Web News

www.upwebnews.com

UP Politics: पीडीए फार्मूले को चुनौती देने की बीजेपी की कोशिश

May 11, 2026

UP Politics: पीडीए फार्मूले को चुनौती देने की बीजेपी की कोशिश

Posted on 11.05.2026 , Time 02.33 PM, Monday, Article by Ratibhan Tripathi, Senior Journalist, Lucknow

पिछड़ों और दलितों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया गया, ब्राह्मण चेहरा भी शामिल कर ब्राह्मणों की कथित नाराजगी खत्म करने की दिशा में कदम

रतिभान त्रिपाठी
लखनऊ : देश के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में से तीन में अपनी जीत का परचम लहराने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश का रुख किया है, जहां अगले साल फरवरी महीने में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। रविवार को योगी सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार उसी रणनीति के तहत पहला कदम है जिसमें जरूरत के हिसाब से जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश की गई है। प्रदेश में भाजपा की मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी ने पीडीए फार्मूले का ढोल पहले से ही पीट रखा है। ताज़ा मंत्रिमंडल विस्तार उसी पीडीए फार्मूले को चुनौती देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
मंत्रिमंडल में उन जातियों को शामिल किया गया है जिनका प्रतिनिधित्व सरकार में कम माना जा रहा था। जैसे फतेहपुर से कृष्णा पासवान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से सुरेंद्र दिलेर को मंत्री बनाकर मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों का प्रतिनिधित्व सरकार में बढ़ाया गया तो भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को कैबिनेट मंत्री बनाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी के जाट चेहरे को महत्व दिया गया है। कृष्णा पासवान को मंत्री बनाकर केवल दलित समुदाय को ही नहीं महिलाओं की ओर से भी प्रतिनिधित्व दिया गया है।
ऐसे ही कैलाश सिंह राजपूत और हंसराज विश्वकर्मा को मंत्री बनाकर लोध और लोहार समाज को सरकार में महत्व देने की कोशिश की गई है। कैलाश राजपूत कन्नौज से आते हैं, जो अखिलेश यादव का लोकसभा क्षेत्र है। वहां से असीम अरुण दलित समाज से पहले से ही मंत्री हैं। अब लोध समाज के कैलाश राजपूत को मंत्री बनाकर पीडी फार्मूला स्पष्ट कर दिया है। वाराणसी क्षेत्र के हंसराज विश्वकर्मा को मंत्री बनाने से पूर्वांचल में उपरोक्त समुदाय के बीच एक अच्छा संदेश देने की कोशिश की गई है।
सपा के पीडीए में से भाजपा ने सरकार में पीडी को तो खूब महत्व दे रखा है, आखिरी अक्षर ए के हिस्से में सिर्फ एक मंत्री हैं दानिश अंसारी और भाजपा को मुस्लिम समाज को सरकार में इससे ज्यादा प्रतिनिधित्व देना भी नहीं है क्योंकि मुस्लिम समाज भाजपा को वोट तो देता ही नहीं, बल्कि चुनाव में खुलकर मुखालिफत करता है। अल्पसंख्यकों में से सिख कोटे से एक मंत्री बलदेव सिंह औलख पहले से ही हैं। वह भी दलित समुदाय से आते हैं। ऐसे में वह दलितों और अल्पसंख्यकों की एक साथ अगुवाई करते हैं। चूंकि 2027 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव पीडीए पीडीए चिल्ला रहे हैं, ऐसे में भाजपा इन समुदायों के बीच यह बताने में पीछे नहीं रहेगी कि उसकी सरकार में इन समुदायों को भरपूर महत्व दिया गया है।
गौरतलब है कि भाजपा की सरकार बनाने में गैर यादव पिछड़ों की अच्छी खासी भूमिका होती है इसलिए मौजूदा सरकार में उनकी भागीदारी अधिक बढ़ाकर पार्टी अगला चुनाव आसान बनाने में लगी हुई है।  इधर रायबरेली के ऊंचाहार से समाजवादी पार्टी से भाजपा में आए मनोज कुमार पाण्डेय को सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। जिस समय मनोज पाण्डेय ने सपा छोड़ी थी, उस समय उन्होंने अखिलेश यादव पर आरोप लगाया था कि वह न केवल राममंदिर मुद्दे पर हिंदुत्व के विरुद्ध काम कर‌ रहे हैं बल्कि स्वामी प्रसाद मौर्य के जरिए ब्राह्मणों को अपमानित करवा रहे हैं। इस बीच सरकार और भाजपा से ब्राह्मणों की कुछ नाराजगी की बात भी उभरकर सामने आने लगी थी तो मनोज पाण्डेय को मंत्रिमंडल में जगह देना असंतोष को कुछ हद तक दबाने की दिशा में कोशिश के रूप में माना जा रहा है। दो मंत्रियों का प्रमोशन करके उन्हें राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाया गया है। अब देखना है कि इस विस्तार और प्रतिनिधित्व का निकट भविष्य में कैसा प्रभाव होता है।

Ratibhan Tripathi Senior Journalist

May 6, 2026

विधान सभा चुनाव: संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ता विपक्ष

Logo Election 2026
Article Posted on 06 May 2026, Wednesday, Time 06.12 PM, Writer Suresh Hindustani
विपक्ष : मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू

The picture that has emerged after the assembly elections in five states, including West Bengal, is one of bitterness and sweetness. While the political parties in the opposition are tasting the sweetness of the mind-boggling results in Tamil Nadu and Kerala, all the opposition parties are doing the unconstitutional act of publicising the West Bengal election result as a BJP-sponsored victory. The biggest thing is that Trinamool Congress leader Mamata Banerjee has been given a mandate by the public to sit in the opposition this time, but Mamata Banerjee is not able to make up her mind to accept defeat in the style of clinging to the chair.

सुरेश हिंदुस्तानी
पश्चिम बंगाल के साथ पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के पश्चात् जो तस्वीर निर्मित हुई है, वह कड़वाहट और मिठास दोनों का ही स्वाद दे रही है। विपक्ष के राजनीतिक दल जहाँ एक ओर तमिलनाडु और केरल के मनमाफिक परिणाम देखकर मिठास का स्वाद ले रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम को सभी विपक्षी दल भाजपा की प्रायोजित जीत के रूप में प्रचारित करने का असंवैधानिक कार्य कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी को इस बार जनता ने विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है, लेकिन ममता बनर्जी कुर्सी से चिपके रहने के अंदाज में पराजय को स्वीकार करने का मानस नहीं बना पा रही हैं। लोकतान्त्रिक मर्यादा के तहत उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी का त्याग करना चाहिए। लेकिन ममता बनर्जी ऐसा न करके एक प्रकार से लोक के निर्णय को ठेंगा दिखाने का कार्य कर रही हैं। खास बात यह है कि विपक्ष के कुछ अन्य दल भी तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के इस कदम का समर्थन करती हुई लग रही हैं। लोकतंत्र में विरोध करने का सभी को अधिकार है, लेकिन यह विरोध संवैधानिक मर्यादायों के तहत ही होना चाहिए।
देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है, ज़ब चुनाव में पराजित हो जाने के बाद मुख्यमंत्री अपना त्याग पत्र देने से मना कर रहा है, ममता बनर्जी का यह रवैया निश्चित ही जनमत के साथ विश्वासघात ही कहा जाएगा। लोकतंत्र का असली आशय यही होता है कि जनता अपने बीच में से अपने प्रतिनिधि चुनकर अपनी सरकार बनाती है। जनता ने जनादेश दे दिया है। विपक्ष को भी यह स्वीकार करना चाहिए। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम यह संदेश प्रवाहित कर रहे हैं कि अब देश में तुष्टिकरण के दिन ख़त्म हो गए हैं। जनता भी ऐसा ही चाहती है। मजेदार तथ्य यह है कि बंगाल के चुनाव के साथ ही पांच राज्य असम, केरल, तमिलनाडु और पंडिचेरी में भी चुनाव हुए असम को छोड़ दिया जाए तो सभी राज्यों में परिणाम सत्ता के विरोध में ही आए, लेकिन सवाल यह है कि इन राज्यों के परिणाम पर कोई आरोप नहीं लगा रहा। इसके पीछे यही कारण माना जा रहा कि वहां भाजपा नहीं जीती। भाजपा की जीतना विपक्ष को कभी नहीं पचा। विपक्ष का व्यवहार ऐसा होता जा रहा है जैसे ये केवल सत्ता के लिए ही बने हैं। चुनाव में जय पराजय होती ही है, केवल एक को ही विजय मिलती है।
पश्चिम बंगाल के बारे में यह सभी जानते हैं कि ममता सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार चरम पर था। जनता भी इस भ्रष्टाचार से त्रस्त रही और प्रशासनिक अधिकारी भी। इसी के चलते तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के विरोध में एक राजनीतिक हवा बनी। भाजपा ने अपने प्रचार के दौरान ममता के भ्रष्टाचार को लेकर जमकर हमला बोला। इसके विपरीत विपक्ष के अन्य दल भी इन मुद्दों पर मुखर रहे। कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से ममता को निशाने पर लिया। इसका आशय स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार के विरोध में लहर थी। दूसरी एक और प्रमुख बात यह भी है कि पश्चिम बंगाल में पिछले जितने भी चुनाव हुए, उनमें हिंसा के माध्यम से मतदाताओं को भयभीत करने का काम भी खुलेआम हुआ। ऐसा कोई भी चुनाव नहीं हुआ, जिसे हिंसा मुक्त कहा जा सकता हो। इस बार के विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने हिंसा मुक्त चुनाव करके दिखा दिया। इसी कारण आम मतदाता बिना किसी भय के मतदान केंद्र तक पहुँचने में सफल हुआ। इसी ने भाजपा की राह आसान की।
पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत का एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है कि वहां की मतदाता सूची से फर्जी नाम विलोपित किए गए। इन नामों में कई तो ऐसे थे, जो इस दुनिया में नहीं हैं। हालांकि यह एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है, इसलिए इसे खास मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। प्रति वर्ष मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने का क्रम चलता है। बंगाल का मामला बांग्लादेशी घुसपैठियों से जुडा था, इसलिए वहां एसआईआर जरुरी था। इससे जहाँ विदेशी मतदाता चुनाव में वोट का प्रयोग करने से वंचित हो गया, वहीं ऐसे मतदाता भी चुनाव में हिस्सा नहीं ले सके, जो फर्जी थे। उल्लेखनीय है कि पूर्व के चुनाव में यह वोट भी उपयोग में आते थे, इनके वोट कैसे पड़ते थे और कौन उंगली से बटन दबाता था, इसमें भले ही संदेह हो, लेकिन इसका आरोप तृणमूल के कार्यकर्ताओं पर ही लगते थे। इसी हिंसा को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने सुरक्षा बलों की तैनाती कराई। सुरक्षा बल केवल नागरिक सुरक्षा एवं भय मुक्त मतदान के लिए ही लगाया, लेकिन ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सहित विपक्ष के कई राजनीतिक दलों ने उनकी निष्ठा पर ही सवाल उठा दिए।
पश्चिम बंगाल के इस बार के चुनाव में ऐसे कई कारण रहे जो भाजपा की जीत और तृणमूल कांग्रेस की हार में काफी प्रभावी रहे। उसमें तृणमूल सरकार विरोधी लहर तो थी ही, साथ ही जो मुस्लिम वोट पूरा का पूरा तृणमूल को मिलता था, इस बार नहीं मिल सका। उसके पीछे मुसलमान नेताओं की सक्रियता रही। इस चुनाव में एक ओर ओवैसी की पार्टी मैदान में थी, वहीं हुमायूं कबीर ने एक नई पार्टी बनाकर ममता की परेशानी में बढ़ोत्तरी की। इस कारण मुसलमान वर्ग के वोट निश्चित ही विभाजित हो गए। इसके साथ ही राज्य का हिन्दू मतदाता कुछ ज्यादा सक्रियता के साथ मैदान में उतर आया। यह मतदाता निश्चित ही भाजपा के पक्ष में गया। इसलिए विपक्ष की ओर से यह कहना कि एसआईआर के कारण या चुनाव आयोग द्वारा भाजपा का साथ देने के आरोप प्रथम दृष्टि में ही तर्कहीन से लगते हैं। अब ममता बनर्जी को अपनी हार की समीक्षा करनी ही चाहिए, जो कमियां रही, उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
चुनाव परिणाम के बाद आरोप प्रत्यारोप का खेल जारी है। इसमें विपक्ष बिना प्रमाण के भाजपा और चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहा है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा विरोधी अन्य राजनीतिक दल जिस प्रकार के आरोप लगा रहे हैं, वह केवल जुबानी ही हैं। उसके पुख्ता प्रमाण किसी के पास नहीं हैं। ऐसी राजनीति न तो लोकतंत्र को सुरक्षित रख सकती है और न ही देश का भला कर सकती है। विपक्ष को सच को स्वीकार करने की मानसिकता बनानी होगी। हर बात के लिए नकारात्मक राय रखना विपक्ष की मजबूरी हो सकती है, लेकिन इसे स्वस्थ लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। जो अच्छा है उसे अच्छा कहना ही होगा। क्योंकि जनता जिस सच के साथ रहती है, विपक्ष को भी उसी सच के साथ ही चलना होगा। विपक्ष को यह भी समझना चाहिए कि आज देश का वातावरण परिवर्तित हो चुका है या हो रहा है। विपक्ष निश्चित रूप से सरकार पर आरोप लगाए, लेकिन जन भावना का अनादर करने से बचना होगा, नहीं तो जैसा पश्चिम बंगाल का परिणाम आया, वैसा अन्य राज्यों का भी आ सकता है।
सुरेश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
103 अग्रवाल अपार्टमेंट
कैलाश टॉकीज के पास, नई सड़क
लश्कर ग्वालियर मध्यप्रदेश
पिन : 474001
मोबाइल : 9425101815

श्रद्धा-स्मरण / स्व. पूरन चंद्र जोशी

PC Joshi Prayagraj

राजनीतिक रुतबेबाजी से अलहदा एक सरल और संवेदनशील इंसान
-रतिभान त्रिपाठी
एक हैंडसम पर्सनालिटी, एक क्वालीफाइड इंजीनियर और फिर बिजनेसमैन, एक मुख्यमंत्री के दामाद, एक स्वतंत्रता सेनानी व सांसद सास के लाड़ले दामाद, एक मुख्यमंत्री व वरिष्ठ नेता के बहनोई और एक प्रोफेसर व मंत्री के पति, लेकिन न कोई घमंड, न कोई हनक दिखाने की मंशा। जबरदस्त जलवे के बावजूद रुतबेबाजी से कोसों दूर थे पूरन चंद्र जोशी। घर राजनीतिक कार्यकर्ताओं से भरा रहता लेकिन जोशी जी सबसे बड़ी सरलता से मिलते। उनसे कोई राजनीतिक चर्चा कर दे तो भले ही कोई शालीन जवाब दे देते लेकिन वह कोई शेखी बघारें, यह उनके स्वभाव में नहीं था।
बात हो रही है प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी के पति पूरन चंद्र जोशी जी की जिन्हें पूरा प्रयागराज पीसी जोशी के नाम से जानता है। आज उनके महाप्रयाण की दुखदाई खबर आई तो मन बहुत व्यथित हो गया। चार पांच दिन पहले अस्वस्थ हुए तो उन्हें पीजीआई लखनऊ में भर्ती कराया गया लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उन्हें बचाया नहीं जा सका। सोमवार की सुबह वह इस दुनिया से विदा हो गए।
मुझे ठीक से याद है कि नब्बे के दशक में जब प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी ने राजनीति में कदम रखा तो पीसी जोशी जी राजनीतिक गतिविधियों से दूर अपने बिजनेस में ही लगे रहते थे। रीता जी को कभी कभार उनकी किसी मदद की जरूरत पड़ी तो वह चुपचाप सहयोग करते रहे लेकिन राजनीतिक रुतबे में शामिल होना उनके स्वभाव से नहीं था। रीता जी इलाहाबाद की मेयर चुनी गई थीं। उन दिनों मोतीलाल वोरा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे। मैंने एक पुस्तक लिखी थी। उसका आमुख वोरा जी से इसलिए लिखवाना चाहता था कि नेता बनने से पहले वह पत्रकार हुआ करते थे।‌ वोरा जी रीता जी का बहुत सम्मान करते थे। मैं रीता जी के साथ इलाहाबाद से लखनऊ आया। पीसी जोशी जी भी साथ थे। रास्ते में जोशी जी से खूब संवाद हुआ। हम लोग रीता जी के लखनऊ स्थित आवास पर रुके और शाम को राजभवन गए। राज्यपाल वोरा जी के साथ भोजन करते समय पुस्तक को लेकर बात होने लगी तो जोशी जी ने उसका व्योरा दिया। वोरा जी ने आमुख लिखने के लिए सहर्ष हामी भरी। पाण्डुलिपि रखवा ली। दूसरे दिन सुबह सुबह देखा कि जोशी जी खुद चाय लेकर मेरे कमरे में आए। यह उनकी सरलता का उदाहरण है। मुझे संकोच भी हुआ लेकिन हम लोगों ने साथ बैठकर चाय पी और कई विषयों पर चर्चा की।
इसके बाद मैं जब कभी भी रीता जी के घर जाता और जोशी जी होते तो खूब बातें होतीं। उन्हें इस बात का कोई घमंड नहीं था कि वह देश के विख्यात नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हेमवती नंदन बहुगुणा के दामाद हैं या इलाहाबाद की मेयर के पति हैं।
एक वाकया याद आता है। जब प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी उत्तर प्रदेश सरकार में पर्यटन मंत्री थीं तो प्रयागराज में एक वैवाहिक समारोह में हम साथ साथ लखनऊ से गए। रास्ते में तय हुआ कि मेरी दोनों बेटियों स्मिता और अमृता को भी उस समारोह में जाना है। रीता जी चूंकि मेरे पूरे परिवार से बखूबी परिचित हैं। तो प्रयागराज पहुंच कर स्टैनली रोड स्थित मेरे घर से उन दोनों को साथ बैठाया गया। आगे चलकर मिंटो रोड पर रीता जी का घर है। जोशी जी को भी साथ जाना था, गाड़ी में वह भी आ गए। वैसे तो पीसी जोशी जी संकोची स्वभाव के थे लेकिन रास्ते में बेटियों से उनके खाने-पीने की आदतों, पसंद-नापसंद की बात करते रहे। यह बात उनके अपनेपन को दर्शाती है।
जोशी जी आदर्श पति कहे जा सकते हैं कि वह अपनी नेता धर्मपत्नी के लिए हमेशा सकारात्मक अंदाज में रहे। कभी किसी बात पर अड़चन नहीं डाली। आजीवन उनके एक अच्छे दोस्त की तरह रहे। दोनों के बीच एक अद्भुत केमिस्ट्री पूरे जीवन बनी रही, जिसके गवाह वह सभी लोग हैं जो रीता जी और उनके परिवार को ठीक से जानते हैं।
ऐसे सरलमना इंसान का जाना उन सबको दुखी कर गया जो उन्हें जीजा जी कहकर ही पुकारते थे। वह केवल विजय बहुगुणा और शेखर बहुगुणा के ही नहीं, रीता जी के समकक्षों और उनसे जुड़े लाखों लोगों के जीजा जी रहे हैं। उन्हें याद करते हुए मन भावुक हो रहा है। इन्हीं चंद शब्दों के साथ मैं पीसी जोशी जी की स्मृतियों को सादर नमन करता हूं। साथ ही ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह आदरणीया बहन रीता बहुगुणा जोशी जी और उनके परिवार को यह असीम दुख सहने की शक्ति प्रदान करे।

May 4, 2026

ममता का मिथक टूटा, मुखर्जी का मंत्र लौटा: केसरिया हुआ बंगाल

Article Posted on 04.05.2026 Time 06.30 PM Monday, West Bengal Election, Writer: Pranay Vikram Singh

प्रणय विक्रम सिंह

पश्चिम बंगाल का सियासी आसमान केसरिया हो गया। ‘ममता’ का अभेद्य महल ढह गया। दिल में ‘काबा’, नयन में ‘मदीना’ रखने वाली TMC आज बंगाल के सियासी समर में नेस्तनाबूद हो गई। जो बात वर्षों तक बंगाल के मन में थी, वह आज साहस के स्वर में ढलकर गूंज रही है कि हम हिंदू हैं… और अपने होने पर हमें गर्व है।

यह जनादेश TMC सरकार के संरक्षण में पल रहे तुष्टिकरण माफिया, सैंड माफिया, कोल माफिया, लैंड माफिया, घुसपैठ माफिया और कैटल माफिया के चंगुल में जकड़े बंगाल की मुक्ति का दस्तावेज है। इस विजय के साथ ही बंगाल की राजनीति का चक्र वहीं लौट आया है, जहां से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपनी वैचारिक यात्रा प्रारंभ की थी। यह जनादेश उनके बलिदान, उनकी दृष्टि और बंगाल के प्रति उनकी अटूट निष्ठा पर इतिहास की सबसे भव्य और भावपूर्ण मुहर है।

भारतीय जनता पार्टी की विजय केवल मतों का गणित नहीं, बल्कि मनों का मंथन और मान्यताओं का परिवर्तन है। बंगाल में रिकॉर्ड मतदान उद्घोष था कि इस बार लोग ‘डरे’ नहीं। लगभग 1 लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती ने मतदान केंद्रों पर सुरक्षा की ऐसी छाया दी, जिसमें मतदाता ने पहली बार ‘मन की मुहर’ खुलकर लगाई।

बंगाल की राजनीति का एक पक्ष लंबे समय तक रक्तरंजित रीतियों, रंजिशों और रसूख की राजनीति से जुड़ा रहा है। पोस्ट-पोल वायलेंस के घाव यहां गांव-गांव में दिखाई देते थे। क्लब कल्चर के नाम पर स्थानीय स्तर पर पनपे दबाव-तंत्र, संगठित समूहों का प्रभाव और प्रशासनिक संरचनाओं पर उनकी छाया लोकतंत्र को सीमित कर दिया था। किंतु इस जनादेश ने स्पष्ट कर दिया है कि जनता अब भय के उस फलक को तोड़कर विश्वास के विस्तार की ओर बढ़ चुकी है।

चुनाव परिणामों में भाजपा और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की सीटों का विशाल अंतर भले संख्यात्मक लगे, पर इसके भीतर मनोवैज्ञानिक बदलाव का विशाल आयाम छिपा है, नाराजगी से निर्णय तक की यात्रा। यह नाराजगी केवल शासन से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से थी जिसे तुष्टीकरण कहते हैं। बहुसंख्यक समाज के भीतर पनपी पीड़ा, अवसरों की असमानता की अनुभूति और प्रशासनिक असंतुलन का आभास ये सभी भाव लंबे समय से भीतर-ही-भीतर सुलगते रहे। इस चुनाव ने उस सुलगन को स्वर दिया।

इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय नेतृत्व की छाया भी स्पष्ट दिखती है। नरेंद्र मोदी का विकास-विश्वास-विस्तार का मंत्र, अमित शाह की संगठन-संरचना-संकल्प की सघनता और योगी आदित्यनाथ का सुरक्षा-सख्ती-सुशासन का मॉडल ने मिलकर एक ऐसा राजनीतिक प्रतिरूप रचा, जिसने बंगाल के मतदाता के मन में विकल्प की स्पष्टता दी।

अब नजर उस भविष्य पर है, जिसे यह जनादेश आकार देगा। विकास के मोर्चे पर यह जनादेश नई अपेक्षाएं लेकर आया है। बंद पड़े कारखानों की चिमनियां फिर से धुआं उगलें, बंदरगाहों की रफ्तार तेज हो और युवाओं के हाथों को काम मिले, यह उम्मीद अब हवा में तैरती है। राज्य का जीडीपी लगभग ₹17 लाख करोड़ के आसपास है, पर इसकी औद्योगिक वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से पीछे रही है। यदि नई सरकार गति, कनेक्टिविटी और रोजगार के त्रिकोण को प्राथमिकता देती है और कोलकाता पोर्ट, हल्दिया डॉक, दीनदयाल औद्योगिक कॉरिडोर और पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं तेज़ी पकड़ती हैं तो बंगाल पूर्वी भारत का आर्थिक इंजन बन सकता है। विदित हो कि निवेश वहीं जाता है, जहां नीतियां स्पष्ट और व्यवस्था विश्वसनीय हो और विश्वसनीयता का बीज सुरक्षा और स्थिरता की मिट्टी में ही पनपता है।

लेकिन बंगाल केवल अर्थशास्त्र नहीं है। वह एक संस्कृति-समृद्ध सभ्यता भी है। दुर्गा पूजा के ढाक की ध्वनि, काली मंदिरों की आरती और स्वामी विवेकानंद की वाणी इस भूमि की आत्मा रचते हैं। पूरी संभावना है कि नई सरकार के सहयोग से यह सभी मिलकर एक ऐसे सांस्कृतिक स्वाभिमान को जन्म देंगे, जहां पहचान पर संकट नहीं, बल्कि आत्मगौरव का आलोक होगा। जहां परंपरा प्रगति की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि प्रेरक शक्ति बनेगी। यह पुनर्जागरण ऐसा हो सकता है, जैसे राख से उठता हुआ फीनिक्स अपनी ही ज्वाला से नया जीवन पाता हुआ।

लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक सीमाएं हिंदी पट्टी तक सिमटी हुई हैं। परंतु बंगाल विजय ने इस मिथक को निर्णायक रूप से तोड़ दिया है। यह स्पष्ट संदेश है कि भाजपा अब एक ऐसी शक्ति है जो पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सक्षम है। गंगोत्री से गंगासागर तक भाजपा है।

इस परिणाम का सबसे तीखा प्रभाव विपक्षी राजनीति पर पड़ेगा। तृणमूल कांग्रेस जैसे गढ़ का ढहना केवल एक राज्य की हार नहीं, बल्कि उस पूरी वैचारिक संरचना का संकट है, जो भाजपा के विरोध को ही अपनी राजनीति का आधार मानती रही। अब विपक्ष के सामने केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न खड़ा है नेतृत्व कौन करेगा, दिशा क्या होगी और जनता को क्या विकल्प देगा? इससे विपक्षी दलों के बीच नेतृत्व और दिशा को लेकर असमंजस और गहरा सकता है।

इस जनादेश ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को भी नई राजनीतिक वैधता प्रदान की है। यह विजय केवल संगठनात्मक क्षमता का परिणाम नहीं, बल्कि उस विश्वास का प्रमाण है, जो जनता ने उनकी नीतियों, निर्णयों और दृष्टि पर जताया है। जब कोई राजनेता अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र से बाहर जाकर भी जनसमर्थन अर्जित करता है, तो वह केवल राजनेता नहीं रहता, वह एक राष्ट्रीय प्रवाह बन जाता है। वर्तमान समय में मोदी इस श्रेणी के एक मात्र राजनेता हैं।

बंगाल की इस जीत ने ‘डबल इंजन’ मॉडल को एक नए आयाम में परिवर्तित कर दिया है। अब उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के साथ उभरता Triple Engine Corridor केवल विचार नहीं, बल्कि ठोस नीति की दिशा बन चुका है। यह परिवर्तन पूर्वी भारत को नई आर्थिक ऊर्जा, औद्योगिक विस्तार और अवसंरचनात्मक सशक्तता प्रदान करते हुए आने वाले दशकों की विकास-दिशा तय करेगा।

इसके साथ ही यह परिणाम राष्ट्रीय विमर्श को भी प्रभावित करेगा। 2029 के आम चुनावों की दृष्टि से भी यह विजय अत्यंत महत्वपूर्ण है। बंगाल जैसे बड़े राज्य में भाजपा की सफलता का अर्थ है लोकसभा में संभावित सीटों की बढ़ोतरी, जो भविष्य की सत्ता-समीकरणों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकती हैं। यह जीत भाजपा को न केवल राजनीतिक बढ़त देती है, बल्कि मनोवैज्ञानिक बढ़त भी प्रदान करती है, जो किसी भी चुनावी युद्ध में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

अंततः यह परिणाम बंगाल की जीतने से अधिक ‘जागने’ की दास्तान है। यह भय से विश्वास, असंतोष से विकल्प और क्षेत्रीय राजनीति से व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि की ओर बढ़ते भारत की कहानी है।

April 29, 2026

प्रदेश के विकास का एक्सप्रेस वे बनेगा गंगा एक्सप्रेस वे मृत्युंजय दीक्षित

Mratunjay Dixit, Journalist lucknow

मृत्युंजय दीक्षित
उत्तर प्रदेश में अवस्थापना विकास के क्रम में निर्मित गंगा एक्सप्रेस वे आम जनमानस के लिए खुल रहा है जिसे प्रदेश के विकास में मील का पत्थर माना जा रहा है। 594 किलोमीटर लंबा गंगा एक्सप्रेस वे प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र (दिल्ली -एनसीआर) को पूर्वी क्षेत्र से जोड़ने वाला पहला सीधा हाई स्पीड एक्सप्रेस वे है। इस परियोजना पर 36,230 करोड़ की लागत आर्इ है। यह एक्सप्रेस वे मेरठ के बिजौली गाँव से प्रारंभ होकर बुलंदशहर, हापुड़, अमरोहा, शाहजहांपुर, संभल, बंदायू, उन्नाव, हरदोई, प्रतापगढ़, रायबरेली होते हुए प्रयागराज जिले के जुडापुर दांदू गांव तक जाएगा। इस एक्सप्रेस वे के प्रारंभ हो जाने के बाद देश के एक्सप्रेस वे नेटवर्क में यूपी की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत हो जाएगी और परियोजनाओं की कुल लंबाई 1910 किमी हो जाएगी। छह लेन का यह एक्सप्रेस वे पूरी तरह ग्रीनफील्ड व एक्सेस -कंट्रोल्ड है। इसमें 3.75 मीटर चौड़ी सर्विस रोड, 17 टोल प्लाजा 8 मुख्य पुल और 381 अंडरपास शामिल हैं।
यह भारत का पहला ऐसा एक्सप्रेस है जिस पर होटल, ढाबा और ईवी चार्जिंग स्टेशन से लेकर अस्पताल तक बनाए गए हैं। इस एक्सप्रेस वे पर विश्वस्तरीय फूड चेन और मोटेल तक की सुविधाएं मिलेगी। 594 किमी लंबे इस एक्सप्रेस वे का 80 प्रतिशत निर्माण अडानी इंटरप्राइजेज ने किया है।अडानी ने प्रयागराज से बदायूं तक 464 किमी लंबा एक्सप्रेस वे बनाया है जबकि शेष 20 प्रतिशत आईआरबी इंफ्रास्ट्रक्चर ने बनाया है।
एक्सप्रेस वे मतल्टीनेशनल चेन भी उपलब्ध – एक्सप्रेस वे पर लखनऊ के खानपान और चिकनकारी की झलक दिखाई पड़ेगी। इस वे पर एक बड़ा डाइनिंग फूड एरिया विकसित किया गया है। पहली बार किसी एक्सप्रेस वे पर ट्रक लेन बनाया गया है। मोटेल भी तैयार हो गया है जहां विश्राम के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त कमरे उपलब्ध हैं। स्टारबक्स जैसे बड़े ब्रांड के साथ गंगा भोग ढाबा भी है। इसमें लोकप्रिय मुरथल ढाबे को लाने का भी प्रयास चल रहा है। यहां पर एक ट्रामा सेन्टर भी तैयार किया गया है।एक्सप्रेस वे पर सुविधा केंद्रों में बच्चों के लिए चिल्ड्रन प्ले एरिया भी बनाया गया है जहां बच्चों के खेलने के लिए झूला पार्क भी बनाया गया है।ड्राइवरों के लिए भी अलग- अलग विश्राम एरिया बनाया गया है।हर क्षेत्र में वाहनों के लिए सर्विस सेंटर बनाया गया है।यह एक्सप्रेस वे 12 जिलों को जोड़ते हुए प्रयागराज से मेरठ की दूरी मात्र 6 घंटे में समेट देगा। वाहनों की 120 किमी प्रति घंटा गति, एयर स्ट्रिप, हाईटेक टेाल और दुर्घटना रोकने वाली अलर्ट स्ट्रिप्स जैसी आधुनिक सुविधाओं से लैस यह एक्सप्रेस वे प्रदेश की कनेक्टिविटी के परिदृश्य को बदलकर रख देगा।
वायुसेना के लिए भी अहम बनेगा एक्सप्रेस वे – यह एक्सप्रेस वे नागरिकों का सफर आसान बनाने के साथ ही भारतीय वायुसेना की ताकत भी बनने वाला है। एक्सप्रेस वे पर शाहजहांपुर के जलालाबाद में 3.5 किमी की हवाई पट्टी का भी निर्माण किया गया है। आपातकालीन स्थिति व युद्ध होने पर रणनीतिक तौर पर यह हवाई पट्टी लड़ाकू विमानों के उतरने व उड़ान भरने के लिए भी इस्तेमाल की जा सकेगी। इस हवाई पट्टी का निर्माण सभी प्रकार के लड़ाकू व परिवहन विमानों के हिसाब से किया गया है। इस पर राफेल सुखोई -0 एमकेआई मिराज 2000 जगुआर और मिग 29 जैसे लडाकू और सी -130 जे सुपर हरक्यूलिस और एएन -32 जैसे वायुसेना के विमान उतरने के साथ-साथ उड़ान भी भर सकेंगे। इस पर रात में भी लड़ाकू विमानो के उतरने और उड़ान भरने की सुविधा होगी। इसके लिए एक्सप्रेस वे पर प्रीसिज़न अप्रोच लाइंटिंग सिस्टम व उन्नत नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। साथ ही इाई इंटेसिटी रनवे लाइटिंग का उपयोग किया गया है। हवाई पट्टी की सुरक्षा के लिए 250 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। जो किसी भी आपातकालीन स्थिति पर नज़र रखने के लिए सहायक हैं।
इस एक्सप्रेस वे का संचालन पूरी तरह आरम्भ हो जाने के बाद 12 जिलों के औद्योगिक विकास को गति मिलेगी जिससे क्षेत्र के युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे तथा पलायन कम होगा। प्रदेश सरकार की योजना इसके किनारे 27 औद्योगिक क्लस्टर बनाने की है जिसके लिए भूमि का अधिग्रहण हो चुका है और आवंटन चल रहा है।इससे रसद आपूर्ति, खाद्य प्रसंस्करण वस्त्र उद्योग और विनिर्माण क्षेत्र को नई ऊर्जा मिलेगी। मेरठ के खेल उद्योग, हापुड़ के हथकरघा, बंदायू के जरी जरदोजी और प्रयागराज के कृषि उत्पादों को अब दिल्ली और पूर्वांचल के बाजारो तक पहुंचना आसान होगा।
प्रमुख विशेषताएं – इस एक्सप्रेस वे की पूरी सड़क पर जल संचयन प्रणाली लगाई गई है ताकि वर्षा का जल सीधे जमीन के अंदर जाए और भूजल स्तर पर बना रहे। यह भारत का सबसे लंबा निरंतर नियंत्रित प्रवेश एक्सप्रेस वे है जहां आवारा पशुओं व स्थानीय यातायत के अनियंत्रित प्रवेश को पूरी तरह से रोका गया है। यह परियोजना टिकाऊ इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन उदाहरण है। इसके निर्माण में भारी मात्रा में कोयले की राख का उपयोग किया गया है जो प्रदूषणा कम करने में सहायक है। पहले सभ्यताएं नदियों के किनारे बसती थीं किंतु अब एक्सप्रेस वे के किनारे होती हैं इसे ध्यान मे रखते हुए एक्सप्रेस वे किनारे 18 लाख से अधिक पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया है। गंगा एक्सप्रेस वे के निर्माण की गुणवत्ता को एक्सीलेंट रेटिंग मिली है ।
विशिष्ट सुरक्षा तकनीक भी – यहां पर विशिष्ट सुरक्षा तकनीक का प्रयोग किया गया है। सड़क के दोनों किनारों पर व्हाइट एलर्ट स्ट्रिप लगाई गई है। यदि किसी चालक को झपकी आ जाए और वाहन इन स्ट्रिप पर चढ़ जाए तो तेज कंपन और आवाज पैदा होगी जिससे चालक तुरंत सतर्क हो जाएगा और दुर्घटना टल जाएगी। इस सड़क पर चलने के दौरान झटके और कंपन महसूस नही होंगे।
मंदिर आर्थिकी व पर्यटन को गति मिलेगी – गंगा एक्सप्रेस वे का निर्माण हो जाने के बाद अब मंदिर आधारित आर्थिकी व पर्यटन को भी गति मिलेगी। यह एक्सप्रेस वे यात्रा को ही आसान नहीं करेगा अपितु प्रदेश में आध्यात्मिक व धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा देगा । 12 जिलों से होकर गुजरने वाले इस एक्सप्रेस वे से प्रमुख आध्यात्मिक व धार्मिक स्थल जुड़ रहे हैं – इनमें गढ़मुक्तेश्वर, कल्कि धाम, बेल्हा देवी धाम, चंद्रिकादेवी शक्ति पीठ और त्रिवेणी संगम शामिल हैं। एक्सप्रेस वे शुरू हो जाने के बाद श्रद्धालु इन तीर्थों के दर्शन आसानी से कर सकेंगे । आगामी समय में वाराणसी, मिर्जापुर और सोनभद्र तक इसका विस्तार किया जिससे वाराणसी , विन्ध्याचल और अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि होगी।

« Newer PostsOlder Posts »