए नियमित औद्योगिक भ्रमण भी कराए जाते हैं। श्री जैन ने कहा कि शैक्षणिक गुणवत्ता ही तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी की सबसे बड़ी पूंजी है।

26वें वर्ष में नई उड़ान

14 सितंबर 2026 को 25 वर्ष पूर्ण कर 26वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी टीएमयू अब अपनी विकास यात्रा के अगले चरण की ओर बढ़ रही है। गुणवत्तापूर्ण एवम् रोजगारपरक शिक्षा, चिकित्सा सेवा, अनुसंधान, नवाचार, उद्यमशीलता, वैश्विक सहयोग, खेल और संस्कारों के समन्वय के संग यूनिवर्सिटी का लक्ष्य स्टुडेंट्स को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना और उन्हें राष्ट्रीय एवम् वैश्विक स्तर पर बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है।

September 13, 2026

हिंदी और एक राजभाषा का प्रश्न

Rajrishi Purushottam Das Tandon

लेख प्रकाशित 13.09.2026, रविवार

सर्वेश कुमार सिंह

भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रवाह हिन्दी में गतिमान है। हिंदी ही भारत की राष्ट्रीय पहचान है। किंतु इसे अभी तक भारत में एकमेव राजभाषा का गौरव नहीं मिल सका है। राजनीतिक तिकड़म और अंग्रेजी प्रेमी नेताओं ने हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी को भी सहायक राजभाषा का दर्जा दिया हुआ है। इसे समाप्त किए जाने की आवश्यकता है तभी हिंदी भारत की अकेली राजभाषा बन सकेगी। वर्ष 1963 का संसद द्वारा पारित विधेयक इस राह का सबसे बड़ा रोड़ा है।

हम हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते हैं। क्योंकि इसी दिन 1949 में संविधान सभा ने लंबी बहस के बाद अनुच्छेद 343 (1) के तहत हिंदी को भारत की राजभाषा स्वीकार किया था। इसमें लिखा गया कि देवनागरी में लिखी गई हिंदी भारत की राजभाषा होगी। इसी उपलक्ष्य में 1953 में पहली बार वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया। तभी से हम हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते हैं।

स्वतंत्र भारत में हिंदी को न्याय और यथोचित स्थान देने की कोशिश हुई, किंतु अंग्रेजी प्रेमी नेतृत्व का विदेशी भाषा से मोह नहीं टूटा। उन्होंने 1950 में ये निर्णय ले लिया कि आगामी 15 वर्ष तक हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी भी सहायक राजभाषा रहेगी। ये 15 वर्ष अंतहीन हो गए हैं और आज तक समाप्त नहीं हुए हैं। परिणाम ये हुआ कि हिंदी की समानांतर राज भाषा बनकर अंग्रेजी ने भारत की राजव्यवस्था से लेकर समस्त शिक्षा व्यवस्था को अपने चंगुल में जकड़ लिया। जब अंग्रेजी के लिए निर्धारित समय सीमा निकट आई तो एक बार फिर हिंदी के साथ छल हुआ। वर्ष 1963 में संसद में विधेयक पारित किया गया कि हिंदी के साथ तब तक अंग्रेजी भी राजभाषा बनी रहेगी जब तक दक्षिण भारत के राज्य हिंदी को राजभाषा मानने पर सहमत ना हो जाएं। ये विधेयक ऐसा बैरियर है जो हिंदी को उसके यथोचित सम्मान की दिशा में प्रगति को बाधित करता है।

उत्तर भारत खासकर उत्तर प्रदेश में हिंदी को राजभाषा से आगे राष्ट्र भाषा का गौरव दिलाने का प्रश्न स्वाभिमान से जुड़ा रहा है। इसी कड़ी में 1910 में राजऋषि पुरुषोत्तम दास टंडन ने हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की। इसमें अनेक हिंदी प्रेमियों ने हिंदी की शाश्वत ज्वाला को प्रज्ज्वलित किया हुआ है। हिंदी को राजभाषा का आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए भी राजऋषि पुरुषोत्तम दास टंडन ने संविधान सभा में लंबी और निर्णायक पैरवी की। प्रखर समाजवादी नेता और चिंतक डॉ राममनोहर लोहिया ने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चलाया। डा लोहिया का कहना था कि लोकभाषा के बगैर लोकराज असंभव है। पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1900 में संयुक्त प्रांत में हिंदी को शासकीय और न्यायालय की भाषा का दर्जा दिलाया। इन प्रयासों से आज हिंदी गौरवान्वित है।

देवनागरी के शासकीय प्रयोग की शताब्दी पर लखनऊ के रवींद्रालय में 18 अप्रैल 2000 को आयोजित समारोह में हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल पंडित विष्णुकांत शास्त्री ने कहा था कि आज अखिल भारतीय स्तर पर अंग्रेजी जीत रही है। भारतीय बाधाएं पिछड़ रही हैं। अंग्रेजी प्रतिष्ठा की प्रतीक बन गई है। उन्होंने कहा कि कोई भी स्वाभिमानी देश अपने देश के बच्चों को विदेशी भाषा में शिक्षा नहीं देता। उन्होंने सुझाव दिया कि हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति बनाई जानी चाहिए और हिंदी का प्रयोग नहीं करने पर दंड की व्यवस्था होनी चाहिए।

हिंदी के विकास को कैसे अवरुद्ध किया गया इस पर प्रख्यात साहित्यकार डॉ विद्यानिवास मिश्र ने एक लेख में अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने रायबरेली में 30 सितंबर से 1 अक्टूबर 2000 तक आयोजित उप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन के अवसर पर एक लेख प्रेषित किया, जिसे आयोजकों ने पत्रक के रूप में प्रकाशित कर वितरित किया। इसमें डॉ मिश्रा ने कहा कि अंग्रेजी को 15 वर्ष से आगे बनाए रखने के लिए हिंदी शब्दावली आयोग बना दिए गए। कहा गया हिंदी को तो अभी बनना है। ये आयोग हिंदी के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए नहीं बने, बल्कि मार्ग के रोड़े बने। ये बहाने बने की हिंदी का निर्माण करना है। तत्कालीन एक मंत्री ने कहा था कि हिंदी तो वन की शकुंतला है, इसे राज दरबार में आना है तो इसे राज दरबार के अनुरूप आना होगा।

आज लगभग 77 साल बाद भी राजभाषा का प्रश्न ज्यों का त्यों है। इसे न तो संसद और न ही राजनीतिक दल तय कर सके हैं। हां समाज और समय ने इसे न्याय देने का प्रयास किया है। समाज ने हिंदी को अपने अंतर्मन में स्थान दिया है, इसे अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाए रखा है। समय ने भी न्याय किया है। कंप्यूटर युग और इसमें भारतीय भाषा टूल यूनिकोड आदि मील के पत्थर साबित हुए हैं। इस प्रयास में भारत सरकार का योगदान रहा और हिन्दी कंप्यूटर की सुगम भाषा बनकर उभरी है।

वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व से अपेक्षा है कि हिंदी को एकमेव राजभाषा का संविधानिक दर्जा प्रदान करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दें।

लेखक परिचय : सर्वेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार लखनऊ

September 11, 2026

भारतीय ज्ञान पंरपराः स्वामी विवेकानन्द और डा मोहन भागवत की समदृष्टि

Swami Vivekanand

लेख पोस्टेड दिनांक 11.09.2026

सर्वेश कुमार सिंह

आज 11 सितम्बर है, शिकागो में  स्वामी विवेकानन्द द्वारा विश्व धर्म सम्मेलन में 1893 को दिये गए ऐतिहासिक भाषण की 133 वीं जयंती। यह भाषण आज भी केवल शिकागो नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व पटल पर भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रतीक स्वर के रूप मे गूंज रहा है। इस भाषण ने विश्व को यह बताया था कि भारत की मूल सोच क्या है, भारत में बन्धुत्व और अपनेपन के तत्व क्या हैं और उनका भारतीय ज्ञान परंपरा में स्रोत क्या है। इस भाषण के ठीक 133 साल बाद एक और संत प्रकृति के भारतीय चिंतक, हिन्दू समाज को सर्वस्व अर्पित कर चुके डा मोहन भागवत ने उक्त पंक्तियों को न्यूयार्क में 29 अगस्त 2026 को दोहराया है। डा भागवत ने भारत के एकत्व (Oneness) दर्शन को 6000 अमेरिकी नागरिकों के सम्मुख प्रस्तुत किया। दोनों के भाषणों में तीन समानताएं हैं, दोनों अमेरिका की धरती पर हुए, दोनों में श्रोताओं की संख्या लगभग समान थी। शिकागो धर्म सम्मेलन में 7000 लोग उपस्थित थे, जबकि न्यूयार्क के सम्मेलन में उपस्थिति 6000 थी। तीसरी समानता यह है कि स्वामी जी के सम्मुख विश्व के सभी धर्मों के प्रमुख वक्ता, दार्शनिक उपस्थित थे, डा मोहन भागवत के सम्मुख विश्व के 30 देशों के 180 धार्मिक नेता उपस्थित थे। संदेश समान-किसी से भेदभाव नहीं, सभी में अपनत्व का दर्शन।

स्वामी जी जिस समय अमेरिका गए थे। उस दौर में भारतीय दर्शन और चिंतन के प्रति विश्व स्तर पर उतनी जागरूकता नहीं थी जितनी आज है। वह युग संचार क्रांति का भी नहीं था। लेकिन, स्वामी जी ने उस समय वह संदेश दे दिया, जिसमें भारत का मूल तत्व समाया हुआ है। स्वामी जी ने अपने भाषण की शुरुआत में ही कहा- मैं आपको भारत की प्रचीन संत परंपरा की ओर से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी (सनातन धर्म) की ओर से धन्यवाद देता हूं। उन्होंने कहा कि मुझे एक ऐसे धर्म से होने पर गर्व है जिसने दुनिया को सहिष्णुता (Tolerance) और सार्वभौमिक स्वीकार्यता (Universal Acceptance) दोनों का पाठ पढाया है। हम केवल सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं करते, बल्कि हम दुनिया के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग के लिए वैविध्य में एकत्व का दर्शन प्रस्तुत किया। गीता का श्लोक और श्रुति के ज्ञान का उल्लेख किया।

DR MOHAN BHAGWAT SRSANGHCHALAK RSS

एकत्व यानि के वननैस का यहीं संदेश लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत न्यूयार्क पहुंचे। उनके भाषण में वही तत्व समाहित हैं जोकि स्वामी विवेकानन्द के भाषण में हैं। न्यूयार्क के मैडिसन स्क्ववायर गार्डन में 29 अगस्त 2026 को अमेरिकन हिन्दूज फार एंगेजमेंट एंड  डायलाग (एहेड फोरम) द्वारा आयोजित यूनिवर्सल वननैस सेलिब्रेशन में डा. मोहन भागवत ने जब संबोधन किया तो लगा एक बार फिर स्वामी विवेकानन्द का प्रकटीकरण हुआ है। उन्होंने उन्हीं शब्दों को दोहराया और वही भाव व्यक्त किया जो स्वामी जी ने 133 साल पहले किया था। डा मोहन भागवत ने कहा कि एक शब्द की प्रायः चर्चा होती है बहुलवाद (Pluralism) वहीं जब हम भारत की बात करते हैं तो एक दूसरा शब्द या वाक्यांश सामने आता है – यूनिटी इन डायवर्सिटी (विविधता में एकता) । उन्होंने कहा कि भारत के लिए एकता और विविधता, दोनों उसके डीएनए में हैं।

भारतीय दृष्टि की चर्चा करते हुए डा भागवत ने कहा कि हर राष्ट्र की एक नियति होती है, जिसे उसे पूरा करना होता है। भारत को जो नियति मिली है, वह है विविधता में एकता के सत्य को साकार करना और समय समय पर पूरी दुनिया को भी इस एकत्व का बोध कराना। उन्होंने आगे कहा कि हम एक हैं और विविधता के कारण हमारी वह एकता और भी सुसज्जित होती है। इसलिए विविधता का उत्सव मनाया जाना चाहिए, उसका सम्मान किया जाना चाहिए और उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। डा भागवत ने कहा कि वह सिद्धांत जो सबको जोडता है, सबको आत्मसात करता है, किसी  प्रकार का विभाजन उत्पन्न नहीं करता , सभी के बीच संतुलन बनाये रखता है और मध्यमार्ग दिखाता है, वही धर्म है।

आज स्वामी विवेकानन्द के शिकागो भाषण की जयंती अवसर पर जहां हमें उस भाषण को पढ़ने, चिंतन और मनने करके आत्मसात करने की आवश्यकता है, वहीं डा मोहन भागवत के न्यूयार्क भाषण को भी पूरा पढने, चिंतन और मनन करने के बाद हिन्दुत्व की मूल भावना और सर्वग्राह्यता के संदेश को समझना आवश्यक है। कुछ लोग डा मोहन भागवत के न्यूयार्क भाषण को पढे बगैर, उसके मूल तत्व को समझे बगैर चर्चा, परिचर्चा और विमर्श कर रहे हैं। उन्हें पहले इसे पूरा पढ़ना चाहिए। इसके बाद सभी तरह के भ्रम समाप्त हो जाएंगे।

लेखक परिचयः स्वतंत्र पत्रकार, राज्य मुख्यालय लखनऊ।

 

August 29, 2026

पुणे विमर्श, राहुल भारत को भी इटली बना देना चाहते हैं!

(राहुल गांधी के भाषण में परिलक्षित इतालवी माचिस्मो, पाश्चात्य अति-व्यक्तिवाद और सांस्कृतिक विखंडन)

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

अभी इसी माह 22 अगस्त को पुणे, महाराष्ट्र में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी द्वारा जनरेशन-जेड की छात्राओं और युवतियों के बीच जिस आक्रामक शैली में “पितृसत्ता को ध्वस्त करने” और महिलाओं को “किसी की संपत्ति न होने” का आह्वान किया, वह पहली नजर में महिलाओं के अधिकारों के प्रति एक प्रगतिशील झुकाव लगता है, परंतु, यदि इस भाषण की वैचारिक परतों, प्रयुक्त शब्दावलियों और इसके पीछे छिपे आर्थिक-सांस्कृतिक दर्शन का गहनता से अध्‍ययन किया जाए, तो इसमें एक गहरा अंतर्विरोध और खतरनाक प्रतिमान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिसका उद्देश्‍य भारत की समाज व्‍यवस्‍था को तोड़ना है।

इसे लेकर आप यह भी कह सकते हैं कि राहुल गांधी का यह भाषण वास्तव में भारत की गौरवशाली और सुरक्षात्मक परिवार व्यवस्था पर पाश्चात्य ‘हाइपर-इंडिविजुअलिज्म’ (अति-व्यक्तिवाद) और ‘बाजारवादी नारीवाद’ को थोपने का एक सुनियोजित प्रयास है। यह विचारधारा स्त्री को उसकी सांस्कृतिक जड़ों, पारिवारिक बंधनों और सामूहिक मर्यादाओं से पूरी तरह काटकर उसे बाजार के लिए एक स्वतंत्र, अकेली और असुरक्षित आर्थिक इकाई में तब्दील करना चाहती है। इसलिए वे भारतीय परिवारों के परस्पर पूरकता के सिद्धांत को ‘शोषक व्यवस्था’ बता रहे हैं।

पुणे में राहुल गांधी ने छात्राओं से कहा कि वे समाज द्वारा तय किए गए बंधनों के खिलाफ “मुखर और निडर” बनें। इस बयान की अंतर्निहित भावना सीधे तौर पर पश्चिमी ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ से प्रेरित है। पारंपरिक मार्क्सवादी दर्शन जहाँ समाज को अमीर और गरीब के आर्थिक संघर्ष में बांटता था, वहीं ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ इसी वर्ग-संघर्ष को परिवार के भीतर पति-पत्नी, पिता-पुत्री और भाई-बहन के पवित्र संबंधों पर लागू कर देता है।

राहुल गांधी ने अपने भाषण में इसी सिद्धांत को हवा दी है, जहाँ उन्होंने परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा दिए जाने वाले पारंपरिक स्नेह और ‘संरक्षण’ को एक ‘दमनकारी सत्ता’ या ‘अधीनता’ के रूप में चित्रित किया। जबकि भारतीय दर्शन के अनुसार, परिवार एक ऐसी जैविक इकाई है जहाँ पुरुष और महिला एक-दूसरे के ‘पूरक’ हैं। पुणे का भाषण इस पूरकता के सिद्धांत पर आघात करता है और युवतियों के मन में यह धारणा पैदा करने की कोशिश करता है कि उनके अपने माता-पिता या परिवार द्वारा लगाई गई नैतिक मर्यादाएं उनके विकास में बाधा हैं। यह सोच अंततः परिवार के भीतर अविश्वास और विखंडन का बीज बोती है।

वस्‍तुत: जब पाश्चात्य ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ के चश्मे से परिवार के स्नेहपूर्ण संरक्षण और नैतिक सीमाओं को ‘बंधक’ या ‘शोषण’ मान लिया जाता है, तो परिवार के भीतर अविश्वास जन्म लेता है। स्वतंत्रता की इस अति-आक्रामक परिभाषा से प्रेरित होकर युवतियां अनजाने में अपने ही माता-पिता, पति या पारिवारिक मूल्यों से विच्छेद (अलग) होने लगती है। इसका तात्कालिक परिणाम यह होता है कि महिलाओं को समाज में सुरक्षा देने वाला सदियों पुराना पारिवारिक ढांचा कमजोर हो जाता है।

भारतीय संस्कृति का विकृतिकरण और बाजार का एजेंडा

राहुल गांधी ने पुणे में जोर देकर कहा, “आप अपने अलावा किसी और की नहीं हैं। आप किसी की संपत्ति नहीं हैं।” यह वाक्य सुनने में आकर्षक लगता है, परंतु यह भारतीय सामाजिक परंपराओं का एक घोर विकृतिकरण है। क्‍योंकि पारंपरिक बंधन में स्त्री को परिवार की धुरी माना गया है। लेकिन जब कोई स्‍त्री परिवार के संबंधों को बंधन मान कर तोड़ देती है ओर अपने परिवार से विच्‍छेद करती है तब वह फिर बाजार के हाथों में खेलने लगती है।

बाजार चाहता है कि स्त्री परिवार की धुरी न रहे, वह बच्चों की परवरिश और घर के बुजुर्गों की देखभाल जैसी “बिना भुगतान वाली” भूमिकाओं को छोड़कर 12 घंटे कॉर्पोरेट दफ्तरों में श्रम करे। इस प्रकार, परिवार से कटी हुई महिला बाजार के लिए एक ‘सस्ती श्रमिक’ और कॉस्मेटिक्स, फैशन व उपभोक्ता वस्तुओं की एक ‘बड़ी खरीदार’ बन जाती है। यह स्त्री की मुक्ति कैसे हो सकती है, यह तो उसका बाजारवादी कहीं दोहन तो कहीं शोषण है!

दूसरी ओर भारतीय संस्कृति है, जिसमें कभी भी स्त्री को ‘पुरुष की कानूनी संपत्ति’ नहीं माना गया। सनातन परंपरा में स्त्री को ‘गृहलक्ष्मी’, ‘अर्धांगिनी’ और ‘शक्ति’ का सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जब राहुल गांधी इस व्यवस्था को ‘संपत्ति की मानसिकता’ कहते हैं, तो वे वास्तव में पाश्चात्य और मध्यकालीन यूरोपीय इतिहास की बुराइयों को भारतीय समाज पर थोप रहे होते हैं, क्योंकि यूरोप के रोमन कानून में महिलाओं को सचमुच पुरुष की कानूनी संपत्ति माना जाता था और बहुत हद तक आज भी माना जाता है, (कैथोलिक इटली, जहां से इनकी मां हैं आज भी आसानी से देखा जा सकता है)

सोनिया गांधी की इतालवी विरासत: ‘माचिस्मो’ का अहंकार और दोहरा मापदंड

यह अत्यंत विचारणीय तथ्य है कि राहुल गांधी भारत की जिस पितृसत्ता को ध्वस्त करने की बात पुणे के मंच से कर रहे थे, उसका वास्तविक और कठोर रूप उनकी अपनी माता सोनिया गांधी के मूल देश इटली में आज भी सांख्यिकीय रूप से मौजूद है। परंतु, राहुल गांधी ने कभी भी इतालवी समाज या कैथोलिक ईसाई पंथ के भीतर मौजूद महिला दमन पर कोई टिप्पणी नहीं की, जो उनके पुरुष अहंकार और राजनीतिक चयनात्मकता को उजागर करता है।

इतालवी सांख्यिकी संस्थान (आईएसटीएटी) और यूरोपीय संघ के वर्ष 2025-2026 के आंकड़ों के अनुसार, इटली में आज भी 43 फीसद महिलाएँ कार्यबल से पूरी तरह बाहर हैं, इटली में जेंडर पे गैप 17.4 प्रतिशत तक है, जहाँ एक ही पद पर काम करने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों से कम वेतन मिलता है। इटली में तलाक की दर लगभग 48.3 फीसद है, जो यह दर्शाती है कि जिस पाश्चात्य ‘बाजारवादी मुक्ति’ और अति-व्यक्तिवाद का मॉडल राहुल गांधी भारत में लाना चाहते हैं, उसने इटली के पारिवारिक ताने-बाने को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। क्या राहुल गांधी पुणे की युवतियों को ऐसा समाज देना चाहते हैं जहाँ हर दूसरा परिवार टूटा हुआ हो और महिलाएँ अकेलेपन व मानसिक तनाव से जूझ रही हों?

भारत बनाम इटली में महिला सुरक्षा का यथार्थ

पुणे के भाषण में राहुल गांधी ने भारत की सामाजिक व्यवस्था को महिलाओं के लिए एक दमनकारी संरचना के रूप में पेश किया। परंतु, यदि हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जनसंख्या के अनुपात (प्रति लाख आबादी पर दर) के आधार पर भारत और इटली की तुलना करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पश्चिमी देशों का सामाजिक ढांचा महिलाओं के लिए कहीं अधिक असुरक्षित और हिंसक है।

विश्‍व सांख्यिकी (जैसे संयुक्त राष्ट्र यूएनओडीसी, यूरोपीय संघ की एफआरए 2026 रिपोर्ट और भारत की एनसीआरबी 2024–2026 रिपोर्ट) के अनुसार भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध की राष्ट्रीय दर 64.6 मामले प्रति एक लाख महिला जनसंख्‍या पर हैं। दूसरी ओर यूरोपीय संघ (ईयू) के देशों में जनसंख्या के अनुपात में वार्षिक दर्ज अपराधों की औसत दर लगभग 125 मामले प्रति एक लाख महिला जनसंख्‍या है। यह दर भारत से कहीं अधिक है। यानी यौन हिंसा, अन्‍य जितने भी महिला उत्‍पीड़न एवं हिंसा के प्रकार हो सकते हैं, युरोप उन सभी अपराध मामलों में भारत से कई गुना आगे है। पाश्चात्य समाज में महिलाओं के खिलाफ घरेलू और यौन हिंसा का प्रतिशत अधिक है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत की पारंपरिक परिवार व्यवस्था, जिसे राहुल गांधी पुणे में कोस रहे थे, वास्तव में महिलाओं को एक अत्यंत मजबूत सुरक्षात्मक कवच प्रदान करती है।

राहुल गांधी का वैचारिक खोखलापन

पुणे के भाषण में राहुल गांधी ने एक बार फिर पारंपरिक हिंदू व्यवस्था और प्राचीन ग्रंथों को निशाने पर लिया, परन्‍तु वे भारत और दुनिया भर में इस्लाम और ईसाइयत के भीतर मौजूद संस्थागत महिला दमन पर पूरी तरह मौन रहे। यह चुप्पी सिद्ध करती है कि उनका यह विमर्श सिर्फ राजनैतिक ध्रुवीकरण के लिए था।

यदि राहुल गांधी महिलाओं की पूर्ण स्वतंत्रता के इतने ही बड़े पक्षधर हैं, तो वे मुस्लिम महिलाओं को शरिया कानून के तहत पैतृक संपत्ति में मिलने वाले असमान अधिकारों और बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं पर पुणे में क्यों नहीं बोले? जब भारत की संसद ने मुस्लिम महिलाओं को नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए ‘तीन तलाक’ के खिलाफ कानून बनाया, तो राहुल गांधी और उनकी पार्टी ने उसके खिलाफ मतदान क्‍यों किया । अरे, इतिहास में जाएं तो उनके पिता राजीव गांधी ने भी शाहबानों प्रकरण में यही किया था!

इसी तरह, वेटिकन और कैथोलिक चर्च के वे नियम जो महिलाओं को आज भी पादरी बनने के अधिकार से वंचित करते हैं और गर्भपात जैसी आपातकालीन चिकित्सा स्थितियों पर पूर्ण रिलीजियस प्रतिबंध लगाते हैं, सच कहें तो उन पर राहुल गांधी की चुप्पी उनके वैचारिक दोहरे मापदंड को उजागर करती है। यह चयनात्मकता दर्शाती है कि वे सिर्फ और सिर्फ हिंदू महिलाओं को उनकी सामाजिक परंपराओं से अलग करना चाहते हैं।

ऐसे में कहना यही होगा कि पुणे में राहुल गांधी द्वारा दिया गया भाषण भारतीय सामाजिक मूल्यों को नष्ट करके एक विघटनकारी पाश्चात्य बाजारवादी मॉडल को स्थापित करने का प्रयास है। स्त्री को उसके परिवार से पूरी तरह मुक्त कर देने का नारा सुनने में तो आकर्षक हो सकता है, पर इसका अंतिम परिणाम समाज का विखंडन, अकेलेपन का संकट और महिलाओं की सुरक्षात्मक प्रणाली का ध्वस्त होना है, जैसा कि इटली और अन्य यूरोपीय देशों के आंकड़े साबित करते हैं। लगता भी यही है कि राहुल गांधी भारत को भी अपनी मां के देश इटली जैसा बना देना चाहते हैं, जिसमें स्‍त्री हिंसा और दमन अपने चरम पर है।

August 23, 2026

वन्देमातरम् को लेकर संग्राम क्यों?

Vandematram
क्या कांग्रेस जिन्ना के मार्ग पर जा रही है?
सुरेश हिंदुस्तानी
वन्देमातरम आज विवाद का विषय बना दिया है। जबकि यह सत्य है कि जब बंकिम बाबू ने इसकी रचना की थी, तब उनके मन में किसी के मन को आहत करने का कोई विचार नहीं था। उनका भाव केवल मातृभूमि के वंदन का था। देश में वन्देमातरम के अंतिम दो भाग का पहली बार विरोध विभाजन की मानसिकता रखने वाले मोहम्मद अली जिन्ना ने किया। आज उसी मार्ग पर कांग्रेस कदम बढ़ाती दिख रही है। यह बात सही है कि देश का सम्मान करने वाली किसी भी बात पर राजनीति नहीं होना चाहिए, लेकिन केवल वोट की चाहत के चलते ऐसा करना और भी खतरनाक हो जाता है।
वन्दे मातरम् भारत की स्वतंत्रता चेतना, मातृभूमि के प्रति समर्पण और राष्ट्रीय स्वाभिमान का ऐसा उद्घोष है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में असंख्य भारतीयों के भीतर देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित की। यही कारण है कि आज जब वन्दे मातरम् के पूर्ण या आंशिक गायन को लेकर राजनीतिक बहस खड़ी होती है, तो प्रश्न केवल गीत की पंक्तियों का नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक दृष्टिकोण का भी बन जाता है।
आज सवाल यह है कि वन्दे मातरम् पर संग्राम क्यों? कांग्रेस की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि 1937 में इसके दो पदों के गायन को लेकर निर्णय हुआ था, इसलिए उसी परंपरा का पालन होना चाहिए। लेकिन 1937 की परिस्थितियों को 2026 के भारत पर उसी रूप में लागू करना कितना उचित है, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। 1937 में भारत स्वतंत्र नहीं था। अंग्रेजी शासन था, साम्प्रदायिक तनाव थे और देश की राजनीतिक परिस्थितियां अत्यंत जटिल थीं। कांग्रेस उस समय आज की तरह सत्ता प्राप्त करने वाला चुनावी राजनीतिक दल नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख राजनीतिक मंच थी। जिसमें सभी देश भक्त शामिल थे। आज की कांग्रेस उससे अलग है। वन्दे मातरम् को लेकर कांग्रेस के भीतर भी यह चर्चा हुई कि इसके कुछ अंशों को लेकर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग की आपत्तियों को कैसे देखा जाए। ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में इस विषय पर विचार किया था और सार्वजनिक अवसरों पर पहले दो पदों के प्रयोग की व्यवस्था बनी।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उस समय की राजनीतिक परिस्थिति आज के स्वतंत्र भारत के लिए भी अंतिम मानक होनी चाहिए?
भारत आज एक संप्रभु गणराज्य है। संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को वन्दे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान सम्मान देने की व्यवस्था की थी। वन्दे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है। इसलिए इसे केवल कांग्रेस, भाजपा या किसी अन्य राजनीतिक दल के चश्मे से देखना उचित नहीं है। यहां यह सवाल भी उठता है कि जब यह राष्ट्र गीत है, तब इसे लेकर अराष्ट्रीय कार्य करने की राजनीति क्यों की जा रही है। यह आत्म मंथन का विषय हो सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना भी आवश्यक है। वन्दे मातरम् संविधान के मूल पाठ में लिखकर नागरिकों के लिए अनिवार्य गायन के रूप में शामिल नहीं था। लेकिन चूँकि वन्देमातरम गाने को लेकर क़ानून बन गया है, तब सभी को इसका पालन करना ही चाहिए, कांग्रेस को भी। आज अगर कांग्रेस इसका विरोध करती है, तो इसे संविधान का अपमान ही कहा जाना उचित होगा। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गीत को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं और इसके पूर्ण छह अंतरे वाले संस्करण को सार्वजनिक प्रसारण में बढ़ावा दिया गया है। जुलाई 2026 में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण कानून में संशोधन का प्रस्ताव भी लाया गया, जिसमें राष्ट्रीय गीत को जानबूझकर रोकने या उसके गायन में व्यवधान डालने के विरुद्ध कानूनी संरक्षण देने की बात है। इसलिए बहस को तथ्यों के आधार पर ही आगे बढ़ाना चाहिए।
वन्दे मातरम् की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी पहचान किसी एक राजनीतिक दल से नहीं जुड़ी। कांग्रेस के अधिवेशनों में इसका गायन हुआ। 1896 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया था। स्वतंत्रता आंदोलन में यह अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना। ऐसे में यह कहना कि वन्दे मातरम् भाजपा की देन है, इतिहास के साथ अन्याय होगा। भाजपा तो स्वतंत्रता के बाद बनी; वन्दे मातरम् उससे बहुत पहले भारतीय राष्ट्रचेतना का हिस्सा बन चुका था। फिर वही प्रश्न उठता है कि आज इसके दो पदों या पूरे गीत को लेकर इतना राजनीतिक संघर्ष क्यों? क्या इसके पीछे वोट बैंक की राजनीति है? इस प्रश्न का उत्तर किसी एक दल के बारे में निश्चित रूप से देना उचित नहीं होगा, क्योंकि राजनीतिक मंशा का प्रमाण तथ्यों से ही स्थापित किया जा सकता है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जब राष्ट्रीय प्रतीकों को बार-बार चुनावी गणित से जोड़ दिया जाता है, तब राष्ट्रहित पीछे और राजनीतिक हित आगे दिखाई देने लगता है। वन्दे मातरम् का सम्मान करना किसी धर्म विशेष का समर्थन करना नहीं है। यह मातृभूमि के प्रति सम्मान और स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति से जुड़ा राष्ट्रीय भाव है।
भारत की शक्ति ही उसकी विविधता है। यहां पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, भाषाएं अलग हो सकती हैं, पर मातृभूमि के प्रति सम्मान का भाव साझा हो सकता है। इसलिए वन्दे मातरम् को हिन्दू बनाम मुस्लिम विवाद में बदल देना उसके ऐतिहासिक और राष्ट्रीय स्वरूप को छोटा करना है।
कांग्रेस के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है। यदि 1937 के निर्णय को आज भी राजनीतिक ढाल बनाया जाएगा, तो यह प्रश्न उठेगा कि क्या स्वतंत्र भारत की परिस्थितियों में भी वही दृष्टिकोण अपरिवर्तित रहना चाहिए? और यदि कांग्रेस स्वयं वन्दे मातरम् के इतिहास की भागीदार रही है, तो उसे इस गीत को लेकर अस्पष्टता के बजाय स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टिकोण सामने रखना चाहिए। इसी प्रकार सत्ता पक्ष को भी यह ध्यान रखना होगा कि राष्ट्रभक्ति किसी पर थोपी जाने वाली भावना नहीं है। राष्ट्रगीत का सम्मान बढ़े, उसके इतिहास को नई पीढ़ी जाने और उसके प्रति स्वाभाविक श्रद्धा विकसित हो, यह अधिक स्थायी रास्ता है। कानून और राजनीतिक आह्वान अपनी जगह हैं, लेकिन राष्ट्रभाव अंततः मन से पैदा होता है।
वन्दे मातरम् को राजनीति के अखाड़े से निकालकर राष्ट्रचेतना के केंद्र में स्थापित करने की आवश्यकता है। इसे कांग्रेस बनाम भाजपा का विषय बनाना भी गलत है और हिन्दू बनाम मुस्लिम का विषय बनाना भी। यह भारत की स्वतंत्रता यात्रा का अमूल्य अध्याय है।
कांग्रेस को अपने राजनीतिक उत्थान से आगे बढ़कर देश के उत्थान के बारे में सोचना चाहिए। वन्दे मातरम् किसी दल की संपत्ति नहीं, भारत की राष्ट्रीय विरासत है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पूछें
जब इसके शब्दों में मातृभूमि के प्रति वंदन है, इसके इतिहास में स्वतंत्रता का संघर्ष है और इसकी स्मृति में असंख्य देशभक्तों का त्याग है, तब इसे विवाद का नहीं, संवाद का विषय बनाया जाना चाहिए। राजनीति अपनी जगह रहे, लेकिन राष्ट्र सबसे ऊपर रहे। वन्दे मातरम् केवल गाया न जाए, उसकी भावना को जीवन में उतारा जाए। यही भारत के प्रति सच्ची वंदना होगी।
Suresh Hindustani Journalist

सुरेश हिन्दुस्तानी वरिष्ठ पत्रकार

सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
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