विजयादशमी उद्बोधन में सरसंघचालक ने पंच परिवर्तन और राष्ट्रीय एकता पर दिया विशेष बल
( हेमेन्द्र क्षीरसागर पत्रकार, लेखक एवं स्तंभकार )
नागपुर में 20 अक्टूबर 2026, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी उत्सव पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का उद्बोधन भारतीय समाज के आत्मबोध, सांस्कृतिक अस्मिता, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता पर केंद्रित रहा। संघ की शताब्दी के कार्यक्रमों के समापन अवसर पर उन्होंने स्पष्ट किया कि सशक्त, आत्मनिर्भर और विश्वकल्याण के लिए प्रतिबद्ध भारत का निर्माण केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और चारित्रिक उत्थान से संभव है।
हम भारत के लोग
सरसंघचालक के उद्बोधन का मूल स्वर अपनी सभ्यतागत पहचान को समझने और उसे समकालीन जीवन में उतारने का रहा। भारत की विविधता को कमजोरी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संपन्नता मानते हुए उन्होंने उस एकात्म भाव को मजबूत करने की आवश्यकता बताई। जो विभिन्न मत-पंथों, भाषाओं, जातियों और प्रादेशिक पहचानों के बावजूद नागरिकों को एक सूत्र में बांधता है। संविधान की भावना के अनुरूप ‘हम भारत के लोग’ का बोध तभी सार्थक होगा। जब समान राष्ट्रीय हित, पारस्परिक सम्मान और कर्तव्यनिष्ठा हमारे व्यवहार में दिखाई दें।
प्रतिबद्धता का संदेश
संत रविदास जी के 650वें जयंती वर्ष का संदर्भ इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उनका जीवन श्रम की प्रतिष्ठा, भक्ति, स्वधर्मनिष्ठा और सामाजिक समरसता की प्रेरणा देता है। स्वामी श्रद्धानंद और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जैसे महापुरुषों का स्मरण भी त्याग, सेवा और सांस्कृतिक चेतना के प्रति प्रतिबद्धता का संदेश देता है।
दैनिक आचरण का हिस्सा
संघ के शताब्दी वर्ष में रेखांकित पंच परिवर्तन सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वबोध एवं स्वदेशी तथा नागरिक अनुशासन को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने सामाजिक जीवन की दिशा बदलने वाला व्यापक अभियान बताया। इनका वास्तविक महत्व तभी है, जब वे नारों और आयोजनों तक सीमित न रहकर दैनिक आचरण का हिस्सा बनें। परिवार में संस्कार, समाज में समानता, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता। स्वदेशी के प्रति आग्रह और नागरिक कर्तव्यों का पालन राष्ट्रनिर्माण की आधारशिलाएं हैं।
विकास का प्रतिमान
विज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रगति को स्वीकार करते हुए उद्बोधन में सरसंघचालक ने उनके विवेकपूर्ण उपयोग पर बल दिया। तकनीक अपने आप में समाधान नहीं, उसका परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य और नैतिक दृष्टि से किया जाता है। डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध सामग्री, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति और नई पीढ़ी के सामने उपस्थित चुनौतियों के संदर्भ में परिवार, समाज और शासन की साझा जिम्मेदारी रेखांकित की। विकास का प्रतिमान ऐसा होना चाहिए, जिसमें आर्थिक समृद्धि के साथ पर्यावरणीय संतुलन, मानवीय गरिमा और सामाजिक उत्तरदायित्व भी सुरक्षित रहें।
सद्भाव, संवाद और नागरिक मर्यादा
डॉ. मोहन भागवत के उद्बोधन का महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक तनावों और आंदोलनों के प्रति विवेकपूर्ण दृष्टिकोण रहा। समस्याओं के समाधान के लिए संवाद, जनसहभागिता और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन आवश्यक है। मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, किंतु उन्हें मनभेद, द्वेष और सामाजिक विभाजन में बदलने से रोकना सभी की जिम्मेदारी है। शासन-प्रशासन, राजनीतिक नेतृत्व और समाज के प्रत्येक वर्ग से अपेक्षा है कि व्यवहार में संवेदनशीलता, शालीनता और नागरिक सम्मान बना रहे। ग्रामीण विद्यालयों और ग्राम विकास में जनसहभागिता के उदाहरण बताते हैं कि सामाजिक समस्याओं का समाधान केवल सरकारी प्रयासों या आंदोलनों पर निर्भर नहीं रह सकता। समाज की सक्रिय भागीदारी, सहयोग और स्वावलंबन स्थायी परिवर्तन की राह खोलते हैं।
एकता ही राष्ट्रशक्ति
वंदे मातरम् के ऐतिहासिक संदर्भ के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और मातृभूमि के प्रति समर्पण का संदेश सामने आया। इतिहास से सीखना आवश्यक है, लेकिन अतीत की कटुता को वर्तमान के सामाजिक संबंधों पर हावी होने देना उचित नहीं। भारत की शक्ति उसकी विविधताओं के बीच आत्मीयता, साझा विरासत और परस्पर सम्मान बनाए रखने में निहित है।
विश्वकल्याण में योगदान
समग्रतः सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का विजयादशमी का यह उद्बोधन राष्ट्रनिर्माण को शासन की जिम्मेदारी भर नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक संकल्प के रूप में देखने की प्रेरणा देता है। भारत को समर्थ और विश्वकल्याण में योगदान देने वाला राष्ट्र बनाने के लिए सांस्कृतिक आत्मबोध के साथ वैज्ञानिक दृष्टि, सामाजिक समरसता, नागरिक अनुशासन और मानवीय संवेदना का समन्वय आवश्यक है। वास्तविक विजय तभी होगी, जब राष्ट्रीय एकता केवल विचार न रहकर प्रत्येक नागरिक के आचरण में प्रतिबिंबित हो।
